
PART 1
नीरा माथुर की बेटी का हाथ टूटा हुआ था, और उसका पति उसी रात अपनी तलाकशुदा साली को संभालने उसके फ्लैट भाग गया।
दिल्ली के पटेल नगर वाले उस छोटे से ड्रॉइंग रूम में 12 साल की काव्या सोफे पर सिकुड़ी पड़ी थी। दाहिने हाथ पर अस्थायी पट्टी बंधी थी, चेहरा दर्द से पीला था, और आँखों में वही सवाल था जिसे कोई बच्चा बोलते हुए भी डरता है। सुबह स्कूल के बाहर साइकिल फिसली थी। 4 घंटे सरकारी अस्पताल की भीड़, एक्स-रे, प्लास्टर रूम की गंध और डॉक्टरों की भागदौड़ के बाद वह बस घर आना चाहती थी।
नीरा उसके लिए गरम समोसे और मैंगो शेक लेकर लौटी थी। काव्या ने अस्पताल में बस यही कहा था—
“मम्मा, पापा मेरे पास रहेंगे न?”
नीरा ने बिना सोचे हाँ कहा था।
लेकिन घर आते ही उसने देखा, राजीव अलमारी से जैकेट निकाल रहा था। उसके फोन पर “रितु” नाम चमक रहा था।
रितु, नीरा की बड़ी बहन।
—अभी जा रहे हो? काव्या को देखो कम से कम, नीरा की आवाज काँप गई।
राजीव ने बेटी की तरफ ठीक से देखा भी नहीं।
—रितु अकेली है। उसका तलाक हुआ है। वह टूट चुकी है। अभी मुझे जाना होगा।
नीरा को लगा जैसे किसी ने उसके भीतर की आखिरी दीवार पर हथौड़ा मार दिया हो।
—तुम्हारी बेटी का हाथ टूटा है, राजीव। वह तुम्हें बुला रही थी।
राजीव चिढ़ गया।
—हर बात में ड्रामा मत करो। तुम्हें शुरू से रितु से दिक्कत रही है।
रितु सचमुच नीरा की जिंदगी की सबसे पुरानी दरार थी। बचपन में वह माँ-बाप का सारा ध्यान ले जाती थी। कॉलेज में नीरा की सहेलियाँ छीन लेती थी। शादी के बाद भी उसने वही किया। कभी सिलेंडर उठवाना, कभी पंखा ठीक करवाना, कभी रात 11 बजे “पैनिक अटैक”। राजीव हमेशा चला जाता था। नीरा हर बार खुद को समझाती—बहन मुश्किल में है।
लेकिन उस रात काव्या ने धीमे से कहा—
—पापा, मत जाओ।
राजीव ने दरवाजा खोलते हुए कहा—
—बस थोड़ी देर में आता हूँ, बेटा।
दरवाजा बंद हुआ। बाहर कार स्टार्ट हुई। काव्या ने चेहरा तकिए में छिपा लिया।
नीरा उसके पास बैठी, उसके बाल सहलाए और पहली बार बिना रोए बोली—
—बड़ों की गलती कभी बच्चे की गलती नहीं होती।
रातभर नीरा नहीं सोई। काव्या को दवा देकर सुलाया, फिर 3 बैग निकाले। कपड़े, दवाइयाँ, स्कूल की फाइलें, लैपटॉप, चार्जर। उसने अपनी दोस्त आरती को फोन किया।
—मैं बच्चों को लेकर कुछ दिन तेरे घर आ सकती हूँ?
आरती ने सिर्फ इतना कहा—
—दरवाजा खुला है। अभी आ।
सुबह तक नीरा घर छोड़ चुकी थी। मेज पर उसने एक पर्ची छोड़ी—
“मैं बच्चों को रितु से पीछे खड़ा नहीं होने दूँगी।”
2 दिन बाद नीरा अपना ऑफिस लैपटॉप लेने लौटी। उसे लगा राजीव साइट पर होगा। उसने चाबी घुमाई, चुपचाप अंदर गई।
टीवी बिना आवाज के चल रहा था।
उसी पारिवारिक सोफे पर, जहाँ काव्या दर्द से रोई थी, राजीव और रितु एक-दूसरे की बाँहों में थे।
PART 2
रितु झटके से उठी, दुपट्टा समेटने लगी। राजीव का चेहरा सफेद पड़ गया।
—नीरा, जैसा तुम सोच रही हो वैसा नहीं है।
नीरा ने सोफे को देखा। फिर अपनी बहन को। फिर उस आदमी को, जिसके साथ उसने 17 साल का घर बनाया था।
अचानक हर फोन कॉल, हर देर रात की मदद, हर मिटाया गया मैसेज, हर पारिवारिक समारोह में रितु की मुस्कान—सबका मतलब साफ हो गया।
—मैं तलाक चाहती हूँ, नीरा ने ठंडी आवाज में कहा।
रितु ने होंठ भींचे।
—एक गलती के लिए घर तोड़ोगी? बच्चे क्या सोचेंगे?
