Posted in

दीवाली की रात बेटी ने आने से मना किया बताया गया, पर पिता ने यकीन नहीं किया; जब वह गोदाम पहुँचा तो सच फट पड़ा—“वह बीमार नहीं थी, उसे बाँधकर छिपाया गया था”, और परिवार की इज्जत खून से भारी निकली

PART 1

Advertisements

दीवाली की रात जब दामाद ने फोन पर कहा कि उसकी बेटी “अब इस बूढ़े आदमी का परिवार होने का नाटक नहीं करना चाहती”, तब रामकिशोर तिवारी के हाथ से पूजा की थाली लगभग गिर गई।

लखनऊ के पुराने चौक में उनके छोटे से घर में घी के दीये जल रहे थे, काजू कतली की खुशबू रसोई से आ रही थी, और उनकी दिवंगत पत्नी सावित्री की पसंद वाली पीतल की थालियां मेज पर सजी थीं। रामकिशोर 63 साल के थे। उन्होंने सोचा था कि पत्नी की चिता, अकेली रसोई और खाली आंगन से बड़ा दुख अब जीवन में नहीं बचेगा। पर उस शाम उन्हें पता चला कि एक पिता का डर उम्र से कभी बूढ़ा नहीं होता।

Advertisements

उनकी बेटी नंदिनी, जिसे घर में सब नंदू कहते थे, 31 साल की थी। वह गोमतीनगर के एक प्ले स्कूल में बच्चों को पढ़ाती थी। उसकी हंसी सावित्री जैसी थी, खुली, साफ, ऐसी कि सन्नाटा भी घर जैसा लगने लगे। नंदू दीवाली पर कभी नहीं रुकी थी। बुखार में भी आई थी। गर्भ के 8वें महीने में भी आई थी। जब छोटी तारा उसकी गोद में थी, तब भी आई थी।

इसलिए जब शाम 6 बजे राघव का संदेश आया, “नंदिनी की तबीयत ठीक नहीं। इंतजार मत कीजिए,” तो रामकिशोर के सीने में कुछ बर्फ जैसा उतर गया।

उन्होंने लिखा, “फोन दो उसे।”

3 मिनट बीते। फिर 10। फिर 20।

दूसरा संदेश आया, “सो रही है। बार-बार परेशान मत कीजिए।”

रामकिशोर ने नंदिनी को फोन किया। घंटी गई, फिर बंद। उसकी रिकॉर्ड की हुई आवाज आई, “नंदू बोल रही हूं, कुछ प्यारा सा संदेश छोड़िए।”

रामकिशोर ने कहा कि खाना रखा है, पूजा की आरती बिना उसके पूरी नहीं लगेगी, और वह चाहे रात 12 बजे आए, दरवाजा खुला रहेगा। पर जवाब नहीं आया।

रात 10 बजे तक दीये आधे जल चुके थे। पटाखों की आवाज बाहर गूंज रही थी, पर घर के भीतर सिर्फ उनकी सांसें थीं। राघव ने फिर फोन नहीं उठाया।

सुबह 5 बजे रामकिशोर ने बिना किसी को बताए अपनी पुरानी बोलेरो की चाबी उठाई।

Advertisements

नंदिनी और राघव मलिहाबाद रोड पर एक पुराने किराये के मकान में रहते थे। पीछे आम के पेड़, साइड में लोहे का गोदाम, जहां राघव निर्माण का सामान रखता था। रामकिशोर वहां कई बार गए थे। 2 महीने पहले उन्होंने ही रसोई का नल ठीक किया था।

मकान के पास पहुंचते ही उन्होंने 3 अजनबी गाड़ियां देखीं। एक काली स्कॉर्पियो, एक बिना नंबर की पिकअप, और एक सफेद वैन गेट के पास खड़ी थी।

घर की लाइटें जल रही थीं। परदे के पीछे परछाइयां हिल रही थीं।

रामकिशोर ने बोलेरो 100 मीटर पहले रोक दी।

उन्होंने नंदिनी को फोन किया। बंद। राघव को फोन किया। एक घंटी गई और कट गया।

वे आम के पेड़ों के किनारे-किनारे झुककर आगे बढ़े। बचपन में गांव में खेतों से गुजरते हुए उनके पिता ने सिखाया था कि सूखी पत्तियों पर कैसे पैर रखना है, ताकि आवाज न हो।

गोदाम के पीछे पहुंचे तो मर्दों की धीमी आवाज सुनाई दी। बीड़ी की गंध थी। शराब की बोतल गिरने जैसी खनक थी। और फिर एक आवाज आई, टूटी हुई, दबाई हुई सांस जैसी।

