
PART 1
तलाक के ठीक 2 महीने बाद अर्जुन मेहरा ने अपनी पूर्व पत्नी नंदिनी को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल के ठंडे गलियारे में अकेले बैठे देखा, और उसकी अस्पताल वाली फीकी पोशाक ने उसे भीतर तक हिला दिया।
नर्स ने रजिस्टर से नजर उठाकर पूछा, “क्या आप अर्जुन मेहरा हैं? नंदिनी शर्मा ने आपको आपातकालीन संपर्क में लिखा है।”
अर्जुन के हाथ में पकड़ा पानी का गिलास काँप गया। कुछ देर पहले तक वह अपने पुराने कॉलेज मित्र की माँ को देखने अस्पताल आया था। उसे क्या मालूम था कि उसी गलियारे में उसकी अपनी अधूरी कहानी स्ट्रेचर, दवाइयों और सफेद रोशनी के बीच बैठी मिलेगी।
नंदिनी खिड़की के पास प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठी थी। उसकी कलाई में सलाइन की सुई लगी थी। चेहरा सूखा, आँखें खोई हुईं, होंठों पर वह मुस्कान भी नहीं थी जिससे वह कभी करवा चौथ की रात उसकी थाली सजाती थी। उसके बाल बहुत छोटे कटे थे। वही नंदिनी, जो अपने लंबे बालों में चमेली का तेल लगाकर रविवार की सुबह चोटी बनाती थी, अब ऐसी लग रही थी जैसे किसी ने उससे उसकी पहचान का एक हिस्सा चुपचाप छीन लिया हो।
अर्जुन के कदम रुक गए।
2 महीने पहले ही उसने साकेत परिवार न्यायालय में तलाक के कागजों पर हस्ताक्षर किए थे। बाहर निकलते वक्त उसने खुद को समझाया था कि यह एक समझदार फैसला है। 5 साल की शादी, 2 अधूरे गर्भ, अनगिनत चुप्पियाँ और एक घर जिसमें अब रसोई की खुशबू से ज्यादा थकान रहती थी—शायद उनका रिश्ता सचमुच खत्म हो चुका था।
वह गुरुग्राम की एक बीमा कंपनी में काम करता था। समय पर ईएमआई भरने वाला, माता-पिता की इज्जत करने वाला, किसी से ऊँची आवाज में बात न करने वाला आदमी। सब कहते थे, “अर्जुन जिम्मेदार है।” लेकिन जिम्मेदारी कभी-कभी सिर्फ बिल भरने तक सीमित रह जाती है। दिल के दरवाजे पर दस्तक देना भी जिम्मेदारी होती है, यह बात उसे तब समझ आई जब बहुत देर हो चुकी थी।
शादी के शुरुआती दिन अलग थे। करोल बाग के छोटे किराए के फ्लैट में दोनों रात को आलू पराठे बनाकर खाते, लाजपत नगर की भीड़ में सस्ते पर्दे खरीदते, दीवाली पर मिट्टी के दीये सजाते। नंदिनी स्कूल में कला पढ़ाती थी और बच्चों के लिए रंगीन कागजों से फूल बनाते-बनाते अपने घर के सपने भी बनाती थी।
फिर 2 बार सब कुछ टूट गया।
पहली बार डॉक्टर ने कहा, “ऐसा हो जाता है।” दूसरी बार घर लौटते हुए नंदिनी ने कार की खिड़की से बाहर देखते हुए सिर्फ इतना कहा, “शायद मेरे हिस्से में माँ बनना नहीं लिखा।”
अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ना चाहा, पर फोन बज गया। ऑफिस की जरूरी कॉल थी। उसने कॉल उठा ली।
उस दिन के बाद नंदिनी धीरे-धीरे कम बोलने लगी। सास के तानों पर मुस्कुरा देती। रिश्तेदारों के “अच्छी खबर कब दोगे?” पर पानी पीने उठ जाती। कभी-कभी रात के 3 बजे बाथरूम में बंद मिलती। कहती, “बस सिर दर्द है।” अर्जुन ने मान लिया, क्योंकि मान लेना आसान था। पूछना मुश्किल था।
धीरे-धीरे वह ऑफिस में देर तक रुकने लगा। फिर देर रात चाय, फिर सहकर्मियों के साथ खाना, फिर कोई भी बहाना। घर लौटते समय उसे डर लगता था कि नंदिनी कुछ कहेगी, रोएगी, टूटेगी। वह उस टूटन का सामना नहीं करना चाहता था।
एक रात उसने कह दिया, “नंदिनी, शायद हमें अलग हो जाना चाहिए।”
नंदिनी ने रोया नहीं। उसने बस पूछा, “यह फैसला तुमने पहले ही कर लिया था, है ना?”
