
PART 1
— आपकी बाँह पर जो टूटी हुई दिशा-सूचक सुई बनी है, बिल्कुल वैसा ही निशान हमारी मम्मी के कंधे के पीछे भी है।
लोधी गार्डन की भीगी घास के पास बैठे अर्जुन मल्होत्रा के हाथ से चाय का कागज़ी कप छूटकर उसके जूतों पर गिर गया। रविवार की हल्की ठंड थी। वह अपने 6 साल के बेटे ईशान की साइकिल की उतर गई चेन ठीक कर रहा था, इसलिए उसकी कुर्ते की बाँह कोहनी तक चढ़ी हुई थी। बाएँ हाथ पर पुराना टैटू साफ दिख रहा था—एक टूटी हुई दिशा-सूचक, जिसकी सुई बीच से फटी हुई थी और ऊपर का छोटा सितारा आधा मिट चुका था।
उसके सामने 3 बच्चियाँ खड़ी थीं।
तीनों करीब 7 साल की लग रही थीं। एक जैसी नेवी ब्लू फ्रॉक, सफेद कार्डिगन, चमकते काले जूते और बालों में मोती जैसे क्लिप। उनकी चाल में अमीरी थी, पर आँखों में वह चुप्पी थी जो अक्सर उन बच्चों में होती है जिन्हें खुलकर हँसने से पहले भी इजाज़त लेनी पड़ती है।
अर्जुन की आवाज़ सूख गई।
— तुमने क्या कहा?
बीच वाली बच्ची ने उसकी बाँह की तरफ इशारा किया।
— यही निशान। मम्मी कहती हैं, यह जवानी की सबसे बड़ी गलती थी।
अर्जुन का सीना जैसे किसी ने भीतर से कस दिया।
यह कोई दुकान से चुना हुआ डिज़ाइन नहीं था। 8 साल पहले मुंबई की बारिश भरी रात में, मरीन ड्राइव के पास एक छोटी सी टैटू शॉप में उसने यह निशान खुद कागज़ के नैपकिन पर बनाया था। उस रात उसके साथ एक लड़की थी, जिसने अपना नाम रिया बताया था। वह किसी ताकतवर खानदान से भागी हुई थी। अर्जुन अपनी माँ की मौत के बाद बिखरा हुआ था। दोनों ने सुबह 4 बजे वही टूटी दिशा-सूचक बनवाई थी, क्योंकि दोनों में से कोई नहीं जानता था कि जिंदगी किस तरफ ले जा रही है।
— तुम्हारी मम्मी का नाम क्या है? अर्जुन ने मुश्किल से पूछा।
बच्ची जवाब देती, उससे पहले ग्रे साड़ी और मोती की माला पहने एक नर्सनुमा आया दौड़ती हुई आई।
— आर्या! तारा! काव्या! पीछे हटो अभी!
उसने तीनों को लगभग खींच लिया, जैसे अर्जुन कोई खतरा हो।
— माफ कीजिए साहब, बच्चों को अजनबियों से बात नहीं करनी चाहिए।
अर्जुन खड़ा हो गया। उसके हाथ लकड़ी की धूल से भरे थे, नाखूनों में गोंद अटका था। उन साफ-सुथरी बच्चियों के सामने वह दूसरी दुनिया का आदमी लग रहा था।
— बस एक नाम बता दीजिए।
आया का चेहरा और सफेद पड़ गया।
— मैडम मेहरा को पता चला तो मेरी नौकरी चली जाएगी।
मेहरा।
यह नाम हथौड़े की तरह अर्जुन की छाती पर पड़ा।
रिया मेहरा। मेहरा हेरिटेज होटल्स की मालिक, दिल्ली और जयपुर के महलों को लग्ज़री होटल में बदलने वाली करोड़पति महिला, जिसका चेहरा बिज़नेस मैगज़ीनों पर आता था। वही रिया, जिसे अर्जुन ने कभी एक सस्ती सी गेस्टहाउस की खिड़की के पास रोते देखा था।
काली कार में बैठते हुए तारा ने मुड़कर अर्जुन को देखा।
उसकी आँखें हल्की भूरी थीं।
बिल्कुल रिया जैसी।
उस रात शाहपुर जाट के अपने छोटे से फ्लैट में अर्जुन ने खाना नहीं छुआ। ईशान मेज़ पर ड्रैगन बना रहा था।
— पापा, मेरा ड्रैगन 3 सिर वाला है।
3।
ईशान के सो जाने के बाद अर्जुन ने लैपटॉप खोला और खोजा—रिया मेहरा जुड़वाँ बेटियाँ।
पर तस्वीरों में जुड़वाँ नहीं, 3 बच्चियाँ थीं। रिया किसी चैरिटी गाला में, रिया जयपुर पैलेस होटल के उद्घाटन में, रिया अपनी 3 बेटियों के साथ। हर खबर में एक ही लाइन थी—“सिंगल मदर, निजी जीवन पर चुप।”
फिर एक फोटो मिली। रिया की पीठ कैमरे की तरफ थी। ब्लाउज़ का कट कंधे के पीछे तक खुला था।
वही टूटी दिशा-सूचक।
अगली सुबह अर्जुन मेहरा ग्रुप के कनॉट प्लेस वाले मुख्यालय पहुँचा। संगमरमर की लॉबी में उसकी साधारण शर्ट और घिसे जूते देखकर रिसेप्शन की लड़की की मुस्कान और ठंडी हो गई।
— मुझे रिया मेहरा से मिलना है।
— अपॉइंटमेंट है?
