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प्रसव के 5 घंटे बाद जब सास ने घायल बहू के सामने कागज़ रखे और कहा, “2 बच्चों की माँ बनने लायक नहीं”, तब कमरे में खड़ा सच पलटा और सबको पता चला कि चुप बहू असल में परिवार न्यायालय की न्यायाधीश थी

PART 1

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ऑपरेशन से प्रसव के सिर्फ 5 घंटे बाद, टांकों की जलन से कांपती रिया माथुर के सामने उसकी सास ने कागज़ फेंके और कहा—
—इन पर हस्ताक्षर कर दो, कबीर को मीरा के साथ जाने दो। तुम्हारे जैसी औरत 2 बच्चों की माँ बनने लायक नहीं है।

दिल्ली के लाजपत नगर की एक निजी प्रसूति इकाई के कमरे 407 में रात गहरी हो चुकी थी। बाहर गलियारे में दवाइयों, दूध और गर्म चाय की मिली-जुली गंध थी। रिया के पेट पर मोटी पट्टी बंधी थी, हाथ में सुई लगी थी, और हर सांस जैसे भीतर किसी ताजा जख्म को खींच रही थी।

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उसके दाहिने तरफ छोटे पारदर्शी पालने में तारा सो रही थी। बाईं तरफ कबीर अपने गुलाबी होंठ हिला रहा था, जैसे अभी भी माँ की धड़कन खोज रहा हो।

रिया ने जिंदगी में इतनी बड़ी खुशी कभी नहीं देखी थी। और इतने पास खड़ा डर भी कभी महसूस नहीं किया था।

सावित्री मल्होत्रा, उसकी सास, महंगे रेशमी सूट में खड़ी थी। उसके पीछे उसकी बेटी मीरा थी, 38 साल की, सूनी मांग, कांपती आंखें और हाथ में खाली शिशु-टोकरी। वह टोकरी खाली थी, मगर खुली हुई थी, जैसे कबीर को उसमें रखने की तैयारी पहले से हो चुकी हो।

रिया ने कागज़ों पर नजर डाली। “अस्थायी पारिवारिक देखभाल”, “मातृ अधिकारों की स्वैच्छिक अनुमति”, “नवजात पुत्र की देखरेख बुआ के पास”। शब्द इतने ठंडे थे कि वे अस्पताल की सफेद चादर से भी ज्यादा बेरहम लग रहे थे।

उसका पति आरव नीचे कार से बैग लेने गया था। जाते-जाते उसने कहा था—
—माँ को देखने दो बच्चों को। जन्म के दिन झगड़ा मत शुरू करना।

रिया ने चुप रहना सीख लिया था। 5 साल से वह यही करती आई थी। सावित्री उसे घर में बैठी, बेटे की कमाई पर जीती, कमजोर औरत समझती थी। परिवार के खाने पर वह हंसकर कहती—
—रिया अच्छी है, बस जिम्मेदारी उठाने की हिम्मत नहीं है।

सावित्री को नहीं मालूम था कि रिया माथुर दिल्ली के परिवार न्यायालय में न्यायाधीश थी। 4 साल से वह बच्चों की अभिरक्षा, घरेलू हिंसा, पत्नी पर दबाव और बूढ़ी माताओं के लालच से टूटते घरों के फैसले लिखती आई थी। आरव सब जानता था। मगर उसने ही कहा था—
—माँ को मत बताना। उन्हें लगेगा तुम उन्हें नीचा दिखा रही हो।

उस रात रिया को समझ आया कि उसका मौन शांति नहीं, दूसरों की हिम्मत बन गया था।

—आप होश में हैं? रिया ने सूखे गले से पूछा।

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सावित्री आगे झुकी।
—मीरा ने 7 बार इलाज कराया, 3 बार गर्भ ठहरा और चला गया। उसका घर खाली है। भगवान ने तुम्हें 2 दिए हैं। 1 उसे दे दो। यही न्याय है।