अर्जुन के पास झूठ भी नहीं बचा था।
अब वही नंदिनी उसके सामने थी। उसने धीरे से उसका नाम लिया, “नंदिनी…”
उसने सिर उठाया। एक पल के लिए उसकी आँखों में पहचान चमकी, फिर शर्म की परत ने उसे ढँक लिया।
“अर्जुन, तुम्हें नहीं आना चाहिए था,” वह फुसफुसाई।
यह शिकायत नहीं थी। और इसी वजह से वह और गहरी लगी।
अर्जुन उसके पास बैठ गया। उसकी हथेली छुई। बर्फ जैसी ठंडी।
“क्या हुआ तुम्हें?”
नंदिनी ने हल्की मुस्कान बनाने की कोशिश की। “कुछ नहीं। बस स्कूल में चक्कर आ गया था।”
पीछे खड़ी नर्स ने धीमे लेकिन साफ स्वर में कहा, “सिर्फ चक्कर नहीं था, सर।”
नंदिनी ने आँखें बंद कर लीं।
अर्जुन को उसी क्षण समझ आ गया कि वह अपनी बीमारी से नहीं डर रही थी। वह इस बात से काँप रही थी कि अर्जुन कहीं सच न जान ले।
PART 2
युवा डॉक्टर ने उन्हें छोटे से परामर्श कक्ष में बुलाया। नंदिनी कुर्सी पर बैठते ही अपनी चुन्नी की किनारी मरोड़ने लगी।
डॉक्टर ने फाइल खोली। “नंदिनी जी स्कूल में बेहोश हुईं। शरीर में बहुत ज्यादा थकावट है। घबराहट के गंभीर दौरे, नींद की गोलियों और शांत करने वाली दवाओं का गलत समय पर इस्तेमाल… यह पहली बार नहीं है।”
अर्जुन ने नंदिनी की ओर देखा। “दवाइयाँ?”
नंदिनी की आवाज गले में अटक गई। “डॉक्टर ने लिखी थीं।”
“कब से?”
वह चुप रही।
डॉक्टर ने धीरे से कहा, “रिकॉर्ड के अनुसार उपचार रुक-रुक कर कई साल से चल रहा है।”
कई साल।
यह शब्द अर्जुन के सीने में पत्थर की तरह गिरा। उसे याद आए काँपते हाथ, बंद मोबाइल, अचानक रद्द हुई पारिवारिक दावतें, मंदिर जाने से इनकार, रातों की बेचैनी। उसने हर बार आसान जवाब चुना—नंदिनी दूर हो रही है, नंदिनी अब उससे प्यार नहीं करती।
जब वे बाहर आए, नंदिनी खड़ी होने लगी और लड़खड़ा गई। अर्जुन ने उसका बाजू थाम लिया।
“खुद को साबित करने की जरूरत नहीं है।”
नंदिनी ने बहुत धीमे कहा, “पूरी जिंदगी यही तो करना पड़ा है—कि मैं टूटी हुई नहीं हूँ।”
उस रात अर्जुन अस्पताल में ही रुका। सुबह वह नंदिनी के फ्लैट से कपड़े लेने गया। अलमारी बहुत साफ थी, जैसे वहाँ कोई रहता ही न हो। बेडसाइड दराज में उसे दवाइयों की पर्चियाँ, काउंसलिंग की रसीदें और एक नीली डायरी मिली।
पहले पन्ने पर उसका नाम लिखा था।
“अगर कभी अर्जुन यह पढ़े, तो शायद वह मुझसे नफरत न करे।”
अंदर एक अस्पताल पत्र था, जिस पर लाल पेन से रेखा खींची थी—
“गर्भहानि के बाद गंभीर घबराहट। पति या परिवार का तत्काल भावनात्मक सहयोग आवश्यक।”
अर्जुन कभी नहीं गया।
क्योंकि उसे बताया नहीं गया था।
या शायद उसने यही मानना चाहा था—तभी डायरी से उसका अपना भेजा हुआ एक प्रिंटेड व्हाट्सऐप संदेश गिरा।