रामकिशोर ने लोहे का दरवाजा बस थोड़ा सा खोला।

पीली ट्यूबलाइट के नीचे सीमेंट की बोरियां, सरिए, प्लाईवुड और औजार बिखरे थे।

एक कोने में उनकी बेटी प्लास्टिक के केबल टाई से खंभे से बंधी थी।

उसका होंठ फटा हुआ था। एक आंख सूजी हुई थी। वही पीली चुन्नी कंधे से लटक रही थी, जिसे पहनकर वह 2 दिन पहले उनके लिए मोतीचूर के लड्डू लाई थी।

“बाबूजी…” नंदिनी ने फुसफुसाया।

रामकिशोर उसके सामने घुटनों के बल बैठ गए। उनके हाथ कांप नहीं रहे थे, जैसे दुख ने डर को पीछे धकेल दिया हो।

“मैं तुझे निकाल रहा हूं।”

नंदिनी ने सिर हिलाया। उसकी आंखों में ऐसा आतंक था जो शब्दों से बड़ा था।

“नहीं, बाबूजी। अंदर 4 आदमी हैं। आप चले जाइए। अगर उन्होंने आपको देख लिया…”

रामकिशोर ने औजारों में से कटर उठाया। एक-एक टाई काटी। नंदिनी कराह उठी जब उसके हाथों में खून वापस दौड़ा।

“चल सकती है?”

“हां।”

“दौड़ सकती है?”

उसने अपनी सूजी आंख खोली।

“तारा के लिए दौड़ सकती हूं।”

तभी बाहर कदमों की आहट आई।

घर का पिछला दरवाजा खुला।

एक आदमी बीड़ी पीता हुआ आंगन में निकला और गोदाम की तरफ देखने लगा।

नंदिनी ने रामकिशोर की कलाई पकड़ ली।

“बाबूजी… राघव ने मुझे बीमार नहीं किया। उसने मुझे उनके हवाले कर दिया।”

और असली अंधेरा अभी बाकी था।

PART 2

“क्या मतलब, राघव ने तुझे उनके हवाले कर दिया?” रामकिशोर की आवाज इतनी धीमी थी कि खुद उन्हें भी अजनबी लगी।

नंदिनी कांप रही थी, मगर ठंड से नहीं।

“उसने कागजों पर साइन किए थे। घर और गोदाम को गिरवी रखा। बोला कारोबार बचाना है। पर ये लोग साहूकार नहीं थे, बाबूजी। ये हवाला और नकली ठेकों वाले लोग हैं।”

बीड़ी वाला आदमी अब भी आंगन में था। उनके पास कुछ ही पल थे।

गोदाम के पीछे जंग लगी छोटी खिड़की थी। रामकिशोर को याद था, क्योंकि उन्होंने राघव से कहा था कि बरसात से पहले इसे बदलवा लेना। उसने कभी नहीं बदली।

उन्होंने धीरे से खिड़की खोली। पहले नंदिनी को बाहर निकाला, फिर खुद गीली मिट्टी पर गिरते हुए बाहर आए।

वे आम के पेड़ों के बीच झुककर भागे। रामकिशोर के घुटने आग की तरह जल रहे थे, मगर बेटी की हथेली उनकी मुट्ठी में थी, वही हथेली जिसे बचपन में सड़क पार कराते समय पकड़ा करते थे।

बोलेरो तक पहुंचकर उन्होंने नंदिनी को नीचे झुकाया और गाड़ी बढ़ा दी।

2 किलोमीटर बाद नंदिनी टूट गई।

“राघव अंदर है।”

रामकिशोर ने ब्रेक दबा दिए।

“क्या?”

“उन्होंने उसे भी मारा। उसने मुझे बेचा, पर बाद में रोकने की कोशिश की। जब उन लोगों ने तारा का नाम लिया, वह टूट गया। संदेश उसी ने भेजा था, पर अपनी मर्जी से नहीं।”

रामकिशोर का गुस्सा और डर एक साथ जकड़ गए।

“तारा कहां है?”

