
भाग 1
जिस रात बर्फ़ीले तूफ़ान ने पहाड़गंज घाटी को निगल लिया, 72 साल की सावित्री देवी ने अपने टूटे हुए लकड़ी के दरवाज़े पर 5 काले चमड़े वाली जैकेट पहने अजनबियों को खड़ा देखा, और उनमें से 1 के हाथ से खून टपक रहा था।
गाँव में कोई और होता तो दरवाज़ा भीतर से बंद कर लेता। पुलिस चौकी को फ़ोन करता। पड़ोसियों को आवाज़ देता। क्योंकि रात 10:15 बज रहे थे, बिजली जा चुकी थी, सड़कें सफ़ेद मौत जैसी जम चुकी थीं और दरवाज़े पर खड़े वे 5 आदमी किसी फ़िल्म के डरावने गिरोह जैसे लग रहे थे।
लेकिन सावित्री देवी ने बस हाथ में पकड़ी मिट्टी के तेल वाली लालटेन ऊपर उठाई, घायल लड़के का नीला पड़ता चेहरा देखा और धीरे से बोलीं—
—अंदर आ जाओ बेटा, बाहर खड़े रहे तो सुबह नहीं देखोगे।
उनका छोटा-सा घर उत्तराखंड के चमोली ज़िले के पास एक ढलान पर था। पति राजेंद्र नाथ को गुज़रे 9 साल हो चुके थे। वह पहले सरकारी स्कूल में रसोई संभालती थीं, बच्चों के लिए खिचड़ी, दाल और रोटी बनाती थीं। अब उनकी दुनिया बस 2 कमरों का पुराना मकान, टपकती छत, बंद पड़ा हीटर, 2 आवारा बिल्लियाँ गौरी और काली, और दीवार पर टंगी राजेंद्र की मुस्कुराती तस्वीर थी।
उस रात उनके पास खाने को सिर्फ़ थोड़ी दाल, आधा डिब्बा चावल, 4 सूखी रोटियाँ और सुबह की बची चटनी थी। फिर भी उन्होंने सबसे पहले चूल्हा जलाया।
5 आदमी भीतर आए तो कमरा छोटा पड़ गया। उनके जूतों से बर्फ़ पिघलकर फर्श पर फैल गई। उनके कंधों पर चमड़े की मोटी जैकेटें थीं, गले तक टैटू, दाढ़ियाँ, हाथों में भारी दस्ताने। उनमें सबसे आगे एक चौड़े सीने वाला आदमी था, उम्र करीब 56, सफ़ेद दाढ़ी, आँखें थकी हुई पर भीतर से बेहद सतर्क। उसका नाम आर्यन मेहरा था।
घायल लड़का करण मुश्किल से खड़ा था। उसकी कलाई से कोहनी तक गहरा चीरा था। सावित्री ने बिना पूछे अपनी अलमारी से राजेंद्र का पुराना प्राथमिक उपचार डिब्बा निकाला। पट्टी कम पड़ गई तो उन्होंने अपनी साफ़ सूती साड़ी का किनारा फाड़ दिया।
—दाँत भींच ले, बेटा। जलन होगी, पर जान बच जाएगी।
करण की आँखों में दर्द से आँसू आ गए। बाकी 4 आदमी चुपचाप खड़े रहे। जैसे उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि यह बूढ़ी औरत उनसे डर नहीं रही।
सावित्री ने दाल में पानी बढ़ाया, चावल डाल दिए, थोड़ी हल्दी, नमक और घी की आख़िरी बूंद। फिर राजेंद्र की मोटी ऊनी शॉल आर्यन की तरफ़ बढ़ा दी।
—यह मेरे पति की थी। बड़े आदमी थे, तुम्हें आ जाएगी।
आर्यन ने शॉल पकड़ी, पर कुछ पल बोल नहीं पाया।
आधी रात तक वे 5 अजनबी सावित्री के फर्श, चारपाई और दरवाज़े के पास सिकुड़कर बैठे थे। बाहर तूफ़ान घर को हिला रहा था। भीतर सावित्री सबको गरम खिचड़ी बाँट रही थीं, लेकिन अपने लिए कटोरा नहीं भर रही थीं।
आर्यन यह सब देख रहा था—टपकती छत के नीचे रखी बाल्टी, खिड़की पर चिपका पुराना प्लास्टिक, खाली राशन डिब्बे, और वह औरत जो अपने पास कुछ न होते हुए भी सब कुछ दे रही थी।
