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19 साल की लड़की खाली जेब लेकर सैन्य कुत्तों की नीलामी में पहुंची, सबने हंसकर कहा “यह पागल है”… लेकिन जैसे ही उसने पिता का पुराना आदेश बोला, 30 खूंखार कुत्ते एक साथ चुप हो गए

भाग 1

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दिल्ली के पास मानेसर के एक बंद सरकारी प्रशिक्षण केंद्र में जब 19 साल की अनन्या राठौड़ ने खाली जेब और कांपते हाथों के साथ सिर्फ एक नाम पुकारा, तो 30 खूंखार कमांडो कुत्ते एक साथ चुप हो गए।

उस हॉल में कोई मेले जैसा शोर नहीं था। वहां लोहे के पिंजरों की खड़खड़ाहट, गीले सीमेंट की गंध, बूटों की आवाज और पैसों से भरे लोगों की ठंडी नजरें थीं। यह आम नीलामी नहीं थी। यह सेवानिवृत्त सैन्य और पुलिस कुत्तों की निजी नीलामी थी, जहां बड़े सिक्योरिटी कॉन्ट्रैक्टर, फार्महाउस मालिक और खदान कंपनियों के एजेंट आए थे। उनके लिए ये कुत्ते साथी नहीं, चलती-फिरती दीवारें थे।

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अनन्या वहां बिल्कुल अलग दिख रही थी। सस्ती सूती सलवार-कमीज, पुराना बैग, आंखों में नींद की कमी और हाथ में मुड़ा हुआ भूरा लिफाफा। उस लिफाफे में 28,600 रुपये थे। यही उसकी कोचिंग की फीस थी, मां की दवाई का पैसा था और वह छोटी बचत थी जिसे उसने गुरुग्राम के एक ढाबे में रात की शिफ्ट करके जोड़ा था।

वह सिर्फ एक कुत्ते के लिए आई थी।

लॉट 17।

रुद्र।

5 साल पहले रुद्र सिर्फ एक फुर्तीला बेल्जियन मेलिनोइस नहीं था। वह अनन्या के लिए उसके घर का तीसरा सदस्य था। उसके पिता मेजर अर्जुन राठौड़, पैरा स्पेशल फोर्सेज में थे। जब भी वह छुट्टी पर जयपुर के अपने छोटे घर आते, रुद्र भी साथ आता। अनन्या स्कूल से लौटते ही अपना बैग फेंकती और रुद्र उसके चारों ओर पागलों की तरह घूमता। अर्जुन हंसकर कहते — “रुद्र, मेरी बेटी की रक्षा करना, यह मेरी सबसे बड़ी पोस्टिंग है।”

लेकिन 3 साल पहले सब खत्म हो गया। कश्मीर की एक पहाड़ी चौकी पर रात के ऑपरेशन में अर्जुन की टीम घिर गई थी। सरकारी रिपोर्ट में बहुत कम लिखा था, पर जो पुराना सूबेदार चुपके से घर आया था, उसने अनन्या की मां से कहा था कि अर्जुन ने अपनी टीम को पीछे भेज दिया और आखिरी गोली तक मोर्चा पकड़े रखा। जब बचाव दल पहुंचा, रुद्र घायल था, उसके कान का हिस्सा फटा था, कंधे में छर्रे थे, लेकिन वह अर्जुन के शरीर के ऊपर खड़ा था। किसी को पास नहीं आने दे रहा था।

अंतिम संस्कार के बाद अनन्या ने अधिकारियों से रुद्र को घर लाने की विनती की थी। जवाब आया — “यह प्रशिक्षित संपत्ति है, परिवार को नहीं दी जा सकती।”

फिर रुद्र को दूसरी यूनिट में भेज दिया गया। फिर सीमा सुरक्षा में। फिर दंगा नियंत्रण में। हर जगह वही रिपोर्ट आई — अत्यधिक आक्रामक, रात में चीखना, नए हैंडलर को स्वीकार न करना, अचानक हमला करना। आखिर उसे “नागरिक उपयोग के लिए खतरनाक” लिखकर निजी नीलामी में डाल दिया गया।

अनन्या को यह खबर उसके पिता के पुराने साथी कर्नल कबीर मल्होत्रा से मिली थी। उन्होंने फोन पर सिर्फ इतना कहा था — “बेटा, अगर तू नहीं गई, तो रुद्र किसी अमीर आदमी के फार्महाउस की जंजीर बन जाएगा।”

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घर में मामा ने उसे पागल कहा था। मां बीमार बिस्तर पर पड़ी रोती रही। मामा चिल्लाए — “तेरे पिता मर गए, अब कुत्ते के पीछे अपनी जिंदगी भी जला देगी?”