नंदिनी का चेहरा राख जैसा सफेद हो गया।

“राघव की मां के पास… बाराबंकी में।”

उसी क्षण रामकिशोर का फोन बजा। अनजान नंबर था।

दूसरी तरफ एक भारी आवाज आई, “बूढ़े, बेटी बचा ली। अब नातिन बचाकर दिखा।”

PART 3

रामकिशोर ने फोन कान से हटाया नहीं। उनकी सांस रुक गई थी, पर उनकी आंखें सड़क पर टिक गईं। आवाज फिर आई, “पुलिस के पास गए तो बच्ची की राख भी नहीं मिलेगी। गाड़ी घुमाओ और अकेले वापस आओ।”

नंदिनी ने कांपते हुए पूछा, “किसका फोन था?”

रामकिशोर ने जवाब नहीं दिया। उन्होंने बोलेरो सीधे सिविल अस्पताल की तरफ मोड़ दी। नंदिनी चिल्लाई, “बाबूजी, तारा!”

“तुझे जिंदा रखना भी तारा को बचाने का हिस्सा है,” उन्होंने कठोर आवाज में कहा, पर उनकी आंखें भीग चुकी थीं।

अस्पताल की इमरजेंसी में उन्होंने साफ कहा कि उनकी बेटी को बंधक बनाया गया था और पीटा गया था। डॉक्टरों ने तुरंत नंदिनी को अंदर ले लिया। उसके हाथों पर केबल टाई के निशान थे, पसलियों में चोट थी, चेहरे पर सूजन थी। नर्स ने जब उसकी चुन्नी हटाई, तो रामकिशोर ने मुंह फेर लिया। वह पिता थे, पर उस क्षण उनकी बेबसी किसी अदालत से भी बड़ी थी।

अस्पताल के एक कोने में, जहां दीवार पर धुंधली सी देवी लक्ष्मी की तस्वीर लगी थी, रामकिशोर ने अपने साले महेंद्र को फोन किया। महेंद्र सावित्री का छोटा भाई था और राष्ट्रीय जांच एजेंसी से रिटायर हो चुका था। लोग उसे कम बोलने वाला आदमी कहते थे, पर रामकिशोर जानते थे कि उसके पास अब भी ऐसे नंबर थे जिन पर आम आदमी फोन नहीं कर सकता।

“महेंद्र,” रामकिशोर ने कहा, “नंदू को गोदाम में बांध रखा था। राघव भी अंदर है। गाड़ियां थीं। कोई पुलिस वाला भी मिला हुआ लगता है। अब तारा को धमकी दे रहे हैं।”

दूसरी तरफ कुछ सेकंड चुप्पी रही।

फिर महेंद्र की आवाज आई, “स्थानीय थाने मत जाना। वहीं बैठो। बेटी को अकेला मत छोड़ना। मैं लखनऊ कंट्रोल से बात कर रहा हूं।”

रामकिशोर ने फोन काटा और पहली बार कुर्सी पर बैठते ही उनका शरीर कांपा। उन्हें लगा जैसे पिछले 2 घंटे किसी और आदमी ने काटे हों। पर अब डर वापस लौट आया था। वही डर जो बेटी के जन्म के दिन पहली बार आया था, जब डॉक्टर ने कहा था कि बच्ची कमजोर है। वही डर जब नंदू स्कूल बस में देर से लौटी थी। वही डर जब शादी में उसने राघव के गले में वरमाला डाली थी और रामकिशोर ने मुस्कुराते हुए भी भीतर से उसे खो दिया था।

1 घंटे बाद सफेद कुर्ते और जैकेट में एक महिला अधिकारी अस्पताल पहुंची। उसके साथ 2 सादे कपड़ों वाले लोग थे।

“मैं निरीक्षक मीरा सक्सेना,” उसने कहा। “महेंद्र जी ने बात की है। आप जो जानते हैं, एक-एक बात बताइए।”

रामकिशोर ने सब बताया। काली स्कॉर्पियो, सफेद वैन, बिना नंबर पिकअप, गोदाम, बीड़ी वाला आदमी, नंदिनी की हालत, फोन पर धमकी, राघव का संदेश।

मीरा सक्सेना ने बीच में टोका नहीं। बस नोट करती रही।

जब रामकिशोर ने कहा, “राघव ने मेरी बेटी को सौंप दिया,” तो नंदिनी, जो अब स्ट्रेचर पर थी, टूटे स्वर में बोली, “उसने गलती की, मैडम। बहुत बड़ी। पर जब उन्होंने तारा का नाम लिया, उसने लड़ने की कोशिश की। उसे भी मारा है।”

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

“यह घर पहले से निगरानी में था,” उसने धीरे से कहा। “राघव के निर्माण ठेकों में नकली बिल, हवाला और जमीन के कागजों का मामला जुड़ा है। हमें शक था, पर हमें यह नहीं पता था कि परिवार को बंधक बना लिया गया है।”

रामकिशोर को लगा जमीन खिसक गई।

“और पुलिस वाला?”