—बच्चा कोई प्रसाद नहीं जिसे बांट दिया जाए।

सावित्री की आंखें सिकुड़ गईं।
—बड़ी बातें मत करो। तुम्हारे पास कमाई नहीं, सहारा नहीं। आरव दिन-रात काम करता है। 2 बच्चों को संभालना तुम्हारे बस की बात नहीं।

रिया ने पेट पर हाथ रखा।
—कबीर की माँ मैं हूँ।

सावित्री ने बिना जवाब दिए पालने की ओर हाथ बढ़ाया।

रिया उठना चाहती थी, मगर दर्द ने उसकी कमर तोड़ दी।
—उसे हाथ मत लगाइए।

सावित्री ने कबीर को उठा लिया। बच्चा चीख पड़ा। उसी पल तारा भी जाग गई। 2 नवजातों का रोना कमरे की दीवारों से टकराने लगा।

रिया ने लाल आपात बटन दबाने की कोशिश की। सावित्री ने उसका हाथ पकड़ लिया। पकड़ इतनी कड़ी थी कि रिया की पट्टी के नीचे गर्म नमी फैल गई।

—हस्ताक्षर कर दो, सब कहेंगे तुमने समझदारी दिखाई।

—कभी नहीं।

थप्पड़ इतनी तेजी से पड़ा कि मीरा चीख उठी। रिया का सिर बिस्तर की लोहे की रेलिंग से टकराया। छत की रोशनी 2 हिस्सों में टूट गई।

लेकिन रिया ने कांपते हाथ से आखिर लाल बटन दबा दिया।

अलार्म बजा।

सावित्री ने एक पल में चेहरा बदल लिया। वह कबीर को सीने से चिपकाकर दरवाजे की ओर चीखी—
—बचाइए! बहू पागल हो गई है! बच्चे को छीनने लगी थी!

और तभी कमरे का दरवाजा खुला।

PART 2

2 नर्सें, एक महिला चिकित्सक, 2 सुरक्षा कर्मी और अस्पताल में मौजूद पुलिसकर्मी भीतर आ गए। दृश्य सावित्री के पक्ष में था। उसके हाथ में बच्चा था, कपड़े सलीकेदार थे, आवाज कांप रही थी। बिस्तर पर रिया बिखरी हुई थी—पीली, घायल, पट्टी भीगी हुई, आंखों में दर्द।

—बहू प्रसव के बाद से ठीक नहीं है, सावित्री रोते हुए बोली। वह खुद कागज़ों पर उलझी बातें लिख रही थी। मेरा बेटा कहकर गया था कि कबीर को बचाए रखना।

रिया ने पूरी ताकत से कहा—
—झूठ। ये मेरे बेटे को मेरी ननद को देने आई हैं।

एक सिपाही बोला—
—मैडम, आप अभी कमजोर हैं। पहले शांत हो जाइए।

सावित्री के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।

रिया ने सीधा उसकी आंखों में देखा। फिर धीमे मगर साफ स्वर में कहा—
—मेरा पूरा नाम रिया माथुर अवस्थी है।

दरवाजे पर खड़ा सुरक्षा अधिकारी ठिठक गया।
—रिया माथुर अवस्थी? परिवार न्यायालय वाली न्यायाधीश?

कमरे में अचानक सन्नाटा जम गया।

सावित्री का चेहरा उतर गया।
—न्यायाधीश? यह तो घर में रहती है!

