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बीमार दोस्त से मिलने आया तलाकशुदा पति जब हेमेटोलॉजी वार्ड में अपनी पूर्व पत्नी को अकेली, पीली और टूटी बैठी देखता है, तो उसका दिल कांप उठता है: “यह वही इंसान है जिस पर मुझे अभी भी भरोसा है”

PART 1

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अपनी तलाकशुदा पत्नी को उसने किसी नई जिंदगी में नहीं, बल्कि एम्स दिल्ली के हेमेटोलॉजी वार्ड के बाहर अकेले, पीली और लगभग टूटी हुई हालत में बैठे देखा।

आरव मेहरा वहीं गलियारे के बीच रुक गया। उसके हाथ में समोसे और चाय का कागज़ी बैग था, जो वह अपने कॉलेज के दोस्त निखिल के लिए लाया था। निखिल की रात में इमरजेंसी सर्जरी हुई थी, और आरव सुबह-सुबह साउथ दिल्ली के ट्रैफिक को कोसता हुआ अस्पताल पहुंचा था। उसके लिए यह एक सामान्य मुलाकात होनी थी। दोस्त को देखना, डॉक्टर से हाल पूछना, 2 मज़ाक करना और फिर अपनी आर्किटेक्चर फर्म लौट जाना।

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लेकिन फिर उसने उसे देखा।

काव्या।

वही काव्या, जिसके नाम के साथ 6 साल तक उसका नाम जुड़ा रहा था। वही लड़की जो कभी करवा चौथ पर उसकी लंबी उम्र के लिए व्रत रखती थी, वही जो दिवाली पर उसकी मां के लिए अपने हाथों से लड्डू बनाती थी, और वही जो अब अस्पताल की प्लास्टिक कुर्सी पर बैठी थी, कंधों पर सफेद अस्पताल की चादर, सिर पर हल्का गुलाबी दुपट्टा, चेहरा इतना सूखा जैसे भीतर की सारी रोशनी किसी ने धीरे-धीरे चूस ली हो।

उसकी कलाई पर सफेद पट्टी बंधी थी। उस पर लिखा था—काव्या शर्मा।

शर्मा।

2 महीने पहले तक वही नाम मेहरा भी था। घर की नेमप्लेट पर, बैंक के कागज़ों पर, शादी के कार्डों की पुरानी फाइलों में, मोहल्ले की औरतों की बातों में।

फिर 2 बार गर्भपात हुआ। घर की थालियां ठंडी होने लगीं। रातों में काव्या बाथरूम में रोती रही और आरव लैपटॉप पर क्लाइंट की ड्रॉइंग ठीक करता रहा। उसकी मां सरोज मेहरा हर दूसरे दिन यही कहती थी—

—ये लड़की अशुभ है, आरव। न घर में बच्चा ला पाई, न शांति। इसका चेहरा देखते ही घर सूना लगने लगता है।

आरव ने कभी सच में विरोध नहीं किया। बस चुप रहा। और कभी-कभी वही चुप्पी काव्या के लिए सबसे बड़ा तमाचा बन गई।

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तलाक साकेत फैमिली कोर्ट में हुआ था। काव्या ने साइन करते समय एक बार भी हाथ नहीं कांपने दिया था। आरव ने सोचा था कि वह मजबूत है, ठंडी है, शायद उससे बहुत पहले ही दूर जा चुकी है।

आज समझ आया, वह मजबूत नहीं थी। वह खत्म हो रही थी।

—काव्या? उसने धीमे से पुकारा।

काव्या ने सिर उठाया। पहले हैरानी, फिर शर्म, फिर एक ऐसी घायल इज्जत उसके चेहरे पर आई कि आरव की सांस अटक गई।

—आरव।

वह 2 कदम आगे बढ़ा।

—तुम यहां क्या कर रही हो?

—टेस्ट हैं।

—हेमेटोलॉजी में?

काव्या ने नजर फेर ली।

—तुम्हें मुझे यहां नहीं देखना चाहिए था।

उस वाक्य ने आरव की छाती में कुछ काट दिया।

—तुम बीमार हो?

