
PART 1
“दूल्हा नहीं आएगा… क्योंकि तुम उसके लिए कभी होने वाली पत्नी नहीं थीं, बस गरीबी से निकली एक सस्ती जरूरत थीं।”
यह वाक्य नैना शर्मा ने दिल्ली के छतरपुर स्थित भव्य विवाह मंडप में, 300 मेहमानों के सामने सुना। उसके शरीर पर हाथ से कढ़ा हुआ सफेद लहंगा था, मुट्ठियों में 24 सफेद गुलाब थे और माथे पर लगा नाजुक घूंघट उसकी कांपती पलकों को छिपाने में असफल था।
घड़ी में दोपहर के 2:14 बज रहे थे। अरमान सेठी 45 मिनट देर कर चुका था।
नैना दिल्ली के एक बड़े सरकारी अस्पताल के आपातकालीन विभाग में परिचारिका थी। दुर्घटना कितनी भी भयानक हो, उसका दिमाग पहले नाड़ी, सांस और रक्तस्राव गिनता था। मगर उस दिन उसके अपने टूटते जीवन का कोई उपचार उसके पास नहीं था।
अरमान की मां देवयानी सेठी पहली पंक्ति में बैठी थी। उसके हाथ में लाल मदिरा का गिलास था और होंठों पर ऐसी मुस्कान, जैसे बेटे का गायब होना कोई दुर्घटना नहीं, पहले से लिखी योजना हो।
2 वर्ष पहले अरमान नैना को पहली बार अपने वसंत विहार वाले घर ले गया था। देवयानी ने पूछा था—
“परिचारिका हो? बहुत सेवा का काम है। वेतन कितना मिल जाता है?”
उसके स्वर में सम्मान नहीं, कीमत जांचने की ठंडक थी।
नैना की मां उसके 9 वर्ष की उम्र में चल बसी थी। पिता ने टैक्सी चलाकर उसे पढ़ाया, फिर हृदयाघात से उनकी भी मृत्यु हो गई। नैना ने छात्रवृत्ति, रात की पालियों और अधूरी नींद के सहारे अपनी शिक्षा पूरी की थी। उसके पास खानदानी हवेली नहीं थी, मगर अरमान कहता था कि उसे उसी का साहस पसंद है।
उसकी सहेली, चिकित्सक मीरा कपूर, बार-बार चेताती थी—
“उसकी मां तुम्हें बहू नहीं, खतरा समझती है।”
लेकिन नैना अरमान की मीठी बातों पर विश्वास करती रही। वह अस्पताल में उसके लिए खाना भेजता, छोटी तारीखें याद रखता और कहता कि विवाह के बाद भी वह उसके काम का सम्मान करेगा। फिर भी हर बार देवयानी का फोन आते ही उसका चेहरा बदल जाता।
विवाह से 2 सप्ताह पहले नैना ने अरमान को कहते सुना था—
“मां, सब तय है। नैना को कुछ पता नहीं। रिया सिंघानिया वाली बात मैं संभाल लूंगा।”
जब उसने पूछा, अरमान ने इसे कार्यालय का विषय बताकर टाल दिया।
अब देवयानी उठी, सेवक से ध्वनिवर्धक लिया और नैना के सामने आ खड़ी हुई।
“यह विवाह नहीं होगा। मेरा बेटा इस समय रिया सिंघानिया के साथ है—एक ऐसी लड़की जिसके पास परिवार, संपत्ति और भविष्य है।”
उसने नैना का घूंघट खींच दिया। पिन ने उसकी कनपटी चीर दी। फिर लाल मदिरा उसके सफेद लहंगे पर उड़ेल दी।
गुलाबों के कांटे उसकी हथेलियों में धंस गए। वह संगमरमर पर घुटनों के बल गिर पड़ी।
देवयानी झुककर फुसफुसाई—
“अब अस्पताल लौट जाओ और मरीजों की गंदगी साफ करो।”
तभी मंडप के प्रवेश द्वार से एक गंभीर आवाज गूंजी—
“अभी मत टूटना, नैना। जिस क्षण इन्हें लगता है तुम हार गई हो, उसी क्षण तुम्हारी जीत शुरू होने वाली है।”
नैना ने पलटकर देखा और उसका रक्त जैसे जम गया।