नीरा ने उसकी तरफ देखा।
—घर मैंने नहीं तोड़ा। तुमने उसे हथियार की तरह इस्तेमाल किया।
जब नीरा आरती के घर पहुँची, वह दरवाजे पर ही बैठकर टूट गई। कुछ दिन बाद उसने बच्चों को सच बताया। 14 साल का आरव गुस्से से खड़ा हो गया।
—मुझे पता था। मैंने पापा के फोन में दिल वाले मैसेज देखे थे। उन्होंने कहा था मैं गंदी सोच रखता हूँ।
काव्या ने सिर हिलाया।
—नहीं। पापा ऐसा नहीं कर सकते। आप झूठ बोल रही हो क्योंकि आपको मौसी पसंद नहीं।
नीरा की आँखें भर आईं, लेकिन उसने बेटी से झूठ नहीं बोला।
अगले ही दिन दोनों परिवार आरती के घर पहुँच गए। नीरा की माँ ने सबके सामने कहा—
—तू बचपन से रितु से जलती आई है।
फिर उन्होंने नीरा को थप्पड़ मार दिया।
तभी सीढ़ियों से काव्या उतरी। नीला प्लास्टर उसकी बाँह पर चमक रहा था।
—पापा, आपने मुझे दर्द में छोड़ा था। उसके लिए।
PART 3
ड्रॉइंग रूम में कुछ सेकंड तक कोई आवाज नहीं आई। थप्पड़ की गूँज दीवारों में अटकी रही, लेकिन उससे भी भारी काव्या की टूटती हुई आवाज थी। राजीव वहीं सोफे पर बैठ गया, जैसे उसके पैर अचानक उसका भार उठाने से इनकार कर रहे हों।
—काव्या, बेटा, मैं…
—मुझे बेटा मत कहो, काव्या ने धीमे पर साफ कहा।
आरव उसके पीछे खड़ा था। उसकी मुट्ठियाँ भींची हुई थीं, आँखें लाल थीं।
—आपने हम सबको चुना ही कब था? माँ बोलती थी तो आप कहते थे वो शक करती है। मैंने पूछा तो कहा मेरी सोच खराब है। और जब काव्या अस्पताल से आई, तब भी आप मौसी के पास चले गए।
राजीव रोने लगा। वह पहली बार सच में कमजोर दिखा, लेकिन उस कमजोरी में भी बचने की कोशिश थी।
—मैं गलती मानता हूँ। मैं रितु से रिश्ता खत्म कर दूँगा। नीरा, मुझे एक मौका दे दो। बच्चों के लिए।
नीरा ने उसकी तरफ देखा। कभी यही आदमी सुबह की चाय बनाकर उसे जगाता था, बच्चों की फीस भरते हुए गर्व करता था, दिवाली पर लाइट लगाते हुए गिरने से डरता था और फिर भी छत पर चढ़ जाता था। पर अब वह सब किसी पुरानी फिल्म जैसा लग रहा था, जिसका अंत किसी और ने बिगाड़ दिया हो।
—बच्चों के लिए ही तुम्हें इस घर से जाना होगा, उसने कहा।
राजीव की माँ, जो अब तक चुप थीं, अचानक उठीं। उनकी आवाज भारी थी।
—राजीव, आज तूने सिर्फ पत्नी को धोखा नहीं दिया। तूने अपनी बेटी का दर्द भी छोटा कर दिया। हमारे घर मत आना अभी।
राजीव ने हैरानी से माँ को देखा।
—माँ?