काव्या हल्का सा हंसी। वह हंसी नहीं थी, राख थी।

—अब पूछ रहे हो?

आरव के दिमाग में वह शाम कौंधी जब काव्या ने उसके ग्रेटर कैलाश वाले फ्लैट से 2 सूटकेस उठाए थे। हाथ में एक मोटी मेडिकल फाइल थी। उसने देखा था। पर पूछा नहीं था।

—काव्या, बताओ तुम्हें क्या हुआ है।

—नहीं।

—क्यों?

वह सीधे उसकी आंखों में देखी।

—क्योंकि जिस दिन मुझे तुम्हारे सवालों की जरूरत थी, उस दिन तुमने तलाक के कागज़ों पर साइन करना ज्यादा जरूरी समझा।

आरव चुप रह गया।

तभी एक जूनियर डॉक्टर बाहर आई।

—काव्या शर्मा?

काव्या उठने लगी, पर उसके पैर लड़खड़ा गए। आरव ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया। वह सख्त हो गई।

—नाटक मत करो।

—मैं नाटक नहीं कर रहा।

—तुम हमेशा वहीं पहुंचते हो, जहां लोग देख रहे हों।

डॉक्टर ने पूछा—

—आप परिवार से हैं?

काव्या ने “नहीं” कहने के लिए होंठ खोले ही थे कि आरव बोल पड़ा—

—मैं इसका पति था।

डॉक्टर रुकी।

—डॉ. अरोड़ा रिपोर्ट समझाना चाहते हैं। काव्या जी, क्या आप चाहेंगी कि ये अंदर आएं?

आरव को पूरा भरोसा था कि वह मना कर देगी।

लेकिन काव्या ने चादर मुट्ठी में भींची और बहुत धीमे कहा—

—ये कोई है, जिस पर मुझे अभी भी भरोसा है।

आरव के भीतर जैसे कोई पुराना दरवाजा टूट गया।

कमरे का दरवाजा खुला। और जब काव्या उसके आगे भीतर गई, आरव को पहली बार लगा कि जिसे वह 2 महीने पहले खो चुका था, वह शायद अब सच में हमेशा के लिए चली जाने वाली है।

PART 2

—एक्यूट ल्यूकेमिया, डॉ. अरोड़ा ने कहा।

कमरे की सफेद दीवारें अचानक और सफेद लगने लगीं। आरव सामने रखी रिपोर्टों को देखता रह गया। काव्या स्थिर बैठी थी, जैसे यह शब्द उसके अंदर पहले ही कई बार मर चुका हो।

—इलाज 4 हफ्ते से चल रहा है, डॉक्टर ने धीमे स्वर में कहा। प्रतिक्रिया उम्मीद जैसी नहीं है। बोन मैरो ट्रांसप्लांट जल्दी सोचना होगा।

आरव ने उसकी ओर देखा।

—तुम्हें तलाक से पहले पता था?

काव्या ने होंठ भींचे।

—संकेत थे। शरीर पर नीले निशान, बुखार, कमजोरी। दूसरे गर्भपात के बाद डॉक्टर ने और जांचें लिखीं।

आरव को वह मेडिकल फाइल याद आई।

—तुमने बताया क्यों नहीं?

काव्या की आंखें भर आईं।

—ताकि तुम्हारी मां कहती कि मेरा खून भी खराब है?

आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

तभी दरवाजा बिना दस्तक खुले। सरोज मेहरा अंदर आई, रेशमी साड़ी, महंगा बैग, ठंडी आंखें।

—वाह, तलाक के बाद भी ड्रामा खत्म नहीं हुआ? अब बीमारी से मेरे बेटे को बांधोगी?