दरवाजे पर मल्होत्रा उद्योग समूह के अध्यक्ष विराज मल्होत्रा खड़े थे—वही व्यक्ति, जिसके सामने अरमान सिर उठाकर बोलने से भी डरता था।
PART 2
विराज सबके सामने नैना के पास घुटनों के बल बैठ गए।
“3 वर्ष पहले यमुना द्रुतमार्ग पर मेरी गाड़ी में आग लगी थी,” उन्होंने कहा। “लोग वीडियो बनाते रहे। केवल एक महिला रुकी। उसने शीशा तोड़ा, मुझे बाहर खींचा और अपने दुपट्टे से मेरा रक्त रोका।”
नैना की आंखें फैल गईं। वह दुर्घटना उसे याद थी, मगर उसने घायल व्यक्ति का नाम कभी नहीं पूछा था।
विराज ने उसकी हथेली थामकर कहा—
“मैं 3 वर्ष से तुम्हें खोज रहा था।”
फिर उन्होंने देवयानी की ओर देखा।
“रिया सिंघानिया नाम की कोई उत्तराधिकारी नहीं है। उसका असली नाम काव्या राव है। वह एक अभिनेत्री है, जिसे मैंने अरमान की नीयत परखने के लिए नियुक्त किया था।”
मंडप में सनसनी फैल गई।
“अरमान ने 22 घंटे में अपनी होने वाली पत्नी का सौदा कर दिया। उसने कहा कि नैना उसकी सम्मानित छवि बनाने का साधन है और बड़ी संपत्ति मिलते ही वह उसे छोड़ देगा। सारी बातचीत दर्ज है। आज सुबह 9 बजे उसे पद से हटा दिया गया।”
उसी क्षण अरमान दौड़ता हुआ अंदर आया। उसने नैना के रक्त और बर्बाद लहंगे को नहीं देखा।
उसका पहला प्रश्न था—
“सर, मेरी नौकरी क्यों गई?”
विराज ने ठंडी दृष्टि से कहा—
“क्योंकि अब तुम्हें अपनी आंखों से देखना होगा कि असली सम्मान किसे मिलता है।”
PART 3
अरमान कुछ क्षण तक वहीं खड़ा रहा। उसके चेहरे पर अपराधबोध नहीं था। उसकी आंखों में केवल भय था—नौकरी खोने का भय, ऊंचे लोगों के बीच अपनी जगह खोने का भय और उस भविष्य के मिट जाने का भय, जिसके लिए उसने नैना को अपमानित होने दिया था।
वह अचानक नैना की ओर बढ़ा।
“नैना, मेरी बात सुनो। यह सब वैसा नहीं है जैसा दिख रहा है। मां ने दबाव डाला था। रिया ने मुझे बहकाया। मैं बस उलझ गया था।”
उसने नैना का हाथ पकड़ने की कोशिश की, लेकिन नैना एक कदम पीछे हट गई।
उसकी हथेलियों से रक्त की पतली बूंदें गिर रही थीं। कनपटी पर लगा घाव उसके गाल तक लाल रेखा बना चुका था। फिर भी उसकी आवाज पहली बार स्थिर थी।
“तुम्हें मेरी चोट नहीं दिखी, अरमान।”
अरमान रुक गया।
“तुम यहां आए और तुम्हें केवल अपनी नौकरी याद रही। तुमने यह तक नहीं पूछा कि मैं ठीक हूं या नहीं।”
“मैं घबराया हुआ था।”
“नहीं,” नैना ने कहा, “तुम बेनकाब हो गए थे।”
देवयानी अपनी कुर्सी से उठी। अपमान के बावजूद उसका अहंकार टूटा नहीं था।
“नैना, अपने शब्द संभालकर बोलो। हमारे परिवार का नाम—”
“आपके परिवार का नाम आपके बेटे की नीयत से छोटा निकला,” मीरा पीछे से बोल पड़ी।
वह तेजी से नैना के पास आई और अपने दुपट्टे से उसकी कनपटी दबाने लगी। उसकी आंखों में आंसू थे, मगर स्वर क्रोध से कांप रहा था।
“जब यह अस्पताल में 14 घंटे खड़ी रहकर अनजान लोगों की जान बचाती थी, तब तुम लोग इसे कमतर कहते थे। आज पता चला कि तुम्हारी सारी दौलत मिलकर भी इसके चरित्र जितनी बड़ी नहीं है।”
