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शादी के रजिस्टर पर साइन करते समय बूढ़े कुत्ते ने दुल्हन का लहंगा खींचा, सबने उसे पागल कहा, लेकिन बाद में सच निकला—“वह मुझे बचा रहा था”, क्योंकि दूल्हे ने उसकी मौत की तारीख खामोशी से चुन ली थी

PART 1

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शादी के रजिस्टर पर हस्ताक्षर करने से ठीक पहले, पुराने कुत्ते ने दुल्हन का लहंगा दांतों से पकड़ लिया और उसे मेज से पीछे खींचने लगा।

साकेत के मैरिज रजिस्ट्रार ऑफिस में अचानक ऐसी चीख-पुकार मची कि बाहर खड़े फूलवाले तक अंदर झांकने लगे। अनन्या मल्होत्रा लाल बनारसी लहंगे में कांपती हुई खड़ी थी, उसके माथे की बिंदी पसीने से हल्की तिरछी हो गई थी, और सामने मेज पर शादी का रजिस्टर खुला पड़ा था। बस एक हस्ताक्षर बाकी था, जिसके बाद वह राघव बंसल की पत्नी कहलाने वाली थी।

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लेकिन शेरू, उसका 13 साल का बूढ़ा लैब्राडोर, जैसे पागल नहीं बल्कि आखिरी चेतावनी बन गया था। उसकी सफेद पड़ चुकी थूथन कांप रही थी, पंजे फिसल रहे थे, पर उसने अनन्या के लहंगे का किनारा नहीं छोड़ा। वह अनन्या पर नहीं गुर्रा रहा था। उसकी भीगी हुई आंखें सिर्फ राघव पर टिकी थीं।

—यह कुत्ता पागल नहीं हुआ है, यह दीदी को बचा रहा है!

मीरा की आवाज कमरे की दीवारों से टकराई। अनन्या की छोटी बहन मीरा भीड़ को धक्का देती हुई आगे आई, आंखों में आंसू और गुस्सा दोनों थे।

सुनीता मल्होत्रा, अनन्या की मां, शर्म से लाल हो गईं।

—इस कुत्ते को बाहर निकालो! सारे रिश्तेदारों के सामने हमारी नाक कटवा दी इसने!

80 मेहमानों के बीच फुसफुसाहट फैल गई। कोई बोला यह अपशकुन है, कोई बोला बूढ़े कुत्ते का दिमाग खराब हो गया है। राघव, क्रीम शेरवानी में बिल्कुल शांत खड़ा था। वही राघव जो पिछले 1 साल से सबको आदर्श दामाद लगता था। रविवार को मिठाई लेकर आता, सुनीता को “मम्मीजी” कहता, प्रकाश मल्होत्रा के पैरों को छूता, और अनन्या से कहता कि शादी के बाद वे गुरुग्राम में नया पेंटहाउस लेंगे।

उसकी मुस्कान इतनी सभ्य थी कि हर कोई उस पर यकीन करना चाहता था।

पर उस क्षण अनन्या ने कुछ देखा। राघव ने शेरू को देखा, और उसके चेहरे से सारी मिठास उतर गई। बस 1 पल के लिए। ठंडी, खतरनाक, असली नजर।

फिर वह झुककर धीरे से बोला—

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—शेरू, छोड़ दे।

आवाज इतनी धीमी थी कि उसमें प्यार नहीं, आदेश था।

शेरू और जोर से गुर्राया।

2 चचेरे भाइयों ने शेरू का कॉलर पकड़ा। बूढ़ा शरीर कांप रहा था, पर वह ऐसे लड़ रहा था जैसे अनन्या किसी अंधे कुएं के किनारे खड़ी हो। उसका पंजा फर्श पर घिसा, लहंगे का किनारा फट गया, और अनन्या लड़खड़ाकर मेज से टकराई। पेन नीचे गिरा। रजिस्ट्रार घबरा गया।