—नहीं, उन्होंने चेहरा फेर लिया। इस बार तुझे कोई बचाएगा नहीं।
नीरा के पिता ने अब भी रुखा चेहरा बनाए रखा।
—घर की बात घर में सुलझती है। औरतें जल्दी घर तोड़ देती हैं।
नीरा ने धीरे से अपनी माँ के थप्पड़ वाली जलन पर हाथ रखा।
—नहीं पापा। घर तब टूटता है जब सच बोलने वाली औरत को ही कटघरे में खड़ा किया जाता है।
आरती अब तक दीवार से लगी खड़ी थी। उसने एक फाइल उठाई और मेज पर रख दी।
—और अगर आप सबको सच चाहिए तो यह भी सुनिए। मैंने रितु के पूर्व पति संदीप से बात की है।
नीरा की माँ चीख पड़ीं—
—उस आदमी का नाम मत लो। उसने मेरी बेटी की जिंदगी खराब की।
आरती ने फोन की रिकॉर्डिंग चला दी। संदीप की थकी, डरी हुई आवाज कमरे में फैल गई। उसने बताया कैसे रितु उसे दोस्तों से काटती थी, गालियाँ देती थी, पैसे छिपाती थी, और जब उसने तलाक माँगा तो उसे झूठे आरोपों की धमकी दी। उसने चोटों की तस्वीरें भेजी थीं, चैट्स भेजे थे, बैंक ट्रांसफर के स्क्रीनशॉट भेजे थे।
रितु वहाँ मौजूद नहीं थी, फिर भी उसका चेहरा हर शब्द में उभर रहा था—रोती हुई, झूठ बोलती हुई, और हर बार किसी न किसी को दोषी बना देती हुई।
नीरा की माँ कुर्सी पर बैठ गईं। पहली बार उनके चेहरे पर भरोसा टूटने का डर था, लेकिन पछतावा नहीं।
—ये सब बनावटी भी हो सकता है, उन्होंने कहा।
नीरा ने बस सिर हिलाया।
—हाँ माँ। मेरे दर्द की तरह। मेरी शादी की तरह। काव्या के आँसू की तरह। सब बनावटी ही होगा, क्योंकि सच मानोगी तो तुम्हें अपनी पसंदीदा बेटी को देखना पड़ेगा।
उस रात फैसला हो गया। राजीव को 2 दिन दिए गए। वह घर से अपने कपड़े, कागज और कुछ औजार ले गया। जाते समय उसने डाइनिंग टेबल पर अपनी शादी की अंगूठी छोड़ दी।
कभी नीरा उस अंगूठी को देखकर रो देती। उस दिन उसने उसे उठाया, एक प्लास्टिक फोल्डर में रखा और फाइल पर लिखा—“तलाक के दस्तावेज।”
यही उसकी जगह थी। यादों के डिब्बे में नहीं, सबूतों के बीच।
अगले हफ्ते नीरा ने वकील से मुलाकात की। वह गुरुग्राम के एक शांत ऑफिस में बैठी महिला थी, नाम था अधिवक्ता मीनाक्षी सूद। उसने नीरा की सारी बात सुनी, बीच में टोका नहीं। फिर बोली—
—आपने देर की है, लेकिन बहुत देर नहीं की। बच्चों की प्राथमिक सुरक्षा, घर में आपका आर्थिक योगदान, पति का आचरण, छिपे हुए खर्च—सब देखेंगे।
नीरा ने बैंक स्टेटमेंट, घर की रजिस्ट्री, अपनी नानी से मिले पैसे का रिकॉर्ड, अस्पताल की पर्ची, राजीव के मैसेज और आरव के बयान तक जमा करने शुरू किए। हर कागज उठाना जैसे पुराने घाव को फिर छूना था, लेकिन अब वह घाव शर्म नहीं था। वह प्रमाण था।
इसी बीच घर के भीतर बच्चों की दुनिया अलग-अलग ढंग से टूट रही थी। आरव चुप रहने लगा। स्कूल से आता, खाना खाता और कमरे में बंद हो जाता। कभी-कभी दीवार पर मुक्का मार देता। काव्या अपने नीले प्लास्टर पर बनी सहेलियों की छोटी-छोटी ड्रॉइंग देखती और अचानक रो पड़ती।
राजीव रोज कुछ भेजता। कभी चॉकलेट, कभी टेडी बियर, कभी लंबा मैसेज।
“काव्या से कहो पापा उससे प्यार करते हैं।”
“आरव से कहो मैं हमेशा उसका पिता रहूँगा।”
“बच्चों को मुझसे दूर मत करो।”
नीरा ने कुछ नहीं फेंका। उसने दरवाजे के पास एक टोकरी रख दी।
—यह सब तुम्हारे लिए आया है। रखना है तो रखो, नहीं रखना तो मत रखो।
आरव ने कभी हाथ नहीं लगाया। काव्या कभी-कभी टेडी उठाती, उसे सूँघती, फिर वापस रख देती। उसकी आँखों में प्रेम और अपमान दोनों लड़ते रहते।
नीरा ने बच्चों को काउंसलर के पास ले जाना शुरू किया। करोल बाग की उस छोटी क्लिनिक में दीवारों पर रंगीन चित्र बने थे। पहली बार काव्या ने वहाँ कहा—
