भाग 1
खाने की मेज पर सबके सामने बहू को थप्पड़ मारते हुए राघव ने सोचा था कि वह अपनी मां की इज्जत बचा रहा है, मगर उसे अंदाजा भी नहीं था कि उसी थप्पड़ से उसके पूरे खानदान की नकली इज्जत राख हो जाएगी।
दिल्ली के लक्ष्मी नगर की तंग गली में बनी 3 मंजिला पुरानी कोठी उस रात बाहर से बिल्कुल साधारण लग रही थी। ऊपर छत पर कपड़े सूख रहे थे, नीचे गली में छोले-कुलचे वाले की आवाज गूंज रही थी और अंदर शर्मा परिवार की डाइनिंग टेबल पर गरम दाल, चावल, आलू-गोभी और रोटियों की खुशबू फैली थी। लेकिन उस खुशबू के नीचे कुछ और भी पक रहा था—अपमान, घुटन और वह पुराना जहर जिसे लोग “परिवार की परंपरा” कहकर छिपा देते हैं।
नंदिनी की शादी को अभी सिर्फ 12 दिन हुए थे। वह सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक प्रीत विहार की एक मेडिकल स्टोर चेन में कैश संभालती थी। उस दिन भी वह दुकान बंद करके सीधे सब्जी मंडी गई, 2 थैले आलू-प्याज, दूध, दही, धनिया और फल लेकर ऑटो से उतरी, फिर सीढ़ियां चढ़ते हुए सांस फूल गई। घर पहुंचते ही सास कमला देवी ने सिर्फ इतना कहा था—
—बहू, हाथ धोकर रसोई में लग जा, आज राघव को दाल तड़के वाली चाहिए।
नंदिनी ने पूछा भी नहीं कि कोई और मदद करेगा या नहीं। उसे जवाब पहले से पता था। घर में राघव था, जो बैंक की नौकरी के बाद खुद को बहुत थका हुआ आदमी मानता था। उसका छोटा भाई मोहित था, 24 साल का, बेरोजगार, दिनभर मोबाइल पर गेम खेलता और मां से चाय मांगता। और कमला देवी थीं, जिनकी नजर में बहू का मतलब था ऐसा शरीर जो थके नहीं, बोले नहीं और हर आदेश को सेवा समझे।
नंदिनी ने खाना बनाया। रोटियां सेंकीं। टेबल लगाई। सबको पानी डाला। सब्जी पर धनिया डाला। दाल में घी का तड़का लगाया। फिर आखिरी प्लेट रखते हुए उसने सोचा कि शायद अब वह 5 मिनट बैठ पाएगी।
लेकिन मोहित ने मोबाइल से नजर उठाए बिना कहा—
—भाभी, मेरे लिए चावल डालो। ऊपर से घी भी डाल देना। और अचार भी देना।
नंदिनी ने उसे देखा। उसकी आवाज न तेज थी, न कांपती हुई। बस सीधी थी।
—कड़छी वहीं रखी है। तुम्हारे हाथ हैं।
मेज पर जैसे किसी ने अचानक हवा रोक दी।
मोहित ने पहली बार फोन नीचे रखा।
—क्या बोली तुम?
कमला देवी की आंखें सिकुड़ गईं।
—अरे वाह, 12 दिन में ही तेवर देखो बहू के। मेरे छोटे बेटे को चावल भी नहीं परोसेगी?
नंदिनी ने कुर्सी की पीठ पकड़ी, जैसे खुद को संभाल रही हो।
—मैंने बाजार से सामान लाया, खाना बनाया, मेज लगाई। मोहित बच्चा नहीं है। वह खुद चावल ले सकता है।
राघव ने धीरे से फोन टेबल पर रखा। उसका चेहरा बदल गया। शादी से पहले वह नंदिनी से कहता था कि उसे उसकी मेहनत पसंद है, उसकी समझदारी पसंद है। आज वही आदमी अपनी मां और भाई के सामने किसी और ही शक्ल में बैठा था—छोटा, डरपोक और अपनी मर्दानगी साबित करने को बेचैन।
—नंदिनी, चावल परोस दो और बात खत्म करो।
—नहीं।
कमला देवी ने माथे पर हाथ रख लिया।
—देखा राघव? मैंने पहले ही कहा था, ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की घर में आग लगाती है। आज भाई को चावल नहीं देगी, कल तुझे भी जवाब देगी।
मोहित मुस्कुराया।
—भैया, अभी से संभाल लो। नहीं तो बाद में सिर चढ़ जाएगी।
नंदिनी ने राघव की तरफ देखा। शायद एक आखिरी उम्मीद थी कि वह कहेगा, “मां, रहने दो।” लेकिन राघव खड़ा हुआ। उसकी कुर्सी पीछे फिसलकर दीवार से टकराई।
—तुम्हें इतनी छोटी बात में नाटक करना जरूरी है?