—समारोह अभी रोकना पड़ेगा।

घर लौटने तक मामला पूरी कॉलोनी में फैल चुका था। ग्रेटर कैलाश वाले मल्होत्रा हाउस में रात तक रिश्तेदार बैठे रहे। मिठाइयां खुली की खुली पड़ी थीं। सुनीता रो रही थीं।

—इस जानवर को हमने बहुत सिर चढ़ा दिया। 13 साल का हो गया है, अब इसे रखना खतरा है।

राघव ने तुरंत उनका हाथ थाम लिया।

—मम्मीजी, ऐसा मत कहिए। शेरू बूढ़ा है। भीड़ देखकर डर गया होगा। मेरी वजह से किसी को उसे सजा देने की जरूरत नहीं।

सबने उसे देवता की तरह देखा। जिस आदमी की शादी कुत्ते ने बिगाड़ दी, वही कुत्ते को बचाने की बात कर रहा था।

सिर्फ मीरा चुप नहीं रही।

—उसने किसी पर नहीं, सिर्फ तुम पर गुर्राया था।

कमरे में अचानक सन्नाटा भर गया।

राघव ने दुखी मुस्कान ओढ़ ली।

—मीरा मुझे कभी स्वीकार नहीं कर पाई। बहन को खोने का डर है उसे, मैं समझता हूं।

एक ही वाक्य में उसने मीरा को जलनखोर बना दिया।

उस रात शेरू अनन्या के कमरे के बाहर सोया। उसने खाना नहीं खाया। आंखें खुली रहीं। जैसे वह पहरा दे रहा हो।

सुबह उसकी कटोरी भरी थी।

पर शेरू गायब था।

अनन्या ने घर का हर कोना छान मारा। लॉन, सर्वेंट रूम, छत, गाड़ी की पार्किंग। फिर उसने राघव को बालकनी में चाय पीते देखा।

—शेरू कहां है?

राघव ने लंबी सांस ली।

—मैं उसे रात में एक फार्महाउस भेज आया। सोहना के पास मेरे दोस्त की जगह है। वहां खुली जमीन है। तुम्हारी मां तो उसे वेट के पास ले जाने की बात कर रही थीं। मैंने उसे बचाया है।

अनन्या जम गई।

—मुझसे पूछे बिना?

—तुम सदमे में थीं। मैंने वही किया जो सबके लिए सही था।

शब्द प्यार जैसे थे, मगर उनकी गंध धोखे जैसी थी।

2 दिन बाद अनन्या ने रजिस्ट्रार ऑफिस की छोटी सी साइड रूम में शादी के कागज पर हस्ताक्षर कर दिए। कोई ढोल नहीं, कोई फूलों की बारिश नहीं, कोई शेरू नहीं। राघव ने उसके हाथ पर हाथ रखा और मुस्कुराया।

—आखिरकार, मिसेज बंसल।

अनन्या ने कैमरे के लिए मुस्कुराया।

लेकिन उसके सीने के भीतर कुछ अब भी दरवाजा खरोंच रहा था।

PART 2

गोवा का हनीमून तस्वीरों में परफेक्ट दिखता था, मगर हर रात राघव बालकनी में जाकर किसी से फुसफुसाता था।

एक रात अनन्या ने साफ सुना—

—नहीं, उसे कुछ पता नहीं चला।

अगले दिन राघव ने बिना पूछे जवाब दे दिया।

—दुबई के इन्वेस्टर्स हैं। टाइम जोन की वजह से देर रात कॉल करते हैं।

हमेशा जवाब। हमेशा सभ्य। हमेशा भरोसे जैसा झूठ।

दोपहर में जब राघव नहा रहा था, अनन्या ने कांपते हाथों से उसका केबिन बैग खोला। कपड़ों के नीचे एक मोटी सिलाई दिखी। उसने धागा खींचा। नकली तह खुल गई।

अंदर पासपोर्ट था।

फोटो राघव की थी।

नाम था—आरव मेहरा।

जन्मतिथि अलग।

पता अलग।

अनन्या के हाथ सुन्न हो गए। जिस आदमी से उसने शादी की थी, शायद वह आदमी था ही नहीं।

दिल्ली लौटकर वह सीधे मीरा के कमरे में गई। फोन पर पासपोर्ट की तस्वीर देखते ही मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया।

