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पत्नी के हादसे पर अस्पताल दौड़ा पति, मगर बगल वाले बूढ़े ने फुसफुसाकर कहा “उस पर भरोसा मत करना”, और फिर 23 साल की शादी के पीछे छिपा दूसरा घर, चोरी हुआ पैसा और टूटा आत्मसम्मान निर्दयता से सामने आ गया

PART 1

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सड़क हादसे के बाद अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी पत्नी ने जैसे ही पति को देखा, उसने घायल आवाज़ में कहा, “यहाँ आने की जरूरत नहीं थी, राजीव… तुम मेरे लिए अब कोई नहीं हो।”

राजीव शर्मा के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। 23 साल की शादी, 2 मंज़िला घर, अनगिनत करवाचौथ, दीवाली की रातें, रिश्तेदारों के सामने निभाई गई मुस्कानें—सब एक पल में राख जैसे लगने लगे। उसे दोपहर में फोन आया था कि अनन्या की कार दिल्ली के रिंग रोड पर डिवाइडर से टकरा गई है। वह पटेल नगर से भागता हुआ सफदरजंग अस्पताल पहुँचा था, सीने में डर ऐसा जैसे कोई उसके दिल को मुट्ठी में दबा रहा हो।

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अनन्या के माथे पर पट्टी थी, बायाँ हाथ स्लिंग में था और गर्दन पर गहरे नीले निशान थे। डॉक्टर ने कहा, चोट गंभीर नहीं है, लेकिन 2 रात निगरानी में रखना होगा। उसे एक साझा वार्ड में रखा गया था। बगल वाले बिस्तर पर एक दुबले-पतले बुज़ुर्ग लेटे थे, सफेद बाल, काँपते हाथ, आँखों में ऐसी थकान जैसे बहुत सालों से किसी ने उनका नाम प्यार से नहीं पुकारा था।

राजीव ने अनन्या का हाथ पकड़ना चाहा, पर उसने झटक दिया।

“मैं ठीक हूँ,” वह बोली, “घर जाओ। मुझे तुम्हारी देखभाल नहीं चाहिए।”

राजीव वहीं बैठा रहा। क्योंकि भारतीय घरों में रिश्ते टूटते भी हैं तो लोग अस्पताल के दरवाज़े पर छोड़कर नहीं जाते। उसने सोचा, शायद दर्द बोल रहा है, शायद डर, शायद हादसे का झटका।

लेकिन रात होते-होते उसका शक जागने लगा। अनन्या बार-बार फोन उठाती, धीमे स्वर में बात करती, कभी हल्का मुस्कुराती, फिर राजीव पास आता तो तुरंत कॉल काट देती। अगली सुबह वह उसके लिए कपड़े, चार्जर और पास की दुकान से गरम इडली-सांभर लेकर आया, जो अनन्या को पसंद था। उसने डिब्बे की तरफ देखा भी नहीं।

“किससे बात कर रही थीं?” राजीव ने धीरे से पूछा।

“कविता से,” उसने ठंडेपन से कहा, “ऑफिस की बात है।”

तभी पर्दे के पीछे से एक कमजोर आवाज़ आई।

“बेटा… ज़रा पानी का गिलास पकड़ा दोगे?”

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राजीव ने पर्दा हटाया। बुज़ुर्ग पानी तक हाथ बढ़ा रहे थे। उनका नाम हरिशंकर मिश्रा था, उम्र 77, पहले कानपुर की एक कपड़ा मिल में अकाउंटेंट थे। पत्नी 4 साल पहले चली गई थीं, बेटा बेंगलुरु में बस गया था और महीनों फोन तक नहीं करता था।

राजीव ने पानी दिया। मिश्रा जी ने ऐसे धन्यवाद कहा जैसे किसी ने उन्हें फिर इंसान समझ लिया हो।

उस दिन से राजीव अस्पताल आते हुए 2 चाय और 2 समोसे लाने लगा—एक अपने लिए, एक मिश्रा जी के लिए। अनन्या हर बार कहती, “मुझे कुछ नहीं चाहिए।”

दूसरी शाम मिश्रा जी ने अचानक पूछा, “बेटा, घर में तुम्हें अब भी इज़्ज़त मिलती है?”