फिर उसकी नज़र मेज़ के हिलते पाँव के नीचे दबे पुराने अख़बार पर पड़ी। अख़बार के कोने पर उसका ही चेहरा छपा था।
भाग 2
सुबह 5 बजे तक सावित्री देवी सोई नहीं। वह हर थोड़ी देर में चूल्हे की आँच देखतीं, करण की पट्टी कसतीं, गौरी और काली को चुप करातीं और लालटेन की लौ बचाए रखतीं। बाहर बर्फ़ रुक चुकी थी, पर ठंड दीवारों से भीतर चुभ रही थी।
सुबह उन्होंने आख़िरी आटे से पराठे बनाए। अचार की छोटी डिब्बी खोली और 5 आदमियों के सामने रख दी।
आर्यन ने जेब से मोटी रकम निकाली। नोटों की गड्डी मेज़ पर रखी।
—माँजी, आपने हमारी जान बचाई है। इसे रख लीजिए।
सावित्री ने नोटों को देखा भी नहीं। उन्होंने गड्डी वापस उसकी तरफ़ सरका दी।
—मदद बिकती नहीं है, बेटा। भूखे को खाना देना सौदा नहीं होता।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
आर्यन ने धीरे से पैसे वापस रखे। फिर उसने अपनी छोटी चमड़े की डायरी निकाली।
—आपका पूरा नाम?
—सावित्री राजेंद्र नाथ।
—पता?
—पता लिखकर क्या करोगे?
—कभी धन्यवाद भेजना हुआ तो?
सावित्री हल्का-सा हँस दीं।
जाने से पहले उन आदमियों ने उनके आँगन से बर्फ़ हटाई। एक ने टूटी कुंडी कस दी। दूसरे ने लकड़ी जमा कर दी। करण ने उनके पैर छू लिए।
—आप मेरी दादी जैसी हैं।
सावित्री ने उसके सिर पर हाथ रखा।
—घर पहुँचकर अपनी माँ को फ़ोन करना।
वे चले गए। काली जैकेटें सफ़ेद बर्फ़ में धीरे-धीरे गुम हो गईं।
2 हफ़्ते तक कुछ नहीं हुआ। फिर एक दिन गैस सिलेंडर आया, पहले से भुगतान किया हुआ। फिर राशन की बोरियाँ आईं। फिर छत देखने वाले मज़दूर आए और बोले कि उन्हें “त्रिशूल समूह” ने भेजा है।
सावित्री को शक हुआ। उसी शाम उन्होंने मेज़ के नीचे दबा अख़बार निकाला। उस पर छपा था—“भारत के 10 सबसे प्रभावशाली उद्योगपति”।
नीचे वाली तस्वीर पर वही चेहरा था।
आर्यन मेहरा।
त्रिशूल लॉजिस्टिक्स का संस्थापक।
3 हफ़्ते बाद उनके दरवाज़े पर फिर दस्तक हुई। इस बार बाहर बर्फ़ीले जूते नहीं, चमकती काली गाड़ी खड़ी थी।
भाग 3
सावित्री देवी ने दरवाज़ा खोला तो सामने वही आँखें थीं, लेकिन आदमी बदला हुआ लग रहा था। उस रात का भीगा हुआ, काँपता हुआ बाइकर अब गहरे भूरे कोट, साफ़ जूतों और सलीके से कटी सफ़ेद दाढ़ी में खड़ा था। उसके पीछे 2 आदमी फ़ाइलें लिए खड़े थे, और सड़क पर खड़ी गाड़ी देखकर पूरा मोहल्ला खिड़कियों से झाँक रहा था।
सावित्री ने कुछ पल उसे देखा, फिर आँखें सिकोड़कर बोलीं—
—अरे, तुम वही शॉल वाला लड़का हो।
आर्यन मेहरा मुस्कुरा दिया।
—जी, माँजी। वही लड़का, जिसकी जान आपने बचाई थी।
—लड़का? 56 साल के होगे कम से कम।
—आपके सामने तो लड़का ही हूँ।
सावित्री के चेहरे पर अनचाही हँसी आ गई। पर अगले ही पल वह गंभीर हो गईं।
—तुम सच में इतने बड़े आदमी हो?