मेहमानों में धीमी फुसफुसाहट शुरू हो गई। कई लोग मोबाइल नीचे करने लगे, जैसे अचानक उन्हें अपनी तमाशबीन निगाहों पर शर्म आने लगी हो।
विराज ने अपने साथ आए विधिक सलाहकार को संकेत किया। एक मध्यम आयु का व्यक्ति आगे आया और उसने एक मोटी फाइल खोली।
“इस फाइल में केवल अरमान की बातचीत नहीं है,” विराज ने कहा। “इसमें विवाह से पहले नैना के नाम पर तैयार किए गए ऋण दस्तावेज, उसके जाली हस्ताक्षर और उस संपत्ति निवेश का विवरण भी है, जिसे विवाह के बाद उसके ऊपर डालने की योजना थी।”
नैना का चेहरा सफेद पड़ गया।
“कौन-सा ऋण?”
अरमान ने नजरें झुका लीं।
विधिक सलाहकार ने बताया कि अरमान ने 8 महीने पहले एक असफल निर्माण परियोजना में भारी धन लगाया था। परियोजना डूबने के बाद उस पर निजी उधारदाताओं का 4 करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज हो गया। देवयानी अपनी पैतृक संपत्ति बचाना चाहती थी। इसलिए विवाह के बाद नैना को एक स्वास्थ्य सेवा संस्था की नाममात्र निदेशक बनाकर ऋण का बड़ा हिस्सा उसके नाम स्थानांतरित करने की योजना बनाई गई थी।
नैना को याद आया कि अरमान ने कुछ महीने पहले उससे कई खाली पृष्ठों पर हस्ताक्षर करवाए थे। उसने कहा था कि वे विवाह बीमा और संयुक्त मकान की औपचारिकताएं हैं।
उसका पेट मरोड़ खाने लगा।
“तुम मुझसे विवाह करने नहीं आ रहे थे,” उसने धीमे स्वर में कहा। “तुम मुझे कर्ज के नीचे दबाने आ रहे थे।”
अरमान ने सफाई देने की कोशिश की—
“मैं सब संभाल लेता। तुम्हें कभी पता भी नहीं चलता।”
यह वाक्य सुनते ही मंडप में बैठी एक बुजुर्ग महिला ने घृणा से मुंह फेर लिया।
नैना ने अरमान को देखा। यही वह आदमी था, जिसने उसके पिता की तस्वीर के सामने हाथ जोड़कर कहा था कि वह जीवनभर उसकी रक्षा करेगा। यही वह आदमी था, जो पिता की बरसी पर उसके लिए फूल लाया था। अब उसे समझ आया कि कुछ लोग भावनाओं को जीते नहीं, उनका अभिनय करते हैं।
देवयानी ने अचानक विराज पर आरोप लगाया—
“आपने मेरे बेटे को फंसाया है। नकली लड़की भेजना अपराध है।”
विराज का चेहरा शांत रहा।
“किसी को विवाह तोड़ने, जाली हस्ताक्षर करने या अपनी मंगेतर को कर्ज में फंसाने के लिए मजबूर नहीं किया गया। उसे केवल एक विकल्प दिखाया गया था। उसने स्वयं अपना चरित्र चुना।”
उन्होंने सलाहकार से संकेत किया। उसने बताया कि जाली दस्तावेजों की शिकायत आर्थिक अपराध शाखा में दर्ज हो चुकी है। विवाह स्थल के बाहर अधिकारी उपस्थित थे। सबूतों की प्रारंभिक जांच के बाद अरमान और उसके वित्तीय सहयोगी से पूछताछ की जानी थी।
अरमान का आत्मविश्वास टूटने लगा।
“सर, मैंने आपकी कंपनी के लिए 7 वर्ष काम किया है।”
“और उन्हीं 7 वर्षों में तुमने सीखा कि विश्वास को कैसे बेचा जाता है,” विराज ने उत्तर दिया।
अरमान ने नैना की ओर देखा। इस बार उसकी आवाज में प्रेम नहीं, हताशा थी।
