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पिता की चिता की राख भी ठंडी नहीं हुई थी, सौतेली माँ 5 करोड़ की वसीयत पूछ रही थी और बहन मुस्कुरा रही थी 😢🔥 मैंने बस नर्स की कही बात याद रखी—”घर मत जाना”… फिर चुपचाप पुरानी गाड़ी में बैठी, और बंद फार्महाउस में जो देखा, उसने पूरी विरासत उलट दी ⚖️

भाग 1:
पिता की चिता की राख अभी पूरी तरह ठंडी भी नहीं हुई थी, तभी उनकी नर्स ने अनन्या मेहरा की कलाई पकड़कर फुसफुसाया—
—घर मत लौटना, बेटा… तुम्हारी सौतेली माँ और बहन तुम्हें भी मरवाना चाहती हैं।

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अनन्या के पैरों के नीचे जैसे श्मशान की जमीन खिसक गई। सुबह 11 बजे निगमबोध घाट पर उसके पिता राजेंद्र मेहरा का अंतिम संस्कार हुआ था, वही राजेंद्र मेहरा जिनकी गिनती दिल्ली के बड़े रियल एस्टेट कारोबारियों में होती थी। यमुना के किनारे धुआँ अभी भी हवा में तैर रहा था, सफेद फूलों की गंध में घी और जली लकड़ी की तीखी बू मिली हुई थी, और बड़े-बड़े कारोबारी काली गाड़ियों में बैठकर संवेदना जताते हुए जा रहे थे।

अनन्या काले सूट में खड़ी थी। आँखें सूज चुकी थीं, पर आँसू जैसे खत्म हो गए थे। सामने उसकी सौतेली माँ कविता मेहरा सिर पर पल्लू रखे ऐसे रो रही थी मानो दुनिया उजड़ गई हो। उसके पास रिया थी, वही लड़की जिसे राजेंद्र ने 8 साल की उम्र से अपनी बेटी की तरह पाला था। रिया बार-बार रूमाल आँखों पर रखती, फिर धीरे से मोबाइल देखती, जैसे किसी जरूरी संदेश का इंतजार हो।

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अनन्या ने दोनों को बचपन से देखा था। उसे पता था कि वह मातम नहीं था, अभिनय था।

राजेंद्र मेहरा 6 महीने से अजीब बीमारी से टूटते जा रहे थे। डॉक्टर कुछ साफ नहीं बता पाते थे। कभी कमजोरी, कभी उलझन, कभी हाथ काँपना, कभी अचानक बेहोशी। हर रात कविता उनके लिए बादाम वाला दूध बनाती थी।

—नींद अच्छी आएगी, राजेंद्र जी।

हर सुबह राजेंद्र और ज्यादा पीले, कमजोर और गुमसुम हो जाते। अनन्या बार-बार कहती कि उन्हें किसी बड़े अस्पताल में पूरी जाँच करानी चाहिए, पर कविता उसे डाँट देती।

—तुम्हें बस प्रॉपर्टी की चिंता है, अनन्या। बाप बूढ़ा हो रहा है, यह मान क्यों नहीं लेती?

रिया भी ताना मारती।

—दीदी, हर चीज में ड्रामा मत किया करो। मम्मी पापा की सेवा कर रही हैं, तुम तो बस शक करती रहती हो।

लेकिन आज, चिता के धुएँ के बीच, सुशीला आंटी का चेहरा देखकर अनन्या को लगा कि उसका शक सिर्फ शक नहीं था। सुशीला पिछले 3 साल से राजेंद्र की निजी नर्स थी। शांत, भरोसेमंद, कम बोलने वाली। पर इस वक्त उसका चेहरा राख जैसा सफेद था।

—आंटी, क्या हुआ? आप ऐसा क्यों कह रही हैं?

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सुशीला ने चारों तरफ देखा। कविता कुछ दूरी पर कुछ रिश्तेदारों के सामने रोने का नाटक कर रही थी। रिया फोन पर किसी से धीरे-धीरे बात कर रही थी।

—यहाँ एक शब्द मत बोलना। मेरे साथ चलो। अभी।

—लेकिन घर पर तेरहवीं की तैयारी…

—अगर जिंदा रहना है तो मेरे साथ चलो।

अनन्या का गला सूख गया। सुशीला उसे भीड़ से अलग लेकर पिछली गली की ओर चली। वहाँ एक पुरानी सफेद मारुति वैन खड़ी थी, जिसका इंजन चालू था। वह मेहरा ग्रुप की साइट पर इस्तेमाल होने वाली पुरानी गाड़ी थी। अनन्या ने आखिरी बार पीछे देखा। कविता ने उसी क्षण आँसू पोंछकर रिया से कुछ कहा और दोनों के चेहरे पर एक पल के लिए ऐसी मुस्कान आई जिसने अनन्या की रीढ़ जमा दी।