काव्या पत्थर जैसी हो गई।

आरव खड़ा हुआ।

—मां, बाहर जाओ।

सरोज हंसी।

—यही तो तुम कहते थे, ये औरत जीने नहीं देती।

काव्या की चुप्पी चीख से भी तेज थी।

उसी पल डॉक्टर का फोन बजा। उन्होंने रिपोर्ट देखी, फिर आरव की तरफ देखा।

—शुरुआती मार्कर अजीब तरह से मिल रहे हैं। आप शायद डोनर मैच हो सकते हैं।

काव्या ने मुंह पर हाथ रख लिया।

और पहली बार वह फूट-फूटकर रो पड़ी।

PART 3

—मैं मना करती हूं, काव्या ने साफ कहा।

आरव ने सोचा, शायद बुखार बोल रहा है। वह अस्पताल के बिस्तर पर बैठी थी। सफेद कंबल उसके चारों ओर ऐसे फैला था जैसे दुनिया ने उसे किसी ठंडी चुप्पी में लपेट दिया हो। दुपट्टा सिर पर थोड़ा तिरछा था, आंखों के नीचे गहरे घेरे थे, हाथ में लगी नली हर सांस के साथ उसे उसकी बीमारी याद दिला रही थी। लेकिन उसकी आवाज कमजोर नहीं थी।

—काव्या, यह तुम्हें मौका दे सकता है।

—मौका? किस चीज का? तुम्हारे पछतावे को अपने शरीर में लेकर जीने का?

डॉ. अरोड़ा अभी-अभी आगे की जांच, प्रक्रिया और जोखिम समझाकर बाहर गए थे। दरवाजा बंद हुआ तो कमरे में सिर्फ मशीनों की धीमी आवाज और 6 साल की टूटी हुई शादी का बोझ रह गया।

आरव बिस्तर के पास खड़ा था। उसे लगा था कि उसे डॉक्टरों, अस्पताल के कागज़ों, अपनी मां और किस्मत से लड़ना होगा। उसने नहीं सोचा था कि सबसे कठिन लड़ाई काव्या से होगी।

—मैं यह खुद को अच्छा साबित करने के लिए नहीं कर रहा, उसने कहा।

काव्या ने कड़वी मुस्कान दी।

—सच? मेरा सिर ढका देखा, हाथों में निशान देखे, रिपोर्ट देखी और अचानक तुम्हें याद आ गया कि तुम्हारे पास दिल है?

आरव ने जवाब नहीं दिया।

—दिल कहां था तुम्हारा उस रात, जब हमारा दूसरा बच्चा चला गया था? याद है? मैं बाथरूम में कांप रही थी। मैंने तुम्हारा नाम 3 बार लिया। तुम बाहर बैठकर किसी क्लाइंट को मेल भेज रहे थे।

आरव ने आंखें बंद कर लीं। वह रात पूरी बेरहमी से लौट आई। बाथरूम की लाइट, नल की आवाज, काव्या की टूटी हुई सांसें, और उसका अपना डर, जिसे उसने काम का बहाना बना दिया था।

—मैं डर गया था, उसने धीमे कहा।

—मैं भी डर गई थी, आरव। फर्क बस इतना था कि मैं अकेली डर रही थी।

काव्या ने खिड़की की तरफ देखा। बाहर दिल्ली की दोपहर धूल और धूप से भरी थी, लेकिन कमरे के भीतर कोई मौसम नहीं था।

—मुझे डर था कि मैं तुम्हारे लिए औरत नहीं रहूंगी। मां नहीं बन सकूंगी। बीमार निकली तो तुम्हारे घर में बोझ कहलाऊंगी। और वही हुआ। तुम्हारी मां बोलती रही, तुम चुप रहे। फिर एक दिन तुमने भी मुझे ऐसे देखना शुरू किया जैसे मैं तुम्हारी जिंदगी की खराब दीवार हूं, जिसे तोड़कर नया नक्शा बनाया जा सकता है।

आरव धीरे से कुर्सी पर बैठ गया। बहुत पास नहीं। उसे अब समझ आ रहा था कि घायल इंसान के पास जाने से पहले उसकी दूरी का सम्मान करना पड़ता है।

—मैं कायर था, उसने कहा। थका हुआ नहीं। उलझा हुआ नहीं। मां के दबाव में नहीं। सिर्फ कायर।

