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बच्चे के पहले जन्मदिन पर बहू ने अपने ही ससुर को घर से छिपाने को कहा, “आपसे हमारी इज्जत खराब होगी”, लेकिन मेहमानों के आने से पहले बूढ़े आदमी ने सबके सामने असली मालिकाना सच खोल दिया और रिश्ता हिला दिया

PART 1

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—मेरे मम्मी-पापा आने वाले हैं, इससे पहले बाहर निकल जाइए… आपके कपड़ों से मजदूरों वाली बदबू आती है।

अपने ही घर की रसोई में, अपने 1 साल के पोते को गोद में लिए खड़े 68 साल के रघुनाथ मिश्रा ने यह वाक्य अपनी बहू तन्वी के मुंह से सुना, तो जैसे उनके भीतर कुछ चुपचाप टूट गया। उनके हाथों पर अब भी सीमेंट की महीन सफेदी लगी थी, नाखूनों के पास लकड़ी की धूल जमी थी, और कुर्ते पर पुराने पेंट के धब्बे थे। वही हाथ जिनसे उन्होंने लखनऊ के इंदिरा नगर में यह दोमंजिला मकान ईंट-ईंट जोड़कर बनाया था।

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रघुनाथ कभी बड़े आदमी नहीं रहे। 43 साल तक उन्होंने लोगों के घरों में मार्बल बिछाया, छतें सुधारीं, दीवारें उठाईं, टूटे दरवाजे ठीक किए। उनकी पत्नी सावित्री कहा करती थीं कि उनके हाथ भले खुरदरे हैं, लेकिन इसी खुरदरापन में घर की असली नींव छिपी है। 4 साल पहले सावित्री कैंसर से चली गईं, और घर की हर दीवार जैसे अचानक बूढ़ी हो गई।

उनका इकलौता बेटा अमन पहले प्राइवेट बैंक में काम करता था। नौकरी छूट गई, किराया चढ़ गया, और तन्वी 7 महीने की गर्भवती थी। एक रात अमन आंखें झुकाए पिता के सामने खड़ा हुआ था।

—पापा, कुछ महीने संभाल लो।

रघुनाथ ने बिना हिसाब लगाए कहा था—

—यह घर तुम्हारा ही है, बेटा। आ जाओ।

पर घर में आते ही तन्वी ने उस घर को अपना बताना शुरू कर दिया और रघुनाथ को धीरे-धीरे कोने में धकेल दिया। वह अपनी ही बड़ी कोठरी छोड़कर पीछे वाले स्टोरनुमा कमरे में सोने लगे। बिजली का बिल वही भरते, राशन वही लाते, बच्चे के डायपर तक वही खरीदते। पोते आरव के जन्म के बाद तो रघुनाथ की सांसों में फिर से जीवन लौट आया। रात में आरव रोता, तो वह उठकर बोतल गरम करते, उसे कंधे से लगाकर पुरानी अवधी लोरी गाते।

लेकिन आरव के पहले जन्मदिन की खबर उन्हें पड़ोस की शर्मा आंटी से मिली। सुनहरे कार्ड पर लिखा था—“आरव turns 1”, होटल में ब्रंच, ड्रेस कोड पेस्टल, फोटोग्राफर, केक, मेहमान। कार्ड पर अमन और तन्वी का नाम था, पर रघुनाथ का नहीं।

रविवार सुबह अमन ने फोन किया—

—पापा, आरव अकेला है। हम लोग तैयारी में हैं, आप बस थोड़ी देर संभाल लो।

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रघुनाथ चुपचाप चले आए। आरव को गोद में लिया ही था कि लैंडलाइन बजा। उधर तन्वी थी।

—सुनिए, मेरे मम्मी-पापा और रिश्तेदार बस आने वाले हैं। आप घर में मत दिखिएगा। सबको बताया है कि यह घर अमन ने खरीदा है। आप पीछे वाले कमरे में चले जाइए।

रघुनाथ की सांस रुक गई।

—यह घर सावित्री और मैंने बनाया था, तन्वी।

—तो क्या हुआ? अब इसे थोड़ा स्टैंडर्ड तो हमने दिया है। प्लीज, आज हमारी इज्जत खराब मत कीजिए।

उस क्षण रघुनाथ ने पहली बार अपने पोते को सीने से लगाकर तय किया कि अब उनका मौन किसी और के झूठ की दीवार नहीं बनेगा।

