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अस्पताल में दम तोड़ने से पहले 7 साल की बच्ची ने पिता से कहा, “मेरे पुराने भालू को अकेले सुनना,” और अंतिम संस्कार के बाद उसी खिलौने से बुआ, मामा और लापता माँ की ऐसी साज़िश खुली जिसने पूरे परिवार को अदालत पहुँचा दिया।

PART 1

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“पापा, अगर कल सुबह मेरी आँखें न खुलें, तो गोलू की बात सुनना… उसे पता है उन्होंने मेरे साथ क्या किया।”

लखनऊ के बाल चिकित्सालय की तीसरी मंज़िल पर अरविंद मिश्रा की उँगलियाँ अपनी 7 साल की बेटी अन्वी की ठंडी हथेली के चारों ओर कस गईं। ऑक्सीजन की नली उसके छोटे से चेहरे पर भारी लग रही थी। आवाज़ इतनी धीमी थी कि मशीनों की आवाज़ में दब जाती, मगर उसकी आँखों में ऐसा डर था जिसने अरविंद की छाती चीर दी।

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—ऐसी बात दोबारा मत कहना, गुड़िया। तुम ठीक होकर घर चलोगी। हनुमान सेतु के पास वाली जलेबी भी खाएँगे।

अन्वी मुस्कराई नहीं। उसने बस अपना पुराना भूरा खिलौना भालू कस लिया। उसकी एक आँख काली बटन की थी, दूसरी कई बार सिल चुकी थी। गले में फीता बँधा था और पेट पर अन्वी ने नीले धागे से “गोलू” काढ़ रखा था।

—अकेले सुनना, पापा। बुआ को मत बताना… मामा राकेश को भी नहीं।

अरविंद का गला सूख गया।

अरविंद 39 साल का विद्युत तकनीशियन था। वह चिनहट की एक औद्योगिक इकाई में रात-दिन मशीनों की खराबी ढूँढ़ता था, पर अपने घर में फैली सड़ांध पहचान नहीं पाया। अन्वी की माँ निशा 3 साल पहले घर छोड़ गई थी। वह कभी त्योहार पर लौटती, बेटी को चूमती, रोती, फिर किसी बहाने गायब हो जाती। अरविंद ने अकेले ही स्कूल, खाना, दवा और बालों की चोटियाँ सँभालना सीख लिया था।

उसकी बड़ी बहन कविता सबकी नज़र में देवी जैसी थी। वही अस्पताल में खिचड़ी लाती, अरविंद को ज़बरदस्ती घर भेजती और कहती—“तू कमाकर ला, अन्वी मेरी भी बेटी है।” अरविंद ने उसे घर की चाबी, बैंक के काग़ज़ और बेटी की चिकित्सा फ़ाइल तक दे दी थी।

अन्वी को दुर्लभ स्नायु रोग हुआ तो खर्च ने अरविंद की कमर तोड़ दी। तभी निशा का भाई राकेश सामने आया। सफ़ेद कुर्ता, चमकती घड़ी और हर दफ़्तर में “अपने आदमी” होने का दावा। उसने निजी अस्पताल, धर्मार्थ संस्था और बड़े दानदाताओं से मदद दिलाने की बात कही। अन्वी की तस्वीरों से अभियान चला, मंदिरों के बाहर दानपेटियाँ रखीं, इंटरनेट पर भावुक संदेश फैलाए गए। अरविंद को बेटी का दर्द दिखाना अपमान लगता था, पर राकेश कहता—“लोग आँसू देखकर ही जेब खोलते हैं।”

उस रात के 2 दिन बाद अन्वी चली गई।

अंतिम संस्कार से लौटकर अरविंद उसके कमरे में बैठा रहा। गुलाबी चप्पलें पलंग के नीचे थीं, अधूरी रंगोली की तस्वीर मेज़ पर पड़ी थी। उसने गोलू को सीने से दबाया तो भीतर से हल्की-सी खटकी सुनाई दी।

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सिलाई खोलते ही कपास के बीच एक छोटा रिकॉर्डर निकला।

पहली आवाज़ अन्वी की थी—

—आज पापा काम पर गए हैं। बुआ और मामा कह रहे हैं कि असली जाँच पापा को नहीं दिखानी…

फिर राकेश बोला—

—जब तक बच्ची गंभीर दिखेगी, पैसा आता रहेगा।

कविता की आवाज़ काँपी—

—यह सब सुन रही है।

राकेश हँसा—

—बहुत कमज़ोर है। बोलने से पहले ही मामला खत्म हो जाएगा।

अरविंद के हाथ से गोलू लगभग गिर गया। रिकॉर्डिंग अभी बाकी थी, और अगली आवाज़ उसकी दुनिया पूरी तरह जला देने वाली थी।

