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हर रविवार दादी उसे बिना नाम वाली कड़वी शीशी पिलाती रही, बच्चा पेट पकड़कर रोता रहा, लेकिन पिता चुप रहा, अस्पताल में डॉक्टर ने कहा, “यह गलती नहीं, बार-बार दी गई दवा थी”, तब माँ का शक सच निकला और घर टूट गया जिसे सब प्यार समझते थे

PART 1

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हर रविवार, दादी 5 साल के आरव की नाक दबाकर उसके मुँह में बिना लेबल वाली कड़वी शीशी का सिरप उड़ेलती थी, और पूरा घर इसे “माँ का घरेलू इलाज” कहकर चुप रह जाता था।

उस रात काव्या ने पहली बार अपने पति रोहन की आँखों में सीधा देखकर कहा था कि अगर उसने फिर अपनी माँ का बचाव किया, तो वह सुबह होते ही आरव को लेकर यह घर छोड़ देगी। दिल्ली के लक्ष्मी नगर वाले उनके 2 कमरों के फ्लैट में रात के 11 बज रहे थे। रसोई की ट्यूबलाइट सफेद और बेरहम चमक रही थी। डाइनिंग टेबल पर छोले की कटोरी ज्यों की त्यों पड़ी थी, आरव की छोटी चप्पलें फ्रिज के पास उलटी पड़ी थीं, और कमरे के भीतर वह बच्चा घुटनों को पेट से चिपकाकर सो रहा था, जैसे नींद में भी किसी अदृश्य हाथ से खुद को बचा रहा हो।

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काव्या चिल्लाई नहीं थी। यही बात ज्यादा डरावनी थी।

“रोहन, आखिरी बार कह रही हूँ। तुम्हारी माँ हर रविवार उसे वह भूरी शीशी पिलाती हैं। हर सोमवार उसे पेट दर्द होता है। और हर बार तुम कहते हो मैं ज्यादा सोचती हूँ।”

रोहन सोफे पर बैठा मोबाइल स्क्रीन घूरता रहा।

“माँ ने 30 साल मोहल्ले की दवा दुकान में काम किया है। उन्हें पता है बच्चे को क्या देना चाहिए।”

काव्या की आँखें भर आईं, मगर आवाज नहीं टूटी।

“आरव कोई प्रयोग करने की चीज नहीं है। वह हमारा बेटा है।”

उनका जीवन कोई फिल्मी अमीरी वाला नहीं था। रोहन प्रॉपर्टी ऑफिस में काम करता था, काव्या एक निजी प्री-स्कूल में सहायक शिक्षिका थी। महीने के अंत में खर्च जोड़ना पड़ता था, गैस सिलेंडर बदलने से पहले हिसाब देखना पड़ता था, और हर रविवार रोहन की माँ सावित्री देवी के घर जाना जैसे परिवार का नियम था।

सावित्री देवी कृष्णा नगर की पुरानी गली में रहती थीं। घर में कपूर, तेज डिटर्जेंट, अजवाइन और पुरानी दवाइयों की मिली-जुली गंध हमेशा तैरती रहती थी। विधवा थीं, तेज जुबान वाली, और हर बात में कहती थीं, “आजकल की लड़कियों को बच्चे पालना नहीं आता।”

उनके घर का रविवार एक अदालत जैसा होता था। आलू-पूरी, सूजी का हलवा, दही, अचार, फिर आरव की थाली पर लंबी टिप्पणी।

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“इतना कम खाएगा तो हवा उड़ाकर ले जाएगी इसे।”

काव्या समझाती, “डॉक्टर ने कहा है उसका वजन ठीक है।”

सावित्री देवी चश्मे के ऊपर से देखतीं।

“डॉक्टर चार्ट देखते हैं, मैं बच्चा देखती हूँ।”

फिर वह पल आता जिससे आरव का चेहरा सफेद पड़ जाता।

“चल बेटा, दादी की ताकत वाली दवा पी ले।”

भूरी काँच की छोटी शीशी, सफेद ढक्कन, कोई नाम नहीं, कोई तारीख नहीं, कोई मात्रा नहीं। अंदर गाढ़ा काला-सा तरल, जिसकी गंध जले हुए शहद और कड़वी जड़ी-बूटी जैसी थी।

काव्या ने पहली बार पूछा था, “इसमें है क्या?”

