
PART 1
श्मशान घाट पर पति की चिता के सामने अनन्या का प्रसव पीड़ा में पानी टूट गया, और सास ने ठंडी आवाज़ में कहा, “आज मेरा बेटा जल रहा है, अपना नाटक लेकर बाहर चली जा।”
दिल्ली के निगम बोध घाट पर उस दोपहर बारिश ऐसी गिर रही थी जैसे आसमान भी अर्जुन मल्होत्रा की मौत पर रो रहा हो। सफेद चादरों, गीली लकड़ियों, भीगे फूलों और अगरबत्ती की गंध के बीच मल्होत्रा परिवार खड़ा था। सबके चेहरे पर शोक था, मगर अनन्या जानती थी कि उस घर के अधिकतर चेहरे बचपन से ही नकाब पहनना सीख चुके थे।
अर्जुन मल्होत्रा, उसके पति, गुरुग्राम की बड़ी निर्यात कंपनी के वारिस थे। घर में करोड़ों की बातें चाय के साथ होती थीं, पर दिल की कीमत कभी नहीं समझी गई। अर्जुन ही अलग था। उसने अनन्या को दहेज, खानदान, हैसियत और रिश्तेदारों की फुसफुसाहटों से ऊपर रखा था। उसी ने अपने परिवार के खिलाफ जाकर उससे शादी की थी।
अब वही अर्जुन बारिश में भीगी चिता पर लेटा था।
अनन्या 9 महीने की गर्भवती थी। काली सूती साड़ी पेट पर तनी हुई थी, पैरों में सूजन थी, माथे की बिंदी बारिश में धुंधली हो चुकी थी। वह बार-बार अपने पेट पर हाथ रखती और चिता की ओर देखती, जैसे अपने बच्चे से कह रही हो कि उसके पिता आखिरी बार यहीं हैं।
अर्जुन जयपुर से लौटते हुए सड़क हादसे में मारा गया था। फोन रात 2 बजे आया था। उसके बाद से अनन्या को ठीक से याद भी नहीं था कि किसने क्या कहा, किसने रोया, किसने सिर्फ संपत्ति की बात की।
तभी उसके पेट में तेज ऐंठन उठी। वह चीख भी नहीं पाई। कमर से नीचे गर्म तरल बहा और साड़ी भीग गई। उसके हाथ कांपने लगे।
“मम्मीजी…” उसने सास सावित्री मल्होत्रा की ओर देखा, “कृपा करके एम्बुलेंस बुला दीजिए। बच्चा… बच्चा अभी आने वाला है।”
सावित्री ने धीरे से चेहरा घुमाया। उनके सफेद रेशमी दुपट्टे पर बारिश की बूंदें मोतियों जैसी चमक रही थीं, पर आंखों में ज़रा भी नमी नहीं थी।
“अनन्या, यहां सब लोग मेरे बेटे को अंतिम विदाई देने आए हैं। तू अपनी तरफ ध्यान खींचना बंद कर।”
अनन्या दर्द से दोहरी हो गई।
“मम्मीजी, मैं सच कह रही हूं… बहुत दर्द हो रहा है…”
पास खड़ा अर्जुन का छोटा भाई रोहन मोबाइल पर किसी से धीमी आवाज़ में बात कर रहा था। अनन्या ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“रोहन, प्लीज… एक बार अस्पताल फोन कर दो।”
रोहन ने उसका हाथ झटक दिया।
“भाभी, ड्रामा मत करो। भैया गए हैं, और आपको अभी भी खुद को बीच में लाना है?”