PART 2

रघुनाथ ने फोन काटा, आरव को पालने में सुलाया और पुराने संदूक से मकान की रजिस्ट्री निकाली। सावित्री की लिखावट वाला एक कागज भी साथ था—“यह घर मेहनत का है, दिखावे का नहीं।”

उन्होंने अपने दो पुराने साथियों, नसीम और मोहन को बुलाया। 30 मिनट में मुख्य दरवाजे, गेट और पिछली कुंडी के ताले बदल गए। तन्वी और अमन के कपड़े, जूते, मेकअप, महंगे कुशन और नकली क्रिस्टल के शोपीस साफ डिब्बों में पैक होकर बरामदे में रख दिए गए। आरव के खिलौने, कपड़े और दवाइयां भीतर ही रहीं।

दोपहर 12:35 पर तन्वी अपने माता-पिता के साथ कार से उतरी। गुलाबी साड़ी, सुनहरे झुमके, चेहरे पर पार्टी वाली मुस्कान। फिर उसने डिब्बे देखे।

—यह क्या तमाशा है?

रघुनाथ ने शांत स्वर में कहा—

—तमाशा वह था जिसमें मेरे घर से मेरा नाम मिटाया जा रहा था।

तन्वी ने चाबी लगाई, पर ताला नहीं खुला। उसी समय अमन केक लेकर दौड़ता आया। तन्वी चिल्लाई—

—अमन, इन्हें समझाओ!

रघुनाथ ने रजिस्ट्री सबके सामने खोल दी।

PART 3

तन्वी के पिता, सुरेश माथुर, जो कानपुर के नामी रिटायर्ड कॉलेज प्रिंसिपल थे, रजिस्ट्री पर झुके और पहली बार उनके चेहरे का रंग उतर गया। उनकी पत्नी कुसुम ने धीमे से पूछा—

—तन्वी, तुमने तो कहा था यह मकान अमन ने खरीदा है।

तन्वी ने अमन की तरफ देखा, जैसे वह झूठ को आगे बढ़ाएगा। पर अमन के हाथ से केक का डिब्बा लगभग छूट गया। उसकी आंखें पिता से नहीं मिल पा रही थीं।

—मम्मीजी… यह घर पापा का है, उसने दबे स्वर में कहा। हम यहां 1 साल से मुफ्त रह रहे हैं।

बरामदे में खड़े मेहमानों के ड्राइवर, पड़ोसी और डेकोरेशन वाले लड़के सब सुन रहे थे। तन्वी का चेहरा गुस्से से कांप रहा था।

—आपको आज ही यह करना था? मेरे रिश्तेदार रास्ते में हैं!

रघुनाथ ने पहली बार उसकी आंखों में सीधे देखा।

—तुम्हें भी आज ही मेरे पोते के जन्मदिन पर मुझे नौकर की तरह छिपाना था?

आरव अपनी दादी सावित्री की पुरानी नीली टोपी पहने रघुनाथ की गोद में था। बच्चे को कुछ समझ नहीं आ रहा था, पर घर के आंगन में खिंची हुई शर्म और सच की रेखा सबको दिख रही थी।

सुरेश माथुर ने धीरे से तन्वी से पूछा—

—तुमने हमें यह भी बताया था कि रघुनाथ जी गांव से आए दूर के रिश्तेदार हैं, जिन्हें अमन ने दया से रखा है।

रघुनाथ ने कोई शिकायत नहीं की। बस बरामदे की दीवार की तरफ इशारा किया, जहां सावित्री की तस्वीर टंगी थी।

—इस औरत ने अपने गहने बेचकर इस घर की छत डलवाई थी। मैंने 43 साल लोगों के बाथरूम और रसोई बनाकर यह रसोई खड़ी की। अगर मेरी मेहनत तुम्हें बदबू लगती है, तो इस घर की हर ईंट तुम्हारे लिए गलत जगह है।

कुसुम की आंखें भर आईं। सुरेश ने तन्वी से आरव लिया और उसे रघुनाथ की ओर बढ़ा दिया।

—बच्चा अपने दादा के पास सुरक्षित है।

यह वाक्य तन्वी को चुभ गया।

अमन आगे बढ़ा—

—पापा, गलती हो गई। लेकिन हमें सड़क पर मत छोड़िए। आरव छोटा है।

रघुनाथ की आवाज भारी थी, पर उसमें अब विनती नहीं थी।

—आरव को मैंने कभी नहीं छोड़ा। तुम दोनों ने उसे दिखावे की फोटो में बदल दिया।

उन्होंने पुलिस नहीं बुलाई। उन्होंने बस इतना कहा कि अमन और तन्वी अपने सामान लेकर 48 घंटे में रहने की व्यवस्था करें। सुरेश ने उसी दोपहर पार्टी रद्द कर दी। मेहमानों को संदेश गया कि बच्चे की तबीयत ठीक नहीं। पर सच गली में हवा की तरह फैल चुका था।