वैन तेज़ी से श्मशान से निकली। दिल्ली की भीड़ पीछे छूटती गई। वे महरौली की तरफ मुड़ीं, फिर छतरपुर के पुराने फार्महाउस इलाकों में घुस गईं। रास्ते में बड़े-बड़े गेट, धूल भरी सड़कें, नीम के पेड़ और अधबने बंगले दिखते रहे। लगभग 1 घंटे बाद वैन एक जंग लगे लोहे के फाटक के सामने रुकी।

अनन्या ने जगह पहचान ली। यह उसके दादा का पुराना फार्महाउस था, जिसे परिवार ने वर्षों से बंद बताया था। राजेंद्र उसे बचपन में यहाँ पतंग उड़ाने लाते थे। उसके बाद यह जगह बस यादों में रह गई थी।

—आंटी, आप मुझे यहाँ क्यों लाई हैं?

सुशीला ने फाटक खोला।

—अंदर चलो। सच वहीं बैठा है।

फार्महाउस बाहर से जर्जर था, मगर अंदर जाते ही अनन्या रुक गई। बरामदा साफ था। एक कोने में तुलसी का गमला पानी से भीगा हुआ था। रसोई में ताजा चाय की खुशबू थी। दीवार पर लगी पुरानी घड़ी चल रही थी।

सुशीला ने ड्राइंग रूम का दरवाजा खोला।

कमरे के बीचोंबीच एक व्हीलचेयर रखी थी। कोई उसमें बैठा था, पीठ दरवाजे की ओर। उसके कंधों पर हल्की शॉल थी। दाहिने हाथ की उंगलियों में वही पुरानी नीलम की अंगूठी चमक रही थी, जिसे अनन्या ने 1000 बार अपने पिता की उंगली में देखा था।

अनन्या की साँस रुक गई।

—नहीं…

व्हीलचेयर धीरे-धीरे घूमी।

राजेंद्र मेहरा सामने थे।

जिंदा।

कमजोर, पीले, थके हुए, पर जिंदा।

अनन्या के मुँह से आवाज नहीं निकली। वह घुटनों के बल गिर पड़ी। राजेंद्र की आँखों में आँसू भर आए। उन्होंने काँपते हाथ से उसकी ओर हाथ बढ़ाया।

—मुझे माफ कर दे, बेटा।

अनन्या उनके पैरों से लिपट गई।

—पापा… यह क्या है? हमने आपको जलाया… सबने देखा…

—जिसे जलाया गया, वह मैं नहीं था। एक बेनाम शव था, जिसकी पहचान कानूनी प्रक्रिया से पहले ही बदली गई। यह पाप जैसा लगता है, पर मेरी जान बचाने का यही रास्ता था।

—किसने किया यह सब?

राजेंद्र ने सुशीला की ओर देखा। सुशीला ने मेज से टैबलेट उठाकर अनन्या को दिया। स्क्रीन पर मेहरा हाउस की रसोई का वीडियो चल रहा था। कविता चाँदी के गिलास में दूध डाल रही थी। उसने पल्लू से कुछ ढका, फिर एक छोटी पुड़िया से सफेद पाउडर मिलाया। थोड़ी देर बाद रिया आई। उसने दरवाजे की तरफ देखा, फिर छोटे काले ड्रॉपर से 5 बूंदें दूध में डाल दीं।

अनन्या का पेट मिचलाने लगा।

—रिया भी…

राजेंद्र की आवाज टूट गई।

—मैंने उसे बेटी कहा था, अनन्या। उसने मुझे रास्ते का पत्थर समझा।

वीडियो आगे बढ़ा। वही दूध राजेंद्र के कमरे में ले जाया गया। कविता मुस्कुराकर बोली—
—पी लीजिए, कल वसीयत की बात भी निपटा देंगे।

अनन्या ने टैबलेट बंद कर दिया। उसकी आँखों में दर्द के साथ आग भर गई।

—वे आपको मारकर सारी संपत्ति लेना चाहती थीं?

—सिर्फ संपत्ति नहीं। वे तुम्हें भी हटाना चाहती थीं। असली वसीयत में 70% शेयर तुम्हारे नाम हैं। कविता को सिर्फ जीवनभर का खर्च और एक बंगला। रिया को शिक्षा और सुरक्षा के लिए अलग फंड। लेकिन उन्होंने नकली वसीयत बनवाई है।

—किसने?

