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बुखार से तपती 2 साल की बेटी फर्श पर साँसों के लिए तड़प रही थी, मगर पति ने माँ से कहा “यह नाटक कर रही है”; अस्पताल में नर्स ने उसे पहचानते ही ऐसा राज खोला कि पूरा परिवार हिल गया

PART 1

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नैना ने अपनी 2 साल की बेटी मीरा को ड्रॉइंग रूम की ठंडी मार्बल फर्श पर पड़ा पाया, उसका शरीर बुखार से तप रहा था, होंठ नीले पड़ रहे थे, और उसका पति आरव उसे ऐसे देख रहा था जैसे बच्ची कोई बोझ नहीं, कोई चालाक दुश्मन हो।

—उसे वहीं रहने दो, नैना। नाटक कर रही है। उसे पता है कि हल्की-सी खाँसी पर भी तुम पागलों की तरह दौड़ पड़ती हो।

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आरव ने यह बात इतनी ठंडेपन से कही कि कमरे की हवा जम गई। वह गुरुग्राम के सेक्टर 49 वाले उनके अपार्टमेंट की खुली रसोई के पास खड़ा था, हाथ में फोन, चेहरे पर चिढ़ और आँखों में कोई डर नहीं। फर्श पर पड़ी मीरा अपनी छोटी-छोटी साँसों के लिए लड़ रही थी। उसके गले से टूटती हुई आवाजें निकल रही थीं, जैसे हर साँस किसी अदृश्य हाथ से छीनी जा रही हो।

नैना अभी-अभी दक्षिण दिल्ली के एक निजी स्कूल से लौटी थी, जहाँ वह प्राथमिक कक्षा की शिक्षिका थी। उसी सुबह आरव ने बड़ी सहजता से कहा था कि वह घर से काम करेगा और मीरा को संभाल लेगा।

—तुम स्कूल जाओ। हर बार छुट्टी लोगी तो लोग बातें बनाएँगे। मैं हूँ न।

नैना को अजीब लगा था। आरव कभी अपनी बेटी के साथ अकेले रहने को तैयार नहीं होता था। वह हमेशा कहता कि मीटिंग है, क्लाइंट है, फाइल है, कॉल है। वह एक बड़ी फाइनेंस कंपनी में वरिष्ठ सलाहकार था, और उसका फोन उसके अपने घरवालों से ज्यादा जरूरी लगता था।

फिर भी नैना ने भरोसा करना चाहा।

कई महीनों से वह उसी भरोसे के छोटे-छोटे टुकड़े जोड़ रही थी। कभी आरव मीरा को दूध दे देता, कभी उसके लिए खिलौना उठा देता, कभी रात में कह देता कि वह बदलने की कोशिश करेगा। नैना चाहती थी कि उसका पति वही आदमी बना रहे, जिसने शादी के बाद चाँदनी चौक की गलियों में उसका हाथ पकड़ा था, जिसने मीरा के जन्म पर अस्पताल के बाहर रोते हुए कहा था कि उसकी दुनिया पूरी हो गई।

पर अब जब मीरा रोती थी, आरव का चेहरा कस जाता था।

—तुमने इसे बिगाड़ दिया है, वह कहता। 2 साल की बच्ची नहीं, घर की रानी बनाकर रखी है।

पहला निशान मीरा की बाँह पर दिखा था। गोल, गहरा, उँगलियों जैसा। आरव ने कहा था कि वह सेंटर टेबल से टकरा गई। फिर गाल पर खरोंच आई। फिर पसलियों के पास नीला निशान। हर बार कोई न कोई वजह थी। बच्चे गिरते हैं, माँएँ ज्यादा सोचती हैं, परिवार शक से नहीं चलता—नैना खुद को यही समझाती रही।

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लेकिन एक शाम जब वह दवा लेकर जल्दी लौटी, उसने दरवाजे के भीतर से मीरा की घुटी हुई सिसकी सुनी।

—चुप रहेगी या नहीं? आरव गरजा था। तेरी माँ यहाँ देवी बनने नहीं आई है!

