
PART 1
—रचना, घर जाकर मिश्री को खाना डाल देना… और विवान के कमरे में मत जाना। उसे सज़ा मिली है।
मीनाक्षी की आखिरी बात सुनते ही रचना के हाथ से लाल पेन गिर गया।
मंगलवार की दोपहर थी। लखनऊ के गोमतीनगर स्थित निजी विद्यालय में दूसरी कक्षा को पढ़ाने वाली रचना बच्चों की गणित की कॉपियाँ जाँच रही थी। फोन पर उसकी भाभी मीनाक्षी की आवाज़ असामान्य रूप से प्रसन्न थी।
—मैं विक्रम के साथ नैनीताल आई हूँ। हमने रविवार तक रुकने का फैसला किया है। मिश्री के लिए खाना रखना भूल गई।
मिश्री सुनहरे रंग की लैब्राडोर थी, जिसे 8 वर्षीय विवान अपनी बहन मानता था। विवान रचना के बड़े भाई समीर का बेटा था। समीर की 4 वर्ष पहले सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो चुकी थी। उसके बाद मीनाक्षी ने परिवार से दूरी बना ली थी और हर बार यही कहती थी कि विवान जिद्दी, झूठा और संभालने में कठिन बच्चा है।
—विवान कहाँ है? —रचना ने तुरंत पूछा।
—अपने दोस्त के घर है। तुम बेकार चिंता मत करो। चाबी तुलसी के गमले के नीचे है।
—किस दोस्त के घर?
मीनाक्षी ने उत्तर दिए बिना फोन काट दिया।
शाम को विद्यालय से निकलकर रचना सीधे इंदिरानगर स्थित उसके घर पहुँची। उसका पति अमित बैंक में काम करता था और देर तक कार्यालय में रहने वाला था।
लोहे का फाटक खोलते ही रचना को कुछ अजीब लगा। बरामदे में 3 दिन के अखबार पड़े थे। कूड़े की थैली फटी हुई थी। खिड़कियाँ बंद थीं और घर के भीतर से सीलन, गंदगी तथा किसी लंबे समय से बंद जगह की दुर्गंध आ रही थी।
दरवाज़ा खुलते ही मिश्री लड़खड़ाती हुई सामने आई। उसकी पसलियाँ दिखाई दे रही थीं। पानी का बर्तन सूखा था और खाने की कटोरी में धूल जमी थी।
—हे भगवान… तुझे कब से कुछ नहीं मिला?
रचना ने कटोरे में पानी भरा। मिश्री सिर उठाए बिना पीती रही। तभी फ्रिज की धीमी आवाज़ के बीच कहीं से कराह सुनाई दी।
रचना जम गई।
—विवान?
कोई उत्तर नहीं आया। फिर एक बहुत कमजोर आवाज़ सुनाई दी, जैसे किसी बच्चे ने रोते-रोते साँस छोड़ी हो।
विवान के कमरे की ओर बढ़ते हुए रचना का दिल तेज़ धड़कने लगा। दरवाज़े के बाहर भारी कुर्सी फँसाई गई थी। उसने काँपते हाथों से कुर्सी हटाई और दरवाज़ा खोला।
बिस्तर पर विवान पड़ा था।
उसके होंठ फटे हुए थे, चेहरा पीला था और कपड़े गंदे थे। फर्श पर खाली बिस्कुट के पैकेट, मैले गिलास और गीले कपड़े पड़े थे। कमरे में मूत्र की तीखी दुर्गंध थी।
मेज़ पर बच्चों को सुलाने वाला सिरप रखा था। उसके नीचे मीनाक्षी की लिखावट में पर्ची थी—
“जिद करे तो 2 चम्मच। रोए तो 1 और। आवाज़ बाहर नहीं आनी चाहिए।”
रचना की टाँगें काँपने लगीं।
—विवान… बेटा, बुआ आ गई है।
उसने बड़ी मुश्किल से आँखें खोलीं।
