
PART 1
“अगर माँ होना तुम्हारी नौकरी से बड़ा है, तो तुम्हारे लिए इस कंपनी में कोई जगह नहीं है।”
सोमवार की सुबह 9 बजे से पहले ही नंदिनी शर्मा ने यह वाक्य सुना, और उसे लगा जैसे गुरुग्राम की उस काँच की ऊँची इमारत में किसी ने उसके पैरों के नीचे की जमीन खींच ली हो।
वह मेहता स्ट्रैटेजी एडवाइजर्स के 21वें माले पर खड़ी थी। बाहर साइबर सिटी की सड़कें हॉर्न, मेट्रो की आवाज़ और चाय वालों की पुकार से भरी थीं। अंदर संगमरमर के फर्श, चमकती दीवारें और महँगे इत्र की गंध थी, जहाँ गरीबी को जैसे गलती नहीं, अपराध माना जाता था।
नंदिनी के हाथ में पुरानी फाइल थी, कंधे पर घिसा हुआ बैग था, और दूसरी उंगली पकड़े उसका 7 साल का बेटा कबीर खड़ा था। कबीर की नीली पानी की बोतल पर दरार थी, स्कूल बैग की चैन आधी टूटी हुई थी, और उसकी आँखों में वह डर था जो बच्चों की उम्र से बहुत बड़ा होता है।
गार्ड के पास पहुँचने से पहले नंदिनी झुकी।
“कबीर, याद है न क्या कहा था?”
बच्चे ने गंभीर होकर सिर हिलाया।
“मैं चुप रहूँगा, मम्मा। किसी को परेशान नहीं करूँगा।”
नंदिनी का गला भर आया।
“तू बस विश्राम कक्ष में बैठेगा। किताब पढ़ेगा। रंग भरेगा। अगर कुछ चाहिए तो मुझे संदेश भेजना। बाहर नहीं आना।”
कबीर ने धीरे से कहा, “मैं दिखूँगा भी नहीं।”
कोई बच्चा इतनी छोटी उम्र में अदृश्य होना नहीं सीखना चाहिए था।
लेकिन कबीर सीख चुका था।
2 साल पहले उसके पिता रोहित ने दूसरी औरत के लिए घर छोड़ दिया था। जाते-जाते वह कर्ज, किराये की धमकियाँ और अदालत में बेटे को छीन लेने की बातें छोड़ गया था। कबीर ने खिलौने माँगना बंद कर दिया था। उसने यह भी सीख लिया था कि जब उसकी माँ रसोई में चुपचाप रोती है, तब उसे नींद का नाटक करना चाहिए।
उस सुबह 5:18 पर नंदिनी को उसकी पड़ोसन शीला आंटी का संदेश आया था।
“बेटा, मेरे पति की तबीयत अचानक बिगड़ गई। अस्पताल जा रही हूँ। आज कबीर को नहीं रख पाऊँगी।”
नंदिनी ने 4 रिश्तेदारों, 2 सहेलियों और अपनी पुरानी कॉलेज साथी को फोन किया। किसी के पास समय नहीं था। स्कूल देर से खुलना था। आपातकालीन देखभाल केंद्र की फीस उसके खाते में बचे पैसों से ज्यादा थी। और उसकी सीधी अधिकारी, कविता मल्होत्रा, पहले ही चेतावनी दे चुकी थी कि वह “अकेली माँ वाले बहाने” अब नहीं सुनेगी।
इसलिए नंदिनी ने वही रास्ता चुना जिसमें दर्द कम था।
वह कबीर को 21वें माले के छोटे से विश्राम कक्ष में ले गई। कमरे में चाय की मशीन, माइक्रोवेव, 3 गोल मेज़ें और एक बड़ी खिड़की थी जहाँ से गुरुग्राम धुंध में डूबा दिखता था। उसने कबीर को एक बड़े गमले के पीछे बैठाया। उसके सामने रंग, कॉपी, बिस्कुट, पानी और विज्ञान की किताब रख दी।
“मैं हर घंटे देखने आऊँगी।”
कबीर मुस्कुराया।
“मम्मा, आप डरना मत। मैं अच्छा बच्चा हूँ।”
नंदिनी वहीं टूट जाना चाहती थी, पर उसने केवल उसके माथे को चूमा और बाहर आ गई।
लगभग 3 घंटे सब ठीक चला। उसने रिपोर्टें तैयार कीं, भुगतान तालिकाएँ जाँचीं, ग्राहकों के संदेशों का जवाब दिया और हर 5 मिनट में फोन देखा। कबीर ने एक भी संदेश नहीं भेजा।
वह अपना वादा निभा रहा था।
वह गायब था।
फिर कविता मल्होत्रा उसके डेस्क के पास आकर रुकी।
“नंदिनी। मेरे केबिन में। अभी।”
नंदिनी का पेट बर्फ जैसा ठंडा हो गया। खुले कार्यक्षेत्र से गुजरते हुए उसे कई निगाहें अपनी पीठ में चुभती महसूस हुईं। कुछ लोग स्क्रीन देखने का नाटक कर रहे थे। कुछ धीमे से फुसफुसा रहे थे।
कविता ने केबिन का दरवाज़ा जोर से बंद किया।
“क्या यह सच है कि तुमने अपने बच्चे को विश्राम कक्ष में छिपा रखा है?”