सावित्री देवी मुस्कराई थीं।

“अजवाइन, बेल, थोड़ा शहद, पुराना नुस्खा। पेट ठीक रहता है, भूख खुलती है।”

“वह 5 साल का है।”

“इसी उम्र में शरीर बनता है।”

आरव उस सिरप से डरता था। वह दादी का कपाट खुलते ही माँ को ढूँढने लगता। होंठ भींच लेता। कई बार रोहन हँसकर कह देता, “अरे चैंपियन, लड़के रोते नहीं।”

पर पिछले शनिवार रात सब टूट गया था। आरव अपना छोटा लाल ट्रक सीने से लगाए काव्या के पास आया।

“मम्मा, कल दादी के घर जाना जरूरी है?”

काव्या ने उसके बाल सहलाए।

“क्यों बेटा?”

उसने सिर झुका लिया।

“दादी वाला गंदा सिरप नहीं पीना। वह बोलती हैं, नहीं पिएगा तो कमजोर रहेगा और कोई प्यार नहीं करेगा। फिर वह मेरी ठुड्डी पकड़ती हैं।”

काव्या का दिल जैसे रुक गया।

“ठुड्डी पकड़ती हैं?”

आरव ने शर्म से सिर हिलाया।

“नाक भी बंद करती हैं। कहती हैं मम्मा को कुछ नहीं आता।”

अगले दिन भी वे गए। क्योंकि रोहन ने कहा था, “बस 2 घंटे।” क्योंकि काव्या नहीं चाहती थी लोग कहें कि बहू ने पोते को दादी से अलग कर दिया। क्योंकि परिवारों में अक्सर औरतों को अपने डर से पहले बुजुर्गों की इज्जत बचाना सिखाया जाता है।

दोपहर के भोजन के बाद सावित्री देवी उठीं।

“आ जा मेरे शेर, दादी की दवा।”

आरव ने काव्या की साड़ी का पल्लू पकड़ लिया।

काव्या तुरंत उठ खड़ी हुई।

“आज मैं देखूँगी वह दवा।”

रसोई में अचानक सन्नाटा जम गया। सावित्री देवी ने कपाट से शीशी निकाली और जोर से स्लैब पर रख दी।

“लो, जाँच कर लो। जैसे मैं दुश्मन हूँ।”

काव्या ने शीशी उठाई। कोई लेबल नहीं।

“साफ-साफ बताइए इसमें क्या है।”

“तुम्हें क्या समझ आएगा?”

“मुझे इतना समझ आता है कि मेरे बच्चे के शरीर में क्या जा रहा है।”

सावित्री देवी का चेहरा कठोर हो गया।

“तुम्हारी वजह से बच्चा हर चीज से डरता है।”

रोहन भी रसोई में आ गया।

“माँ, रहने दो। आज मत दो। हम चलते हैं।”

काव्या ने सोचा, आज खतरा टल गया।

लेकिन रात 8 बजे आरव का चेहरा पीला पड़ने लगा। उसने पानी माँगा, फिर पेट पकड़कर सोफे पर सिकुड़ गया। आधी रात के बाद वह पसीने से भीग गया। रात 1 बजकर 12 मिनट पर काव्या को कमरे से घुटी हुई आवाज सुनाई दी। वह भागी।

आरव उल्टी कर रहा था। आँखें आधी बंद, शरीर काँपता हुआ, हाथ पेट पर दबे हुए।

“रोहन! अभी एम्बुलेंस बुलाओ!”

एम्बुलेंस की नीली रोशनी में काव्या उसका हाथ पकड़े बैठी रही। सफदरजंग अस्पताल की इमरजेंसी में जब डॉक्टर ने पूछा, “कोई दवा, सिरप, घरेलू नुस्खा?” तो काव्या ने बिना रोहन की तरफ देखे कहा—

“हाँ। उसकी दादी हर रविवार उसे बिना लेबल वाली शीशी से कुछ पिलाती हैं।”

डॉक्टर ने कलम रोक दी।

“कितने समय से?”

काव्या का गला सूख गया।

“लगभग 2 साल से।”

PART 2

सुबह 7 बजकर 40 मिनट पर डॉक्टर फाइल लेकर कमरे में आईं और दरवाजा बंद कर दिया। बस वह आवाज ही काव्या की हड्डियों तक ठंडी कर गई।

“आरव की रिपोर्ट में लोपरामाइड मिला है।”

रोहन ने उलझकर पूछा, “वह क्या होता है?”

“दस्त रोकने की दवा। छोटे बच्चों में गलत मात्रा या बार-बार देने से पेट दर्द, उल्टी, सुस्ती, आँतों की गति रुकना और गंभीर हालत में दिल पर असर हो सकता है। रिपोर्ट एक बार की गलती जैसी नहीं लगती। यह बार-बार दिए जाने जैसा मामला है।”

काव्या को लगा फर्श हिल गया।

रोहन ने काँपते हाथों से माँ को फोन लगाया और स्पीकर ऑन कर दिया।

“माँ, आरव अस्पताल में है। डॉक्टर कह रहे हैं उसके शरीर में लोपरामाइड है। आपकी शीशी में क्या था?”