PART 2

रिकॉर्डर में अन्वी की टूटी साँसों के बीच एक और वाक्य था—“बुआ ने मेरी नई दवा छिपा दी। मामा बोले, पुरानी दवा से मैं और बीमार दिखूँगी।”

अरविंद का पहला मन हुआ कि राकेश का गला पकड़ ले, मगर बेटी ने प्रमाण इसलिए छोड़ा था कि सच बचे, अपराधी सावधान न हो जाएँ। वह सीधे ध्वनि विशेषज्ञ और न्यायालयी दस्तावेज़ परीक्षक डॉ. मीरा सक्सेना के पास पहुँचा। रिकॉर्डिंग असली निकली। दान की रकम निजी खातों में गई थी, दवाओं के झूठे बिल बने थे और एक सरकारी संस्थान की मूल रिपोर्ट बदल दी गई थी।

मूल रिपोर्ट में अन्वी को तुरंत विशेष अस्पताल भेजने और दवा बदलने की सलाह थी। नकली रिपोर्ट में महँगा निजी उपचार जारी रखने को कहा गया था।

मीरा ने धीमे स्वर में कहा—“शायद बीमारी पूरी तरह न रुकती, पर उसे समय मिलता। दर्द कम होता।”

उसी शाम अरविंद कविता के घर गया। उसने केवल इतना कहा—“अन्वी ने गोलू के अंदर सब छोड़ दिया है।”

कविता का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

तभी रसोई से राकेश निकला, जैसे वह वहाँ का मालिक हो। दोनों एक ही घर में, एक ही षड्यंत्र में और शायद एक ही रिश्ते में थे।

अरविंद ने छिपा हुआ यंत्र चालू किया।

PART 3

राकेश ने पहले अपनी घड़ी सीधी की, फिर कुर्सी खींचकर बैठ गया। उसके चेहरे पर वही शांति थी जो किसी ऐसे आदमी के चेहरे पर होती है जिसे वर्षों से विश्वास हो कि पैसा हर दरवाज़ा बंद कर सकता है और हर मुँह खुलने से पहले खरीद सकता है।

—अरविंद, तू शोक में है। अभी जो सोच रहा है, वह सच नहीं भी हो सकता।

अरविंद ने गोलू को मेज़ पर रख दिया।

कविता की नज़र खिलौने पर टिकते ही काँप गई। उसके होंठ हिले, मगर आवाज़ नहीं निकली।

—अन्वी ने तुम्हारी आवाज़ रिकॉर्ड की है—अरविंद बोला—दवा छिपाने की, रिपोर्ट बदलने की और दान के पैसे बाँटने की।

राकेश कुछ पल चुप रहा, फिर आगे झुककर बोला—

—बातों को संदर्भ से काटकर अपराध नहीं बनाया जा सकता। जो किया, उसी बच्ची के इलाज के लिए किया। अभियान ठंडा पड़ता तो पैसा बंद हो जाता।

—इसलिए उसे ठीक होने नहीं दिया?

—वह पहले से गंभीर थी।

यह सुनते ही अरविंद की आँखों में ऐसा क्रोध चमका कि कविता पीछे हट गई। मगर उसने मुट्ठियाँ नहीं उठाईं। वह जानता था कि कमरे की हर आवाज़ दर्ज हो रही है।

—सरकारी अस्पताल की मूल रिपोर्ट कहाँ है?

राकेश ने उत्तर नहीं दिया।

कविता रो पड़ी।

—मैंने नहीं बदली थी, अरविंद। कसम से, मैंने सिर्फ़ फ़ाइल उसे दी थी।

राकेश ने उसे घूरा।

—चुप रहो।

—कितनी रकम मिली?—अरविंद ने पूछा।

कविता ने चेहरा ढक लिया।

—पहले 12 लाख। फिर अभियान बड़ा हुआ तो और आने लगा। राकेश कहता था कि अन्वी की तस्वीर बहुत असर करती है। वह कहता था कि तेरी थकी हुई हालत देखकर लोग ज़्यादा दान देते हैं… अकेला बाप, बीमार बच्ची… सबको कहानी सच्ची लगती थी।

अरविंद का सीना जैसे भीतर से फट गया।

—कहानी सच्ची थी। मेरी बेटी सच में मर रही थी।

—मैं निकलना चाहती थी—कविता ने सिसकते हुए कहा—लेकिन उसने कहा कि पैसे लौटाए तो सब पकड़े जाएँगे। जब अन्वी ने हमारी बातें सुन लीं, उसने रिकॉर्डिंग शुरू कर दी। मुझे पता चला तो मैंने गोलू ढूँढ़ा, पर वह उसे हमेशा सीने से लगाए रहती थी।

—और दवा?