“छिपाया नहीं है, मैम। वह मेरा बेटा है। उसे देखने वाली आंटी को आपात स्थिति में अस्पताल जाना पड़ा। मेरे पास कोई रास्ता नहीं था।”
“यह कंपनी है, मोहल्ले की आँगनवाड़ी नहीं।”
“मुझे पता है। उसने किसी को परेशान नहीं किया। बस आज का दिन पूरा करने दीजिए। शाम तक मैं—”
“तुम आज का दिन पूरा नहीं करोगी।”
नंदिनी ने अविश्वास से देखा।
“जी?”
कविता ने कुर्सी पर पीछे झुकते हुए कहा, “तुम्हारी सेवा समाप्त की जाती है। अभी से।”
नंदिनी को लगा जैसे कमरे की हवा खत्म हो गई।
“मैम, प्लीज़। मुझे इस नौकरी की जरूरत है।”
“तुम बहुत दिनों से अस्थिर हो। कभी बच्चा बीमार, कभी स्कूल की बैठक, कभी घर की समस्या। कंपनी तुम्हारे निजी जीवन का बोझ नहीं उठा सकती।”
“अगर यह नौकरी गई, तो मेरा घर चला जाएगा।”
कविता के चेहरे पर कोई नरमी नहीं आई।
“वह कंपनी की समस्या नहीं है। 1 घंटे में अपना सामान समेटो। मानव संसाधन विभाग औपचारिकता पूरी कर देगा। और बच्चे को तुरंत बाहर निकालो, इससे पहले कि ऊपरी प्रबंधन उसे देख ले।”
नंदिनी बाहर निकली तो उसके पैर काँप रहे थे। उसने अपनी मेज पर रखी छोटी-छोटी चीजें समेटीं—स्टील का मग, 2 पेन, एक पुरानी डायरी, कबीर की स्कूल ड्रेस वाली फोटो और माँ की दी हुई छोटी चाँदी की लक्ष्मी प्रतिमा।
फोटो उठाते ही उसकी आँख से आँसू गिर गया।
तभी लिफ्ट के पास किसी ने फुसफुसाकर कहा, “आरव मेहता आ रहे हैं।”
आरव मेहता, कंपनी के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी, उस माले पर शायद ही कभी आते थे। 39 साल की उम्र में वह देश के सबसे तेज दिमागों में गिने जाते थे, पर उनका शांत चेहरा बड़े-बड़े साझेदारों को भी डरा देता था।
नंदिनी ने डिब्बा सीने से लगाया और विश्राम कक्ष की ओर बढ़ी।
एक गहरी आवाज़ ने उसे रोक दिया।
“नंदिनी शर्मा?”
वह धीरे से मुड़ी।
आरव मेहता सामने खड़े थे। उनका गहरा नीला सूट बेदाग था, पर उनकी नजर नंदिनी के डिब्बे पर नहीं, उसकी सूजी हुई आँखों पर थी।
“जी, सर।”
“मुझे बताया गया कि आपको अभी निकाला गया है।”
“जी। मैं जा रही हूँ।”
“कारण?”
