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उस बच्चे ने 4 रातों तक चिल्लाकर कहा, “मेरा हाथ काट दो, पापा”, लेकिन पिता ने उसे झूठा समझकर बांध दिया; जब आया ने प्लास्टर खोला, सौतेली मां की मुस्कान के नीचे छिपा सच घर को हमेशा के लिए तोड़ गया

PART 1

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“मेरा हाथ काट दो, पापा!” 10 साल के आरव मेहरा ने तीसरी रात वही चीख मारी, और इस बार भी उसके पिता विक्रम ने उसे अस्पताल नहीं ले जाया।

दिल्ली के वसंत कुंज वाले बड़े बंगले में रात के 2 बजे सन्नाटा नहीं, एक बच्चे की टूटती हुई आवाज गूंज रही थी। आरव का दायां हाथ सफेद प्लास्टर में बंद था। 5 दिन पहले स्कूल के मैदान में क्रिकेट खेलते हुए वह गिर गया था। डॉक्टर ने कहा था, हल्का फ्रैक्चर है, 4 हफ्ते में ठीक हो जाएगा।

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लेकिन उस प्लास्टर के अंदर कुछ ऐसा था, जिसे कोई मानने को तैयार नहीं था।

“पापा, अंदर कुछ चल रहा है,” आरव रोते-रोते कहता। “वो मुझे काट रहा है। सच में काट रहा है। प्लीज, इसे खोल दो।”

उसकी उंगलियां सूज चुकी थीं। नाखूनों के पास लालपन था। माथे पर पसीना था, जैसे बुखार में जल रहा हो। उसने प्लास्टर दीवार पर मारने की कोशिश की, तो विक्रम ने घबराकर उसका दूसरा हाथ पलंग से बांध दिया।

“बस, आरव,” विक्रम की आवाज कांप रही थी। “हड्डी हिल गई तो और नुकसान होगा।”

दरवाजे पर खड़ी रिया ने गहरी सांस ली। वह विक्रम की दूसरी पत्नी थी, रेशमी नाइटसूट, सलीके से बंधे बाल और चेहरे पर नकली चिंता।

“विक्रम, तुम फिर इसके ड्रामे में आ रहे हो,” उसने धीमे मगर तेज शब्दों में कहा। “डॉक्टर ने कहा था, इसे प्लास्टर नहीं छेड़ना है। यह अपनी मां के जाने के बाद से बहुत भावुक हो गया है।”

आरव की मां, नंदिता, 2 साल पहले कैंसर से चली गई थी। उसके बाद से आरव हर रात तकिए के नीचे मां की छोटी सी तस्वीर रखकर सोता था। रिया को वह तस्वीर पसंद नहीं थी। वह कहती थी, “घर को आगे बढ़ना चाहिए, श्मशान नहीं बनना चाहिए।”

आरव ने पिता को देखा। उसकी आंखों में दर्द से ज्यादा डर था।

“पापा, मैं झूठ नहीं बोल रहा।”

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विक्रम ने नजरें फेर लीं।

तभी कमरे में शांता दीदी आईं। 62 साल की वह औरत आरव को जन्म से पाल रही थी। घर में सब उन्हें नौकरानी कहते थे, लेकिन आरव उन्हें “दीदी मां” बुलाता था।

“साहब,” शांता ने कड़क आवाज में कहा, “बच्चा झूठ नहीं बोल रहा। दर्द की आवाज और नाटक की आवाज अलग होती है।”

रिया तुरंत पलटी।

“शांता, अपनी हद में रहिए। आप डॉक्टर नहीं हैं।”

“डॉक्टर नहीं हूं,” शांता ने आरव की ओर देखते हुए कहा, “पर मां की गोद में बच्चों की चीख पहचानना सीखा है।”

विक्रम थक चुका था। कारोबार, मीटिंग, रिया की बातों और आरव की रात-रात भर की चीखों ने उसे अंदर से खाली कर दिया था।

“सब शांत रहो,” उसने टूटे स्वर में कहा। “आरव को आराम चाहिए।”

शांता ने बंधे हुए हाथ की ओर देखा। उसकी आंखें भर आईं।

“आज आपने इसका हाथ नहीं बांधा, साहब,” उसने कहा। “आज आपने इसका भरोसा बांध दिया।”

सुबह जब सूरज की हल्की रोशनी पूजा-घर की पीतल की घंटी पर पड़ी, विक्रम अपने स्टडी रूम में बैठा था। सामने चाय ठंडी हो चुकी थी। दीवार पर अब भी नंदिता की तस्वीर टंगी थी, जिसमें वह नवजात आरव को सीने से लगाए मुस्कुरा रही थी।

तभी शांता बिना दस्तक दिए अंदर आईं।

“मेरे साथ चलिए।”

“शांता, अभी नहीं…”

उन्होंने अपनी हथेली खोल दी।

उस पर एक मरी हुई लाल चींटी पड़ी थी।

विक्रम का चेहरा सख्त हुआ।

“ये क्या है?”