—मैंने उसकी कंपनी देखी है, दीदी। बंसल कैपिटल रियल्टी 8 महीने पहले बनी है। ऑफिस सिर्फ वर्चुअल एड्रेस है। कोई स्टाफ नहीं।

फिर मीरा ने धीमे से कहा—

—और शादी में आए उसके मां-बाप असली नहीं थे। दोनों जूनियर आर्टिस्ट हैं।

तभी अनन्या के फोन पर अनजान नंबर चमका।

एक औरत की आवाज आई—

—अगर तुम राघव बंसल की पत्नी हो, तो भाग जाओ। जब मैं उसे जानती थी, उसका नाम आरव मेहरा था। और हर बार किसी औरत के मरने से पहले, घर का पालतू जानवर गायब कर दिया जाता था।

PART 3

अनन्या ने फोन पकड़े-पकड़े दीवार का सहारा लिया। कमरे में रखी पूजा की छोटी सी घंटी हवा से हल्की बज रही थी, लेकिन उसकी आवाज भी उस औरत के शब्दों के आगे डरावनी लग रही थी।

—आप कौन हैं? अनन्या ने फुसफुसाकर पूछा।

—काव्या। बस इतना ही। मैं नोएडा में रहती थी। उसने मुझसे सगाई की थी। पहले मेरे दोस्तों को दूर किया, फिर मेरी मां को यकीन दिलाया कि मैं मानसिक रूप से कमजोर हूं। फिर मेरे फ्लैट के कागज पर साइन करवाए। जब मैंने शक किया, मेरी बिल्ली गायब हो गई। 3 हफ्ते बाद मेरी दवा में कुछ मिलाया गया। मैं बच गई क्योंकि पड़ोसी ने एम्बुलेंस बुला ली।

लाइन कट गई।

मीरा ने तुरंत फोन अपने हाथ में ले लिया।

—अब रोना नहीं। अब सबूत चाहिए।

मीरा ने अपने पिता प्रकाश के पुराने दोस्त इंस्पेक्टर रिटायर्ड देवेंद्र राणा से संपर्क किया। राणा अब निजी जांचकर्ता थे, लेकिन उनकी आंखों में वही कठोर शांति थी जो पुलिसवालों में लंबे अनुभव के बाद आती है। वह लोधी रोड के एक शांत कैफे में अनन्या और मीरा से मिले। उन्होंने पासपोर्ट की फोटो देखी, कंपनी के दस्तावेज देखे, शादी के वीडियो में शेरू का व्यवहार देखा।

फिर बोले—

—उस दिन उस कमरे में अगर कोई सचमुच समझदार था, तो वह तुम्हारा कुत्ता था।

अनन्या का गला भर आया।

राणा ने स्पष्ट नियम रखा।

—तुम राघव से कुछ नहीं पूछोगी। मुस्कुराओगी, साथ रहोगी, भरोसा दिखाओगी। ऐसे आदमी सीधे हमला नहीं करते। पहले तुम्हें अकेला करते हैं, फिर कागजों पर कब्जा करते हैं, फिर मौत को बीमारी बना देते हैं।

उस रात अनन्या घर लौटी तो राघव ने उसके लिए पनीर टिक्का मंगवाया था। उसने उसके माथे को चूमा।

—तुम बहुत चुप हो गई हो। मीरा फिर कुछ भर रही है तुम्हारे कान में?