आर्यन ने सिर झुका दिया।
—बड़ा आदमी उस रात नहीं था, माँजी। उस रात मैं बस एक ठंड से मरता हुआ आदमी था, और आपने बिना मेरा नाम पूछे दरवाज़ा खोल दिया।
सावित्री ने दरवाज़ा और खोल दिया।
—अंदर आओ। चाय बनाऊँ?
आर्यन ने जूते उतार दिए। इस बार भी, जैसे उस रात उतारे थे। यही बात सावित्री को सबसे ज़्यादा छू गई। बड़ा आदमी होकर भी घर की दहलीज़ की इज़्ज़त करना हर किसी को नहीं आता।
वह उसी पुरानी मेज़ पर बैठा। वही मेज़ जिसका 1 पाँव अब भी पुराने अख़बार से टिकाया गया था। सावित्री ने पानी चढ़ाया। चायपत्ती डाली। अदरक कूटी। गौरी और काली दरवाज़े के पास बैठी उसे देख रही थीं, जैसे पहचानने की कोशिश कर रही हों।
आर्यन ने कमरे को चुपचाप देखा। छत की दरारें, दीवार पर नमी, कोने में रखी बाल्टियाँ, टूटे हीटर पर रखा कपड़ा, अलमारी पर राजेंद्र की तस्वीर। फिर उसकी नज़र उस अख़बार पर गई।
वह झुककर देखने लगा।
सावित्री ने तुरंत कहा—
—हाँ, हाँ, तुम्हारा ही चेहरा है। 6 महीने से मेरी मेज़ संभाल रहा है।
आर्यन ज़ोर से हँस पड़ा। उसके साथ आए आदमी असहज हो गए, जैसे उन्हें समझ ही नहीं आया कि उनके मालिक पर हँसना ठीक है या नहीं।
सावित्री ने चाय उसके सामने रखी।
—अब बताओ, इतने बड़े काफ़िले के साथ बूढ़ी औरत के घर क्यों आए हो?
आर्यन का चेहरा बदल गया। वह सीधा बैठा। उसने अपने साथी से फ़ाइल ली और मेज़ पर रख दी।
—माँजी, मैं आपकी मदद करने नहीं आया हूँ।
सावित्री की भौहें तन गईं।
—तो?
—मैं आपके भीतर जो रोशनी है, उसे पूरे इलाके तक पहुँचाने आया हूँ।
सावित्री ने कुछ नहीं कहा। उनकी उंगलियाँ कप के किनारे पर ठहर गईं।
आर्यन ने फ़ाइल खोली।
—पहली बात, यह घर। नई छत, नया हीटिंग सिस्टम, नया बिजली कनेक्शन, पानी की पाइपलाइन, खिड़कियाँ, दीवारों की मरम्मत। सब होगा। लेकिन आपका पिछला बरामदा नहीं टूटेगा। मुझे पता है, वह राजेंद्र जी ने अपने हाथों से बनाया था।
सावित्री का चेहरा अचानक ढीला पड़ गया। किसी ने इतने ध्यान से उनके घर को कब देखा था? लोग तो बस गरीबी देखते थे। इस आदमी ने यादों को देखा था।
—तुम्हें यह किसने बताया?
—उस रात आपने शॉल देते हुए कहा था, “मेरे पति की थी।” फिर आपने बरामदे की तरफ़ देखकर चूल्हे की लकड़ी रखी थी। आदमी जब किसी चीज़ को प्यार से देखता है, तो वह चीज़ उसकी कहानी बता देती है।
सावित्री ने नज़र झुका ली।
आर्यन ने दूसरा कागज़ निकाला।
—दूसरी बात, आप खाना बनाती हैं। सिर्फ़ पेट भरने के लिए नहीं। आप लोगों को इज़्ज़त से खिलाती हैं। आपने 5 अजनबियों के लिए अपनी आख़िरी दाल में पानी बढ़ाया, लेकिन कटोरे में प्यार कम नहीं किया। इसीलिए त्रिशूल सेवा न्यास यहाँ नीचे वाली बंद पड़ी पुरानी राशन दुकान खरीदेगा। वहाँ सामुदायिक रसोई बनेगी। नाम होगा—राजेंद्र-सावित्री जन रसोई।
सावित्री ने चौंककर उसकी तरफ़ देखा।
—मेरे नाम की रसोई?