“आरव की चादर पर थी।”

“बगीचे से आ गई होगी।”

शांता उसके करीब आईं।

“बगीचे से नहीं, प्लास्टर से निकली है।”

विक्रम के शरीर में ठंड दौड़ गई।

वह ऊपर भागा। आरव पीला पड़ा था। होंठ सूखे, आंखें आधी बंद, और बंधे हाथ की कलाई पर लाल निशान। प्लास्टर से एक मीठी, सड़ी हुई बदबू आ रही थी।

शांता के हाथ में कैंची, साफ पट्टियां और छोटी कटर मशीन थी।

“इसे अभी खोलना होगा।”

“अगर हड्डी बिगड़ गई तो?”

“अगर देर हुई, तो शायद हाथ ही न बचे।”

तभी रिया दरवाजे पर आ खड़ी हुई।

“ये सब क्या तमाशा है?”

“प्लास्टर खोल रहे हैं,” शांता बोलीं।

रिया का चेहरा पहली बार बिगड़ा।

“कोई इसे हाथ नहीं लगाएगा!”

विक्रम ने उसे देखा। पहली बार उसे रिया की आंखों में आरव के लिए डर नहीं दिखा। वहां कोई और डर था।

पकड़े जाने का डर।

“रिया,” विक्रम ने धीमे कहा, “तुम इतना क्यों डर रही हो?”

आरव अचानक कराह उठा।

“पापा… फिर से काट रहा है…”

कटर मशीन चली। कमरे में तीखी आवाज भर गई। आरव चीखा। विक्रम ने उसके कंधे थाम लिए।

“मैं यहीं हूं, बेटा।”

आरव ने आंसुओं से भरी आंखों से उसे देखा।

“कल भी यहीं थे… फिर भी बांध दिया था।”

विक्रम अंदर तक टूट गया।

प्लास्टर चटककर खुला।

पहले बदबू निकली।

फिर गीली, भूरी, चिपचिपी पट्टी।

और फिर आरव की जली हुई लाल त्वचा के बीच से दर्जनों लाल चींटियां बाहर भागने लगीं।

विक्रम की सांस रुक गई।

उसका बेटा सच कह रहा था।

लेकिन सबसे भयानक चींटियां नहीं थीं।

सबसे भयानक रिया का चेहरा था।

वह हैरान नहीं थी।

वह गुस्से में थी कि प्लास्टर इतनी जल्दी खुल गया।

PART 2

“एम्बुलेंस बुलाइए!” शांता चिल्लाईं, और उसी पल आरव अपने पिता की बांहों में बेहोश हो गया।

विक्रम को लगा जैसे किसी ने उसके सीने से दिल निकाल लिया हो। वह अपने बेटे की सूजी हुई त्वचा, काटने के निशान और प्लास्टर की गीली पट्टी को देखता रहा। 4 रातों तक आरव मदद मांगता रहा था। और वह उसे कमजोर, जिद्दी, मां की मौत से टूटा हुआ बच्चा समझता रहा।

रिया पीछे हट गई।

“ये कैसे हो सकता है?”

उसकी आवाज में सदमा कम, चिढ़ ज्यादा थी।

अस्पताल में डॉक्टरों ने आरव को तुरंत उपचार कक्ष में ले लिया। खून की जांच, संक्रमण की सफाई, नई पट्टियां, दर्द की दवा। विक्रम बाहर दीवार से टिककर खड़ा था, जैसे पैरों में जान नहीं बची।

कुछ देर बाद डॉक्टर बाहर आईं।

“संक्रमण बढ़ रहा था, पर समय पर खोल दिया गया। देर होती, तो स्थायी नुकसान हो सकता था।”

शांता ने आंखें बंद कर भगवान का नाम लिया।

डॉक्टर ने आगे कहा, “प्लास्टर के अंदर मीठा चिपचिपा पदार्थ मिला है। शहद या गाढ़ी चाशनी जैसा। चींटियां अपने आप अंदर नहीं गईं।”

प्रतीक्षा-कक्ष जम गया।

रिया तुरंत बोली, “ये नामुमकिन है।”

डॉक्टर ने पूछा, “आप कौन हैं?”