अनन्या ने अपनी सांस रोकी और झूठ बोला—

—नहीं। बस शेरू याद आ रहा है।

राघव ने 1 पल को आंखें सिकोड़ दीं, फिर नरम आवाज बनाई।

—बेबी, वह खुश होगा। फार्महाउस में दौड़ रहा होगा।

अनन्या ने सिर हिलाया। अंदर से उसे उल्टी जैसी हुई।

अगले ही हफ्ते राघव ने पहला बड़ा कदम उठाया। उसने रात के खाने के बाद एक फाइल अनन्या के सामने रखी। सुनीता और प्रकाश भी बैठे थे। राघव ने इतना प्यारा माहौल बनाया था कि किसी को शक हो ही नहीं सकता था।

—गुड़गांव में एक जबरदस्त निवेश है। टैक्स भी बचेगा और भविष्य सुरक्षित होगा। बस तुम्हारे वसंत कुंज वाले फ्लैट की पावर ऑफ अटॉर्नी मेरे नाम करनी होगी। मैं सब संभाल लूंगा।

वसंत कुंज वाला फ्लैट अनन्या को उसकी नानी ने दिया था। छोटा था, मगर उसमें नानी की पूरी जिंदगी की बचत थी। सुनीता ने तुरंत कहा—

—पति-पत्नी में इतना शक कैसा? राघव इतना समझदार है।

मीरा ने टेबल के नीचे अनन्या का पैर दबाया।

अनन्या ने पेन उठाया।

—तुम कह रहे हो तो ठीक होगा।

राघव मुस्कुराया। इस बार वह दामाद वाली मुस्कान नहीं थी। वह जीत की मुस्कान थी।

उसे नहीं पता था कि फाइल की हर पेज की कॉपी पहले ही राणा के पास जा चुकी थी। उसे यह भी नहीं पता था कि पेन में छोटा रिकॉर्डर लगा था, और कमरे के कोने में रखी मीरा की किताबों वाली शेल्फ में कैमरा छिपा था।

लेकिन असली वार 2 दिन बाद हुआ।

राणा ने मीरा को फोन किया—

—अनन्या को लेकर तुरंत मेरे ऑफिस आओ। अकेली मत आना।

डिफेंस कॉलोनी के छोटे ऑफिस में राणा ने मेज पर एक बिल रखा। पशु चिकित्सालय, छतरपुर।

नाम: शेरू।

अनुरोधकर्ता: राघव बंसल।

कारण: आक्रामक व्यवहार के कारण शांतिपूर्ण मृत्यु।

तारीख: वही सुबह, जब शादी पहली बार रुकी थी।

अनन्या ने कागज को देखा। फिर दोबारा देखा। अक्षर तैरने लगे।

—नहीं…

मीरा ने मुंह पर हाथ रख लिया।

राणा की आवाज भारी थी।

—उसने खुद को मालिक बताया। कहा कि कुत्ते ने दुल्हन को काटने की कोशिश की। वेटरी डॉक्टर नया था। कैश लिया गया। कोई सवाल नहीं पूछा गया।

अनन्या की आंखों से आंसू नहीं निकले। शायद दुख इतना बड़ा था कि आंसुओं को रास्ता ही नहीं मिला। उसके भीतर जैसे कोई शीशा टूटकर हमेशा के लिए जम गया।

शेरू फार्महाउस में नहीं था।

वह खुले मैदान में नहीं दौड़ रहा था।

वह मर चुका था।

क्योंकि उसने उस आदमी को पहचान लिया था, जिसे इंसान पहचान नहीं पाए।

अनन्या ने बिल को दोनों हाथों से पकड़ा और पहली बार उसकी आवाज पत्थर जैसी हुई।

—अब मैं सिर्फ बचना नहीं चाहती। मैं उसे गिराना चाहती हूं। शेरू के लिए। काव्या के लिए। उन औरतों के लिए जिनकी आवाज कभी सुनी नहीं गई। और अपने लिए, क्योंकि वह मुझे भी खत्म करने वाला था।

राणा ने दूसरा फोल्डर खोला।

—वह तैयारी कर चुका है।

उसमें बीमा कंपनी के कागज थे। अनन्या के नाम पर बड़ी जीवन बीमा पॉलिसी। लाभार्थी: राघव बंसल। साथ में नकली मेडिकल रिपोर्ट, जिसमें दिल की जन्मजात समस्या लिखी थी। रिपोर्ट पर डॉक्टर की मुहर थी, लेकिन राणा ने पता कर लिया था कि वह डॉक्टर 6 महीने पहले विदेश जा चुका था।