कविता ने सिर झुका लिया।

—नई दवा अस्पताल से आई थी। राकेश ने कहा कुछ दिन रोक दो। उसके बाद उसे दूसरे अस्पताल ले जाने का नाटक करेंगे और नई अपील निकालेंगे। मैंने दवा अलमारी में रख दी। मैं… मैं सोचती रही कि 2 दिन से कुछ नहीं होगा।

अरविंद की साँस अटक गई।

—उसी रात उसे दौरा पड़ा था।

कविता फूटकर रोने लगी।

राकेश अचानक उठा और दरवाज़े की ओर बढ़ा, मगर बाहर पहले से अपराध शाखा के अधिकारी खड़े थे। मीरा द्वारा तैयार प्रारंभिक रिपोर्ट, बैंक विवरण और अरविंद की शिकायत के आधार पर तलाशी वारंट लिया जा चुका था। राकेश ने पीछे के रास्ते भागने की कोशिश की, पर 2 अधिकारियों ने उसे पकड़ लिया।

घर की तलाशी में लोहे की अलमारी से 17 चिकित्सा फ़ाइलें मिलीं। उनमें केवल अन्वी का नाम नहीं था। अलग-अलग जिलों के बीमार बच्चों की तस्वीरें, दानदाताओं की सूचियाँ, नकली मुहरें, चिकित्सकों के हस्ताक्षर की प्रतियाँ और निजी खातों में भेजी गई रकम का हिसाब था। एक बही में बच्चों को “मामला 4”, “मामला 9” और “लंबी अवधि वाला मामला” लिखा गया था।

अन्वी के नाम के आगे राकेश ने लिखा था—“भावनात्मक प्रतिक्रिया बहुत अच्छी। पिता का चेहरा उपयोगी।”

अरविंद ने वह पंक्ति पढ़ी तो उसकी आँखों के आगे अस्पताल की सारी रातें घूम गईं। मशीनों के बीच बैठा वह स्वयं, गोद में सिकुड़ी अन्वी, दान माँगते हुए उसकी काँपती आवाज़—यह सब किसी के लिए बाज़ार का सामान था।

अधिकारियों ने कविता का फ़ोन जब्त किया। उसमें निशा के संदेश मिले।

“मैं सामने कम आऊँगी तो लोगों को लगेगा बच्ची के पास सिर्फ़ बाप है।”

“मेरी पुरानी तस्वीर मत लगाना, सहानुभूति कम हो जाएगी।”

“अगली किश्त कब मिलेगी?”

अन्वी की माँ केवल अनुपस्थित नहीं थी। उसने अपनी अनुपस्थिति को भी कमाई का साधन बना दिया था।

निशा को 4 दिन बाद कानपुर केंद्रीय बस अड्डे से पकड़ा गया। वह नक़द 8 लाख रुपये और नकली पहचान पत्र लेकर नेपाल सीमा की ओर जाने की तैयारी में थी। पुलिस के सामने उसने पहले कहा कि उसे कुछ मालूम नहीं, फिर दावा किया कि राकेश ने उसे धमकाया था। मगर बैंक संदेशों, बातचीत और उसके हस्ताक्षर वाले खातों ने झूठ तोड़ दिया।

जाँच लखनऊ से बाहर फैली तो 3 जाँच केंद्र, 2 छोटे अस्पताल, एक संस्था और कई बिचौलिए जुड़े मिले। असली रिपोर्ट दबाकर, बिल बढ़ाकर और बीमारी को अधिक गंभीर दिखाकर परिवारों के नाम पर धन जुटाया जाता था। अन्वी इस जाल की सबसे छोटी गवाह थी, पर उसी ने पहली दीवार तोड़ी।

