
भाग 1
5 साल के बेटे आरव के सुनहरे घुँघराले बाल जबरदस्ती मुंडवाने के बाद, दादी शकुंतला ने मुस्कुराकर कहा, “अब जाकर लड़का लड़का लग रहा है,” और दरवाजे पर खड़ा वह बच्चा अपनी मुट्ठी में आखिरी कटी हुई लट दबाए फूट-फूटकर रो रहा था।
मीरा कुछ पल तक सांस लेना भूल गई। सामने उसका बेटा खड़ा था, वही आरव जिसके बाल धूप में शहद जैसे चमकते थे, जिनकी छोटी-छोटी लटें माथे पर गिरतीं तो पड़ोस की आंटियां कहतीं, “अरे, बिल्कुल भगवान कृष्ण जैसा बच्चा है।” लेकिन आज उसका सिर जगह-जगह से असमान मुंडा हुआ था। गर्दन के पीछे उस्तरे की लाल रेखाएं थीं, कान के पास बाल अधूरे कटे थे और आंखों में ऐसी चोट थी, जैसे किसी ने उससे उसका खिलौना नहीं, उसका भरोसा छीन लिया हो।
शकुंतला देवी कार से उतरीं। हाथ में कचौड़ी और जलेबी का डिब्बा था, जैसे वह किसी मंदिर से प्रसाद लेकर लौटी हों।
—इतना मुंह क्यों बना रही हो, मीरा? बाल ही तो कटवाए हैं। कल फिर उग आएंगे।
मीरा का गला सूख गया।
—आप उसे स्कूल से कैसे ले आईं?
—नाम लिखा है मेरा गार्डियन लिस्ट में। और फिर मैं उसकी दादी हूं, कोई पराई थोड़े ही हूं।
—आपने मुझसे पूछा भी नहीं।
—पूछती तो तुम नाटक करती। आजकल की मांएं बच्चों को बच्चा नहीं, फैशन शो बना देती हैं।
आरव धीरे से मीरा के पीछे छिप गया। उसकी मुट्ठी अभी भी बंद थी।
—मम्मा… क्या ये अभी भी काम आएगा?
मीरा ने उसके हाथ को खोला। भीतर सुनहरी घुँघराली लट थी, छोटी, मुलायम और बेकार हो चुकी। मीरा की आंखें भर आईं, लेकिन उसने खुद को संभाला।
—हां बेटा, काम आएगा।
पर वह जानती थी, यह झूठ था। और शायद आरव भी समझ गया था, क्योंकि उसने सिर झुका लिया।
यह सब अचानक नहीं हुआ था। शकुंतला देवी महीनों से आरव के बालों को लेकर ताने मारती रहती थीं।
—ये लड़का है या लड़की?
—हमारे खानदान के लड़के ऐसे बाल नहीं रखते।
—निखिल, अपनी बीवी को समझाओ। बच्चे को नाचने-गाने वाली शक्ल मत दो।
निखिल हर बार सख्ती से कहता था।
—मां, आरव के बाल कोई नहीं छुएगा।
शकुंतला उस समय चुप हो जातीं, लेकिन उनकी चुप्पी में मान लेना नहीं, बदला लेने का इंतजार छिपा होता था।
उस गुरुवार सुबह मीरा ने आरव को दिल्ली के द्वारका वाले स्कूल में 8:15 पर छोड़ा था। उसने नीली यूनिफॉर्म पहनी थी, पीठ पर डायनासोर वाला बैग था और बाल हल्के से रबर बैंड में बंधे थे। गेट के अंदर जाने से पहले उसने मीरा का दुपट्टा पकड़कर पूछा था—
—आज हम दीदी को अस्पताल देखने जाएंगे ना?
—हां, शाम को जाएंगे।
आरव मुस्कुराया और अंदर भाग गया।
दोपहर 12:20 पर स्कूल की रिसेप्शनिस्ट का फोन आया।
—मैम, बस कन्फर्म करना था कि आरव घर पहुंच गया ना? उसकी दादी उसे 1 घंटा पहले ले गईं। उन्होंने कहा कि घर में मेडिकल इमरजेंसी है।
मीरा के हाथ से दवा की शीशी लगभग गिर गई।
—क्या? किसने अनुमति दी?