कुछ सेकंड खामोशी रही।

फिर सावित्री देवी की आवाज आई, चिढ़ी हुई।

“थोड़ा-सा ही तो था।”

रोहन की साँस अटक गई।

“थोड़ा-सा क्या?”

“आधी गोली पीसकर डालती थी। कभी पेट ज्यादा ढीला लगे तो थोड़ी और। शहद में मिलाने से बच्चा पी लेता था। मुझे पता था मैं क्या कर रही हूँ।”

काव्या ने रोहन को देखा।

“सुना तुमने?”

उस पल रोहन के चेहरे पर बेटे का डर, पत्नी की चेतावनी और माँ की निर्दय शांति एक साथ उतर आए।

PART 3

कमरे में मशीन की धीमी बीप बज रही थी। आरव सोया था, मगर उसकी भौंहें अब भी सिकुड़ी थीं। छोटे हाथ में कैनुला लगा था। काव्या उसकी उँगलियाँ सहला रही थी और रोहन दीवार से टिककर खड़ा था, जैसे किसी ने उसकी रीढ़ निकाल दी हो।

“माँ ने सोचा होगा…” उसने बहुत धीमे कहा।

काव्या की आँखें आग की तरह उठीं।

“वाक्य पूरा मत करना।”

रोहन चुप हो गया।

“तुम्हारे बेटे ने 2 साल ‘नहीं’ कहा। 2 साल हर रविवार डर के साथ गया। 2 साल पेट पकड़कर सोमवार काटा। और तुमने हर बार मुझे ही शक करने वाली, नाटक करने वाली, ज्यादा पढ़ी-लिखी माँ बना दिया।”

रोहन ने माथा पकड़ लिया।

“मैं नहीं जानता था।”

“नहीं, रोहन। तुम जानना नहीं चाहते थे।”

डॉक्टर ने बाद में साफ कहा कि अस्पताल को मामला दर्ज कराना होगा। एक नाबालिग बच्चे को बिना माता-पिता की स्पष्ट अनुमति, बिना डॉक्टर की सलाह, बिना सही मात्रा के दवा दी गई थी। यह “घरेलू नुस्खा” नहीं, बच्चे को खतरे में डालना था।

काव्या ने पहली बार महसूस किया कि किसी ने उसके डर को नाम दिया है। संरक्षण।

उसी दोपहर सावित्री देवी अस्पताल पहुँच गईं। हल्की क्रीम रंग की साड़ी, बालों में कसकर बंधा जूड़ा, हाथ में पुराना चमड़े का पर्स और एक प्लास्टिक फोल्डर। उसमें दवा दुकान के पुराने सर्टिफिकेट, काम के कागज, मोहल्ले की औरतों के लिखे हुए चरित्र प्रमाण पत्र रखे थे। जैसे कागजों की मोटाई बच्चे की उल्टियों को झुठला सकती थी।

काव्या ने कमरे के दरवाजे के सामने खड़े होकर कहा, “आप अंदर नहीं जाएँगी।”

सावित्री देवी की आँखें फैल गईं।

“हट सामने से। मैं अपने पोते को देखने आई हूँ।”

“आप उसे नहीं देखेंगी।”

“बहू होकर मुझे परिवार से रोकोगी?”

“मैं उसकी माँ हूँ।”

सावित्री देवी हँसीं, मगर वह हँसी चाकू जैसी थी।

“माँ? माँ वह होती है जो बच्चे को मजबूत बनाए। तुमने तो उसे रोने वाला, कमजोर, डरपोक बना दिया। इसलिए मुझे करना पड़ा।”

कॉरिडोर में नर्सें धीमी पड़ गईं। पास के बिस्तर से एक बूढ़ा आदमी भी सिर उठाकर देखने लगा। रोहन पीछे से आया। उसका चेहरा उतना ही पीला था जितना रात में आरव का था।

“माँ, मैंने कहा था मत आना।”

“और मैं कहती हूँ, यह औरत तुम्हें तुमसे छीन रही है। बेटा, होश में आ। आज इसकी बात मान ली तो कल यह तुझे भी काट देगी परिवार से।”

फिर उसने पर्स से वही भूरी शीशी निकाली।

“लो, कर लो जाँच। देख लो, मैंने जहर नहीं दिया। बच्चे की भलाई की है।”

