
PART 1
गुरुग्राम के उस संगमरमर वाले डाइनिंग हॉल में 7 महीने की गर्भवती अनन्या मेहरा पर उसकी सास ने गंदे बर्फीले पानी की बाल्टी उछाल दी।
कुछ पल के लिए पूरी मेज चुप हो गई, फिर किसी ने हँसी दबाई, किसी ने नैपकिन से होंठ छिपाए, और अर्जुन मल्होत्रा, अनन्या का पूर्व पति, अपनी कुर्सी पर पीछे झुक गया ताकि उसके महंगे कुर्ते पर छींटे न पड़ें।
सावित्री मल्होत्रा ने बाल्टी नीचे रखी और मोतियों की माला सीधी करते हुए बोली—
—अब शायद इस लड़की को अपनी औकात याद रहेगी।
डाइनिंग हॉल में चांदी की थालियाँ सजी थीं। बाहर मानसून की बारिश काँच की ऊँची खिड़कियों पर थपथपा रही थी। अंदर गुलाब, अगरबत्ती और महंगे इत्र की मिली-जुली गंध थी। यह वही घर था जहाँ अनन्या कभी बहू बनकर आई थी, और आज उसे ऐसे बुलाया गया था जैसे कोई गलती सुधारी जा रही हो।
अर्जुन ने फोन पर कहा था—
—अनन्या, माँ चाहती हैं कि सब शांति से हो। बच्चा जन्म लेने वाला है। परिवार की इज्जत के लिए बैठकर बात कर लेते हैं।
अनन्या गई थी, क्योंकि उसके भीतर पल रहा बच्चा किसी युद्ध का वारिस नहीं होना चाहिए था।
वह भूल गई थी कि कुछ घरों में शांति सिर्फ कमजोर को चुप कराने का दूसरा नाम होती है।
मेज पर अर्जुन के साथ निशा कपूर बैठी थी, वही औरत जिसके लिए अर्जुन ने अनन्या को तलाक के कागज भेजे थे। निशा की कलाई में हीरे चमक रहे थे, और चेहरे पर ऐसी मुस्कान थी जैसे किसी और की टूटन भी उसके लिए मनोरंजन हो।
सावित्री ने अनन्या को सिर से पाँव तक देखा।
—मल्होत्रा खानदान में आने के बाद भी चाल-ढाल वैसी ही रही। न रूप, न रुतबा, न बोलने का सलीका। अर्जुन ने न जाने किस भावुकता में यह बोझ उठा लिया था।
निशा हँसी।
—आंटी, अब तो जाने दीजिए। बच्चा है, इसलिए बुला लिया। वरना ऐसी औरतें तो हमारे ड्राइवरों के घर भी बहुत संभलकर आती हैं।
अर्जुन ने उसे रोका नहीं।
अनन्या की उँगलियाँ अपनी गोद में रखे दुपट्टे को कसकर पकड़ चुकी थीं। उसका क्रीम रंग का सूट अब पेट पर तना हुआ था। बच्चे ने हल्की सी करवट ली, जैसे भीतर से पूछ रहा हो कि बाहर इतनी ठंड क्यों है।
अनन्या ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह जानती थी, इस परिवार में शब्द जाल होते हैं। वह रोती तो कमज़ोर कहलाती। वह बोलती तो बदतमीज। वह चुप रहती तो नीच समझी जाती।
लेकिन उसकी चुप्पी कभी डर नहीं थी।
वह सावधानी थी।
सावित्री उठी और रसोई की तरफ गई। सबको लगा शायद मिठाई आने वाली है। वह लौटी तो हाथ में लोहे की बाल्टी थी। उसमें बर्फ के टुकड़े तैर रहे थे, और पानी मटमैला था, जैसे फर्श धोने के बाद बचा हो।
अनन्या ने बस एक पल के लिए अर्जुन को देखा।
उसे लगा, शायद वह उठेगा। शायद कहेगा कि बस बहुत हुआ। शायद कम से कम अपने बच्चे की माँ के लिए खड़ा होगा।
पर अर्जुन ने सिर्फ अपनी कुर्सी पीछे खिसका ली।
अगले ही पल पानी उसके सिर, चेहरे, सीने और पेट पर गिरा। बर्फ के टुकड़े उसके गले से होते हुए गोद में गिरे। उसका दुपट्टा भीगकर शरीर से चिपक गया। ठंड उसके भीतर तक उतर गई।
निशा ने नाक सिकोड़कर कहा—
—किसी को पोछा बुलाना चाहिए, लकड़ी का फर्श खराब हो जाएगा।
सावित्री ने संतोष से कहा—
—अब थोड़ी सफाई हो गई।
अनन्या काँपी, मगर झुकी नहीं।
उसने पेट पर हाथ रखा। बच्चा जोर से हिला। वह दर्द नहीं था, वह याद दिलाना था।
वह अकेली नहीं थी।
अनन्या ने भीगे हुए बैग से मोबाइल निकाला। स्क्रीन पर पानी की बूंदें थीं, पर फोन चल रहा था।
अर्जुन हँसा।
—किसे फोन करोगी? अपनी माँ को? या उस पुराने वकील को जो तलाक में भी तुम्हें कुछ दिला नहीं पाया?