राजीव चुप रह गया।

मिश्रा जी ने खिड़की की तरफ देखते हुए कहा, “प्यार थक सकता है, मगर अपमान अगर रोज़ मिले तो समझ लेना, कोई सच छिपाया जा रहा है।”

राजीव के अंदर कुछ काँप गया।

जिस दिन अनन्या को छुट्टी मिली, उसने साफ कहा था कि वह उसे लेने न आए। फिर भी राजीव पहुँचा। अनन्या सजी हुई थी, हल्का मेकअप, बाल सँवारे हुए, चेहरे पर वही मुस्कान जो वह महीनों से राजीव को नहीं देती थी।

तभी कविता आई।

वह सिर्फ सहकर्मी की तरह नहीं आई। उसने बिना झिझक अनन्या की कमर थामी और धीमे से कहा, “मेरी जान, तूने तो मेरी सांस ही रोक दी थी।”

अनन्या ने उसका हाथ नहीं हटाया।

राजीव पत्थर की तरह खड़ा रह गया।

जब दोनों साथ चली गईं, मिश्रा जी ने बिस्तर से उसे इशारा किया।

“राजीव बेटा,” उन्होंने फुसफुसाकर कहा, “अपनी पत्नी पर आँख बंद करके भरोसा मत करना।”

राजीव ने पहली बार महसूस किया—जिस हादसे से वह डर रहा था, असली हादसा तो अब शुरू होने वाला था।

PART 2

अगले दिन राजीव मिश्रा जी को उनके पुराने घर छोड़ने गया। लाजपत नगर की तंग गली में बना वह मकान साफ था, पर वीरान। दीवारों पर पुरानी तस्वीरें थीं, जिनमें मिश्रा जी अपनी पत्नी के साथ हँस रहे थे, जैसे वह हँसी किसी और जन्म की हो।

चाय बनाते हुए उन्होंने पूछा, “बेटा, तुम खुश हो?”

राजीव ने टूटी आवाज़ में कहा, “अब तो खुशी का मतलब भी याद नहीं।”

मिश्रा जी ने अलमारी से एक पुरानी जेब घड़ी निकाली। उसकी सूइयाँ 3:15 पर रुकी थीं।

“यह मेरे पिता की निशानी थी,” उन्होंने कहा, “सालों संभालता रहा। फिर पता चला, बाहर से सुंदर थी, अंदर से बंद।”

उन्होंने घड़ी राजीव की हथेली पर रख दी।

“कभी-कभी आदमी 20 साल तक वही बचाता रहता है, जो बहुत पहले मर चुका होता है।”

उस रात राजीव ने अनन्या का फोन मेज पर चमकते देखा। संदेश कविता का था—

“चाबी मिल गई। मंगलवार को घर सेट कर देंगे। उसके बाद उसे बता देना।”

मंगलवार को अनन्या ने कहा कि उसे गुरुग्राम में क्लाइंट मीटिंग है। राजीव ने उसका पीछा किया। वह नोएडा एक्सटेंशन की नई सोसाइटी में पहुँची। कविता पहले से वहाँ थी।

राजीव ने दूर से देखा—अनन्या कार से उतरी, कविता दौड़कर आई, दोनों ने एक-दूसरे को बाँहों में लिया, फिर कविता ने अनन्या का चेहरा थामा और उसे चूम लिया।

अनन्या ने भी वैसी ही कोमलता से जवाब दिया, जैसी राजीव 23 साल से तलाश रहा था।

उसी रात जब अनन्या सो गई, राजीव ने उसका फोन खोला। पासवर्ड उनकी शादी की तारीख उलटी थी। मज़ाक कितना बेरहम था।

संदेशों में लिखा था—“हमारा घर”, “हमारी जिंदगी”, “जब तू उससे आज़ाद हो जाएगी।”

फिर राजीव ने बैंक ट्रांसफर देखे।

अनन्या 6 महीनों से उनके संयुक्त खाते से पैसे निकाल रही थी। कुल रकम लगभग 400000 थी।