—मैम, उनका नाम ऑथराइज्ड पिकअप में है। उन्होंने कहा आप अस्पताल में हैं और फोन नहीं उठा पाएंगी।
मीरा ने तुरंत शकुंतला को फोन लगाया। फोन बंद था। निखिल को कॉल किया, वह मीटिंग में था। ससुर, ननद, पड़ोसी, सबको फोन किया। किसी को कुछ नहीं पता था। 1 घंटा बीता। फिर 2 घंटे। मीरा खिड़की और दरवाजे के बीच पागलों की तरह चक्कर काटती रही। उसके मन में दुर्घटना, अपहरण, अस्पताल, हर डर एक साथ दौड़ रहा था।
जब सफेद कार गली में मुड़ी, मीरा दौड़कर बाहर आई। आरव पीछे की सीट से उतरा, पर वह रोज की तरह भागकर मां से नहीं लिपटा। वह धीरे-धीरे चला, जैसे हर कदम भारी हो। उसके बाल जा चुके थे।
—आरव… मेरे बच्चे… क्या हुआ?
उसके होंठ कांपे।
—दादी ने कहा मैं लड़की जैसा दिखता हूं।
शकुंतला ने डिब्बा आगे बढ़ाया।
—लो, गरम जलेबी लाई हूं। बच्चे का मूड ठीक हो जाएगा।
मीरा ने डिब्बा नहीं लिया।
—आपने मेरे बच्चे को झूठ बोलकर स्कूल से निकाला। उसे रुलाया। उसकी मर्जी के खिलाफ उसके बाल कटवाए।
—अरे, बड़ी बात बना रही हो। घर के बड़े बच्चों को सुधारते हैं तो आजकल की बहुएं कानून लेकर बैठ जाती हैं।
—वह आपका प्रोजेक्ट नहीं है। मेरा बेटा है।
—और मेरा पोता। मैं उसे तमाशा नहीं बनने दूंगी।
आरव ने रोते हुए मीरा का कुर्ता पकड़ लिया। मीरा ने उसे गोद में उठाया और दरवाजा बंद कर दिया। अंदर आकर वह सोफे पर बैठ गई। आरव उसकी छाती से चिपककर रोता रहा।
शाम को निखिल घर आया। उसने जैसे ही आरव का सिर देखा, उसकी आंखों से रंग उतर गया। उसने चाबी धीरे से मेज पर रखी, घुटनों के बल बैठा और आरव के सिर पर उंगलियां रखीं।
—किसने किया ये?
आरव ने नीचे देखते हुए कहा—
—दादी।
निखिल ने आंखें बंद कर लीं। जब उसने आंखें खोलीं, उनमें आंसू नहीं थे, ठंडा गुस्सा था।
उस रात बच्चे सो गए, लेकिन घर की हवा नहीं सोई। मीरा ने रसोई में जाकर देखा, निखिल लैपटॉप खोले बैठा था। सामने स्कूल के कागज, पिकअप फॉर्म, अस्पताल की रिपोर्ट और एक वकील का नंबर लिखा हुआ था।
—क्या कर रहे हो? मीरा ने धीमे से पूछा।
निखिल ने स्क्रीन से नजर नहीं हटाई।
—रविवार के पारिवारिक लंच की तैयारी।
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भाग 2
शनिवार सुबह शकुंतला देवी का फोन आया, जैसे कुछ हुआ ही न हो। —रविवार को सब आ रहे हैं। आलू-पूरी, छोले, दही भल्ले और गाजर का हलवा बनेगा। तुम्हारी ननद, मामा जी, 3 पड़ोसनें और मंदिर वाली सुनीता भी आएगी। एक बाल कटवाने पर कोई मुंह मत फुलाना। मीरा ने फोन पर ही कह देना चाहा कि अब वह इस घर में कदम नहीं रखेगी, लेकिन निखिल ने फोन ले लिया। —हम आएंगे, मां। फोन कटते ही मीरा फट पड़ी। —तुम्हें समझ आ रहा है उसने क्या किया है? निखिल ने कहा। —मुझे सब समझ आ रहा है। इसलिए जाना जरूरी है। सिर्फ आरव के लिए नहीं, काव्या के लिए भी। काव्या का नाम आते ही कमरे में सन्नाटा भर गया। काव्या 8 साल की थी। 