“मैं अपने बेटे को साथ लाई थी। आपात स्थिति थी। मैंने नियम तोड़ा है।”
आरव कुछ क्षण चुप रहे।
फिर पूछा, “आपका बेटा कहाँ है?”
“विश्राम कक्ष में।”
“मुझे उसके पास ले चलिए।”
नंदिनी का दिल डर से सिकुड़ गया।
वे अंदर गए।
कबीर अभी भी गमले के पीछे बैठा था। कान में पुराने इयरफोन, गोद में विज्ञान की किताब, और चेहरे पर ऐसी चुप्पी जैसे वह सांस भी इजाजत लेकर ले रहा हो।
आरव दरवाज़े पर ठिठक गए।
फिर उन्होंने अपना कोट उतारा, नीचे फर्श पर बच्चे के पास बैठ गए और नरम आवाज़ में पूछा, “क्या पढ़ रहे हो?”
कबीर ने एक इयरफोन निकाला।
“अंतरिक्ष।”
“सबसे अच्छा क्या लगता है?”
“शनि ग्रह। उसके चारों तरफ छल्ले हैं। जैसे वह अकेला भी है, फिर भी उसके पास अपनी रक्षा है।”
आरव की आँखें एक पल के लिए बदल गईं।
“मेरी माँ भी मुझे ऐसा ही कुछ कहती थीं।”
कबीर ने जिज्ञासा से पूछा, “आपकी मम्मी भी आपको काम पर लाती थीं?”
आरव बिल्कुल स्थिर हो गए।
“हाँ,” उन्होंने धीमे से कहा, “जब मैं तुम्हारी उम्र का था।”
उसी क्षण कविता दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गई, चेहरा पीला पड़ा हुआ।
आरव ने उसकी ओर देखा और इतनी ठंडी आवाज़ में कहा कि पूरा माला सुन सके।
“नंदिनी शर्मा आज इस इमारत से नहीं जाएँगी। आज यह कंपनी याद करेगी कि इसे बनाया क्यों गया था।”
PART 2
विश्राम कक्ष के बाहर ऐसा सन्नाटा छा गया कि चाय की मशीन की हल्की आवाज़ भी तेज लगने लगी।
आरव फर्श से उठे। कबीर ने किताब सीने से लगा ली, नंदिनी ने डिब्बा और कसकर पकड़ लिया।
“जब मैं 7 साल का था,” आरव ने कहा, “मेरी माँ रात में कार्यालय साफ करती थीं और सुबह रिसेप्शन पर बैठती थीं। कई बार वह मुझे भी साथ ले जाती थीं। वह कहती थीं—आवाज़ मत करना, कुछ मत माँगना, किसी को पता मत चलना।”
कबीर धीरे से बोला, “मम्मा ने भी कहा था कि मैं ऐसे रहूँ जैसे हूँ ही नहीं।”
आरव ने आँखें बंद कीं।
“कोई बच्चा यह नहीं सुनना चाहिए।”
कविता ने तुरंत कहा, “सर, नियम सबके लिए होते हैं।”
आरव ने उसे देखा।
“नियम इंसानों को बचाने के लिए होते हैं, कुचलने के लिए नहीं।”
गलियारे में कर्मचारी जमा हो चुके थे।
आरव की आवाज़ और साफ हो गई।
“मेरी माँ को मुझे काम पर लाने के कारण निकाल दिया गया था। उस रात हमने सूखी रोटी पानी के साथ खाई थी। मैंने उन्हें बाथरूम में रोते सुना था। उसी दिन तय किया था, अगर कभी मेरे पास अधिकार हुआ, तो मेरी कंपनी में कोई माँ अपने बच्चे को बचाने के लिए शर्मिंदा नहीं होगी।”
नंदिनी रो पड़ी।
“मैं परेशानी नहीं बनना चाहती थी, सर।”
“आप परेशानी नहीं हैं,” आरव ने कहा, “आपने परेशानी दिखा दी है।”
तभी लेखा विभाग के समीर ने आगे बढ़कर कहा, “सर, नंदिनी ही इस विभाग को संभालती है। उसने मेरे पिता की सर्जरी के समय मेरा काम भी किया था।”
एक और महिला बोली, “मेरी प्रसूति छुट्टी के बाद उसी ने मुझे बचाया था। कविता मैम ने उस पर हमेशा अतिरिक्त काम डाला।”
कविता का चेहरा लाल हो गया।
“मैंने केवल अनुशासन रखा है।”
“तो यह अनुशासन टूटा हुआ है,” आरव बोले। “नंदिनी तुरंत बहाल होंगी। उन्हें संचालन प्रबंधक बनाया जाएगा, वेतन में 30 प्रतिशत वृद्धि के साथ। और इस कंपनी में आपात स्थिति के लिए बच्चों का सुरक्षित कक्ष बनेगा।”
तभी लिफ्ट खुली।
रोहित अंदर आया, आँखों में गुस्सा और आवाज़ में जहर।
“नंदिनी! अब बेटे को लेकर नौकरी में नाटक कर रही हो?”