—हमारे वकील विक्रम खन्ना ने।

अनन्या को याद आया। वही चिकना चेहरा, महंगे सूट वाला आदमी, जो आज घाट पर कविता के बहुत पास खड़ा था।

राजेंद्र ने धीमे से कहा—
—आज शाम वे घर में वसीयत पढ़वाएँगे। तुम लौटोगी। टूटे हुए चेहरे के साथ। तुम्हें कुछ नहीं पता, ऐसा दिखाना होगा।

—और अगर उन्होंने मुझे मारने की कोशिश की?

सुशीला ने उसकी हथेली में एक छोटा सा ब्रोच रखा।

—इसमें माइक्रोफोन है। तुम्हारे पिता और हमारे लोग सब सुनेंगे।

—हमारे लोग?

राजेंद्र ने पहली बार हल्की मुस्कान की।

—कुछ ईमानदार पुलिस वाले अभी भी बचे हैं, बेटा। और कुछ पुराने कर्ज दोस्ती से चुकाए जाते हैं।

अनन्या ने पिता को देखा। जिस आदमी को वह 1 घंटे पहले मृत समझकर रोई थी, वह अब उसके सामने बैठा था और अपनी ही पत्नी को बेनकाब करने की योजना बना रहा था।

उसने काँपती आवाज में पूछा—
—पापा, अगर वे सचमुच जीत गईं तो?

राजेंद्र की आँखें अचानक कठोर हो गईं।

—तो मेहरा परिवार की सारी संपत्ति जहर के हाथ चली जाएगी। लेकिन अगर आज रात तुमने हिम्मत रखी, तो वे खुद अपने बनाए जाल में गिरेंगी।

उसी क्षण सुशीला का फोन बजा। उसने स्क्रीन देखी। संदेश में सिर्फ 1 पंक्ति थी—

“लड़की घर न पहुँचे तो दूसरा इंतजाम करो।”

सुशीला ने फोन अनन्या को दिखाया। भेजने वाला नंबर सेव नहीं था, लेकिन प्रोफाइल फोटो में विक्रम खन्ना का आधा चेहरा दिख रहा था।

अनन्या की उंगलियाँ ठंडी पड़ गईं।

घर में अभी से उसकी मौत का इंतजाम शुरू हो चुका था।

कमेंट्स में दिए गए लिंक से पूरी कहानी पढ़े 👇

भाग 2:

अनन्या शाम 7 बजे ग्रेटर कैलाश वाले मेहरा हाउस में दाखिल हुई, चेहरा सूजा हुआ, कदम धीमे, आँखें खाली। घर मातम से ज्यादा जीत की पार्टी जैसा लग रहा था। ड्राइंग रूम में काँच के गिलास सजे थे, रसोई में कबाब की खुशबू थी और मंदिर के पास अगरबत्ती की जगह महंगा परफ्यूम तैर रहा था। कविता सफेद साड़ी में सोफे पर बैठी थी, लेकिन उसके कानों में हीरे चमक रहे थे। रिया लैपटॉप पर दुबई के होटल देख रही थी। विक्रम खन्ना ने फाइल खोली और बनावटी गंभीरता से वसीयत पढ़नी शुरू की। पहली वसीयत में मेहरा ग्रुप की कमान अनन्या को दी गई थी; कविता के चेहरे पर कसैलापन फैल गया। तभी उसने अपने पर्स से दूसरा लिफाफा निकाला। विक्रम ने उसे “सबसे नया दस्तावेज” बताया, जिसमें सब कुछ कविता और रिया के नाम था, और अनन्या को सिर्फ पढ़ाई के खर्च तक सीमित कर दिया गया था। अनन्या ने गुस्सा दबा लिया, क्योंकि उसके ब्रोच से हर शब्द फार्महाउस तक पहुँच रहा था। रात गहरी होते ही उसने अपने कमरे में बंद होने का नाटक किया, फिर सर्विस सीढ़ियों से नीचे उतरकर मुख्य बिजली बंद कर दी। पूरा घर अंधेरे में डूब गया। छुपे स्पीकर से राजेंद्र की रिकॉर्ड की हुई आवाज गूँजी— “कविता, मेरा दूध कहाँ है?” कविता की चीख दीवारों से टकराई। रिया रोने लगी। विक्रम गालियाँ देता हुआ मोबाइल जलाने लगा। तभी कुछ ऐसा हुआ जो योजना में नहीं था। दूसरी मंजिल के गलियारे में काले कपड़ों वाला कोई आदमी दिखा। वह रिया के कमरे में घुसा और बिस्तर पर टूटी हुई गुड़िया छोड़ गया, जिसके सीने में पिन से कागज लगा था— “मैं भी जानता हूँ कि तुमने क्या किया।” अगली सुबह रिया का चेहरा राख जैसा था। अनन्या ने उसका पीछा किया और तहखाने में उसे एक पुराना बॉक्स खोलते देखा। रिया के जाते ही अनन्या ने उसमें से नीली अस्पताल फाइल निकाली। अंदर 22 साल पुरानी तस्वीर थी—कविता गर्भवती थी और उसके साथ विक्रम खन्ना खड़ा था। पीछे लिखा था, “हमारी रिया।” अनन्या समझ गई कि रिया राजेंद्र की बेटी कभी थी ही नहीं। वह यह सब पिता को भेज पाती, उससे पहले ही घर का मुख्य दरवाजा धड़ाम से टूटा। हथियारबंद पुलिस अंदर घुसी। इंस्पेक्टर ने चिल्लाकर कहा कि अनन्या मेहरा को कंपनी के 12 करोड़ के गबन और नकली दस्तावेजों के आरोप में गिरफ्तार किया जाता है। कविता की मुस्कान अँधेरे में चाकू जैसी चमकी। रिया ने धीरे से कहा कि अब यह कमरा उसका ड्रेसिंग रूम बनेगा। जब अनन्या को हथकड़ी लगाकर बाहर ले जाया जा रहा था, उसने दूर पेड़ के पीछे सुशीला को देखा। सुशीला ने बस अंगूठा उठाया, और अनन्या समझ नहीं पाई कि यह बचाव का संकेत था या मौत के अगले दरवाजे का।