काव्या ने हाथ बढ़ाया, मगर रोहन ने उससे पहले शीशी ले ली।

एक पल के लिए काव्या का दिल फिर डूब गया। वही पुराना डर लौट आया। वही आदमी जो हर बार माँ और पत्नी के बीच दीवार नहीं, पर्दा बन जाता था। वह शीशी उसकी जैकेट की जेब में चली गई।

सावित्री देवी की आँखों में राहत चमकी।

“बात घर में बैठकर सुलझती है। पुलिस-कचहरी से इज्जत मिट्टी में मिलती है।”

काव्या ने बहुत शांत स्वर में कहा, “रोहन, वह शीशी सबूत है।”

रोहन की आवाज टूट गई।

“वह मेरी माँ हैं।”

काव्या ने दरवाजे के भीतर सोते बच्चे की तरफ इशारा किया।

“और वह तुम्हारा बेटा है।”

कॉरिडोर में समय जैसे रुक गया। रोहन ने माँ को देखा, फिर कमरे के भीतर आरव को। फिर धीरे-धीरे जेब से शीशी निकाली और पास खड़ी नर्स को दे दी।

“कृपया इसे डॉक्टर को दे दीजिए। यही मेरे बेटे को दिया जा रहा था।”

सावित्री देवी की आँखों का रंग बदल गया।

“रोहन!”

उसने पहली बार माँ की तरफ देखे बिना कहा, “अब बस।”

“तू अपनी माँ को अपराधी बनाएगा?”

रोहन की आवाज भारी हो गई।

“आपने मुझे लगभग पिता कहलाने लायक नहीं छोड़ा।”

उस दिन सावित्री देवी पहली बार निरुत्तर रह गईं।

शीशी की जाँच ने सब साफ कर दिया। उसमें सचमुच लोपरामाइड की गोलियाँ पीसकर शहद, अजवाइन के अर्क और कड़वी जड़ी-बूटी जैसी गंध वाले पदार्थों में मिलाई गई थीं। मात्रा मारने के लिए नहीं थी, लेकिन धीरे-धीरे बच्चे को बीमार रखने के लिए काफी थी। मेडिकल रिपोर्ट में लिखा गया कि बार-बार अनधिकृत दवा देना बच्चे की सुरक्षा के विरुद्ध था।

कागज पर शब्द ठंडे थे, मगर काव्या ने उन्हें बार-बार पढ़ा। हर लाइन उसके लिए जैसे मुक्ति का दरवाजा थी।

आरव 4 दिन बाद अस्पताल से निकला। आँखों के नीचे काले घेरे थे, शरीर कमजोर था, मगर उसने अस्पताल के गेट पर माँ की उँगली कसकर पकड़कर कहा, “मम्मा, भूख लगी है।”

काव्या की आँखें भर आईं।

“क्या खाएगा मेरा बच्चा?”

“सादा चावल और दही। पर उसमें दवा नहीं होगी ना?”

काव्या ने खुद को टूटने से रोका।

“कुछ भी बिना बताए नहीं होगा। कभी नहीं।”

उस रात काव्या रोहन के साथ फ्लैट नहीं लौटी। उसने पहले ही एक बैग तैयार कर लिया था। वह आरव को लेकर अपनी बड़ी बहन मीरा के घर नोएडा चली गई। मीरा ने दरवाजा खोला, आरव को देखा, फिर काव्या को बाँहों में भर लिया।

“यहाँ कोई तेरे बच्चे को तेरी अनुमति के बिना पानी भी नहीं देगा।”

इतनी साधारण बात सुनकर काव्या रो पड़ी।

अगले कई दिन आरव सिर्फ माँ से चिपककर सोता। कोई गिलास सामने रखता तो पहले सूँघता। खाना देखकर पूछता, “दादी ने नहीं बनाया?” सिरप शब्द सुनते ही वह दरवाजे के पीछे छिप जाता। डॉक्टर ने कहा यह डर शरीर से दवा निकल जाने के बाद भी मन में बचा रहेगा।

काव्या हर बार झुककर कहती, “तुम्हारा शरीर तुम्हारा है। कोई जबरदस्ती नहीं करेगा।”

वह वाक्य आरव के लिए दवा से भी जरूरी था।

2 हफ्ते बाद काव्या ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और बाल सुरक्षा विभाग को रिपोर्ट दी। अस्पताल की फाइल, शीशी की जाँच, डॉक्टर का बयान और रोहन का कॉल रिकॉर्ड सब जमा हुआ। सावित्री देवी थाने में भी यही कहती रहीं कि उन्होंने “माँ से बढ़कर” देखभाल की। उन्होंने कहा कि आजकल की बहुएँ बच्चों को मोबाइल देकर पालती हैं, दादी के नुस्खों की कीमत नहीं जानतीं। उन्होंने यह भी कहा कि काव्या घर तोड़ना चाहती थी और बेटा उसके प्रभाव में आ गया।