“तुम शिकायत वापस ले सकती हो। हम दोनों मिलकर सब ठीक कर सकते हैं।”
नैना को पहली बार हंसी आई, मगर वह हंसी इतनी थकी हुई थी कि सुनकर मीरा की आंखों से आंसू बह निकले।
“हम दोनों?” नैना ने पूछा। “आज से कुछ मिनट पहले तुम्हारी मां ने मुझे 300 लोगों के सामने गरीब, सस्ती और अयोग्य कहा। तुम कहीं छिपकर यह अपमान होने दे रहे थे। अब जब तुम्हारे ऊपर मामला आया, तो हम दोनों याद आ गए?”
अरमान ने धीरे से कहा—
“यह बात सबके सामने मत बढ़ाओ।”
नैना ने चारों ओर देखा।
पीछे की अंतिम पंक्तियों में उसके अस्पताल के साथी बैठे थे। देवयानी ने जानबूझकर उन्हें सबसे दूर स्थान दिया था। वहीं सफाई कर्मचारी कमला मौसी बैठी थीं, जिन्होंने नैना की मां की मृत्यु के बाद उसे कई रातें अपने घर खिलाया था। वहीं वाहन चालक महेश था, जो आधी रात को उसे सुरक्षित घर पहुंचाता था। वहीं कनिष्ठ परिचारिकाएं थीं, जिन्हें नैना ने गलत उपचार के खिलाफ बोलना सिखाया था।
वे सभी उसे ऐसे देख रहे थे, जैसे उसका उठ खड़ा होना केवल उसकी नहीं, उनकी भी जीत हो।
नैना ने अपने रक्त से भीगे गुलाब नीचे रख दिए।
“मुझे अपनी बात सबके सामने ही कहनी है,” उसने कहा। “क्योंकि अपमान भी सबके सामने हुआ है।”
वह धीरे-धीरे मंच की सीढ़ियां चढ़ी। मीरा ने उसे सहारा देना चाहा, मगर नैना ने सिर हिलाकर मना कर दिया। इस बार वह अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी।
विवाह कराने के लिए बुलाए गए पंडित जी असमंजस में खड़े थे। पवित्र अग्नि अभी जलाई नहीं गई थी। फूलों से सजा मंडप उस झूठ का साक्षी बन चुका था, जिसे परिवार की प्रतिष्ठा के नाम पर छिपाया जाना था।
नैना ने ध्वनिवर्धक उठाया।
“आज यहां आए सभी लोगों से वह कुछ कहना चाहती है,” उसने आरंभ किया, फिर अपनी भूल समझकर स्वयं को सुधारा, “नैना शर्मा कुछ कहना चाहती है।”
भीड़ शांत हो गई।
“इस विवाह में 300 लोग बुलाए गए थे। उनमें से बहुत-से लोग उसे नहीं जानते। कुछ लोग केवल सेठी परिवार की हैसियत देखने आए थे। कुछ लोग अभी कुछ मिनट पहले उसका अपमान देखकर मुस्कराए भी थे।”
कई चेहरों पर बेचैनी फैल गई।
“लेकिन आज का सच यह है कि गरीब परिवार में जन्म लेना शर्म की बात नहीं है। अस्पताल में घायल शरीर साफ करना शर्म की बात नहीं है। किसी बूढ़े मरीज को अपने हाथ से खाना खिलाना शर्म की बात नहीं है। छात्रवृत्ति पर पढ़ना, किराए के कमरे में रहना या टैक्सी चालक की बेटी होना शर्म की बात नहीं है।”
उसने देवयानी की ओर देखा।
“शर्म की बात है किसी का विश्वास चुराना। शर्म की बात है बेटे के अपराध को परिवार की प्रतिष्ठा कहना। शर्म की बात है किसी स्त्री को इसलिए छोटा समझना क्योंकि उसकी मेहनत आपके धन से अधिक चमकती है।”
मंडप में पहली तालियां अस्पताल की सफाई कर्मचारी कमला मौसी ने बजाईं। उनके बाद मीरा ने। फिर धीरे-धीरे पूरी पिछली पंक्ति खड़ी हो गई।
देवयानी चिल्लाई—
“यह नाटक बंद करो!”