— कह दो अर्जुन आया है।
— मैडम बिना अपॉइंटमेंट किसी से नहीं मिलतीं।
अर्जुन ने एक कागज़ पर लिखा—“टूटी दिशा-सूचक।”
15 मिनट बाद उसे ऊपर ले जाया गया।
रिया शीशे की दीवार के सामने खड़ी थी। क्रीम रंग की साड़ी, हीरे के छोटे झुमके, बंधे बाल, चेहरा पत्थर जैसा। पर अर्जुन को देखते ही उसकी उँगलियाँ कुर्सी के किनारे में धँस गईं।
— तुम…
— हाँ, मैं।
— क्या चाहते हो?
— सच।
रिया ने धीमे से साँस ली।
— तुम्हें उनसे कभी नहीं मिलना चाहिए था।
— वे मेरी बेटियाँ हैं?
कमरे की खामोशी ने जवाब दे दिया।
— हाँ, रिया ने कहा।
अर्जुन पीछे हट गया।
— तुम्हें जन्म से पता था?
— हाँ।
— और तुमने मुझे 7 साल अँधेरे में रखा?
रिया की आवाज़ ठंडी हो गई।
— मैंने उन्हें बचाया।
— अपने पिता से?
— एक ऐसे आदमी से, जिसे मैं सिर्फ 1 कमजोर रात से जानती थी।
अर्जुन की मुट्ठियाँ कस गईं।
— तुम मुझे ढूँढ़ सकती थीं।
रिया ने दराज़ खोली और एक फाइल बाहर रखी।
— मैंने ढूँढ़ा था। तुम 1 छोटे फ्लैट में रहते थे, कर्ज़ में डूबे थे, एक बच्चे को अकेले पाल रहे थे, और तुम्हारी फर्नीचर वर्कशॉप हर 2 महीने में बंद होने की कगार पर होती थी। मैं अपनी बेटियों को उस अस्थिरता में नहीं डाल सकती थी।
— हमारी बेटियाँ।
रिया का चेहरा सख्त हो गया।
— यह शब्द दोबारा मत कहना।
— तुम मुझे मिटा नहीं सकती।
— 7 साल से कर चुकी हूँ।
फिर वह और पास आई।
— और अगर तुम उनके आसपास फिर दिखे, अर्जुन, तो तुम्हारे बेटे के लिए जो थोड़ा-बहुत बनाया है, वह भी छिन जाएगा।
उस शाम अर्जुन जब अपनी वर्कशॉप पहुँचा, दरवाज़ा आधा खुला था।
मेज़ पर सफेद लिफाफा रखा था।
अंदर 5 करोड़ रुपये का चेक था।
साथ में सिर्फ 1 लाइन—
“हमारी जिंदगी से गायब हो जाओ।”
PART 2
अर्जुन बहुत देर तक चेक को देखता रहा।
5 करोड़। इससे उसका कर्ज़ उतर सकता था, ईशान के स्कूल की फीस सुरक्षित हो सकती थी, वर्कशॉप बच सकती थी, किराए के घर की दीवारों से सीलन हट सकती थी। पहली बार वह अपने बेटे से “अगले महीने” नहीं कहता।
दरवाज़ा खुला।
रिया भीतर आई। उसके साथ कोई ड्राइवर नहीं, कोई सहायक नहीं। सिर्फ काला शॉल और चेहरे पर वही अमीर डर।
— यह साफ रास्ता है, उसने कहा। तुम कागज़ पर साइन करो। न दावा, न मुलाकात, न सच।
अर्जुन ने चेक उठाया।
— तुम मुझे खरीद रही हो?