यह सिर्फ बेवफाई नहीं थी।

वह उसे छोड़ नहीं रही थी।

वह उसे खाली कर रही थी।

PART 3

सुबह होते ही राजीव बैंक पहुँचा। काउंटर पर बैठे मैनेजर ने जब स्टेटमेंट निकाला, तो राजीव की उंगलियाँ ठंडी पड़ गईं। छोटी-छोटी रकमों में पैसा निकाला गया था—5000, 12000, 30000, कभी नकद, कभी ऑनलाइन, कभी किसी नए खाते में ट्रांसफर। हर एंट्री ऐसे छिपाई गई थी जैसे कोई चाकू धीरे-धीरे घोंप रहा हो, ताकि शोर न हो।

“सर, यह सब आपके जॉइंट अकाउंट से अधिकृत ट्रांजैक्शन हैं,” मैनेजर ने सावधानी से कहा।

“अधिकृत?” राजीव की आवाज़ फट गई। “जिस घर को बनाने में मेरी उम्र चली गई, उसे भी कोई अधिकृत तरीके से लूट सकता है?”

वह सीधे मिश्रा जी के घर गया। दरवाज़ा खुलते ही बुज़ुर्ग ने उसके चेहरे को पढ़ लिया। उन्होंने कुछ नहीं पूछा, बस उसे भीतर बैठाया। राजीव पहली बार बच्चे की तरह टूटकर रोया।

“मैंने उसे घर दिया, नाम दिया, सम्मान दिया,” वह बुदबुदाया, “अगर उसे जाना था तो चली जाती। मगर यह… यह क्यों?”

मिश्रा जी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

“क्योंकि कुछ लोग सच बोलने से नहीं, पकड़े जाने से डरते हैं। बात करने से पहले अपने आपको बचाओ।”

उन्होंने पुराने डायरी के पन्ने से एक नंबर फाड़कर दिया—अधिवक्ता समीर माथुर।

समीर माथुर का ऑफिस तीसरी मंज़िल पर था, करोल बाग की व्यस्त सड़क के ऊपर। फाइलें, कानून की किताबें, चाय के कप और चेहरे पर थकी हुई समझदारी। उन्होंने राजीव की बात पूरी सुनी, फिर फोन के स्क्रीनशॉट, बैंक स्टेटमेंट, घर के कागज़, म्यूचुअल फंड और रिटायरमेंट खाते की जानकारी देखी।

कुछ देर बाद उन्होंने चश्मा उतार दिया।

“राजीव जी, आपकी पत्नी सिर्फ भावनात्मक रूप से अलग नहीं हुई हैं। वह आर्थिक रूप से बाहर निकलने की तैयारी कर रही हैं। और अगर आपने देर की, तो आपके नाम पर बची चीज़ें भी खतरे में आ सकती हैं।”

राजीव ने सिर झुका लिया। उसे लगा जैसे कोर्ट, पुलिस, बैंक—ये सब शब्द किसी और की जिंदगी के हैं। वह तो बस एक सामान्य पति था, जिसने सोचा था कि विवाह में कठिन दिन आते हैं, लोग फिर संभल जाते हैं।

समीर ने कहा, “पहले संयुक्त खाते पर रोक लगवाइए। संपत्ति पर कोई नई गतिविधि न हो, इसका आवेदन दीजिए। तलाक की कार्यवाही शुरू कीजिए। अभी सामना मत कीजिए।”

“लेकिन मैं उससे पूछना चाहता हूँ,” राजीव ने कहा, “मैं उसकी आँखों में देखकर पूछना चाहता हूँ कि उसने 23 साल की रोटी, नमक, साथ… सबको इतना सस्ता कैसे समझ लिया।”

“पूछिएगा,” समीर ने कठोर स्वर में कहा, “लेकिन तब, जब वह आपको और नुकसान न पहुँचा सके।”

उस दिन राजीव ने कागज़ों पर हस्ताक्षर किए। संयुक्त खाता फ्रीज़ हुआ। संपत्ति पर कानूनी नोटिस गया। तलाक की प्रक्रिया शुरू हुई। वह घर लौटा तो अनन्या ड्रॉइंग रूम में बैठी मोबाइल पर मुस्कुरा रही थी।