नैना ने दरवाजा खोला तो मीरा सोफे और दीवार के बीच सिकुड़ी बैठी थी। आरव उसके सामने खड़ा था, जैसे 2 साल की बच्ची ने उसकी इज्जत लूट ली हो।

नैना ने अगले दिन नीचे वाली शांता आंटी को मीरा के निशान की फोटो दिखाई। शांता आंटी कभी सरकारी अस्पताल में बच्चों की नर्स रही थीं। उन्होंने तस्वीर को बड़ा करके देखा और धीरे से कहा—

—बेटी, यह मेज से लगने का निशान नहीं है। यह किसी की पकड़ है।

नैना का पेट अंदर से मुड़ गया।

—मैं अपना घर शक में तोड़ना नहीं चाहती, आंटी।

शांता आंटी ने उसका हाथ दबाया।

—घर सच देखने से नहीं टूटता। घर तब टूटता है जब बच्चे की चीख को भी आदत समझ लिया जाए।

और फिर वह शुक्रवार आया। स्कूल की बैठक 3:30 बजे रद्द हो गई। नैना ने रास्ते से मीरा के लिए गुलाबी बोतल वाला जूस और छोटे स्टिकर खरीदे। वह सोच रही थी कि घर पहुँचते ही मीरा दौड़कर कहेगी, “मम्मा आई!”

लेकिन दरवाजा खुलते ही घर में अजीब सन्नाटा था।

—मीरा?

ड्रॉइंग रूम में बच्ची फर्श पर पड़ी थी।

नैना ने उसे उठाया तो उसका शरीर ढीला था, माथा जल रहा था, साँस टूट रही थी। उसी समय आरव सीढ़ीनुमा मेजेनाइन से नीचे आया, हाथ में तौलिया, चेहरे पर झुंझलाहट।

—क्या हुआ इसे? नैना चीखी।

—गिरी है। तुम फिर ड्रामा शुरू मत करना।

—इसे साँस नहीं आ रही!

आरव ने आँखें घुमाईं।

—यह तुम्हें बेवकूफ बना रही है।

नैना ने जवाब नहीं दिया। उसने मीरा को अपने दुपट्टे में लपेटा, कार की चाबी उठाई और बाहर भागी। लिफ्ट में मीरा ने आँखें आधी खोलीं।

—मम्मा… दर्द…

नैना की आत्मा टूट गई।

वह उसे लेकर सफदरजंग अस्पताल की बाल आपातकालीन इकाई पहुँची। डॉक्टरों ने तुरंत ऑक्सीजन लगाई, तापमान लिया, एक्स-रे और पेट की जाँच के लिए भेजा। तभी पीछे से आरव आया, गुस्से में, जैसे अस्पताल आना भी उसकी बेइज्जती हो।

—मेरी पत्नी बहुत जल्दी घबरा जाती है, उसने रिसेप्शन पर कहा।

एक नर्स ट्रे लेकर गुजरी और अचानक रुक गई। उसके हाथ काँपे। एक कॉटन पैक नीचे गिर पड़ा।

—आरव? उसने फुसफुसाया। तुमने तो कहा था तुम्हारी शादी टूट चुकी है… और तुम्हारा कोई बच्चा नहीं है।

नैना ने धीरे से सिर घुमाया।

आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

PART 2

नर्स का नाम रिया था। उसके चेहरे पर वह शर्म नहीं थी जो किसी प्रेमिका के पकड़े जाने पर होती है, बल्कि वह डर था जो किसी जाल में फँसी औरत को देर से सच दिखने पर होता है।

—तुम मुझे 6 महीने से झूठ बोल रहे थे? नैना की आवाज काँपी नहीं, जल उठी।

रिया की आँखों से आँसू गिर पड़े।

—उसने कहा था वह अकेला रहता है। उसने कहा था उसकी पत्नी उसे छोड़कर चली गई। उसने कहा था उसे बच्चों से नफरत है क्योंकि बचपन में उसे प्यार नहीं मिला।

काँच के पार मीरा ऑक्सीजन मास्क में पड़ी थी।

नैना ने पूछा—

—मेरी बेटी के बारे में तूने क्या कहा था?