9 महीने पहले उसे ल्यूकेमिया निकला था। पहले पैरों पर नीले निशान आए, फिर थकान, फिर टेस्ट, फिर वह शब्द जिसे कोई मां-बाप सुनना नहीं चाहते। कीमोथेरेपी ने उससे स्कूल, डांस क्लास, पार्क की शामें और सबसे बढ़कर उसके बाल छीन लिए थे। उसके भी बाल आरव जैसे ही थे, सुनहरे, घुँघराले और चमकदार। जब वे गुच्छों में झड़ने लगे, काव्या ने शीशा देखना बंद कर दिया। वह गुलाबी टोपी पहनकर सोती और अपनी पुरानी गुड़िया गुड्डी को सीने से चिपकाए रखती, जिसकी चोटी उसने खुद काट दी थी ताकि “वह अकेली गंजा न रहे।” एक रात अस्पताल में आरव चुपचाप काव्या के बिस्तर पर चढ़ा था। उसने उसके सिर पर हाथ फेरकर कहा था। —दीदी, तुम मत रोना। मैं अपने बाल बहुत लंबे कर लूंगा। फिर मम्मा उनसे तुम्हारे लिए विग बनवाएगी। काव्या ने पूछा था। —सच में? —पक्का वादा। उस दिन से आरव अपने बालों को खजाने की तरह संभालता था। कोई खींचता तो रो पड़ता। हर महीने पूछता, “अब इतने लंबे हुए क्या?” शकुंतला को बीमारी पता थी, मगर वादा नहीं। और सच यह था कि उन्होंने जानना जरूरी भी नहीं समझा। शनिवार रात निखिल ने मीरा से कहा। —मुझे अस्पताल वाले वीडियो चाहिए। काव्या के, आरव के, उस वादे के। रविवार दोपहर 2 बजे वे शकुंतला के घर पहुंचे। मेज पर खाना भरा था, रिश्तेदार हंस रहे थे। शकुंतला ने आरव के सिर को छूना चाहा, वह पीछे हट गया। वह फिर भी बोलीं। —देखो तो, अब कितना साफ-सुथरा लड़का लग रहा है। काव्या ने गुलाबी टोपी के नीचे से आरव का हाथ पकड़ लिया। 20 मिनट तक शकुंतला घर की रानी बनी रहीं। फिर निखिल ने चम्मच रख दिया। आवाज छोटी थी, पर पूरी मेज चुप हो गई। वह उठा, बैग से एक फाइल निकाली और मां के सामने रख दी। —हलवे से पहले ये पढ़ लो। शकुंतला मुस्कुराईं, जैसे गिफ्ट हो। लेकिन पहला पन्ना देखते ही उनका चेहरा पीला पड़ गया। —निखिल… तुम मुझे वकील का नोटिस दे रहे हो? —नहीं मां। बता रहा हूं कि आज से मेरे बच्चों पर आपका कोई अधिकार नहीं रहा।
भाग 3
शकुंतला देवी ने फाइल को ऐसे पकड़ा जैसे कागज नहीं, जलता हुआ कोयला हो।
—ये क्या बेहूदगी है? मैं तुम्हारी मां हूं।
निखिल अपनी कुर्सी के पीछे खड़ा रहा। उसकी आवाज धीमी थी, लेकिन हर शब्द धारदार था।
—और मैं आरव और काव्या का पिता हूं। मीरा उनकी मां है। आप दादी हैं, मालिक नहीं।
मेज के आसपास बैठे लोग एक-दूसरे को देखने लगे। ननद रचना ने प्लेट में रखी पूरी अधूरी छोड़ दी। मामा जी ने खांसकर माहौल हल्का करने की कोशिश की, मगर कोई नहीं हंसा। शकुंतला की पड़ोसन सुनीता, जो हर बात पर “बड़ों का सम्मान करो” कहती थी, आज चुप थी।
शकुंतला ने पहला पन्ना जोर से पढ़ा।
—स्कूल पिकअप अनुमति रद्द… बच्चों से मिलने के लिए माता-पिता की लिखित अनुमति जरूरी… स्वास्थ्य, रूप-रंग, इलाज या स्कूल से जुड़े किसी भी निर्णय में दखल देने पर कानूनी कार्रवाई… ये सब मेरे लिए?
—हां।
—एक बाल कटवाने के लिए?