“सौतेली मां।”

डॉक्टर की आंखें सख्त हो गईं।

“हम पुलिस और बाल संरक्षण समिति को सूचना दे चुके हैं।”

विक्रम ने रिया की ओर देखा। अचानक उसे वे 6 मिनट याद आए, जब क्लिनिक में प्लास्टर लगने के बाद वह बिजनेस कॉल उठाने बाहर गया था। लौटकर आया तो रिया आरव के पास खड़ी थी। उसके हाथ में छोटा सा पर्स था। आरव तब भी अजीब तरह से चुप था।

“तुमने उसके प्लास्टर को छुआ था?” विक्रम ने पूछा।

रिया हंसी, पर हंसी सूखी थी।

“तुम पागल हो गए हो।”

“जवाब दो।”

वह पास झुकी।

“तुम डर गए हो। इसलिए किसी को दोष देना चाहते हो।”

विक्रम की आंखें भर आईं।

“मैंने पहले ही अपने बेटे को दोष दे दिया था। अब सच बोलो।”

उसी पल रिया का चेहरा एक सेकंड को कांपा।

और वही सेकंड सब बता गया।

सुबह तक रिया घर से गायब थी।

लेकिन शांता ने अस्पताल आने से पहले प्लास्टर के टुकड़े, पट्टियां और मरी चींटियां सीलबंद थैलियों में रखकर फ्रीजर में छिपा दी थीं।

“अमीर लोग समझते हैं,” उन्होंने पुलिस से कहा, “काम करने वाली औरतें सिर्फ झाड़ू लगाती हैं। हम सच भी बचा सकती हैं।”

PART 3

रिया को 11 दिन बाद जयपुर के एक गेस्ट हाउस से पकड़ा गया। वह नकली नाम से रुकी थी, उसके बैग में नकद पैसे, नंदिता के पुराने सोने के कंगन और आरव के जन्म प्रमाणपत्र की कॉपी मिली।

उस कॉपी ने जांच की दिशा बदल दी।

पुलिस को पहले लगा था कि यह सिर्फ क्रूरता थी। बाद में पता चला, यह योजना थी। रिया चाहती थी कि आरव को मानसिक रूप से अस्थिर साबित किया जाए। वह चाहती थी कि विक्रम को यकीन हो जाए कि बच्चा खतरनाक है, खुद को नुकसान पहुंचा सकता है, और उसे किसी बोर्डिंग स्कूल या रिश्तेदारों के पास भेज देना चाहिए।

आरव चला जाता, तो बंगला रिया का होता। विक्रम पूरी तरह उसके नियंत्रण में होता। और नंदिता की बची हुई निशानियां, आरव समेत, घर से मिट जातीं।

लेकिन लालच से भी गहरा कुछ था।

नफरत।

रिया आरव से इसलिए नफरत करती थी क्योंकि वह नंदिता की चलती-फिरती याद था। उसकी आंखें मां जैसी थीं। पूजा में बैठने का ढंग मां जैसा था। जब वह हंसता था, तो विक्रम अनायास मुस्कुरा देता था। रिया उस मुस्कान से जलती थी, क्योंकि वह जानती थी, वह विक्रम की दूसरी पत्नी हो सकती है, पहली धड़कन नहीं।

शुरुआत छोटी चीजों से हुई थी।

आरव का पसंदीदा खिलौना टूट गया।

नंदिता की साड़ी से बना कुशन गायब हो गया।

मां की तस्वीर का शीशा दरक गया।

फिर फुसफुसाहटें शुरू हुईं।

“तुम्हारे पापा तुम्हारी वजह से दुखी हैं।”

“अगर तुम्हारी मां होती, तो तुम्हें इतना रोता देखकर शर्म आती।”

“एक दिन तुम्हें हॉस्टल भेज देंगे, फिर देखना।”

आरव चुप होने लगा। खाना कम करने लगा। स्कूल से लौटकर सीधे कमरे में चला जाता। वह शांता से पूछता, “दीदी मां, अगर मैं अच्छा बच्चा बन जाऊं, तो पापा मुझे छोड़ेंगे नहीं ना?”