PART 3
संदेश पर ऊपर उसका नाम था।
“अर्जुन, मनोवैज्ञानिक ने कहा है कि अच्छा होगा अगर तुम अगली बार मेरे साथ आओ। मैं तुम्हें मजबूर नहीं करना चाहती, पर मुझे डर लग रहा है।”
अर्जुन ने वह पंक्ति 3 बार पढ़ी। तारीख देखकर उसकी साँस अटक गई। वह मंगलवार था। उसे वह दिन याद था। गुरुग्राम ऑफिस में लंबी प्रस्तुति थी। शाम को सहकर्मी उसे साइबर हब ले गए थे। उसने फोन पर नंदिनी की कई सूचनाएँ देखी थीं और सोचा था, “घर जाकर देख लूँगा।”
घर जाकर उसने देखा ही नहीं।
उसने तुरंत अपना मोबाइल खोला। संदेश नहीं था। न पुरानी चैट में। न मिटाए गए संदेशों में। कुछ नहीं।
उसका गला सूख गया। यह गलती सिर्फ भूल नहीं थी। यह वह दरवाजा था जिसे नंदिनी ने काँपते हाथों से खोला था, और अर्जुन ने बिना देखे बंद कर दिया था।
वह डायरी बैग में रखकर अस्पताल लौटा। नंदिनी खिड़की के बाहर पीपल के पेड़ को देख रही थी। जब उसने डायरी देखी, उसके चेहरे से रंग उतर गया।
“तुम्हें यह नहीं खोलना चाहिए था।”
अर्जुन ने धीरे से कहा, “उस पर मेरा नाम था।”
“इसीलिए नहीं खोलना चाहिए था।”
वह उसके सामने बैठ गया। कुछ देर तक दोनों के बीच मशीनों की हल्की आवाज चलती रही।
“तुमने उस दिन मुझसे मदद माँगी थी?”
नंदिनी की पलकों पर नमी काँपी। “हाँ।”
“फिर दोबारा क्यों नहीं कहा?”
उसने उसे देखा। वह नजर गुस्से की नहीं थी। वह एक ऐसे इंसान की नजर थी जो बहुत लंबे समय तक अकेले अपनी साँसें गिनता रहा हो।
“क्योंकि तुम जा चुके थे, अर्जुन। बस तुम्हारा सामान घर में पड़ा था।”
अर्जुन के पास कोई जवाब नहीं था।
वह सच था। वह रात को लौटता था, बिजली का बिल भरता था, किराया देता था, एक ही बिस्तर पर लेटता था, मगर मन से वह पहले ही निकल चुका था। नंदिनी ने उसे खोने से पहले ही उसका खाली खोल देख लिया था।
धीरे-धीरे उसने वह सब बताया जिसे उसने कभी बोलने की हिम्मत नहीं की।
दूसरी गर्भहानि के बाद उसे पहली बार मेट्रो में घबराहट का दौरा पड़ा था। राजीव चौक की भीड़ में उसे लगा था कि वह मर जाएगी। सांस छोटी हो रही थी, हाथ सुन्न पड़ रहे थे, और आसपास लोग बस जल्दी में धक्का दे रहे थे। वह दीवार से लगकर खड़ी रही, जब तक किसी बुजुर्ग महिला ने पानी नहीं दिया।
फिर बाजार में हुआ। फिर स्कूल में। फिर घर की रसोई में, जब गैस पर चाय चढ़ी थी और उसे अचानक लगा कि रोने की आवाज किसी बच्चे की है।
“मैं जानती थी आवाज बाहर से नहीं आ रही थी,” नंदिनी ने कहा, “पर उस पल मुझे लगता था कि वह मेरा बच्चा है। वह बच्चा जो कभी घर नहीं आया।”