“आज बहुत देर लगा दी,” उसने बिना देखे कहा।

राजीव ने पहली बार जवाब नहीं दिया। वह कमरे में गया, मिश्रा जी की घड़ी जेब से निकाली और मेज पर रख दी। 3:15। रुका हुआ समय। रुकी हुई शादी। रुका हुआ आत्मसम्मान।

अगले 7 दिन घर में अजीब नाटक चलता रहा। अनन्या सुबह जल्दी निकलती, शाम देर से आती। कभी कहती प्रॉपर्टी क्लाइंट से मिलना है, कभी कहती साउथ दिल्ली में मीटिंग है, कभी कहती कविता की तबीयत खराब है। राजीव हर झूठ को पहचानता और चुप रहता। अब उसकी चुप्पी कमजोरी नहीं, तैयारी थी।

एक शाम समीर का फोन आया।

“सब सुरक्षित है। अब आप बात कर सकते हैं।”

उस रात अनन्या 8 बजे लौटी। हाथ में खाना था।

“सोचा आज साथ में खाना खा लें,” उसने अजीब मिठास से कहा।

राजीव डाइनिंग टेबल पर बैठ गया।

“अनन्या, मुझे कविता के बारे में सब पता है।”

उसके चेहरे से रंग उतर गया।

“क्या मतलब?”

राजीव ने स्क्रीनशॉट मेज पर रखे। फिर बैंक ट्रांसफर। फिर नोएडा वाले घर की तस्वीरें, जो उसने सोसाइटी के बाहर से खींची थीं।

अनन्या की आँखों में आँसू नहीं आए। पहले डर आया। फिर चिढ़। फिर गुस्सा।

“तुमने मेरी जासूसी की?”

राजीव ने शांत आवाज़ में कहा, “मैंने अपना बचाव किया।”

तभी उसका फोन बजा। स्क्रीन पर कविता का नाम चमका।

राजीव ने कहा, “उठाओ। स्पीकर पर।”

“राजीव, ड्रामा मत करो।”

“23 साल के बाद कम से कम सच सुनने का अधिकार तो है।”

अनन्या ने काँपते हाथ से कॉल उठाई।

कविता की आवाज़ कमरे में गूँजी, “बता दिया उसे? कल मूवर्स आ रहे हैं। फर्नीचर और बाकी सामान शिफ्ट करना है। मैं नहीं चाहती कि वह बीच में रोना-धोना करे।”

घर में सन्नाटा गिरा।

अनन्या ने आँखें बंद कर लीं। “कविता, वह यहीं है।”

कुछ पल खामोशी रही। फिर कविता बोली, “तो अच्छा है। उसे भी समझ आना चाहिए कि तू उसकी नौकरानी नहीं है। इतने साल उस आदमी को ढोया है तूने।”

राजीव का गला जल उठा, पर वह चिल्लाया नहीं।

“मैं बोझ था?” उसने अनन्या से पूछा। “वह आदमी, जिसने तुम्हारी माँ के ऑपरेशन के लिए अपनी एफडी तोड़ी? जिसने तुम्हारे भाई की दुकान बचाने के लिए कर्ज लिया? जिसने हर रिश्तेदार के सामने तुम्हारी इज्ज़त रखी?”

अनन्या की आँखें भर आईं।

“मैं घुट रही थी, राजीव।”

“घुट रही थीं तो कहतीं। अलग होतीं। पर तुमने मुझे मूर्ख बनाए रखा। मेरी कमाई से अपना दूसरा घर बनाया। मेरे ही घर का सामान उठाने की तैयारी की। यह आज़ादी नहीं, चोरी है।”

“मैं तुम्हें चोट नहीं पहुँचाना चाहती थी।”

“नहीं,” राजीव की आवाज़ पहली बार कठोर हुई, “तुम बस चाहती थीं कि चोट तब लगे जब मैं कुछ बचा न सकूँ।”

उसने बताया कि वकील है, खाता बंद है, संपत्ति सुरक्षित है, तलाक शुरू हो चुका है। अनन्या का चेहरा बदल गया। आँसू सूख गए, गुस्सा उभर आया।

“तुम मुझे खाली हाथ भेजोगे?”