“मेरा बच्चा…”
“ऑटो पकड़ो और चली जाओ।”
फिर उसने अनन्या की बांह पकड़ी और उसे भीड़ से अलग धकेल दिया। इतनी जोर से कि उसका पैर गीली मिट्टी में फिसला और वह लोहे की रेलिंग से टकरा गई। रिश्तेदारों ने देखा, पर किसी ने हाथ नहीं बढ़ाया। बुआओं ने सिर झुका लिया। चचेरे भाइयों ने छतरियां ठीक कर लीं। पंडित मंत्र पढ़ता रहा।
सावित्री ने सिर्फ इतना कहा, “इसे बाहर छोड़ आओ। अशुभ समय में बच्चा पैदा होने लगा है।”
अनन्या की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा। वह किसी तरह गेट तक पहुंची। बारिश, दर्द और अपमान तीनों मिलकर उसके शरीर को तोड़ रहे थे। सड़क पर खड़े ऑटो वाले ने पहले मना कर दिया, फिर जब उसने अपने कानों की छोटी बालियां उतारकर हथेली पर रखीं, तब उसने अस्पताल चलने को हामी भरी।
सरकारी अस्पताल के प्रसूति वार्ड में उस रात अनन्या ने अकेले बच्चे को जन्म दिया। कोई पति नहीं था, कोई सास नहीं, कोई देवर नहीं, कोई रिश्तेदार नहीं। सिर्फ एक नर्स थी, जिसने उसके माथे से भीगे बाल हटाते हुए कहा, “हिम्मत रखो बहन, बेटा हुआ है।”
बच्चे को जब उसके सीने पर रखा गया, अनन्या फूटकर नहीं रोई। उसके आंसू चुपचाप तकिए में गुम हो गए। बच्चे की आंखें बंद थीं, मगर मुट्ठियां कसी हुई थीं। जैसे वह दुनिया से लड़ने की तैयारी लेकर आया हो।
उसने उसका नाम कबीर रखा, क्योंकि अर्जुन ने महीनों पहले मुस्कुराकर कहा था, “हमारा बेटा आएगा तो नाम ऐसा रखना जो सच से कभी न डरे।”
12 दिन बाद, जब अनन्या अभी ठीक से चल भी नहीं पा रही थी, उसके छोटे से किराए के घर की घंटी बजी।
दरवाजे की स्क्रीन पर सावित्री खड़ी थीं। सफेद साड़ी, मोती की माला, माथे पर हल्का चंदन। पीछे रोहन था, हाथ में महंगा खिलौना और चेहरे पर वही घमंड।
अनन्या ने दरवाजा खोला।
सावित्री ने बिना अपराधबोध के कहा, “हम अपने पोते को देखने आए हैं।”
अनन्या ने उनकी आंखों में सीधा देखा।
“कौन सा पोता?”
और उसी पल सावित्री मल्होत्रा का चेहरा राख जैसा सफेद पड़ गया।
PART 2
सावित्री कुछ पल तक अनन्या को देखती रहीं, जैसे शब्दों ने उनके कानों में जहर भर दिया हो।
“क्या मतलब कौन सा पोता? अर्जुन का बेटा कहां है?”
रोहन आगे बढ़ा। “भाभी, दरवाजा खुला रखिए। हमें बच्चे को देखना है। और कंपनी के कुछ कागज़ भी हैं। भैया के जाने के बाद आपको समझ नहीं आएगा क्या करना है।”
अनन्या ने दरवाजा पूरा खोल दिया।
बैठक में वरिष्ठ वकील श्रीनिवास त्रिवेदी बैठे थे, जो वर्षों से मल्होत्रा परिवार के ट्रस्ट और कंपनी के दस्तावेज़ संभालते थे। मेज पर फाइलें, सीलबंद लिफाफे और एक छोटी लोहे की पेटी रखी थी।
लेकिन रोहन का चेहरा फाइलों से नहीं, सोफे के पास खड़ी एक स्त्री को देखकर उतर गया।
वह मीरा थी। साधारण सलवार-कमीज, आंखों में डर और गरिमा दोनों। उसके पास 5 साल का एक लड़का बैठा था, जो बिस्कुट खाते हुए सबको देख रहा था।
उसकी आंखें बिल्कुल रोहन जैसी थीं।
सावित्री के होंठ कांपे। “तुम यहां कैसे आई?”
मीरा ने धीमे पर साफ स्वर में कहा, “उसी तरह, जैसे 5 साल पहले आपके घर से निकाली गई थी। गर्भ में आपके बेटे का बच्चा लेकर।”
रोहन पीछे हट गया। “मां…”
“चुप!” सावित्री फुफकारीं।
त्रिवेदी ने फाइल खोली। “बच्चे का नाम आरव है। डीएनए रिपोर्ट पुष्टि करती है कि वह रोहन मल्होत्रा का बेटा है। हमारे पास धमकी भरे संदेश, बैंक ट्रांसफर और नौकरी से निकाले जाने के कागज़ भी हैं।”
अनन्या ने कबीर को गोद में कस लिया।
“अर्जुन सब जानता था। उसने मरने से पहले सब सुरक्षित कर दिया था।”
त्रिवेदी ने दूसरा दस्तावेज़ उठाया।
“मल्होत्रा पारिवारिक ट्रस्ट की धारा 7 के अनुसार, कोई भी उत्तराधिकारी यदि अपने रक्त संबंधी बच्चे को जानबूझकर अस्वीकार करे या छिपाए, तो वह प्रबंधन और लाभ से वंचित होगा।”
सावित्री का चेहरा पत्थर हो गया।
अनन्या बोली, “आप मेरे बच्चे को पोता कहने आई हैं। पहले बताइए, आरव आपका कौन है?”
