
भाग 1
अनन्या मेहरा ने अपने ही शरीर के अंदर तब होश पाया, जब उसने अपने 9 साल के बेटे को फुसफुसाते सुना कि उसके पिता उसकी मौत का इंतज़ार कर रहे हैं।
आरव अस्पताल के बेड के पास खड़ा था। उसकी स्कूल यूनिफॉर्म सिकुड़ी हुई थी, टाई ढीली लटक रही थी, और आंखें ऐसी लाल थीं जैसे वह कई रातों से सोया ही न हो। उसने चुपके से सफेद चादर के नीचे हाथ डाला और अपनी मां की ठंडी, बेजान उंगलियों को ढूंढने लगा।
—मम्मा… आंखें मत खोलना। पापा यहीं हैं। वो चाहते हैं कि आप मर जाओ।
अनन्या चीखना चाहती थी।
लेकिन उसके होंठ नहीं हिले।
उसकी पलकें नहीं कांपीं।
उसका हाथ अपने बेटे की हथेली में पड़ा रहा, जैसे वह सचमुच किसी और दुनिया में जा चुकी हो।
12 दिन से वह मुंबई के एक महंगे निजी अस्पताल की आईसीयू में कोमा में पड़ी थी। डॉक्टरों ने कहा था कि बचने की उम्मीद कम है। रिश्तेदारों ने कहा था कि भगवान की मर्ज़ी मान लेनी चाहिए। मीडिया ने खबर चलाई थी कि मेहरा इंफ्रा की वारिस अनन्या मेहरा का एक्सप्रेसवे हादसे में गंभीर एक्सीडेंट हुआ है।
लेकिन किसी को नहीं पता था कि वह उस अंधेरे से वापस लौट चुकी है।
वह सब सुन सकती थी।
मशीनों की बीप, ऑक्सीजन की हल्की आवाज़, नर्सों के कदम, बेटे की टूटी सांसें… सब कुछ।
—अगर आप मुझे सुन सकती हो तो मेरा हाथ दबाओ, प्लीज़ —आरव ने बहुत धीरे कहा।
अनन्या ने पूरी ताकत इकट्ठा की। उसने आरव को याद किया, जब वह छोटा था और बारिश में कागज़ की नावें बहाता था। उसने उसके माथे पर लगी वह हल्की चोट याद की, जो 6 साल की उम्र में साइकिल से गिरने पर आई थी। उसने अपने पिता वीरेंद्र कपूर की आवाज़ याद की, जो हमेशा कहते थे कि पैसा बचाने से ज्यादा ज़रूरी है अपने बच्चे को बचाना।
लेकिन उसका शरीर पत्थर था।
एक उंगली तक नहीं हिली।
तभी दरवाज़ा खुला।
आरव ने तुरंत हाथ पीछे खींच लिया, जैसे उसने कोई चोरी कर ली हो।
राघव मेहरा अंदर आया। काला सूट, महंगी घड़ी, चेहरे पर थकान का अभिनय और आंखों में वह ठंडापन, जिसे अनन्या ने शादी के 11 साल बाद बहुत देर से पहचाना था। उसके पीछे काव्या थी, अनन्या की छोटी बहन। वही काव्या, जिसे अनन्या ने पढ़ाया, संभाला, अपने घर में जगह दी, अपनी कंपनी में पद दिलाया।
काव्या की साड़ी परफेक्ट थी। उसका काजल थोड़ा फैला था, लेकिन अनन्या समझ गई कि वह रोकर नहीं, रगड़कर फैलाया गया था।
—फिर से यहां? —राघव ने आरव को देखते हुए कहा। —तुम्हारी मां तुम्हें सुन नहीं सकती।
—सुन सकती हैं —आरव बोला।
राघव के चेहरे पर झुंझलाहट चमकी।
काव्या बेड के पास आई और अनन्या के माथे के पास झुक गई।
—दीदी हमेशा सब पर हुक्म चलाती थीं। अब देखो… अपनी सांस भी खुद नहीं ले पा रहीं।
अनन्या के भीतर आग उठी।
उसे एक्सीडेंट से पहले की रात याद आई।
दक्षिण मुंबई वाले पेंटहाउस की डाइनिंग टेबल पर राघव ने एक मोटी फाइल रखी थी। बाहर गणेश विसर्जन की आवाज़ें आ रही थीं, लेकिन घर के अंदर अजीब सन्नाटा था।
—साइन कर दो, अनन्या। बस फैमिली प्रोटेक्शन है।
उसने दस्तावेज़ पढ़े थे।
मेहरा इंफ्रा के शेयर, कपूर ट्रस्ट की ज़मीनें, पुणे और नोएडा की प्रॉपर्टी, आरव के नाम का एजुकेशन फंड — सब कुछ एक नई होल्डिंग कंपनी में जा रहा था, जिसके नियंत्रण में राघव था।
—मैं यह साइन नहीं करूंगी।
राघव की मुस्कान उस रात पहली बार गायब हुई थी।
—तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं?
