
भाग 1
राज मल्होत्रा उस दोपहर पहाड़ से नीचे उतर चुका था, लेकिन 1 चीख ने उसे फिर जलते जंगल की तरफ दौड़ा दिया। मसूरी के पास की घाटी आग से लाल नहीं, राख जैसी काली हो चुकी थी। देवदार के पेड़ चटख रहे थे, धुआं सड़क तक आ रहा था, और पुलिस बार-बार लाउडस्पीकर पर चिल्ला रही थी कि कोई भी वापस अंदर न जाए। राज की जीप सुरक्षित मोड़ पर खड़ी थी। घर पर उसका 7 साल का बेटा कबीर इंतजार कर रहा था। फिर भी जब धुएं के बीच से किसी औरत की आवाज आई, तो राज ने गाली दी, अपनी गमछी पानी में भिगोई और भाग पड़ा।
लोग उसे पागल कह रहे थे। किसी ने पीछे से चिल्लाया — अरे भाई, मर जाएगा! पर राज रुकने वाला नहीं था। वह पहले फौजी नहीं था, न कोई बड़ा हीरो। वह देहरादून में छोटा ठेकेदार था, जिसने जिंदगी में बस 1 बात सीखी थी—किसी को पीछे छोड़ना पाप होता है। रास्ता राख से ढका था। उसकी आंखें जल रही थीं। सांस लेना ऐसा लग रहा था जैसे सीने में अंगारे भर रहे हों।
करीब 30 कदम आगे उसे वह औरत दिखी। वह एक चट्टान के सहारे बैठी थी, दाहिना पैर अजीब तरह से मुड़ा हुआ, माथे से खून नहीं बल्कि धुएं और मिट्टी की काली लकीर बह रही थी। उसके महंगे ट्रेकिंग जूते टूट चुके थे, लेकिन आंखों में डर से ज्यादा जिद थी।
— वापस जाइए, उसने भारी आवाज में कहा। आप मुझे नहीं बचा पाएंगे।
राज उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया।
— ये फैसला मेरा है।
— आपको पता भी नहीं मैं कौन हूं।
— अभी इससे फर्क नहीं पड़ता।
उसने अपना भीगा गमछा उसके सिर पर रखा और उसे उठाने लगा। औरत दर्द से कांपी, लेकिन चीखी नहीं।
— नाम? राज ने पूछा।
— आर्या मेहरा।
राज एक पल को ठिठका। मेहरा नाम उसने अखबारों में पढ़ा था। सौर ऊर्जा कंपनी, बड़े प्रोजेक्ट, सरकारी विवाद। पर यह सोचने का समय नहीं था। उसने आर्या को बाहों में उठाया और वापस मुड़ा। आग अब रास्ते को काट चुकी थी।
आर्या ने कांपती उंगली से बाईं तरफ इशारा किया।
— उधर… पुरानी चरवाहा पगडंडी है। वहां पत्थर ज्यादा हैं, आग धीमी चलेगी।
राज ने बिना सवाल किए दिशा बदली। धुएं में दोनों करीब 15 मिनट पत्थरों के नीचे झुके रहे। आग उनके आसपास से गुजरी, जैसे कोई दानव सांस लेता हुआ निकल गया हो। राज की हथेलियां जल गईं, आर्या बेहोशी में बुदबुदाती रही, फिर भी दोनों जिंदा रहे।
जब वे आखिर सड़क तक पहुंचे, राज लगभग गिर पड़ा। उसने आर्या को जीप में बैठाया, खुद स्टीयरिंग पर झुका और अस्पताल की तरफ चल पड़ा। रास्ते भर आर्या ने कुछ नहीं कहा। बस अपनी राख से भरी जैकेट के अंदर 1 छोटा जल चुका बैग कसकर पकड़े रही।
अस्पताल में डॉक्टर ने कहा कि उसका टखना टूट गया है, धुएं का असर है, पर जान बच जाएगी। राज को हल्की जलन और खांसी थी। वह चुपचाप बाहर बैठा खराब चाय पी रहा था, तभी नर्स आई।
— आर्या मेहरा आपसे मिलना चाहती हैं।
राज अंदर गया। आर्या बिस्तर पर सीधी बैठी थी, पैर पर प्लास्टर, आंखों में नींद नहीं।
— राज जी, उसने धीरे कहा, वह जंगल की आग हादसा नहीं थी।
राज ने कप नीचे रख दिया।
— मतलब?