रात को अमन अकेला लौटा। गेट के बाहर खड़ा रहा। पहली बार उसके कपड़े महंगे नहीं, बल्कि बेबस लग रहे थे।

—पापा, मैंने आपको रोका क्यों नहीं… मुझे समझ नहीं आता। मैं बस तन्वी की लड़ाई से डरता था।

रघुनाथ ने गेट नहीं खोला।

—तू अपनी पत्नी से नहीं, सच से डरता था। तन्वी ने मेरा अपमान किया, पर तूने उसे जगह दी।

अमन रो पड़ा।

—मैं आपका बेटा हूं।

—बेटा होना अधिकार नहीं, जिम्मेदारी भी है।

अगले कुछ दिन घर पर पत्थर जैसे भारी रहे। तन्वी ने कई संदेश भेजे। कभी माफी, कभी धमकी, कभी यह आरोप कि रघुनाथ बूढ़े होकर “कंट्रोलिंग” हो गए हैं। अमन बार-बार फोन करता, पर रघुनाथ हर बार सिर्फ एक बात कहते—

—आरव की जरूरत अलग है, तुम्हारे अहंकार की जरूरत अलग।

तीसरी रात 2:10 पर पिछली खिड़की से कांच टूटने की आवाज आई। रघुनाथ नींद से उछल पड़े। उन्होंने पहले पुलिस को फोन किया, फिर आहट की तरफ बढ़े। ड्रॉइंग रूम की रोशनी जलते ही तन्वी सामने थी। उसके हाथ में फाइलों का बैग था।

—मैं आरव के कागज लेने आई थी, उसने कहा।

—रात के 2 बजे, शीशा तोड़कर?

—वह मेरा बेटा है!

—और यह मेरा घर है। कागज अदालत तय करेगी, चोरी नहीं।

पुलिस आई। तन्वी रोने लगी, बोली कि बूढ़े ससुर ने उसे घर से निकाला, बच्चे से अलग किया, धमकाया। लेकिन टूटी खिड़की, बदलते ताले, कॉल रिकॉर्ड और बरामदे में रखे पैक सामान कुछ और ही कहानी कह रहे थे।

अमन थाने पहुंचा तो पिता पर भड़क उठा।

—आपने मेरी पत्नी पर केस कर दिया?

रघुनाथ ने फोन पर धीमे से कहा—

—मैंने उस औरत पर शिकायत की है जो अपने बच्चे की फाइल चुराने रात में घुसी। पत्नी बनना, मां बनना और इंसान बनना 3 अलग बातें हैं, अमन।

अगली सुबह रघुनाथ ने वह किया जिससे उनका दिल सबसे ज्यादा कांपा—उन्होंने बाल कल्याण समिति से संपर्क किया। वह अमन या तन्वी से बदला नहीं लेना चाहते थे। वह बस यह नहीं चाहते थे कि आरव होटल, रिश्तेदारों के सोफे और झूठे अहंकार के बीच धकेला जाए।

2 दिन बाद एक महिला अधिकारी, पूजा सक्सेना, घर आईं। उन्होंने हर बात नोट की। घर किसका है। बच्चा कहां सोता है। खर्च कौन उठाता है। मां ने रात में प्रवेश क्यों किया। पिता की नौकरी क्या है। बच्चे की दवाइयों का रिकॉर्ड किसके पास है।

तन्वी ने कहा—

—मैं तनाव में थी।

अमन ने कहा—

—हम संभाल लेंगे।

पूजा ने पूछा—

—अब तक कौन संभाल रहा था?

कमरे में चुप्पी गिर गई।

अस्थायी रूप से आरव की देखभाल रघुनाथ को सौंप दी गई। आदेश सुनते ही रघुनाथ की आंखों से आंसू निकल पड़े। यह जीत नहीं थी। यह उस घर की सबसे भारी जिम्मेदारी थी, जिसे उन्होंने कभी अपने बुढ़ापे का सहारा समझा था।

उसी शाम उन्होंने आरव का असली जन्मदिन मनाया। शर्मा आंटी ने घर का बना सूजी का हलवा भेजा। नसीम एक छोटी पीली कार लेकर आया। मोहन ने 3 गुब्बारे बांध दिए। कोई फोटोग्राफर नहीं था। कोई पेस्टल ड्रेस कोड नहीं। बस एक बूढ़ा दादा, 1 मोमबत्ती और एक बच्चा, जो ताली बजाते हुए हलवे में उंगली डाल रहा था।

रघुनाथ ने सावित्री की तस्वीर के सामने थाली रखी।

—देख रही हो न, हमारा पोता?