अनन्या ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में आँसू नहीं थे। सिर्फ एक ऐसी शांति थी, जिससे अमीर लोग डरते हैं क्योंकि वह बिकती नहीं।
उसने ध्रुव सिन्हा को फोन मिलाया, जो सूर्योदय समूह का मुख्य कानूनी अधिकारी था। वही सूर्योदय समूह, जहाँ अर्जुन, सावित्री, निशा और मल्होत्रा परिवार के कई रिश्तेदार बड़े पदों पर बैठे थे।
ध्रुव ने पहली घंटी में फोन उठाया।
—मैडम, सब ठीक है?
अनन्या ने धीमे कहा—
—प्रक्रिया 7 लागू कर दीजिए।
दूसरी तरफ सन्नाटा छा गया।
फिर ध्रुव की आवाज आई—
—अगर यह हुआ, तो आज रात से मल्होत्रा परिवार का हर अधिकार रुक जाएगा।
सावित्री की मुस्कान जम गई।
अर्जुन की भौंहें सिकुड़ीं।
निशा का गिलास हवा में ही ठहर गया।
अनन्या ने पेट पर हाथ रखा।
—अभी।
उसने फोन काट दिया।
कुछ सेकंड तक सिर्फ उसके बालों से पानी टपकने की आवाज आती रही।
अर्जुन ने बनावटी ठहाका लगाया।
—प्रक्रिया 7? अब तुम कारोबारी नाटक भी करने लगीं?
अनन्या चुप रही।
रात 9:18 पर अर्जुन का मोबाइल काँपा।
फिर सावित्री का।
फिर निशा का।
फिर मेज पर रखे हर फोन की घंटी एक साथ बजने लगी।
अर्जुन ने स्क्रीन देखी।
और पहली बार उसके चेहरे से घमंड उतर गया।
PART 2
संदेश सूर्योदय समूह के निदेशक मंडल से था।
“प्रक्रिया 7 तत्काल प्रभाव से लागू। अर्जुन मल्होत्रा, सावित्री मल्होत्रा, निशा कपूर और पारिवारिक नियुक्तियों से जुड़े सभी अधिकारियों के अधिकार जाँच पूरी होने तक निलंबित। सभी प्रवेश-पत्र, कंपनी खाते, गाड़ियाँ, आवासीय सुविधाएँ और निर्णयाधिकार रोके जाते हैं। आदेश: बहुलांश स्वामित्व न्यास ए.एम.”
सावित्री की आवाज फट गई।
—यह ए.एम. कौन है?