“कानून जो देगा, मिलेगा। उससे ज्यादा नहीं।”

“इतने सालों की शादी का यही बदला?”

राजीव ने उसकी आँखों में देखा। “शादी बदला नहीं मांगती। पर विश्वासघात हिसाब मांगता है।”

उस रात अनन्या ने 2 सूटकेस भरे। अलमारी से साड़ियाँ निकालीं, कुछ जेवर उठाए, अपनी फाइलें समेटीं। जाते-जाते दरवाज़े पर ठहरकर बोली, “एक दिन समझोगे, मैं सिर्फ जीना चाहती थी।”

राजीव ने कहा, “तुम जी सकती थीं, मुझे तोड़कर नहीं।”

दरवाज़ा बंद हुआ। घर में ऐसी चुप्पी फैल गई जैसे किसी ने वर्षों पुराना शोर अचानक बंद कर दिया हो। राजीव रसोई में बैठा रहा। वही रसोई जहाँ अनन्या ने पहली बार चाय बनाई थी। वही दीवार जहाँ शादी की 25वीं सालगिरह का कैलेंडर टंगा था, जो अब कभी नहीं आएगी।

रात 2 बजे उसने मिश्रा जी को फोन किया।

“वह चली गई।”

उधर से धीमी आवाज़ आई, “कैसा लग रहा है?”

“टूटा हुआ… मगर पहली बार हल्का।”

मिश्रा जी ने लंबी सांस ली। “तो समझो, मरम्मत शुरू हो गई।”

आने वाले महीने आसान नहीं थे। रिश्तेदारों ने सवाल पूछे। कुछ ने कहा, “घर की बात बाहर क्यों ले गए?” कुछ ने फुसफुसाकर अनन्या को दोष दिया, कुछ ने राजीव को। भारतीय समाज में टूटे विवाह से ज्यादा लोगों को टूटे आदमी की चुप्पी परेशान करती है। सबको कारण चाहिए था, मसाला चाहिए था, फैसला चाहिए था। राजीव ने किसी को तमाशा नहीं दिया।

समीर ने कोर्ट में आर्थिक दस्तावेज़ रखे। अनन्या ने पहले आरोप लगाए कि राजीव ने उसे नियंत्रित किया, फिर कहा कि पैसे उसने “सुरक्षा” के लिए निकाले थे। लेकिन बैंक रिकॉर्ड, चैट, नोएडा वाले किराए के कागज़ और मूवर्स की बुकिंग ने सच्चाई साफ कर दी। न्यायाधीश ने संयुक्त संपत्ति पर निष्पक्ष बँटवारा तय किया, पर छिपाकर निकाली गई रकम का हिसाब अनन्या के हिस्से से समायोजित करने का आदेश दिया।

कुछ दिनों बाद समीर ने एक और बात बताई।

“आपका पुराना रिटायरमेंट फंड याद है?”

“हाँ, शायद 12 साल पहले खुलवाया था।”

“अनन्या ने उसमें भी नॉमिनी और विदड्रॉल से जुड़ी जानकारी बदलने की कोशिश की थी। अच्छा हुआ हमने पहले ही नोटिस डाल दिया।”

उस क्षण राजीव के भीतर बची हुई आखिरी नरमी भी बुझ गई। अब उसे अनन्या से नफरत नहीं थी। बस अफसोस था कि जिस चेहरे को उसने घर माना, वह उसके लिए सिर्फ रास्ता था।

उधर मिश्रा जी उसके जीवन का सहारा बन गए। कभी अपने हाथ का सादा उपमा बनाकर भेजते, कभी कहते, “आज बाहर निकलो, धूप देखो।” कभी डाँटते, “आदमी दुख में खाना छोड़ दे तो दुख जीत जाता है।”

राजीव हर रविवार उनके घर जाने लगा। दोनों छत पर बैठकर चाय पीते। मिश्रा जी अपनी पत्नी सवित्री की बातें बताते—कैसे वह हर होली पर गुझिया जलाकर भी गर्व से खिलाती थीं, कैसे बरसात में छत टपकती थी तो दोनों बाल्टी लगाकर हँसते थे, कैसे आखिरी दिनों में भी उन्होंने मिश्रा जी से कहा था, “अकेले मत सूख जाना।”

एक दिन राजीव ने पूछा, “आपका बेटा क्यों नहीं आता?”

