
भाग 1
मीरा को अगले दिन तक एक मंगेतर चाहिए था, वरना उसकी बीमार माँ यह मानकर मर जाती कि दुनिया में उसकी बेटी को कभी किसी ने सच में चाहा ही नहीं।
मुंबई के बांद्रा वाले 42वें माले के पेंटहाउस की रसोई में यह बात इतनी धीमी आवाज़ में कही गई थी, फिर भी अर्जुन मल्होत्रा के सीने में किसी ने हथौड़ा मार दिया। वह अपने स्टडी रूम से बाहर निकल ही रहा था। हाथ में 300 करोड़ के होटल प्रोजेक्ट की फाइल थी, मोबाइल लगातार बज रहा था, और बोर्ड मीटिंग 20 मिनट से उसका इंतज़ार कर रही थी। लेकिन रसोई से आती मीरा की टूटी हुई आवाज़ ने उसके कदम रोक दिए।
—पूजा, मैं झूठ नहीं बोल रही… कल नेहा की शादी है। पापा ने पूरे खानदान में बोल दिया कि मैं अपने मंगेतर के साथ आ रही हूँ। माँ ने तो उसके लिए अलग से शगुन का नारियल रखवा दिया है। मैं उन्हें कैसे बताऊँ कि कोई है ही नहीं?
अर्जुन ने दरवाज़े के पास रुककर साँस रोक ली।
वह दूसरों की बातें सुनने वाला आदमी नहीं था। 45 साल की उम्र में वह मुंबई, दिल्ली और जयपुर में 9 लग्जरी होटलों का मालिक था। उसके पास गाड़ियाँ थीं, बंगले थे, प्राइवेट लिफ्ट थी, और इतने लोग थे जो उसके इशारे पर झुकते थे। लेकिन उसके घर में काम करने वाली मीरा शर्मा की आवाज़ में उस वक्त ऐसी बेबसी थी, जिसे अनसुना करना इंसानियत से गिर जाना होता।
मीरा पिछले 4 साल से उसके घर में काम करती थी। सुबह 6 बजे आती, चुपचाप चाय रखती, सफेद ऑर्किड के फूल बदलती, अलमारी में धुली हुई शर्ट्स लगाती और शाम होने से पहले घर से ऐसे निकल जाती जैसे उसका वहाँ होना किसी को याद भी न रहे। अर्जुन ने उसे हमेशा मेहनती, समय की पाबंद और शांत समझा था। उसने कभी यह नहीं सोचा था कि उसके झुके हुए कंधों पर घर, अस्पताल, दवाइयाँ और रिश्तेदारों की तानेबाज़ी का बोझ भी है।
—माँ का दिल बहुत कमजोर है, पूजा… डॉक्टर ने साफ कहा है कि उन्हें खुश रखना होगा। वह बस मुझे एक बार किसी के साथ देखना चाहती हैं। उन्हें लगता है कि मेरे जाने के बाद पापा मुझे अकेले नहीं जीने देंगे।
थोड़ी देर सन्नाटा रहा।
फिर मीरा की आवाज़ काँपी।
—मैंने पड़ोस के राजू भैया से भी कहा था कि 1 दिन के लिए साथ चल चलो। उन्होंने अपनी पत्नी से शिकायत कर दी। मुझे बहुत शर्म आई। किसी को पैसे देकर ले जाने की सोचती, तो पैसे कहाँ से लाती? सब माँ की दवाइयों में चला जाता है।
अर्जुन ने फाइल कसकर पकड़ ली।
उसके डाइनिंग हॉल में 14 लोगों की मेज थी, जिस पर वह अक्सर अकेले खाता था। उसके बेडरूम में शहर का आधा आसमान दिखता था, मगर रात को वही आसमान उसे खाली लगता था। उसके पास सब कुछ था, फिर भी घर में किसी के इंतज़ार की आवाज़ नहीं थी।
मीरा की गरीबी और उसकी तन्हाई में फर्क था। अर्जुन की तन्हाई महंगी थी। मीरा की तन्हाई में अस्पताल की पर्चियाँ, पिता का डर, बहन की शादी और माँ की आखिरी इच्छा थी।
फोन कटने के बाद मीरा बाहर आई। उसने आँखें पोंछीं और जैसे ही अर्जुन को देखा, उसका चेहरा सफेद पड़ गया।
—साहब… मैं… माफ कीजिए। काम के समय मुझे निजी फोन नहीं उठाना चाहिए था। दोबारा नहीं होगा।
—मीरा।
उसने सिर झुका लिया।
—मुझे यह नौकरी चाहिए, साहब। बहुत जरूरत है।
अर्जुन को लगा जैसे किसी ने उसके गले में काँटा फँसा दिया।
—मैं तुम्हें नौकरी से नहीं निकाल रहा।
—तो कृपया जो सुना, भूल जाइए।
—नहीं भूल सकता।
मीरा ने पहली बार सीधे उसकी आँखों में देखा। उनमें शर्म भी थी, गुस्सा भी और एक ऐसी थकान भी, जिसे 34 साल की उम्र में किसी के चेहरे पर नहीं होना चाहिए था।
—यह मेरा मामला है।
—इतना भारी मामला अकेले उठाना जरूरी नहीं है।
मीरा हल्का सा हँसी, मगर वह हँसी चाकू जैसी थी।
—हमारे घर की लड़कियों को बचपन से यही सिखाया जाता है।
धीरे-धीरे उसने अर्जुन को सब बताया। उसकी माँ सावित्री देवी को दिल की गंभीर बीमारी थी। पिता भैरव शर्मा जयपुर के पास पुराने पुश्तैनी घर में रहते थे, सख्त, परंपरावादी और गुस्सैल। छोटी बहन नेहा की शादी अगले दिन थी। परिवार वालों को लगता था कि मीरा मुंबई में किसी अच्छे आदमी से सगाई कर चुकी है। सच यह था कि मीरा ने कभी ऐसा कहा नहीं था, बस पिता के सामने सच बोलने की हिम्मत नहीं हुई थी। माँ ने यह सुनकर इतनी खुशी जताई कि मीरा उनसे सच छीन नहीं पाई।
—अगर मैं अकेली गई, तो बुआ सबके सामने कहेंगी कि शहर जाकर भी लड़की को कोई नहीं मिला। पापा कहेंगे कि इसलिए औरत को घर से बाहर नहीं जाना चाहिए। माँ मुस्कुराएँगी, मगर उनका दिल टूट जाएगा।
अर्जुन कुछ देर चुप रहा। वह पैसे दे सकता था, डॉक्टर भेज सकता था, ड्राइवर भेज सकता था। उसकी दुनिया में हर समस्या का समाधान चेकबुक से निकलता था। मगर इस बार चेकबुक बेइज्जती लगती।
—आज रात आराम करो।
मीरा ने हैरानी से देखा।
—क्या?