अर्जुन की आँखों में जलन भर आई।
नंदिनी ने चेहरा मोड़ लिया। “तुम्हारी माँ बुरी नहीं थीं, पर उनके शब्द चुभते थे। ‘अब पूजा-पाठ कर लो’, ‘तनाव मत लो’, ‘आजकल की लड़कियाँ जल्दी हार मान जाती हैं।’ तुम्हारी बुआ ने तो एक दिन कह दिया था कि शायद मेरी कुंडली में दोष है।”
अर्जुन ने सिर झुका लिया। उसे सब याद था। लाजपत नगर वाले घर में रविवार की दावत। स्टील की प्लेटें। उसकी माँ की चिंता भरी मगर तेज आवाज। रिश्तेदारों की सलाहें। और नंदिनी का चुपचाप अचार की कटोरी आगे बढ़ाना।
वह हर बार विषय बदल देता था। उसे लगता था कि उसने माहौल बचा लिया। असल में उसने नंदिनी को अकेला छोड़ दिया था।
“मैंने तुम्हें वहाँ भी नहीं बचाया,” उसने कहा।
“तुम अकेले दोषी नहीं थे,” नंदिनी ने थकी आवाज में कहा, “पर तुम्हीं वह आदमी थे जिससे उम्मीद थी कि मुझे पागल नहीं समझेगा।”
यह सुनकर अर्जुन टूट गया, लेकिन उसने रोकर खुद को केंद्र नहीं बनाया। पहली बार उसने सिर्फ सुना।
डॉक्टर ने अगले दिन साफ कहा कि नंदिनी को कुछ दिन और भर्ती रहना होगा। दवाओं का सही नियंत्रण, नियमित मनोचिकित्सा, निगरानी, परिवार की जिम्मेदार मौजूदगी। कोई चमत्कार नहीं। कोई एक रात का समाधान नहीं। शरीर और मन को जितना चोट लगती है, उतना ही समय उसे भरोसा लौटाने में लगता है।
नंदिनी ने तुरंत कहा, “मैं किसी को परेशान नहीं करना चाहती।”
अर्जुन ने उसकी बात पूरी होने से पहले कहा, “तुम परेशानी नहीं हो।”
“हम तलाकशुदा हैं।”
“हाँ,” उसने शांत स्वर में कहा, “पर इसका मतलब यह नहीं कि तुम अकेली हो।”
नंदिनी ने आँखें बंद कर लीं। एक आँसू कनपटी तक बह गया। उसने उसे पोंछा नहीं।
दोपहर तक उसका बड़ा भाई रोहित जयपुर से पहुँचा। हाथ में कपड़ों का बैग और मोतीचूर के लड्डू का डिब्बा था, जैसे मिठाई से वर्षों की दूरी का स्वाद बदल जाएगा। वह दरवाजे पर खड़ा रह गया। नंदिनी ने उसे देखा और नजर फेर ली।
“नंदू…” उसकी आवाज भर्रा गई। “मुझे माफ कर दे।”
नंदिनी ने कोई उत्तर नहीं दिया।
रोहित ने अर्जुन की तरफ देखा। “मुझे पता था कि वह ठीक नहीं है। वह रात में फोन करती थी, फिर खुद ही कह देती थी कि सब ठीक है। मैं मान लेता था। आसान था।”
नंदिनी ने कमजोर आवाज में कहा, “रोहित, यह सब मत करो।”
रोहित ने सिर हिलाया। “नहीं। अब नहीं। एक बात अर्जुन को जाननी चाहिए।”
नंदिनी का चेहरा तना। “कृपया…”
रोहित ने मोबाइल निकाला। “तलाक के कागज साइन होने से एक रात पहले उसने मुझे यह आवाज संदेश भेजा था। मैं महीनों से इसे सुनता हूँ और खुद से शर्मिंदा होता हूँ। आज इसे छिपाना अपराध होगा।”
कमरे में सन्नाटा फैल गया। रोहित ने संदेश चला दिया।