—योजना क्या है? मीरा ने पूछा।

राणा ने अनन्या की तरफ देखा।

—हमें उसके मुंह से सच चाहिए।

मौका जल्दी आ गया। प्रकाश मल्होत्रा का 60वां जन्मदिन था। सुनीता ने ग्रेटर कैलाश वाले घर में छोटा पारिवारिक डिनर रखा। वह अब भी सच से भागना चाहती थीं। उन्हें लगता था कि अगर मेज पर चांदी के बर्तन सजा दिए जाएं और मेहमानों को गरमा-गरम गुलाब जामुन मिल जाएं, तो परिवार की दरारें छिप जाएंगी।

राघव महंगी घड़ी पहनकर आया, हाथ में काजू कतली का डिब्बा और चेहरे पर वही आदर्श दामाद वाली चमक। उसने प्रकाश के पैर छुए, सुनीता से रसोई में मदद का अभिनय किया, और मीरा से कहा—

—आज तो लड़ाई नहीं करोगी न, साली साहिबा?

मीरा ने मुस्कुराकर जूस का गिलास उसकी सफेद कुर्ता-जैकेट पर गिरा दिया।

बस 1 पल।

राघव का चेहरा बदल गया। आंखों में ऐसी नफरत आई कि सुनीता ने भी सांस रोक ली। फिर उसने तुरंत मुखौटा पहन लिया।

—कोई बात नहीं। हादसा है।

वह जैकेट उतारकर बाथरूम की ओर गया। उसी दौरान अनन्या ने उसकी जेब से फोन निकाला, राणा का दिया छोटा उपकरण जोड़ा, स्क्रीन पर हरी बत्ती जली, और फोन वापस रख दिया। उसके हाथ बर्फ जैसे थे, लेकिन चेहरा शांत था।

रात में मीरा के कमरे में राणा ने डेटा खोला। उसमें संदेश थे, बैंक अकाउंट, नकली पहचान पत्र, टिकट, बीमा फॉर्म और कई नाम।

काव्या।

रिया, जयपुर।

नंदिता, पुणे।

और अनन्या मल्होत्रा।

उसके नाम के सामने तारीख लिखी थी: 18 दिसंबर।

मीरा रो पड़ी। अनन्या ने स्क्रीन से नजर नहीं हटाई।

एक और चैट थी। महिला का नाम इरा था। वह एक प्राइवेट बैंक में वरिष्ठ अधिकारी थी। वही राघव की प्रेमिका और साथी थी।

राघव का मैसेज था—

“वसंत कुंज साइन हो गया।”

इरा ने जवाब दिया—

“अच्छा। दिसंबर के बाद हम सिंगापुर निकलेंगे।”

फिर एक और मैसेज ने कमरे की हवा जमा दी।

“कुत्ते ने लगभग सब बिगाड़ दिया था। उसे पहले हटा देना चाहिए था।”

अनन्या ने अपने होंठ काट लिए। इस बार आंसू आए, लेकिन वह गुस्से से भरे थे।

राणा ने कहा—

—अब आखिरी जाल लगेगा।

योजना बेहद खतरनाक थी। अनन्या ने राघव को बताया कि वह 3 दिन के लिए मुंबई जा रही है, एक डिजाइन कॉन्फ्रेंस के लिए। राघव उसे एयरपोर्ट छोड़ने गया। रास्ते भर उसने गाने लगाए, उसका हाथ पकड़ा, और कहा—

—मेरी पत्नी अब बड़ी बिजनेसवुमन बनने वाली है।

एयरपोर्ट के अंदर जाकर अनन्या दूसरे गेट से बाहर निकली, जहां मीरा कार में इंतजार कर रही थी। उसी समय राणा की टीम ने अनन्या के अपने घर में, उसकी लिखित अनुमति से, कैमरे और माइक लगा दिए। पुलिस को शुरुआती दस्तावेज मिल चुके थे। बस स्पष्ट बातचीत चाहिए थी।