— मैं अपनी बेटियों को बचा रही हूँ।
— नहीं, तुम अपना नाम बचा रही हो।
रिया का चेहरा टूटने लगा।
— तुम नहीं जानते, मैं अकेली थी। 3 समय से पहले जन्मी बच्चियाँ, अस्पताल का कमरा, पिता की मौत, चाचा बोर्ड पर कब्ज़ा चाहते थे, वकील मेरे बिस्तर के पास खड़े थे। मुझे हर तरफ से लड़ना पड़ा।
— मुझे कब ढूँढ़ा?
रिया चुप रही।
— कब?
— जब वे 2 साल की थीं।
अर्जुन को लगा किसी ने थप्पड़ मार दिया।
— यानी 5 साल से जानती थीं।
— हाँ।
— ईशान के बारे में भी?
— हाँ।
अर्जुन ने चेक को देखा। उसकी उँगलियाँ काँपीं। फिर उसने उसे बीच से फाड़ दिया। 1, 2, 3, 4 टुकड़े।
रिया का चेहरा सफेद पड़ गया।
— तुम पछताओगे।
पीछे से छोटी आवाज़ आई।
— मम्मी… उसने इतने पैसे क्यों फाड़ दिए?
दोनों पलटे।
आर्या, तारा और काव्या दरवाज़े पर खड़ी थीं।
उन्होंने सब सुन लिया था।
PART 3
— क्या ये हमारे पापा हैं?
आर्या ने यह बात बहुत धीरे कही, लेकिन अर्जुन की वर्कशॉप में वह आवाज़ लकड़ी काटने वाली मशीन से भी तेज़ लगी।
रिया वहीं जम गई। वह महिला, जो 300 कमरों वाले होटल खरीदते समय नहीं काँपती थी, जो मंत्रियों, निवेशकों और अपने लालची रिश्तेदारों को एक मुस्कान से रोक देती थी, अपनी 3 बेटियों के सामने बोलना भूल गई।
अर्जुन की हालत भी अलग नहीं थी। उसकी हथेलियों में लकड़ी की धूल थी, शर्ट की बाँह पर गोंद का दाग था, आँखों में 7 साल की चोरी हुई सुबहें थीं। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि एक टूटी दिशा-सूचक उसे इस तरह 3 मासूम चेहरों के सामने खड़ा कर देगी।
काव्या ने ज़मीन पर पड़े चेक के टुकड़े देखे।
— मम्मी, आप चाहती थीं कि ये चले जाएँ?
रिया ने उसकी तरफ कदम बढ़ाया।
— काव्या, मेरी बात सुनो…
तारा पीछे हट गई।
यह छोटा सा कदम रिया के लिए किसी अदालत के फैसले से कम नहीं था।
— आप चाहती थीं कि ये चले जाएँ क्योंकि ये अमीर नहीं हैं? तारा ने पूछा।
अर्जुन ने गर्दन झुका ली। बच्ची के मुँह से निकला सच किसी भी अपमान से ज्यादा गहरा था।
— नहीं, रिया ने टूटी आवाज़ में कहा।
— फिर क्यों? आर्या की आँखें गीली थीं, पर आवाज़ सीधी थी।
रिया ने अर्जुन की तरफ देखा, जैसे अब भी झूठ बोलने की इजाज़त माँग रही हो। अर्जुन ने कुछ नहीं कहा। उसकी चुप्पी ही जवाब थी।
रिया धीरे से लकड़ी की पुरानी कुर्सी पर बैठ गई। पहली बार वह करोड़पति होटल मालकिन नहीं लग रही थी। वह सिर्फ एक माँ थी, जिसे अपनी ही बनाई दीवारों के नीचे दबना पड़ रहा था।
— क्योंकि मैं डर गई थी, उसने कहा। बहुत डर गई थी। मुझे लगा, मेरा परिवार तुम लोगों को मुझसे छीन लेगा। मुझे लगा, लोग कहेंगे कि रिया मेहरा ने अपने खानदान की इज्जत एक अनजान आदमी के साथ बर्बाद कर दी। मुझे लगा, अगर अर्जुन तुम्हारी जिंदगी में आया, तो तुम लोग मुझसे कम प्यार करोगी।