आरव चुप रहा।

रिया ने अपनी कलाई आगे की। वहाँ बैंगनी निशान था, उँगलियों जैसा।

—पिछले हफ्ते मैंने उससे पूछा कि वह शाम के बाद कहाँ गायब हो जाता है। उसने मेरी कलाई पकड़कर कहा कि औरतें प्यार मिलते ही गला घोंटने लगती हैं।

उसी वक्त डॉक्टर मल्होत्रा एक्स-रे लेकर बाहर आए। उनका चेहरा भारी था।

—मिसेज नैना, हमें बात करनी होगी। बच्ची की पसली में दरार है, पेट में सूजन है, और शरीर पर अलग-अलग समय के चोट के निशान हैं। यह एक साधारण गिरावट नहीं है।

आरव ने तुरंत कहा—

—डॉक्टर, बच्ची बहुत जिद्दी है। मैं बस उसे संभाल रहा था।

डॉक्टर ने ठंडी नजर से देखा।

—2 साल की बच्ची को संभालने में पसली नहीं टूटती।

तभी मीरा ने अंदर से कमजोर आवाज में रोते हुए कहा—

—पापा नहीं…

और उस एक वाक्य ने सब कुछ खत्म कर दिया।

PART 3

नैना को लगा जैसे अस्पताल का पूरा गलियारा अचानक बहुत दूर चला गया हो। आवाजें थीं, लोग थे, मशीनों की बीप थी, सफेद रोशनी थी, पर उसके कानों में बस वही 2 शब्द गूँज रहे थे—पापा नहीं।

वह शब्द किसी बच्चे की शिकायत नहीं था। वह डर की जड़ से निकली हुई विनती थी।

बाल रोग विभाग की वरिष्ठ नर्स, कविता मैडम, नैना को एक छोटे काउंसलिंग रूम में ले गईं। कमरे में एक स्टील की कुर्सी, पानी की बोतल और भगवान की छोटी-सी तस्वीर रखी थी। बाहर अस्पताल की भागदौड़ चल रही थी, भीतर नैना की पूरी जिंदगी बैठी काँप रही थी।

कविता मैडम ने नरमी से पूछा—

—क्या आपको पहले कभी शक हुआ था?

नैना ने होंठ दबा लिए। आँखों के सामने सब घूम गया—नीला निशान, बहाने, आरव का गुस्सा, मीरा का किसी पुरुष की आवाज सुनकर माँ की साड़ी पकड़ लेना, रात में डरकर उठ जाना।

—हाँ, उसने कहा। मुझे शक था। लेकिन मैं खुद से ही झूठ बोलती रही।

कविता मैडम ने उसे दोष नहीं दिया। उन्होंने सिर्फ इतना कहा—

—आज से झूठ खत्म। अब बच्ची को बचाना है।

अस्पताल ने तुरंत बाल संरक्षण इकाई को सूचित किया। डॉक्टर मल्होत्रा ने मेडिकल रिपोर्ट तैयार की। रिया ने अलग से बयान देने की बात कही। शांता आंटी को फोन किया गया। वह रोते हुए बोलीं—

—मैंने कई बार ऊपर से बच्ची की चीख सुनी थी। अगर जरूरत पड़ी तो कोर्ट में बोलूँगी।

आरव अब भी गलियारे में अपनी सफाई दे रहा था। कभी कहता वह तनाव में था, कभी कहता नैना मानसिक रूप से अस्थिर है, कभी कहता रिया बदला ले रही है। उसके चेहरे पर चिंता नहीं, नियंत्रण खोने का डर था।

नैना बाहर आई तो वह उसकी ओर बढ़ा।

—देखो, बात बढ़ाने से कुछ नहीं मिलेगा। परिवार की इज्जत भी कोई चीज होती है।

नैना ने पहली बार उसकी आँखों में बिना डर देखा।

—परिवार की इज्जत उस दिन मर गई थी जब तुमने अपनी बेटी को फर्श पर छोड़कर कहा था कि वह नाटक कर रही है।

आरव की आवाज धीमी होकर खतरनाक हो गई।

—तुम मुझे बर्बाद कर दोगी?