अनन्या ने जवाब नहीं दिया। वह सुबह 4 बजे घर से निकल गई।

नीलामीकर्ता ने माइक पकड़ा — “अगला लॉट 17। नर बेल्जियन मेलिनोइस। उम्र 7 साल। 3 उच्च जोखिम अभियानों का अनुभव। पर चेतावनी साफ है, यह कुत्ता अस्थिर है। 2 हैंडलर को काट चुका है। इसे परिवार या सामान्य सुरक्षा के लिए न लिया जाए।”

साइड गेट खुला। 2 भारी भरकम कर्मचारी लोहे की पकड़ वाली छड़ों से एक कुत्ते को खींचते हुए लाए। अनन्या की सांस रुक गई।

रुद्र।

उसकी चमकदार खाल अब रूखी थी। थूथन पर लंबा निशान था। एक कान आधा कटा था। मुंह पर मोटा चमड़े का जालीदार पट्टा था। वह गुर्रा रहा था, जैसे पूरी दुनिया से नफरत करता हो। एक आदमी ने हंसकर कहा — “ऐसे जानवर को गोली मारनी चाहिए थी।”

अनन्या का चेहरा सफेद पड़ गया।

नीलामी शुरू हुई — “10,000।”

अनन्या ने हाथ उठाया।

पीछे से एक ठंडी आवाज आई — “50,000।”

वह राजीव सेठी था, दिल्ली की बड़ी निजी सुरक्षा कंपनी का मालिक। उसके चेहरे पर घमंड था। वह रुद्र को देखकर नहीं, अनन्या को देखकर बोली लगा रहा था।

अनन्या ने गला सूखते हुए कहा — “28,600।”

हॉल में हल्की हंसी फैल गई।

राजीव मुस्कुराया — “1,00,000।”

अनन्या की आंखों में अंधेरा छा गया। उसके पास कुछ नहीं बचा था। न पैसा, न पहचान, न सहारा। तभी नीलामीकर्ता ने हथौड़ा उठाया — “1,00,000 पहली बार… दूसरी बार…”

अनन्या ने लोहे की रस्सी के नीचे से कदम रख दिया।

लोग चिल्लाए। कर्मचारी डर गए। रुद्र ने उसे देखा और पूरी ताकत से उसकी ओर झपटा।

अनन्या ने आंखें बंद नहीं कीं। उसने अपने पिता की भारी, सख्त आवाज की नकल करते हुए चीखा — “रुद्र!”

पूरा हॉल जम गया।

फिर उसने वही कमांड बोली, जो उसके पिता घर के आंगन में कहा करते थे — “अर्जुन राठौड़ के लिए सावधान!”

भाग 2

रुद्र की देह अचानक पत्थर की तरह स्थिर हो गई। उसकी गुर्राहट गले में ही टूट गई। जिन 2 कर्मचारियों ने उसे पकड़ रखा था, वे पीछे की ओर जोर लगाए हुए थे, पर रुद्र के रुकते ही वे खुद आगे लड़खड़ा गए। पीछे पिंजरों में बंद 30 कुत्तों का भौंकना भी एक-एक करके बंद होने लगा। सिर्फ पंखों की आवाज और अनन्या की भारी सांसें सुनाई दे रही थीं।

रुद्र ने सिर झुकाया। वह अनन्या को देखता रहा, जैसे उसकी आंखों में कोई पुराना घर खोज रहा हो। फिर उसने हवा सूंघी। अनन्या ने वही जैकेट पहनी थी जो उसके पिता की अलमारी में 3 साल से बंद थी। रुद्र की आंखें बदल गईं। वह धीरे से बैठ गया। सीधा। अनुशासित। बिल्कुल वैसे जैसे मेजर अर्जुन राठौड़ के सामने बैठा करता था।

नीलामीकर्ता की आवाज कांप गई — “तुम कौन हो?”