—मुझे लगता है अगर मैं उस दिन नहीं गिरती, तो पापा घर नहीं छोड़ते।
काउंसलर ने बहुत धीरे कहा—
—काव्या, किसी बच्चे का गिरना किसी पिता को बेवफा नहीं बनाता।
नीरा बाहर बैठी यह सुन रही थी। उसकी आँखों से आँसू गिरते रहे, लेकिन उसने कोई आवाज नहीं की।
कुछ दिन बाद संदीप ने नीरा को मिलने के लिए बुलाया। वह कनॉट प्लेस के एक पुराने कैफे में आया। साधारण कुर्ता, थके कंधे, आँखों में वह डर जो लंबे समय तक किसी चालाक इंसान के साथ रहने से बस जाता है।
—रितु हमेशा से ऐसी थी, उसने कहा। वह हर रिश्ते को परीक्षा बना देती थी। अगर तुम पास नहीं हुए, तो वह तुम्हें अपराधी साबित कर देती थी।
उसने नीरा को पुराने मैसेज दिखाए। रितु की आवाज वाली ऑडियो क्लिप सुनाई, जिसमें वह संदीप को धमका रही थी—
“अगर तुमने मुझे छोड़ा तो मैं ऐसा रोऊँगी कि सब तुम्हें जानवर समझेंगे।”
नीरा ने फोन मेज पर रख दिया। उसे लगा जैसे उसके बचपन की सारी घटनाएँ अब एक सीधी रेखा बन रही हैं। बास्केटबॉल छोड़ना। कॉलेज की सहेली खोना। शादी के बाद माँ का हर बार रितु का पक्ष लेना। सब अचानक समझ आने लगा।
—तुमने पहले क्यों नहीं बताया? नीरा ने पूछा।
संदीप ने हल्की कड़वी हँसी हँसी।
—क्योंकि हमारे यहाँ आदमी अगर कहे कि पत्नी उसे मारती है, तो लोग पहले हँसते हैं। फिर कहते हैं, मर्द होकर रो रहा है।
उस दिन नीरा ने थाने में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। सिर्फ अपने लिए नहीं। उस सच के लिए जिसे रितु ने वर्षों से आँसुओं के नीचे दबाया था।
तलाक की प्रक्रिया आसान नहीं थी। राजीव ने शुरू में “भावनात्मक कमजोरी”, “परिवार का दबाव”, “गलत समय पर गलत फैसला” जैसे शब्द इस्तेमाल किए। पर मीनाक्षी ने एक-एक परत खोल दी। फिर एक और बात सामने आई—राजीव ने वर्षों से एक अलग बचत खाता छिपा रखा था। उसी पैसे से उसने नोएडा में छोटे फ्लैट की बुकिंग करवाई थी, जबकि घर में वह हमेशा बच्चों की ट्यूशन फीस पर तनाव दिखाता था।
नीरा ने पहली बार अदालत के बाहर हँस दिया। वह हँसी खुशी की नहीं थी, आजादी की शुरुआत की थी।
अदालत ने बच्चों की मुख्य अभिरक्षा नीरा को दी। घर में उसके आर्थिक योगदान और छिपाए गए धन को देखते हुए संपत्ति का फैसला भी उसके पक्ष में गया। राजीव को भरण-पोषण देना पड़ा। उसके पिता ने उसे पारिवारिक निर्माण कंपनी के कई प्रोजेक्ट्स से हटा दिया। जो आदमी मोहल्ले में आदर्श पति और जिम्मेदार पिता कहलाता था, अब लोगों की निगाहों से बचकर चलता था।
रितु की कहानी भी धीरे-धीरे खुली। ऑफिस में शिकायतें बढ़ीं। अनुपस्थिति, झगड़े, झूठे आरोप। नौकरी गई। मकान मालिक ने किराया बढ़ाकर उसे जाने पर मजबूर कर दिया। कुछ महीनों बाद वह एक मॉल के बिलिंग काउंटर पर काम करती दिखी। जो औरत रिश्तों को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करती थी, जब सीढ़ियाँ हट गईं तो जमीन बहुत कठोर निकली।
एक शाम बारिश हो रही थी। नीरा ने दरवाजा खोला तो सामने रितु खड़ी थी। चेहरा सूखा, बाल बिखरे, हाथ में पुराना बैग।
—नीरा, मुझे बस कुछ दिनों के लिए रहने दे। मैं सच में अकेली हूँ।
नीरा ने उसकी आँखों में देखा। वहाँ आँसू थे, लेकिन आँसुओं के पीछे वही पुराना हिसाब भी था।
रितु ने एक मुड़ा हुआ कागज आगे बढ़ाया।
—मैंने सब लिख दिया है। मुझे तुझसे जलन थी। तेरे बच्चों से, तेरे घर से, इस बात से कि कोई तुझे सच में चाहता था।
नीरा ने कागज ले लिया।
—मैं इसे पढ़ूँगी। ताकि फिर कभी खुद पर शक न करूँ।
रितु ने राहत की साँस ली।
—तो मैं अंदर आ जाऊँ?