नंदिनी की आवाज आई, टूटी हुई, धीमी, मगर साफ।
“रोहित भैया, अर्जुन ने कहा है कि शायद तलाक ठीक रहेगा। मैं उसे दोष नहीं देती। सच में नहीं देती। मैं खुद से थक गई हूँ। उसे लगता होगा कि मैं अब उससे प्यार नहीं करती, पर सच यह है कि कुछ दिन ऐसे होते हैं जब मुझे सांस लेना भी याद नहीं रहता। मैं उसे पकड़कर रोकना चाहती हूँ, पर मुझे डर है कि वह मुझे बोझ समझेगा।”
अर्जुन का शरीर जैसे पत्थर बन गया।
आवाज आगे बढ़ी।
“मैंने उसे संदेश भेजे। थेरेपी में आने को कहा। फिर मिटा दिए। मुझे शर्म आई। सोचा, जिसे रहना होगा, वह बिना कहे रुक जाएगा। और अगर वह थक गया है, तो उसे मेरे और टूटने से पहले चला जाना चाहिए।”
नंदिनी रो रही थी, पर बिना आवाज। रोहित की आँखें भी लाल थीं। अर्जुन ने पहली बार उसकी पीड़ा को बिना किसी पर्दे के सुना। उस समय सुना, जब वह खुद मान चुका था कि नंदिनी ने उसे प्यार करना छोड़ दिया है।
संदेश की आखिरी पंक्ति कमरे की दीवारों पर जैसे स्थिर हो गई।
“अर्जुन से कहना यह उसकी गलती नहीं है… लेकिन मेरे एक हिस्से को उम्मीद थी कि वह पूछेगा, मुझे सच में क्या दर्द है।”
संदेश बंद हो गया।
काफी देर कोई नहीं बोला।
नंदिनी ने काँपती आवाज में कहा, “मैं नहीं चाहती थी कि तुम यह सुनो।”
अर्जुन ने पूछा, “क्यों?”
“क्योंकि मैं नहीं चाहती कि तुम अपराधबोध से लौटो। मुझे दया नहीं चाहिए। मुझे किसी का डर से निभाया रिश्ता नहीं चाहिए।”
यह बात सबसे सच्ची थी। नंदिनी अब वह स्त्री नहीं बनना चाहती थी जो दूसरों को असहज न करने के लिए खुद को चुप करा दे। वह प्रेम चाहती थी, पर ऐसा प्रेम नहीं जो पछतावे की जंजीर से बँधा हो।
रोहित ने सिर पकड़ लिया। “मैं भी गलत था। मुझे लगा पैसे भेज देना काफी है। बहन को फीस चाहिए, दवा चाहिए, किराया चाहिए। पर उसे भाई की आवाज चाहिए थी। मैंने हिसाब भेजा, सहारा नहीं।”
नंदिनी ने उसे तुरंत माफ नहीं किया। और यह जरूरी भी नहीं था। कुछ रिश्ते अपराध स्वीकार करने से ठीक नहीं होते। उन्हें समय, उपस्थिति और बार-बार चुनी गई ईमानदारी चाहिए होती है।
अर्जुन ने डॉक्टर से पूरा इलाज समझा। उसने अपनी बीमा कंपनी से मेडिकल कवर की जानकारी निकाली। सामाजिक कार्यकर्ता से बात की। स्कूल प्रशासन से अवकाश प्रक्रिया पूछी। उसने पहली बार नंदिनी के जीवन को समस्या की तरह नहीं, जिम्मेदारी की तरह देखा।
लेकिन उसने खुद को नायक नहीं समझा।
उस रात, जब रोहित चाय लेने बाहर गया, अर्जुन नंदिनी के बिस्तर के पास बैठा। उसकी आवाज धीमी थी।
“मैं तुम्हारे साथ जो हुआ उसे बदल नहीं सकता।”