अर्जुन ने कोई जवाब नहीं दिया।
अनन्या जानती थी।
ए.एम. यानी अनन्या मेहरा।
6 साल पहले, जब सूर्योदय समूह कर्ज, झूठे ठेकों और फर्जी लाभ के बोझ तले डूब रहा था, अनन्या सिर्फ अर्जुन की शांत पत्नी नहीं थी। वह पुनर्गठन विशेषज्ञ थी। उसने फाइलों में छिपे गड्ढे देखे, गलत सौदे पहचाने और अपने नाना के छोड़े हुए न्यास से कंपनी में पूंजी लगाई।
धीरे-धीरे उसने नियंत्रण वाली हिस्सेदारी खरीद ली।
निदेशक मंडल जानता था। ध्रुव जानता था। अर्जुन नहीं जानता था, क्योंकि सावित्री ने कहा था कि बेटे का अहंकार टूट जाएगा।
अनन्या ने तब चुप रहकर पति का सम्मान बचाया था।
आज उसी चुप्पी ने साम्राज्य हिला दिया।
डाइनिंग हॉल के दरवाजे खुले। 2 सुरक्षा अधिकारी और काले सूट में एक महिला भीतर आई।
—श्री मल्होत्रा, श्रीमती मल्होत्रा, सुश्री कपूर, कृपया कंपनी के उपकरण सौंप दीजिए।
अर्जुन गरजा—
—यह मेरी माँ का घर है।
महिला ने शांत स्वर में कहा—
—यह घर सूर्योदय समूह की प्रतिनिधि संपत्ति है। निजी संपत्ति नहीं।
सावित्री ने मेज पकड़ ली।
महिला अनन्या की ओर मुड़ी।
—मैडम, डॉक्टर बाहर हैं। क्या बच्चे की जाँच चाहिए?
पूरा कमरा पत्थर हो गया।
अनन्या उठी। पानी अब भी टपक रहा था, मगर उसकी रीढ़ सीधी थी।
अर्जुन आगे बढ़ा।
—तुम कहीं नहीं जाओगी जब तक बताओगी नहीं कि किया क्या है।
एक सुरक्षा अधिकारी बीच में आ गया।
अनन्या ने आखिरी बार उसे देखा।
—तुम्हें तलाक के कागज पढ़ लेने चाहिए थे।
बाहर ध्रुव छाते के नीचे खड़ा था।
अस्पताल में जब बच्चे की धड़कन तेज, साफ और जिंदा सुनाई दी, तब अनन्या पहली बार रोई।
लेकिन सुबह 11:00 बजे वह सूर्योदय समूह के बोर्डरूम की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठी थी।
और मेज पर रखी फाइल में वह सच था, जो अर्जुन को सिर्फ नौकरी से नहीं, आजादी से भी दूर कर सकता था।
PART 3
दिल्ली की उस सुबह में बारिश थम चुकी थी, मगर मल्होत्रा परिवार पर तूफान अभी शुरू हुआ था।
सूर्योदय समूह के मुख्यालय में हर मंजिल पर कानाफूसी थी। वही कर्मचारी, जो कल तक अर्जुन को “सर” कहकर झुकते थे, आज उसके प्रवेश-पत्र के लाल चमकने की खबर एक-दूसरे को धीमी आवाज में सुना रहे थे।
अर्जुन सुबह 10:15 पर आया था। नीला बंदगला, चमकते जूते, चेहरे पर वही पुराना मालिकाना भाव। उसने सोचा होगा कि रात का संदेश कोई गलतफहमी था। उसने प्रवेश-द्वार पर कार्ड लगाया।
लाल बत्ती जल गई।
सुरक्षा अधिकारी ने विनम्रता से कहा—
—क्षमा कीजिए, आपका प्रवेश निलंबित है।
अर्जुन का चेहरा सख्त हो गया।
—जानते हो किससे बात कर रहे हो?