अनन्या ने आंसू रोकते हुए कहा — “मैं मेजर अर्जुन राठौड़ की बेटी हूं। और यह मेरे पिता का साथी है।”

राजीव सेठी ने ताली बजाकर हंसी उड़ाई — “बहुत भावुक दृश्य है। अब लड़की को बाहर करो और नीलामी पूरी करो। मेरी बोली 1,00,000 है।”

अनन्या उसकी ओर मुड़ी — “वह सामान नहीं है।”

राजीव आगे आया — “मेरे लिए है। और तुम जैसी लड़की ऐसे कुत्ते के साथ 2 दिन भी नहीं रह पाएगी।”

तभी पीछे से एक कुर्सी खिसकने की आवाज आई। सफेद दाढ़ी, सीधा कंधा और गहरी आंखों वाला आदमी आगे आया। यह कर्नल कबीर मल्होत्रा था। हॉल के कई पूर्व सैनिक तुरंत खड़े हो गए।

कबीर ने कहा — “मैं उस रात बचाव दल में था। जब हम पहुंचे, अर्जुन नहीं बचे थे। लेकिन यह कुत्ता 42 मिनट तक उनके शरीर के आगे खड़ा रहा। गोली लगी थी, खून बह रहा था, फिर भी पीछे नहीं हटा। जिस आदमी की बेटी आज यहां खड़ी है, उसने 8 जवानों को बचाया था।”

कमरा भारी हो गया।

राजीव का चेहरा तन गया — “नीलामी भावना से नहीं चलती, कर्नल साहब।”

कबीर ने बिना पलक झपकाए कहा — “2,00,000।”

अनन्या सन्न रह गई। वह हार गई थी। रुद्र अब भी उसका नहीं होगा।

राजीव ने दांत भींचे — “2,50,000।”

कबीर बोले — “5,00,000।”

हथौड़ा गिरा।

अनन्या का दिल टूट गया। तभी कबीर ने चेक उसके हाथ में रख दिया।

“मैंने नहीं खरीदा, बेटा। तूने खरीदा है। अर्जुन ने मेरी जान बचाई थी। आज हिसाब पूरा हुआ।”

भाग 3

अनन्या चेक को ऐसे देख रही थी जैसे किसी ने उसके हाथ में कागज नहीं, उसके पिता की आखिरी सांस रख दी हो। हॉल में खड़े लोग, जो कुछ देर पहले उसे मजाक समझ रहे थे, अब चुप थे। किसी की आंखें झुकी थीं, किसी की मुट्ठी बंधी थी, और कुछ लोग पहली बार उस कुत्ते को कीमत से नहीं, कहानी से देख रहे थे।

नीलामीकर्ता ने कागजात पर मुहर लगाई। लोहे की मेज पर वह आवाज गूंजी, जैसे किसी कैद की दीवार टूट गई हो।

“लॉट 17 नागरिक संरक्षण में हस्तांतरित,” उसने धीमी आवाज में कहा। फिर कर्मचारियों की ओर देखा — “नीचे लाओ।”

दोनों कर्मचारी झिझक गए। उनमें से एक बोला — “सर, यह बहुत जोखिम भरा है। अभी शांत है, लेकिन अगर भड़क गया तो किसी को भी चीर सकता है।”

राजीव सेठी, जो अब भी हार की जलन से लाल था, हंस पड़ा — “छोड़ दो। देखता हूं बेटी अपने पिता की विरासत कैसे संभालती है।”

कबीर की नजर उस पर पड़ी तो राजीव चुप हो गया।

रुद्र को धीरे-धीरे लोहे के रैंप से नीचे लाया गया। उसके पंजे भारी आवाज के साथ जमीन पर पड़े। उसकी आंखें हर तरफ घूमीं, फिर अनन्या पर ठहर गईं। उसके शरीर में अब भी तनाव था, जैसे उसके भीतर युद्ध अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था। उसकी गर्दन पर मोटी लोहे की चेन थी, मुंह पर चमड़े का पट्टा और आंखों में 3 साल की बेचैनी।

अनन्या उसके सामने घुटनों के बल बैठ गई।

पूरा हॉल सांस रोके देख रहा था।

कर्मचारी बोला — “मैडम, हाथ आगे मत कीजिए। यह काट सकता है।”