—मुझे अपने बेटे पर भरोसा है। और इसलिए मैं सब कुछ उसके लिए सुरक्षित रखूंगी।
उसी रात, पुणे एक्सप्रेसवे पर, बारिश में, उसकी कार के ब्रेक ने जवाब देना बंद कर दिया था।
आईसीयू में राघव मॉनिटर के पास खड़ा हुआ।
—डॉक्टर ने साफ कहा है। यह कोई ज़िंदगी नहीं है। सिर्फ मशीनों पर शरीर टिकाए रखना पाप है।
—मम्मा ज़िंदा हैं —आरव ने कहा।
—तुम बच्चे हो। तुम्हें कुछ समझ नहीं आता।
—मुझे सब समझ आता है।
काव्या ने पर्स से रुमाल निकाला।
—राघव जी, पंडित जी ने भी कहा था कि आत्मा को रोके रखना ठीक नहीं। दीदी को शांति दे देनी चाहिए।
आरव की आंखें फैल गईं।
—शांति मतलब?
राघव ने उसकी ओर देखा।
—बड़ों की बात है।
—आप लोग मम्मा को मारना चाहते हो?
कुछ सेकंड तक कोई नहीं बोला।
काव्या का चेहरा कस गया।
—ये बातें किसने सिखाईं तुम्हें?
—मम्मा ने कहा था कि अगर उन्हें कुछ हो जाए तो नंदिता आंटी को कॉल करना।
राघव का जबड़ा जकड़ गया।
नंदिता राव अनन्या की वकील थी। वही औरत जिसने 2 हफ्ते पहले अनन्या का नया वसीयतनामा, मेडिकल पावर और आरव की कस्टडी से जुड़े दस्तावेज़ तैयार किए थे।
राघव ने कमरे का दरवाज़ा अंदर से लॉक कर दिया।
—तुमने उसे कॉल किया?
आरव चुप रहा।
राघव आगे बढ़ा।
—मैंने पूछा, तुमने उसे कॉल किया?
—मुझे याद नहीं।
राघव ने उसके कंधे को जोर से पकड़ लिया।
—झूठ बोलोगे तो बहुत पछताओगे।
अनन्या का दिल मशीनों में उछल पड़ा। वह उठना चाहती थी। वह अपने बेटे को छीनना चाहती थी। वह राघव का हाथ तोड़ देना चाहती थी।
लेकिन उसका शरीर उसकी जेल था।
काव्या ने धीरे से कहा:
—राघव, यह बच्चा बहुत सुनता है।
—तो अब इसे चुप रहना सीखना होगा —राघव ने कहा।
आरव कांपा, पर रोया नहीं। वह झुका, अपनी मां के कान के पास आया और फुसफुसाया:
—मम्मा, मैंने वही किया जो आपने कहा था।
अनन्या ने उस एक वाक्य को पकड़ा जैसे डूबती हुई औरत रस्सी पकड़ती है।
उसने अपनी सारी बची हुई जान उंगलियों तक भेजी।
दर्द बिजली की तरह दौड़ा।
और फिर, चादर के नीचे, उसकी दाहिनी तर्जनी हल्की सी कांपी।
इतनी हल्की कि शायद कोई और न देखता।
लेकिन आरव ने देख लिया।
उसने न मुस्कुराया, न चिल्लाया। उसने बस मां का हाथ दोनों हथेलियों में ढक लिया और राघव की आंखों में देखकर कहा:
—मेरी मम्मा मरी नहीं हैं।
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भाग 2