निखिल का चेहरा तन गया।
—ये बाल कटवाना नहीं था। आपने स्कूल में झूठ बोला। इमरजेंसी का बहाना बनाया। 5 साल के बच्चे को उसकी मां से छिपाकर ले गईं। उसकी इच्छा के खिलाफ उसे कुर्सी पर बैठाया। जब वह रोया, तब भी आप रुकी नहीं। आपने उसे बताया कि वह जैसा है, वैसा शर्मनाक है।
—मैंने सिर्फ उसे ठीक दिखाने की कोशिश की।
—नहीं मां। आपने उसे अपनी सोच में फिट करने की कोशिश की।
शकुंतला ने मीरा की ओर देखा।
—तुमने मेरे बेटे को मेरे खिलाफ भड़का दिया।
मीरा ने पहली बार सिर उठाया। उसके भीतर का डर उस दिन मर चुका था।
—मैंने कुछ नहीं भड़काया। आपने खुद किया।
—बहू होकर तुम मुझे सिखाओगी?
—नहीं। आज आपको आपका पोता सिखाएगा।
निखिल ने मीरा की ओर देखा।
—वीडियो चलाओ।
मीरा का हाथ कांप रहा था, लेकिन उसने पेन ड्राइव निकाली। टीवी चालू हुआ। वही टीवी जिस पर शकुंतला हर रविवार भजन लगाती थीं, आज उनके घर का सच दिखाने वाला था।
स्क्रीन पर काव्या दिखाई दी। अस्पताल के कमरे में बैठी, पीले स्वेटर में, चेहरा पीला, आंखें थकी हुईं। उसके हाथ में कंघी थी और कंघी में सुनहरे घुँघराले बाल फंसे थे। वह रो नहीं रही थी। बस कंघी को देख रही थी, जैसे समझ नहीं पा रही हो कि उसका शरीर उससे एक और चीज क्यों छीन रहा है।
रचना ने मुंह पर हाथ रख लिया।
—हे भगवान…
वीडियो बदला। काव्या ने गुलाबी टोपी पहन रखी थी। उसके पास आरव बैठा था, तब उसके बाल कानों तक आते थे। गोद में गुड्डी थी, जिसकी चोटी कटी हुई थी।
—दीदी, तुम मत रोना। मैं अपने बाल बड़े करूंगा। फिर तुम्हें मेरे जैसे कर्ली बाल मिलेंगे।
काव्या ने धीमे से पूछा।
—अगर बच्चे तुम्हारा मजाक उड़ाएंगे तो?
आरव ने कंधे उचकाए।
—तो उड़ाने दो। तुम रोती हो तो मुझे अच्छा नहीं लगता।
मेज पर बैठे लोगों की आंखें झुक गईं। शकुंतला की उंगलियां फाइल पर जमी रह गईं।
स्क्रीन पर तस्वीरें चलने लगीं। आरव आईने के सामने अपने बाल नाप रहा था। आरव स्कूल में टोपी पहनकर जा रहा था ताकि कोई बाल न खींचे। आरव अस्पताल में काव्या के पास बैठा था और काव्या पहली बार कीमो के बाद हंस रही थी, क्योंकि वह उसके बालों में उंगलियां घुमा रही थी। फिर एक वीडियो आया, कटिंग से 2 दिन पहले का। काव्या बिस्तर पर बैठी थी। आरव उसके गले लगा था। उसके बाल कंधों तक गिर रहे थे।
—बस थोड़ा और, आरू। फिर मैं फिर से अपनी जैसी लगूंगी।
टीवी काला हो गया।
कमरे में ऐसा सन्नाटा छा गया कि बाहर सब्जी वाले की आवाज भी बहुत दूर से आती लगी।
शकुंतला ने पहली बार बोलने में देर लगाई।
—मुझे… मुझे वादे के बारे में नहीं पता था।
मीरा की आवाज शांत थी।
—लेकिन आपको इतना तो पता था कि वह बाल नहीं कटवाना चाहता था।
शकुंतला चुप रहीं।
—आपको पता था निखिल ने मना किया था। आपको पता था मैंने अनुमति नहीं दी थी। आपको पता था वह स्कूल से अचानक गायब हुआ तो मैं पागल हो जाऊंगी। आपको पता था वह रो रहा था। फिर भी आपने नाई से कहा होगा, “पूरा छोटा कर दो।”
शकुंतला की आंखें भर आईं, मगर उनके चेहरे पर अभी भी अहंकार की आखिरी परत बची हुई थी।
—मैंने परिवार की इज्जत के लिए किया।
निखिल हंसा नहीं, पर उसकी आंखों में दर्द तैर गया।
—अगर किसी बच्चे के बाल से आपकी इज्जत चली जाती है, तो आपकी इज्जत बहुत कमजोर है, मां।
मामा जी ने धीरे से कहा।
—शकुंतला, गलती तो बड़ी हुई है।
शकुंतला ने उन्हें घूरा।
—अब तुम भी?