शाम को राघव ने फोन लगाया।

—आ जाओ। वह मुंबई में है।

1 घंटे बाद इरा घर आई। वह हल्के रंग की साड़ी में थी, हाथ में शैम्पेन की बोतल। स्क्रीन पर, राणा की कार में बैठी अनन्या ने देखा कि इरा ने उसी सोफे पर राघव को चूमा, जिसके नीचे शेरू कभी अपनी गेंद छिपाता था।

वे हंसे। उन्होंने ग्लास भरे। फिर राघव ने अपना असली चेहरा खोल दिया।

—वह अब पूरी तरह मेरे भरोसे है। पावर ऑफ अटॉर्नी साइन, बीमा प्रक्रिया में, मेडिकल रिपोर्ट तैयार। दिसंबर में पहाड़ों पर छोटा सा ट्रिप, फिर अचानक दिल का दौरा। सब लोग कहेंगे, बेचारी की बीमारी छिपी हुई थी।

इरा ने पूछा—

—और उसकी बहन?

राघव हंसा।

—मीरा को सब पागल समझते हैं। मैंने पहले ही परिवार में बीज बो दिया है। अनन्या हमेशा उसी को चुनेगी जो उसे सुरक्षित महसूस कराए। ऐसी औरतें यही करती हैं।

कार में मीरा ने अनन्या का हाथ पकड़ लिया।

राघव ने फिर ग्लास उठाया।

—एक ही गलती हुई थी। वह बूढ़ा कुत्ता। उसने मुझे पहले दिन से पहचान लिया था।

इरा ने कहा—

—जानवर अजीब होते हैं।

राघव मुस्कुराया।

—पर जानवर अदालत में गवाही नहीं देते।

इस बार अनन्या टूटकर रोई नहीं। वह सीधी बैठ गई। उसकी आंखों में वही आग थी जो शायद शेरू की आंखों में उस दिन थी।

12 मिनट बाद दरवाजा टूटा नहीं, बल्कि कानूनी तरीके से खुला। पुलिस अंदर आई। राघव पहले हंसा।

—यह क्या तमाशा है? पति-पत्नी की निजी जिंदगी में घुस आए?

फिर उसने अनन्या को पुलिस के पीछे खड़ा देखा।

उसकी मुस्कान मर गई।

—तुम्हें पता भी है तुम क्या कर रही हो?

अनन्या आगे बढ़ी। उसकी आवाज कांपी नहीं।

—हां। वही कर रही हूं जो शेरू ने रजिस्ट्रार ऑफिस में करने की कोशिश की थी। तुम्हें अपनी जिंदगी से खींचकर बाहर फेंक रही हूं, इससे पहले कि तुम मुझे मार दो।

इरा सबसे पहले टूटी। हिरासत में उसने खातों, नकली नामों, बीमा धोखाधड़ी, डॉक्टरों की झूठी रिपोर्टों और उन पुराने मामलों की जानकारी दे दी जिन्हें परिवारों ने हादसा समझकर दफना दिया था। काव्या ने बयान दिया। जयपुर और पुणे की महिलाओं के परिवार सामने आए। कुछ जख्म इतने पुराने थे कि कानून को भी शर्म आ गई कि वे इतने साल धूल खाते रहे।

सुनीता मल्होत्रा कई रात सो नहीं पाईं। जिस शेरू को उन्होंने अपशकुन कहा था, वही उनकी बेटी का रक्षक निकला। जिस मीरा को उन्होंने जलनखोर कहा था, वही सच के पीछे खड़ी रही। वह एक सुबह अनन्या के सामने बैठीं, बिना साड़ी की पिन ठीक किए, बिना बाल संवारे।