आर्या ने अपना जला हुआ बैग खोला और उसमें से काले पड़े कागज निकाले।
— किसी ने जानबूझकर आग लगाई। और अगर आपने मुझे न निकाला होता, तो आज सिर्फ मैं नहीं मरती… सच भी मर जाता।
भाग 2
राज ने सोचा आर्या दर्द और धुएं के असर में बोल रही है, लेकिन उसके कागजों ने उसकी हंसी रोक दी। पहाड़ी जमीन के नक्शे बदले गए थे, संरक्षित जंगल को बंजर दिखाया गया था, और “हिमालय विस्टा रिजॉर्ट” नाम की लग्जरी टाउनशिप के लिए झूठी मंजूरियां ली गई थीं। आर्या की कंपनी को वहां सौर ऊर्जा का ठेका नहीं मिला था, पर सर्वे करते समय उसकी टीम ने गड़बड़ी पकड़ी थी। उसने खुद जांच शुरू की, और उसी दिन उसे असली फाइलें मिलीं।
— जिन लोगों ने ये किया है, वे मंत्री, अफसर और बिल्डर सबको खरीद चुके हैं, आर्या ने कहा। मैं पुलिस के पास खाली आरोप लेकर नहीं जा सकती थी।
राज ने उसे पागल कहा, पर अगले ही सुबह वह उसके साथ फिर घाटी में था। प्लास्टर के बावजूद आर्या बैसाखी पर राख से भरे रास्ते पर चली। एक जली हुई झाड़ी के पीछे लोहे का डिब्बा मिला—पेन ड्राइव, जमीन के दस्तावेज, तस्वीरें, भुगतान की रसीदें। तभी नीचे से 2 आदमी आते दिखे।
— साहब ने कहा है, उस औरत की कोई चीज बचनी नहीं चाहिए, उनमें से 1 बोला।
राज और आर्या टूटे पेड़ के पीछे सांस रोके बैठे रहे। तब राज को पहली बार समझ आया कि यह सिर्फ जमीन का मामला नहीं, हत्या की कोशिश थी।
देहरादून लौटकर उन्होंने पत्रकार निखिल सेन से संपर्क किया। निखिल 6 महीने से उसी कंपनी के पैसों का पीछा कर रहा था। उसने बताया कि हिमालय विस्टा के पीछे “सूर्यांत होल्डिंग्स” नाम की कंपनी है, जिसके मालिक का चेहरा कहीं नहीं दिखता।
आर्या ने सरकारी आयोग में शिकायत की, लेकिन आयुक्त भसीन ने मुस्कुराकर कहा—
— आप ठेका हार गईं, इसलिए बदला ले रही हैं।
उसी रात आर्या के ऑफिस में चोरी हुई। निखिल के घर पर हमला हुआ। फिर भी खबर छप गई। सुबह तक पूरा देश पूछ रहा था कि पहाड़ किसने बेचे।
राज को लगा सच जीतने लगा है। तभी उसकी पूर्व पत्नी रमा का फोन आया। उसकी आवाज टूट रही थी।
— राज… कबीर स्कूल से घर नहीं आया। किसी ने कहा तुम उसे लेने आए थे।
राज की सांस रुक गई। उसी पल अज्ञात नंबर से कॉल आया।
— आपका बेटा हमारे पास है, आवाज बेहद शांत थी। आर्या झूठ बोलेगी, खबर वापस होगी… वरना 24 घंटे बाद आप सिर्फ पछतावा गिनेंगे।
भाग 3
राज के हाथ से फोन गिरते-गिरते बचा। कमरे में आर्या, निखिल और होटल की पीली रोशनी थी, लेकिन उसे सब धुंधला दिख रहा था। कबीर… उसका छोटा बच्चा, जो रात को डर लगने पर आज भी उसके कमरे में आकर सो जाता था, उन लोगों के पास था जिनके लिए इंसान सिर्फ रास्ते की रुकावट थे। फोन से आवाज फिर आई।
— बच्चे से बात कर लो। लेकिन समझदारी से।
कुछ सरसराहट हुई। फिर कबीर की आवाज आई।
— पापा?