रचना ने हिम्मत करके कहा।
—मां, स्कूल से झूठ बोलकर बच्चा लाना सामान्य बात नहीं है। मैं भी मां हूं। मेरे साथ होता तो मैं भी चुप नहीं बैठती।
सुनीता पड़ोसन ने धीरे से कहा।
—कभी-कभी हम संस्कार के नाम पर नियंत्रण करने लगते हैं।
यह वाक्य शकुंतला के चेहरे पर थप्पड़ जैसा लगा। जिन लोगों के सामने वह खुद को समझदार, धार्मिक और अनुशासित दादी बताती थीं, उन्हीं लोगों के सामने उनकी जिद खुल गई थी।
निखिल ने फाइल फिर उठाई।
—आज से आप बच्चों को अकेले नहीं मिलेंगी। स्कूल, अस्पताल, ट्यूशन, मंदिर, कहीं से भी आप उन्हें नहीं ले जा सकतीं। कोई भी मुलाकात पहले हमसे पूछकर होगी। और अगर दोबारा आपने उनकी मर्जी या हमारे निर्णय के खिलाफ कुछ किया, तो रिश्ता अनिश्चित समय के लिए खत्म होगा।
—तुम अपनी मां को घर से काट दोगे?
—मैं अपने बच्चों को चोट से बचाऊंगा।
हलवा नहीं परोसा गया। लोग धीरे-धीरे उठने लगे। कुछ ने मीरा को गले लगाया। कुछ ने निखिल के कंधे पर हाथ रखा। किसी ने शकुंतला का पक्ष नहीं लिया। कोई यह कहने की हिम्मत नहीं कर पाया कि “बाल ही तो थे।”
क्योंकि अब सब देख चुके थे कि वे सिर्फ बाल नहीं थे।
वे एक 5 साल के भाई का वादा थे।
वे 8 साल की बीमार बहन की उम्मीद थे।
वे उस बच्चे की पहली बड़ी इच्छा थी, जिसे एक बड़े ने अपने अहंकार से काट दिया था।
मीरा बाहर आंगन में चली गई। बारिश अभी-अभी रुकी थी। मिट्टी की गंध हवा में थी। उसने दीवार से टिककर आंखें बंद कीं। इतने महीनों से वह मजबूत मां बनी हुई थी। अस्पताल में मजबूत। स्कूल में मजबूत। रिश्तेदारों के सामने मजबूत। लेकिन आज वह टूटना चाहती थी।
निखिल उसके पास आया।
—ठीक हो?
मीरा ने सिर हिलाया।
—नहीं।
निखिल ने उसे गले लगा लिया।
—मैं भी नहीं।
तभी पीछे से धीमे कदमों की आवाज आई। शकुंतला खड़ी थीं। अब उनके चेहरे पर वह तेज नहीं था जिससे वह सबको छोटा कर देती थीं। वह छोटी लग रही थीं, थकी हुई, हारी हुई।
—क्या मैं बच्चों से बात कर सकती हूं?
निखिल ने तुरंत जवाब नहीं दिया।
—माफ करना हमारा अधिकार नहीं है। उनसे पूछना होगा।
शकुंतला ने सिर झुका दिया।
—पूछ लो।
आरव और काव्या कार के पास बैठे थे। काव्या ने गुलाबी टोपी पहनी हुई थी और गुड्डी को सीने से लगाया था। आरव अपने असमान कटे सिर पर हाथ फेर रहा था, जैसे अब भी खोज रहा हो कि उसकी लटें कहां गईं।
शकुंतला कुछ कदम दूर रुक गईं।
—आरव।
आरव ने देखा। वह मुस्कुराया नहीं। यही बात शकुंतला को सबसे ज्यादा तोड़ गई।
—मुझे माफ कर दो बेटा। मुझे तुम्हें स्कूल से नहीं लाना चाहिए था। मुझे तुम्हारे बाल नहीं कटवाने चाहिए थे। मुझे तुम्हें लड़की जैसा कहकर रुलाना नहीं चाहिए था।
आरव ने मासूम आंखों से कहा।
—मेरे बाल फिर आ जाएंगे।
शकुंतला रो पड़ीं।
—हां, लेकिन जब तक आएंगे, मैंने तुम्हें दर्द दिया है। वह जल्दी नहीं जाएगा।
काव्या ने पहली बार पूछा।
—दादी, आपने उसके बाल क्यों काटे? वो मेरे लिए थे ना?