—छोटी बात नहीं है। हर बार मुझे नौकरानी समझना छोटी बात नहीं है।
कमला देवी ने चिल्लाकर कहा—
—बहू होकर जवाब देती है! राघव, अगर आज नहीं रोका तो जिंदगी भर पछताएगा।
अगले ही पल राघव ने नंदिनी के गाल पर थप्पड़ मार दिया।
आवाज इतनी तेज थी कि रसोई की खिड़की पर बैठी चिड़िया उड़ गई। नंदिनी का चेहरा एक तरफ मुड़ गया। होंठ के कोने से खून की पतली लकीर निकली। उसके कान में सनसनाहट भर गई। कुछ पल के लिए उसे सिर्फ अपनी धड़कन सुनाई दी।
फिर तालियां बजीं।
कमला देवी ताली बजा रही थीं।
—शाबाश बेटा। औरत को शुरुआत में ही उसकी औकात दिखानी पड़ती है।
मोहित हंस पड़ा।
—अब भाभी, चावल परोसोगी या दूसरा भी चाहिए?
नंदिनी ने धीरे-धीरे सिर उठाया। उसकी आंखों में आंसू नहीं थे। सिर्फ ऐसी ठंडी आग थी जो किसी को भी डराने के लिए काफी थी। उसके सामने मेज पर गरम दाल की बड़ी कड़ाही रखी थी। उसमें से भाप उठ रही थी।
राघव ने शायद देर से समझा कि सीमा पार हो चुकी थी।
—नंदिनी, ज्यादा मत सोचो। बस गलती सुधारने के लिए—
वह वाक्य पूरा नहीं कर पाया।
नंदिनी ने दोनों हाथों से कड़ाही उठाई और पूरी गरम दाल राघव के सिर और कंधों पर उलट दी। राघव चीखता हुआ पीछे गिरा। उसकी शर्ट पीली दाल से भीग गई। बालों में जीरा, लाल मिर्च और धनिया चिपक गया। मोहित का चेहरा सफेद पड़ गया। कमला देवी की ताली हवा में ही रुक गई।
नंदिनी ने राघव को नीचे देखते हुए कहा—
—मुझे दोबारा हाथ लगाया तो हाथ बचेंगे नहीं।
उसने अपने होंठ से खून पोंछा और सीधे कमरे में चली गई। दरवाजा बंद होते ही बाहर से चीखें शुरू हो गईं। कमला देवी खुद को पीड़िता बताकर रो रही थीं। मोहित दरवाजा पीट रहा था। राघव गालियां दे रहा था। लेकिन कमरे के अंदर नंदिनी पहली बार साफ समझ गई थी कि यह घर उसका ससुराल नहीं, पिंजरा था।
उसने अलमारी खोली और छोटा सूटकेस निकाला। शादी के बाद अभी कपड़े ठीक से रखे भी नहीं गए थे। उसने 4 सूट, जींस, दस्तावेज, आधार कार्ड, बैंक पासबुक, थोड़े पैसे और अपनी पुरानी डायरी रखी।
दरवाजा फिर जोर से हिला।
—दरवाजा खोल, पागल औरत! —मोहित चिल्लाया।
नंदिनी ने सूटकेस बंद किया। उसने अपने गाल की जलन को हथेली से छुआ। उसे अचानक अपना बचपन याद आया—मेरठ का छोटा घर, जहां उसका भाई रोहित हमेशा पहले खाना खाता था, और वह बाद में। जहां मां कहती थी—
—लड़कियां घर संभालती हैं, सवाल नहीं पूछतीं।
जहां पिता ने 15 साल की उम्र में कहा था—
—ज्यादा बोलोगी तो कोई शादी नहीं करेगा।