भाग 3:

पुलिस जीप रात की खाली सड़कों पर दौड़ रही थी। अनन्या पीछे बैठी थी, हथकड़ी लगी हुई, मगर दिमाग में सवालों का तूफान था। अगर यह योजना का हिस्सा था तो उसे बताया क्यों नहीं गया था? अगर यह योजना नहीं थी, तो विक्रम ने उसे सचमुच जेल भेज दिया था। दिल्ली की रोशनी शीशे पर फिसलती जा रही थी। उसके कानों में अभी भी रिया की आवाज गूँज रही थी—अब यह कमरा मेरा होगा।

जीप थाने के मुख्य गेट से अंदर नहीं गई। वह पीछे की तरफ मुड़ी और बेसमेंट पार्किंग में उतर गई। अनन्या का दिल और तेज़ धड़कने लगा। एक कांस्टेबल ने दरवाजा खोला। उसने उम्मीद की थी कि उसे धक्का दिया जाएगा, मगर उसने बहुत धीरे से कहा—

—सावधान रहिए, मैडम। सीढ़ी गीली है।

अनन्या ने उसे घूरकर देखा।

—यह क्या चल रहा है?

कांस्टेबल ने जवाब नहीं दिया। उसे एक लंबे कॉरिडोर से ले जाया गया। आखिरी कमरे का दरवाजा खुला तो अनन्या वहीं रुक गई।

अंदर सुशीला बैठी थी। उसके साथ एक सख्त चेहरे वाले अधेड़ अधिकारी थे। दीवार पर बड़ी स्क्रीन लगी थी। स्क्रीन पर मेहरा हाउस का ड्राइंग रूम लाइव दिखाई दे रहा था।

अधिकारी उठे और अनन्या की हथकड़ी खोल दी।

—मैं डीसीपी अरविंद राणा। आपके दादा के पुराने परिचित। माफ कीजिए, गिरफ्तारी का नाटक जरूरी था।

अनन्या की आँखों में गुस्सा और राहत एक साथ आ गए।

—मुझे बताया जा सकता था।

सुशीला ने धीमे से कहा—

—अगर तुम्हें सच पता होता, तुम्हारे चेहरे पर डर असली नहीं दिखता। कविता और विक्रम बहुत चालाक हैं।

डीसीपी राणा ने स्क्रीन की ओर इशारा किया। ड्राइंग रूम में कविता, रिया और विक्रम शैम्पेन की बोतल खोल रहे थे। राजेंद्र के अंतिम संस्कार के 12 घंटे भी पूरे नहीं हुए थे, और वे जश्न मना रहे थे।

विक्रम ने गिलास उठाया।

—मेहरा साम्राज्य अब हमारा है। लड़की जेल में, बूढ़ा राख में, और असली फाइलें मेरे पास।

कविता हँसी।

—आज रात 12 बजे से पहले दुबई वाले खाते में पैसा चला जाना चाहिए। सुबह तक बैंक सवाल पूछने लगेगा।

रिया चुप थी। उसके चेहरे पर गुड़िया वाले संदेश का डर अभी भी था।

—मम्मी, वह आदमी कौन था? जिसने गुड़िया छोड़ी?