राज की आंखें भर आईं, लेकिन उसने आवाज संभाली।
— हां बेटा, मैं हूं। तू ठीक है?
— उन्होंने कहा आप मेरे दोस्त हैं। आपने भेजा है। पर पापा, मुझे घर जाना है।
राज ने दीवार पकड़ी।
— मैं आ रहा हूं। बस जो कहें, वैसा कर। भागना मत। उन्हें नाराज मत करना।
— आप सच में आएंगे?
— 100 बार आऊंगा। तू बस बहादुर बना रह।
फोन वापस उस आदमी के पास चला गया।
— 24 घंटे। आर्या मेहरा कैमरे पर कहेगी कि सबूत झूठे हैं। निखिल खबर वापस लेगा। आप कहेंगे कि आपको भ्रमित किया गया। बच्चे को सुबह छोड़ देंगे।
कॉल कट गया।
रमा को सच बताना राज की जिंदगी का सबसे कठिन काम था। वह फोन पर रोई, चिल्लाई, बोली कि राज ने अपने पागलपन में उनके बच्चे को खतरे में डाल दिया। राज ने कोई सफाई नहीं दी, क्योंकि आधी बात सच थी। अगर वह उस दिन आग में न गया होता, तो शायद कबीर सुरक्षित होता। पर अगर वह न गया होता, तो आर्या मर जाती, जंगल बिक जाता, और वे लोग और भी ताकतवर हो जाते।
आर्या ने फोन उठाया और निखिल की तरफ देखा।
— हमें झूठ बोलना होगा।
राज ने उसे घूरा।
— क्या?
— सचमुच नहीं। बस उन्हें विश्वास दिलाना होगा कि हम टूट गए हैं। जितना समय चाहिए, उतना खरीदना होगा।
निखिल ने अपना लैपटॉप खोला। उसकी उंगलियां तेजी से चलने लगीं।
— सूर्यांत होल्डिंग्स की 1 खाली बिल्डिंग है, सहस्रधारा रोड से आगे पुराना औद्योगिक इलाका। कागजों में बंद, लेकिन पिछले 2 साल से बिजली-पानी के बिल चल रहे हैं।
— कबीर वहां हो सकता है? राज ने पूछा।
— पक्का नहीं। पर शुरुआत है।
आर्या ने अपने एक पुराने संपर्क को कॉल किया—विक्रम राणा, पूर्व सेना अधिकारी, अब निजी सुरक्षा सलाहकार। वह पहले आर्या की कंपनी के पहाड़ी प्रोजेक्ट में सुरक्षा देख चुका था और आर्या पर एहसानमंद था क्योंकि उसने उसके ऊपर लगे झूठे आरोपों में साथ दिया था। 1 घंटे बाद विक्रम होटल के कमरे में था। ऊंचा कद, शांत चेहरा, और आंखें ऐसी जैसे डर उसके आसपास से होकर गुजर जाता हो, अंदर नहीं जाता।
उसने सब सुना। फिर बोला—
— पुलिस?
— कौन-सी पुलिस? राज ने कड़वे स्वर में कहा। वही जो आग को हादसा लिख रही है?