नंदिनी ने 17 साल की उम्र में छिपकर आत्मरक्षा सीखी थी। वह किसी से लड़ना नहीं चाहती थी। वह बस यह जानना चाहती थी कि जब कोई उसका रास्ता रोके, तो वह खुद अपना रास्ता बना सके।
उसने दरवाजा खोला।
मोहित बहुत पास खड़ा था। दरवाजा उसके चेहरे से टकराया और वह नाक पकड़कर पीछे हटा। कमला देवी हाथ में झाड़ू लिए खड़ी थीं। राघव की शर्ट अभी भी दाल से भीगी थी, आंखों में शर्म नहीं, गुस्सा था।
—कहीं नहीं जाओगी —राघव ने सूटकेस पकड़ने की कोशिश की।
नंदिनी ने उसका हाथ झटक दिया।
—हट जाओ।
—तुम मेरी पत्नी हो।
—मैं तुम्हारी संपत्ति नहीं हूं।
कमला देवी ने झाड़ू उठाई।
—इस घर में बहुएं ऐसे नहीं बोलतीं।
झाड़ू नीचे आई, मगर नंदिनी ने उसे कलाई से रोककर जोर से खींचा। कमला देवी का संतुलन बिगड़ा और वह फर्श पर बैठ गईं। मोहित झपटकर आगे आया, लेकिन नंदिनी ने उसका कंधा मोड़कर उसे सोफे पर धकेल दिया। राघव पीछे से पकड़ने आया तो उसने कोहनी उसकी पसलियों में मारी। राघव लड़खड़ाकर शोकेस से टकराया। कांच टूट गया।
घर अचानक चुप हो गया।
पहली बार तीनों ने नंदिनी को डराने की चीज नहीं, डरने की वजह की तरह देखा।
नंदिनी ने सूटकेस उठाया।
—अब अगर किसी ने मुझे रोकने की कोशिश की, तो पुलिस को फोन करूँगी।
वह सीढ़ियां उतर गई। गली की हवा उसके सूजे गाल पर लगी। रात में भी दिल्ली जाग रही थी। ऑटो की आवाजें, कुत्तों का भौंकना, दूर मेट्रो की गड़गड़ाहट। मगर नंदिनी के भीतर सब कुछ खाली था।
उसने अपनी मां को फोन किया। जवाब नहीं आया। पिता को फोन किया। उन्होंने काट दिया। फिर वह ऑटो लेकर अपने मायके, मेरठ रोड वाली कॉलोनी पहुंची।
दरवाजा खुला तो पिता पहले से खड़े थे।
—क्या तमाशा किया तूने? कमला जी का फोन आया था। बोल रही थीं कि तूने उनके पूरे परिवार पर हमला कर दिया।
नंदिनी ने अपने गाल की तरफ इशारा किया।
—राघव ने मुझे सबके सामने मारा।
मां ने होंठ भींचे।
—तो तू घर छोड़कर आ गई? शादी में ऐसी बातें होती रहती हैं।
—ऐसी बातें?
पिता गरजे—
—कल सुबह वापस जाएगी और माफी मांगेगी। हमारी नाक मत कटवा।
नंदिनी ने उन्हें देखा। वही लोग। वही मेज। वही डर। वही “लोग क्या कहेंगे।”
—अगर वह मुझे मार डालता तो?
पिता बोले—
—नाटक मत कर। औरत का घर पति के साथ होता है।
नंदिनी ने धीरे से कहा—
—तो आज से मेरा कोई घर नहीं है।
वह मुड़ी और बाहर निकल गई। पीछे मां रोई, पिता ने कहा कि अब वह उनकी बेटी नहीं। मगर नंदिनी नहीं रुकी।
उस रात उसने गाजियाबाद स्टेशन के पास 1 सस्ते लॉज में कमरा लिया। सुबह जब वह चाय लेने नीचे गई, 2 औरतें सड़क किनारे बात कर रही थीं।
—सुना? शर्मा जी की नई बहू रात को भाग गई।
—किसके साथ?