मिश्रा जी मुस्कुराए, पर वह मुस्कान सूखी थी।

“हर बच्चे का शरीर बड़ा होता है, बेटा। दिल हर किसी का नहीं।”

कुछ ही हफ्तों में उनका स्वास्थ्य गिरने लगा। सांस फूलती। चलते-चलते रुक जाते। राजीव उन्हें डॉक्टर के पास ले गया। डॉक्टर ने उम्र, दिल और पुरानी कमजोरी की लंबी सूची बताई। घर लौटते हुए मिश्रा जी ने ऑटो की खिड़की से बाहर देखते हुए कहा, “बुढ़ापे में सबसे बड़ा डर मौत नहीं होता। डर यह होता है कि जाते-जाते कोई नाम लेकर रोएगा भी या नहीं।”

राजीव ने उनका हाथ पकड़ लिया।

“मैं हूँ।”

मिश्रा जी ने उसकी तरफ देखा। “और मैं भी हूँ। जब तक हूँ।”

तलाक का अंतिम आदेश 9 महीने बाद आया। समीर ने फोन पर कहा, “राजीव जी, प्रक्रिया पूरी हो गई। आप कानूनी रूप से मुक्त हैं।”

मुक्त। यह शब्द राजीव ने सुना तो उसे खुशी नहीं हुई। बस एक शांत खालीपन महसूस हुआ। जैसे लंबे बुखार के बाद शरीर कमजोर हो, पर आग उतर चुकी हो।

उसने मिश्रा जी को फोन किया।

“मिश्रा जी, खत्म हो गया।”

उधर से धीमी हँसी आई। “तो कल जलेबी खाएँगे। आज आराम करो। तुमने अपनी जिंदगी वापस ले ली।”

लेकिन अगले दिन फोन मिश्रा जी का नहीं, उनके बेटे आलोक का आया।

“आप राजीव बोल रहे हैं? पापा को हार्ट अटैक आया है। एम्स में हैं। उन्होंने आपका नाम लिया।”

राजीव अस्पताल पहुँचा तो वही गंध, वही सफेद दीवारें, वही डर उसका इंतज़ार कर रहे थे। मिश्रा जी आईसीयू में थे, मशीनों से जुड़े हुए, बहुत छोटे, बहुत शांत। राजीव ने उनका हाथ पकड़ा।

“मिश्रा जी, मैं आ गया।”

बुज़ुर्ग की पलकों में हल्की हरकत हुई।

“टुकड़ों से… समझौता मत करना,” उन्होंने फुसफुसाया।

राजीव की आँखें भर आईं। “नहीं करूँगा। वादा है।”

“तुम… अच्छे आदमी हो। किसी के धोखे से अपनी कीमत मत नापना।”

राजीव उनके हाथ से लिपट गया।

कुछ देर बाद मशीन की आवाज़ बदल गई। डॉक्टर दौड़े। नर्सों ने राजीव को पीछे किया। वह दरवाज़े के बाहर खड़ा रहा, हाथ जोड़े, वही प्रार्थना दोहराता रहा जो उसने बचपन में माँ से सीखी थी।

पर इस बार ईश्वर ने चुप्पी चुनी।

मिश्रा जी चले गए।

उनका अंतिम संस्कार छोटा था। बेटा आलोक था, 2 पुराने पड़ोसी थे, और राजीव। चिता की आग उठी तो राजीव को लगा जैसे उसके जीवन का एक और सहारा राख बन रहा है। पर इस राख में धोखा नहीं था। इसमें आशीर्वाद था।

अंत में आलोक ने उसे एक लिफाफा दिया।

“पापा ने कहा था, यह आपको देना है।”