राघव ने पहले तो हंसने की कोशिश की, लेकिन उसकी हंसी गले में अटक गई, क्योंकि आरव का चेहरा अब किसी डरे हुए बच्चे जैसा नहीं था; वह अपनी मां का पहरेदार बन चुका था। काव्या ने अनन्या की पलकों को गौर से देखा, जैसे किसी बंद दरवाज़े के पीछे से आवाज़ सुन ली हो। तभी नर्स मीरा ने दरवाज़ा खटखटाया और पूछा कि कमरा बंद क्यों है। राघव ने कहा कि बच्चा परेशान है, लेकिन मीरा की नज़र सीधे सेडेटिव पंप पर गई। दवा की मात्रा 4 से 7 कर दी गई थी। उसने तुरंत रिकॉर्ड चेक किया तो आखिरी बदलाव डॉ. सुरेश बत्रा के कोड से हुआ था, जबकि डॉ. बत्रा उस समय कमरे में होने की बात नकार रहे थे। कुछ ही मिनटों में वही डॉक्टर और एक नोटरी अंदर आए, फाइल में वही कागज़ थे जिन्हें अनन्या ने एक्सीडेंट से पहले साइन करने से मना किया था। राघव ने कहा कि सिर्फ अंगूठे का निशान चाहिए, पत्नी की इच्छा पहले ही बताई जा चुकी है। नोटरी घबरा गया, क्योंकि उसे बताया गया था कि मरीज होश में है। मीरा ने अनन्या से कहा कि अगर वह सुन रही है तो उंगली हिलाए। अनन्या ने उंगली नहीं, पूरा हाथ हल्का सा कस दिया। फिर उसने 1 बार पलक झपकाई। जब मीरा ने पूछा कि क्या कमरे में मौजूद किसी ने उसे नुकसान पहुंचाने की कोशिश की है, अनन्या ने 2 बार पलक झपकाई। उसी पल आरव ने डॉक्टर की ट्रे से सिरिंज नीचे गिरा दी। अलार्म बजा, सिक्योरिटी दौड़ी, और नंदिता राव पुलिस इंस्पेक्टर अर्जुन सिंह के साथ अंदर आई। आरव ने सचमुच कॉल लगा कर फोन जेब में खुला छोड़ दिया था। राघव की धमकियां, कागज़ों की बात, दवा बढ़ाने की साजिश — सब रिकॉर्ड हो चुका था। नंदिता ने बताया कि अनन्या ने पहले ही क्लॉज डाल रखा था: संदिग्ध हालत में उसकी अक्षमता होते ही पूरा संपत्ति तंत्र फ्रीज होगा और आरव का फंड स्वतंत्र ट्रस्ट में चला जाएगा। राघव पहली बार डर गया। लेकिन सबसे बड़ा झटका तब लगा जब अस्पताल से निकलते समय काव्या बच निकली। शाम 4:17 पर आरव का स्मार्टवॉच सिग्नल बंद हुआ। 4:22 पर अनन्या के फोन पर फोटो आई: आरव जयपुर वाली पुरानी हवेली के नीले कमरे में बैठा था, और उसके पीछे काव्या खड़ी थी। मैसेज था: चाबी लेकर अकेली आओ, वरना तुम्हारा बेटा भी वही हादसा देखेगा जिससे तुम बच गईं। ❤️नमस्ते, प्यारे रीडर्स! अगर आप अगले पार्ट के लिए तैयार हैं, तो प्लीज़ नीचे “Yes” लिखें, और मैं इसे तुरंत भेज दूँगा। मैं उन सभी के अच्छे स्वास्थ्य और खुशी की कामना करता हूँ जिन्होंने यह कहानी पढ़ी और पसंद की है! 💚
भाग 3
अनन्या अभी ठीक से बैठ भी नहीं पाती थी, लेकिन उसने अस्पताल का बेड छोड़ने की ज़िद ऐसे की जैसे कोई मां मौत से बहस कर रही हो।
इंस्पेक्टर अर्जुन सिंह ने कहा कि यह पुलिस ऑपरेशन होगा, भावनात्मक फैसला नहीं। नंदिता राव ने साफ कहा कि वह मरीज को इस हालत में कहीं नहीं ले जा सकती। नर्स मीरा की आंखें भर आईं, क्योंकि अनन्या का ब्लड प्रेशर हर 10 मिनट में गिर रहा था।
अनन्या ने बस इतना कहा:
—मेरा बेटा उनके पास है।
उसके बाद कोई तर्क नहीं बचा।