—अरे वही इमरान मिस्त्री के साथ। कमला देवी कह रही थीं, शादी से पहले से चक्कर था।
नंदिनी के हाथ में चाय का गिलास कांप गया।
उन्हें उसे मारकर भी चैन नहीं मिला था। अब वे उसका नाम भी मारना चाहते थे।
वह वहीं खड़ी रह गई, और उसी पल उसने फैसला कर लिया कि अब भागना बंद।
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भाग 2
नंदिनी ने उसी चायवाले से इमरान मिस्त्री का पता पूछा और पुरानी दिल्ली की एक तंग गली में उसकी छोटी-सी वेल्डिंग की दुकान तक पहुंच गई। इमरान करीब 35 साल का मजबूत कद-काठी वाला आदमी था, जिसकी आंखों में थकान और गुस्सा साथ-साथ रहते थे। नंदिनी ने अपना नाम बताया और कहा कि कमला देवी पूरे मोहल्ले में उसे उसका प्रेमी बता रही हैं। इमरान का चेहरा अचानक सख्त हो गया। —मैं तुम्हें जानता भी नहीं। —मुझे भी यही साबित करना है। —उस औरत ने फिर मेरा नाम लिया? —फिर? इमरान ने लोहे की छड़ मेज पर रख दी। —3 साल पहले राघव ने मुझसे 80000 रुपये उधार लिए थे। बोला था, छोटे भाई के लिए मोबाइल पार्ट्स का काम शुरू करेगा। मुझसे ही नहीं, 2 और लोगों से भी पैसे लिए। जब पैसे मांगे, तो कमला देवी ने मोहल्ले में फैला दिया कि मैं गुंडा हूं, उनकी बहू-बेटियों को धमकाता हूं। झगड़ा हुआ, पुलिस आई, और बदनाम मैं हुआ। नंदिनी को लगा जैसे अंधेरे कमरे में अचानक खिड़की खुल गई हो। कमला देवी झूठ बोलती नहीं थीं, झूठ से घर बनाती थीं। —मेरे साथ चलोगे? —कहाँ? —उसी घर के सामने। आज वह कहानी सबके सामने पूरी होगी। इमरान ने दुकान बंद की और उसके साथ चल पड़ा। जब दोनों लक्ष्मी नगर पहुंचे, तब तक गली में आधी अफवाह घूम चुकी थी। कमला देवी दरवाजे पर खड़ी थीं, जैसे नाटक के लिए मंच तैयार हो। नंदिनी और इमरान को साथ देखते ही वह चीखीं— —देखो! मैंने कहा था ना, यही है इसका आशिक! राघव पीछे खड़ा था, मगर उसकी आंखों में डर था। नंदिनी ने मोबाइल निकालकर रिकॉर्डिंग शुरू की। —कमला देवी, आज सबके सामने बोलिए। आपने मुझे बदचलन कहा, इस आदमी का नाम क्यों लिया? भीड़ जमा होने लगी। इमरान आगे आया। —पहले मैं बोलूंगा। राघव ने 3 साल पहले मुझसे पैसे लिए थे। वापस नहीं किए। जब मैं लेने आया, तो उसकी मां ने मुझे गुंडा बना दिया। एक बुजुर्ग पड़ोसी बोले— —हाँ, उस दिन पुलिस आई थी। हमें कहा गया था कि इमरान चोरी करने आया था। राघव का चेहरा पीला पड़ गया। नंदिनी ने उसकी तरफ देखा। —तो तुम सिर्फ पत्नी को मारने वाले आदमी नहीं, कर्ज लेकर छिपने वाले आदमी भी हो। तभी कमला देवी आगे बढ़ीं और नंदिनी का फोन छीनने की कोशिश की। नंदिनी पीछे हटी, मगर राघव ने अचानक उसका हाथ पकड़ लिया। इमरान गरजा— —छोड़ उसे! और ठीक उसी पल गली के मोड़ पर पुलिस की जीप रुक गई, क्योंकि नंदिनी ने आते समय ही 112 पर कॉल कर दिया था। ❤️नमस्ते, प्यारे रीडर्स! अगर आप अगले पार्ट के लिए तैयार हैं, तो प्लीज़ नीचे “Yes” लिखें, और मैं इसे तुरंत भेज दूँगा। मैं उन सभी के अच्छे स्वास्थ्य और खुशी की कामना करता हूँ जिन्होंने यह कहानी पढ़ी और पसंद की है! 💚
भाग 3
पुलिस की जीप रुकते ही गली में फैला शोर अचानक बदल गया। जो लोग अभी तक तमाशा देख रहे थे, वे अब पीछे हटने लगे। कुछ ने मोबाइल नीचे कर लिए, कुछ ने और ऊंचा उठा लिए। दिल्ली की तंग गलियों में पुलिस का आना हमेशा सिर्फ कानून नहीं लाता, लोगों की असली शक्लें भी बाहर खींच लाता है।
एक महिला सब-इंस्पेक्टर, कविता राणा, जीप से उतरीं। उनके साथ 2 कांस्टेबल थे। उन्होंने भीड़ को हटाते हुए सीधा नंदिनी की तरफ देखा।
—किसने कॉल किया था?