विक्रम झुँझला गया।

—कोई नौकर होगा। या अनन्या का कोई घटिया ड्रामा। असली खतरा अब खत्म है।

डीसीपी राणा ने अपने टेक्नीशियन को इशारा किया। अगले ही पल स्क्रीन पर दिखाई दिया कि विक्रम की लैपटॉप स्क्रीन काली हो गई। उसने कीबोर्ड पर हाथ मारा।

—यह क्या हुआ?

फिर मेहरा हाउस की सारी ऑटोमेटिक लॉकिंग प्रणाली सक्रिय हो गई। मुख्य दरवाजा बंद। खिड़कियों की स्टील शटर नीचे। अंदर की लिफ्ट लॉक। कविता दरवाजे की ओर भागी और हैंडल खींचने लगी।

—दरवाजा खोलो! यह किसने किया?

रिया चीखने लगी।

—मम्मी, मुझे यहाँ से निकलना है!

विक्रम के चेहरे का रंग उड़ गया।

—किसी ने सिस्टम हैक कर लिया है।

उसी समय ड्राइंग रूम की बड़ी टीवी स्क्रीन अपने आप चालू हुई। उस पर अनन्या का चेहरा दिखाई दिया। वह डीसीपी राणा और सुशीला के बीच बैठी थी।

—शुभ संध्या, परिवार। जश्न कैसा चल रहा है?

कविता पीछे हट गई।

—तू… तू तो गिरफ्तार थी।

—हाँ। और तुम लोग कबूल कर रहे थे।

विक्रम ने तुरंत संयम वापस लाने की कोशिश की।

—यह सब गैरकानूनी है। निजी घर में जासूसी, अवैध रिकॉर्डिंग, जबरन बंदी…

डीसीपी राणा स्क्रीन पर आगे झुके।

—जब घर के मालिक ने खुद अनुमति दी हो, तब यह गैरकानूनी नहीं होता।

कविता हँस पड़ी, मगर आवाज काँप रही थी।

—घर का मालिक मर चुका है।

तभी सीढ़ियों के ऊपरी हिस्से से एक भारी आवाज आई—

—किसने कहा?

तीनों ने एक साथ मुड़कर देखा।

सीढ़ियों से राजेंद्र मेहरा उतर रहे थे। साधारण कुर्ता-पायजामा, कंधे पर शॉल, चेहरा पीला, पर आँखें जिंदा और सीधी। वह व्हीलचेयर पर नहीं थे। हर कदम धीमा था, मगर हर कदम कविता के झूठ पर हथौड़े जैसा गिर रहा था।

रिया की चीख निकल गई। कविता ने मुँह पर हाथ रख लिया। विक्रम की पीठ दीवार से लग गई।

—नहीं… यह नहीं हो सकता… मैंने तुम्हें…

वह अचानक रुक गई।

राजेंद्र आखिरी सीढ़ी पर ठहर गए।

—क्या किया था, कविता? जहर दिया था? या मरते देखा था?

कविता की आँखें पागलपन से फैल गईं।

—तुमने मुझे मजबूर किया! पूरी जिंदगी तुम्हारे घर में रही, पर सब कुछ अनन्या के नाम! मैं क्या थी? सजावट? नौकरानी?

अनन्या ने स्क्रीन के सामने मुट्ठियाँ भींच लीं। इतने वर्षों की चुप्पी में छिपा जहर अब आवाज बनकर बाहर आ रहा था।

राजेंद्र ने शांत स्वर में कहा—

—तुम मेरी पत्नी थीं। तुम्हें सम्मान, घर, सुरक्षा सब मिला। पर तुमने परिवार नहीं चाहा, तिजोरी चाही।

विक्रम ने तुरंत खुद को बचाने की कोशिश की।

—राजेंद्र साहब, मैं तो सिर्फ कागज बनाता था। योजना कविता की थी। उसने मुझे धमकाया था।

कविता उसकी ओर झपटी।

—झूठे! जहर तू लाया था। डॉक्टर तूने बदला। नकली वसीयत तूने बनवाई। और रिया को भी तूने ही कहा था कि बूढ़े को रोज 5 बूंदें देना।

रिया जैसे पत्थर बन गई। उसकी आँखें अपनी माँ और विक्रम के बीच दौड़ने लगीं।

—मुझे सच बताओ। यह आदमी मेरे लिए इतना क्यों कर रहा था?