नंदिता ने कानूनी रास्ता बनाया, अर्जुन सिंह ने लोकेशन ट्रैक की, और एक मेडिकल वैन को एम्बुलेंस बनाकर जयपुर रोड की तरफ रवाना किया गया। बाहर बरसात शुरू हो चुकी थी। गाड़ी की खिड़की पर गिरती बूंदें अनन्या को उसी रात में वापस ले जाती थीं — गीली सड़क, ब्रेक का खाली पैडल, सामने मुड़ता ट्रक, और फिर लोहे का भयानक शोर।
लेकिन इस बार वह अकेली नहीं थी।
उसके ब्लाउज़ के अंदर एक छोटा माइक्रोफोन लगा था। व्हीलचेयर के नीचे जीपीएस था। एम्बुलेंस से 2 किलोमीटर पीछे पुलिस की 3 गाड़ियां बिना सायरन चल रही थीं।
जयपुर के पास कपूर परिवार की पुरानी हवेली कई साल से बंद थी। वही हवेली जहां अनन्या के पिता वीरेंद्र कपूर गर्मियों में खाते-पुस्तकें देखते थे। वही जगह जहां 4 साल पहले वह अचानक मृत मिले थे। काव्या ने तब सबसे ज्यादा रोने का नाटक किया था और अंतिम संस्कार जल्दी करवाने की ज़िद भी उसी ने की थी।
हवेली की सारी खिड़कियां अंधेरी थीं, बस दूसरी मंज़िल का एक कमरा रोशन था।
नीला कमरा।
नंदिता ने व्हीलचेयर धकेली। अनन्या की सांसें तेज थीं, लेकिन आंखें अब वैसी नहीं थीं जैसी आईसीयू में थीं। अब उनमें डर से ज्यादा आग थी।
मुख्य दरवाज़े पर राघव खड़ा था। उसका सूट भीग चुका था। चेहरे से वह आदमी गायब था जो मीडिया के सामने दुखी पति बनता था। वहां सिर्फ एक लालची, डरा हुआ और टूटा हुआ पुरुष खड़ा था।
—तुम्हें अकेले आना था —उसने कहा।
—तुम्हें मेरे बेटे को छूना नहीं था —अनन्या ने जवाब दिया।
राघव की नज़र नंदिता पर गई।
—वकील को क्यों लाई?
—क्योंकि तुम्हें कानून की भाषा पैसे से ज्यादा चुभती है।
राघव ने गुस्से से दांत भींचे, मगर उसकी आवाज़ में कमजोरी थी।
—मैंने आरव को नहीं उठाया। काव्या ने किया।
—लेकिन तुमने मेरा अंगूठा लगवाने की कोशिश की।
राघव चुप रहा।
—तुमने डॉक्टर को पैसे दिए।
वह फिर चुप रहा।
—तुम मुझे बेहोश रखकर मेरा सब कुछ लेना चाहते थे।
राघव ने धीरे से कहा:
—हां।
—और फिर मशीन हटवाकर मुझे मरने देना चाहते थे।
राघव ने आंखें बंद कर लीं।
—हां।
अनन्या के सीने में कुछ टूटकर गिरा। 11 साल की शादी, आरव का बचपन, परिवार की तस्वीरें, त्योहारों की रातें — सब एक शब्द में जल गए।
माइक्रोफोन हर आवाज़ रिकॉर्ड कर रहा था।
राघव अचानक बोला:
—लेकिन ब्रेक मैंने नहीं कटवाए। काव्या ने मुझे बताया था कि हादसा हो गया है और यह मौका है। मुझे आज पता चला कि हादसा उसने करवाया था।
ऊपर से दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई।
काव्या सीढ़ियों पर दिखाई दी। उसके एक हाथ में आरव का कंधा था और दूसरे हाथ में सिरिंज। आरव का चेहरा सफेद था, पर उसकी आंखें खुली थीं।
—मम्मा!