काव्या ने उसकी ओर देखा।

—मैंने मां को तुम्हारे ऊपर बोलने दिया। हर बार। जब उन्होंने कहा तुम अपशकुन हो, मैं चुप रहा। जब उन्होंने कहा तुम्हारे कारण हमारा वंश रुक गया, मैं चुप रहा। जब उन्होंने रिश्तेदारों के सामने तुम्हारे गर्भपात को तुम्हारी कमजोरी कहा, मैं चुप रहा। मेरी चुप्पी ने तुम्हें अकेला कर दिया।

काव्या की आंखें भीग गईं, मगर चेहरा कठोर रहा।

—अब?

यह छोटा सा शब्द कमरे में गिरा और उसमें 2 खोए बच्चे, 6 साल की शादी, अनगिनत चुप रातें और तलाक के कागज़ सब समा गए।

—मैं तुमसे माफ़ी नहीं मांग रहा, क्योंकि माफ़ी तुम्हारा अधिकार है, मेरी मांग नहीं। मैं तुमसे यह भी नहीं कह रहा कि मुझे वापस अपना लो। मैं सिर्फ यह कह रहा हूं कि मेरे कारण तुम अपनी जिंदगी से नाराज़ मत हो जाओ।

—तुम्हें लगता है मैं मरना चाहती हूं?

—नहीं। मुझे लगता है तुम इतनी घायल हो कि जीना भी किसी की जीत या हार जैसा लगने लगा है।

काव्या ने चादर पकड़ ली। उसकी उंगलियां बहुत पतली लग रही थीं।

—अगर मैं बच गई, तो तुम क्या करोगे? 2 महीने कुर्सी पर सोओगे, सबको दिखाओगे कि तुम महान हो, फिर जब मैं फिर से चिड़चिड़ी, कमजोर और अधूरी लगूंगी, तब चले जाओगे?

आरव को समझ आया, यह सवाल नहीं था। यह वह दरार थी जिसमें वह 6 साल से गिरती रही थी।

—मैं तुम्हें विश्वास करने को मजबूर नहीं कर सकता। मैं सिर्फ इतना कर सकता हूं कि इस बार इतना देर तक रहूं कि तुम्हें मेरी गैरहाजिरी की आदत टूट जाए।

काव्या रोई, पर आवाज नहीं निकली। आरव ने हाथ नहीं बढ़ाया। उसने वादा नहीं किया कि सब ठीक हो जाएगा। पहली बार उसे समझ आया कि सच्चा साथ दर्द को ढकना नहीं, उसके पास चुपचाप बैठना होता है।

अगले दिन काव्या ने आगे की जांच के लिए हां कर दी।

आरव ने अपने टेस्ट कराए। खून की जांच, काउंसलिंग, फॉर्म, जोखिम, हस्ताक्षर। डॉक्टरों ने दर्द, कमजोरी, संक्रमण, प्रक्रिया की जटिलता सब बताया। उसने हर कागज़ पढ़कर साइन किया। चेहरे पर कोई हीरो जैसी चमक नहीं थी। वह बस भागना बंद कर रहा था।

सरोज मेहरा ने उस दिन 12 बार फोन किया।

आखिर आरव ने अस्पताल के कॉरिडोर में फोन उठाया।

—तू अपनी जिंदगी एक ऐसी औरत पर बर्बाद कर रहा है, जिसने तुझे पिता तक नहीं बनाया, सरोज ने कहा।

आरव ने कांच में अपना चेहरा देखा। वह पहले से बूढ़ा लग रहा था।

—नहीं मां। मैंने अपनी जिंदगी उस दिन बर्बाद की थी, जब मैंने समझा कि परिवार का मतलब किसी को तब छोड़ देना है, जब वह आपकी उम्मीदों में फिट न बैठे।

—मैं तेरी मां हूं।

—और काव्या मेरी पत्नी थी। तुमने उसे सालों तक तोड़ा। मैंने तुम्हें तोड़ने दिया। अब नहीं।

—वह तुझे फिर फंसा रही है।

—अगर किसी ने किसी को फंसाया है, तो वह हमारी खामोशी थी। और मैं आज उससे बाहर आ रहा हूं।

उसने फोन काट दिया।

जब वह कमरे में लौटा, काव्या जाग रही थी।

—वह थीं?