कमरे में ऐसा सन्नाटा छा गया कि दीवार घड़ी की टिक-टिक चाकू जैसी सुनाई देने लगी।
तभी त्रिवेदी ने अंतिम कागज़ सामने रखा।
“आज सुबह अदालत ने मल्होत्रा ट्रस्ट और कंपनी खातों पर अस्थायी रोक लगा दी है। रोहन को तत्काल प्रभाव से पद से निलंबित किया गया है। सावित्री जी के खिलाफ वित्तीय दबाव, छिपाव और दस्तावेज़ी हेरफेर की जांच शुरू हो चुकी है।”
रोहन चीखा, “ये सब तुम्हारी वजह से हुआ, मां! तुमने कहा था मीरा और बच्चा बोझ हैं!”
और फिर जो परिवार दूसरों को तोड़ता था, वही अनन्या के दरवाजे पर खुद टूटने लगा।
PART 3
दिल्ली और गुरुग्राम के कारोबारी हलकों में खबर आग की तरह फैल गई। मल्होत्रा एक्सपोर्ट्स, जो कभी अपनी सफेद इमारत, चमकदार रिसेप्शन और परफेक्ट पारिवारिक तस्वीरों के लिए जाना जाता था, अब फुसफुसाहटों, नोटिसों और बंद कमरों की बैठकों का नाम बन गया।
सावित्री मल्होत्रा ने पूरी जिंदगी इज़्ज़त को इंसान से ऊपर रखा था। उन्हें लगता था कि पैसे से सच दबाया जा सकता है, रिश्तों को खरीदा जा सकता है और औरतों की आवाज़ को दहलीज़ पर कुचला जा सकता है। पर इस बार सच किसी नौकरानी की फुसफुसाहट नहीं था। वह अदालत के कागज़ पर लिखा था। डीएनए रिपोर्ट में दर्ज था। अर्जुन की आवाज़ में रिकॉर्ड था।
अर्जुन ने अपनी मौत से 4 महीने पहले त्रिवेदी को बुलाकर सब सौंप दिया था। उसे शक था कि जयपुर वाले नए सौदे में रोहन और सावित्री कुछ गड़बड़ कर रहे हैं। कई खातों से पैसे धीरे-धीरे गायब हो रहे थे। कुछ नकली आपूर्तिकर्ताओं के नाम पर रकम जा रही थी। जब उसने गहराई से देखा, तो उसे मीरा के बारे में भी पता चला।
मीरा कभी मल्होत्रा एक्सपोर्ट्स में अकाउंट्स विभाग में काम करती थी। रोहन ने उससे शादी का वादा किया, फिर गर्भ की बात सुनते ही पीछे हट गया। सावित्री ने उसे अपने ऑफिस में बुलाया था। दरवाजा बंद कर कहा था, “अगर बच्चे का नाम मल्होत्रा से जोड़ा, तो तेरा घर, नौकरी और इज़्ज़त तीनों मिटा दूंगी।”
मीरा अकेली थी। पिता बीमार थे, मां सिलाई करती थीं। उसने बच्चा गिराने से मना किया, तो उसकी नौकरी चली गई। बैंक खाते में हर महीने कुछ पैसे आने लगे, पर साथ में चेतावनी भी आती रही कि वह कभी सामने न आए।
अर्जुन ने यह सब खोजा तो उसकी दुनिया हिल गई। उसने मीरा को ढूंढा, आरव की फीस भरी, डॉक्टर का खर्च उठाया, पर मीरा से वादा किया कि बिना उसके साहस के वह सच बाहर नहीं लाएगा। फिर उसने अपने अजन्मे बच्चे और अनन्या के लिए भी व्यवस्था की। अपनी वसीयत में उसने लिखा कि यदि उसके साथ कुछ भी अचानक हो, तो उसकी पत्नी अनन्या कबीर की संरक्षक होने के साथ-साथ उसके शेयरों की वैध प्रतिनिधि होगी।
अनन्या को यह सब अस्पताल में पता चला था।
जिस रात कबीर पैदा हुआ, उसी रात त्रिवेदी अस्पताल पहुंचे थे। अनन्या प्रसव के बाद कमजोर थी। हाथ में सलाईन लगी थी, बाल बिखरे थे, आंखें सूजी हुई थीं। वह सोच रही थी कि अब उसे अपने बच्चे को लेकर कहां जाना होगा। तभी त्रिवेदी ने उसके सामने लोहे की वही पेटी रखी थी।