नीरा ने दरवाजे की चौखट पर हाथ रख दिया।
—नहीं। तू बिस्तर नहीं माँग रही, रितु। तू परिणामों से बचने की जगह माँग रही है।
रितु का चेहरा तुरंत बदल गया।
—तुझे लगता है तू मुझसे बेहतर है?
नीरा ने बहुत शांत होकर कहा—
—नहीं। मुझे सिर्फ इतना लगता है कि मेरे बच्चे इस घर में सुरक्षित रहने के हकदार हैं।
उसने दरवाजा बंद कर दिया। बाहर बारिश चलती रही। अंदर पहली बार घर सचमुच शांत लगा।
माँ-बाप ने भी लौटने की कोशिश की। माँ ने फोन पर रोते हुए कहा कि परिवार टूटना नहीं चाहिए। पिता ने कहा कि खून के रिश्ते काटे नहीं जाते। नीरा ने उन्हें एक बार मिलने बुलाया। लाजपत नगर की एक रेस्टोरेंट में वे बैठे। माँ ने रितु की मजबूरी गिनाई। पिता ने राजीव को “भटका हुआ आदमी” कहा।
नीरा ने पानी का गिलास रखा और पूछा—
—पूरी जिंदगी आपने मुझे उन लोगों को समझने को कहा जिन्होंने मुझे चोट पहुँचाई। कभी पूछा कि मैं कैसी हूँ?
माँ चुप रहीं।
—मैं आपसे नफरत नहीं करती, नीरा बोली। लेकिन अब आपको मेरे जीवन में बिना दरवाजा खटखटाए आने की इजाजत नहीं है।
वह बिल चुकाकर चली गई। बाहर धूप तेज थी, फिर भी उसे साँस हल्की लगी।
समय ने सब ठीक नहीं किया। समय ने बस दर्द को रहने लायक बना दिया।
काव्या ने सीखा कि वह अपने पिता की पुरानी यादों से प्यार कर सकती है, बिना उस रात को माफ किए। आरव ने स्कूल की बास्केटबॉल टीम जॉइन की। पहले मैच में नीरा और आरती स्टैंड में बैठी थीं। जब आरव ने लगातार 3 बास्केट किए, नीरा इतनी जोर से चिल्लाई कि वह शर्म से सिर झुका गया। लेकिन अगले मैच में उसने सबसे पहले स्टैंड की तरफ देखा—माँ आई है या नहीं।
आरती अब सिर्फ दोस्त नहीं रही। वह वह बहन थी जिसे खून ने नहीं, मुश्किल ने चुना था।
संदीप भी धीरे-धीरे परिवार जैसा हो गया। वह बच्चों के लिए किताबें लाता, कभी पिज्जा, कभी बोर्ड गेम। बाद में उसने अपने साथी कबीर से मिलवाया। उसने बताया कि उसने अपनी पहचान वर्षों तक छिपाई, क्योंकि रितु हर कमजोरी को हथियार बना देती थी। कबीर शांत था, पक्षियों की तस्वीरें खींचता था। काव्या उसे पार्क में दिखे हर पक्षी की फोटो भेजती।
नीरा ने भी जीना फिर से सीखा। उसने काम में प्रमोशन लिया, अपना बैंक खाता मजबूत किया, रात को अकेले सोना सीखा। एक फिटनेस क्लास में उसकी मुलाकात मीरा से हुई, जिसने एक दिन अपने भाई विवेक से मिलवाया। विवेक अस्पताल में नर्सिंग सुपरवाइजर था, कम बोलता था, ध्यान से सुनता था। उसने नीरा से कॉफी पूछी।
नीरा डर गई।
उसने उसी रात बच्चों से बात की।
आरव ने कंधे उचकाए।
—आपको खुश रहने का हक है, मम्मा।
काव्या ने गंभीर होकर पूछा—
—उसे पता है हमें नए पापा की जरूरत नहीं?