अनन्या व्हीलचेयर से उठने की कोशिश में गिर पड़ती, अगर नंदिता ने उसे पकड़ न लिया होता।
—आरव को छोड़ दो, काव्या —नंदिता ने कहा।
काव्या हंसी।
—तुम हमेशा देर से पहुंचती हो, नंदिता। पहले पापा के समय, फिर दीदी के समय, अब इस बच्चे के समय।
अनन्या ने पहली बार उसकी आवाज़ में वह ज़हर साफ सुना, जो सालों से मिठास में छिपा था।
—चाबी चाहिए न? —अनन्या ने पूछा।
काव्या की आंखें चमक उठीं।
—हां। और कोई चाल चली तो यह दवा इसके शरीर में जाएगी। बच्चा है, सह नहीं पाएगा।
राघव चीखा:
—काव्या, पागल मत बनो!
—चुप रहो —काव्या ने उसे घूरा। —तुम जैसे आदमी को लालच दिखाकर घसीटना सबसे आसान काम था।
राघव सुन्न रह गया।
नीले कमरे में घुसते ही अनन्या की सांस अटक गई। दीवारों पर हल्का नीला रंग, पुरानी राजस्थानी खिड़कियां, बीच में भारी शीशम की मेज़, और दीवार पर वीरेंद्र कपूर की तस्वीर। सब कुछ वैसा ही था जैसा पिता की मौत के बाद बंद कर दिया गया था।
मेज़ पर एक पुरानी तस्वीर रखी थी। उसमें 12 साल की अनन्या और 7 साल की काव्या राखी के दिन मुस्कुरा रही थीं। दोनों के माथे पर तिलक था। दोनों बहनें थीं। सचमुच बहनें।
काव्या ने हाथ बढ़ाया।
—चाबी।
अनन्या ने कांपते हाथ से छोटी पीतल की चाबी निकाली।
—इस कमरे में ऐसा क्या है, जिससे तुम 4 साल से डर रही हो?
काव्या की मुस्कान गायब हो गई।
—तुम्हें हमेशा सब जानना होता था। पापा की बेटी, कंपनी की मालकिन, नैतिकता की देवी। मैं क्या थी? तुम्हारी दया पर पलने वाली छोटी बहन?
—मैंने तुम्हें घर दिया।
—तुमने मुझे एहसान दिया।
—मैंने तुम्हें कंपनी में जगह दी।
—कुर्सी दी, ताकत नहीं।
—तो तुमने पापा को मार दिया?
कमरे में सन्नाटा फैल गया।
राघव पीछे हट गया।
आरव रो पड़ा, लेकिन काव्या ने सिरिंज उसके गले के पास और दबा दी।
काव्या ने धीरे-धीरे बोलना शुरू किया, जैसे सालों से बंद गटर का ढक्कन खुल गया हो।
वीरेंद्र कपूर ने 4 साल पहले पता लगा लिया था कि काव्या परिवार की चैरिटी से पैसे निकाल रही है। गरीब बच्चों की पढ़ाई के नाम पर बने खातों से करोड़ों रुपए शेल कंपनियों में भेजे गए थे। 8 करोड़ से ज्यादा रकम गायब थी। पापा ने उसे पुलिस में देने का फैसला कर लिया था।
—उन्होंने मुझे बर्बाद कर देना था —काव्या बोली।
—वो तुम्हें बचा सकते थे।
—नहीं। वह सिर्फ तुम्हें बचाते थे।
डॉ. सुरेश बत्रा ने पैसे लेकर वीरेंद्र कपूर को ऐसी दवा दी थी जिससे शरीर लकवे जैसा हो गया और दिल का दौरा जैसा रिकॉर्ड बना। काव्या कमरे में बैठकर पिता को मरते देखती रही। फिर जल्दी से अंतिम संस्कार करवा दिया गया, ताकि पोस्टमार्टम न हो।
अनन्या की आंखों से आंसू निकल गए, लेकिन आवाज़ पत्थर की थी।
—तुमने मेरे पिता को मारा।
—हमारे पिता —काव्या चिल्लाई। —लेकिन उन्होंने कभी मुझे बेटी माना ही नहीं।
—और मुझे भी मारना चाहती थी?