—मैंने उस आदमी को घर में जगह दी। मैंने शेरू पर चिल्लाया। मैंने तुझे गलत समझा।

अनन्या ने लंबी सांस ली।

—मैंने भी उसे माना था, मां। हम सबने उसकी शक्ल देखी। शेरू ने उसका मन देखा।

प्रकाश ने मीरा को पहली बार इतने कसकर गले लगाया जैसे उन्हें अपनी छोटी बेटी का साहस देर से समझ आया हो।

राघव बंसल, जो आरव मेहरा भी था और कम से कम 3 और नामों से जी चुका था, पर धोखाधड़ी, जालसाजी, संपत्ति हथियाने की साजिश, हत्या के प्रयास और पुराने संदिग्ध मामलों में आपराधिक जांच शुरू हुई। उसके खाते सील हुए। उसकी कंपनी गायब हुई। शादी में आए नकली मां-बाप फिर किसी सीरियल में भी नहीं दिखे। उसकी परफेक्ट मुस्कान अदालत के सामने बेकार हो गई।

लेकिन कोई अदालत शेरू को वापस नहीं ला सकी।

कई महीने बाद अनन्या उसी साकेत मैरिज रजिस्ट्रार ऑफिस के बाहर गई। इस बार उसके शरीर पर दुल्हन का लहंगा नहीं था। उसने साधारण सफेद कुर्ता पहना था। हाथ में एक छोटी मिट्टी की डिब्बी थी, जिसे राणा ने छतरपुर के क्लिनिक से बरामद करवाया था।

मीरा उसके साथ थी। सुनीता और प्रकाश कुछ कदम पीछे चुपचाप चले।

ऑफिस के बगल वाले पुराने पीपल के नीचे अनन्या ने खुद मिट्टी खोदी। उसके नाखूनों में धूल भर गई। उसने डिब्बी रखी और एक छोटी सी पट्टिका जमीन में गाड़ दी।

“शेरू। जब सब ताली बजा रहे थे, वह भौंक रहा था।”

अब अनन्या रोई। जोर से नहीं, मगर पूरी आत्मा से। उसने उस दिन के लिए रोया जब उसने शेरू को गलत समझा था। उस रात के लिए रोया जब वह उसके दरवाजे पर पहरा दे रहा था। उस सुबह के लिए रोया जब उसकी कटोरी भरी रह गई थी। उस बूढ़े दिल के लिए रोया जिसने आखिरी सांस तक उसे बचाने की कोशिश की।

—माफ कर देना, शेरू, उसने मिट्टी पर हाथ रखते हुए कहा। तू शुरू से सही था।

हवा से पीपल के पत्ते हिले। एक पत्ता धीरे से पट्टिका पर गिरा, जैसे किसी ने बूढ़े कुत्ते के माथे पर हाथ फेरा हो।

उसी समय रजिस्ट्रार ऑफिस के अंदर किसी और शादी की हंसी सुनाई दी। ढोलक नहीं थी, पर रिश्तेदारों की आवाजें थीं। एक नई दुल्हन लाल दुपट्टे में सीढ़ियां उतर रही थी। अनन्या ने उसे देखा। उसके मन में कड़वाहट नहीं थी। बस एक ऐसी समझ थी, जो दर्द बहुत महंगी कीमत पर देता है।

जिस दिन सबको लगा था कि एक कुत्ते ने उसकी शादी बर्बाद कर दी, असल में उसी दिन उसने उसकी जान बचाई थी।

उसके बाद जब भी अनन्या दिल्ली की किसी सड़क पर सफेद थूथन वाला बूढ़ा कुत्ता देखती, वह सिर्फ जानवर नहीं देखती थी।

वह एक चुप वादा देखती थी।

सच्चा प्यार हमेशा सुंदर शब्दों, महंगे तोहफों और परफेक्ट मुस्कान में नहीं आता।

कभी-कभी वह गुर्राता है।

कभी दुल्हन का लहंगा खींचता है।

कभी पूरे समाज को शर्मिंदा कर देता है।

और कभी बिना सुने मर जाता है, ताकि इंसान उस सच तक पहुंच सके जिसे वह अपनी सुविधा के लिए अनदेखा कर चुका था।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.