शकुंतला ने हाथ जोड़ लिए।
—क्योंकि मैं गलत थी। मुझे लगा जो मुझे सही दिखता है, वही सही है। मैंने यह नहीं सोचा कि तुम दोनों क्या महसूस कर रहे हो।
काव्या की आवाज कांप गई।
—मुझे उसके कर्ल्स वाली विग चाहिए थी।
आरव ने तुरंत उसका हाथ पकड़ा।
—मत रो दीदी। मैं फिर से उगाऊंगा।
इतना छोटा वाक्य था, पर वहां खड़े हर बड़े को छोटा कर गया।
शकुंतला गीले फर्श पर ही घुटनों के बल बैठ गईं।
—तू मुझसे बड़ा निकला, आरव।
आरव थोड़ा आगे आया, लेकिन गले नहीं लगा। बस बोला—
—दादी, मुझे स्कूल से कभी मत ले जाना बिना मम्मा-पापा से पूछे।
—कभी नहीं। कसम।
निखिल ने कार का दरवाजा खोला।
—चलो।
वे बिना हलवा खाए, बिना झूठी मुस्कान के, बिना “सब ठीक है” कहे लौट आए।
उस रात काव्या ने गुड्डी और आरव की बची हुई सुनहरी लट को एक छोटी डिब्बी में रखकर तकिए के पास रखा। आरव ने कहा—
—ये विग की शुरुआत है।
मीरा ने उसे सच नहीं बताया। उस एक लट से कोई विग नहीं बन सकती थी, लेकिन उस लट में जितना प्रेम था, उतना किसी दुकान में नहीं बिकता।
सोमवार को निखिल और मीरा स्कूल गए। पिकअप लिस्ट बदली गई। प्रधानाचार्या ने कई बार माफी मांगी। नियम सख्त किए गए कि बिना सीधे माता-पिता से पुष्टि के कोई बच्चा बाहर नहीं जाएगा। निखिल ने एक लिखित रिपोर्ट भी दर्ज करवाई, ताकि भविष्य में कोई रिश्तेदार “परिवार” के नाम पर सीमा पार न कर सके।
शकुंतला ने फोन नहीं किया।
मंगलवार भी गुजर गया।
बुधवार सुबह दरवाजे की घंटी बजी। मीरा ने दरवाजा खोला तो सामने शकुंतला खड़ी थीं। उनके सिर पर नीला दुपट्टा था। हाथ में सफेद डिब्बा। न माथे पर बड़ी बिंदी, न सोने की चूड़ियों की खनक, न वह अधिकार भरा चेहरा। बस एक थकी हुई औरत।
निखिल भी बाहर आ गया।
—मां?
शकुंतला ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।
—मैं जल्दी माफी मांगने नहीं आई। मैं कुछ समझाने भी नहीं आई। मैं सिर्फ एक चीज करने आई हूं।
उन्होंने दुपट्टा हटाया।
उनका सिर पूरी तरह मुंडा हुआ था।
मीरा स्तब्ध रह गई। निखिल ने कुछ नहीं कहा।
शकुंतला ने नीचे देखते हुए कहा—
—कल नाई के पास गई थी। कहा सब उतार दो। मैं जानती हूं इससे आरव का वादा वापस नहीं आएगा। यह सजा भी पूरी नहीं है। लेकिन इतने साल मैं बच्चों को बताती रही कि उन्हें कैसा दिखना चाहिए। मुझे समझ ही नहीं आया कि बाल सिर्फ शोभा नहीं होते। कभी पहचान होते हैं, कभी सहारा, कभी वादा। काव्या बीमारी से लड़ते हुए अपना बाल खो रही है। मैं अपने अहंकार से लड़ने के लिए अपने बाल खो सकती हूं।
तभी काव्या कमरे से बाहर आई। उसके पीछे आरव था।
शकुंतला नीचे बैठ गईं और सफेद डिब्बा आगे बढ़ाया।
—ये तुम्हारे लिए है, काव्या।
काव्या ने सावधानी से डिब्बा खोला। भीतर सुनहरी घुँघराली विग थी। मुलायम, लंबी, लगभग वैसी जैसी उसके पुराने बाल थे। वैसी जैसी आरव की लटें थीं।
काव्या ने उंगलियों से उसे छुआ।
—मेरी?