—आप और राजेंद्र जी के नाम की। उसमें रोज़ 200 लोगों को गरम खाना मिलेगा। स्कूल के बच्चे, अकेले बुज़ुर्ग, मज़दूर, सड़क पर फँसे यात्री। और उसे चलाएँगी आप।
—मैं? मैं तो बस घर की बूढ़ी औरत हूँ।
—नहीं, माँजी। आप वही औरत हैं जिसने उस रात 5 लोगों को मरने से बचाया। रसोई चलाने के लिए डिग्री से ज़्यादा दिल चाहिए। बाकी हिसाब-किताब के लिए कर्मचारी होंगे। 5 लोगों की नौकरी भी इसी मोहल्ले से होगी। आपको वेतन मिलेगा।
सावित्री की आँखें फैल गईं।
—वेतन? इस उम्र में?
—इज़्ज़त की कोई उम्र नहीं होती।
कुछ देर तक सावित्री चुप रहीं। चाय ठंडी होने लगी।
आर्यन ने तीसरा कागज़ पलटा।
—तीसरी बात, यह गली। रास्ते टूटे हैं। स्ट्रीट लाइटें बंद हैं। बच्चे कीचड़ में खेलते हैं। त्रिशूल समूह 50 लाख रुपये का मोहल्ला अनुदान देगा। सड़क सुधरेगी, लाइट लगेगी, खाली प्लॉट में बच्चों का पार्क बनेगा। लेकिन पैसे का फैसला कोई बाहर वाला नहीं करेगा। मोहल्ले की समिति बनेगी। आप उसकी अध्यक्ष होंगी।
सावित्री ने घबराकर हाथ पीछे खींच लिए।
—नहीं बेटा, यह सब मुझसे नहीं होगा। लोग बातें बनाएँगे। कहेंगे बूढ़ी औरत को पैसे मिल गए तो नेता बन गई।
—लोग उस रात भी कहते कि दरवाज़ा मत खोलो। आपने फिर भी खोला।
यह वाक्य सीधे उनके भीतर उतर गया।
आर्यन ने आख़िरी पन्ना निकाला। अब उसकी आवाज़ थोड़ी धीमी थी।
—और हर साल 2 बच्चों को पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति मिलेगी। 1 लड़की, 1 लड़का। जो पढ़ाई के साथ समाज सेवा करते हों। नाम होगा—राजेंद्र नाथ और सावित्री देवी छात्रवृत्ति।
सावित्री की आँखें राजेंद्र की तस्वीर पर टिक गईं।
9 साल से वह तस्वीर दीवार पर थी। लोग आते-जाते उसे देखते भी नहीं थे। आज पहली बार लगा जैसे राजेंद्र फिर कमरे में मौजूद हैं।
उनके होंठ काँपे।
—मेरे राजेंद्र का नाम बच्चों की पढ़ाई से जुड़ेगा?
—जी।
—कोई गरीब बच्चा कॉलेज जाएगा?
—हर साल 2।
—और उसे लौटाकर पैसे नहीं देने होंगे?
—नहीं। बस आगे किसी और की मदद करनी होगी।
सावित्री ने सिर झुका लिया। आँसू चुपचाप गिरने लगे। वह रोईं तो भी आवाज़ नहीं निकली। जैसे जीवन भर की थकान पानी बनकर बाहर आ रही हो। टपकती छत, ठंडी रातें, अकेलेपन में खाई सूखी रोटी, अस्पताल के बिल, लोगों की अनदेखी, त्योहारों पर खाली आँगन—सब एक-एक बूंद बनकर बहने लगा।
आर्यन ने उन्हें रोने दिया। कोई सांत्वना नहीं दी, कोई जल्दी नहीं की।
काफ़ी देर बाद सावित्री ने आँचल से आँखें पोंछीं।
—एक शर्त है।
आर्यन तुरंत सीधा हुआ।
—कहिए।
—रसोई में कोई भूखा आए तो उससे जात, धर्म, पहचान, पैसा कुछ मत पूछना। जो दरवाज़े तक आ गया, वह अपना है।
आर्यन ने बिना सोचे कहा—
—यही नियम सबसे ऊपर लिखा जाएगा।
—और दूसरी बात।
—जी?