—हां।

—आएंगी?

—नहीं।

काव्या ने धीरे से सिर हिलाया। एक आंसू उसके कान की ओर बह गया।

—मुझे ये बात पहले सुननी थी।

—मुझे पता है।

—अब इससे सब ठीक नहीं होगा।

—यह भी पता है।

आने वाले हफ्ते सुंदर नहीं थे। कोई फिल्मी चमत्कार नहीं हुआ। काव्या को उल्टियां हुईं, बुखार आया, रातें लंबी हुईं। रिपोर्ट कभी उम्मीद देती, कभी डराती। नर्सें पीपीई में आतीं, डॉक्टर सावधानी से बोलते, खाना ट्रे में आता और अक्सर वैसा ही लौट जाता।

आरव कभी कुर्सी पर सोता, कभी पार्किंग में कार की सीट पर। वह सीख गया कि किस अलार्म की आवाज खतरनाक है और किसकी नहीं। कौन सा सूप उसे कम परेशान करता है। किस समय उसे बात नहीं चाहिए होती। कौन से शब्द सांत्वना नहीं, बोझ बन जाते हैं।

एक शाम काव्या ने आंखें खोलीं। आरव उसके शॉल का टूटा बटन टेढ़े-मेढ़े तरीके से सीने की कोशिश कर रहा था।

—तुमसे नहीं होगा, उसने धीमे कहा।

आरव ने उलझे धागे को देखा।

—पता है।

—तुम हमेशा बटन गलत सीते थे।

—मैंने बहुत कुछ गलत सीया था।

काव्या का हल्का सा मुस्कुराना वहीं रुक गया, लेकिन उसने नजर नहीं फेरी।

डोनर प्रक्रिया वाले दिन सुबह हल्की बारिश हुई। दिल्ली की सड़कें गीली थीं, अस्पताल की खिड़कियों पर बूंदें लगी थीं। आरव मशीन से जुड़ा कई घंटों तक बैठा रहा। उसका खून उसके शरीर से निकलता, घूमता, फिर वापस लौटता। उसे वह छोटी पीली फ्रॉक याद आई जो काव्या ने पहले बच्चे के लिए खरीदी थी। वह नीला स्वेटर जो दूसरे बच्चे के लिए उसकी अलमारी में रह गया। वह मेडिकल फाइल जिसे उसने कभी खोला नहीं। और वह वाक्य, जो काव्या ने डॉक्टर के सामने कहा था—

—ये कोई है, जिस पर मुझे अभी भी भरोसा है।

वह भरोसा माफ़ी नहीं था। वह जिम्मेदारी थी।

ट्रांसप्लांट एक सुरक्षित कमरे में हुआ। कोई संगीत नहीं, कोई नाटकीय रोशनी नहीं। बस सफेद दीवारें, शांत नर्सें, मास्क पहने काव्या और एक पारदर्शी तरल, जो धीरे-धीरे नली से उसके भीतर जा रहा था।

काव्या ने उस थैली को देखा।

—अजीब है, उसने थकी आवाज में कहा। तुम मेरी जिंदगी से एक साइन करके निकले थे, और वापस एक ड्रिप बनकर आ रहे हो।

आरव की आंखें भर आईं।

—मुझे नहीं पता कि मुझे वापस आने का हक है या नहीं।

काव्या ने पलकें बंद कीं।

—तो पहले रुकना सीखो।

वह रुका।

अगले दिन बहुत कठिन थे। बुखार, ठंड, कमजोरी, डर। एक रात काव्या बेहोशी में उस नाम को पुकारने लगी, जो उन्होंने पहले बच्चे के लिए सोचा था, पर कभी किसी को बताया नहीं था। आरव कमरे से बाहर गया, दीवार से टिककर खड़ा हुआ और मुंह पर हाथ रखकर रो पड़ा। उस रात पहली बार उसने सिर्फ काव्या को नहीं, अपने दोनों अनजन्मे बच्चों को भी माफ़ी मांगी।