तीनों बच्चियाँ चुप रहीं।
रिया की आँख से आँसू गिरा।
— इसलिए मैंने वही किया जो मैं हमेशा करती हूँ। मैंने सब नियंत्रित किया। पैसे दिए। सच छिपाया। फैसले अकेले लिए। और उसे सुरक्षा का नाम दे दिया।
अर्जुन के भीतर की आग धीमी नहीं हुई, बस उसका रंग बदल गया। वह अब सिर्फ उस अमीर औरत को नहीं देख पा रहा था जिसने उसे खरीदा समझा था। उसे वह भी याद आ रही थी जो 8 साल पहले बारिश में काँपते हुए बोली थी कि उसे अपने ही घर में साँस नहीं आती।
पर समझ लेना माफ करना नहीं था।
— तुम्हें अधिकार नहीं था, अर्जुन ने कहा।
रिया ने सिर झुका दिया।
— मुझे पता है।
— नहीं, अभी नहीं पता। तुमने मेरे 7 साल चुरा लिए। उनसे उनका आधा सच छिपा लिया। और ईशान को, सिर्फ इसलिए कि वह छोटे घर में रहता था, अपनी बहनों से मिलने लायक भी नहीं समझा।
तभी भीतर वाले कमरे का पर्दा हिला।
ईशान नींद भरी आँखों के साथ बाहर आया। हाथ में उसका पुराना प्लास्टिक ट्रक था।
— पापा, ये 3 लड़कियाँ रात में वर्कशॉप में क्यों आई हैं?
किसी ने तुरंत जवाब नहीं दिया।
तारा ने उसे ध्यान से देखा।
— शायद तुम्हारे पापा हमारे भी पापा हैं।
ईशान ने आँखें फैलाईं।
— तीनों के?
— हाँ।
ईशान ने कुछ सेकंड सोचा।
— फिर तो मेरे जन्मदिन पर गिफ्ट बढ़ जाएँगे।
काव्या हँस पड़ी। फिर तारा। आर्या ने हँसी रोकने की कोशिश की, मगर उसके होंठ काँप गए।
वह छोटी सी हँसी रिया के दिल में चाकू की तरह लगी। क्योंकि उसी पल उसे दिख गया कि उसने 7 साल तक किस सहज रिश्ते को जन्म लेने से रोका था।
अर्जुन बच्चियों के सामने बैठ गया।
— मुझे नहीं पता था कि तुम लोग हो। अगर पता होता, तो मैं तुम्हें खोजता। शायद ठीक तरीके से नहीं, शायद बहुत डरते हुए, लेकिन आता जरूर।
आर्या ने उसके टैटू को देखा।
— मम्मी कहती थीं, कुछ लोग हमारे पैसे के लिए पास आते हैं।
— कुछ लोग आते हैं, अर्जुन ने कहा। मगर सभी नहीं।
— कैसे पता चले?
अर्जुन ने फटे हुए चेक की तरफ देखा।
— शुरुआत में हमेशा पता नहीं चलता। पर देखो, आदमी क्या करता है जब उसके सामने पैसा और रिश्ता दोनों रखे हों।
तारा नीचे झुकी, चेक का एक टुकड़ा उठाया।
— यह सच में बहुत पैसा था?
— हाँ।
— फिर आपने फाड़ क्यों दिया?
अर्जुन ने हल्की मुस्कान से कहा।
— क्योंकि हर भूख पैसों से नहीं मिटती।
काव्या ने धीमे से कहा।
— शायद आप डरपोक नहीं हैं।
रिया ने आँखें बंद कर लीं।
उस रात किसी ने कोई बड़ा फैसला नहीं किया। न कोई फिल्मी गले लगना हुआ, न अचानक परिवार बन गया। अर्जुन ने साफ कहा कि 7 साल एक शाम में वापस नहीं आ सकते। उसे कानूनी पहचान चाहिए, बेटियों से मिलने का अधिकार चाहिए, और बच्चियों को सच जानने का सुरक्षित रास्ता चाहिए।
रिया के चेहरे पर पुरानी आदत लौटने लगी।
— तुम मुझ पर केस करोगे?