तभी मीरा टूटकर रो पड़ी।
—माँ झूठ बोल रही है। उन्होंने कहा था रिया दवाइयों में रहेगी, हस्ताक्षर कर देगी, और आरव बाद में सब संभाल लेगा।

रिया की आंखें आरव को ढूंढने लगीं।

उसी क्षण आरव दरवाजे पर आ खड़ा हुआ।

PART 3

उसके कंधे पर बच्चों का बैग था, हाथ में पानी की बोतल, और चेहरे पर ऐसी घबराहट जैसे किसी ने अचानक उसके पूरे जीवन की दीवार गिरा दी हो। उसने पहले अपनी माँ को कबीर के साथ देखा, फिर मीरा को रोते हुए, फिर रिया को—गाल लाल, पेट की पट्टी भीगी हुई, आंखें ऐसी जैसे अब वह पति को नहीं, किसी गवाह को देख रही हो।

—यह क्या हो रहा है? आरव की आवाज फंस गई।

रिया ने बिना रोए कहा—
—तुम्हारी माँ हमारा बेटा लेकर जा रही थी।

आरव सफेद पड़ गया।
—माँ ने मुझे फोन किया था। कहा था तुम घबरा रही हो।

पुलिसकर्मी आगे आया।
—कोई बाहर नहीं जाएगा। बच्चे को तुरंत नर्स को दीजिए।

सावित्री ने कबीर को और कस लिया।
—यह मेरा पोता है। मेरी बेटी ने उसे अपनी जान से ज्यादा चाहा है। एक माँ का दर्द तुम लोग क्या समझोगे?

महिला चिकित्सक का चेहरा कठोर हो गया।
—दूसरी औरत का दर्द किसी नवजात पर अधिकार नहीं बनाता।

नर्स ने सावधानी से कबीर को सावित्री की बांहों से लिया। एक पल के लिए सावित्री ने विरोध किया, मगर 2 पुलिसकर्मी आगे बढ़े तो उसने हाथ ढीले छोड़ दिए। कबीर को जब रिया की छाती पर रखा गया, उसका रोना धीरे-धीरे सिसकी में बदल गया। तारा को भी पास खिसका दिया गया। रिया ने दोनों बच्चों को अपनी बांहों में भर लिया, जैसे उसका घायल शरीर भी किले की दीवार बन सकता था।

वह कुछ नहीं बोली। वह सिर्फ उनके सांस लेने की आवाज सुनती रही।

1 बच्चा दाईं ओर।

1 बच्चा बाईं ओर।

दोनों जीवित।

दोनों उसके।

चिकित्सक ने पट्टी देखी। टांके पर जोर पड़ा था। रक्तचाप बढ़ा हुआ था। गाल पर सूजन थी। नर्स ने चोट का विवरण लिखा। समय दर्ज हुआ। कमरे में मौजूद हर व्यक्ति का नाम लिखा गया। पहली बार रिया को लगा, सच को कागज़ मिल रहे हैं।

सुरक्षा कक्ष से कैमरों की फुटेज मंगाई गई। उसमें सावित्री और मीरा लिफ्ट से उतरती दिखीं। मीरा के हाथ में खाली टोकरी थी, सावित्री के हाथ में कागज़ों की मोटी फाइल। वे कमरे के बाहर रुककर इधर-उधर देखती रहीं। नर्स के आगे निकलते ही सावित्री बिना दस्तक दिए भीतर गई।

मीरा की कार से एक बैग मिला—नवजात के कपड़े, दूध की बोतलें, नीला कंबल, छोटे मोजे, तेल की शीशी और एक लिफाफा। लिफाफे पर मीरा की कांपती लिखावट थी—

“घर में स्वागत है, मेरे बेटे। तेरी असली माँ ने तेरा इंतजार 10 साल किया।”

जब यह वाक्य पुलिसकर्मी ने पढ़ा, रिया ने आंखें बंद कर लीं। उसका दुख अब आंसू नहीं था। वह भीतर लोहे की तरह ठंडा हो चुका था।

यह कोई भावुक गलती नहीं थी। यह योजना थी। एक नवजात को उसकी माँ की छाती से अलग करने की योजना।

सावित्री को कमरे से बाहर ले जाया गया। जाते-जाते भी वह बोली—
—तुम सब नहीं समझते। मीरा टूट गई है। रिया के पास 2 हैं। 1 से किसका क्या बिगड़ जाता?