—आप सच में आ गईं? —वह फुसफुसाया—मुझे लगा… अब कोई नहीं आएगा।
रचना ने तुरंत 112 और बाल सहायता सेवा को फोन किया। वह उसे थोड़ा पानी देने लगी, तभी विवान ने उसकी कलाई पकड़ ली।
—बुआ… मेरा टैबलेट… गद्दे के नीचे है।
—पहले अस्पताल चलेंगे।
—नहीं… उसमें सब है। वरना वे फिर कहेंगे कि मैं झूठ बोलता हूँ।
रचना ने टूटी स्क्रीन वाला टैबलेट निकाला। उसमें 4 दिन पहले बनाया गया एक वीडियो था।
वह उसे खोलने ही वाली थी कि चिकित्साकर्मी कमरे में दौड़ते हुए आए। विवान को स्ट्रेचर पर रखते समय उसकी आँखों में बीमारी से अधिक आतंक दिखाई दे रहा था।
रचना समझ चुकी थी कि टैबलेट में केवल उपेक्षा का प्रमाण नहीं था।
उसमें कई वर्षों से छिपाया गया वह सच था, जिसने पूरे परिवार की आत्मा को कठघरे में खड़ा कर देना था।
PART 2
जिला अस्पताल में विवान को गंभीर निर्जलीकरण और दवा की अधिक मात्रा के कारण भर्ती किया गया। रचना ने टैबलेट खोला।
वीडियो में मीनाक्षी एक गिलास लेकर कमरे में आई।
—पूरा पी लो।
—माँ, मुझे नींद नहीं आ रही। मुझे भूख लगी है।
—विक्रम आने वाला है। मुझे तुम्हारा रोना नहीं सुनना।
—आप कब लौटेंगी?
—जब मेरा मन करेगा। शोर मचाया तो कोई तुम्हारी बात नहीं मानेगा।
उसने दवा पिलाई, रोशनी बुझाई और बाहर से दरवाज़ा बंद कर दिया।
वीडियो देखकर बाल संरक्षण अधिकारी कविता अवस्थी का चेहरा कठोर हो गया।
—यह जानबूझकर किया गया परित्याग है। बच्चे को अभी संरक्षण में लिया जाएगा।
आधी रात को मीनाक्षी ने फोन किया।
—मिश्री ठीक है?
—विवान अस्पताल में है।
कुछ क्षण चुप्पी रही।
—तुमने उसके कमरे में जाने की हिम्मत कैसे की?
अगले दिन मीनाक्षी रोती हुई अस्पताल पहुँची और दावा करने लगी कि विवान कहानियाँ बनाता है। लेकिन विवान ने काँपते हुए पूछा—
—अगर मैं अच्छा बच्चा बनूँ तो क्या बुआ के साथ रह सकता हूँ?
उसी शाम विक्रम ने पुलिस को फोन किया।
उसने कहा कि उसके पास ऐसे संदेश हैं जिनसे साबित होगा कि मीनाक्षी विवान को केवल डराना नहीं चाहती थी।
वह उसकी मौत को दुर्घटना बनाना चाहती थी।
PART 3
विक्रम अगले दिन लखनऊ लौट आया। उसकी आँखों के नीचे काले घेरे थे और चेहरे पर ऐसा भय था, जैसे उसने अपने साथ बिताए हर क्षण को दोबारा देखकर उसके भीतर छिपी सच्चाई पहचान ली हो।
पुलिस अधिकारी, बाल संरक्षण अधिकारी कविता अवस्थी और बाल कल्याण समिति के सामने उसने अपना फोन मेज़ पर रख दिया।
—मुझे लगा था कि मीनाक्षी गुस्से में बातें करती है, —उसने धीमी आवाज़ में कहा—वह अक्सर कहती थी कि विवान ने उसकी जिंदगी बर्बाद कर दी। मैं समझता था कि वह अकेली माँ है, थकी हुई है। लेकिन नैनीताल पहुँचने के बाद उसने जो कहा, उससे मुझे डर लगने लगा।
कविता ने पूछा—
—उसने क्या कहा?