अधिकारी ने स्क्रीन की ओर देखा।
—फिलहाल एक निलंबित अधिकारी से।
10 मिनट बाद सावित्री आईं। उनके साथ 2 रिश्तेदार थे, जिन्हें कंपनी में सलाहकार पद मिले हुए थे, जबकि किसी को मालूम नहीं था कि वे सलाह देते किस बात की हैं।
उनका प्रवेश भी बंद था।
निशा ने पार्किंग के निजी प्रवेश से अंदर जाने की कोशिश की। वहाँ भी वही लाल बत्ती जली।
ऊपर, 18वीं मंजिल पर, अनन्या बोर्डरूम में बैठी थी। उसने काले रंग की मातृत्व साड़ी पहनी थी। बाल कसकर बंधे थे। आँखों के नीचे रात की थकान थी, पर आवाज में कोई कंपन नहीं था।
ध्रुव सिन्हा ने फाइलें खोलीं।
पहली फाइल में वे खर्चे थे, जिन्हें “ग्राहक सत्कार” कहा गया था—सावित्री के निजी मंदिर-समारोह, निशा के गोवा प्रवास, अर्जुन के दोस्तों की शराब पार्टियाँ, रिश्तेदारों की विदेश यात्राएँ।
दूसरी फाइल में उन कर्मचारियों के बयान थे, जिन्हें अर्जुन ने झूठे आंकड़े बनाने को दबाव दिया था।
तीसरी फाइल में वह सबसे भारी सबूत था—ईमेलों की श्रृंखला, जिसमें अर्जुन और निशा एक नया निवेशक लाने की योजना बना रहे थे ताकि कंपनी का एक हिस्सा गुप्त रूप से बेचकर अलग निजी कोष बनाया जा सके।
और चौथी फाइल ने कमरे की हवा बदल दी।
उसमें अस्पताल की रिपोर्ट थी।
तलाक की कार्यवाही के दौरान अर्जुन ने अदालत में कहा था कि वह बच्चे की जिम्मेदारी स्वीकार करेगा, पर बाद में सावित्री के कहने पर उसने निजी तौर पर पितृत्व पर संदेह जताने की तैयारी शुरू की थी। उसने एक सलाहकार से कहा था कि बच्चे के जन्म के बाद “परिवार की छवि बचाने” के लिए अनन्या को मानसिक रूप से अस्थिर साबित करना होगा।
ध्रुव ने धीमे स्वर में कहा—
—मैडम, कल रात का वीडियो भी मिल गया है। घर की सुरक्षा रिकॉर्डिंग में पूरी घटना है।
अनन्या ने आँखें बंद कीं।
वह चाहती तो सिर्फ कंपनी बचाती। वह चाहती तो सिर्फ अपनी हिस्सेदारी घोषित करती। लेकिन अब यह सिर्फ कारोबार नहीं था।
यह उसके बच्चे की सुरक्षा थी।
निदेशक मंडल ने 2 घंटे तक सबूत देखे। कोई शोर नहीं हुआ। कोई भावुक भाषण नहीं। सिर्फ तथ्य, हस्ताक्षर, नियम और वह ठंडी सच्चाई कि जिस परिवार ने खुद को सूर्योदय समूह का जन्मदाता समझा था, वह वर्षों से उसी स्त्री की कमाई पर जी रहा था जिसे वे “नीचे घर की लड़की” कहते थे।
दोपहर 12:00 बजे मतदान हुआ।
अर्जुन मल्होत्रा हटाया गया।
सावित्री मल्होत्रा की सभी सुविधाएँ समाप्त हुईं।
निशा कपूर को तत्काल प्रभाव से निकाला गया।
पारिवारिक नियुक्तियों की विशेष जाँच बैठी।
और अनन्या मेहरा को अंतरिम कार्यकारी अध्यक्ष घोषित किया गया।
जब सार्वजनिक घोषणा निकली, कारोबार जगत चौंक गया।
“सूर्योदय समूह में बड़ा बदलाव, छिपी बहुलांश स्वामिनी अनन्या मेहरा ने संभाला नियंत्रण।”
दोपहर तक समाचार पोर्टलों ने पुराने फोटो निकाल लिए। समारोहों में अर्जुन आगे, सावित्री बीच में, और पीछे कोने में खड़ी अनन्या। कभी साधारण सूती साड़ी में, कभी बिना गहनों के, कभी फाइल पकड़े, कभी चुप।
लोग लिख रहे थे कि असली मालिक तो हमेशा फ्रेम में थी, बस किसी ने देखा नहीं।
अर्जुन ने 52 बार फोन किया।
अनन्या ने एक भी कॉल नहीं उठाई।
सावित्री का संदेश आया—
“बात परिवार में बैठकर होनी चाहिए।”
अनन्या ने संदेश पढ़ा, फोन रखा और ध्रुव से कहा—
—कानूनी नोटिस भेजिए। अब परिवार अदालत में परिभाषित होगा, डाइनिंग टेबल पर नहीं।
निशा ने सोशल मीडिया पर लिखा कि अनन्या गर्भावस्था का फायदा उठाकर निर्दोष लोगों को बर्बाद कर रही है। पोस्ट 30 मिनट में उल्टा पड़ गया। पुराने कर्मचारी सामने आए। किसी ने लिखा कि निशा कंपनी के खर्च पर जन्मदिन मनाती थी। किसी ने बताया कि सावित्री कर्मचारियों को मेहमानों के सामने अपमानित करती थीं। किसी ने अर्जुन की मीटिंगों में चिल्लाने की आदत बताई।
रात तक निशा ने पोस्ट हटा दिया।
लेकिन अर्जुन ने हार मानना नहीं सीखा था।
3 दिन बाद वह एक कारोबारी चर्चा कार्यक्रम में दिखा। चेहरा थका हुआ, दाढ़ी हल्की बढ़ी हुई, आवाज नपी-तुली, जैसे वह पीड़ित हो।
—एक पारिवारिक घटना को बदले की आग में बदल दिया गया। अनन्या भावनात्मक रूप से ठीक नहीं है। गर्भावस्था में उसे आराम चाहिए, सत्ता नहीं।
संचालक ने पूछा—
—क्या आपको पता था कि सूर्योदय समूह में बहुलांश स्वामित्व अनन्या मेहरा के पास है?