—सुबह कितने बजे निकलना है?
—5:30 की ट्रेन है।
—ठीक है। निकलने से पहले मुझसे मिल लेना।
वह समझी नहीं, मगर जवाब देने की ताकत भी नहीं बची।
सुबह 5 बजे जब मीरा रसोई में पहुँची, अर्जुन वहाँ खड़ा था। उसने महंगा सूट नहीं पहना था। साधारण सफेद कुर्ता, नेवी जैकेट और जींस में वह पहली बार किसी कॉरपोरेट पोस्टर जैसा नहीं, बल्कि इंसान जैसा दिख रहा था।
—साहब, आप इतनी सुबह?
—अर्जुन।
—जी?
—अगर दोपहर तक मैं तुम्हारा मंगेतर बनने वाला हूँ, तो तुम्हारा मुझे साहब कहना थोड़ा अजीब लगेगा।
मीरा के हाथ से स्टील का गिलास लगभग छूट गया।
—यह मजाक अच्छा नहीं है।
—मैं मजाक नहीं कर रहा।
—आप मेरे साथ नहीं जा सकते।
—जा सकता हूँ।
—आप मेरे मालिक हैं।
—और इसीलिए बाद में हम इस गलती की सीमाओं पर बात करेंगे। लेकिन आज तुम्हें मदद चाहिए।
—मेरे परिवार वाले सवाल पूछेंगे।
—हम जवाब देंगे।
—आप मेरे बारे में कुछ नहीं जानते।
अर्जुन ने धीमे से कहा।
—हाँ। और यह तुम्हारी कमी नहीं, मेरी कमी है।
मीरा ने 5 बार मना किया। उसने कहा कि यह पागलपन है, उसके पिता झूठ पकड़ लेंगे, उसकी बुआ पुलिस पूछताछ से भी कठिन सवाल करती हैं, और उसका चचेरा भाई करण लोकल न्यूज चैनल में काम करता है, जो झूठ की गंध दूर से पहचान लेता है। अर्जुन ने सब सुना।
7 बजे तक उनकी कहानी तैयार थी।
वे मुंबई में एक पुराने बंगले की मरम्मत के दौरान नज़दीक आए थे। मीरा ने ईमानदार कारीगरों की मदद की थी। अर्जुन को उसकी सादगी और हिम्मत पसंद आई। मीरा को उसकी चुपचाप परवाह करने की आदत अच्छी लगी। सगाई अभी परिवार को बतानी थी।
—आपमें चुपचाप परवाह करने की आदत नहीं है, —मीरा ने कार में कहा।
—है।
—आपने पिछले महीने शेफ को इसलिए निकाल दिया था क्योंकि उसने उपमा में “आत्मा की कमी” कर दी थी।
—वह सच था।
कई घंटों बाद पहली बार मीरा हँसी।
वे फ्लाइट से जयपुर पहुँचे, फिर कार से पुराने मोहल्ले की तरफ निकले। रास्ते में हवेलियाँ, मंदिर, दुकानों पर लटकी रंगीन चुनरियाँ, मिठाई की खुशबू और शादी वाले घरों की भागदौड़ दिख रही थी। मीरा धीरे-धीरे चुप होती गई।
—वापस चलना चाहो तो चल सकते हैं, —अर्जुन ने कहा।
मीरा ने सड़क किनारे गेंदे के फूलों की दुकान देखी।
—नहीं। माँ इंतज़ार कर रही हैं।
शर्मा परिवार का पुराना घर लोगों से भरा था। आँगन में कुर्सियाँ लगी थीं, छत से लाइटें लटक रही थीं, रसोई से कढ़ाई की खुशबू आ रही थी और ढोलक की आवाज़ पूरे मोहल्ले में फैल रही थी।
दरवाज़े पर सावित्री देवी आईं। कमजोर शरीर, हल्की पीली साड़ी, माथे पर छोटी बिंदी और आँखों में थकी हुई चमक।
—मीरा…
मीरा भागकर उनसे लिपट गई।
अर्जुन पीछे खड़ा रहा। उसे लगा वह किसी बहुत निजी, बहुत पवित्र दृश्य में घुस आया है।
फिर सावित्री देवी ने उसे देखा।
—तुम अर्जुन हो?