विक्रम ने एक संदेश खोला।
मीनाक्षी ने लिखा था—
“अगर 5 दिन तक कोई उसे देखने नहीं गया तो समझूँगी कि किसी को उसकी परवाह नहीं। फिर मैं अगली बार और लंबे समय के लिए जा सकती हूँ।”
दूसरा संदेश था—
“कुछ हो भी गया तो मैं तुम्हारे साथ शहर से बाहर रहूँगी। कोई मुझे दोष नहीं दे पाएगा।”
तीसरे संदेश ने कमरे में बैठे हर व्यक्ति को स्तब्ध कर दिया—
“लोग उस माँ से ज्यादा सहानुभूति रखते हैं जिसका बच्चा दुर्घटना में मर जाए, उस औरत से नहीं जो अपने बच्चे से छुटकारा चाहती है।”
रचना की उँगलियाँ ठंडी पड़ गईं।
यह भूल नहीं थी।
मीनाक्षी ने भोजन रखना नहीं भूला था। उसने विवान को दोस्त के घर नहीं भेजा था। उसने जानबूझकर घर में राशन नहीं छोड़ा, पानी सीमित किया, बच्चे को नशीली दवा दी और दरवाज़ा बाहर से बंद किया था। नैनीताल की तस्वीरें और होटल की रसीदें उसकी अनुपस्थिति का प्रमाण बनने वाली थीं।
विक्रम ने बताया कि यात्रा के दौरान मीनाक्षी बार-बार घर के आसपास लगे कैमरे की जाँच करती रही थी।
—वह देखना चाहती थी कि कोई आया या नहीं। जब मैंने पूछा कि विवान अपने दोस्त के घर से कब लौटेगा, तो उसने कहा कि वह बच्चा घर में ही है। मैंने सोचा वह मज़ाक कर रही है। फिर उसने कहा, “कुछ दिन भूखा रहेगा तो अक्ल आ जाएगी।”
—तुमने उसी समय पुलिस को क्यों नहीं बताया? —रचना ने रोष से पूछा।
विक्रम ने सिर झुका लिया।
—मैं डर गया था। उसने कहा कि यदि मैंने किसी को बताया तो वह दावा करेगी कि मैंने विवान को नुकसान पहुँचाया है। कल समाचार में पुलिस की गाड़ी उसके घर के बाहर देखी, तब समझ आया कि बच्चा सचमुच भीतर था।
रचना को उस पर क्रोध आया, लेकिन वह यह भी जानती थी कि उसके फोन के संदेश विवान को हमेशा के लिए उस घर से बचा सकते थे।
अस्पताल में विवान धीरे-धीरे स्वस्थ हो रहा था। वह एक बार में पूरा भोजन नहीं खाता था। रोटी का छोटा टुकड़ा तोड़कर तकिए के नीचे छिपा देता। नर्स पूछती तो कहता—
—बाद में भूख लगी तो काम आएगा।
उसे पानी की बोतल दी जाती तो वह केवल 2 घूँट पीता।
—बाकी कल के लिए रखूँगा।
रचना हर बार समझाती—
—यहाँ पानी खत्म नहीं होगा।
लेकिन भूख और प्यास का डर उसके शरीर से अधिक गहराई में उतर चुका था।
एक दिन अस्पताल की भोजन परिचारिका ने उसे खीर दी। विवान ने कटोरी को देर तक देखा।
—इसके पैसे लगेंगे?
—नहीं बेटा, यह तुम्हारे लिए है।
—अगर मैं पूरी खा लूँ तो कोई नाराज़ तो नहीं होगा?
नर्स बाहर जाकर रो पड़ी।
रचना का पति अमित रोज़ कार्यालय से लौटकर अस्पताल आता। उसने विवान के लिए चित्रों की किताबें और रंग खरीदे, लेकिन बच्चा किसी भी वस्तु को छूने से पहले पूछता—
—क्या यह सच में मेरी है?
एक शाम उसने कागज़ पर घर बनाया। घर के बाहर तुलसी का पौधा था। भीतर 3 लोग और एक कुत्ता थे।
—ये कौन हैं? —अमित ने पूछा।
—बुआ, फूफा और मैं। बाहर मिश्री है।
—तुम्हारी माँ कहाँ है?