—हां। रविवार रात ही बनवाने का ऑर्डर दिया था। ये आरव के बालों से नहीं बनी, और मुझे पता है, वही सबसे कीमती बात थी। लेकिन जब तक उसके बाल फिर बढ़ें… अगर वह चाहे… तब तक तुम्हारे पास ये रहे।
आरव तुरंत बोला—
—मैं फिर भी बाल बढ़ाऊंगा।
काव्या ने उसे देखा।
—अब भी?
—हां। मैंने वादा किया था।
निखिल ने विग काव्या को पहनाई। वह कुछ पल स्थिर खड़ी रही, फिर धीरे-धीरे शीशे तक गई। उसने खुद को देखा। सुनहरी लटें उसके कंधों पर थीं। उसकी आंखों में चमक लौटी। फिर वह मुस्कुराई।
वह छोटी, मजबूर मुस्कान नहीं थी जो अस्पताल में डॉक्टरों को दिखाती थी। वह असली मुस्कान थी। वही, जो बीमारी से पहले आती थी।
आरव गंभीर होकर बोला—
—अब तुम फिर से तुम जैसी लग रही हो।
काव्या हंस पड़ी। मीरा की आंखों से आंसू बह निकले। निखिल ने चेहरा फेर लिया। शकुंतला चुपचाप रोती रहीं। उन्होंने बच्चों को गले लगाने की कोशिश नहीं की। कोई अधिकार नहीं जताया। बस वहीं बैठी रहीं, जैसे पहली बार समझ रही हों कि प्रेम का मतलब नियंत्रण नहीं, अनुमति मांगना भी होता है।
निखिल ने दरवाजा थोड़ा और खोला।
—अंदर आ सकती हो। लेकिन नियम वही रहेंगे।
शकुंतला ने सिर झुका दिया।
—मैं मानती हूं।
और उस दिन पहली बार निखिल को लगा कि शायद वह सच बोल रही हैं।
सब कुछ एक दिन में ठीक नहीं हुआ। भरोसा बालों की तरह बराबर-बराबर नहीं उगता। कहीं खाली जगह रह जाती है, कहीं देर लगती है, कहीं पुराना दर्द खुजली की तरह लौट आता है। पर शकुंतला ने पहली बार सीमाएं सीखनी शुरू कीं। वह आने से पहले फोन करतीं। आरव को छूने से पहले पूछतीं। काव्या को कुछ खिलाने से पहले मीरा से अनुमति लेतीं। किसी के कपड़ों, बालों या चेहरे पर टिप्पणी करने से पहले खुद को रोकतीं।
आरव कई हफ्तों तक स्कूल में टोपी पहनकर गया। बच्चे पूछते तो वह कहता—
—मेरे बाल कट गए थे, लेकिन मैं दीदी के लिए नए उगा रहा हूं।
काव्या ने 1 महीने बाद एक पारिवारिक पूजा में वह विग पहनी। पीली फ्रॉक, माथे पर छोटी बिंदी और कंधों पर सुनहरे कर्ल्स। सबने ताली बजाई। पर आरव ने ताली नहीं बजाई। वह बस गर्व से उसे देखता रहा और बोला—
—मैंने कहा था ना, तुम फिर से सुंदर लगोगी।
शकुंतला कमरे के कोने में बैठी थीं। उनके सिर पर हल्की सफेद जड़ें उगने लगी थीं। उन्होंने अपनी खोपड़ी पर हाथ फेरा और चुपचाप रो पड़ीं।
5 साल के बच्चे ने अपनी बहन के लिए जो वादा किया था, वह कई बड़े लोगों की समझ से बड़ा निकला।
और वह दादी, जो अपने पोते को “मर्द” बनाना चाहती थी, आखिर उसी बच्चे से सीख गई कि असली हिम्मत किसी का बाल काटने में नहीं, किसी के दर्द को समझने में होती है।
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