उसने हाथ जोड़ दिए।
—नमस्ते, आंटी।
सावित्री देवी ने उसका हाथ पकड़कर अपने सिर से लगा लिया।
—भगवान तुम्हें खुश रखे। मेरी बेटी को अकेला नहीं छोड़ा तुमने।
झूठ उसके गले में पत्थर बनकर अटक गया।
उसी समय आँगन के दूसरे छोर से भैरव शर्मा आए। चौड़ी मूँछें, सफेद कुरता, माथे पर शिकन और आँखों में ऐसा शक, जैसे अर्जुन कोई आदमी नहीं, कोर्ट में खड़ा अपराधी हो।
—अगर मेरी बेटी के साथ खेल खेलने आए हो, तो याद रखना, पैसे वाले आदमी को छुपने की जगह बहुत मिलती है, मगर बाप का श्राप कहीं भी पकड़ लेता है।
मीरा घबरा गई।
अर्जुन ने सिर झुकाकर कहा।
—आपका डर जायज़ है, अंकल।
भैरव ने उसका हाथ इतनी जोर से दबाया कि अर्जुन की उंगलियाँ दुख गईं।
तभी भीतर से बुआ विमला की आवाज़ आई।
—अरे वाह, दामाद तो हीरो निकला! देखना कहीं 1 दिन के किराए पर तो नहीं लाए हमारी मीरा!
सारा आँगन हँस पड़ा।
मीरा का चेहरा उतर गया।
अर्जुन ने उसी पल समझ लिया कि यह दिन सिर्फ एक झूठ निभाने का नहीं होगा।
यह दिन एक लड़की के पूरे जीवन की अदालत बनने वाला था।
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भाग 2
हल्दी से पहले ही अर्जुन से 8 रिश्तेदार, 3 पड़ोसी, 1 पंडित और 1 छोटा बच्चा सवाल कर चुके थे कि क्या अमीर लोग भी मिर्ची खाते हैं। सबसे खतरनाक करण था, मीरा का चचेरा भाई, जो जयपुर के एक डिजिटल न्यूज चैनल में रिपोर्टर था और हर बात को मोबाइल में रिकॉर्ड करने की आदत रखता था। वह ठंडाई के गिलास के पास अर्जुन से बोला। —तो आप मीरा दीदी से मुंबई में मिले? —हाँ। —कौन से इलाके में? —बांद्रा। —बंगले का नाम? अर्जुन ने बस 1 सेकंड सोचा, मगर करण की आँखें चमक उठीं। तभी मीरा बीच में आ गई। —करण, दूल्हे की बारात आने वाली है या तुम सीबीआई की चार्जशीट बना रहे हो? करण मुस्कुराया। —बस जीजाजी की सच्चाई जान रहा हूँ। नेहा की शादी मंदिर के बड़े मंडप में हुई। सावित्री देवी व्हीलचेयर पर थीं, मगर उनकी आँखों में ऐसी खुशी थी कि मीरा बार-बार रोने से खुद को रोकती रही। अर्जुन ने उसके पास चुपचाप रूमाल रखा। उनकी उंगलियाँ छुईं, और दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा भी नहीं, जैसे देखने से सच बाहर आ जाएगा। शाम को घर के आँगन में रिसेप्शन हुआ। दाल बाटी, गट्टे की सब्जी, मिठाइयाँ, ढोल और रिश्तेदारों की आवाज़ों के बीच अर्जुन ने कुर्सियाँ उठाईं, पानी के कैन लगाए और भैरव शर्मा के कहने पर टेंट वाले से बहस भी की। भैरव ने ताना मारा। —कभी हाथ से काम किया है, होटल वाले? अर्जुन ने कहा। —आज सीख रहा हूँ। मीरा दूर से उसे देख रही थी। पहली बार उसे लगा कि यह आदमी सिर्फ दीवारों और शीशों के पीछे रहने वाला मालिक नहीं है। फिर डीजे ने घोषणा कर दी कि परिवार की रस्म है, हर जोड़े को दूल्हा-दुल्हन के सामने नाचकर चुंबन देना होगा। मीरा जम गई। बुआ विमला चिल्लाईं। —मीरा और अर्जुन! अब बचकर दिखाओ! सावित्री देवी मुस्कुरा रही थीं। अर्जुन ने मीरा से फुसफुसाकर कहा। —जरूरी नहीं है। मीरा की आँखें भर आईं। —माँ देख रही हैं। झूठ को सच जैसा बना दो। अर्जुन ने सोचा था कि वह बस हल्का सा चुंबन देगा। लेकिन जैसे ही उसके होंठ मीरा से छुए, आँगन, ढोल, रिश्तेदार, झूठ, नौकरी, मालिक और नौकरानी का फर्क सब गायब हो गया। मीरा का हाथ उसके कंधे पर कस गया। अर्जुन पीछे हट सकता था, पर नहीं हटा। जब दोनों अलग हुए, तालियाँ बज रही थीं, मगर उनके चेहरों पर डर था। रात को सावित्री देवी ने अर्जुन को बुलाकर कहा। —तुम मेरी बेटी पर एहसान की तरह नहीं देखते। अर्जुन चुप रहा। —मैं बीमार हूँ, बेवकूफ नहीं। झूठ कैसे शुरू हुआ, नहीं जानती। पर तुम्हारी आँखें अब झूठ नहीं बोल रहीं। उसी रात उन्हें नेहा का पुराना कमरा दिया गया। घर में जगह कम थी और कमरा 1 ही था। अर्जुन ने कहा। —मैं जमीन पर सो जाऊँगा। मीरा ने थकी आवाज़ में कहा। —माँ सुबह देख लेंगी तो समझेंगी कि तुम मुझे छूना भी नहीं चाहते। दोनों कपड़ों में ही बिस्तर के 2 कोनों पर लेट गए। बीच में तकिया रख दिया गया, जैसे सीमा रेखा हो। बहुत देर बाद मीरा ने पूछा। —मुंबई लौटकर क्या होगा? अर्जुन जवाब दे पाता, उससे पहले सुबह करण का मैसेज आया। “दीदी, अर्जुन मल्होत्रा के बारे में कुछ मिला है। अगर मामा ने पहले देख लिया तो शादी का घर रणभूमि बन जाएगा।”
भाग 3
मीरा ने करण का मैसेज 4 बार पढ़ा। उसके हाथ ठंडे पड़ गए।
अर्जुन भी उठ चुका था। उसने स्क्रीन देखी और उसका चेहरा गंभीर हो गया।
—मीरा, बात उतनी सीधी नहीं है जितनी दिख रही है।
मीरा ने तकिए को किनारे किया और बैठ गई।
—क्या मतलब?