मीरा का चेहरा कठोर हो गया।

“स्थानीय चौकी का इंस्पेक्टर भदौरिया पिछले 6 महीने से इन लोगों को संरक्षण दे रहा है। हमें शक था, सबूत नहीं था।”

नंदिनी ने अचानक आंखें खोलीं।

“कल रात एक आदमी बोला था, ‘सुबह भदौरिया बच्ची को लाएगा। बूढ़े को झुकाने के लिए बच्ची काफी है।’”

रामकिशोर के हाथ से पानी का गिलास गिर गया।

“तारा…”

मीरा ने तुरंत पूछा, “बच्ची अभी कहां है?”

“बाराबंकी। राघव की मां शारदा देवी के पास।”

रामकिशोर ने शारदा देवी को फोन लगाया। घंटी जाती रही। कोई जवाब नहीं। फिर दोबारा। फिर तीसरी बार। चौथी बार फोन बंद हो गया।

नंदिनी ने उठने की कोशिश की। दर्द से उसका चेहरा मुड़ गया।

“मुझे जाना है। मेरी बच्ची वहां है।”

रामकिशोर ने उसके कंधे दबाए।

“नहीं। अब हम अकेले नहीं हैं।”

यह कहते हुए भी उनके भीतर एक बूढ़ा पिता रो रहा था कि अगर तारा को कुछ हो गया, तो वह खुद को कभी माफ नहीं करेगा।

मीरा ने तुरंत टीम को निर्देश दिए। आधे घंटे के भीतर बाराबंकी वाले पते पर दो गाड़ियां पहुंचीं। रामकिशोर और नंदिनी अस्पताल के कमरे में फोन की स्क्रीन को ऐसे देख रहे थे जैसे उसी में सांस अटकी हो।

फिर मीरा का फोन बजा। उसने सुना, और उसका चेहरा पत्थर जैसा हो गया।

“क्या हुआ?” रामकिशोर ने पूछा।

मीरा ने धीरे से कहा, “शारदा देवी घर पर मिली हैं। बेहोशी की हालत में। उनका फोन तोड़ा गया है। तारा घर में नहीं है।”

नंदिनी की चीख अस्पताल की सफेद दीवारों से टकराकर लौट आई।

“नहीं… नहीं… मेरी बच्ची…”

रामकिशोर ने उसे पकड़ लिया, पर खुद का सीना खाली हो चुका था।

मीरा ने फोन पर तेज आवाज में आदेश दिए। “सीसीटीवी देखो। गली के मोड़, पेट्रोल पंप, हाईवे कट, सब। बच्ची 6 साल की है, गुलाबी स्वेटर, नीली जींस। जिसने लिया है, पुलिस की वर्दी में हो सकता है।”

तभी रामकिशोर को कुछ याद आया। बहुत छोटी सी बात। ऐसी बात जिस पर घर के लोग हंसते थे।

“उसके हाथ में घड़ी है,” उन्होंने कहा।

मीरा ने उनकी तरफ देखा।

“कैसी घड़ी?”

“बच्चों वाली स्मार्ट घड़ी। गुलाबी। मैंने दिलवाई थी। राघव ने कहा था, ‘बाबूजी, आप जरूरत से ज्यादा डरते हैं।’ मैंने फिर भी दिलवाई। उसमें लोकेशन है।”

नंदिनी ने कांपते हाथों से अपना फोन मांगा। स्क्रीन टूट चुकी थी, पर चल रही थी। ऐप खोला गया। कुछ सेकंड घूमता हुआ निशान आया। फिर नक्शे पर एक बिंदु दिखा।

तारा चल रही थी।

बाराबंकी से निकलकर गाड़ी देवा रोड की तरफ जा रही थी।

मीरा ने बिना देर किए लोकेशन टीम को भेजी। “सड़क बंद कराओ। बच्चे को नुकसान नहीं होना चाहिए। संदिग्ध पुलिस वर्दी में है।”

रामकिशोर उठ खड़े हुए।

“मैं चलूंगा।”

“नहीं,” मीरा ने कहा।

“वह मेरी नातिन है।”

“इसलिए आपको जिंदा रहना है।”