— मैं अपनी बेटियों की जिंदगी में कानूनी जगह माँगूँगा। यह हमला नहीं, उनका अधिकार है।
“अधिकार” शब्द वर्कशॉप में देर तक गूँजता रहा। रिया ने विरासत, शेयर, अनुबंध, होटल, बोर्ड मीटिंग और गुप्त समझौतों की भाषा बहुत सीखी थी। उसने भूल गई थी कि बच्चों के सच का भी एक अधिकार होता है।
— ठीक है, उसने कहा।
आर्या ने तुरंत पूछा।
— और हमें? हमें कुछ तय करने का अधिकार है?
अर्जुन ने उसकी तरफ देखकर कहा।
— तुम्हें डरने, गुस्सा होने, सवाल पूछने और समय लेने का पूरा अधिकार है। कोई तुम्हें मुझे प्यार करने के लिए मजबूर नहीं करेगा।
काव्या ने ईशान को देखा।
— इसे भी नहीं?
ईशान ने ट्रक उठाकर कहा।
— मुझे प्यार करना आसान है। मेरे पास ट्रक है।
इस बार तीनों सचमुच हँस पड़ीं।
अगले दिन से रिया की चमकदार दुनिया में दरारें पड़ने लगीं। मेहरा हाउस में सुबह से फोन बजने लगे। उसके चाचा राजीव मेहरा, जो हमेशा परिवार की इज्जत के नाम पर कंपनी की कुर्सी चाहते थे, उसके दफ्तर में तूफान की तरह घुसे।
— तुम शाहपुर जाट के बढ़ई को मेहरा परिवार में घुसने दोगी?
रिया ने रात भर नींद नहीं ली थी, पर उसकी आवाज़ पहली बार सच के कारण मजबूत थी।
— वह बढ़ई नहीं, मेरी बेटियों का पिता है।
— वह पैसा माँगेगा।
— उसने 5 करोड़ फाड़ दिए।
राजीव हँसा।
— गरीब लोग शुरुआत में नाटक करते हैं।
रिया को अर्जुन के काँपते हाथ याद आए। वह लालच से नहीं काँप रहा था, टूटने से बचने के लिए काँप रहा था।
— बाहर जाइए, रिया ने कहा।
— क्या?
— मेरे दफ्तर से बाहर जाइए। और अगर मेरी बेटियों को फिर कभी परिवार की संपत्ति कहा, तो बोर्ड में आपकी कुर्सी भी नहीं बचेगी।
यह रिया मेहरा की जिंदगी का पहला फैसला था जो डर से नहीं, शर्म से पैदा हुए साहस से निकला था।
उधर अर्जुन एक फैमिली लॉ सलाहकार के पास पहुँचा। हाथ में फाइल थी—अपना आधार, ईशान का जन्म प्रमाणपत्र, वर्कशॉप के कागज़, और अखबारों से छपी तस्वीरें। उसकी आवाज़ में संकोच था।
— मैं बच्चों को उनकी माँ से छीनना नहीं चाहता। बस चाहता हूँ कि वे जानें कि मैं हूँ।
सलाहकार ने चश्मा उतारकर कहा।
— पिता के रूप में पहचाने जाना छीनना नहीं होता, जिम्मेदारी स्वीकार करना होता है।
यह वाक्य अर्जुन के अंदर देर तक बैठा रहा।
फिर वे दिन आए जिन्हें कोई सोशल मीडिया पोस्ट सुंदर नहीं बना सकती थी। कानूनी नोटिस, डीएनए टेस्ट, काउंसलिंग, बच्चियों के रोके गए सवाल, रिया की थकान, अर्जुन की घबराहट, ईशान की उलझन। टेस्ट ने वही कहा जो टैटू पहले ही बता चुका था—अर्जुन आर्या, तारा और काव्या का जैविक पिता था।
रिया ने रिपोर्ट कार में अकेले पढ़ी और स्टीयरिंग पर सिर रखकर रोई।
अर्जुन ने रिपोर्ट वर्कशॉप में पकड़े-पकड़े पूरी दोपहर काट दी। ईशान ने आकर पूछा—
— मतलब वे सच में मेरी बहनें हैं?
— हाँ।
— तीनों?