डॉ. अरोड़ा ने कभी बड़ी उम्मीद नहीं दी। वे हमेशा कहते—

—सावधानी रखनी होगी। अभी रास्ता लंबा है।

आरव ने इंतजार करना सीखा। बिना सवाल के। बिना जवाब मांगने के।

16वें दिन डॉक्टर कमरे में आए। चेहरे पर हल्की, संयमित मुस्कान थी।

—कुछ अच्छे संकेत हैं। शरीर ग्राफ्ट को स्वीकार करना शुरू कर रहा है।

काव्या ने आंखें झपकाईं।

—मतलब?

—मतलब अभी जीत नहीं कहेंगे। पर यह अच्छी खबर है।

आरव खड़ा हुआ, फिर तुरंत बैठ गया। उसके पैर जैसे जवाब दे गए। उसने चेहरा दोनों हाथों में छिपा लिया। उसने नहीं कहा कि उसने उसे बचा लिया। उसने कोई महान वाक्य नहीं बोला। वह बस रोया, जैसे किसी ने अंधेरे कमरे में एक बहुत छोटी खिड़की खोल दी हो।

धीरे-धीरे जिंदगी लौटने लगी। बहुत धीरे। काव्या कभी 5 कदम चलती, कभी पूरे दिन बिस्तर से नहीं उठ पाती। एक दिन उसने इलायची वाली चाय मांगी। अगले दिन उसकी गंध से ही उसे उल्टी होने लगी। आरव ने जल्दी खुश होना छोड़ दिया। उसने साथ देना सीखा।

एक महीने बाद सरोज मेहरा अस्पताल आई। हाथ में मोगरे और गुलाब का बड़ा गुलदस्ता था, चेहरा बुझा हुआ।

आरव नीचे रिसेप्शन पर ही मिला।

—मुझे उससे माफ़ी मांगनी है, सरोज बोली।

आरव ने गुलदस्ते को देखा। काव्या को मोगरा पसंद था। सरोज यह जानती थी। वह हमेशा छोटी पसंदों को चाबी की तरह इस्तेमाल करती थी।

—आप ऊपर नहीं जाएंगी।

—मैं भी मां हूं, मुझे भी दर्द है।

—दर्द आपको हर दरवाजा खोलने का अधिकार नहीं देता।

सरोज की आंखें सख्त हो गईं।

—तो आखिर जीत उसी की हुई?

आरव के भीतर बची हुई आखिरी नरमी भी शांत हो गई।

—आप देख रही हैं? अभी भी आपको यह जीत-हार लग रहा है। काव्या ने कुछ नहीं जीता, मां। वह बीमारी से बची है। और हमसे भी।

सरोज पहली बार चुप रह गई।

जब आरव ऊपर लौटा, काव्या एक पुरानी पत्रिका खोले बैठी थी, पर पढ़ नहीं रही थी।

—वह आई थीं?

—हां।

—तुमने रोक दिया?

—हां।

काव्या ने पत्रिका बंद कर दी।

—धन्यवाद।

वह एक छोटा शब्द था, पर आरव के भीतर बहुत गहराई तक उतर गया।

कुछ हफ्तों बाद काव्या को निगरानी में अस्पताल से अस्थायी छुट्टी मिली। आरव उसे उसके मामा के घर नोएडा ले गया, क्योंकि वह आरव के फ्लैट में नहीं लौटना चाहती थी। न उसी कमरे में, न उसी रसोई में, न उसी बालकनी में जहां उसने कई रातें अकेले बिताई थीं। आरव ने कोई बहस नहीं की।

कार में काव्या खिड़की से बाहर देखती रही। सड़क के ठेले, मेट्रो की लाइन, मंदिर के बाहर फूल बेचती बच्ची, बारिश के बाद की मिट्टी—सब उसे ऐसे दिख रहा था जैसे दुनिया पहली बार साबित कर रही हो कि वह अभी भी यहां है।

इमारत के नीचे आरव ने गाड़ी रोकी।

—बैग ऊपर छोड़ दूं?