उस रात घर में पहली बार दर्द के साथ शांति भी थी।

कुछ दिन बाद सुरेश माथुर अकेले आए। हाथ में मिठाई नहीं, एक लिफाफा था। उनका चेहरा उतना कठोर नहीं था जितना पहली मुलाकात में लगा था।

—मुझे माफ कीजिए, रघुनाथ जी। मेरी बेटी ने आपसे झूठ बोला, पर शायद हमने उसे बचपन से यही सिखाया कि लोग क्या सोचेंगे, यह सच से बड़ा होता है।

रघुनाथ ने उन्हें बैठने को कहा।

सुरेश ने लिफाफा मेज पर रखा।

—अमन ने जो पैसे आपसे लिए, उनमें जितना मुझे पता चला, यह उसका एक हिस्सा है। बाकी वह खुद लौटाएगा। मैं अपनी बेटी की गलती खरीद नहीं सकता, पर आपकी मेहनत का अपमान कम से कम यूं खुला न रहे।

रघुनाथ ने लिफाफे को नहीं छुआ।

—मुझे पैसे से ज्यादा जवाब चाहिए था।

—जवाब यह है कि हमने तन्वी को इज्जत सिखाई, इंसानियत नहीं। वह हार से डरती रही और दूसरों की मेहनत को नीचा समझकर खुद को ऊपर मानती रही।

उस दिन पहली बार रघुनाथ को लगा कि सच ने सिर्फ उन्हें नहीं, सामने वाले घर को भी काटा है।

अगले महीनों में जिंदगी धीरे-धीरे बदली। अमन को एक हार्डवेयर सप्लाई कंपनी में नौकरी मिली। शुरुआत में वह आरव से मिलने आता तो उसके चेहरे पर चोट खाए आदमी जैसा गुस्सा होता। फिर एक दिन वह डायपर लेकर आया। दूसरे दिन दूध का डिब्बा। तीसरे हफ्ते उसने पूछा—

—पापा, आरव को बुखार में कौन सी दवा देते हैं?

रघुनाथ ने दवा का नाम बताया, पर साथ में यह भी कहा—

—बच्चे को सिर्फ दवा नहीं, स्थिरता चाहिए।

अमन चुप रहा।

एक शाम, बारिश के बीच, वह देर तक बैठा रहा। आरव सो चुका था। उसने पिता से कहा—

—मैंने आपकी जगह छीन ली थी और फिर आपको ही बोझ समझने लगा। तन्वी अकेली गलत नहीं थी। मैं भी था।

रघुनाथ ने पूछा—

—क्यों किया तूने ऐसा?

—क्योंकि मैं असफल दिखना नहीं चाहता था। तन्वी के परिवार के सामने, दोस्तों के सामने… मुझे लगता था अगर सच बता दिया तो मैं छोटा हो जाऊंगा।

रघुनाथ की आंखें भर आईं।

—तू मेरे सामने कभी छोटा नहीं था। तू तो तब छोटा हुआ जब तूने अपने पिता को छोटा दिखाना स्वीकार किया।

अमन रोया, पर रघुनाथ ने उसे गले नहीं लगाया। इस बार आंसुओं से दरवाजा नहीं खुलना था।

—अगर पिता बनना है, तो महीने-दो महीने नहीं, सालों तक साबित कर। आरव को बहाना बनाकर घर मत मांग। उसके लिए आदमी बन।

तन्वी का रास्ता और कठिन था। अदालत में उसके संदेश सामने आए। उसने अपनी सहेलियों को लिखा था—“कल तक इस बूढ़े और उसकी मजदूर गंध को कहीं छिपाना पड़ेगा।” एक और संदेश में था—“मम्मी-पापा को सच पता चला तो मेरी सारी इमेज खत्म हो जाएगी।”

जज ने स्क्रीन से नजर उठाई और पूछा—

—आपको किस बात की ज्यादा चिंता थी? बच्चे के जन्मदिन की या अपनी छवि की?