—मेरी कंपनी राजस्थान में कुछ हेरिटेज होटल प्रोजेक्ट देख रही है।
—तो?
अर्जुन ने धीरे से कहा।
—जयपुर के बाहर कुछ पुराने मकानों और जमीनों की सूची बनी थी। मुझे पूरी सूची याद नहीं थी।
मीरा जैसे कुछ समझना नहीं चाहती थी।
—क्या हमारे घर का नाम भी उस सूची में है?
अर्जुन चुप रहा।
वही चुप्पी जवाब थी।
नीचे आँगन में करण इंतज़ार कर रहा था। उसके हाथ में मोबाइल था। आसपास अभी शादी के बचे हुए फूल पड़े थे, कुर्सियाँ उल्टी रखी थीं, और सुबह की चाय बन रही थी। मगर हवा में रात की खुशी नहीं, तूफान की बू थी।
करण ने बिना भूमिका के मोबाइल आगे बढ़ाया।
—मामा को दिखाने से पहले तुम्हें दिखा रहा हूँ। यह देखो। “मल्होत्रा हेरिटेज ग्रुप” ने इस इलाके की 12 पुश्तैनी हवेलियों में रुचि दिखाई है। चौथे नंबर पर शर्मा निवास।
मीरा को लगा जमीन हिल गई।
—अर्जुन?
—मैं कल यहाँ खरीदारी करने नहीं आया था।
करण हँसा, मगर हँसी में जहर था।
—वाह। पैसे वाले हमेशा यही कहते हैं। पहले घर में घुसो, फिर रिश्ते में, फिर जमीन में।
तभी भैरव शर्मा आ गए।
—क्या चल रहा है?
कोई जवाब देता, उससे पहले उन्होंने मोबाइल छीन लिया। पढ़ते-पढ़ते उनका चेहरा लाल पड़ गया।
5 मिनट में आधा परिवार आँगन में जमा हो गया। नेहा अभी दुल्हन के कपड़ों में थी, आँखों का काजल फैला हुआ था। बुआ विमला ने माथे पर हाथ रख लिया। सावित्री देवी दरवाज़े के पास खड़ी थीं, साँसों के लिए दीवार पकड़कर।
भैरव शर्मा ने अर्जुन की तरफ देखा।
—तो यह था असली काम? मेरी बेटी को बहाना बनाकर घर देखने आए थे?
—नहीं, अंकल।
—चुप! मेरी बेटी कोई दरवाज़ा नहीं है, जिससे होकर तुम हमारी जायदाद तक पहुँचो।
मीरा आगे बढ़ी।
—पापा, मेरी बात सुनिए—
—तू चुप रह!
यह आवाज़ मीरा पर किसी थप्पड़ की तरह गिरी। पूरा आँगन शांत हो गया।
अर्जुन ने पहली बार सख्त आवाज़ में कहा।
—उनसे इस तरह बात मत कीजिए।
भैरव उसकी तरफ मुड़े।
—मेरे घर में मेरी बेटी से कैसे बोलना है, यह तू सिखाएगा?
मीरा ने आँसू पोंछे। लेकिन इस बार वह पीछे नहीं हटी।
—हाँ, पापा। अब कोई तो सिखाएगा। क्योंकि आपने मुझे हमेशा बेटी नहीं, बोझ समझकर बात की।
सन्नाटा फैल गया।
भैरव का चेहरा बदल गया।
—क्या कहा तूने?
मीरा की आवाज़ काँप रही थी, मगर टूट नहीं रही थी।
—मैंने कहा, अब बस। मैंने इस घर के लिए 8 साल पैसे भेजे। माँ की दवाइयाँ, नेहा की पढ़ाई, घर की मरम्मत, बिजली के बिल, सब कुछ। आपने कभी नहीं पूछा कि मुंबई में मैं कैसे जीती हूँ। आपको बस यह चिंता थी कि मैं किसी आदमी के साथ लौट रही हूँ या नहीं।
बुआ विमला धीरे से बोलीं।
—अरे लड़की, शादी वाले घर में—
—बुआ, आपने हर साल माँ के सामने कहा कि मीरा कमाती है, मगर किसके लिए? आज सुन लीजिए। मैं किसी के लिए एटीएम नहीं हूँ।
नेहा रोते हुए आगे आई।
—दीदी…
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
—तुझसे शिकायत नहीं है, नेहा। तू मेरी बच्ची जैसी है। पर यह घर मेरे प्यार को मेरी जिम्मेदारी मानता रहा, कभी मेरी थकान नहीं देखी।
भैरव ने गुस्से से कहा।
—और इसलिए तू झूठा मंगेतर लेकर आई?