नंदिनी ने कहा, “नहीं।”
“मैं डर गया था। तुम्हारी चुप्पी को मैंने अपने खिलाफ फैसला मान लिया। मैं खुद को पीड़ित समझता रहा, क्योंकि यह मानना आसान था कि तुम बदल गई हो। यह मानना मुश्किल था कि तुम डूब रही थीं और मैं किनारे से देख रहा था।”
नंदिनी ने अपनी उँगलियाँ मोड़ लीं। “मैंने भी बहुत छिपाया।”
“हाँ,” अर्जुन ने कहा, “पर मैं तुम्हारा पति था। मुझे सिर्फ सुनना नहीं, पूछना भी था। बार-बार पूछना था।”
नंदिनी ने उसकी ओर देखा। इस बार उसकी आँखों में पुरानी कोमलता नहीं थी, पर पूरी कठोरता भी नहीं थी। वहाँ सच था।
“तो बदलो, अर्जुन। मेरे लिए नहीं। इसलिए बदलो क्योंकि आधे मन से किया गया प्रेम भी किसी को घायल कर सकता है।”
यह वाक्य अर्जुन के भीतर बैठ गया।
अगले दिन आसान नहीं थे। अस्पताल का कमरा किसी फिल्म का दृश्य नहीं बना। कोई अचानक गले लगकर सब ठीक नहीं हुआ। कागज भरे गए, दवाओं की मात्रा बदली गई, मनोचिकित्सक से लंबी मुलाकात हुई, रातों में नंदिनी घबराकर उठ बैठती। कभी कहती, “मुझे घर नहीं जाना।” कभी कहती, “मुझे किसी पर निर्भर नहीं होना।”
अर्जुन वहीं रहा। पर उसने उसकी जिंदगी पर अधिकार नहीं जताया। उसने सिर्फ मौजूद रहना सीखा।
रोहित हर 10 दिन जयपुर से आने लगा। शुरू में नंदिनी उससे ज्यादा बात नहीं करती। फिर एक दिन अस्पताल की कैंटीन में उसने उससे चाय मँगवाई। 2 हफ्ते बाद उसने उसे अपने स्कूल के बच्चों की बनाई राखियों की तस्वीर दिखाई। 1 महीने बाद दोनों ने बचपन की बात पर हल्की हँसी बाँटी—कैसे नंदिनी हमेशा आखिरी गुलाब जामुन छिपाकर रखती थी और रोहित फिर भी ढूँढ लेता था। वह हँसी छोटी थी, मगर सचमुच जीवित थी।
अर्जुन को अपने घर में भी सच बोलना पड़ा। जब उसकी माँ ने फोन पर कहा, “बेचारी, पर हमें बताया भी तो नहीं,” तो उसने पहली बार बात काटी।
“माँ, हमने देखा था। सबने देखा था। बस किसी ने असुविधा उठाना नहीं चाहा।”
फोन के उस पार चुप्पी रही।
फिर उसकी माँ अस्पताल आईं। हाथ में प्रसाद था, पर इस बार सलाह नहीं थी। उन्होंने नंदिनी के सिर पर हाथ रखा और सिर्फ कहा, “बेटा, माफ कर सके तो करना। न कर सके तो भी हम सुनेंगे।”
नंदिनी ने आँखें भरकर उन्हें देखा। उसने माफ नहीं किया, पर उसने मुँह नहीं मोड़ा। कभी-कभी शुरुआत इतनी ही होती है।
7 दिन बाद नंदिनी अस्पताल से घर लौटी। अर्जुन ने उसे उसके दिल्ली वाले फ्लैट तक छोड़ा। रास्ते में ट्रैफिक था, सिग्नल लंबे थे, ऑटो रिक्शा की आवाजें थीं, सड़क किनारे चाय बेचने वाला था। जिंदगी वही थी, मगर उनके बीच कुछ बदल चुका था।
घर पहुँचने से पहले अर्जुन ने पूछा, “कुछ खाना है?”