शांता कई बार विक्रम से बोलीं। मगर रिया ने पहले ही उसके कान भर दिए थे।

“शांता बच्चे को मेरे खिलाफ कर रही है।”

“यह पुरानी नौकरानी है, इसे नई बहू पसंद नहीं।”

“आरव को मां की मौत से बाहर आना होगा, नहीं तो वह बीमार हो जाएगा।”

विक्रम सुनता गया। समझता नहीं गया।

जब आरव का हाथ टूटा, रिया को मौका दिखा। प्लास्टर एक बंद कमरा था, जिसमें वह दर्द छिपा सकती थी। ऐसा दर्द जिसे बच्चा बताए तो पागल लगे। ऐसा अत्याचार जिसका कोई गवाह न हो।

फॉरेंसिक जांच में प्लास्टर की अंदरूनी पट्टी पर शहद के कण मिले। वही दुर्लभ पहाड़ी शहद जो रिया महंगे ऑर्गेनिक स्टोर से खरीदती थी। उसके बाथरूम की अलमारी में एक छोटी कांच की शीशी मिली, बहुत धुली हुई, पर किनारे पर चिपचिपा अंश बचा था।

फिर उसकी टैबलेट खुली।

खोजें देखकर विक्रम कुर्सी पर बैठ गया।

“प्लास्टर में चींटियां कैसे जा सकती हैं”

“बच्चे को भावनात्मक रूप से अस्थिर कैसे साबित करें”

“काटने से त्वचा संक्रमण कितने दिन में होता है”

“सौतेले बच्चे को घर से कानूनी रूप से कैसे हटाएं”

विक्रम ने अपना चेहरा दोनों हाथों में छिपा लिया। उसे लगा, वह सिर्फ पति के रूप में धोखा नहीं खाया था। वह पिता के रूप में सो गया था, और उसके बच्चे पर हमला होता रहा।

मुकदमा दिल्ली की विशेष बाल अदालत में चला। मीडिया ने बंगले के बाहर कैमरे लगा दिए। समाज के लोग फुसफुसाने लगे। वही लोग, जो शादी में रिया की तारीफ कर रहे थे कि “कितनी सुसंस्कृत लड़की है”, अब पूछ रहे थे, “कोई मां ऐसा कैसे कर सकती है?”

लेकिन शांता ने कहा, “हर औरत मां नहीं होती। और हर मां पेट से नहीं होती।”

अदालत में रिया हल्के क्रीम रंग की साड़ी, मोतियों की माला और शांत चेहरे के साथ आई। जैसे वह किसी चैरिटी कार्यक्रम में बैठी हो। उसके वकील ने कहा कि आरव दुखी बच्चा था। उसने खुद कुछ मीठा गिराया होगा। शायद उसने प्लास्टर में कुछ डालने की कोशिश की होगी। शायद वह ध्यान चाहता था।

विक्रम की मुट्ठियां भींच गईं।

लेकिन न्यायाधीश ने शांत स्वर में कहा, “10 साल का बच्चा अपने ही प्लास्टर में चींटियां पालकर अपना हाथ क्यों खराब करेगा?”

फिर शांता गवाही के लिए खड़ी हुईं।

वह महंगे कपड़े नहीं पहनी थीं। साधारण सूती साड़ी, माथे पर हल्की सी बिंदी, और हाथों में वर्षों की मेहनत की रेखाएं। लेकिन उनकी आवाज में वह ताकत थी, जो सच में होती है।

उन्होंने बताया कि कैसे आरव रात में रोते-रोते उनका पल्लू पकड़ लेता था। कैसे वह कहता था, “दीदी मां, पापा को बुला दो।” कैसे रिया रात को कमरे के बाहर घूमती थी। कैसे एक बार उन्होंने रिया के हाथ में छोटी शीशी देखी थी और पूछने पर उसने कहा था, “क्रीम है, बच्चों की त्वचा के लिए।”

“आपने पहले पुलिस को क्यों नहीं बताया?” वकील ने पूछा।

शांता ने विक्रम की ओर देखा।

“क्योंकि घर का मालिक अपनी पत्नी की आंखों में देखता था, बच्चे की चीख में नहीं।”

अदालत में सन्नाटा फैल गया।

विक्रम का सिर झुक गया।

फिर सीसीटीवी फुटेज चलाया गया। क्लिनिक के गलियारे का वीडियो। डॉक्टर बाहर गया। विक्रम फोन पर चला गया। रिया पर्दे के पीछे आरव के पास झुकी। उसके हाथ में छोटा पर्स था। 6 मिनट तक वह वहीं रही।