रामकिशोर ने बहस नहीं की। पर वह अस्पताल के कमरे में भी नहीं बैठ पाए। वे बरामदे में चक्कर काटते रहे। बाहर दीवाली के बचे हुए पटाखों की जली गंध हवा में थी। कल रात जिन दीयों को उन्होंने बेटी के इंतजार में जलाया था, आज वही रोशनी उन्हें अपराध जैसी लग रही थी।

नंदिनी बिस्तर पर थी, पर उसकी आंखें फोन से नहीं हट रही थीं। हर 10 सेकंड में बिंदु थोड़ा आगे बढ़ता। फिर एक जगह रुक गया।

मीरा ने स्क्रीन देखी। “गाड़ी रुकी है। शायद वाहन बदलने वाले हैं।”

उसने फोन कान से लगाया। “अब। अभी घेरो।”

कमरे में खामोशी छा गई। रामकिशोर ने अपनी जेब से सावित्री की पुरानी चाबी का गुच्छा निकाला। वही चाबी जिसमें छोटी सी पीतल की घंटी लगी थी। सावित्री कहा करती थी, “घर की आवाज कभी बंद नहीं होनी चाहिए।” उस पल वह घंटी उनकी मुट्ठी में दबकर चुप थी।

12 मिनट बाद मीरा के फोन पर कॉल आया।

उसने सुना।

रामकिशोर ने सांस रोक ली।

मीरा ने उनकी तरफ देखा। उसकी आंखों में पहली बार नरमी आई।

“मिल गई।”

नंदिनी ने ऐसा रोना शुरू किया जैसे किसी ने उसके भीतर अटकी सांस वापस लौटा दी हो।

तारा एक बंद पड़ी ढाबे की पार्किंग में मिली। इंस्पेक्टर भदौरिया उसे दूसरी गाड़ी में बैठाने वाला था। उसके साथ वही चौथा आदमी था जो मलिहाबाद वाले घर से भाग निकला था। टीम ने बिना गोली चलाए दोनों को पकड़ लिया। तारा डर से चुप थी, पर सुरक्षित थी। उसके हाथ में वही गुलाबी घड़ी थी, जिसकी स्क्रीन पर छोटे-छोटे सितारे चमक रहे थे।

जब तारा अस्पताल लाई गई, तो वह दरवाजे पर कुछ पल ठिठकी। फिर “मम्मा!” चिल्लाकर नंदिनी की ओर भागी।

नंदिनी ने दर्द भूलकर उसे छाती से लगा लिया। उसकी पसलियां चीख रही थीं, मगर उसने बच्ची को ढीला नहीं छोड़ा।

“मम्मा, एक अंकल बोले पापा से मिलवाएंगे,” तारा ने रोते हुए कहा। “मैंने बोला पहले नाना को फोन करो।”

रामकिशोर ने आंखें बंद कर लीं। इतने छोटे बच्चे को भी डर में किसका नाम याद आया था, यही जानकर उनका दिल टूट भी गया और जुड़ भी गया।

उसी शाम खबर आई कि मलिहाबाद वाले घर पर छापा पड़ा। 3 आदमी पकड़े गए। गोदाम से नकद रकम, फर्जी मुहरें, सरकारी ठेकों की फाइलें और कई जमीनों के कागज मिले। राघव रसोई के पास घायल हालत में मिला। उसकी नाक टूटी थी, 2 पसलियां टूटी थीं, सिर पर गहरी चोट थी। वह जिंदा था, पर उसकी आंखों में वह आदमी नहीं बचा था जिसने कभी बारात में सीना तानकर नंदिनी का हाथ पकड़ा था।

2 दिन बाद, जब डॉक्टरों ने अनुमति दी, नंदिनी उससे मिलने गई। रामकिशोर दरवाजे के बाहर खड़े रहे। उन्हें डर था कि बेटी फिर पिघल जाएगी। उन्हें डर था कि समाज फिर वही कहेगा, “पति है, गलती हो जाती है।” उन्हें डर था कि दुख के नाम पर अपराध को माफ कर दिया जाएगा।

नंदिनी 18 मिनट बाद बाहर आई। उसकी आंखें लाल थीं, पर चेहरा साफ था।

“उसने सच बताया,” उसने कहा। “उसने पैसे लिए। पहले लालच में। फिर डर में। फिर चुप्पी में। उसने मुझे बचाने की कोशिश की, पर बहुत देर से।”

रामकिशोर ने पूछा, “अब?”