विक्रम ने सिर हिलाया।
— ठीक है। लेकिन कोई हीरोपंती नहीं। बच्चा पहले। सबूत बाद में। बदला कभी नहीं।
रात 9 बजे वे पुरानी बिल्डिंग के पास पहुंचे। औद्योगिक इलाके में कुत्ते भौंक रहे थे, सड़क के किनारे बंद कारखानों की दीवारों पर राजनीतिक पोस्टर आधे फटे थे। बिल्डिंग के ऊपर 2 खिड़कियों में रोशनी थी। बाहर 3 गाड़ियां खड़ी थीं। निखिल ने कैमरा और रिकॉर्डर छिपा लिया। आर्या कार में रही, क्योंकि उसका पैर अभी भी साथ नहीं दे रहा था, पर उसकी आंखों में वही आग थी जो राज ने जंगल में देखी थी।
विक्रम ने पीछे का ताला खोला। राज का दिल हर कदम पर धड़क नहीं, टकरा रहा था। उसे कबीर की आवाज याद आ रही थी—“आप सच में आएंगे?” वह वादा झूठ नहीं हो सकता था।
दूसरी मंजिल पर 2 आदमी दरवाजे के बाहर बैठे थे। विक्रम ने इशारे से सबको रुकाया। फिर उसने बिजली के पैनल का स्विच गिरा दिया। गलियारा अंधेरे में डूबा। गार्ड हड़बड़ा कर उठे। विक्रम छाया की तरह आगे बढ़ा। 1 को उसने दीवार से टकराया, दूसरे का हाथ मोड़ा, हथियार नीचे गिरा। सब कुछ 10 सेकंड में खत्म हो गया।
राज ने दरवाजा खोला। कमरे के कोने में कबीर गद्दे पर बैठा था। उसकी आंखें लाल थीं, बाल बिखरे हुए, लेकिन वह जिंदा था।
— पापा!
राज ने उसे सीने से चिपका लिया। वह कुछ बोल नहीं पाया। बस उसके सिर को बार-बार चूमता रहा।
— माफ कर दे बेटा… माफ कर दे।
— आपने कहा था आएंगे, कबीर ने उसके कंधे में चेहरा छिपाते हुए कहा। आप आ गए।
वे नीचे की तरफ भागे, पर मुख्य हॉल में रोशनी जल उठी। सामने 4 आदमी खड़े थे। उनके बीच एक सफेद कुरते और महंगे नेहरू जैकेट वाला व्यक्ति था। चेहरे पर वही मुस्कान, जो मंदिर में दान देते वक्त भी सौदा गिनती है।
आर्या लंगड़ाती हुई अंदर आई। उसने उसे देखते ही कहा—
— समर प्रताप राठौर।
राज ने नाम सुना था। रियल एस्टेट साम्राज्य, टीवी चैनलों पर दानवीर छवि, नेताओं के साथ तस्वीरें।
राठौर मुस्कुराया।
— आर्या मेहरा। आपने बहुत शोर कर दिया।
— आग आपने लगवाई।
— सफाई करवानी थी। कागज बहुत खतरनाक थे।
— और बच्चा?