अनन्या ने उसकी बात नहीं सुनी। उसने दोनों हथेलियां खुली रखीं, खाली, बिना डर दिखाए। रुद्र ने 1 कदम बढ़ाया। फिर दूसरा। फिर तीसरा। वह उसके इतना पास आ गया कि उसका गर्म सांस अनन्या के चेहरे से टकराया।

कुछ पल तक वह बस सूंघता रहा। हाथ। बाजू। कंधा। फिर वह जैकेट। वही पुरानी सेना वाली जैकेट जिसमें अभी भी धूप, पसीने, मिट्टी और अर्जुन की हल्की सी गंध थी।

रुद्र का पूरा शरीर कांप गया।

उसने कोई भौंक नहीं की। कोई हमला नहीं किया। वह धीरे-धीरे अपना भारी सिर अनन्या की छाती से लगा कर खड़ा रह गया। उसके गले से एक टूटी हुई, गहरी आवाज निकली। वह आवाज गुर्राहट नहीं थी। वह किसी बूढ़े दर्द का रोना था।

अनन्या टूट गई।

उसने रुद्र की गर्दन पकड़ ली और उसके खुरदरे बालों में चेहरा छिपा लिया। उसकी आवाज फुसफुसाहट से भी धीमी थी — “बस, रुद्र। अब नहीं लड़ना। पापा नहीं हैं, लेकिन मैं हूं। तू घर चल रहा है।”

कई लोगों ने मुंह फेर लिया। कुछ पूर्व सैनिकों की आंखें भर आईं। कर्नल कबीर ने अपनी पलकों को झपकाकर नमी छुपाई।

अनन्या ने धीरे से उसके मुंह का चमड़े का पट्टा खोलने के लिए हाथ बढ़ाया।

कर्मचारी घबरा गया — “नहीं, यह मत कीजिए।”

कबीर ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया — “उसे करने दो।”

अनन्या ने पट्टा खोला। चमड़ा ढीला हुआ। उसने उसे धीरे से उतारकर जमीन पर रख दिया। रुद्र का जबड़ा आजाद हुआ। हॉल में मौजूद कई लोगों के हाथ अपनी कमर की ओर खिसक गए, जैसे किसी अनहोनी के लिए तैयार हों।

लेकिन रुद्र ने दांत नहीं दिखाए।

उसने बस अपनी जीभ से अनन्या के गाल पर बहते आंसू को छुआ और फिर बहुत धीरे से उसके कंधे से सिर लगा दिया।

उसी क्षण अनन्या को समझ आया कि रुद्र पागल नहीं हुआ था। वह बेवफा भी नहीं हुआ था। वह बस उसी जगह अटका रह गया था, जहां उसका मालिक गिरा था। लोग उसे नई पोस्टिंग देते रहे, नए आदेश देते रहे, नई जंजीरें पहनाते रहे। लेकिन उसके लिए दुनिया उसी रात रुक गई थी। वह अब भी अर्जुन को बचा रहा था।

कागजी प्रक्रिया पूरी हुई। अनन्या ने अपने 28,600 रुपये भी मेज पर रख दिए।

कबीर ने कहा — “बेटा, इसकी जरूरत नहीं।”

अनन्या ने सिर उठाया — “यह मेरी तरफ से है। मैं खाली हाथ अपने पिता का साथी नहीं ले जाऊंगी।”

नीलामीकर्ता ने लिफाफा लिया, फिर कुछ देर उसे देखता रहा। उसने रकम वापस अनन्या की ओर सरका दी।

“इसे रुद्र की दवाई में लगाना,” उसने धीमे से कहा। “आज पहली बार लगा कि इस नौकरी में कोई काम अच्छा भी हुआ।”

राजीव सेठी बाहर जाने लगा, लेकिन दरवाजे तक पहुंचते-पहुंचते रुद्र ने उसकी ओर देखा। कोई गुर्राहट नहीं, कोई हमला नहीं। बस एक स्थिर, ठंडी नजर। राजीव जल्दी से बाहर निकल गया। हॉल में कुछ लोग हल्के से मुस्कुरा दिए।

अनन्या ने साधारण नीली रस्सी निकाली, जो वह घर से लाई थी। उसने उसे रुद्र के कॉलर से बांधा।

“साथ,” उसने बहुत हल्के से कहा।

रुद्र तुरंत उसके बाएं पैर के पास आ गया। उसकी चाल अब भी सैनिक जैसी थी। सिर ऊंचा, कंधा अनन्या की टांग से लगा हुआ। जैसे वह कह रहा हो कि अब यह लड़की उसका मिशन है।