नंदिनी ने हाथ उठाया।
—मैंने।
राघव ने तुरंत बीच में बोलना चाहा—
—मैडम, यह पारिवारिक मामला है। मेरी पत्नी थोड़ा गुस्से में—
कविता ने उसे हाथ से रोक दिया।
—जब महिला 112 पर कॉल करती है, तो पहले महिला बोलेगी।
नंदिनी ने पहली बार किसी अधिकारी को यह कहते सुना, और उसके भीतर अजीब-सी मजबूती आई। उसने अपना मोबाइल आगे किया। उसमें पिछली रात की पूरी रिकॉर्डिंग नहीं थी, मगर कमरे से बाहर निकलते समय हुई बहस, कमला देवी की चीखें, मोहित की धमकियां और राघव का “तुम मेरी पत्नी हो” साफ सुनाई दे रहा था। उसने अपना सूजा गाल दिखाया, होंठ का कट दिखाया, टूटे शोकेस और दाल से सनी शर्ट की तस्वीरें दिखाईं।
कविता ने राघव की तरफ देखा।
—आपने पत्नी को मारा?
राघव चुप रहा।
कमला देवी तुरंत रोने लगीं।
—मैडम, बहू ने भी मेरे बेटे पर गरम दाल फेंकी। हमें पीटा। घर की इज्जत मिट्टी में मिला दी। नई-नई आई है, मगर घर तोड़ने पर तुली है।
कविता ने सख्ती से पूछा—
—आपने बेटे को बहू पर हाथ उठाते देखा?
कमला देवी की आंखें इधर-उधर भागीं।
—वो… गुस्से में गलती हो गई होगी।
भीड़ में धीमा शोर उठा।
नंदिनी ने साफ आवाज में कहा—
—गलती नहीं थी, मैडम। यह सबक सिखाने के लिए था। उन्होंने मुझे इसलिए मारा क्योंकि मैंने इनके छोटे भाई को चावल परोसने से मना किया था।
मोहित पीछे हटने लगा, लेकिन इमरान ने उसे देखकर कहा—
—भाग क्यों रहा है? तू भी तो हंस रहा था।
कविता ने मोहित को रोका।
—नाम?
—मोहित शर्मा।
—काम क्या करते हो?
मोहित चुप।
भीड़ से किसी ने हंसकर कहा—
—मोबाइल चलाता है, मैडम।
मोहित का चेहरा लाल हो गया।
कविता ने कमला देवी से पूछा—
—आपने नंदिनी के बारे में अफवाह फैलाई कि वह इस आदमी के साथ भागी?
कमला देवी ने फिर नाटक शुरू किया।
—मैंने तो बस जो सुना—
भीड़ से एक महिला बोली—
—झूठ बोल रही हैं। इन्होंने खुद मंडी में कहा कि बहू इमरान के साथ भागी।
दूसरी औरत ने कहा—
—तिलक वाली दुकान पर भी यही बोला था।
तीसरे आदमी ने जोड़ दिया—
—और 3 साल पहले इमरान को चोर भी इन्होंने ही कहा था।
अब कमला देवी की गर्दन झुकने लगी। पहली बार वह अपनी बनाई भीड़ में खुद फंस गई थीं।
कविता ने इमरान की तरफ देखा।
—आप बताइए।
इमरान ने जेब से पुरानी फाइल निकाली। उसमें नोटबुक के पन्ने, उधार की लिखी रकम, राघव के साइन वाला कागज और बैंक ट्रांसफर का स्क्रीनशॉट था।
—मैडम, 3 साल पहले राघव ने 80000 रुपये लिए थे। लौटाए नहीं। जब मैं पैसे मांगने आया, तो मुझे गुंडा कहा गया। उस झगड़े में मेरा नाम खराब हुआ, काम गिरा, घर में तनाव हुआ। मैंने लड़ाई की गलती मानी, लेकिन इनके झूठ की सजा आज तक भुगत रहा हूं।
राघव ने घबराकर कहा—
—वो पैसे मैंने वापस करने थे। थोड़ा समय चाहिए था।
नंदिनी हंसी, मगर वह हंसी खुशी की नहीं थी।
—तुम्हें 3 साल चाहिए थे पैसे लौटाने के लिए और 3 सेकंड चाहिए थे पत्नी पर हाथ उठाने के लिए?