विवान की पेंसिल रुक गई।
—वह घूमने गई है। वह हमेशा चली जाती है।
फिर उसने बहुत धीमे स्वर में पूछा—
—अगर मैं रात में नहीं रोऊँ, खाना नहीं माँगूँ और चीज़ें नहीं तोड़ूँ… तो क्या मैं आपके घर रह सकता हूँ?
अमित ने चेहरा दूसरी ओर कर लिया। उसकी आँखें भर आई थीं।
रचना ने विवान का हाथ थामा।
—तुम्हें हमारे साथ रहने के लिए खुद को छोटा नहीं बनाना पड़ेगा।
—लेकिन माँ कहती हैं कि मैं सबकी जिंदगी खराब कर देता हूँ।
—वह गलत कहती हैं।
विवान ने पहली बार रचना की आँखों में सीधे देखा, जैसे यह जाँच रहा हो कि कोई बड़ा इंसान झूठ बोल रहा है या नहीं।
जाँच शुरू हुई तो वर्षों से बंद पड़े कई दरवाज़े खुलने लगे।
पड़ोस में रहने वाली शारदा आंटी ने बताया कि उन्होंने कई बार आधी रात को विवान के रोने की आवाज़ सुनी थी। मीनाक्षी हर बार कहती कि बच्चा मोबाइल के लिए नाटक कर रहा है।
विद्यालय की शिक्षिका ने बयान दिया कि विवान दोपहर के भोजन से बची रोटी और फल अपने बैग में छिपाता था। पूछने पर कहता था कि मिश्री के लिए ले जा रहा है। बाद में पता चला कि वह रात में स्वयं खाता था।
विद्यालय के रिकॉर्ड में 3 बार उसके शरीर पर चोट के निशान दर्ज थे। मीनाक्षी ने हर बार कहा था कि वह खेलते हुए गिर गया।
एक पुराने चिकित्सक ने बताया कि विवान को 2 वर्ष पहले कलाई की चोट के साथ लाया गया था। चोट पकड़कर मरोड़ने जैसी थी, लेकिन मीनाक्षी ने अस्पताल से जल्दी छुट्टी माँग ली थी।
स्थानीय बाल संरक्षण कार्यालय में 2 गुमनाम शिकायतें भी मिलीं। दोनों को केवल फोन पर पूछताछ करके बंद कर दिया गया था, क्योंकि मीनाक्षी ने मीठी आवाज़ में अधिकारियों को समझाया था कि उसका बेटा ध्यान आकर्षित करने के लिए झूठ बोलता है।
रचना को स्वयं पर भी अपराधबोध होने लगा।
पारिवारिक समारोहों में उसने विवान को चुपचाप कोने में बैठे देखा था। कभी वह भोजन जल्दी-जल्दी खाता, कभी अपनी माँ की ओर देखकर थाली छोड़ देता। मीनाक्षी हँसते हुए कहती—
—इसे मत पूछो, यह हर बात का नाटक करता है।
परिवार के लोग उसकी बात मान लेते।
जब विवान ने रचना से कहा था कि माँ उसे कमरे में बंद करती हैं, तब रचना ने इसे सामान्य सज़ा समझा था। उसने केवल इतना कहा था—
—माँ की बात माना करो।
अब वही वाक्य उसके भीतर काँटे की तरह चुभ रहा था।
बाल कल्याण समिति की अस्थायी सुनवाई के दिन मीनाक्षी सफेद सलवार-कमीज़ पहनकर आई। चेहरे पर श्रृंगार नहीं था और हाथ में समीर की तस्वीर थी। उसने रोते हुए कहा—
—पति की मृत्यु के बाद मैंने अकेले बच्चे को पाला। अब मेरी ननद मेरी कमजोरी का लाभ उठाकर मेरा बेटा छीनना चाहती है।
उसके वकील ने रचना पर आरोप लगाया कि वह संतान न होने के कारण विवान को अपनाना चाहती है और इसी कारण परिवार तोड़ रही है।
रचना का चेहरा क्रोध से लाल हो गया, लेकिन कविता ने उसे शांत रहने का संकेत दिया।
वकील ने कहा—
—विवान कल्पनाशील बच्चा है। वह वीडियो बनाता है, कहानियाँ गढ़ता है और अपनी माँ को परेशान करने के लिए भोजन छिपाता है। मेरी मुवक्किल तनाव में थीं। संभव है कि कमरे का दरवाज़ा सुरक्षा के लिए बंद किया गया हो।
समिति की अध्यक्ष ने कठोर स्वर में पूछा—
—बाहर से कुर्सी लगाना सुरक्षा कैसे है? घर में पर्याप्त भोजन क्यों नहीं था? बच्चे को चिकित्सकीय सलाह के बिना नींद की दवा क्यों दी गई?