“अर्जुन ने कहा था, अगर वह न रहे और परिवार तुम्हें अकेला छोड़ दे, तो यह तुम्हें दे दूं।”
पेटी में अर्जुन का पत्र था। अनन्या ने कांपते हाथों से पढ़ा था।
“अनन्या, अगर तुम यह पढ़ रही हो, तो शायद मैं तुम्हारे साथ नहीं हूं। मुझे माफ करना कि मैं तुम्हें उस घर के बीच छोड़ गया, जहां लोग खून को भी संपत्ति की तरह तौलते हैं। मां और रोहन पर भरोसा मत करना। मीरा और आरव को ढूंढना। सच तुम्हें बचाएगा। हमारे बच्चे को डरकर मत पालना। उसे बताना कि उसके पिता ने देर से सही, पर सही पक्ष चुना।”
उस पत्र ने अनन्या को तोड़ भी दिया और खड़ा भी कर दिया।
12 दिन तक उसने एक शब्द नहीं कहा। उसने न सावित्री को फोन किया, न रोहन को। उसने बच्चे को दूध पिलाया, टांकों का दर्द सहा, रातों में अर्जुन की तस्वीर देखकर रोई, और दिन में वकीलों से बात की। उसी दौरान मीरा उसके घर आई। दोनों औरतें पहली बार आमने-सामने बैठीं। एक ने पति खोया था, दूसरी ने सम्मान। एक ने बच्चे को अकेले जन्म दिया था, दूसरी ने बेटे को दुनिया से छिपाकर पाला था।
पहली मुलाकात में वे दोनों ज्यादा नहीं बोलीं।
बस जब आरव ने कबीर की पालने में झांका और धीरे से पूछा, “ये मेरा भाई है क्या?” तो अनन्या की आंखें भर आईं।
मीरा ने तुरंत उसे चुप कराया। “ऐसा मत बोलो, बेटा।”
अनन्या ने उसकी ओर देखा और पहली बार उसके चेहरे पर कठोरता की जगह नरमी आई।
“क्यों नहीं? खून सिर्फ नाम से नहीं, सच से भी जुड़ता है।”
सावित्री और रोहन के दरवाजे पर टूटने के बाद मामला तेज़ी से आगे बढ़ा। अदालत ने रोहन की कंपनी तक पहुंच रोक दी। निदेशक मंडल ने जांच समिति बनाई। कई पुराने कर्मचारी, जो वर्षों से चुप थे, बोलने लगे। किसी ने बताया कि कैसे सावित्री विधवा बहूओं को अपशकुन कहती थीं। किसी ने बताया कि कैसे दहेज कम लाने वाली बहुओं को ताने दिए जाते थे। किसी ने गवाही दी कि मीरा को बिना कारण नौकरी से निकाला गया था।
रोहन की सबसे बड़ी चोट पैसों पर पड़ी। जो आदमी क्लब, गाड़ियों और घड़ियों के बिना खुद को अधूरा समझता था, उसे अदालत ने आरव के लिए भरण-पोषण और पिछले 5 साल की आर्थिक जिम्मेदारी का आदेश दिया। उसकी महंगी कार बिकी। साउथ दिल्ली का सर्विस अपार्टमेंट खाली करना पड़ा। जिन दोस्तों के साथ वह हर शाम महंगे होटल में बैठता था, वे अब फोन नहीं उठाते थे।
सावित्री को पहली बार समझ आया कि डर से चलाया गया घर कभी परिवार नहीं बनता। पर यह समझ पछतावे से नहीं, मजबूरी से आई। बैंक खातों की जांच शुरू हुई, सामाजिक समारोहों से बुलावा बंद हुआ। जिन महिलाओं के सामने वह बहूओं पर ज्ञान देती थीं, वही अब उनके आते ही विषय बदल लेतीं।
मल्होत्रा हवेली में एक दिन बहुत बड़ा सन्नाटा उतरा। दीवार पर लगी अर्जुन की तस्वीर के नीचे माला सूख चुकी थी। सावित्री ने पहली बार उसके सामने बैठकर रोना चाहा, मगर आंसू नहीं निकले। शायद क्योंकि जीवन भर उन्होंने दूसरों के आंसुओं की कीमत नहीं समझी थी।