“नाटक आपने शुरू किया था,” नैना ने उत्तर दिया। “अंतर बस इतना है कि अंत अब आपके हाथ में नहीं है।”
विवाह स्थल के मुख्य द्वार से 2 अधिकारी और एक महिला निरीक्षक अंदर आए। उन्होंने अरमान को बताया कि उसे पूछताछ के लिए साथ चलना होगा। अरमान ने पीछे हटते हुए देवयानी को देखा।
“मां, कुछ कीजिए।”
देवयानी ने पहली बार अपने बेटे से नजरें चुरा लीं। उसे शायद समझ आ गया था कि पैसे और परिचय से हर दस्तावेज नहीं मिटाया जा सकता।
अरमान ने नैना की ओर हाथ बढ़ाया।
“एक बार कह दो कि यह गलतफहमी है।”
नैना ने शांत स्वर में कहा—
“जिस दिन तुमने मुझे बेचने का निर्णय लिया, उसी दिन यह रिश्ता खत्म हो गया था। आज केवल मुझे सच पता चला है।”
अधिकारी उसे बाहर ले गए। जाते-जाते वह विराज को कोसता रहा, फिर नैना को दोषी कहने लगा और अंत में अपनी मां पर चिल्लाया। कुछ ही कदमों में उसका सभ्य चेहरा उतर गया और भीतर छिपा डरपोक, लालची आदमी सबके सामने आ गया।
देवयानी भी बाहर जाने लगी, मगर महिला निरीक्षक ने उसे रोक लिया। जाली दस्तावेजों की तैयारी में उसकी भूमिका की भी जांच होनी थी।
उसने नैना की ओर मुड़कर कहा—
“तुमने हमारा परिवार बर्बाद कर दिया।”
नैना ने उत्तर दिया—
“परिवार मैंने नहीं बर्बाद किया। मैंने केवल अपने जीवन को बर्बाद होने से बचाया है।”
देवयानी को भी बाहर ले जाया गया।
कुछ देर बाद विवाह मंडप लगभग खाली हो चुका था। कई मेहमान बिना विदा लिए चले गए। जो लोग रुके, वे नैना से आंखें मिलाने का साहस नहीं कर पा रहे थे।
मीरा उसे पास के कमरे में ले गई। घाव साफ करते हुए उसने कहा—
“टांके लगाने पड़ सकते हैं।”
नैना ने दर्पण में स्वयं को देखा। सफेद लहंगा लाल धब्बों से भर चुका था। काजल बह गया था। सिर के एक हिस्से से रक्त रिस रहा था। फिर भी उसे अपने चेहरे पर पहली बार कोई अजीब-सी शांति दिखाई दी।
“यह लहंगा उतार दो,” मीरा ने कहा। “यह अब कपड़ा नहीं, उनकी क्रूरता का बोझ बन चुका है।”
दरवाजे पर दस्तक हुई।
विराज बाहर खड़े थे। उनके हाथ में एक साधारण कपड़े का थैला था।
“अंदर आ सकता हूं?” उन्होंने पूछा।
अनुमति मिलने पर वह कमरे में आए और थैला मेज पर रख दिया।
उसमें गहरे लाल रंग की एक सादी रेशमी साड़ी थी, जिसके किनारे पर बहुत हल्की सुनहरी कढ़ाई थी।
नैना ने पूछा—
“आप यह लेकर क्यों आए थे?”