मीरा ने सावित्री देवी की तरफ देखा। उसकी आवाज़ धीमी हो गई।
—हाँ। माँ के लिए। मैं नहीं चाहती थी कि वह यह सोचते हुए जाएँ कि उनकी बड़ी बेटी अकेली और अधूरी है।
सावित्री देवी रो पड़ीं।
—मीरा…
—माँ, अर्जुन मेरा मंगेतर बनकर आया था। सच यह है कि वह मेरा मालिक था। पर कल रात तक जो झूठ था, वह आज मेरे लिए झूठ नहीं रहा।
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा। उसके चेहरे पर राहत नहीं, जिम्मेदारी थी।
भैरव ने मेज पर हाथ मारा।
—बेशर्मी की भी हद होती है!
तभी बाहर गली में शोर हुआ। 3 आदमी काले कपड़ों में गेट के पास आकर खड़े हो गए। उनके साथ स्थानीय प्रॉपर्टी दलाल महेंद्र था, जो कई महीनों से शर्मा निवास खरीदने की कोशिश कर रहा था।
—भैरव जी, अब तो मेहमान भी आ गए हैं, कागज पर साइन कर दीजिए, —महेंद्र ने जोर से कहा। —वरना पुराने कर्ज का मामला पुलिस तक जाएगा।
अर्जुन की आँखें सिकुड़ गईं।
—कौन सा कर्ज?
भैरव पहली बार घबराए।
करण ने तुरंत मोबाइल रिकॉर्डिंग ऑन कर दी।
महेंद्र ने हँसते हुए कहा।
—अरे साहब, परिवार की बात है। इनका घर बेचकर सब ठीक हो जाएगा।
मीरा ने पिता की तरफ देखा।
—पापा, आपने कर्ज लिया?
भैरव ने नज़रें चुरा लीं।
—तेरी माँ के इलाज के लिए… और नेहा की शादी के लिए… थोड़ा पैसा लेना पड़ा।
—कितना?
भैरव चुप।
महेंद्र ने जेब से फाइल निकाली।
—42 लाख। ब्याज अलग। आज साइन नहीं किया तो कल कब्जा होगा।
मीरा लड़खड़ा गई। अर्जुन ने उसे थामा, मगर उसने खुद को संभाल लिया।
—आपने मुझे क्यों नहीं बताया?
भैरव की आँखें भर आईं, पर आवाज़ अभी भी कठोर थी।
—क्योंकि तू पहले ही बहुत देती थी।
—तो आपने घर किसी दलाल के हाथ चढ़ा दिया?
महेंद्र ने बीच में कहा।
—ज्यादा ड्रामा मत करो, बिटिया। बड़े लोग आए हैं, अच्छा दाम मिल जाएगा। वैसे भी मल्होत्रा साहब की कंपनी को यह घर चाहिए ही।
अर्जुन आगे बढ़ा।
—मेरी कंपनी को अब यह घर नहीं चाहिए।
महेंद्र हँसा।
—साहब, बातें बाहर के लिए रखिए। आपके आदमी 2 महीने से मुझसे बात कर रहे हैं।
यह सुनकर पूरा आँगन फिर अर्जुन की तरफ देखने लगा।
अर्जुन ने तुरंत फोन निकाला और अपने लीगल हेड को कॉल किया। उसने स्पीकर ऑन कर दिया।
—राघव, जयपुर पुराने शहर वाले सारे अधिग्रहण रोक दो। शर्मा निवास और आसपास की 12 संपत्तियों को तुरंत ब्लॉक करो। इस डील में महेंद्र नाम के दलाल की भूमिका की जांच करवाओ।
दूसरी तरफ से आवाज़ आई।
—सर, यह तो बड़ा प्रोजेक्ट है। बोर्ड—
—मैं बोर्ड हूँ। अभी करो।
—सर, लिखित आदेश चाहिए।
—5 मिनट में ईमेल जाएगा। और हाँ, अगर किसी परिवार को दबाव में साइन कराया गया है, तो हमारी तरफ से कानूनी मदद जाएगी।
महेंद्र का चेहरा उतर गया।
—साहब, आप समझ नहीं रहे—
—मैं बहुत साफ समझ रहा हूँ, —अर्जुन ने कहा। —तुम बीमार औरत, कर्ज में डूबे बाप और शादी वाले घर का फायदा उठा रहे थे।
महेंद्र के साथ आए 1 आदमी ने गुस्से में कुर्सी ठोकर से गिरा दी। आँगन में बच्चे चीख पड़े। करण ने कैमरा उसकी तरफ कर दिया।
—सब रिकॉर्ड हो रहा है, भाई। न्यूज चैनल पर चेहरा साफ जाएगा।
आदमी रुक गया।
महेंद्र दाँत पीसते हुए बोला।
—यह मामला यहीं खत्म नहीं होगा।
अर्जुन ने शांत आवाज़ में कहा।
—नहीं होगा। अब यह अदालत में खत्म होगा।
वे लोग चले गए, मगर आँगन की हवा बदल चुकी थी। अब शक की जगह सच खड़ा था—कड़वा, शर्मनाक और खुला।
भैरव शर्मा कुर्सी पर बैठ गए। उनकी आँखें पहली बार बूढ़ी लगीं।
—मैं घर बचाना चाहता था… पर और डूबता गया।
मीरा उनके सामने खड़ी रही।
—घर दीवारों से नहीं बचता, पापा। घर सच से बचता है। आपने मुझे सच से बाहर रखा, क्योंकि मैं बेटी थी। पर पैसा चाहिए था तो बेटी याद आई।
भैरव ने पहली बार सिर झुका लिया।
—मैं गलत था।
यह 3 शब्द उनके मुँह से पत्थर की तरह निकले।
सावित्री देवी धीरे-धीरे आगे आईं।
—गलती सिर्फ तुम्हारी नहीं, भैरव। मैंने भी मीरा को मजबूत समझकर उस पर सब डाल दिया। बेटी है, संभाल लेगी… यही सोचते रहे। कभी यह नहीं सोचा कि बेटी भी टूटती है।
मीरा माँ के पैरों के पास बैठ गई और उनका हाथ पकड़ लिया।
—मैं अकेली नहीं रहना चाहती थी, माँ। मगर मुझे यह भी नहीं चाहिए था कि कोई मुझे बचाने आए और मेरा मालिक बन जाए।
सावित्री देवी ने अर्जुन की तरफ देखा।
—और तुम? तुम क्या चाहते हो?