6 महीने बाद अनन्या मल्होत्रा एक्सपोर्ट्स की मुख्य कार्यालय इमारत में दाखिल हुई। उसने लाल बॉर्डर वाली सफेद साड़ी पहनी थी। माथे पर हल्का सिंदूर नहीं था, पर आंखों में वह दृढ़ता थी जो किसी विवाह-चिह्न से बड़ी होती है। कबीर को उसने अपनी सहायिका के पास नहीं छोड़ा। वह उसे गोद में लेकर ही अंदर गई।
कुछ लोगों ने फुसफुसाकर कहा, “विधवा होकर ऑफिस संभालेगी?”
अनन्या ने सुन लिया, पर रुकी नहीं।
बोर्डरूम में 11 निदेशक बैठे थे। त्रिवेदी ने अर्जुन की वसीयत, ट्रस्ट दस्तावेज़ और अदालत का अंतरिम आदेश पढ़ा। उसके बाद अनन्या को कंपनी संचालन समिति की प्रमुख घोषित किया गया। यह कोई दया नहीं थी। यह अर्जुन की इच्छा, कानून का आदेश और न्याय की शुरुआत थी।
उसने पहली बैठक में सिर्फ 3 बातें कहीं।
“पहली, किसी कर्मचारी को गर्भ, विवाह, जाति, विधवापन या पारिवारिक स्थिति के कारण अपमानित नहीं किया जाएगा। दूसरी, कंपनी के सभी खातों की स्वतंत्र जांच होगी। तीसरी, आरव की शिक्षा और सुरक्षा के लिए ट्रस्ट से वैधानिक प्रावधान होगा, क्योंकि बच्चा गलती नहीं होता, गलती उसे छिपाने वाले करते हैं।”
मीरा पीछे की कुर्सी पर बैठी थी। उसने पहली बार सिर उठाकर कमरे को देखा। आरव उसकी गोद में नहीं छिपा था। वह खिड़की के पास खड़ा नीचे दौड़ती गाड़ियों को देख रहा था, जैसे दुनिया अब उसके लिए बंद कमरा नहीं रही।
कबीर धीरे-धीरे बड़ा होने लगा। वह अर्जुन की तस्वीर को देखकर मुस्कुराता था। अनन्या हर रात उसे पिता की कहानियां सुनाती। यह नहीं कि अर्जुन अमीर था। यह नहीं कि उसके पास बड़ी कंपनी थी। बल्कि यह कि उसके पिता ने जब सच जाना, तो देर से सही, मगर छिपाया नहीं।
मीरा और अनन्या के बीच अजीब रिश्ता बना। न दोस्ती जैसा, न रिश्तेदारी जैसा। वह दो घायल औरतों का मौन समझौता था कि बच्चे कभी बड़ों के पाप का बोझ नहीं उठाएंगे। त्योहारों पर आरव कबीर के लिए खिलौना लाता। रक्षाबंधन पर मीरा की छोटी बहन ने दोनों बच्चों को तिलक लगाया। दीवाली पर अनन्या ने पहली बार अपने घर के दरवाजे पर 2 दीये ज्यादा जलाए—एक अर्जुन के लिए, एक उस सच के लिए जिसने उन्हें बचाया।
एक दिन कार्यालय में सूचना मिली कि सावित्री रिसेप्शन पर खड़ी हैं। वे मिलना चाहती थीं।
अनन्या ने कैमरे में देखा। वही औरत, जो कभी रेशमी साड़ियों और मोतियों में राजरानी जैसी दिखती थी, आज साधारण सूती साड़ी में खड़ी थी। बाल सफेद दिख रहे थे। हाथ में पुराना पर्स था। चेहरे पर घमंड की जगह थकान थी।
रिसेप्शन से आवाज़ आई, “मैडम, कह रही हैं 5 मिनट चाहिए। बहुत जरूरी है।”
अनन्या कुछ देर चुप रही। उसकी आंखों के सामने वह बारिश लौट आई। गीली मिट्टी। चिता की आग। पेट में उठता दर्द। रोहन का धक्का। सावित्री की आवाज़—अपना नाटक लेकर बाहर चली जा।
उसने कबीर की ओर देखा। वह उसके केबिन में छोटे लकड़ी के घोड़े से खेल रहा था। माथे पर हल्की पसीने की बूंदें थीं। वह सुरक्षित था। जिंदा था। मुस्कुरा रहा था।
अनन्या ने फोन उठाया।
“उन्हें बाहर तक छोड़ दीजिए। और कहिए, परिवार उस दिन खत्म हो जाता है जब कोई प्रसव पीड़ा में खड़ी बहू को श्मशान के गेट पर अकेला छोड़ देता है।”
रिसेप्शन पर कुछ क्षण चुप्पी रही।
“मैडम, कोई और संदेश?”