“मुझे आशंका थी कि आज कुछ बुरा हो सकता है,” विराज ने कहा। “लेकिन मैं यह नहीं जानता था कि वह इतना नीचे गिरेंगे। मेरी सहयोगी ने साड़ी चुनी थी। तुम्हें पहननी हो तो पहनना। नहीं तो मैं वाहन की व्यवस्था कर देता हूं। तुम्हें अस्पताल भी ले जाया जा सकता है।”
“आपको मेरा नाप कैसे पता था?”
विराज हल्का-सा मुस्कराए।
“तुम्हें खोजने में 3 वर्ष लगे। नाप पता करना आसान था।”
नैना के चेहरे पर कठोरता लौट आई।
“और यदि मैं आपकी सहायता स्वीकार न करूं?”
“तब भी शिकायत, सबूत और कानूनी सुरक्षा तुम्हारी ही रहेगी। सहायता कोई सौदा नहीं है।”
यह उत्तर नैना के भीतर कहीं गहराई तक उतर गया। अरमान का हर उपहार भविष्य की किसी मांग से जुड़ा होता था। विराज पहली बार कुछ देकर बदले में कुछ नहीं मांग रहे थे।
नैना ने साड़ी पहन ली।
जब वह बाहर आई, तब मंडप में केवल उसके अपने लोग, कुछ कर्मचारी और विराज की छोटी-सी टीम बची थी। कमला मौसी ने उसे देखते ही गले लगा लिया।
“सफेद कपड़े पर दाग लग गया तो क्या हुआ,” उन्होंने रोते हुए कहा, “बेटी का मन तो साफ है।”
नैना टूट गई। पूरे दिन रोके हुए आंसू उनके कंधे पर बह निकले।
उस दिन कोई विवाह नहीं हुआ। कोई जल्दबाजी में बदला लेने वाला निर्णय भी नहीं हुआ। पंडित जी ने केवल अग्नि के सामने एक छोटी-सी प्रार्थना करवाई—नैना के साहस और नए जीवन के लिए।
विराज ने दूरी बनाए रखी। उन्होंने नैना को घर तक पहुंचाने के लिए महिला चालक और मीरा की व्यवस्था की। जाते समय केवल इतना कहा—
“तुमने 3 वर्ष पहले मेरी जान बचाई थी। आज तुम्हें देखकर लगा कि साहसी लोग भी कभी-कभी अकेले पड़ जाते हैं। आगे से अकेली मत लड़ना।”
अगले कई महीने कठिन रहे।
आर्थिक अपराध शाखा की जांच में पता चला कि अरमान ने नैना के अतिरिक्त 3 छोटे निवेशकों के दस्तावेजों में भी हेरफेर किया था। उसकी निर्माण परियोजना केवल असफल नहीं हुई थी; उसने जानबूझकर धन दूसरी कंपनियों में पहुंचाया था। देवयानी ने अपने सामाजिक संबंधों का उपयोग करके कई शिकायतें दबवाई थीं।
नैना ने अदालत में बयान दिया। अरमान के वकीलों ने उसके चरित्र पर प्रश्न उठाने की कोशिश की। पूछा गया कि वह विराज को पहले से जानती थी या नहीं, क्या उसने धन के लिए साजिश की और क्या विवाह तोड़ने में उसकी भूमिका थी।
हर प्रश्न के सामने नैना ने अस्पताल में सीखी स्थिरता अपनाई।
“उसने दुर्घटना में घायल व्यक्ति को बचाया था। उसका नाम नहीं पूछा था। यदि धन चाहिए होता तो वह उसी दिन अपना पता छोड़ देती।”
उसकी बात दर्ज हुई।
जाली हस्ताक्षर, वित्तीय धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र के मामलों में अरमान को न्यायिक प्रक्रिया का सामना करना पड़ा। देवयानी की कई संपत्तियों पर जांच बैठी। समाज में वर्षों से बनाई गई उनकी चमकदार छवि कुछ ही महीनों में ढह गई।