पुलिस अधिकारी ने शांत स्वर में कहा—
—बच्चा किसी बड़े के टूटे हुए जीवन की पट्टी नहीं होता।

मीरा भी बाहर ले जाई गई। वह चल नहीं पा रही थी। दरवाजे के पास रुककर उसने रिया की ओर देखा।
—मुझे माफ कर दो।

रिया ने कोई उत्तर नहीं दिया।

कुछ माफी इतनी जल्दी आ जाती है कि घाव उसे सुनने की हालत में नहीं होता।

दरवाजा बंद हुआ तो कमरे में आरव रह गया। वह धीरे-धीरे बिस्तर के पास आया।

—रिया…

—मुझे मत छूना।

वह वहीं रुक गया।

—मैंने नहीं सोचा था माँ सच में ऐसा करेंगी।

रिया ने उसकी ओर देखा। वह नजर अदालत की नहीं, एक टूटी हुई पत्नी की थी।
—लेकिन तुम जानते थे कि वे ऐसा सोचती हैं।

आरव ने सिर झुका लिया।

—माँ कहती थीं मीरा मर जाएगी दुख से। कहती थीं कि परिवार में ही तो रहेगा बच्चा। शायद कुछ व्यवस्था हो सकती है। मैंने सोचा बस बातें हैं।

—तुमने सोचा नहीं, आरव। तुमने सुविधा चुनी।

वह कांप गया।

—मैं झगड़ा नहीं चाहता था।

—नहीं। तुम चाहते थे मैं झगड़े को चुपचाप झेलती रहूं। तुमने मुझे अपनी माँ के सामने बेरोजगार, कमजोर, अयोग्य कहलाने दिया। तुम जानते थे मैं क्या काम करती हूं। तुम जानते थे मैं कितनी महिलाओं को उनके बच्चों से दूर होने से बचाती हूं। फिर भी तुमने मुझे अपने ही घर में छोटा बनाकर रखा।

आरव की आंखों से आंसू गिरने लगे।
—मुझसे गलती हुई।

रिया ने तारा के सिर पर होंठ रखे। फिर कबीर के गाल को उंगली से छुआ।
—गलती वह होती है जो अचानक हो। यह चुप्पी थी, जो सालों तक पाली गई।

उस रात आरव कमरे के कोने में बैठा रहा। रिया सोई नहीं। हर कुछ मिनट में वह दोनों बच्चों को देखती। कभी कबीर की छाती उठती देखती, कभी तारा की मुट्ठी। उसे डर था कि आंख बंद होते ही कोई फिर दरवाजा खोल देगा।

सुबह तक बात अस्पताल प्रशासन तक पहुंच गई। प्रसूति इकाई ने शिकायत दर्ज कराई। नकली कागज़ों में एक झूठी संस्था की मुहर थी। “परिवार परामर्श समिति” नाम की कोई मान्यता प्राप्त संस्था नहीं निकली। हस्ताक्षर की जगह रिया का नाम पहले से छपा था। तारीख वही थी—बच्चों के जन्म की रात।

मामला दर्ज हुआ—नवजात को अवैध रूप से ले जाने की कोशिश, मारपीट, धोखाधड़ी के कागज़, प्रसूति मरीज पर दबाव। अस्पताल ने कमरे के बाहर सुरक्षा बैठा दी। रिया के न्यायालय के सहकर्मियों को खबर मिली तो पहले संयमित संदेश आए—

“मजबूत रहो।”

“बच्चे सुरक्षित हैं?”

“दरवाजे पर कोई भरोसेमंद है?”