—तुम जब भी आओगे, पैसे वाले आर्यन मेहरा बनकर नहीं आओगे। वही बर्फ़ वाला बेटा बनकर आओगे।
आर्यन की आँखें भर आईं। उसने धीरे से कहा—
—वादा।
सावित्री ने हाथ आगे बढ़ाया। उसका हाथ छोटा, झुर्रियों भरा, हल्का काँपता हुआ था। आर्यन ने दोनों हाथों से पकड़ा और झुककर छू लिया।
उस दिन पहाड़गंज घाटी में खबर आग की तरह फैली। लोग कहने लगे कि सावित्री देवी की किस्मत खुल गई। कुछ ने कहा, “इतना सब एक रात की खिचड़ी के बदले?” कुछ ने ताने भी मारे, “बूढ़ी अम्मा ने बड़े आदमी को फँसा लिया होगा।” लेकिन जब काम शुरू हुआ, तो ताने धीरे-धीरे शर्म में बदल गए।
पहले उनके घर की छत बदली। बरसात में पहली बार बाल्टियाँ नहीं रखनी पड़ीं। सावित्री उस रात देर तक छत को देखती रहीं। फिर राजेंद्र की तस्वीर से बोलीं—
—देखो, अब घर रोता नहीं है।
नया हीटर लगा। ठंड में पहली बार कमरे में साँस लेते हुए दर्द नहीं हुआ। खिड़कियों पर प्लास्टिक हट गया। गौरी और काली धूप में बैठने लगीं। बरामदा वैसा ही रहा—पुराना, पर संभला हुआ। सावित्री हर सुबह वहाँ चाय रखतीं, जैसे राजेंद्र अभी भी आकर बैठेंगे।
3 महीने बाद पुरानी राशन दुकान बदलने लगी। टूटी शटर गई, नई लकड़ी का दरवाज़ा आया। भीतर साफ़ फर्श, लंबी मेज़ें, बड़ा चूल्हा, स्टील के बर्तन, दीवार पर लिखा नियम—
“जो भूखा आए, वह अपना है।”
उद्घाटन के दिन पूरा मोहल्ला उमड़ आया। सावित्री ने नई साड़ी पहनी, लेकिन वही पुराना स्वेटर रखा। माथे पर छोटी बिंदी, बाल सफ़ेद, हाथ में कलछी। आर्यन भी आया, इस बार चमड़े की जैकेट में। उसके साथ करण, देव, निखिल और इमरान भी थे। वही 5 आदमी, जिनके लिए एक रात दाल में पानी बढ़ाया गया था।
करण की कलाई पर अब हल्का निशान था। उसने सावित्री को देखकर हाथ जोड़ दिए।
—माँजी, पट्टी का निशान रह गया।
सावित्री ने मुस्कुराकर कहा—
—अच्छा है। याद रहेगा कि ठंड में अकड़ना नहीं चाहिए।
सब हँस पड़े।
पहले दिन 238 लोगों ने खाना खाया। मज़दूर, स्कूल की लड़कियाँ, बस अड्डे पर फँसे यात्री, अकेली दादियाँ, छोटे बच्चे। सावित्री हर थाली में चावल डालते हुए पूछतीं—
—और दाल दूँ?