अर्जुन ने मीरा के पास आकर दूरी बनाकर खड़ा होना चुना, जैसे वह उसकी तरफ से जवाब देने का अधिकार नहीं चाहता।
—मैं यहाँ झूठ निभाने आया था। लेकिन अब मैं झूठ में नहीं रहना चाहता। मैं मीरा को खरीदना नहीं चाहता, बचाना नहीं चाहता, साबित नहीं करना चाहता कि मैं उसके लायक हूँ। मैं बस इतना चाहता हूँ कि अगर वह चाहे, तो मुझे उसके साथ चलने की अनुमति दे।
मीरा ने आँसू भरी आँखों से उसे देखा।
—और अगर मैं कहूँ कि मुझे समय चाहिए?
—तो मैं इंतज़ार करूँगा। बिना दबाव। बिना एहसान। बिना शर्त।
बुआ विमला ने नाक पोंछते हुए कहा।
—अरे, यह तो सच में किराए वाला नहीं लगता।
नेहा रोते हुए हँस पड़ी।
उस दिन शादी का घर फिर से खुश नहीं हुआ। कम से कम तुरंत नहीं। बहुत बातें हुईं। कर्ज के कागज निकले। करण ने महेंद्र की रिकॉर्डिंग अपने चैनल में देने की धमकी दी। अर्जुन ने अपने वकीलों से मदद करवाई, मगर मीरा ने साफ शर्त रखी कि घर का कानूनी मामला परिवार के नाम से चलेगा, उसके नाम से नहीं।
—मैं एहसान नहीं लूँगी, —उसने कहा।
—एहसान नहीं, न्याय, —अर्जुन ने जवाब दिया।
फिर भी उसने हर कागज मीरा को पढ़कर समझाया, हर निर्णय में उसे शामिल किया, और जहाँ वह कहती, वहाँ रुक जाता।
मुंबई लौटने के बाद मीरा ने अर्जुन के पेंटहाउस की नौकरी छोड़ दी। अर्जुन ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की। वह समझ चुका था कि प्यार का पहला प्रमाण पकड़ना नहीं, खुला छोड़ना होता है।
मीरा ने नर्सिंग कोर्स में दाखिला लिया। फीस का सवाल आया तो अर्जुन ने मदद की पेशकश की। मीरा ने 9 बार मना किया। 10वीं बार उसने कहा।
—यह लोन होगा। मैं लौटाऊँगी।
अर्जुन ने कहा।
—ठीक है।
—बिना ब्याज।
—इतनी सख्त शर्त?
—और हर महीने हिसाब।
—जी, मैडम।
मीरा पहली बार खुलकर हँसी।
सावित्री देवी 5 महीने बाद चली गईं। आखिरी दिनों में वह जयपुर वाले घर के छोटे कमरे में थीं। मीरा ने उनका हाथ पकड़ा था, भैरव उनके पैरों के पास बैठे थे, नेहा रोते हुए मंत्र सुन रही थी, और अर्जुन दरवाज़े के पास खड़ा था। वह अंदर आना चाहता था, मगर उसने जगह नहीं घेरनी चाही।
सावित्री देवी ने कमजोर आवाज़ में बुलाया।
—अर्जुन।
वह आगे आया।
—जी, आंटी।
—मेरी बेटी को संभालना नहीं। उसके साथ चलना।
अर्जुन की आँखें भर आईं।
—वादा करता हूँ।
फिर उन्होंने मीरा से कहा।
—तू अधूरी कभी नहीं थी। मुझे देर से समझ आया।
मीरा फूटकर रो पड़ी।
सावित्री देवी ने उसी रात चुपचाप साँस छोड़ दी। घर में पहली बार कोई ताना नहीं था। सिर्फ रोने की आवाज़ थी और एक नीली शॉल, जिसे मीरा ने माँ के तकिए के पास मोड़कर रखा।
माँ के जाने के बाद भैरव शर्मा बदलने की कोशिश करने लगे। वह परफेक्ट पिता नहीं बने। वर्षों की कठोरता 1 दिन में नहीं पिघलती। मगर अब वह फोन पर पूछते।
—खाना खाया?