जैसे ही अनन्या बाहर की ओर चली, लोग खुद-ब-खुद रास्ता छोड़ते गए। कोई तालियां नहीं बजा रहा था, कोई नारा नहीं लगा रहा था, पर वह चुप्पी सम्मान से भरी थी। एक युवा लड़की और घायल कुत्ता उस हॉल से ऐसे निकल रहे थे जैसे एक अधूरी शहादत को आखिर घर मिल गया हो।

बाहर धूप तेज थी। मानेसर की सड़क पर ट्रकों की आवाज थी। ऑटो वाले ने जब रुद्र को देखा तो पहले डर गया।

“बहनजी, यह कुत्ता काटेगा तो नहीं?”

अनन्या ने रुद्र की पीठ पर हाथ फेरा। रुद्र शांत बैठा रहा।

“नहीं,” अनन्या ने कहा। “यह सिर्फ उन लोगों को पहचानता है जो अपने नहीं होते।”

ऑटो वाले ने कुछ पल सोचा, फिर बोला — “बैठ जाइए। फौजी कुत्ता है तो मेरा भी मेहमान है।”

जयपुर पहुंचते-पहुंचते रात हो गई। अनन्या जब घर के बाहर उतरी, तो गली के लोग दरवाजों से झांकने लगे। उसकी मां, मीरा, खिड़की के पास बैठी थीं। बीमारी ने उनका शरीर कमजोर कर दिया था, लेकिन जैसे ही उन्होंने रुद्र को देखा, उनकी आंखें फैल गईं।

“रुद्र…” उनके होंठ कांपे।

रुद्र ने सिर उठाया। उसे वह आवाज याद थी। वह धीरे से घर में घुसा, मीरा के बिस्तर के पास गया और अपना सिर उनके पैरों में रख दिया।

मीरा रो पड़ीं।

“अर्जुन इसे बेटा कहते थे,” उन्होंने कांपते हाथों से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा। “सब कहते थे जानवर है, पर अर्जुन कहते थे, यह जानवर नहीं, मेरा साथी है।”

मामा उसी समय अंदर आए। उन्होंने रुद्र को देखा और गुस्से से बोले — “तू सच में इस जानवर को घर ले आई? इस घर में पहले ही दवाई के पैसे नहीं हैं। अब इसके खाने का खर्च भी उठाएगी?”

अनन्या चुप रही। फिर पहली बार उसने सीधे उनकी आंखों में देखा।

“मामा, जिस पेंशन पर आप 3 साल से घर चला रहे हैं, वह पापा की शहादत की है। जिस घर में आप ऊंची आवाज में बोलते हैं, वह पापा की याद से खड़ा है। और आज जो उनके साथी को आप जानवर कह रहे हैं, उसने वही शरीर बचाया था जिसे आप अंतिम संस्कार में सम्मान से छू पाए थे।”

मामा का चेहरा उतर गया।

मीरा ने धीरे से कहा — “भैया, अब बस। मेरी बेटी ने आज वह किया है जो हम सब करने से डर गए थे।”

मामा कुछ बोल नहीं पाए। रुद्र ने सिर्फ उनकी ओर देखा, फिर अपना सिर वापस मीरा के पैरों पर रख दिया। वह नफरत से नहीं, थकान से भरा था। जैसे वह भी झगड़ों से ऊब चुका था।

शुरुआत आसान नहीं थी।

रात में रुद्र अचानक उठकर दरवाजे के पास खड़ा हो जाता। कभी अंधेरे में गुर्राता, कभी नींद में पंजे चलाता। पटाखे की आवाज सुनकर वह कांप जाता। एक बार बरसात की रात बिजली गरजी तो वह रसोई के कोने में जाकर दीवार से चिपक गया। अनन्या उसके पास बैठी रही। उसने उसे जबरदस्ती नहीं छुआ। बस वहीं बैठकर अपने पिता की पुरानी डायरी पढ़ती रही।

डायरी में एक पन्ने पर लिखा था — “रुद्र आदेश से नहीं, भरोसे से चलता है। इसे मारकर कोई नहीं संभाल सकता। इसे अपना बना लो, यह जान दे देगा।”