—नहीं, नैना ने कहा। तुमने खुद को बर्बाद किया है। मैं सिर्फ मीरा को बचा रही हूँ।

उसने हाथ उठाया, शायद रोकने को, शायद डराने को। पर इस बार अस्पताल के सुरक्षा कर्मचारी पास खड़े थे। उन्होंने उसे पीछे कर दिया। कुछ देर बाद पुलिस आई। आरव को पूछताछ के लिए ले जाया गया। जाते-जाते उसने नैना को ऐसी नजर से देखा जैसे वह अब भी मानता हो कि गलती उसी की है।

नैना ने पहली बार उस नजर से आँखें नहीं झुकाईं।

उस रात वह मीरा के बेड के पास बैठी रही। बच्ची के हाथ में छोटी-सी कैनुला लगी थी। चेहरे पर ऑक्सीजन मास्क था। उसके बाल पसीने से चिपके थे। कभी-कभी वह नींद में काँप जाती और बहुत धीमे कहती—

—मम्मा… मत जाना…

नैना हर बार उसका माथा छूती।

—कहीं नहीं जाऊँगी, मेरी जान। अब कभी नहीं।

सुबह उसकी बड़ी बहन पूजा नोएडा से पहुँची। वह एक बैग में कपड़े, खाना, मीरा का खिलौना हाथी और अपनी आँखों में भरा हुआ गुस्सा लेकर आई थी।

—तू अस्पताल से सीधे मेरे घर चलेगी, पूजा ने कहा। बहस नहीं।

—मैं तुम्हें परेशान नहीं करना चाहती।

पूजा की आँखें भर आईं।

—परेशानी वह आदमी है जिसने तेरी बच्ची को डरना सिखाया। तू नहीं।

अगले 3 दिन अस्पताल, पुलिस स्टेशन, मेडिकल रिपोर्ट और बयान में बीते। नैना को हर बार वही सवालों से गुजरना पड़ा—कब से, कैसे, किसने देखा, पहले क्यों नहीं बताया। हर सवाल उसके भीतर की शर्म को कुरेदता था, पर फिर वह मीरा का चेहरा देखती और जवाब देती।

रिया भी आई। उसने नैना से मिलने की विनती की। नैना के भीतर एक पल के लिए जलन उठी, फिर तुरंत बुझ गई। सामने खड़ी औरत कोई विजयी प्रेमिका नहीं थी। वह भी आरव के झूठ की घायल गवाह थी।

—मैंने सच नहीं जाना, रिया ने रोते हुए कहा। काश मुझे पहले पता होता कि घर में बच्ची है।

नैना ने बहुत धीरे कहा—

—मुझे तुमसे नफरत करनी चाहिए। आसान होता। लेकिन अभी मुझे सच चाहिए।

रिया ने सब बताया। कैसे आरव ने खुद को अकेला बताया था। कैसे वह कहता था कि उसकी जिंदगी में शांति नहीं है। कैसे वह बच्चों की आवाज से चिढ़ता था। कैसे वह बार-बार कहता था कि औरतें माँ बनते ही पति को भूल जाती हैं। रिया ने यह भी बताया कि एक रात नशे में उसने कहा था—

—बच्चे आदमी की जिंदगी खा जाते हैं।

नैना को अचानक समझ आया कि मीरा उसके लिए बेटी नहीं, प्रतिद्वंद्वी बन चुकी थी। एक 2 साल की बच्ची से वह अपनी जगह छिन जाने का हिसाब ले रहा था।