नैना को बदला लेने का सुख नहीं मिला। उसे केवल यह राहत मिली कि कोई दूसरी स्त्री उनके जाल में नहीं फंसेगी।
विराज कभी-कभी अस्पताल के बाहर चाय लेकर आते, मगर भीतर जाने से पहले अनुमति मांगते। वह नैना की ड्यूटी समाप्त होने तक वाहन में बैठकर प्रतीक्षा करते। अगर नैना थकी होती, तो सवाल नहीं पूछते।
एक रात 3 बजे नैना एक बच्चे को बचाने के बाद बाहर आई। बच्चा सड़क दुर्घटना में घायल हुआ था। उसके माता-पिता रोते हुए नैना के पैर छूने लगे थे।
विराज ने उसे चाय दी।
“आज बात करना चाहती हो?” उन्होंने पूछा।
नैना ने सिर हिलाकर मना कर दिया।
विराज ने बस इतना कहा—
“ठीक है।”
दोनों अस्पताल की सीढ़ियों पर चुप बैठे रहे। उसी रात नैना ने समझा कि प्रेम हर समय बड़े वाक्य नहीं बोलता। कभी-कभी वह केवल पास बैठता है और आपके मौन को भी सम्मान देता है।
लगभग 1 वर्ष बाद विराज ने विवाह का प्रस्ताव रखा। किसी महंगे भोजनालय में नहीं, बल्कि उसी यमुना द्रुतमार्ग के पास बने छोटे ढाबे पर, जहां दुर्घटना के बाद पहली सहायता पहुंची थी।
उन्होंने अंगूठी निकालने से पहले कहा—
“तुमने मुझे जीवन दिया था, इसलिए मैं तुमसे जीवन मांगने का अधिकार नहीं समझता। केवल यह पूछ रहा हूं कि क्या तुम अपने जीवन में मेरे लिए जगह बनाना चाहोगी?”
नैना ने तुरंत उत्तर नहीं दिया।
उसने विराज को लंबे समय तक परखा था। देखा था कि वह कर्मचारियों से कैसे बात करते हैं, असहमति पर कैसे प्रतिक्रिया देते हैं और उसकी नौकरी को किस नजर से देखते हैं। उसने देखा था कि विराज उसे बदलना नहीं चाहते थे।
तब उसने हां कहा।
उनका विवाह दिल्ली के एक छोटे न्यायालय में हुआ। मीरा और कमला मौसी गवाह बनीं। नैना ने भारी लहंगे के बजाय वही लाल साड़ी पहनी, जो उसे अपमान वाली रात मिली थी। विवाह के बाद सभी ने सड़क किनारे गर्म जलेबी और कचौरी खाई।
नैना ने अपना काम नहीं छोड़ा।
लोग पूछते—
“इतने बड़े उद्योगपति की पत्नी होकर भी अस्पताल में रात की पाली करती हो?”
वह मुस्कराकर कहती—
“विवाह ने उसका नाम बदला है, उद्देश्य नहीं।”
कई वर्षों बाद भी सफेद गुलाबों की गंध उसे उस दिन की याद दिलाती थी। मगर अब वह याद केवल अपमान की नहीं थी।
वह उस क्षण की याद थी, जब एक स्त्री रक्त, मदिरा और टूटे वचनों के बीच घुटनों पर गिरी थी—और फिर उठकर उसने तय किया था कि कोई भी परिवार, कोई भी धन और कोई भी झूठा प्रेम उसकी कीमत निर्धारित नहीं करेगा।
नैना ने उस दिन दूल्हा नहीं खोया था।
उसने एक धोखा खोया था।
और बदले में उसने अपना सम्मान, अपनी आवाज और वह जीवन पाया था, जिसमें उसे गिरने से बचाने वाला व्यक्ति कभी उसके पंख काटने की कोशिश नहीं करता था।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.