राजेंद्र ने मेज से भूरी फाइल उठाई और उसकी ओर फेंकी। कागज फर्श पर फैल गए।

—क्योंकि सच बेटी से ज्यादा खून को पहचानता है।

रिया ने पहला कागज उठाया। डीएनए रिपोर्ट। उसकी साँस अटक गई।

राजेंद्र मेहरा से मेल: 0%
विक्रम खन्ना से मेल: 99.9%

रिया की उंगलियाँ काँपने लगीं। उसने विक्रम को देखा।

—आप… मेरे पिता हैं?

विक्रम चुप रहा। उसकी चुप्पी किसी स्वीकारोक्ति से ज्यादा साफ थी।

रिया ने कविता की ओर देखा।

—मुझे आपने झूठ में पाला? मुझे अनन्या से नफरत करवाई? मुझे उस आदमी को मारने के लिए कहा जिसने मुझे अपना नाम दिया?

कविता रोने लगी।

—मैंने सब तुम्हारे लिए किया।

—नहीं! आपने मेरे लिए नहीं, पैसों के लिए किया।

कमरे में एक पल को ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे सबकी साँसें बंद हो गई हों। रिया ने राजेंद्र की ओर देखा। उसके चेहरे पर अपराध, शर्म और टूटन थी।

—मैंने आपको पापा कहा… और फिर…

वह वाक्य पूरा नहीं कर पाई। वह फर्श पर बैठ गई और फूट-फूटकर रोने लगी।

राजेंद्र की आँखें भर आईं, लेकिन उनका चेहरा कठोर रहा।

—मैंने तुम्हें कभी सौतेली बेटी नहीं माना, रिया। स्कूल की फीस, जन्मदिन, विदेश यात्रा, हर बीमारी में रातें… सब किया। तुमने बदले में मुझे दूध में मौत दी।

रिया ने सिर झुका लिया।

—मुझे लगा… मुझे लगा मेरा हक छीना जा रहा है।

—हक प्यार से बनता है, जहर से नहीं।

विक्रम अचानक दरवाजे की ओर दौड़ा, पर लॉक बंद था। वह मुड़ा, मेज पर रखी मूर्ति उठाई और राजेंद्र की ओर झपटा।

—अगर मैं डूबा, तो सबको साथ लेकर डूबूँगा!

उसी क्षण बाहर से तेज़ धमाका हुआ। मुख्य दरवाजा लोहे के राम से तोड़ा गया। कमांडो अंदर घुसे। एक ने विक्रम के हाथ पर डंडा मारा। मूर्ति गिर गई। दूसरे ने उसे जमीन पर दबोच लिया।

कविता ने मौका देखकर फल काटने वाला चाकू उठा लिया और राजेंद्र की ओर दौड़ी।

—तुम जिंदा नहीं बचोगे!

अनन्या स्क्रीन के सामने खड़ी हो गई।

—पापा!

लेकिन इससे पहले कि कविता पास पहुँचती, एक महिला कांस्टेबल ने उसे पीछे से पकड़ लिया। चाकू संगमरमर पर गिरा। कविता हाथ-पैर मारती रही, चिल्लाती रही, पर 2 पुलिसवालों ने उसे हथकड़ी लगा दी।

—राजेंद्र, मैंने तुमसे प्यार किया था!

राजेंद्र ने उसकी ओर देखा। उस नजर में न गुस्सा था, न दया। बस अंतिम दूरी थी।

—तुमने मुझसे नहीं, मेरे नाम से प्यार किया था।

विक्रम जमीन पर पड़ा चिल्ला रहा था—

—मैं सहयोग करूँगा! मैं सब बताऊँगा! कविता ने शुरू किया था!

रिया अचानक उठी। उसके चेहरे पर आँसू थे, पर आँखों में अजीब सा अंधेरा। वह धीरे-धीरे विक्रम के पास गई।

—आप मेरे पिता हैं?

विक्रम ने डरते हुए कहा—

—रिया, मेरी बात सुनो…

—फिर आपने मुझे भी बेच दिया? अभी अपनी जान बचाने के लिए मम्मी को भी बेच रहे हैं, मुझे भी बेच देंगे?