कबीर माँ के पीछे छिप गया।
रोहित हँसा। “अच्छा हुआ निकाल दिया। अब अदालत को बताऊँगा कि तुम उसे पाल नहीं सकती।”
आरव आगे आए।
“कृपया बाहर जाएँ।”
“तुम कौन हो? इसका नया रक्षक?”
कबीर अचानक चीख पड़ा।
“मैं आपके साथ नहीं जाना चाहता!”
पूरा माला जम गया।
बच्चा काँप रहा था।
“आपने हमें छोड़ा। आप मम्मा पर चिल्लाते थे। आपने कहा था मैं बोझ हूँ।”
रोहित का चेहरा सख्त हो गया।
“चुप रहो, कबीर।”
“नहीं!” कबीर रोते हुए बोला। “अब मैं चुप नहीं रहूँगा।”
रोहित ने हाथ उठाया। बस उतना ही काफी था।
आरव बीच में आ गए।
“सुरक्षा।”
2 गार्डों ने रोहित को पकड़ लिया। वह अदालत, पुलिस और बदनामी की धमकियाँ देता रहा।
तभी समीर ने धीमे मगर साफ कहा, “सर, कविता मैम के संदेश हैं। कई माताओं के खिलाफ। धमकियाँ, कटौती, अपमान।”
कविता की साँस अटक गई।
आरव ने उसकी ओर मुड़कर कहा, “लगता है आज की सुबह अभी शुरू हुई है।”
PART 3
1 साल बाद मेहता स्ट्रैटेजी एडवाइजर्स का 12वाँ माला किसी ठंडी कॉर्पोरेट इमारत का हिस्सा नहीं लगता था। वहाँ रंगीन दीवारें थीं, छोटी मेज़ें थीं, कहानी की किताबें थीं, मुलायम गद्दे थे और एक शीशे के दरवाज़े के पास पीतल की पट्टिका लगी थी—
“कोई बच्चा छिपने के लिए पैदा नहीं होता। कोई माँ देखभाल करने के लिए माफी नहीं माँगेगी।”
कबीर हर सुबह उसे पढ़ता था, जैसे पहली बार पढ़ रहा हो।
नंदिनी अब उसी इमारत में अलग चाल से चलती थी। उसके कपड़े अब भी सादे थे, उसके हाथ अब भी काम से भरे रहते थे, जीवन अब भी आसान नहीं था। लेकिन उसके भीतर से वह पुराना डर उतर चुका था जिसमें हर दिन लगता था कि उसका माँ होना उसकी गलती है।
उस दिन के बाद सब कुछ एक साथ नहीं बदला। पहले बहुत दर्द आया।
रोहित ने सचमुच अदालत में याचिका दी। उसने लिखा कि नंदिनी “अस्थिर” है, “बच्चे को कार्यस्थल पर घुमाती है” और “सुरक्षित घर देने में असमर्थ” है। लेकिन इस बार नंदिनी अकेली नहीं थी।
कंपनी के 11 कर्मचारियों ने लिखित बयान दिए। सुरक्षा विभाग ने रोहित के 21वें माले वाले व्यवहार की रिपोर्ट जमा की। बाल मनोवैज्ञानिक ने अदालत को बताया कि कबीर लंबे समय से डर और भावनात्मक दबाव में जी रहा था। जब न्यायाधीश ने बच्चे से नरम आवाज़ में पूछा कि वह किसके साथ सुरक्षित महसूस करता है, कबीर ने अपनी छोटी उंगलियाँ भींचकर कहा—