मीनाक्षी ने आँसू पोंछे।
—मैंने केवल 1 रात के लिए छोड़ा था। मेरी योजना अगले दिन लौटने की थी।
तभी विक्रम के संदेश, होटल की 5 रातों की बुकिंग और कैमरे की जाँच का विवरण सामने रखा गया।
मीनाक्षी के चेहरे का रंग बदल गया।
विवान को अलग कमरे से वीडियो माध्यम द्वारा बयान देने की अनुमति दी गई। उसके साथ मनोवैज्ञानिक और कविता मौजूद थीं।
—तुम्हें कमरे में किसने बंद किया? —अध्यक्ष ने पूछा।
—माँ ने।
—क्या उन्होंने बताया था कि कब लौटेंगी?
—उन्होंने कहा था कि अगर मैं अच्छा रहा तो रविवार को आएँगी।
—तुमने कितनी रातें गिनीं?
विवान ने उँगलियाँ देखीं।
—5… शायद। कभी दवा पीने के बाद बहुत देर तक सो जाता था। उठता तो अँधेरा होता था।
—तुमने किसी को आवाज़ क्यों नहीं दी?
—पहले दी थी। माँ ने कहा था कि पड़ोसी सुनेंगे तो मुझे पुलिस वाले ले जाएँगे और बुआ भी कहेंगी कि मैं झूठा हूँ।
यह सुनते ही रचना की आँखों से आँसू बह निकले।
विवान ने स्क्रीन पर उसे देखा और तुरंत बोला—
—बुआ, माफ कर दो। मैंने जोर से नहीं रोया।
रचना कुर्सी से उठ गई।
—तुम्हें माफी माँगने की जरूरत नहीं है, बेटा।
मीनाक्षी उसे घूर रही थी। उसकी आँखों में पश्चाताप नहीं, क्रोध था।
विराम के दौरान विवान को घबराहट का दौरा पड़ा। अदालत के शौचालय के बाहर वह रचना से चिपट गया।
—मुझे वापस मत भेजना। मैं अब खाना नहीं माँगूँगा। मैं चुप रहूँगा। मिश्री को भी परेशान नहीं करूँगा।
रचना घुटनों के बल बैठ गई।
—किसी घर में रहने के लिए बच्चे को भूखा और चुप रहना नहीं पड़ता।
अमित ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
—तुमने कुछ गलत नहीं किया।
अंतिम सुनवाई में विक्रम स्वयं उपस्थित हुआ। उसने संदेशों के अतिरिक्त एक आवाज़ की रिकॉर्डिंग भी दी। उसमें मीनाक्षी कह रही थी—
“अगर इस बार भी परिवार ने उसे मुझसे नहीं लिया तो मैं कुछ ऐसा करूँगी कि हमेशा के लिए छुट्टी मिल जाए।”
रिकॉर्डिंग चलने के बाद कमरे में लंबा सन्नाटा छा गया।
मीनाक्षी का वकील कुछ कहने उठा, लेकिन उसने अचानक मेज़ पर हाथ मार दिया।
—हाँ, मैं थक गई थी! —वह चीखी—मैं 19 वर्ष की थी जब विवान पैदा हुआ। समीर ने शादी तो कर ली, लेकिन उसकी मृत्यु के बाद सबने मुझे अकेला छोड़ दिया। किसी ने नहीं पूछा कि मैं क्या चाहती हूँ। मैं घूमना चाहती थी, अपना बुटीक खोलना चाहती थी, सामान्य जिंदगी जीना चाहती थी।
रचना ने कहा—
—इसका दोष 8 वर्ष के बच्चे का नहीं था।