कुछ ही दिनों में मामला महिला अपराध प्रकोष्ठ और बाल संरक्षण विभाग तक पहुँच गया। पूजा की सलाह पर नैना ने अधिवक्ता अनामिका सूद से मुलाकात की। उनका छोटा-सा ऑफिस पटियाला हाउस कोर्ट के पास था। दीवार पर कानून की किताबें, एक कोने में तुलसी का गमला और मेज पर कई फाइलें थीं।

अनामिका ने पूरी बात सुनी। बीच में एक बार भी नहीं टोका।

—मेडिकल रिपोर्ट मजबूत है, उन्होंने कहा। नर्स का बयान भी जरूरी है। लेकिन अगर बार-बार की हिंसा साबित करनी है तो पुराने सबूत चाहिए। फोटो, मैसेज, ऑडियो, पड़ोसी, कैमरा—कुछ भी।

नैना अचानक चुप हो गई।

घर का कैमरा।

मीरा जब चलना सीख रही थी, तब नैना ने ड्रॉइंग रूम में छोटा-सा वाई-फाई कैमरा लगाया था, ताकि वह रसोई से भी उसे देख सके। आरव ने बहुत मजाक उड़ाया था।

—तुम्हें हर चीज पर नजर रखनी है, उसने कहा था। एक दिन बच्ची भी तुमसे डरने लगेगी।

लेकिन कैमरा वहीं शेल्फ पर रखा रह गया था, शोपीस और किताबों के बीच, लगभग छुपा हुआ।

पुलिस की अनुमति से नैना पूजा के साथ अपार्टमेंट गई। दरवाजा खोलते ही उसके भीतर कुछ टूट गया। वही सोफा, वही नीली चटाई, मीरा के छोटे जूते, रसोई के पास आरव का कॉफी मग। यह घर कभी घर था। अब यह सबूतों का कमरा लग रहा था।

नैना ने कैमरे की मेमोरी कार्ड निकाली।

पूजा के घर लौटकर जब उन्होंने वीडियो खोले, तो पहले कई साधारण दृश्य आए। मीरा खिलौनों से खेल रही थी। नैना उसे खाना खिला रही थी। आरव फोन पर चलता हुआ जा रहा था।

फिर एक सोमवार सुबह का वीडियो आया।

मीरा ने दूध गिरा दिया था। आरव फ्रेम में आया, उसका हाथ इतनी जोर से पकड़ा कि बच्ची हवा में लगभग खिंच गई।

—तू मेरी जिंदगी खराब कर रही है, उसने दाँत भींचकर कहा।

मीरा रोई नहीं। वह जम गई। जैसे रोना भी खतरा हो।

दूसरे वीडियो में वह खिलौना ढूँढ़ते हुए रो रही थी। आरव ने उसके कंधे पकड़े और हिलाया।

—तेरी माँ भी तेरे कारण मेरे खिलाफ हो गई है। पैदा ही क्यों हुई तू?

पूजा ने रोते हुए मुँह पर हाथ रख लिया। नैना का शरीर पत्थर हो गया। उसने स्क्रीन बंद नहीं की। उसे पूरा सच देखना था, चाहे वह उसे अंदर से चीर दे।

तीसरे वीडियो में आरव फोन पर रिया से मीठी आवाज में बात कर रहा था। मीरा उसके पैर से चिपककर पानी माँग रही थी। उसने उसे झटककर दूर किया और बोला—

—चुप रह। अभी मम्मी नहीं है जो तेरा दरबार लगाए।

उसके बाद मीरा फर्श पर बैठकर रोती रही। आरव बालकनी में जाकर फोन पर हँसता रहा।

नैना ने पहली बार अपनी शर्म को दिशा दी। यह शर्म उसकी नहीं थी। यह आरव की थी। और अब वह छुपेगी नहीं।