“जहाँ मम्मा रोती नहीं हैं।”
उस एक वाक्य ने अदालत की हवा बदल दी।
नंदिनी को कबीर की पूर्ण अभिरक्षा मिली। रोहित को निगरानी में मुलाकात की अनुमति दी गई, वह भी तब तक जब तक वह परामर्श सत्र पूरा न करे और भरण-पोषण की बकाया राशि न चुकाए। पहली बार रोहित की धमकियाँ कागजों और कानून के सामने कमजोर पड़ गईं।
कविता मल्होत्रा का अंत भी धीरे-धीरे हुआ, पर साफ हुआ।
आंतरिक जाँच में 3 साल के संदेश निकले। किसी महिला ने बच्चे के बुखार के कारण आधा दिन माँगा तो उसे “भावुक बोझ” कहा गया। किसी ने प्रसूति के बाद लौटने में मदद माँगी तो उसका मूल्यांकन घटाया गया। किसी ने स्कूल की आपात बैठक के लिए अनुमति ली तो उसकी पदोन्नति रोक दी गई। सबसे दर्दनाक यह था कि कई कर्मचारी यह सब जानते थे, पर डर के कारण चुप रहे।
आरव ने पूरी रिपोर्ट बोर्ड के सामने रखी।
“यदि लाभ कमाने के लिए हम लोगों को तोड़ते हैं,” उन्होंने कहा, “तो हमारी सफलता केवल चमकदार शर्म है।”
कविता को पद से हटाया गया। उसके खिलाफ औपचारिक अनुशासनात्मक कार्रवाई हुई। कंपनी ने कार्यस्थल समानता नीति फिर से लिखी। आपातकालीन बाल कक्ष शुरू हुआ, लचीले कार्य घंटे बने, एकल माता-पिता सहायता कोष बना और हर प्रबंधक के लिए संवेदनशीलता प्रशिक्षण अनिवार्य किया गया।
लेकिन सबसे बड़ा बदलाव कागजों में नहीं, लोगों की चाल में दिखा।
अब कोई महिला बच्चे के बुखार का संदेश पढ़कर छिपकर रोती नहीं थी। कोई पिता स्कूल की बैठक के लिए छुट्टी माँगते हुए अपराधी जैसा महसूस नहीं करता था। कोई कर्मचारी अपने घर की आपदा को “बहाना” कहे जाने से पहले सौ बार नहीं सोचता था।
आरव भी बदल गए।
पहले वे ऊपरी मंजिल के बंद कमरे में बैठने वाले गंभीर मालिक थे। लोग उन्हें दूर से देखते थे, समझते नहीं थे। उस दिन के बाद वे हर शुक्रवार बाल कक्ष में आने लगे। कभी ग्रहों की किताबें लाते, कभी पहेलियाँ, कभी छोटे रंगीन ग्लोब। कबीर उनसे कठिन सवाल पूछता—“ब्लैक होल डरावने होते हैं?” “क्या बड़े लोग भी रोते हैं?” “अगर कोई पापा छोड़ दे तो क्या बच्चा खराब होता है?”