अर्जुन आधा सेकंड चुप रहा।
वही आधा सेकंड सब समझाने के लिए काफी था।
उसे पता नहीं था।
वह उस महल का राजकुमार बना घूम रहा था, जिसकी नींव किसी और ने खरीदी थी।
इसके बाद उसके लिए सहानुभूति बनाना मुश्किल हो गया। निवेशकों ने दूरी बनाई। पुराने मित्रों ने फोन कम किए। जिन क्लबों में सावित्री की कुर्सी हमेशा सुरक्षित रहती थी, वहाँ लोग अब मौसम की बात करके आगे बढ़ जाते थे।
अनन्या अस्पताल गई, नियमित जाँच कराई और डॉक्टर ने कहा कि बच्चा सुरक्षित है। फिर भी उस रात के बाद वह हर ठंडी चीज से चौंक जाती थी। नर्स ने जब बर्फ वाला पानी पास रखा, तो उसकी उँगलियाँ काँप गईं।
डॉक्टर ने धीरे से कहा—
—सदमा शरीर में भी रह जाता है। खुद पर कठोर मत होइए।
6 सप्ताह बाद बेटे का जन्म हुआ।
अनन्या ने उसका नाम आरव रखा।
न मल्होत्रा परिवार की परंपरा से, न सावित्री की इच्छा से। यह नाम उसने इसलिए चुना क्योंकि उसमें शांति थी, और वह अपने बेटे को शोर से नहीं, शांति से बड़ा करना चाहती थी।
जब आरव को पहली बार उसकी बाँहों में रखा गया, अनन्या ने उसके माथे को होंठों से छुआ।
—तुम्हें कोई यह नहीं सिखाएगा कि किसी को नीचा दिखाना शक्ति है।
पर अर्जुन ने पिता होने का दावा किया।
परिवार अदालत में सब रखा गया—डाइनिंग हॉल का वीडियो, अस्पताल की रिपोर्ट, उसके सार्वजनिक बयान, पितृत्व पर संदेह उठाने की तैयारी, सावित्री के संदेश जिनमें वह लिखती थी कि “बच्चा मल्होत्रा वंश की संपत्ति है।”
अदालत ने अर्जुन को निगरानी में मुलाकात की अनुमति दी।
सावित्री को कोई अधिकार नहीं मिला।
पहली मुलाकात एक तटस्थ केंद्र में हुई। शीशे के उस पार अनन्या बैठी रही। अंदर सामाजिक कार्यकर्ता के सामने अर्जुन ने आरव को गोद में लिया।
वह असहज था। बच्चे को पकड़ना भी जैसे सीखना पड़ रहा था। आरव ने अपनी छोटी उँगली से अर्जुन के कुर्ते का बटन पकड़ा।
अर्जुन की आँखें भर आईं।
अनन्या ने देखा।
उसने अपना दिल कठोर नहीं किया, पर दरवाजा भी नहीं खोला।
क्योंकि क्रूर लोग हर पल क्रूर नहीं होते। यही सबसे बड़ा जाल है। वे कभी दवा भी लाते हैं, कभी हँसाते भी हैं, कभी हाथ भी थामते हैं। और फिर उसी हाथ से अपमान की मेज पर अकेला छोड़ देते हैं।
कुछ अच्छे पल वर्षों की कायरता को माफ नहीं कर सकते।
सूर्योदय समूह में बदलाव शुरू हुआ। अनन्या ने फर्जी पद हटाए। रिश्तेदारी पर बने अनुबंधों की जाँच कराई। कर्मचारियों के वेतन सुधारे। महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश बढ़ाया। शिकायत व्यवस्था को असली शक्ति दी। जिन लोगों को सालों से डराकर चुप कराया गया था, उन्हें पहली बार लगा कि कार्यालय भी न्याय का स्थान बन सकता है।