— हाँ।
— ठीक है। लेकिन मेरी पतंग कोई नहीं छुएगा।
पहली आधिकारिक मुलाकात साउथ दिल्ली के एक पारिवारिक मध्यस्थता केंद्र में हुई। कमरा बहुत साफ था, जैसे वहाँ दर्द को भी फाइल में रखकर बुलाया जाता हो। रिया बेटियों के साथ आई। अर्जुन ईशान के साथ आया, जिसने “गंभीर दिखने” के लिए अपनी सबसे अच्छी नीली शर्ट पहनी थी।
आर्या चुप थी। तारा सवालों से भरी हुई थी। काव्या अर्जुन की हथेलियों को देख रही थी, जैसे समझना चाहती हो कि लकड़ी से मेज बनाने वाला आदमी उसकी कहानी से कैसे जुड़ गया।
— आप लकड़ी का काम क्यों करते हैं? काव्या ने पूछा।
— क्योंकि मुझे उन चीजों को ठीक करना अच्छा लगता है जो अभी टूटकर पूरी तरह खत्म नहीं हुईं।
रिया ने नीचे देखा।
अर्जुन को अपनी ही बात भारी लगी, पर काव्या ने धीरे से पूछा।
— और जो पूरी तरह टूट जाए?
— उसे जबरदस्ती नहीं जोड़ते। कभी-कभी उसका एक टुकड़ा संभालकर रख लेते हैं, याद के लिए।
कुछ हफ्तों बाद बच्चियाँ पहली बार 2 घंटे के लिए उसकी वर्कशॉप आईं। रिया बाहर कार में बैठी रही। वह काँच के पार देखती रही, जैसे पहली बार समझ रही हो कि बच्चे माँ के डर के बिना भी साँस ले सकते हैं।
अंदर ईशान ने उन्हें औज़ार दिखाए।
— यह सैंडर है, बहुत शोर करता है। यह क्लैम्प है, उँगली फँसाओगे तो रोओगे। यह वाली मशीन मत छूना, वरना पापा अपनी भारी आवाज़ निकालेंगे।
तारा ने हर चीज़ नापनी शुरू कर दी। आर्या ने कहा कि उसे बोरियत हो रही है, लेकिन वह अर्जुन की हर हरकत देख रही थी। काव्या ने चेरी की लकड़ी पर हाथ रखा।
— यह गरम लग रही है।
— लकड़ी हाथों की गर्मी थोड़ी देर तक रखती है, अर्जुन ने कहा।
काव्या ने हाथ नहीं हटाया।
महीनों में सच आसान नहीं हुआ, मगर जीने लायक बनने लगा।
आर्या ने 3 दिन तक रिया से बात नहीं की, जब उसे पता चला कि उसके बचपन की एक भी तस्वीर अर्जुन को कभी नहीं भेजी गई। तारा ने पूछा कि लंबे झूठ के लिए माँ पर मुकदमा हो सकता है या नहीं। काव्या एक रात रोती रही क्योंकि उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसका बचपन खुश था या सिर्फ सुंदर तरीके से सजाया गया झूठ।
रिया ने सब सहा। कभी टूटकर, कभी चिढ़कर, कभी चुप रहकर, लेकिन इस बार भागी नहीं।
एक बुधवार अर्जुन ने रिया से कहा—
— बाहर मत रुको। अंदर आ जाओ।
रिया वर्कशॉप के दरवाज़े पर ठिठक गई। उसकी महँगी साड़ी लकड़ी की धूल से डर रही थी, पर उसके कदम आखिर भीतर आ गए।
चारों बच्चे मेज़ के आसपास थे। ईशान पेंसिल कान के पीछे लगाए खड़ा था। तारा स्क्रू आकार के हिसाब से जमा रही थी। काव्या छोटी डिब्बी पर रंग लगा रही थी। आर्या एक लकड़ी की पट्टी को पूरी गंभीरता से घिस रही थी।
अर्जुन ने 3 छोटे पेंडेंट मेज़ पर रखे।
चेरी की लकड़ी से बनी 3 दिशा-सूचक।
इस बार टूटी हुई नहीं।
ऊपर का सितारा पूरा था।
आर्या ने अपना पेंडेंट सबसे पहले उठाया।
— यह टूटी क्यों नहीं है?
अर्जुन ने रिया को देखा, फिर तीनों बेटियों को।
— क्योंकि बच्चे उन रास्तों के लिए जिम्मेदार नहीं होते जहाँ बड़े लोग भटक जाते हैं।
रिया ने मुँह पर हाथ रख लिया।
काव्या ने पेंडेंट गले में पहन लिया।
— क्या हम अगले बुधवार फिर आ सकते हैं?