— कारोबार में भावनाएं महंगी पड़ती हैं। आपके दोस्त ने भावनाओं को कमजोरी बना लिया।
राज ने कबीर को अपने पीछे कर लिया।
— रास्ता छोड़।
राठौर ने हल्का सा सिर टेढ़ा किया।
— आप जैसे लोग यही गलती करते हैं। सोचते हैं कि साहस से व्यवस्था बदल जाएगी। व्यवस्था पैसों से चलती है।
— नहीं, आर्या ने अपना फोन ऊपर उठाया। कभी-कभी रिकॉर्डिंग से भी चलती है।
राठौर के चेहरे से मुस्कान 1 सेकंड को गायब हुई। निखिल पीछे से निकला। उसके कैमरे की लाल बत्ती जल रही थी।
— आपकी हर बात लाइव बैकअप पर जा चुकी है, निखिल बोला। मेरे संपादक, 2 वकील और 1 केंद्रीय एजेंसी अभी सुन रहे हैं।
राठौर ने अपने आदमियों की तरफ देखा। तभी बाहर सायरन सुनाई दिया। विक्रम ने पहले ही आर्या के संपर्कों के जरिए केंद्रीय जांच एजेंसी और वन अपराध शाखा को लोकेशन भेज दी थी। दरवाजे टूटे। अधिकारी अंदर घुसे। राठौर भाग नहीं पाया। उसके आदमी हथियार छोड़कर जमीन पर बैठ गए।
कबीर राज से चिपका रहा। जब अधिकारी राठौर को हथकड़ी लगा रहे थे, वह आदमी पहली बार छोटा दिखा। उसके महंगे कपड़े भी उसे बचा नहीं पा रहे थे।
अगली सुबह अखबारों में आग, नकली नक्शे, काले पैसे, अपहरण और राजनीतिक संरक्षण की पूरी कहानी छपी। हिमालय विस्टा प्रोजेक्ट रोक दिया गया। आयुक्त भसीन निलंबित हुआ। कई अफसरों पर जांच बैठी। राठौर का चेहरा चैनलों पर दिन भर दिखता रहा, लेकिन इस बार दानवीर नहीं, आरोपी के रूप में।
राज को लगा सब खत्म हो गया, पर सच में कहानी अब भीतर शुरू हुई थी। कबीर रात को चीखकर उठता। स्कूल जाने से डरता। अजनबी गाड़ियों को देखकर राज का हाथ पकड़ लेता। रमा ने राज से कहा—
— मैंने गुस्से में बहुत कहा, पर तूने उसे वापस लाया। अब उसे ठीक भी करना होगा।
राज ने सिर झुका कर कहा—
— हम दोनों करेंगे।
पहली सुनवाई 3 हफ्ते बाद दिल्ली की विशेष अदालत में हुई। कोर्ट में पत्रकार, पर्यावरण कार्यकर्ता, पहाड़ के गांवों से आए लोग और राठौर के महंगे वकील सब मौजूद थे। आर्या बिना बैसाखी के आई, लेकिन चलने में हल्की तकलीफ थी। निखिल फाइलें लेकर बैठा था। राज पीछे बैठना चाहता था, पर कबीर ने उसका हाथ पकड़ा।
— पापा, आप बोलोगे?
राज ने उसकी तरफ देखा।
— डर लग रहा है।
कबीर ने धीरे कहा—
— मुझे भी। फिर भी हम आए हैं।
जब आर्या का नाम पुकारा गया, वह गवाही के लिए खड़ी हुई। उसने कोर्ट को बताया कि कैसे जमीन के नक्शे बदले गए, कैसे जंगल को बंजर दिखाया गया, कैसे आग लगाकर सबूत मिटाने की कोशिश हुई। उसकी आवाज शांत थी, लेकिन हर शब्द हथौड़े की तरह गिर रहा था।
— उन्होंने मुझे जलते जंगल में मरने के लिए छोड़ दिया, उसने कहा। पर जिस आदमी ने मुझे बचाया, उसे चुप कराने के लिए उसके 7 साल के बच्चे को उठा लिया गया। यह सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं है। यह डर को कानून से बड़ा साबित करने की कोशिश थी।
फिर राज को बुलाया गया। उसके पैर भारी थे। वह माइक के सामने खड़ा हुआ और कोर्ट की लकड़ी की दीवारों को देखते हुए बोला—