मुकदमा शुरू हुआ तो न्यायालय के बाहर भीड़ रहने लगी। अरविंद कैमरों से दूर रहा, पर 7 साल की बच्ची द्वारा खिलौने में प्रमाण छिपाने की बात पूरे देश को झकझोर चुकी थी।

फिर न्यायालय में गोलू से मिली रिकॉर्डिंग चलाई गई।

कमरे में अन्वी की धीमी आवाज़ गूँजी—

—पापा देर से आएँगे। बुआ ने कहा दवा खत्म है, लेकिन मैंने बोतल उनकी थैली में देखी।

कुछ सेकंड बाद दूसरी रिकॉर्डिंग चली।

—मामा बोले कि मेरे बाल और गिरेंगे तो नई तस्वीर खींचेंगे। मुझे तस्वीर नहीं खिंचवानी। पापा रोते हैं।

अरविंद ने सिर झुका लिया। उसके नाखून हथेली में धँस गए।

अगले अंश में अन्वी शायद कंबल के भीतर थी। उसकी साँस तेज़ थी।

—पापा, अगर तुम यह सुनो तो अपने आपको दोष मत देना। तुम काम पर जाते हो क्योंकि मेरी दवा लानी होती है। गोलू मेरे पास रहता है, इसलिए उसे सब पता है।

अरविंद की देह काँपने लगी। वह अंतिम संस्कार में भी इतने खुले रूप से नहीं रोया था। उस दिन न्यायालय के बीच वह कुर्सी पर झुक गया और दोनों हाथों से चेहरा ढक लिया। उसकी बेटी मरते समय भी उसे अपराधबोध से बचाने की कोशिश कर रही थी।

सरकारी पक्ष ने मूल और बदली हुई रिपोर्टें सामने रखीं। विशेषज्ञों ने बताया कि अन्वी की बीमारी कठिन थी, पर समय पर दवा बदलने, संक्रमण रोकने और विशेष चिकित्सा केंद्र में भर्ती करने से उसकी हालत स्थिर हो सकती थी। यह निश्चित नहीं था कि वह वर्षों जीवित रहती, पर उसके अंतिम सप्ताह इतने पीड़ादायक नहीं होते और उसकी मृत्यु टलने की वास्तविक संभावना थी।

यही अंतर सबसे बड़ा था। अपराधियों ने केवल पैसा नहीं चुराया था; उन्होंने एक बच्ची से समय चुराया था।

कविता ने अंततः अपना अपराध स्वीकार कर लिया। उसने बताया कि राकेश से उसका छिपा संबंध 2 साल से था। वह कर्ज़ में डूबी थी और राकेश ने उसे आसान पैसे का रास्ता दिखाया। शुरुआत में उसने दान की रकम से केवल “उधार” लेने की बात मानी, फिर नकली बिलों पर हस्ताक्षर किए। बाद में वह इतनी फँस गई कि अन्वी की दवा छिपाने तक पहुँच गई।

—मैं उससे प्यार नहीं करती थी—उसने न्यायालय में कहा—मैं उस जीवन से प्यार करने लगी थी जो चोरी के पैसे से मिल रहा था।

अरविंद ने पहली बार उसकी ओर सीधा देखा।

—और अन्वी तुमसे प्यार करती थी। वह तुम्हें अपनी माँ से ज़्यादा भरोसे लायक मानती थी।

कविता के पास कोई उत्तर नहीं था।

निशा ने गरीबी और दबाव का बहाना बनाया, मगर उसके संदेशों में वह बेटी की बिगड़ती हालत पर त्योहार से पहले नया अभियान चलाने की योजना बना रही थी। न्यायालय में कई लोग रो पड़े; अरविंद के भीतर आँसू भी नहीं बचे थे।

निर्णय के दिन न्यायाधीश ने कहा कि बीमारी से जूझते बच्चे को लाभ का साधन बनाना केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि विश्वास और मानवता के विरुद्ध अपराध है। राकेश को आपराधिक षड्यंत्र, जालसाज़ी, धन अपहरण, चिकित्सा अभिलेखों में हेरफेर और उपचार में जानबूझकर बाधा डालने के लिए लंबी कारावास की सज़ा मिली। कविता को सहयोग, प्रमाण छिपाने, धन हस्तांतरण और दवा रोकने के लिए दंडित किया गया। निशा को धोखाधड़ी, धन शोधन और षड्यंत्र में सक्रिय भागीदारी के लिए सज़ा मिली। संबंधित केंद्रों के लाइसेंस निलंबित हुए और कई चिकित्साकर्मियों पर अलग मुकदमे चले।