मीरा पहले चिढ़ जाती।
—पैसे नहीं चाहिए?
भैरव चुप होकर कहते।
—नहीं। बस पूछ रहा था।
यह छोटा वाक्य भी उनके लिए लंबा सफर था।
अर्जुन और मीरा का रिश्ता धीरे-धीरे बढ़ा। रविवार की चाय से बुधवार की मुलाकातें हुईं। फिर अस्पताल की ड्यूटी के बाद वड़ा पाव, देर रात वीडियो कॉल, जयपुर की यात्राएँ और कई झगड़े।
1 बार अर्जुन उसे एक बड़े बिजनेस डिनर में ले जाना चाहता था। मीरा ने मना कर दिया।
—मैं तुम्हारी दुनिया में तमाशा नहीं बनना चाहती।
—कोई तुम्हें कुछ कहेगा तो मैं—
—तुम सब सुन नहीं पाओगे, अर्जुन। अमीर लोग अक्सर मुस्कान में जहर रखते हैं।
अर्जुन को बुरा लगा। वह अकेला डिनर में गया। वहाँ एक महिला ने हँसते हुए कहा।
—सुना है आप अपनी हाउसहेल्प के साथ दिख रहे हैं। बहुत प्रोग्रेसिव हो गए हैं आप।
पुराना अर्जुन शायद मुस्कुराकर बात बदल देता। नए अर्जुन ने पानी का गिलास रखा और कहा।
—उनका नाम मीरा शर्मा है। उन्होंने 8 साल अपने परिवार को संभाला, 1 बीमार माँ को जीवन दिया, और अब नर्सिंग पढ़ रही हैं। इस मेज पर बैठे आधे लोग उनकी ईमानदारी के सामने खड़े भी नहीं हो सकते।
मेज पर सन्नाटा छा गया।
अर्जुन डिनर अधूरा छोड़कर निकल गया।
रात को वह मीरा के छोटे किराए के फ्लैट पर पहुँचा। मीरा किताबों के बीच बैठी थी, बाल क्लिप से बंधे थे, आँखों पर थकान थी।
—यहाँ क्यों आए हो?
—सीखने।
—क्या सीखा?
—हर जगह जहाँ मैं जा सकता हूँ, वहाँ तुम्हें ले जाना सम्मान नहीं होता। कभी-कभी तुम्हें बचाना नहीं, तुम्हारी बात सुनना सम्मान होता है।
मीरा ने उसे कुछ देर देखा।
—धीरे सीख रहे हो, मल्होत्रा।
—लेकिन सीख रहा हूँ।
उनका प्यार चमकदार नहीं था। वह धीरे-धीरे, रोजमर्रा की चीजों में पनपा। अस्पताल की कैंटीन की चाय, मीरा की थकान, अर्जुन के असहज माफीनामे, भैरव के छोटे फोन, नेहा के बच्चे के जन्म, करण की अब भी चालू रिकॉर्डिंग आदत, और बुआ विमला की शादी के नए प्रस्तावों वाली फाइलों के बीच।
1 साल बाद, नेहा की शादी की सालगिरह पर पूरा परिवार फिर जयपुर वाले घर में जमा हुआ। महेंद्र का केस चल रहा था। घर कानूनी रूप से सुरक्षित था। सावित्री देवी नहीं थीं, मगर उनकी नीली शॉल लकड़ी की कुर्सी पर वैसे ही रखी थी।
रात को खाने के बाद अर्जुन ने मीरा से कहा।
—थोड़ा बाहर चलोगी?
—तुम्हारे चेहरे पर वही भाव है जो प्रेजेंटेशन से पहले होता है।
—आज उससे भी कठिन है।
वे आँगन के नीम के पेड़ के नीचे पहुँचे। वही आँगन, जहाँ 1 साल पहले झूठ खड़ा हुआ था। वही जगह, जहाँ सच ने सबको नंगा कर दिया था।
अर्जुन ने जेब से छोटी सी डिब्बी निकाली।
मीरा की साँस अटक गई।
—अर्जुन…
—मीरा शर्मा, 1 साल पहले मैं तुम्हारे साथ एक झूठ बचाने आया था। मुझे लगा था मैं तुम्हारी मदद कर रहा हूँ। सच यह है कि तुमने मुझे मेरी खाली जिंदगी से निकाला। तुमने मुझे सिखाया कि घर वह नहीं होता जहाँ महंगे फर्श हों, बल्कि वह होता है जहाँ कोई सच बोल सके और फिर भी ठहर सके।
उसने डिब्बी खोली। अंगूठी बहुत बड़ी या दिखावटी नहीं थी। पतली सी सोने की अंगूठी थी, जिसमें छोटी हरी पत्थर की पत्ती जड़ी थी, वैसी ही जैसे सावित्री देवी की नीली शॉल के किनारे पर बनी पत्तियाँ।
—मैं तुम्हारा मालिक नहीं बनना चाहता। तुम्हारा रक्षक भी नहीं। मैं तुम्हारे बराबर चलना चाहता हूँ। जब तुम आगे रहो, मैं पीछे से गर्व करूँ। जब मैं डरूँ, तुम मुझे सच बताओ। जब हम लड़ें, तो भागें नहीं। क्या तुम मुझसे शादी करोगी?
मीरा रो रही थी और हँस भी रही थी।
—तुमने मेरी माँ के आँगन में, उसी जगह जहाँ पहली बार सब बिखरा था, मुझे शादी के लिए पूछा?