—तुमने वसीयत बदल दी। नंदिता से मिलने लगी। नीले कमरे के बारे में पूछने लगी। मुझे कोई रास्ता नहीं छोड़ा।
काव्या ने मेज़ के पीछे रखी पुरानी लकड़ी की अलमारी की ओर इशारा किया।
—खोलो।
अनन्या ने चाबी ताले में लगाई।
अलमारी खुलते ही भीतर से धूल की गंध निकली। अंदर लोहे के बॉक्स, पुराने हार्ड ड्राइव, फाइलें, बैंक रिकॉर्ड और एक लिफाफा था जिस पर लिखा था: अनन्या के लिए।
काव्या का चेहरा बदल गया।
—वह मत छूना।
अनन्या ने लिफाफा उठा लिया।
—अब रोक कर दिखाओ।
आरव ने उसी पल मौका देखा। उसने अपनी पूरी ताकत से काव्या के पैर पर एड़ी मारी। सिरिंज थोड़ा हट गई। नंदिता ने उसे खींचना चाहा, लेकिन काव्या ने बालों से पकड़कर उसे फिर रोक लिया।
अनन्या लिफाफा खोल चुकी थी।
पत्र उसके पिता का था।
वीरेंद्र कपूर ने लिखा था कि उन्हें काव्या पर शक है। उन्होंने नीले कमरे में छिपे कैमरे लगवाए थे। कैमरे सिर्फ रिकॉर्ड नहीं करते थे, बल्कि रिकॉर्डिंग एक सुरक्षित सर्वर पर भेजते थे। अगर उनकी मौत अचानक होती, तो डेटा नंदिता राव को स्वतः भेजा जाना था।
अनन्या ने दीवार पर लगी पुरानी तस्वीर की ओर देखा।
वीरेंद्र कपूर की तस्वीर के फ्रेम में एक बहुत छोटी काली बिंदु थी।
काव्या ने भी देख लिया।
—नहीं…
वह आरव को छोड़कर तस्वीर की ओर दौड़ी। उसी क्षण आरव अनन्या की व्हीलचेयर से लिपट गया।
—मम्मा!
अनन्या ने उसे अपने कमजोर हाथों में खींच लिया, जैसे टूटे शरीर में अचानक पूरा संसार समा गया हो।
काव्या ने गुस्से में तस्वीर जमीन पर पटकी। कांच टूट गया। उसने फ्रेम से छोटा कैमरा निकाला और पैर से कुचल दिया।
फिर वह हंस पड़ी।
—अब कुछ नहीं बचा।
तभी नंदिता ने अपना फोन ऊपर उठाया।
—सब बचा है, काव्या। रिकॉर्डिंग 4 साल पहले ही क्लाउड पर चली गई थी। और अभी तुमने अपनी पूरी कहानी लाइव पुलिस चैनल पर सुना दी है।
दरवाज़े के बाहर कदमों की आवाज़ गूंजी।
—पुलिस! हथियार नीचे रखो!
काव्या ने पर्स से पिस्तौल निकाली।
राघव आगे बढ़ा।
—बस करो, काव्या!
गोली चली।
राघव दीवार से टकराकर नीचे गिरा। गोली उसके कंधे को चीरती हुई निकली थी। आरव चीखा। अनन्या ने अपने बेटे को अपनी छाती से ढक लिया, हालांकि उसका शरीर खुद खड़े होने लायक भी नहीं था।
इंस्पेक्टर अर्जुन सिंह ने दरवाज़ा तोड़कर प्रवेश किया।
—काव्या कपूर, हथियार फेंको!