अनन्या की आवाज़ धीमी हुई, मगर पत्थर जैसी साफ रही।
“हां। कहिए, पोता देखने का अधिकार जन्म से नहीं, व्यवहार से मिलता है।”
सावित्री उस दिन चली गईं। उन्होंने हंगामा नहीं किया। शायद उनमें अब आवाज़ बची ही नहीं थी।
3 साल बाद एक बरसाती शाम अनन्या कंपनी से बाहर निकली। कबीर उसके साथ था, पीली बरसाती पहने, हाथ में छोटा छाता लिए। वह पानी के गड्ढों में कूदता और हंसता था। अनन्या उसे डांटने ही वाली थी, फिर रुक गई। बारिश अब उसे डराती नहीं थी।
सड़क के दूसरी ओर बस स्टॉप के टूटे शेड के नीचे सावित्री खड़ी थीं। भीगती हुई, अकेली, हाथ में दवा की थैली। उन्होंने अनन्या को पहचाना। फिर कबीर को देखा। वही बच्चा, जिसे उन्होंने जन्म से पहले अपशकुन कहा था। वही पोता, जिसके नाम पर वे अधिकार मांगने आई थीं।
सावित्री ने कांपता हाथ उठाया।
कबीर ने पूछा, “मम्मा, वो आंटी हमें जानती हैं?”
अनन्या ने कुछ पल उन्हें देखा। न गुस्सा उठा, न बदला। बस एक शांत दूरी थी, जैसे कोई तूफान बहुत पीछे छूट चुका हो।
उसने कबीर का छाता ठीक किया।
“कुछ लोग हमें बहुत देर से पहचानते हैं, बेटा।”
“तो हम उन्हें नमस्ते करें?”
अनन्या ने सड़क के उस पार फिर देखा। सावित्री की आंखों में पश्चाताप था, पर हर पश्चाताप को गोद नहीं मिलती। कुछ पछतावे भीगते ही अच्छे लगते हैं, ताकि दुनिया देख सके कि जिसने दूसरों को बारिश में धकेला था, उसे भी कभी छत की जरूरत पड़ती है।
अनन्या ने हल्के से सिर झुकाया। न माफी, न नफरत। बस एक अंतिम स्वीकार कि अतीत अब उसके घर का दरवाजा नहीं खटखटा सकता।
वह कबीर को कार में बैठाकर उसके पास झुकी।
“मम्मा, बारिश तेज़ है।”
अनन्या मुस्कुराई।
“हां, बेटा। लेकिन अब हमारे पास अपना छाता है।”
कार आगे बढ़ गई। पीछे बस स्टॉप पर सावित्री धुंधली होती गईं। सामने शीशे पर बारिश बहती रही, मगर भीतर कबीर की हंसी गूंज रही थी।
और अनन्या ने पहली बार सच में महसूस किया कि कुछ तूफान जिंदगी उजाड़ने नहीं आते। वे सिर्फ यह दिखाने आते हैं कि कौन तुम्हें भीगता छोड़ देगा, कौन तुम्हारे लिए छाता खोलेगा, और किसके बिना भी तुम पूरी दुनिया पार कर सकते हो।