—मुझे ड्रामा की आदत लग गई है।
—बुआ विमला को पता चला तो वह ढोल बुला लेंगी।
खिड़की से आवाज़ आई।
—ढोल नहीं, पूरा बैंड बुलाऊँगी!
मीरा ने माथा पकड़ लिया। करण मोबाइल लेकर खड़ा था। नेहा रो रही थी। भैरव दरवाज़े पर आए, अंगूठी देखी, फिर अर्जुन को देखा।
—जवाब देने से पहले 1 बात।
अर्जुन सीधा खड़ा हो गया।
—जी।
—मेरी बेटी से कभी ऊँची आवाज़ में बात की तो दामाद समझकर नहीं छोड़ूँगा।
मीरा ने कहा।
—पापा।
भैरव की आँखें नम थीं।
—और अगर मेरी बेटी गलती करे, तो उसे भी सच कहना। वह देवी नहीं है। मेरी बेटी है। बहुत जिद्दी है।
मीरा रोते हुए हँसी।
भैरव ने धीरे से कहा।
—अब जवाब दे दे। लड़का घुटनों पर ज्यादा देर रहेगा तो उठ नहीं पाएगा।
मीरा अर्जुन के सामने बैठ गई।
—हाँ। लेकिन 1 शर्त।
—कहो।
—शादी में कोई झूठ नहीं होगा।
—कभी नहीं।
—और मैं अपनी नर्सिंग पूरी करूँगी।
—मैं पहली पंक्ति में बैठकर ताली बजाऊँगा।
—और घर मेरे नाम नहीं, मेरे अपने फैसलों के नाम होगा।
—तुम्हारा जीवन तुम्हारा रहेगा।
मीरा ने हाथ आगे बढ़ा दिया।
—हाँ, अर्जुन।
बुआ विमला ने सचमुच ढोल वाले को फोन कर दिया।
उनकी शादी 6 महीने बाद उसी घर के आँगन में हुई। कोई 5 स्टार होटल नहीं, कोई मीडिया कवरेज नहीं, कोई क्रिस्टल झूमर नहीं। बस गेंदे के फूल, रसोई में कचौरी की खुशबू, छत पर लाइटें, नेहा का बच्चा, करण का कैमरा, भैरव की भारी आवाज़ और सावित्री देवी की नीली शॉल वाली खाली कुर्सी।
विवाह के बाद भैरव शर्मा ने सबके सामने गिलास उठाया।
—जब यह आदमी पहली बार इस घर में आया था, मुझे लगा यह बहुत अमीर है, बहुत चिकना है और बहुत झूठा है।
सब हँस पड़े।
अर्जुन ने सिर झुका लिया।
—मैं 2 बातों में गलत था। 1 बात में शायद नहीं।
बुआ विमला चिल्लाईं।
—चिकना तो है!
आँगन में ठहाका लगा।
फिर भैरव की आवाज़ भर्रा गई।
—मैं अपनी बेटी के बारे में भी गलत था। मुझे लगता था उसे पूरा करने के लिए किसी आदमी की जरूरत है। सच यह है कि वह पहले से पूरी थी। हम ही उसे बोझ समझकर तोड़ते रहे। सावित्री ने मुझसे आखिरी दिनों में कहा था कि अर्जुन मीरा को ऐसे देखता है जैसे कोई आदमी ठंडी अंधेरी जगह से घर लौट आया हो। आज समझ आया।
मीरा ने आँखें बंद कर लीं।
भैरव ने आगे कहा।
—मेरी बेटी को आशीर्वाद। उसने देना सीखा था, अब लेना भी सीखे। और अर्जुन को आशीर्वाद। उसने पैसा बहुत कमाया होगा, पर आदमी वह तब बना जब उसने प्यार में बदलना सीखा।
तालियाँ बजीं। अर्जुन ने मीरा का हाथ पकड़ा। वह हाथ अब किसी नौकरी का, किसी दया का, किसी झूठ का हिस्सा नहीं था। वह बराबरी का हाथ था।
रात को ढोल वाले ने आवाज़ लगाई।
—परिवार की पुरानी रस्म! दूल्हा-दुल्हन को चुंबन देना होगा!
मीरा ने अर्जुन की तरफ देखा।
—झूठ जैसा मत करना।
अर्जुन मुस्कुराया।
—अब तुम्हारे साथ झूठ करना आता ही नहीं।
उसने मीरा को ऐसे चूमा जैसे 1 दिन की मजबूरी ने 2 जिंदगियों को रास्ता दिखा दिया हो।
सालों बाद भी जयपुर के उस मोहल्ले में लोग यह कहानी सुनाते थे। कहते थे, एक लड़की को अगले दिन तक मंगेतर चाहिए था। एक करोड़पति ने उसे रोते हुए सुन लिया। वह शादी में झूठा दूल्हा बनकर पहुँचा। फिर जमीन, कर्ज, दलाल, बीमारी, ताने और सच ने सबको घेर लिया।
लेकिन जो लोग उस आँगन में मौजूद थे, वे असली बात जानते थे।
अर्जुन ने मीरा को अकेलेपन से नहीं बचाया।
मीरा ने अर्जुन को खालीपन से बचाया।
और सावित्री देवी की नीली शॉल वाली खाली कुर्सी अब भी हर पारिवारिक समारोह में रखी जाती थी, जैसे वह चुपचाप कह रही हो—
—प्यार किसी को पूरा करने नहीं आता। प्यार वह डर हटाने आता है, जिसके कारण लोग अपने ही घर में सच बोलने से डरते हैं।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.