नीरा मुस्कुराई।
—उसे पता है। और मुझे भी किसी बचाने वाले की जरूरत नहीं। बस कॉफी है।
राजीव को पता चला तो वह एक रविवार घर आया। अब वह पहले जैसा चमकता हुआ आदमी नहीं था। बालों में सफेदी, चेहरे पर थकान, आवाज में पछतावा।
—मैं माफी माँगने आया हूँ, उसने कहा। उस रात के लिए। तुम्हारे लिए। बच्चों के लिए।
नीरा ने सुना।
—माफी सुन ली, उसने कहा।
राजीव की आँखों में उम्मीद चमकी।
—क्या कभी…
—नहीं, नीरा ने बीच में ही कहा। मैं आज शाम कॉफी पर जा रही हूँ।
राजीव ने सिर झुका लिया।
काव्या कुछ महीनों तक उससे मिलती रही। फिर एक दिन लौटकर बोली—
—मैंने उन्हें मौका दिया था। उन्होंने उस मौके को मुझसे आपसे बात करवाने में खर्च कर दिया।
उसके बाद वह नहीं गई। नीरा ने उसे रोका नहीं, धक्का भी नहीं दिया। बच्चों को अब अपने निर्णयों पर भरोसा करना सीखना था।
साल बीतते गए। आरव लंबा, मजबूत और शांत हुआ। काव्या की हँसी लौट आई, पहले से ज्यादा सावधान मगर सच्ची। नीरा ने घर की दीवारों पर नई तस्वीरें लगाईं। पुराने सोफे को बेच दिया। उसकी जगह एक नया नीला सोफा आया, जिस पर काव्या ने पहला नियम बनाया—
—यहाँ कोई झूठ बोलने वाला नहीं बैठेगा।
सब हँसे, लेकिन नीरा की आँखें भर आईं।
रितु कहीं बाहरी दिल्ली में नौकरी कर रही थी, ऐसा सुनने में आया। माता-पिता उसकी मदद करते रहे। नीरा ने अब दुखी होना छोड़ दिया था। जिन्हें हमेशा आरामदेह झूठ पसंद था, वे उसी के साथ रह सकते थे।
राजीव शहर छोड़कर पुणे चला गया। उसने कभी-कभी संदेश भेजे, त्योहारों पर पैसे भेजे, लेकिन घर की धुरी अब उसके बिना घूमना सीख चुकी थी।
एक जून की शाम, आरव के मैच के बाद काव्या स्टैंड में नीरा के पास बैठी। मैदान पर सूरज ढल रहा था। आरव अब भी अकेला अभ्यास कर रहा था, जैसे हर शॉट से खुद को साबित कर रहा हो।
—मम्मा, काव्या ने पूछा, आपको तलाक का पछतावा है?
नीरा ने दूर देखा। उसे वह रात याद आई—ठंडा होता मैंगो शेक, नीला प्लास्टर, खाली दरवाजा, सोफे पर मिला धोखा, माँ का थप्पड़, और वह क्षण जब बेटी ने कहा था, “आपने मुझे दर्द में छोड़ा था।”
—नहीं, उसने कहा। मुझे सिर्फ इस बात का पछतावा है कि मुझे खुद को बचाने का हक समझने के लिए पहले अपने बच्चों को चोट खाते देखना पड़ा।
काव्या ने सिर उसकी बाँह पर रख दिया।
—मुझे पछतावा नहीं कि मैंने आखिर में आप पर भरोसा किया।
नीरा ने उसे बाँहों में भर लिया। इस बार बाहर कोई कार स्टार्ट नहीं हो रही थी। कोई गलत इंसान को सांत्वना देने नहीं जा रहा था। कोई बच्चा दर्द में अकेला नहीं छोड़ा गया था।
कुछ धोखे परिवार तोड़ देते हैं।
कुछ धोखे बस यह दिखा देते हैं कि परिवार में सच में कौन था।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.