काव्या ने कुछ पल सोचा।

—हां। लेकिन तुम रुक नहीं रहे।

—ठीक है।

—मेरे लिए फैसले नहीं करोगे।

—ठीक है।

—और इस सबको प्रेम कहानी बनाकर अपने अपराधबोध को साफ नहीं करोगे।

आरव ने गहरी सांस ली।

—ठीक है।

काव्या ने उसकी तरफ देखा।

—मैं नहीं जानती हम क्या हैं।

—मैं भी नहीं।

—मैं तुम्हारी पत्नी नहीं हूं।

—मुझे पता है।

—मैं तुम्हारी जिम्मेदारी भी नहीं हूं।

—यह भी पता है।

उसकी आंखें भर आईं, पर आवाज स्थिर रही।

—मुझे ऐसे जीना है जहां प्यार कर्ज न बन जाए।

आरव ने सिर झुका दिया।

—तो मैं प्यार करना सीखूंगा बिना हिसाब मांगे।

काव्या ने अपनी कमजोर, पतली उंगलियों को देखा। वे डरी हुई थीं, लेकिन जीवित थीं। कुछ पल बाद उसने अपना हाथ आरव के हाथ पर रख दिया। बहुत देर तक नहीं। बस इतना कि वह समझ सके—यह पूरा माफ़ करना नहीं था, कोई वादा भी नहीं था। यह शुरुआत थी।

महीने बीत गए। जांचें होती रहीं। कभी रिपोर्ट अच्छी आती, कभी डर लौट आता। कभी काव्या 2 दिन फोन नहीं उठाती, और आरव उसे परेशान नहीं करता। कभी रात के 1 बजे वह उसका नाम लेकर सिर्फ इतना कहती—

—जाग रहे हो?

और वह कहता—

—हां।

वह वापस उसके जीवन में पति बनकर नहीं घुसा। वह उतनी ही जगह पर खड़ा रहा, जितनी जगह काव्या ने दी। कभी दरवाजे के बाहर, कभी कमरे के भीतर, कभी सिर्फ फोन की दूसरी तरफ।

एक सर्द सुबह एम्स के उसी हेमेटोलॉजी कॉरिडोर में, जहां उसने उसे पहली बार अकेला देखा था, एक नर्स ने फाइल देखते हुए पूछा—

—आरव जी, आप इनके पति हैं?

आरव ने जवाब देने के लिए होंठ खोले, मगर काव्या ने पहले कहा—

—नहीं।

आरव की नजर झुक गई।

काव्या अभी भी पूरी तरह ठीक नहीं थी। सिर पर दुपट्टा था, चेहरे पर थकान थी, शरीर में लड़ाई के निशान थे। लेकिन उसकी आंखें अब भागती नहीं थीं।

वह धीरे से बोली—

—ये वो इंसान है, जो बहुत देर से आया था।

आरव की सांस अटक गई।

फिर उसने उसकी तरफ देखा और जोड़ा—

—लेकिन इस बार रुका रहा।

आरव ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश नहीं की। वह उस क्षण को अपने पश्चाताप से भरना नहीं चाहता था।

इस बार काव्या ने खुद अपनी उंगलियां उसकी उंगलियों में डाल दीं।

और उसी अस्पताल के गलियारे में, जहां उसे कभी लगा था कि वह सब कुछ खो चुका है, आरव ने समझा कि टूटे रिश्ते हमेशा पहले जैसे नहीं बनते। कभी-कभी वे सिर्फ इतना मांगते हैं कि कोई रोज़ उस टूटन के सामने खड़ा रहे, बिना भागे, बिना बहाना बनाए, जब तक घायल इंसान को यह भरोसा न हो जाए कि अब उसे अकेले दर्द नहीं सहना पड़ेगा।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.