आरव हर सवाल का जवाब तुरंत नहीं देते थे। शायद इसलिए कबीर उन पर भरोसा करने लगा। क्योंकि बड़े लोग अक्सर बच्चों को चुप कराने के लिए जल्दी जवाब देते हैं, पर आरव सुनते थे।
नंदिनी के लिए यह भरोसा देखना आसान नहीं था। उसके भीतर वर्षों का संदेह था। वह हर नरम व्यवहार के पीछे कोई कीमत ढूँढ़ती थी। हर मदद में एहसान का डर खोजती थी। आरव ने कभी जल्दी नहीं की।
पहले केवल सम्मान था।
फिर चाय।
फिर देर शाम छोटी-छोटी बातचीत, जब ज्यादातर कर्मचारी जा चुके होते और काँच की खिड़कियों के पार गुरुग्राम की रोशनियाँ फैल जातीं।
एक बरसाती शाम, जब बाल कक्ष से बच्चे जा चुके थे और दीवार पर चिपके कागजी सितारे हल्की हवा से काँप रहे थे, आरव ने वह बात कही जो उन्होंने शायद ही किसी से कही थी।
“मेरी माँ थककर मरी थीं,” उन्होंने धीमे से कहा। “बीमारी से पहले ही जीवन ने उन्हें तोड़ दिया था। उन्होंने मेरी पढ़ाई, किराया, खाना—सबके लिए खुद को खर्च कर दिया।”
नंदिनी ने उनकी ओर देखा। उस क्षण वह कंपनी का मालिक नहीं, वही बच्चा लग रहे थे जो कभी सफाई के कमरे में चुप बैठा था।
“आपने यह सब उन्हें लौटाने के लिए बनाया,” उसने कहा।
आरव हल्का सा मुस्कुराए, पर आँखें भीग गईं।
“लेकिन वह देखने के लिए नहीं रहीं।”
“शायद देखने का यही तरीका है,” नंदिनी बोली। “जब किसी और माँ को टूटने से बचाया जाता है।”
आरव ने पहली बार उसे ऐसे देखा जैसे किसी ने उसके भीतर बरसों से बंद दरवाजा खोल दिया हो।
उनका रिश्ता किसी फिल्मी बचाव की तरह नहीं बढ़ा। उसमें धीमापन था, संकोच था, सीमाएँ थीं। आरव ने पहले नंदिनी की भूमिका बदलवाई ताकि वह सीधे उन्हें रिपोर्ट न करे। उन्होंने बोर्ड को सूचित किया। उन्होंने मानव संसाधन से लिखित व्यवस्था करवाई। वह नहीं चाहते थे कि कोई भी यह कह सके कि नंदिनी पर कोई दबाव था।
जब उन्होंने महीनों बाद उसे भोजन के लिए आमंत्रित किया, तो वह किसी करोड़ों के सौदे से ज्यादा घबराए हुए थे।
“मैं आपको रात के खाने पर ले जाना चाहता हूँ,” उन्होंने कहा, “आपकी अनुमति से। मालिक की तरह नहीं। उस दिन वाले आदमी की तरह भी नहीं। बस एक ऐसे व्यक्ति की तरह जो आपको बहुत सम्मान देता है।”
नंदिनी ने सीधा उत्तर नहीं दिया।
“कबीर पहले आता है। हमेशा।”
“मुझे पता है,” आरव बोले। “मैं उसकी जगह किसी से नहीं छीनना चाहता। बस यदि वह अनुमति दे, तो उसके संसार के दरवाज़े के बाहर खड़ा रहना चाहता हूँ।”
कबीर ने अनुमति तुरंत नहीं दी। वह छोटा था, पर उसने जीवन की बेवफाई देखी थी। उसने आरव से 100 सवाल पूछे। “आप गुस्से में चिल्लाते हैं?” “आपको दाल-चावल पसंद है?” “अगर मम्मा देर से आएँ तो आप उन्हें डाँटेंगे?” “आप किसी दिन गायब हो जाएँगे?”
आखिरी सवाल पर आरव लंबे समय तक चुप रहे।
फिर बोले, “मैं यह झूठ नहीं कहूँगा कि मैं कभी गलती नहीं करूँगा। लेकिन मैं यह वादा कर सकता हूँ कि मुश्किल आते ही गायब नहीं होऊँगा।”
कबीर ने बहुत देर तक उन्हें देखा।
फिर उसने अपनी अंतरिक्ष वाली किताब उनकी ओर बढ़ा दी।
नंदिनी के लिए वह किसी अंगूठी से बड़ा संकेत था।
समय बीतता गया। कबीर की हँसी लौटने लगी। वह स्कूल से कहानियाँ लेकर आता, बाल कक्ष के छोटे बच्चों को ग्रहों के नाम सिखाता, और कभी-कभी नंदिनी के केबिन में आकर पूछता, “आज आप रोई तो नहीं?”