फिर एक वरिष्ठ महिला न्यायाधीश ने स्वयं अस्पताल प्रशासन से बात की। अगले दिन रिया की सहकर्मी सीमा एक थैला लेकर आई—छोटे कपड़े, फोन का चार्जर, घर का बना दलिया, और एक पर्ची—

“तुमने बहुतों की रक्षा की है। आज दरवाजे की रखवाली हमें करने दो।”

रिया ने वह पर्ची कई बार पढ़ी।

खबर धीरे-धीरे रिश्तेदारों में फैल गई। परिवार के बड़े लोगों ने फोन किए। कुछ ने सावित्री को गलत कहा। कुछ ने मीरा का दुख याद दिलाया। कुछ ने आरव को बेचारा बताया—
—माँ और पत्नी के बीच फंस गया लड़का।

रिया को यह वाक्य सबसे ज्यादा चुभा। क्योंकि वह जानती थी, सच में फंसता वही है जो खड़ा होने से डरता है। आरव फंसा नहीं था। वह खामोश खड़ा था, और उसकी खामोशी ने रास्ता बना दिया था।

3 दिन बाद सावित्री ने एक रिश्तेदार के जरिए संदेश भेजा—
“मैंने यह सब परिवार बचाने के लिए किया। मीरा को भी माँ बनने का हक है।”

रिया ने अपनी वकील से सिर्फ 1 पंक्ति भिजवाई—
“माँ बनने का हक किसी दूसरी माँ से बच्चा छीनने का अधिकार नहीं देता।”

5 दिन बाद रिया अस्पताल से निकली। बाहर कोई खुशी का शोर नहीं था। न ढोल, न फूलों की माला, न घर लौटती माँ की मुस्कुराती तस्वीर। आरव ने कबीर की टोकरी उठाई। रिया ने तारा को सीने से लगाया। हर कदम उसके टांकों को याद दिला रहा था कि शरीर भी स्मृति रखता है।

घर पहुंचते ही उसने सबसे पहले ताला बदलवाया।

आरव दरवाजे पर खड़ा देखता रहा।
—तुम सच में ताला बदल रही हो?

—हाँ।

—माँ के खिलाफ?

रिया ने चाबी हाथ में घुमाई।
—हर उस व्यक्ति के खिलाफ जो बिना दस्तक दिए मेरी जिंदगी में घुसना चाहता है।

आरव ने धीमे से पूछा—
—और मैं?

रिया ने उसकी ओर देखा।
—तुम्हारे पास अभी चाबी है। मगर अब तुम्हें पता है, चाबी भरोसे से चलती है, जन्मसिद्ध अधिकार से नहीं।

अगले कुछ महीने मुश्किल थे। तारा रात में रोती तो रिया की धड़कन तेज हो जाती। कबीर दूध पीते-पीते अचानक चुप हो जाता तो वह उसकी सांस जांचती। घर की घंटी बजती तो उसके हाथ ठंडे हो जाते। वह कई बार बच्चों को गिनती—1, 2। फिर दोबारा—1, 2। जैसे कोई अदृश्य हाथ अभी भी किसी एक को उठाने आ सकता था।

आरव ने अपनी माँ से संपर्क तोड़ा। शुरुआत में रिया को उस पर विश्वास नहीं हुआ। फिर उसने देखा कि वह हर कॉल काट देता है, हर संदेश वकील को भेजता है, हर रिश्तेदार से यही कहता है—
—मेरी पत्नी पागल नहीं थी। मेरी माँ ने अपराध किया।

यह वाक्य बोलने में उसे 5 साल लग गए थे। पर अब वह हर बार थोड़ा सीधा खड़ा होता दिखता था।

फिर भी रिया ने उसे तुरंत माफ नहीं किया। वह जानती थी कि पछतावा और परिवर्तन 2 अलग बातें हैं। पछतावा आंखों से गिरता है। परिवर्तन आदतों में दिखता है।

आरव ने परामर्श लेना शुरू किया। वह बच्चों को नहलाना सीखता, रात में बोतल गर्म करता, रिया के सोते समय दरवाजा चेक करता। कभी-कभी गलती से वह धीमे कदमों से कमरे में आता, और रिया चौंककर बैठ जाती। वह वहीं रुक जाता और कहता—
—मैं हूं। पहले पूछ रहा हूं, भीतर आऊं?