सज़ा सुनने के बाद भी अरविंद को जीत महसूस नहीं हुई। न्यायालय से बाहर निकलते समय लोगों ने कहा—“अन्वी को न्याय मिल गया।” लेकिन उसे लगा, न्याय वह होता जब अन्वी उसका हाथ पकड़कर घर लौटती, दूध से मुँह बनाती और स्कूल न जाने का बहाना करती।

कानून दोषियों को कैद कर सकता था, पर उसके कमरे की ख़ामोशी को नहीं।

कई सप्ताह तक अरविंद अन्वी के कमरे का दरवाज़ा नहीं खोल पाया। फिर एक रविवार उसने धीरे से भीतर कदम रखा। धूल की हल्की परत रंगों की डिब्बी पर जम चुकी थी। अलमारी में पीली फ्रॉक टँगी थी। मेज़ की दराज़ में उसे एक मुड़ा हुआ काग़ज़ मिला। उस पर टेढ़े अक्षरों में लिखा था—

“पापा, जब मैं ठीक हो जाऊँगी तो आप रात की नौकरी मत करना। हम दोनों छत पर सोएँगे। अगर मैं जल्दी भगवान के घर चली गई तो रोना, पर खाना भी खाना। गोलू को अकेला मत छोड़ना।”

नीचे 3 आकृतियाँ बनी थीं—अरविंद, अन्वी और गोलू। तीनों के ऊपर बड़ा-सा चाँद था।

अरविंद फर्श पर बैठ गया। उसने काग़ज़ सीने से लगाया और पहली बार बेटी से क्षमा नहीं माँगी। उसने केवल कहा—

—तुमने मुझे बचा लिया, गुड़िया।

बची वैध दानराशि पीड़ित परिवारों को लौटाई गई। अरविंद ने “अन्वी भरोसा केंद्र” शुरू किया, जहाँ परिवारों को दूसरी चिकित्सा राय, सरकारी अस्पतालों की जानकारी और दान खातों की निगरानी मिलती थी। वहाँ किसी बच्चे की मजबूरी को विज्ञापन नहीं बनाया जाता था।

काँच के एक छोटे संदूक में गोलू रखा रहता था। लोग उसे देखने आते, पर अरविंद उसे वीरता का प्रदर्शन नहीं मानता था। उसके लिए वह एक चेतावनी था।

खतरा हमेशा अजनबी बनकर नहीं आता। कभी वह राखी बाँधने वाली बहन के हाथ में चाबी लेकर आता है। कभी माँ की आँखों में आँसू बनकर लौटता है। कभी सफ़ेद कुर्ते में “संपर्क” और “व्यवस्था” का भरोसा देता है। वह खाना लाता है, अस्पताल की रात बाँटता है और धीरे-धीरे घर की हर साँस का हिसाब अपने नाम कर लेता है।

लेकिन गोलू एक और बात भी याद दिलाता था—कमज़ोर शरीर का अर्थ कमज़ोर आत्मा नहीं होता।

7 साल की अन्वी बोलते-बोलते थक जाती थी, फिर भी उसने सच को कपास के भीतर सुरक्षित रखा। जिन वयस्कों ने सोचा था कि उसकी आवाज़ उसके साथ दब जाएगी, वे उसी छोटी आवाज़ से अदालत तक घसीटे गए।

हर रात अरविंद गोलू के काँच पर हाथ रखता और अन्वी की अंतिम पंक्ति याद करता—

“पापा, अपने आपको दोष मत देना।”

वह अब भी पूरी तरह अपने आपको क्षमा नहीं कर पाया था। शायद कभी नहीं कर पाता। मगर उसने इतना सीख लिया था कि अपराधबोध में डूबना अन्वी की आख़िरी इच्छा के विरुद्ध होता।

इसलिए वह रोता भी था, खाना भी खाता था, काम पर भी जाता था और हर उस परिवार के साथ खड़ा होता था जिसे कोई झूठी उम्मीद बेचने आता।

अन्वी लौटकर नहीं आई, पर उसकी आवाज़ बची रही—एक पुराने खिलौना भालू के भीतर, एक पिता की धड़कनों में और उन सैकड़ों घरों में, जहाँ अब कोई भी चमकती घड़ी और बड़े संपर्कों वाले आदमी पर आँख बंद करके भरोसा नहीं करता था।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.