वीडियो पुलिस को दिए गए। शांता आंटी ने लिखित बयान दिया कि उन्होंने कई बार दोपहर में बच्ची की चीख और आरव की तेज आवाज सुनी थी। मीरा की क्रेच टीचर ने बताया कि बच्ची किसी पुरुष स्टाफ के पास आते ही पीछे हट जाती थी। डॉक्टर मल्होत्रा ने रिपोर्ट में साफ लिखा कि चोटें अलग-अलग समय की हैं और आकस्मिक गिरावट से मेल नहीं खातीं।

आरव ने जेल से पत्र भेजने शुरू किए। पहले पत्र में उसने काम के तनाव की बात की। दूसरे में बचपन की कमी का बहाना बनाया। तीसरे में लिखा कि नैना ने उसे पति होने का एहसास नहीं दिया। चौथे में लिखा—

—अगर तुम चाहो तो हमारा घर फिर बन सकता है।

नैना ने वह पत्र सिंक के ऊपर फाड़ दिया।

जिस घर की नींव बच्चे की चीख पर रखी गई हो, उसे फिर बनाना पाप होता है।

पहली सुनवाई में आरव साफ-सुथरी शर्ट पहनकर आया। बाल ठीक, चेहरा थका हुआ, आवाज संयमित। उसका वकील कह रहा था कि यह वैवाहिक विवाद है, पत्नी पति की बेवफाई से आहत है, इसलिए मामले को बढ़ा रही है। उसने कहा छोटे बच्चे अक्सर गिरते हैं। उसने कहा आरव का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। उसने कहा एक प्रतिष्ठित नौकरी वाला आदमी राक्षस नहीं हो सकता।

नैना की मुट्ठियाँ काँप रही थीं।

फिर अनामिका सूद ने वीडियो चलाया।

अदालत में सन्नाटा उतर गया।

स्क्रीन पर वही प्रतिष्ठित आदमी 2 साल की बच्ची को पकड़ रहा था, झटका दे रहा था, उसे दोष दे रहा था, कह रहा था कि उसने सब खराब कर दिया। कोई बहाना उस आवाज को धो नहीं सकता था।

रिया ने भी गवाही दी। उसकी आवाज काँप रही थी, पर वह रुकी नहीं।

—उसने मुझसे झूठ बोला। लेकिन मैं यहाँ अपने लिए नहीं आई हूँ। मैं यहाँ इसलिए आई हूँ क्योंकि मैंने उसी आदमी की हिंसा अपनी कलाई पर महसूस की, जो इस बच्ची के शरीर पर लिखी हुई है।

आरव ने पहली बार सिर झुका लिया। वह शर्म से नहीं, पकड़े जाने से टूटा था।

जब नैना को बोलने के लिए कहा गया, उसने मीरा की छोटी-सी गुलाबी क्लिप अपने हाथ में कस ली। मीरा उस दिन पूजा के घर थी, सो रही थी। उसे अदालत की आवाजें नहीं सुननी थीं।

—मैंने देर की, नैना ने कहा। मैंने अपने शक से डरकर अपनी बच्ची को अकेला छोड़ा। लेकिन अब मैं डरकर चुप नहीं रहूँगी। उसे पिता नहीं, सुरक्षा चाहिए। और जिस आदमी से बच्ची नींद में भी डरती है, उसे पिता कहने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए।

अदालत ने तत्काल संपर्क प्रतिबंध लगाया। आरव को मीरा से मिलने पर रोक लगी। नैना और बच्ची के लिए संरक्षण आदेश जारी हुआ। बाद की प्रक्रिया में घरेलू हिंसा, नाबालिग पर क्रूरता और मानसिक उत्पीड़न के आरोपों पर मुकदमा चला। मेडिकल रिपोर्ट, वीडियो, गवाहों और रिया के बयान ने झूठ की हर दीवार गिरा दी।