रिया को यह छोटा वाक्य धीरे-धीरे दवा जैसा लगने लगा। अनुमति। सीमा। आदर।

2 महीने बाद मीरा ने मिलने की इच्छा जताई। रिया ने पहले मना किया। फिर अपनी परामर्शदाता और वकील की मौजूदगी में मिलने को तैयार हुई। जगह एक छोटा कार्यालय था, जहां खिड़की से नीम का पेड़ दिखता था।

मीरा बिना सजावट के आई थी। आंखों के नीचे काले घेरे थे। उसने कबीर का नाम भी तुरंत नहीं लिया।

—मैंने अपने दुख को सच मान लिया था, उसने कहा। माँ कहती थीं कि तुम बच्चों को संभाल नहीं पाओगी। कहती थीं, आरव मान जाएगा। कहती थीं, परिवार के भीतर ही तो रहेगा। मुझे लगा मैं चोरी नहीं कर रही, अपना खाली घर भर रही हूं।

रिया चुप रही।

—जब मैंने तुम्हें उस बिस्तर पर देखा, मीरा की आवाज टूट गई, मुझे पता चल गया था कि हम राक्षस बन गए हैं। पर मैं देर से बोली।

रिया ने सीधे पूछा—
—टोकरी किसने लाई थी?

मीरा ने आंखें बंद कीं।
—मैंने।

—बैग किसने तैयार किया?

—मैंने।

—लिफाफा किसने लिखा?

मीरा की ठुड्डी कांपी।
—मैंने।

—तो अब यह मत कहना कि तुम सिर्फ माँ की बातों में आई थीं।

मीरा ने सिर झुका लिया।
—नहीं कहूंगी।

उस दिन रिया ने उसे माफ नहीं किया। मगर उसे पहली बार बिना बहाने वाला सच मिला। और कभी-कभी न्याय की शुरुआत माफी से नहीं, सच के पूरे वाक्य से होती है।

मामला अदालत तक पहुंचा। रिया उस दिन न्यायाधीश की कुर्सी पर नहीं थी। वह शिकायतकर्ता थी। माँ थी। वही स्त्री थी जिसे प्रसव के 5 घंटे बाद उसके बेटे से अलग करने की कोशिश हुई थी।

सावित्री अदालत में भी सजी-धजी आई। हल्की रेशमी साड़ी, मोतियों की माला, माथे पर छोटी बिंदी। जैसे वह किसी पारिवारिक सभा में अपनी सफाई देने आई हो। मगर इस बार कमरे पर उसका नियंत्रण नहीं था। कैमरों की फुटेज चली। नकली कागज़ पढ़े गए। मीरा के संदेश सामने आए। आरव ने गवाही दी कि उसने अपनी माँ को कई बार “कबीर को मीरा के पास रखने” की बात करते सुना था और हर बार उसे टालकर गलती की।

जब रिया से पूछा गया कि वह कुछ कहना चाहती है या नहीं, वह धीरे से उठी। उसके हाथ स्थिर थे।

—मेरे बच्चों के जन्म के दिन, किसी ने उन्हें यह सिखाने की कोशिश की कि माँ की कमजोरी का फायदा उठाया जा सकता है। कि एक औरत का खुला हुआ पेट उसे कम माँ बना देता है। कि किसी एक स्त्री का अधूरा दुख दूसरी स्त्री की गोद से बच्चा मांग सकता है। मैं चाहती हूं मेरे बच्चे इसके उलट सच जानें—किसी भी खालीपन को भरने के लिए किसी बच्चे को उसकी माँ से नहीं छीना जा सकता।

अदालत में सन्नाटा था।

सावित्री ने पहली बार नजरें झुका लीं।

निर्णय में उसे सजा मिली, जुर्माना लगा, और रिया तथा बच्चों से दूर रहने का आदेश हुआ। मीरा को भी दंड मिला, मगर उसके सहयोग और स्वीकारोक्ति को ध्यान में रखते हुए उसे अनिवार्य मनोवैज्ञानिक परामर्श और निगरानी के साथ सशर्त राहत दी गई। आरव पर कोई आपराधिक आरोप सिद्ध नहीं हुआ, पर अदालत की टिप्पणी ने उसे भीतर तक हिला दिया—