कविता ने राघव को सख्त नजर से देखा।
—आप दोनों पक्ष थाने चलेंगे। घरेलू हिंसा, बदनामी और पुराने लेन-देन की शिकायत अलग-अलग दर्ज होगी। और अगर महिला अभी वापस नहीं जाना चाहती, तो कोई उसे मजबूर नहीं करेगा।
यह सुनते ही कमला देवी टूटती नहीं, भड़क उठीं।
—नहीं! मेरी बहू थाने नहीं जाएगी। हमारे खानदान में पुलिस-कचहरी नहीं होती। बहू घर से निकलती है तो बदनामी होती है।
नंदिनी उनके सामने जाकर खड़ी हो गई।
—बदनामी तब नहीं हुई जब आपके बेटे ने मुझे मारा? बदनामी तब नहीं हुई जब आपने ताली बजाई? बदनामी तब हुई जब मैंने कहा कि मेरे भी हाथ हैं?
कमला देवी ने गुस्से से कहा—
—बहू होकर सास से ऐसे बात करती है?
—सास होकर बहू को इंसान समझती हैं?
यह सवाल हवा में अटक गया। कई औरतों की आंखें झुक गईं। शायद किसी ने अपनी पुरानी चोट याद की। शायद किसी ने अपना पहला थप्पड़। शायद किसी ने वह रात, जब उसने भी चुप रहना चुना था क्योंकि घर बचाना था।
तभी गली के मोड़ से एक और ऑटो रुका। नंदिनी के माता-पिता उतरकर तेजी से आए। पिता, सुरेश त्यागी, के चेहरे पर वही पुरानी कठोरता थी। मां, विमला, आंखों में पानी लिए थीं, लेकिन वह पानी बेटी के दर्द का नहीं, समाज के डर का था।
सुरेश ने आते ही कहा—
—नंदिनी! यह क्या तमाशा लगा रखा है? तेरी सास ने फोन किया। तूने हमें कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा।
कविता ने पूछा—
—आप पीड़िता के पिता हैं?
सुरेश ने कहा—
—मैडम, बच्ची जिद्दी है। घर-घर में छोटी-मोटी बात होती रहती है। हम इसे समझाकर वापस भेज देंगे।
नंदिनी ने धीरे से उनकी तरफ देखा।
—मैं बच्ची नहीं हूं। और मैं वापस नहीं जाऊंगी।
विमला आगे बढ़ीं।
—बेटी, तलाकशुदा औरत की जिंदगी आसान नहीं होती। लोग बातें बनाते हैं। अभी भी समय है। पैर पकड़कर माफी मांग ले, घर बस जाएगा।
नंदिनी ने जैसे भीतर किसी पुरानी रस्सी को टूटते महसूस किया।
—माफी? किस बात की माफी? कि मैंने एक 24 साल के आदमी को खुद चावल लेने को कह दिया?