नंदिनी हर बार उसे गले लगा लेती।
“नहीं, आज नहीं।”
3 साल बाद, वही इमारत रोशनी से भरी थी। छत पर गेंदे और रजनीगंधा की झालरें लगी थीं। शाम की हवा में हल्की ठंडक थी। नीचे शहर चमक रहा था। शादी बड़ी नहीं थी, पर उसमें वह गर्माहट थी जो बड़े बैंक्वेट हॉल भी नहीं खरीद सकते।
नंदिनी ने साधारण क्रीम रंग की साड़ी पहनी थी। माँ की वही छोटी चाँदी की प्रतिमा उसकी थाली में रखी थी। आरव ने हल्की शेरवानी पहनी थी, पर उनकी आँखें लगातार कबीर को खोज रही थीं।
कबीर अब 10 साल का था। वह उनके पास एक छोटी पीली डिब्बी लेकर खड़ा था जिसमें अंगूठियाँ रखी थीं। उसका चेहरा गंभीर था, जैसे वह कोई बहुत बड़ा निर्णय लेने आया हो।
जब विवाह अधिकारी ने औपचारिकता शुरू की और पूछा कि क्या किसी को कुछ कहना है, कबीर ने हाथ उठा दिया।
नंदिनी का चेहरा सफेद पड़ गया।
आरव भी ठिठक गए।
सभी मेहमानों की साँस जैसे रुक गई।
कबीर आगे आया। उसने पहले अपनी माँ को देखा, फिर आरव को, फिर उन सभी कर्मचारियों को जो कभी उस 21वें माले पर खड़े होकर उसके रोने के साक्षी बने थे।
“मुझे कोई विरोध नहीं है,” उसने धीमे से कहा। “मैं बस सबको बताना चाहता हूँ कि आज से ये मेरे भी पापा हैं।”
छत पर सन्नाटा फैल गया।
कबीर ने गहरी साँस ली।
“क्योंकि सच्चे पापा वह नहीं होते जो आसान दिन में फोटो खिंचवाने आ जाएँ। सच्चे पापा वह होते हैं जो डर लगने पर आपके सामने खड़े हो जाएँ।”
किसी ने तुरंत ताली नहीं बजाई। शायद इसलिए कि लगभग सबकी आँखें भर आई थीं।
फिर तालियाँ ऐसी गूँजीं जैसे शहर के ऊपर बादल फट पड़े हों।
आरव घुटनों के बल बैठ गए और कबीर को गले लगा लिया। वह बच्चे को पकड़ रहे थे, पर नंदिनी जानती थी कि उस आलिंगन में 2 बच्चे थे—एक कबीर, और एक वह छोटा आरव जो कभी अपनी माँ के साथ छिपकर बैठता था।
नंदिनी ने उन्हें देखा और पहली बार उसे लगा कि जीवन ने उससे जो छीना था, उसका हिसाब पैसे या पद से नहीं, बल्कि सुरक्षा से लौटाया जा रहा है।
रात गहरी हुई। बच्चे फूलों के बीच दौड़ रहे थे। कर्मचारी अपने परिवारों के साथ हँस रहे थे। वही लोग जो कभी घर की समस्याओं को छिपाते थे, अब अपने बच्चों को गर्व से गोद में उठाए खड़े थे।
आरव नंदिनी के पास आए। दोनों छत की रेलिंग के पास शहर को देख रहे थे।
“आज माँ बहुत याद आ रही हैं,” उन्होंने कहा।
नंदिनी ने उनका हाथ थाम लिया।
“उन्हें गर्व होता।”
“काश वह देख पातीं।”
नंदिनी ने नीचे चमकती इमारतों, बाल कक्ष की जलती खिड़की और कबीर की हँसी की ओर देखा।
“वह देख रही हैं,” उसने फुसफुसाकर कहा। “हर बार जब कोई माँ इस इमारत में डर के बिना प्रवेश करती है। हर बार जब कोई बच्चा गमले के पीछे छिपने के बजाय खुले दरवाज़े से अंदर आता है।”
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.