दूसरा वीडियो बंगले के गलियारे का था। रात 12:43। रिया दस्ताने पहने आरव के कमरे में घुसी। हाथ में शीशी। 9 मिनट बाद बाहर निकली। उसके चेहरे पर कोई घबराहट नहीं थी।

फिर शांता की रिकॉर्डिंग चली। उन्होंने पहली रात आरव की आवाज रिकॉर्ड कर ली थी, क्योंकि उन्हें डर था कि कोई उस पर विश्वास नहीं करेगा।

रिकॉर्डिंग में आरव की टूटी हुई आवाज गूंजी।

“दीदी मां, पापा को बोलो ना। अंदर कुछ काट रहा है। मैं बुरा बच्चा नहीं हूं।”

फिर दूर से विक्रम की आवाज आई।

“बस करो, आरव। झूठ मत बोलो।”

विक्रम ने आंखें बंद कर लीं।

कुछ आवाजें उम्र भर पीछा करती हैं।

रिया ने फैसला सुनाए जाने से पहले समझौता करने की कोशिश की। उसने बयान बदलना चाहा। कहा, “मैं तनाव में थी।” फिर कहा, “मैंने सिर्फ थोड़ा शहद लगाया था, नुकसान का इरादा नहीं था।” फिर रोकर बोली, “मैं उस बच्चे से प्यार करना चाहती थी, पर वह मुझे मां नहीं मानता था।”

न्यायाधीश ने ठंडी आवाज में कहा, “मां कहलाने के लिए बच्चे से नाम नहीं, सुरक्षा चाहिए।”

रिया को बाल अत्याचार, जानबूझकर चोट पहुंचाने, सबूत मिटाने और मानसिक प्रताड़ना के आरोपों में 24 साल की सजा हुई। उसकी संपत्ति जब्त नहीं हुई, पर नंदिता के जेवर विक्रम को लौटाए गए। अदालत ने आदेश दिया कि रिया जीवन भर आरव से संपर्क नहीं करेगी।

फैसले के बाद उसने विक्रम की ओर देखा।

“मैं तुमसे प्यार करती थी।”

विक्रम ने बहुत देर बाद जवाब दिया।

“नहीं। तुम जीतना चाहती थीं। प्यार कभी बच्चे को हथियार नहीं बनाता।”

आरव धीरे-धीरे ठीक हुआ। उसका हाथ बच गया, लेकिन निशान रह गए। डॉक्टर ने कहा, नसें सुरक्षित हैं, पर महीनों तक फिजियोथेरेपी करनी होगी। वह उंगलियां मोड़ता तो दर्द होता। रात को अचानक जाग जाता। कई बार पूछता, “दरवाजा बंद है ना?”

विक्रम हर बार उठकर दिखाता।

“हां, बेटा। बंद है। चाबी तुम्हारे पास है।”

उन्होंने वसंत कुंज वाला बंगला बेच दिया। वह घर बहुत बड़ा था, पर उसमें भरोसा मर चुका था। विक्रम ने नोएडा के शांत सेक्टर में छोटा घर लिया। बड़ा आंगन नहीं था, लेकिन खिड़कियां धूप से भरी थीं। आरव ने अपने कमरे की दीवार नीली चुनी। शांता ने कहा, “नीला अच्छा है, नजर भी नहीं लगती।”

पहली रात आरव ने पूछा, “क्या शांता दीदी यहीं रहेंगी?”

विक्रम ने तुरंत कहा, “जब तक वह खुद चाहें।”

शांता ने आंखें तरेरीं।

“मैं कहीं नहीं जा रही। इस घर को अभी भी पहरेदार चाहिए।”

थेरेपी शुरू हुई। आरव बोलना सीख रहा था। दर्द के बारे में। डर के बारे में। उस रात के बारे में जब पिता ने उसका हाथ बांधा था।

विक्रम भी हर सत्र में बैठता। वह सफाई नहीं देता। यह नहीं कहता कि वह थका था, भ्रमित था, धोखा खा गया था। वह सिर्फ सुनता।

एक दिन आरव ने कहा, “मैं जोर से इसलिए चिल्ला रहा था, क्योंकि मुझे लगा अगर ज्यादा जोर से चिल्लाऊंगा तो पापा वापस आ जाएंगे।”

विक्रम रो पड़ा।

आरव ने उसे नहीं संभाला।

और यह ठीक था।

माफी कोई मिठाई नहीं, जो मांगते ही मिल जाए। माफी खेत है। रोज जोतना पड़ता है। रोज पानी देना पड़ता है। फिर भी फसल आएगी या नहीं, यह जख्मी दिल तय करता है।