कोई बच्चा डरते-डरते हाँ कहता तो वह थोड़ा ज़्यादा डाल देतीं।
जल्दी ही रसोई पूरे इलाके का सहारा बन गई। शाम को जिन घरों में चूल्हा नहीं जलता था, वहाँ से लोग शर्माते हुए आते। सावित्री ने शर्म भी परोसकर खिला दी। वह कहतीं—
—भूख में शर्म कैसी? पेट तो सबका एक जैसा बोलता है।
गली में लाइटें लगीं। बरसों बाद रात को महिलाएँ बिना डर पानी भरने जा सकीं। खाली प्लॉट में छोटा पार्क बना। झूले लगे। बच्चे दौड़ने लगे। जिन घरों के दरवाज़े पहले बंद रहते थे, वहाँ लोग शाम को बाहर बैठने लगे। सावित्री की रसोई ने सिर्फ़ पेट नहीं भरे, मोहल्ले को फिर से आपस में मिलाया।
फिर पहला छात्रवृत्ति समारोह आया। सरकारी इंटर कॉलेज का छोटा हॉल भरा हुआ था। 2 बच्चों के नाम घोषित हुए—पूजा रावत और आदिल खान। पूजा की माँ घरों में काम करती थी। आदिल के पिता रिक्शा चलाते थे। दोनों ने पढ़ाई के साथ बुज़ुर्गों को दवा पहुँचाने का काम किया था।
सावित्री मंच पर पहुँचीं। हाथ में लिफ़ाफ़े थे, पर आवाज़ काँप रही थी।
—यह पैसे तुम्हारे सिर पर बोझ नहीं हैं। यह भरोसा है। इसे लौटाना मत। बस कभी किसी के दरवाज़े पर दस्तक सुनो, तो खोलना मत भूलना।
हॉल में कुछ देर सन्नाटा रहा। फिर तालियाँ गूँज उठीं। पूजा रो रही थी। आदिल ने अपनी माँ का हाथ कसकर पकड़ लिया।
आर्यन पीछे खड़ा सब देख रहा था। किसी पुरस्कार समारोह में उसे इतनी शांति कभी नहीं मिली थी।
1 साल बीत गया।
फिर वही तारीख़ आई—14 फरवरी। पहाड़ों पर फिर बर्फ़ पड़ी। उतना भयानक तूफ़ान नहीं था, पर रात कड़वी थी। लोग जल्दी घरों में बंद हो गए। सड़कें खाली हो गईं। पर राजेंद्र-सावित्री जन रसोई की बत्तियाँ जल रही थीं।
सावित्री ने उस दिन रसोई बंद नहीं की। कर्मचारियों ने कहा—
—अम्मा, आज कोई नहीं आएगा। मौसम बहुत खराब है।
सावित्री ने खिड़की से बाहर देखा।
—जिसे आना होगा, वही आएगा।
उन्होंने दाल चढ़ाई, चावल धोए, चाय बनाई, 3 कंबल दरवाज़े के पास रखे। गौरी और काली अब रसोई के बाहर ही बैठती थीं, जैसे पहरेदार हों।
रात 9:15 पर दरवाज़े पर दस्तक हुई।
ठीक वैसी ही।
सावित्री का हाथ कुछ पल हवा में ठहर गया। फिर वह धीरे-धीरे दरवाज़े तक गईं और खोल दिया।
बाहर एक जवान औरत खड़ी थी, उम्र 25 के आसपास। गोद में 2 साल का बच्चा, दोनों काँप रहे थे। औरत के होंठ नीले पड़ चुके थे।
—माँजी… बस बंद हो गई… कोई गाड़ी नहीं रुकी… बच्चे को ठंड लग रही है…
सावित्री ने एक पल भी नहीं सोचा।
—अंदर आ जा बेटी, बाहर खड़ी रही तो सुबह नहीं देखेगी।
उन्होंने बच्चे को अपनी बाँहों में लिया, कंबल में लपेटा, उसे चूल्हे के पास बैठाया। औरत को गरम चाय दी। फिर दाल-चावल की थाली आगे रख दी।
औरत खाते-खाते रो पड़ी।
—आप मुझे जानती भी नहीं… फिर भी इतना सब क्यों कर रही हैं?
सावित्री ने बच्चे के सिर पर हाथ फेरा। उनकी आँखों में उस रात की बर्फ़, वह दरवाज़ा, 5 अजनबी और राजेंद्र की शॉल एक साथ चमक उठे।
—कभी मेरे दरवाज़े पर भी कोई आया था। उस दिन समझ आया कि घर का दरवाज़ा लकड़ी का नहीं होता, दिल का होता है।
बाहर बर्फ़ गिरती रही। भीतर रसोई की रोशनी जलती रही। दीवार पर राजेंद्र और सावित्री का नाम चमक रहा था। चूल्हे पर दाल उबल रही थी। 1 बच्चा गरम कंबल में सो गया। 1 माँ पहली बार चैन से रो पाई।
और सावित्री देवी ने कलछी उठाकर 2 और कटोरे भर दिए, जैसे दुनिया की सबसे बड़ी बात यही हो—जब कोई ठंड से काँपता हुआ दरवाज़े पर आए, तो उसे भीतर बुला लिया जाए।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.