—तुम्हारे लिए कहना आसान है! —मीनाक्षी चिल्लाई—वह हर समय कुछ माँगता है। खाना, स्कूल की फीस, दवा, कपड़े। वह बीमार पड़ता है, रोता है, डरता है। उसकी वजह से कोई आदमी मेरे साथ टिकना नहीं चाहता।
विक्रम ने नज़रें झुका लीं।
मीनाक्षी बोलती रही—
—मैं चाहती थी कि कोई उसे मुझसे ले जाए। मैं देखना चाहती थी कि परिवार में किसे सच में उसकी परवाह है। अगर कोई नहीं आता तो… तो वह मेरी गलती नहीं होती।
अध्यक्ष का स्वर बर्फ जैसा ठंडा था।
—एक बच्चा आपकी परीक्षा का साधन नहीं है। आपने सहायता नहीं माँगी। आपने उसे भूखा रखा, दवा दी, बंद किया और मृत्यु के जोखिम में छोड़ा।
समिति ने तत्काल निर्णय सुनाया। विवान को मीनाक्षी की देखभाल में लौटाने से मना कर दिया गया। रचना और अमित को अस्थायी पारिवारिक संरक्षण दिया गया। पुलिस ने मीनाक्षी के विरुद्ध बाल परित्याग, क्रूरता, गलत तरीके से बंधक बनाने और बच्चे के जीवन को जानबूझकर खतरे में डालने के आरोपों में मामला दर्ज किया।
मिश्री को भी रचना के घर भेजने की अनुमति मिली।
निर्णय सुनने के बाद विवान ने खिलौनों या नए कमरे के बारे में नहीं पूछा। उसने कविता से केवल एक प्रश्न किया—
—क्या वहाँ मुझे रोज़ रात का खाना मिलेगा?
अमित उसके सामने घुटनों पर बैठ गया।
—हर दिन। सुबह का नाश्ता, दोपहर का खाना, स्कूल का डिब्बा और रात का भोजन भी।
—अगर मुझे ज्यादा भूख लगी तो?
—तो तुम और माँगोगे।
—कोई गुस्सा नहीं करेगा?
—कोई नहीं।
उस शाम रचना और अमित उसे अपने 2 कमरों वाले घर में ले आए। बैठक में मिश्री पूँछ हिलाती हुई उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। विवान ने उसे देखते ही कसकर गले लगा लिया।
—मुझे लगा था तुम भी मर जाओगी।
मिश्री ने उसका चेहरा चाटा। कई दिनों बाद विवान के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।
अमित ने अतिथि कक्ष को उसके लिए तैयार किया था। दीवार पर अंतरिक्ष के चित्र, मेज़ पर रंग, अलमारी में कपड़े और बिस्तर के पास छोटी नीली रोशनी वाली लैंप थी। रचना के विद्यार्थियों ने कागज़ पर लिखा था—
“विवान, तुम्हारा स्वागत है।”
वह दरवाज़े पर खड़ा रहा।
—यह सब किसका है?
—तुम्हारा, —रचना ने कहा।
—अगर मुझसे कुछ टूट गया तो?
—हम ठीक कर लेंगे।
—अगर बिस्तर गीला हो गया तो?
रचना ने बिना झिझक कहा—
—चादर बदल देंगे।
—अगर रात में डर लगा?
—हमें बुला लेना।
—और अगर भूख लगी?
अमित ने मेज़ की दराज़ खोली। उसमें केले, बिस्कुट, सूखे मेवे और पानी की बोतलें रखी थीं।
विवान ने दराज़ को छुआ, फिर तुरंत हाथ पीछे खींच लिया।
—क्या मैं सच में बिना पूछे खा सकता हूँ?