वह मेज से भारी पीतल का दीया उठाकर विक्रम की ओर बढ़ी, मगर पुलिस ने उसे पकड़ लिया। दीया उसके हाथ से गिर गया। वह टूटकर रो पड़ी।

—मेरा कोई पिता नहीं… कोई माँ नहीं… मेरी पूरी जिंदगी झूठ थी…

अनन्या ने यह सब स्क्रीन पर देखा। उसे लगा था इस पल उसे संतोष मिलेगा। पर उसे सिर्फ थकान महसूस हुई। जैसे किसी ने उसके बचपन की सारी चोटों को एक साथ खोल दिया हो। वह उठी और कमरे से बाहर चली गई। सुशीला उसके पीछे आई।

—बेटा…

अनन्या दीवार से टिक गई।

—आंटी, न्याय इतना भारी क्यों लगता है?

सुशीला ने उसके सिर पर हाथ रखा।

—क्योंकि सच तलवार नहीं होता, ऑपरेशन जैसा होता है। बचाता है, पर काटता बहुत है।

उस रात कविता, विक्रम और रिया गिरफ्तार हुए। मीडिया में खबर आग की तरह फैल गई। “दिल्ली के उद्योगपति की नकली मौत”, “पत्नी ने दूध में मिलाया जहर”, “वकील निकला सौतेली बेटी का असली पिता”—हर चैनल चिल्ला रहा था। लोग सोशल मीडिया पर बहस कर रहे थे। कुछ कहते राजेंद्र ने मौत का नाटक कर गलत किया। कुछ कहते अगर वह ऐसा न करते तो उनकी लाश सचमुच जल चुकी होती और अनन्या अगली होती।

अनन्या ने कुछ नहीं पढ़ा। उसे बस अपने पिता को अस्पताल ले जाना था। जहर ने उनके शरीर को कमजोर कर दिया था। कई हफ्ते इलाज चला। राजेंद्र रात में डरकर जाग जाते। कभी कहते दूध मत देना। कभी कहते दरवाजा बंद करो। अनन्या उनके पास बैठी रहती।

—पापा, अब कोई कुछ नहीं करेगा।

राजेंद्र उसका हाथ पकड़ लेते।

—मैंने तुझे बहुत अकेला छोड़ा, बेटा।

—आप लौट आए। अभी इतना काफी है।

6 महीने बाद केस अदालत पहुँचा। कोर्ट खचाखच भरा था। पत्रकार, कैमरे, वकील, कारोबारी, पुराने रिश्तेदार—सब वहाँ थे। कविता सादे कपड़ों में आई, चेहरा सूख चुका था। रिया बिना मेकअप, बिना गहने, बिल्कुल अलग लग रही थी। विक्रम की चाल में वह पुरानी अकड़ नहीं थी।

सबूत साफ थे। रसोई के वीडियो, बैंक ट्रांसफर, नकली वसीयत, डीएनए रिपोर्ट, जहर की खरीद, डॉक्टर बदलने के संदेश, और उस रात की पूरी रिकॉर्डिंग।

कविता को हत्या के प्रयास, षड्यंत्र, धोखाधड़ी और जालसाजी में लंबी सजा मिली। विक्रम खन्ना को जालसाजी, मनी लॉन्ड्रिंग, आपराधिक षड्यंत्र और हत्या के प्रयास में कठोर सजा हुई। उसका लाइसेंस रद्द हुआ, संपत्तियाँ जब्त हुईं। रिया को कम सजा मिली, क्योंकि उसने अदालत में स्वीकार किया कि उसे सच से दूर रखकर लालच और झूठ में धकेला गया था, पर उसके अपराध को माफ नहीं किया गया।

सुनवाई खत्म होने पर रिया ने अनन्या की ओर देखा।

—मुझे माफ कर दो।

अनन्या कुछ देर चुप रही। फिर बोली—

—मैं तुम्हारे लिए नफरत नहीं रखूँगी। पर तुम्हें मेरी जिंदगी में वापस आने का हक नहीं है।

रिया ने सिर झुका लिया। शायद वह पहली बार सचमुच समझ रही थी कि कुछ रिश्ते टूटते नहीं, जलकर राख हो जाते हैं।

फैसले के 1 महीने बाद सुशीला आंटी अस्पताल में भर्ती हुईं। तब पता चला कि उन्हें कैंसर था, जिसे उन्होंने महीनों तक छिपाया था। वह राजेंद्र को बचाने, सबूत जुटाने और अनन्या को सुरक्षित रखने में लगी रहीं। आखिरी दिनों में अनन्या उनके पास बैठी रहती।

—आपने हमें बताया क्यों नहीं?