— मैं बड़ा आदमी नहीं हूं। मैं कानून की भाषा नहीं जानता। उस दिन मैंने आग में किसी कंपनी, किसी घोटाले या किसी प्रोजेक्ट को नहीं देखा था। मैंने बस 1 इंसान को मदद मांगते सुना। मैंने उसे उठाया। शायद वही मेरी गलती भी थी और वही मेरा सही फैसला भी।
उसने राठौर की तरफ देखा।
— आपने मेरे बेटे को स्कूल से उठवाया। उसे कहा कि उसके पिता ने भेजा है। आपने 1 बच्चे के भरोसे को हथियार बनाया। पैसा चोरी हो जाए तो वापस आ सकता है। जमीन बचाई जा सकती है। लेकिन बच्चे के मन से डर निकालने में साल लगते हैं। मैं अदालत से बस इतना चाहता हूं कि जो लोग बच्चों के डर पर अपना साम्राज्य बनाते हैं, उन्हें कभी खुला मैदान न मिले।
कोर्ट में सन्नाटा था। राठौर ने पहली बार नजरें झुका लीं।
न्यायाधीश ने जमानत खारिज कर दी। जांच का दायरा बढ़ाया गया। सरकारी अधिकारियों के नाम भी रिकॉर्ड में आए। बाहर निकलते समय पहाड़ के 1 बुजुर्ग ने राज के पैर छूने चाहे। राज पीछे हट गया।
— ऐसा मत कीजिए।
बुजुर्ग ने कहा—
— तुमने सिर्फ 1 औरत नहीं बचाई बेटा। तुमने हमारा पहाड़ बचाया।
कई महीने बीते। जंगल में नई घास उगने लगी। कोर्ट केस चलता रहा, लेकिन राठौर की दुनिया टूट चुकी थी। आर्या ने अपनी कंपनी के जरिए उस इलाके में सौर ऊर्जा और वर्षा जल संरक्षण का सामुदायिक प्रोजेक्ट शुरू किया। निखिल की रिपोर्ट को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, पर उसने कहा कि असली पुरस्कार वह सुबह थी जब कबीर जिंदा मिला।
राज अब भी साधारण जीवन जीता था। काम पर जाता, शाम को कबीर को लेने स्कूल पहुंचता, और हर रात घर के दरवाजे का ताला 2 बार जांचता। आर्या कभी-कभी उनके घर आती। रमा भी अब उसे शक की नजर से नहीं देखती थी। कबीर उसे “आर्या आंटी” कहता और पूछता कि पहाड़ सच में ठीक हो जाएगा क्या।
एक रविवार राज, कबीर और आर्या उसी घाटी में गए। जहां कभी आग थी, वहां काली मिट्टी से छोटे हरे पौधे निकल आए थे। हवा में अब धुएं की जगह गीली मिट्टी की खुशबू थी। कबीर ने 1 छोटा पौधा लगाया और उसके पास मिट्टी दबाई।
— पापा, अगर उस दिन आप वापस नहीं जाते तो?
राज ने दूर पहाड़ों को देखा। आर्या चुप खड़ी थी।
— तो शायद आज हम यहां नहीं होते।
कबीर ने मासूमियत से पूछा—
— और अगर फिर कभी कोई मदद मांगे?
राज घुटनों के बल बैठा, उसके कंधे पर हाथ रखा।
— तब पहले डर को देखना। फिर सही काम करना। बहादुरी का मतलब मरने दौड़ना नहीं होता। बहादुरी का मतलब है किसी को अकेला न छोड़ना।
आर्या की आंखें भर आईं। उसने कुछ नहीं कहा। बस उस छोटे पौधे के पास 1 और मुट्ठी मिट्टी डाल दी।
शाम को पहाड़ों पर धूप सुनहरी हो रही थी। जले हुए तनों के बीच नई पत्तियां चमक रही थीं। राज ने कबीर का हाथ पकड़ा, आर्या उनके साथ चल दी। पीछे वह छोटा पौधा हवा में हल्का सा हिल रहा था, जैसे राख से निकली जिंदगी कह रही हो—सच देर से सही, पर अगर कोई उसे उठाने लौट आए, तो वह जलकर भी फिर हरा हो सकता है।