“परिवार की चुप्पी कई बार अपराध की सीढ़ी बन जाती है।”

रिया ने वह पंक्ति पढ़ी और कागज़ बंद कर दिया। उसे किसी से जीतने की खुशी नहीं हुई। ऐसी लड़ाइयों में जीत भी थकी हुई आती है।

घर लौटते समय कार की पिछली सीट पर तारा सो रही थी। कबीर खिड़की की रोशनी पर हाथ मार रहा था। आरव ने धीरे से पूछा—
—क्या आज रात मैं बच्चों को सुला दूं?

रिया ने कुछ पल सोचा।
—पहले दरवाजे की कुंडी देख लेना।

वह समझ गया।
—हाँ।

शाम को बच्चों ने पहली बार साथ बैठकर खिचड़ी खाई। तारा ने आधी अपनी ठुड्डी पर गिरा दी। कबीर ने कटोरी उलट दी। रिया ने उन्हें देखा तो उसके भीतर पहली बार वह हंसी उठी जो डर से नहीं टूटी थी।

रात में जब दोनों सो गए, रिया ने अलमारी से छोटा डिब्बा निकाला। उसमें अस्पताल के 2 कंगन रखे थे।

तारा माथुर अवस्थी।

कबीर माथुर अवस्थी।

2 पतले प्लास्टिक के कंगन। मगर रिया के लिए वे किसी फैसले से भारी थे। किसी मुहर से बड़े। किसी रिश्तेदार की राय से पवित्र।

आरव कमरे के दरवाजे पर रुका।
—क्या मैं अंदर आ सकता हूं?

रिया ने उसकी ओर देखा। फिर धीमे से सिर हिलाया।

वह अंदर आया, मगर दूरी बनाकर खड़ा रहा।

—तुम ये कंगन हमेशा रखोगी?

—हाँ।

—बच्चों को बताओगी?

रिया ने डिब्बे पर हाथ रखा।
—हाँ। पर नफरत की कहानी की तरह नहीं। सीमा की कहानी की तरह। उन्हें बताऊंगी कि प्यार मांगता है, छीनता नहीं। परिवार सहारा देता है, सौदा नहीं करता। और माँ थकी हो सकती है, घायल हो सकती है, रो सकती है, पर इसका मतलब यह नहीं कि वह कमजोर है।

आरव की आंखें भर आईं।
—मैं उस सीमा के लायक बनना चाहता हूं।

रिया ने तुरंत कोई वादा नहीं दिया। वह जानती थी कि कुछ फैसले आंसुओं की गर्मी में नहीं सुनाए जाते। उन्हें समय, प्रमाण और बार-बार सही चुने गए कर्म चाहिए।

उसने सिर्फ इतना कहा—
—तो मेरी ताकत को फिर कभी झगड़ा मत कहना।

आरव ने सिर झुका दिया।
—कभी नहीं।

कुछ देर बाद रिया बच्चों के कमरे तक गई। हल्की नीली रोशनी में तारा की मुट्ठी खुली थी और कबीर का चेहरा तकिए की ओर मुड़ा था। दोनों की सांसें कमरे में छोटे-छोटे दीपकों की तरह जल रही थीं।

पहले वह हर रात उन्हें गिनती थी। 1। 2। फिर दोबारा 1। 2।

उस रात उसने दरवाजे पर खड़े होकर सिर्फ सुना।

दोनों सांस ले रहे थे।

दोनों वहीं थे।

और पहली बार जन्म के बाद, रिया ने उन्हें गिना नहीं।

उसे पता था।

वे 2 थे।

और अब वह भी पूरी थी।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.