सावित्री की चैरिटी संस्था की जाँच में निजी खर्च निकले—साड़ियों के बिल, आभूषण, निजी भोज, रिश्तेदारों की यात्राएँ, सब “सामाजिक सेवा” के नाम पर।
अनन्या चाहती तो चुप रह सकती थी, ताकि बदनामी कम रहे।
उसने चुप्पी नहीं चुनी।
सावित्री ने “स्वास्थ्य कारणों” से पद छोड़ा।
दिल्ली जानती थी कारण स्वास्थ्य नहीं था।
1 साल बाद आरव के जन्मदिन पर अर्जुन का हाथ से लिखा पत्र आया। अनन्या ने उसे लगभग फाड़ दिया था। फिर रात में, जब आरव सो रहा था, उसने पढ़ा।
“अनन्या, कंपनी नहीं माँग रहा, पैसा नहीं, माफी भी नहीं। सिर्फ यह स्वीकार करना चाहता हूँ कि तुमसे डरता था। मुझे नहीं पता था कि तुम मालिक हो, पर यह पता था कि तुम मुझसे बेहतर हो। उसी बात ने मुझे छोटा बना दिया।”
यह अर्जुन की वर्षों में पहली ईमानदार पंक्ति थी।
अनन्या ने उसे माफ नहीं किया।
पर उसने एक सीमा तय की।
अर्जुन हर जन्मदिन पर आरव के लिए पत्र भेज सकता था। वे पत्र अनन्या संभालकर रखेगी, जब तक आरव समझने लायक न हो जाए।
यह क्षमा नहीं थी।
यह बंद दरवाजे पर रखा एक डाक-बक्सा था।
वर्ष बीतते गए। अर्जुन धीरे-धीरे बदला। जल्दी नहीं, पूरी तरह नहीं, लेकिन उसने खुद को पीड़ित कहना छोड़ा। वह एक मध्यम कंपनी में काम करने लगा, परामर्श लेने लगा, और आरव से बात करते समय अनन्या को वापस पाने की कोशिश नहीं करता था।
सावित्री नहीं बदली।
एक बार उसने दादी के अधिकार के लिए आवेदन करने की कोशिश की। अनन्या के वकीलों ने अदालत में वही वीडियो जमा करने की तैयारी दिखाई, जिसमें वह गर्भवती बहू पर गंदा बर्फीला पानी फेंक रही थी।
48 घंटे में आवेदन वापस ले लिया गया।
सूर्योदय समूह का नाम बाद में बदल दिया गया। अनन्या नहीं चाहती थी कि कंपनी उस परिवार की पहचान ढोए, जिसने विरासत को योग्यता समझ लिया था।
नया नाम रखा गया—नवप्रकाश कैपिटल।
बाजार ने स्वागत किया।
सावित्री ने इसे विश्वासघात कहा।
अनन्या ने इसे सफाई कहा।
जब आरव 16 का हुआ, अनन्या ने उसे पूरी कहानी बताई। बिना जहर, बिना सजावट। उस रात की मेज से लेकर प्रक्रिया 7 तक, अदालत से लेकर पत्रों तक।
आरव चुपचाप सुनता रहा।
अंत में उसने माँ का हाथ पकड़ा।
—अच्छा हुआ आपने फोन किया था।
अनन्या की आँखें भर आईं।
—हाँ, बहुत अच्छा हुआ।
क्योंकि उस रात सावित्री ने सोचा था कि गंदा पानी किसी औरत को मिटा सकता है।
वह नहीं जानती थी कि कुछ स्त्रियाँ चीखकर नहीं, उठकर जवाब देती हैं।
उन्हें सिर्फ 1 फोन, 1 हस्ताक्षर और इतना साहस चाहिए होता है कि वे उन लोगों को बचाना बंद कर दें, जो उन्हें तोड़ने पर तुले हों।