सवाल बहुत छोटा था। उसमें विरासत नहीं थी, पैसा नहीं था, जीत नहीं थी। सिर्फ समय माँगा गया था।
रिया ने अर्जुन की तरफ देखा। अर्जुन ने जवाब नहीं दिया। यह अधिकार अब रिया को बच्चों से छीनना नहीं था।
रिया ने धीमे से कहा।
— हाँ, अगर तुम लोग चाहो।
आर्या ने आँखें तरेरीं।
— बिना झूठ?
रिया पास आई। बहुत धीरे, जैसे घायल बच्चे के पास जाते हैं।
— बिना झूठ।
आर्या ने उसे गले नहीं लगाया। उस दिन नहीं। मगर जब रिया ने उसके कंधे पर हाथ रखा, वह पीछे भी नहीं हटी।
शायद असली माफी ऐसी ही शुरू होती है—किसी बड़े संवाद से नहीं, बस पीछे न हटने से।
अर्जुन अमीर नहीं हुआ। रिया अचानक देवी जैसी माँ नहीं बन गई। बच्चे तस्वीरों वाला परफेक्ट परिवार नहीं बने। अभी भी जलनें थीं, उलझनें थीं, जन्मदिन पर असहज चुप्पियाँ थीं, मेहरा परिवार के डिनर में तिरछी निगाहें थीं। कभी ईशान को लगता, उसके पापा अब बाँट दिए गए हैं। कभी आर्या को लगता, उसका सच बहुत देर से आया। कभी रिया रात में बच्चियों के कमरे के बाहर खड़ी होकर खुद को कोसती रहती।
मगर हर बुधवार 3 नीली कारों में नहीं, कभी-कभी मेट्रो से भी, वे बच्चियाँ शाहपुर जाट पहुँचने लगीं।
उनके महँगे जूतों पर लकड़ी की धूल लगती। उनके बालों में परफ्यूम के साथ वार्निश की हल्की गंध मिल जाती। ईशान उन्हें “मेरी रॉयल बहनें” कहता। तारा जवाब देती कि वह “गणितीय रूप से परेशान करने वाला भाई” है। काव्या हँसती। आर्या कहती उसे यह सब बचकाना लगता है, पर फिर भी हर बार सबसे पहले आती।
एक शाम बारिश हो रही थी। वर्कशॉप बंद हो चुकी थी। बच्चे अंदर अपना सामान समेट रहे थे। बाहर शटर के पास रिया और अर्जुन खड़े थे। उनके बीच न प्यार था, न पुरानी रात को दोबारा जीने की कोई कोशिश। बस एक लंबा, अधूरा सच था।
— मुझे माफ कर दो, रिया ने कहा।
इस बार यह वाक्य सौदे की भाषा में नहीं था।
अर्जुन ने अपनी बाँह पर बने टूटे टैटू को देखा।
— अभी नहीं कर पा रहा।
रिया ने सिर हिलाया।
— मैं इंतज़ार करूँगी।
— माफी का नहीं। भरोसे का इंतज़ार करना।
रिया की आँखें भर आईं।
— करूँगी।
अंदर से काव्या ने आवाज़ दी—
— पापा, मेरा पेंडेंट फिर उलझ गया!
अर्जुन ने दरवाज़े की तरफ कदम बढ़ाया। फिर ठिठककर रिया से कहा—
— चलो। इस बार हम दोनों मिलकर सुलझाते हैं।
रिया उसके साथ अंदर गई।
पुरानी दिशा-सूचक उनकी त्वचा पर अब भी टूटी हुई थी। वह कभी पूरी नहीं होगी। वह उस रात की गवाही रहेगी, जब 2 डरे हुए लोग एक-दूसरे से मिले और फिर अपने-अपने डर में खो गए।
लेकिन 3 बच्चियों के गले में अब नई दिशा-सूचक थी।
सही-सलामत।
झूठ मिटाने के लिए नहीं।
घाव को छोटा दिखाने के लिए नहीं।
बल्कि यह याद दिलाने के लिए कि बच्चे कभी बड़ों के डर की कीमत चुकाने के लिए पैदा नहीं होते।
और कभी-कभी घर कोई जगह नहीं होता।
घर वह हाथ होता है जिसे 7 साल बाद भी पकड़ा जा सकता है।
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