सुरेश गरजे—
—तेरा यही चरित्र है। बचपन से जवाब देती आई है। मैंने कहा था, तेरी जुबान तेरा घर तोड़ेगी।
नंदिनी ने अपना सूटकेस जमीन पर रखा। फिर पूरे मोहल्ले, पुलिस, ससुराल और मायके के सामने सीधी खड़ी हो गई।
—आज मैं आखिरी बार बोल रही हूं।
भीड़ शांत हो गई।
—राघव, तुमने मुझे थप्पड़ सिर्फ गुस्से में नहीं मारा। तुमने मुझे इसलिए मारा क्योंकि तुम्हें लगा तुम्हारी मां के सामने तुम्हारी मर्दानगी कम हो जाएगी। तुमने सोचा पत्नी पर हाथ उठाकर तुम बड़े हो जाओगे। सच यह है कि उस थप्पड़ से तुम बहुत छोटे हो गए।
राघव ने सिर झुका लिया।
—नंदिनी, मैं माफी मांगता हूं। घर चलो। मैं मां से बात करूँगा।
—तुम्हारी माफी उस हाथ से आई है जिसने मुझे मारा। मुझे उस पर भरोसा नहीं।
वह कमला देवी की तरफ मुड़ी।
—आपको बहू नहीं चाहिए थी। आपको मुफ्त की नौकरानी चाहिए थी। ऐसी लड़की चाहिए थी जो सुबह कमाए, शाम को खाना बनाए, रात को अपमान सुने और सुबह मुस्कुराए। आपने अपने बेटे को राजा बनाया, दूसरे बेटे को लाड़ में निकम्मा बनाया, और सोचा कि किसी की बेटी आकर आपकी गलती ढोएगी। मैं नहीं ढोऊंगी।
कमला देवी ने होंठ भींच लिए, लेकिन भीड़ के सामने उनके पास शब्द कम पड़ गए।
नंदिनी ने मोहित को देखा।
—तुम्हें लगा न, एक कटोरी चावल से बात शुरू हुई? नहीं। बात उस दिन शुरू हुई थी जब तुम्हें सिखाया गया कि तुम्हें सेवा मिलनी चाहिए क्योंकि तुम लड़के हो। जिस दिन कोई औरत तुम्हें खुद उठकर पानी लेने को कहे, उसे दुश्मन मत समझना। शायद वही तुम्हें इंसान बना रही होगी।
मोहित पहली बार नजरें चुराने लगा।
फिर नंदिनी अपने माता-पिता के सामने आई।
विमला रो पड़ीं।
—ऐसा मत बोल, बेटी।
नंदिनी की आवाज कांपी, पर टूटी नहीं।
—आप लोगों ने मुझे बचपन से सिखाया कि बेटा जरूरी है और बेटी बोझ। भाई को दूध, मुझे समझौता। भाई को आजादी, मुझे मर्यादा। मैंने जब-जब सवाल किया, आपने कहा मैं समस्या हूं। आज समझ आई कि मैं समस्या नहीं थी। समस्या वह घर था जो मुझे इंसान मानने को तैयार नहीं था।
सुरेश ने हाथ उठाया, जैसे हमेशा की तरह उसे चुप करा देंगे।
कविता ने तेज आवाज में कहा—
—हाथ नीचे।
सुरेश का हाथ हवा में रुक गया। फिर धीरे से नीचे गिर गया। नंदिनी ने पहली बार देखा कि उसके पिता भी डर सकते हैं—कानून से, गवाहों से, उस बेटी से जो अब झुकने वाली नहीं थी।
—आज से मैं न आपके घर लौटूंगी, न राघव के घर। जब सम्मान से बात करनी हो, फोन करना। जब मुझे फिर से सहना सिखाना हो, मेरा नंबर भूल जाना।
विमला जमीन पर बैठने जैसी हो गईं, मगर नंदिनी आगे नहीं बढ़ी। कुछ दूरियां रोकर नहीं मिटतीं। कुछ दरवाजे बाहर से नहीं, भीतर से बंद हो चुके होते हैं।
थाने में उसी शाम नंदिनी ने बयान दर्ज कराया। घरेलू हिंसा की शिकायत हुई। कमला देवी से लिखित माफी ली गई कि उन्होंने इमरान और नंदिनी के बारे में झूठी अफवाह फैलाई। इमरान के पुराने कर्ज के कागज भी दर्ज हुए। राघव को तुरंत जेल नहीं हुई, मगर उसकी दुनिया पहली बार कानूनी कागजों, नोटिसों और पड़ोस की फुसफुसाहटों में घिर गई। जो परिवार कल तक इज्जत का ढोल पीटता था, आज हर दरवाजे पर सफाई देता फिर रहा था।
नंदिनी ने उसी हफ्ते महिला सहायता केंद्र की मदद से किराए का कमरा लिया। कमरा छोटा था। खिड़की के बाहर दूसरी इमारत की दीवार थी। पंखा आवाज करता था। बाथरूम साझा था। लेकिन वहां कोई उसे चावल परोसने का आदेश नहीं देता था। कोई उसके गाल पर हाथ नहीं उठाता था। कोई ताली बजाकर उसकी बेइज्जती को संस्कार नहीं कहता था।
वह मेडिकल स्टोर में काम करती रही। शाम को ऑनलाइन कोर्स में दाखिला लिया। खर्चा कम करने के लिए उसने शादी के भारी सूट बेच दिए। मंगलसूत्र उसने एक डिब्बे में बंद कर दिया, न गुस्से से फेंका, न रोकर चूमा। बस रख दिया, जैसे किसी गलत फैसले का प्रमाण।
2 महीने बाद अदालत से अलग रहने की प्रक्रिया शुरू हुई। राघव कई बार फोन करता रहा।
—नंदिनी, मां अब मान गई हैं। वापस आ जाओ।
—तुम बदले हो या डर गए हो?