—हाँ। यह तुम्हारा घर है।
वह बिस्तर पर बैठा और तकिए को सीने से लगा लिया। कुछ क्षण बाद उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उसने कोई आवाज़ नहीं की। जैसे रोने की भी अनुमति माँग रहा हो।
रचना उसके पास बैठ गई।
—अब आँसू छिपाने की जरूरत नहीं है।
विवान उसके कंधे से लग गया और पहली बार खुलकर रोया। वह उस रात केवल पिछले 5 दिनों के लिए नहीं रो रहा था। वह उन सभी रातों के लिए रो रहा था जब उसने भूख दबाई, दर्द छिपाया और यह मान लिया कि उसकी जरूरतें अपराध हैं।
सोने से पहले उसने रचना को पुकारा।
—बुआ…
—हाँ, बेटा?
—क्या माँ कभी मुझसे प्यार करेंगी?
रचना का गला भर आया। वह उसे झूठी उम्मीद देकर फिर किसी प्रतीक्षा में नहीं बाँधना चाहती थी।
—कुछ लोग प्यार करना नहीं सीख पाते, चाहे उन्हें कितना भी प्यार मिले। लेकिन उनकी कमी तुम्हारी गलती नहीं होती। तुम कभी बोझ नहीं थे।
विवान कुछ देर चुप रहा।
—क्या मैं आपको कभी माँ कह सकता हूँ?
दरवाज़े पर खड़ा अमित आँसू पोंछने लगा।
रचना ने विवान के माथे को चूमा।
—जब तुम्हारा मन करे।
उसने आँखें बंद कीं। कुछ क्षण बाद उसके चेहरे पर छोटी, थकी हुई मगर भय से मुक्त मुस्कान आई।
—शुभ रात्रि, माँ।
रचना ने रोशनी धीमी कर दी। कमरे के बाहर मिश्री दरवाज़े से लगकर बैठ गई, जैसे अब वह किसी को भीतर बंद करने नहीं, विवान की नींद की रक्षा करने आई हो।
अगले महीनों में विवान ने भोजन छिपाना धीरे-धीरे बंद किया। विद्यालय में वह पहले से अधिक बोलने लगा। मनोवैज्ञानिक की सहायता से उसे समझ आया कि डरना, भूख लगना और मदद माँगना गलत नहीं है।
मीनाक्षी को न्यायिक प्रक्रिया का सामना करना पड़ा। अदालत ने उसके माता-पिता के अधिकार सीमित कर दिए और विवान से किसी भी मुलाकात को विशेषज्ञ की निगरानी से जोड़ दिया। पुराने बंद किए गए मामलों की भी जाँच हुई और लापरवाही करने वाले अधिकारियों से जवाब माँगा गया।
रचना ने वर्षों तक स्वयं को दोष दिया कि वह पहले क्यों नहीं समझी। फिर एक दिन विवान ने विद्यालय से लौटकर उसे अपनी कॉपी दिखाई। उसने परिवार पर निबंध लिखा था।
अंतिम पंक्ति थी—
“परिवार वह नहीं जो बच्चे से चुप रहने को कहे। परिवार वह है जो उसकी धीमी आवाज़ भी सुन ले।”
मीनाक्षी ने वर्षों तक सबको विश्वास दिलाया था कि विवान समस्या है। सच यह था कि समस्या वह दुनिया थी जिसने एक बच्चे को अपना दर्द रिकॉर्ड करने पर मजबूर किया, क्योंकि केवल उसके शब्दों पर किसी ने भरोसा नहीं किया।
बच्चे अक्सर सीधे नहीं कहते कि उनके साथ क्या हो रहा है। कभी वे रोटी छिपाते हैं। कभी हर बात पर माफी माँगते हैं। कभी पूछते हैं कि भोजन महँगा तो नहीं। कभी कहते हैं कि वे घर नहीं लौटना चाहते।
ऐसे क्षणों में वे नाटक नहीं कर रहे होते।
वे केवल यह देख रहे होते हैं कि इस बार कोई बड़ा इंसान समय पर उनकी आवाज़ सुनता है या नहीं।
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