अंततः आरव को सजा हुई। उसकी अभिरक्षा और मुलाकात के अधिकार निलंबित किए गए। उसे परामर्श और निगरानी के आदेश मिले, लेकिन मीरा से दूरी तय रही। अदालत ने साफ कहा कि बच्चे की सुरक्षा किसी वयस्क के पछतावे से बड़ी है।

फैसले वाले दिन नैना खुश नहीं हुई। खुशी बहुत हल्का शब्द था। उसे ऐसा लगा जैसे उसके सीने पर रखा पत्थर थोड़ा हट गया हो। निशान मिटे नहीं थे, पर दरवाजा बंद हो गया था।

नैना ने गुरुग्राम वाला अपार्टमेंट छोड़ दिया। वह पूजा के घर रही, फिर कुछ महीनों बाद दिल्ली के द्वारका में एक छोटा-सा फ्लैट किराए पर लिया। फ्लैट पुराना था, रसोई छोटी थी, बालकनी से मेट्रो की आवाज आती थी। लेकिन सुबह की धूप सीधे कमरे में गिरती थी।

और सबसे जरूरी बात—चाबी की आवाज डर नहीं लाती थी।

मीरा धीरे-धीरे ठीक होने लगी। शुरू में वह पुरुषों की आवाज सुनकर नैना की गोद में छिप जाती। रात में अचानक उठकर कहती—

—पापा नहीं आएँगे?

नैना उसे सीने से लगा लेती।

—नहीं आएँगे। मम्मा है। तू सुरक्षित है।

उसने मीरा को बाल मनोवैज्ञानिक के पास ले जाना शुरू किया। खुद भी काउंसलिंग ली। उसने सीखा कि प्यार का मतलब चुप रहना नहीं होता। परिवार बचाने का मतलब बच्चे को खतरे में रखना नहीं होता। औरत की सहनशीलता गुण है, पर जब वही सहनशीलता बच्चे की पीड़ा ढकने लगे, तो उसे तोड़ देना ही धर्म है।

रिया ने कुछ महीनों बाद पत्र लिखा। उसने अस्पताल बदल लिया था। उसने लिखा कि वह भी थेरेपी में है, और उसे समझ आया है कि आरव ने उसे भी एक झूठी दुनिया में कैद कर दिया था। पत्र के अंत में लिखा था—

—आपके सच बोलने से मैं भी बच गई।

नैना बहुत देर तक रोई। उस रोने में जलन नहीं थी। उसमें मुक्ति थी।

लगभग 1 साल बाद, वसंत की एक सुबह, मीरा रसोई की छोटी मेज पर बैठी दही खा रही थी। उसके बाल बिखरे थे, नाक पर दही लगा था, और हाथ में चम्मच ऐसे पकड़ा था जैसे कोई बड़ी जीत हासिल कर ली हो।

—मम्मा, खुद से खाया!

नैना ने मुस्कुराते हुए कहा—

—हाँ, मेरी शेरनी। खुद से।

उस दिन वह मीरा को पार्क ले गई। घास पर बच्चे साबुन के बुलबुले उड़ा रहे थे। मीरा एक बुलबुले के पीछे भागी, फिसली, और धप्प से बैठ गई। नैना का दिल एक पल को रुक गया। फिर मीरा खुद उठी, हँसी, और बोली—

—देखो, कुछ नहीं हुआ!

नैना की आँखें भर आईं।

हाँ। यह एक असली गिरना था। बच्चे वाली गिरावट। घास पर धूल, घुटनों पर हल्की मिट्टी, मुँह में हँसी। कोई झूठ नहीं। कोई डर नहीं। कोई आदमी नहीं जो दर्द को नाटक कहे।

शाम को घर लौटकर मीरा नैना की गोद में सो गई। उसका छोटा-सा हाथ अपने खिलौना हाथी पर था। नैना देर तक उसकी साँसें सुनती रही।

हर साँस एक जीत थी।

हर साँस कह रही थी कि वे बच गईं।

हर साँस कह रही थी कि अब यह घर डर का नहीं, माँ और बेटी की रोशनी का है।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.