वह जवाब नहीं दे पाता।
कमला देवी ने एक बार संदेश भेजा—
“घर टूटता है तो औरत पर दाग लगता है।”
नंदिनी ने सिर्फ इतना लिखा—
“घर तब टूट गया था जब आपने थप्पड़ पर ताली बजाई थी।”
उसके माता-पिता ने भी संपर्क किया। मां ने पहले कहा कि पिता बीमार हैं। फिर कहा कि मोहल्ले वाले पूछते हैं। फिर एक दिन बहुत देर बाद लिखा—
“तू ठीक है?”
नंदिनी ने उस संदेश को देर तक देखा। जवाब दिया—
“हाँ। जब आप मेरी चिंता करेंगी, समाज की नहीं, तब बात करेंगे।”
धीरे-धीरे उसका कमरा घर बनने लगा। एक छोटी मेज आई। 2 स्टील के गिलास आए। दीवार पर कैलेंडर लगा। कोर्स की किताबें जमा हुईं। उसने अपनी डायरी में 3 लक्ष्य लिखे—तलाक पूरा करना, प्रमोशन लेना, और किसी भी रिश्ते में खुद को खोना नहीं।
एक रविवार, इमरान चाय की दुकान पर मिला। वह अब मुस्कुरा रहा था।
—राघव ने 20000 रुपये लौटाए। बाकी के लिए लिखित दिया है।
नंदिनी ने कहा—
—अच्छा है।
—तुम्हारी वजह से मेरी भी इज्जत वापस आई।
—नहीं। झूठ बहुत दिन खड़ा था। बस गिराने वाला धक्का चाहिए था।
इमरान ने सिर हिलाया।
—और तुम?
नंदिनी ने चाय का कप हाथ में लिया।
—मैं भी खड़ी हूं। अभी पूरी तरह नहीं। लेकिन गिर भी नहीं रही।
उस शाम नंदिनी अपने कमरे में लौटी। उसने चावल पकाए, दाल गरम की, अचार निकाला और अकेले मेज पर बैठी। कुछ पल के लिए उसे वही रात याद आई—मेज, थप्पड़, तालियां, गरम दाल, खून की लकीर। फिर उसने धीरे से अपने लिए चावल परोसे।
कोई आदेश नहीं था। कोई अपमान नहीं था। कोई डर नहीं था।
उसने पहला निवाला खाया और आंखें बंद कर लीं।
आज भी वह पूरी तरह खुश नहीं थी। आज भी भीतर कहीं मायके की चोट, शादी का डर, समाज की आवाजें बाकी थीं। आज भी रातों में कभी-कभी अकेलापन दरवाजा खटखटाता था। लेकिन अब वह दरवाजा खोलने या बंद रखने का फैसला खुद करती थी।
आजादी हमेशा शोर से नहीं आती। कभी-कभी वह 1 छोटे कमरे में आती है, जहां औरत अपनी थाली खुद भरती है, अपना नाम खुद बचाती है और आईने में देखकर पहली बार कह पाती है कि वह किसी की बहू, पत्नी या बेटी होने से पहले खुद की है।
नंदिनी ने खिड़की खोली। बाहर शहर का शोर था—हॉर्न, रिक्शे, बच्चों की आवाजें, दूर कहीं अजान, पास के मंदिर की घंटी। सब कुछ वैसा ही था, फिर भी सब बदल चुका था।
उस रात उसने अपने फोन में मां का नंबर देखा, राघव का नंबर देखा, फिर स्क्रीन बंद कर दी।
उसने किसी को माफ करने की जल्दी नहीं की।
उसने सिर्फ खुद को छोड़ना बंद कर दिया।
और शायद यही उसकी सबसे बड़ी जीत थी।
Disclaimer: This story is a work of fiction created for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.