अनन्या ने उसी पन्ने को अपने कमरे की दीवार पर चिपका दिया।

उसने कॉलेज का दाखिला 1 साल टाल दिया। दिन में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती, शाम को पशु चिकित्सक के पास जाती, रात को रुद्र के साथ लंबी चुप सैर करती। धीरे-धीरे रुद्र ने जंजीर से नफरत छोड़नी शुरू की। उसने पहली बार बिना डर के पानी पिया। पहली बार मीरा के हाथ से रोटी खाई। पहली बार गली के एक छोटे बच्चे के पास शांत बैठा, जब वह बच्चा दूर से उसे “फौजी भैया” कहकर हाथ हिला रहा था।

एक दिन कर्नल कबीर जयपुर आए। उनके साथ सेना के पशु व्यवहार विशेषज्ञ भी थे। उन्होंने रुद्र को देखा, उसकी चाल, उसकी प्रतिक्रिया, उसकी आंखों की बेचैनी।

विशेषज्ञ ने कहा — “यह आक्रामक नहीं है। यह शोक में था। बहुत गहरे शोक में। इसे हर जगह गलत पढ़ा गया।”

अनन्या ने रुद्र की ओर देखा। वह बरामदे में मीरा के बिस्तर के पास लेटा था, कान हिलाते हुए सब सुन रहा था।

कबीर ने अनन्या से पूछा — “तू आगे क्या करेगी?”

अनन्या ने कहा — “मैं पशु व्यवहार और पुनर्वास पढ़ना चाहती हूं। ऐसे कुत्तों के लिए जगह बनाना चाहती हूं जिन्हें लोग टूटे हुए समझकर बेच देते हैं।”

कबीर ने गर्व से सिर हिलाया — “अर्जुन होता तो कहता, मेरी बेटी ने मेरी यूनिट से बड़ा काम कर दिया।”

1 साल बाद, उसी घर का बरामदा बदल चुका था। दीवार पर मेजर अर्जुन राठौड़ की तस्वीर थी। नीचे फूल रखे थे। पास ही रुद्र लेटा था। उसकी खाल अब चमकने लगी थी। घावों के निशान अब भी थे, पर उनमें डर नहीं, इतिहास दिखता था।

मीरा अब थोड़ा चलने लगी थीं। अनन्या ने एक छोटे गैर-लाभकारी केंद्र की शुरुआत की थी, जिसका नाम था “साथी पुनर्वास गृह”। पहले दिन वहां 3 सेवानिवृत्त पुलिस कुत्ते आए। एक बूढ़ा लैब्राडोर, जिसकी सूंघने की क्षमता घट गई थी। एक जर्मन शेफर्ड, जिसे तेज आवाजों से डर लगता था। और एक देसी नस्ल का खोजी कुत्ता, जिसे उसके हैंडलर की मौत के बाद कोई नहीं अपनाना चाहता था।

रुद्र ने उन सबको देखकर पहले दूरी बनाई। फिर धीरे-धीरे वह उनके बीच जाकर बैठ गया। वह नेता की तरह नहीं, पहरेदार की तरह बैठा। जैसे कह रहा हो — “यह जगह सुरक्षित है।”

उसी शाम अनन्या ने अपने पिता की तस्वीर के सामने दिया जलाया। रुद्र खुद उठकर तस्वीर के नीचे बैठ गया। उसने सिर झुका दिया। मीरा की आंखें भर आईं।

अनन्या ने धीमे से कहा — “पापा, आपका साथी घर आ गया। और अब वह अकेला नहीं है।”

रुद्र ने जैसे उसकी बात समझी। उसने अपना सिर अनन्या की गोद में रख दिया। बाहर गली में बच्चे खेल रहे थे, रसोई से चाय की खुशबू आ रही थी, और बरामदे में वह कुत्ता सो रहा था जिसने युद्ध, मौत, जंजीर और बाजार सब देख लिया था।

उस रात रुद्र ने पहली बार कोई बुरा सपना नहीं देखा।

वह नींद में भाग रहा था, पर किसी पहाड़ी चौकी पर नहीं। वह जयपुर के पुराने आंगन में था। अर्जुन हंस रहे थे। छोटी अनन्या स्कूल यूनिफॉर्म में दौड़ रही थी। और रुद्र उनके बीच दौड़ता हुआ, बिना जंजीर, बिना पट्टे, बिना डर के, आखिरकार घर पहुंच चुका था।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.