तन्वी जवाब नहीं दे पाई।

उसे काउंसलिंग, स्थिर रोजगार और निगरानी में मुलाकात की शर्त दी गई। सुरेश ने उसके महंगे खर्च बंद कर दिए। तन्वी ने गोमती नगर की एक रियल एस्टेट एजेंसी में काम शुरू किया। अजीब विडंबना थी—अब वह लोगों को घर दिखाती थी और हर बार दीवार, फर्श, छत की मजबूती पर बात करते हुए शायद पहली बार सोचती थी कि इन सबके पीछे किसी रघुनाथ जैसे आदमी के हाथ होते हैं।

6 महीने बाद वह रघुनाथ के गेट पर आई। सादी कॉटन साड़ी, बिना मेकअप, आंखों में थकान। इस बार उसके हाथ खाली थे।

—मैं आरव को लेने नहीं आई, उसने कहा। मैं माफी मांगने आई हूं।

रघुनाथ तुलसी में पानी डाल रहे थे।

—कहिए।

तन्वी ने बहुत देर बाद बोला—

—मुझे आपकी गरीबी से नहीं, अपनी नकली अमीरी के टूटने से डर था। आप मुझे याद दिलाते थे कि हम आपके सहारे थे। इसलिए मैंने आपको नीचा दिखाया, ताकि मैं खुद को ऊंचा मान सकूं।

रघुनाथ ने कोई सहानुभूति नहीं दिखाई, पर ध्यान से सुना।

—मैंने चाहा कि मेरा बेटा ऐसे माहौल में बड़ा हो जहां दादा को शर्म समझा जाए। इससे बड़ा पाप क्या होगा?

उसकी आवाज टूट गई।

रघुनाथ ने कहा—

—शर्म तब तक बेकार है जब तक वह व्यवहार नहीं बदलती।

तन्वी ने सिर झुका लिया।

धीरे-धीरे उसे आरव से मिलने की अनुमति मिली। पहले पूजा सक्सेना की मौजूदगी में, फिर कुछ घंटों के लिए। अमन ने अलग कमरा किराए पर लिया। तन्वी और अमन साथ नहीं लौटे। शायद उनका विवाह दिखावे की मेज पर रखा वह केक था, जो सच की गर्मी से पिघल चुका था।

रघुनाथ ने किसी को बदला लेने की कहानी नहीं सुनाई। मोहल्ले में लोग चर्चा करते रहे। कोई बोला—“बूढ़े ने बेटे को निकाल दिया, बहुत कठोर है।” कोई बोला—“ठीक किया, अपमान की भी सीमा होती है।”

रघुनाथ बस आरव को बड़ा होते देखते रहे।

हर सुबह आरव पीले जूते पहनकर आंगन में भागता और चिल्लाता—

—दादू, कार!

रघुनाथ वही छोटी पीली कार निकालते, जो नसीम ने जन्मदिन पर दी थी। आरव उसे उनके पैरों के बीच घुमाता, फिर अचानक उनके खुरदरे हाथों को पकड़कर कहता—

—दादू के हाथ स्ट्रॉन्ग हैं।

यह सुनकर रघुनाथ की छाती भर आती।

एक सर्द रात, जब आरव उनकी गोद में सो गया, बारिश छज्जे पर गिर रही थी। रघुनाथ ने अपने हाथों को देखा। दरारें थीं, पुराने कट के निशान थे, उंगलियों में उम्र की अकड़ थी। तन्वी ने इन्हीं हाथों को बदबू कहा था। दुनिया ने शायद इन्हें मजदूर के हाथ कहा होगा।

पर इन्हीं हाथों ने घर बनाया था। इन्हीं हाथों ने पत्नी की चिता पर फूल रखे थे। इन्हीं हाथों ने बेटे को कई बार गिरने से बचाया था। और इन्हीं हाथों ने एक बच्चे को उस दिन बचा लिया था, जब बड़े लोग इज्जत के नाम पर सच को दरवाजे के बाहर धकेलना चाहते थे।

रघुनाथ ने आरव की पीठ पर हाथ रखा और खिड़की के बाहर अंधेरे आंगन को देखा।

अगर मेहनत की गंध किसी को शर्म लगती है, तो वह घर में रहने लायक नहीं, सिर्फ सजावट देखने लायक होता है। और अगर कोई बच्चा उन हाथों में सुरक्षा महसूस कर ले, तो वही हाथ दुनिया की सबसे अमीर विरासत बन जाते हैं.