नंदिनी ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा, “मालवीय नगर वाली दुकान से आलू टिक्की।”
अर्जुन ने गाड़ी रोकी। 2 प्लेट लीं। नंदिनी ने अपनी प्लेट से एक टुकड़ा तोड़कर उसकी ओर बढ़ा दिया। यह प्रेम की घोषणा नहीं थी। यह तलाक रद्द करने का संकेत नहीं था। यह बस इतना था कि जो कुछ पूरी तरह मर चुका लग रहा था, उसमें कहीं बहुत भीतर अभी भी एक छोटी गर्माहट बची थी।
समय धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
नंदिनी ने नियमित उपचार शुरू किया। उसने स्कूल से कुछ महीनों की छुट्टी ली, फिर आधे दिन लौटना शुरू किया। उसने एक सहायता समूह जॉइन किया, जहाँ औरतें गर्भहानि, अवसाद, घबराहट और समाज की बेरहम चुप्पियों पर खुलकर बात करती थीं। पहली बार उसने बिना शर्म कहा, “आज मैं ठीक नहीं हूँ।”
अर्जुन ने भी परामर्श लेना शुरू किया। उसे समझ आया कि शांत आदमी हमेशा संवेदनशील नहीं होता। कभी-कभी वह सिर्फ संघर्ष से भागना जानता है। उसने सीखा कि किसी के दर्द को ठीक करने की जल्दबाजी भी दर्द को छोटा कर देती है। पहले सुनना पड़ता है। बिना बहाना, बिना सलाह, बिना यह कहे कि “सब ठीक हो जाएगा।”
वे दोबारा शादीशुदा नहीं हुए।
बहुत लोगों को यह बात समझ नहीं आई। रिश्तेदारों ने कहा, “इतना सब किया, फिर साथ क्यों नहीं?” कुछ ने फुसफुसाकर कहा, “अब तलाकशुदा होकर भी मिलना ठीक है क्या?” पर नंदिनी ने पहली बार समाज की आवाज से ज्यादा अपनी सांसों को महत्व दिया।
वह अर्जुन से मिलती थी। कभी अस्पताल की फॉलो-अप मुलाकात में, कभी कॉफी पर, कभी उस पार्क में जहाँ वे शादी के पहले घूमने जाया करते थे। उनके बीच अब कोई झूठा दावा नहीं था। अर्जुन उसे वापस पाने की कोशिश नहीं करता था। नंदिनी उसे सजा देने की कोशिश नहीं करती थी। दोनों बस सच के साथ बैठना सीख रहे थे।
एक शाम लोधी गार्डन की बेंच पर बैठी नंदिनी ने कहा, “मैंने सालों तक सोचा कि लोग मुझे तभी प्यार करेंगे जब मैं किसी को परेशान न करूँ।”
अर्जुन ने लंबे मौन के बाद कहा, “और मैंने सालों तक सोचा कि घर में मौजूद रहना ही साथ होना है।”
नंदिनी ने हल्की मुस्कान दी। वह मुस्कान खुशी की पूरी धूप नहीं थी। वह उस दीपक जैसी थी जो आँधी के बाद भी बुझने से बच गया हो।
अस्पताल का वह गलियारा अर्जुन को उसका विवाह वापस नहीं दे पाया।
पर उसने उसे वह सच दे दिया जिससे वह जिंदगी भर भागता रहा था।
और नंदिनी को भी एक नया सच मिला—कि टूटना कमजोरी नहीं, अकेले टूटते रहना अन्याय है।
अब जब कभी घबराहट उसके दरवाजे पर दस्तक देती, कमरे में सिर्फ अंधेरा नहीं होता। कहीं न कहीं फोन बजता। कोई जवाब देता। कोई कहता, “बोलो, क्या दर्द है?”
क्योंकि किसी को खोना हमेशा उसके घर छोड़कर जाने से नहीं होता।
कभी-कभी हम उसे हर उस पल खोते हैं, जब वह चुपचाप मदद माँगता है और हम सुविधा के लिए सुनना बंद कर देते हैं।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.