विक्रम ने इंतजार किया। हर दिन। बिना हक जताए।

वह आरव को स्कूल छोड़ता। फिजियोथेरेपी ले जाता। रात को कहानी पढ़ता। जब आरव कहता, “आज अकेले सोना है,” तो वह दरवाजे के बाहर बैठ जाता। जब आरव कहता, “मत बैठो,” तो वह अपने कमरे में चला जाता। उसने पहली बार सीखा कि बच्चे की सुरक्षा का मतलब उसे पकड़कर रखना नहीं, उसे अपने डर पर अधिकार देना है।

धीरे-धीरे आरव की हंसी लौटी। पहले छोटी। फिर खुली। उसने तबला सीखना शुरू किया ताकि उंगलियां मजबूत हों। बाद में उसने एक आवारा पिल्ला अपनाया, जिसका नाम उसने “लड्डू” रखा। लड्डू घर में इतना शोर करता कि शांता कहतीं, “इससे तो चींटियां भी डरकर भाग जाएं।”

कई साल बीते।

आरव 18 साल का हुआ। स्कूल के विदाई समारोह में उसे मंच पर बुलाया गया। वह लंबा हो चुका था। दाहिने हाथ पर हल्का निशान था, जिसे वह अब छिपाता नहीं था। सामने विक्रम बैठे थे। बगल में शांता, जिनकी आंखें पहले से ही भीगी थीं।

आरव ने माइक पकड़ा।

“जब मैं 10 साल का था,” उसने कहा, “मैंने कई रातें यह सोचकर काटीं कि शायद मेरा दर्द झूठ है, क्योंकि बड़े लोग उसे सच नहीं मान रहे थे। लेकिन एक इंसान था जिसने सबूत से पहले मेरी चीख सुनी। मेरी शांता दीदी ने मेरी जान बचाई।”

पूरा हॉल तालियों से भर गया। शांता ने पल्लू से चेहरा ढक लिया।

आरव ने आगे कहा, “मेरे पापा ने भी मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा घाव दिया। उन्होंने मुझ पर विश्वास नहीं किया। लेकिन बाद में उन्होंने एक कठिन काम किया। उन्होंने गलती मान ली। बहाना नहीं बनाया। और इतने साल रुके, जब तक मैं फिर से उन्हें पिता कह सकूं।”

विक्रम सांस लेना भूल गया।

कार्यक्रम के बाद आरव मंच से उतरा। वह विक्रम के सामने रुका। कुछ पल दोनों के बीच वही पुरानी रात खड़ी रही। फिर आरव ने हाथ बढ़ाया।

विक्रम ने कांपते हुए उसे पकड़ा।

आरव ने धीरे से कहा, “अब दर्द नहीं है, पापा।”

विक्रम की आंखों से आंसू बह निकले।

“मुझे पता है,” आरव बोला। “निशान है। पर दर्द नहीं।”

उस रात वे किसी महंगे होटल में नहीं गए। सड़क किनारे छोटे से ढाबे में बैठे। गरम पराठे, दही, अचार और शांता की शिकायत कि चाय में अदरक कम है। लड्डू कार में बैठा भौंक रहा था।

आरव ने गिलास उठाया।

“शांता दीदी के नाम।”

“शांता दीदी के नाम,” विक्रम ने कहा।

शांता ने नाराज होने का नाटक किया।

“बस करो, मुझे रुलाओगे क्या?”

फिर आरव ने पिता की ओर देखा।

“और आपके नाम भी।”

विक्रम ने सिर झुका लिया। यह क्षमा नहीं थी। यह उससे भी बड़ी चीज थी।

यह भरोसे की पहली लौटती हुई धड़कन थी।

रिया ने एक बच्चे के दर्द को पागलपन साबित करने की कोशिश की थी। उसने पिता के प्यार को शक में बदलना चाहा था। उसने सच को प्लास्टर, पट्टियों, शहद और चींटियों के नीचे दबा दिया था।

लेकिन सच भी बच्चे की चीख जैसा होता है।

पहले लोग उसे अनदेखा कर सकते हैं।

फिर वह कांपता है।

फिर टूटता है।

और एक दिन, वह इतने जोर से बाहर आता है कि झूठ बोलने वाले अपनी ही चुप्पी में कैद हो जाते हैं।

Disclaimer: This story is a work of fiction created for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.