काव्या की आंखें पागलपन से भरी थीं।
—सब मेरी वजह से नहीं हुआ। मुझे धक्का दिया गया। मुझे हमेशा कम समझा गया। हमेशा।
अनन्या ने धीमे कहा:
—तुम कम नहीं थीं, काव्या। तुम लालची थीं।
काव्या का हाथ कांपा।
नंदिता ने वही वाक्य बोला जिसने रात खत्म कर दी।
—तुम्हारे पिता ने आखिरी रिकॉर्डिंग में भी यही कहा था। उन्होंने कहा था, अगर काव्या सच बोल दे तो उसे जेल नहीं, इलाज चाहिए। वह तुम्हें बचाना चाहते थे।
काव्या का चेहरा राख हो गया।
—झूठ।
—रिकॉर्डिंग में है।
कुछ सेकंड तक सिर्फ बारिश की आवाज़ सुनाई दी।
फिर काव्या के हाथ से पिस्तौल गिर गई।
पुलिस ने उसे उसी नीले कमरे में हथकड़ी लगाई, जहां उसने पिता को मरते देखा था।
डॉ. सुरेश बत्रा 2 दिन में गिरफ्तार हुआ। अस्पताल की दवा रिकॉर्ड, बैंक ट्रांसफर, नकली मेडिकल नोट्स और गाड़ी के ब्रेक से जुड़े भुगतान सब सामने आ गए। जिसने कार को स्क्रैप करवाया था, वह राघव की कंपनी का आदमी था। जिसने ब्रेक सिस्टम छेड़ा था, वह काव्या द्वारा भेजा गया मैकेनिक था।
राघव बच गया, लेकिन उसका साम्राज्य नहीं बचा। उसने काव्या के खिलाफ गवाही दी, मगर खुद को निर्दोष साबित नहीं कर पाया। उसे धोखाधड़ी, जबरन हस्ताक्षर की कोशिश, मेडिकल साजिश, बच्चे को खतरे में डालने और संपत्ति हड़पने की योजना के लिए सजा मिली।
डॉ. बत्रा को लंबी कैद हुई।
काव्या को अदालत ने हत्या, हत्या की कोशिश, अपहरण और वित्तीय अपराधों में दोषी माना।
महीनों बाद, अनन्या पहली बार अदालत से बाहर निकली तो उसके कदम धीमे थे। वह अभी भी सहारे से चलती थी। कभी-कभी शब्द भूल जाती थी। कई रातों में उसे लगता कि वह अब भी आईसीयू में पड़ी है और लोग उसकी मौत की योजना बना रहे हैं।
लेकिन हर बार आरव उसके पास बैठता।
—मम्मा, मैं यहीं हूं।
और वह वापस सांस लेना सीख जाती।
कपूर ट्रस्ट अब आरव के नाम सुरक्षित था, 3 स्वतंत्र ट्रस्टियों की निगरानी में। अनन्या कंपनी में लौटी, लेकिन अब उसने अपने नाम से ज्यादा अपने बेटे की सुरक्षा को महत्व दिया। उसने पिता की चैरिटी फिर शुरू की, उस पैसे से जिसे काव्या ने कभी चुराया था।
एक साल बाद, रक्षाबंधन के दिन, अनन्या आरव के साथ वीरेंद्र कपूर की समाधि पर गई। उसने वहां नीले रंग की एक छोटी कंचे की गोली रखी। वही कंचे जो उसके पिता आरव को तब देते थे, जब वह कोई मुश्किल सवाल हल कर लेता था।
आरव ने पूछा:
—नानू को पता था कि मैं आपको बचाऊंगा?
अनन्या ने उसके बाल सहलाए।
—उन्हें पता था कि सच्चाई कभी अकेली नहीं मरती।
आरव ने धीरे से कहा:
—मैं बहुत डर गया था।
—डर के बावजूद जो मां का हाथ नहीं छोड़ता, वही सबसे बहादुर होता है।
आरव ने उसे कसकर गले लगा लिया।
राघव ने सोचा था कि अनन्या सिर्फ मशीनों पर पड़ा शरीर है।
काव्या ने सोचा था कि खून का रिश्ता अपराध छिपा लेगा।
डॉ. बत्रा ने सोचा था कि दवा सच को सुला सकती है।
तीनों गलत थे।
अनन्या जाग चुकी थी।
आरव सुन रहा था।
और जब सब एक मां की मौत का इंतज़ार कर रहे थे, एक 9 साल का बच्चा पहले ही उसकी जिंदगी बचाने निकल पड़ा था।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.