सुशीला हल्के से मुस्कुराईं।

—कुछ लोग पैसे के लिए परिवार बनते हैं, बेटा। कुछ लोग बिना नाम के भी परिवार हो जाते हैं।

—आपने हमारे लिए अपनी जान लगा दी।

—जान तो वैसे भी जा रही थी। अच्छा हुआ न्याय देखकर जा रही है।

उनकी मृत्यु शांत थी। न कोई लालच, न कोई नाटक। बस अनन्या का हाथ उनके हाथ में था और राजेंद्र की आँखों में कृतज्ञता।

तेरहवीं के दिन राजेंद्र और अनन्या ने फार्महाउस में गरीब बच्चों के लिए एक ट्रस्ट की घोषणा की, जिसका नाम रखा गया—सुशीला जीवन न्यास। उस न्यास से बीमार बुजुर्गों की देखभाल करने वाली नर्सों के परिवारों को सहायता दी जाने लगी। राजेंद्र ने कहा—

—जिसने परिवार का अर्थ समझाया, उसका नाम दीवार पर नहीं, काम में होना चाहिए।

कुछ महीनों बाद राजेंद्र ने मेहरा ग्रुप की जिम्मेदारी अनन्या को सौंप दी। कई वरिष्ठ पुरुष निदेशकों को लगा कि 28 साल की लड़की इतने बड़े कारोबार को नहीं संभाल पाएगी। पहली बोर्ड मीटिंग में वे कानाफूसी करते रहे। अनन्या नीले सूट में कमरे में आई, फाइल खोली और बिना आवाज ऊँची किए 14 पुराने संदिग्ध प्रोजेक्ट बंद कर दिए, 3 भ्रष्ट अधिकारियों को बाहर किया, और कंपनी की जमीनों के कागज स्वतंत्र ऑडिट में भेज दिए।

एक बुजुर्ग निदेशक ने धीमे से कहा—

—मैडम, इतना सख्त कदम बाजार को डरा देगा।

अनन्या ने उसकी तरफ देखा।

—बाजार डर से नहीं, भरोसे से चलता है। और मेरे घर में भरोसे की कीमत बहुत महँगी चुकाई गई है।

कमरे में फिर कोई नहीं बोला।

राजेंद्र दिल्ली छोड़कर ऋषिकेश के पास एक शांत घर में रहने लगे। सुबह गंगा किनारे चलते, दोपहर में पौधों को पानी देते, शाम को अनन्या से फोन पर पूछते कि उसने खाना खाया या नहीं। कभी-कभी वह वीडियो कॉल पर कंपनी की मीटिंग देखते और चुपचाप मुस्कुराते।

एक शाम अनन्या उनसे मिलने गई। पहाड़ों के पीछे सूरज उतर रहा था। राजेंद्र मिट्टी में हाथ गंदे किए तुलसी और मोगरे के पौधे लगा रहे थे।

—पापा, कभी सोचा था आप मिट्टी में इतने खुश दिखेंगे?

राजेंद्र हँस पड़े।

—जब आदमी अपनी झूठी चिता देख चुका हो, तो मिट्टी से डर नहीं लगता। उससे रिश्ता बदल जाता है।

अनन्या ने उन्हें गले लगा लिया।

—मुझसे वादा कीजिए, अब कोई मौत वाला नाटक नहीं।

राजेंद्र ने उसके सिर पर हाथ रखा।

—वादा। अब बस जीना है।

वापसी में अनन्या की कार ग्रेटर कैलाश वाले पुराने मेहरा हाउस के सामने से गुजरी। वही ऊँची दीवारें, वही बंद खिड़कियाँ, वही लोहे का गेट। कभी वह घर उसे डराता था। अब वह सिर्फ खाली खोल जैसा लगा। बड़ा घर, छोटे लोग। चमकदार दीवारें, सड़ी हुई नीयत।

अनन्या ने ड्राइवर से कहा—

—आगे चलो।

गाड़ी आगे बढ़ गई। पीछे छूट गया वह घर जहाँ दूध में जहर था, आँसुओं में अभिनय था, बहन में लालच था, माँ के नाम पर धोखा था और पिता की मौत भी झूठ बनकर सच को बचा लाई थी।

आगे शहर की रोशनी थी। काम था। जीवन था। घाव थे, पर उनसे निकली ताकत भी थी।

अनन्या ने खिड़की से बाहर देखा। उसे अब समझ आ चुका था कि परिवार खून से नहीं, कर्म से बनता है। कुछ लोग तुम्हारा नाम लेकर भी तुम्हें मिटाना चाहते हैं, और कुछ लोग बिना किसी रिश्ते के तुम्हारे लिए मौत से लड़ जाते हैं।

उस रात उसने पहली बार चैन से साँस ली।

क्योंकि जिसने दूसरों के लिए चिता सजाई थी, अंत में वही अपनी ही आग में जल चुका था।

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