नंदिनी ने पहली बार बिना कांपे कहा, “अब मैं उसे माफ नहीं करूंगी। तारा को भी उसके झूठ के घर में वापस नहीं ले जाऊंगी।”

यही फैसला सबसे कठिन निकला।

परिवार के कुछ लोगों ने कहा, “राघव ने अंत में बचाने की कोशिश तो की।”

किसी ने कहा, “बच्ची के लिए घर टूटना ठीक नहीं।”

किसी ने यह भी कहा, “औरत को थोड़ा सहना पड़ता है।”

नंदिनी ने सबकी बातें सुनीं। फिर एक दिन उसने आंगन में खड़ी होकर कहा, “जिस घर की दीवारें मेरी बेटी के नाम से मुझे धमकाएं, वह घर नहीं, पिंजरा है।”

उसके बाद कोई जवाब नहीं दे पाया।

मामला अदालत तक गया। इंस्पेक्टर भदौरिया पर अपहरण, रिश्वत, आपराधिक षड्यंत्र और पद के दुरुपयोग के आरोप लगे। हवाला गिरोह के लोगों पर जबरन वसूली, बंधक बनाने और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले चले। राघव ने जांच में सहयोग किया, पर उसे भी फर्जी लेनदेन और अवैध कागजों पर हस्ताक्षर करने की सजा का सामना करना पड़ा। अदालत ने तारा की कस्टडी नंदिनी को दी और राघव से मुलाकात सिर्फ निगरानी में रखने का आदेश दिया।

रामकिशोर ने अपना पुराना घर फिर से खोल दिया। वही कमरा जहां कभी नंदिनी की स्कूल की ट्रॉफियां थीं, तारा का कमरा बना। दीवार पर कार्टून चिपके। सावित्री की अलमारी से निकली रजाई पर तारा सोती। रात में डरकर उठती तो नंदिनी उसे सीने से लगा लेती। कभी-कभी नंदिनी खुद भी रोते-रोते पिता के कमरे के दरवाजे तक आ जाती।

रामकिशोर कुछ नहीं पूछते। बस रसोई में चाय चढ़ा देते।

महीनों बाद पहली दीवाली आई।

इस बार नंदिनी ने कहा कि बड़ी मिठाई नहीं बनेगी। बस घर में बने बेसन के लड्डू, थोड़ी खीर और सावित्री वाली आलू-पूरी। तारा ने सारे दीये एक ही कोने में रख दिए और बोली, “यहां ज्यादा अंधेरा था, नाना।”

रामकिशोर ने दीये ठीक नहीं किए।

उन्हें लगा बच्ची ने शायद जीवन का सबसे बड़ा सच समझ लिया था। जहां अंधेरा ज्यादा हो, वहां रोशनी भी ज्यादा रखनी चाहिए।

रात को पूजा के बाद नंदिनी ने पीतल की थाली उठाई। वही थाली जो उस भयावह सुबह मेज पर ठंडी पड़ी रह गई थी। उसने पिता की ओर देखा।

“बाबूजी,” वह बोली, “अगर आप उस दिन नहीं आते…”

रामकिशोर ने धीरे से कहा, “पर मैं आया।”

तारा उनकी गोद में सिर रखकर सो चुकी थी। उसके हाथ की गुलाबी घड़ी अब उतारकर मेज पर रखी थी। उसकी स्क्रीन बंद थी, क्योंकि अब उसे खोजने की जरूरत नहीं थी। वह घर में थी। अपनी मां के पास। अपने नाना की सांसों के बीच।

रामकिशोर 63 साल के थे। वह कोई नायक नहीं थे। उनके घुटने कमजोर थे। उनकी बोलेरो पुरानी थी। उनकी आंखें चश्मे के बिना साफ नहीं देखती थीं। पर उस सुबह उनके सीने में जो ठंडक उतरी थी, उसने उन्हें रास्ता दिखा दिया।

लोग कहते हैं, त्योहार घरों में रोशनी लाते हैं।

रामकिशोर को उस साल समझ आया कि असली रोशनी दीये में नहीं होती। असली रोशनी उस पिता के कदमों में होती है जो संदेशों पर भरोसा नहीं करता, उस मां की चीख में होती है जो टूटकर भी बच्ची को ढूंढती है, और उस छोटी गुलाबी घड़ी में होती है जो अंधेरे रास्ते पर भी उम्मीद का बिंदु बनकर चमकती रहती है।

कभी-कभी प्यार दरवाजा खटखटाकर नहीं आता।

कभी-कभी प्यार जंग लगी खिड़की से अंदर घुसता है, केबल टाई काटता है, खून से सने हाथ पकड़ता है, और अपनी बेटी को अंधेरे से बाहर खींच लाता है।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.