राजीव ने घर जाकर खोला। अंदर साफ लिखावट में पत्र था।

“प्रिय राजीव,

अगर तुम यह पढ़ रहे हो, तो समझो मैं चला गया। दुख मत करना। मेरे आखिरी महीनों को अर्थ मिला क्योंकि मैं तुम्हें गिरते हुए देखकर तुम्हारा हाथ पकड़ सका।

जो घड़ी मैंने तुम्हें दी थी, वह मरी हुई चीज़ की निशानी नहीं है। वह याद दिलाने के लिए है कि रुका हुआ समय भी मूल्य रखता है, अगर कोई उसे नई नज़र से देखे।

अनन्या ने जो किया, वह तुम्हारी कीमत तय नहीं करता। जिस इंसान ने तुम्हें नहीं बचाया, उसके कारण खुद को दोष मत देना।

अब जीना। थोड़ा मेरे हिस्से का भी।

आशीर्वाद,
हरिशंकर मिश्रा”

राजीव ने पत्र को घड़ी के साथ रखा। 3:15 पर रुकी सूइयाँ अब उसे मज़ाक नहीं लगती थीं। वे चेतावनी थीं। वे दर्पण थीं। वे प्रमाण थीं कि आदमी टूटकर भी किसी दूसरे टूटे हुए आदमी का सहारा बन सकता है।

महीनों बाद उसने अपने जीवन को धीरे-धीरे फिर जोड़ा। पटेल नगर का बड़ा घर बिक गया। वह एक छोटे फ्लैट में रहने लगा। शुरुआत में दीवारें अजनबी थीं, रसोई खाली थी, रातें बहुत लंबी थीं। पर धीरे-धीरे उसने उनमें अपनी साँसें बसाईं।

उसने फोटोग्राफी क्लास जॉइन की। रविवार को इंडिया गेट के पास सुबह की रोशनी में तस्वीरें लेने लगा। कभी पुरानी दिल्ली की गलियों में जाता, कभी लोधी गार्डन में बुज़ुर्ग जोड़ों को चुपचाप चलते देखता। पहले इन दृश्यों से दर्द होता था। फिर उनमें जीवन दिखने लगा।

एक दिन क्लास में उसकी मुलाकात मीरा से हुई। वह सरकारी स्कूल में इतिहास पढ़ाती थी, तलाकशुदा थी, और बात करते समय जल्दी फैसला नहीं देती थी। उसकी हँसी में शोर नहीं, सुकून था। उसने राजीव से पूछा, “आप लोगों की तस्वीरें क्यों कम लेते हैं?”

राजीव ने कैमरा नीचे किया।

“क्योंकि चेहरों पर भरोसा करना सीख रहा हूँ।”

मीरा ने मुस्कुराकर कहा, “धीरे सीखिए। अच्छे चेहरे जल्दीबाजी में नहीं खुलते।”

राजीव को नहीं पता था आगे क्या होगा। पहली बार उसे यह जानने की जरूरत भी नहीं थी। अब उसे किसी रिश्ते में खुद को खोकर सुरक्षा तलाशनी नहीं थी। अब वह जानता था कि प्रेम और आत्मसमर्पण अलग चीज़ें हैं। वफ़ादारी और डर अलग चीज़ें हैं। घर और पिंजरा अलग चीज़ें हैं।

कभी-कभी रात में वह पुरानी घड़ी खोलता। सूइयाँ अब भी 3:15 पर अटकी थीं। पर राजीव अब उन्हें रुका हुआ समय नहीं मानता था।

वह उन्हें उस क्षण की तरह देखता था जब उसने पहली बार खुद से झूठ बोलना बंद किया था।

क्योंकि समय सच में तब नहीं रुकता जब घड़ी बंद हो जाए।

समय तब रुकता है जब इंसान दूसरों को असुविधा न हो इसलिए खुद जीना छोड़ दे।

और समय फिर चल पड़ता है, जिस दिन वह आदमी काँपते हाथों से ही सही, दरवाज़ा बंद करके अपनी तरफ लौट आता है।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.