लेकिन इस बार सिर्फ उनकी आवाज नहीं सुनी गई। आरव की भी सुनी गई।

बाल मनोवैज्ञानिक के सामने उसने छोटी आवाज में बताया कि दादी उसका सिर पीछे खींचती थीं, नाक दबाती थीं और कहती थीं कि अच्छा बच्चा दवा बिना रोए पीता है। उसने कहा कि अगर वह उल्टी करता तो दादी कहतीं, “मम्मा को मत बताना, वरना वह दादी को बुरा बोलेगी।”

काव्या बाहर बैठी यह बयान सुन रही थी। उसके आँसू इसलिए नहीं निकले कि बच्चा रो रहा था। उसके आँसू इसलिए निकले कि आरव यह सब बिना रोए बता रहा था। जैसे डर इतना पुराना हो चुका था कि वह आँसू बनने की उम्र भी पार कर गया था।

रोहन ने उसी दिन काव्या से कहा, “मैंने तुम्हें अकेला छोड़ दिया था।”

काव्या ने कोई सांत्वना नहीं दी।

“हाँ।”

उसने सिर झुका लिया।

“मैं माँ से डरता था। उनके अकेलेपन से, उनके गुस्से से, उनके तानों से। मुझे लगता था चुप रहना शांति है।”

काव्या ने कहा, “चुप रहना कभी-कभी किसी और की पीड़ा को अनुमति देना होता है।”

कुछ महीनों बाद अदालत ने सावित्री देवी को आरव से दूर रहने का आदेश दिया। बिना अनुमति किसी भी मुलाकात पर रोक लगी। रोहन को भी साफ निर्देश मिला कि वह अपने बेटे से तभी मिल सकता है जब वह तय नियमों का पालन करे और दादी को किसी भी रूप में उसके पास न लाए।

अदालत के बाहर सावित्री देवी ने काव्या को घूरकर कहा, “बहुत खुश हो? बच्चे को परिवार से काट दिया?”

काव्या ने आरव की उँगली और कसकर पकड़ ली। वह जवाब देना चाहती थी, मगर रोहन ने पहली बार उसके पहले बोल दिया।

“माँ, परिवार डर से नहीं बनता।”

सावित्री देवी ने उसे ऐसे देखा जैसे वह उनका बेटा नहीं, कोई अनजान आदमी हो।

“तू भी?”

रोहन ने धीमे मगर साफ कहा, “आरव से दूर रहिए।”

यह वाक्य देर से आया था। बहुत देर से। लेकिन पहली बार सीमा खिंच गई थी।

समय बीता, मगर घाव सीधा नहीं भरा। रविवार अब भी काव्या के लिए कठिन होते। घड़ी में दोपहर के 2 बजते ही उसका मन पुराने कृष्णा नगर वाले घर की रसोई में लौट जाता। आरव कई बार खेलते-खेलते पेट पकड़ लेता, जैसे शरीर को याद हो कि डर कहाँ रहता है। स्कूल में जब टीचर ने बच्चों को स्वास्थ्य दिवस पर विटामिन सिरप दिखाया, तो वह बाथरूम में छिप गया।

काव्या ने उसे डाँटा नहीं। उसने स्कूल को समझाया। डॉक्टर ने दवा की बोतल दिखाकर, लेबल पढ़ाकर, मात्रा समझाकर उसे भरोसा दिलाना शुरू किया। पहली बार जब आरव ने खुद चम्मच पकड़कर डॉक्टर के सामने विटामिन की एक बूंद चखी, काव्या ने ताली नहीं बजाई। उसने बस उसकी आँखों में देखा और कहा, “तुमने फैसला किया। इसलिए यह बहादुरी है।”

रोहन धीरे-धीरे मिलने आता। पहले आरव उससे दूर बैठता। पूछता, “दादी बाहर तो नहीं?” रोहन हर बार दरवाजा खोलकर दिखाता।

“नहीं। मैं अकेला आया हूँ।”

वह खिलौने लाता, मगर अब काव्या ने साफ कह दिया था कि प्यार खिलौनों से साबित नहीं होगा। वह आरव को जबरदस्ती गोद में नहीं ले सकता। वह यह नहीं कह सकता कि दादी तुमसे प्यार करती हैं। वह अतीत को छोटा नहीं कर सकता।

एक शाम रोहन ने आरव को डायनासोर वाली किताब पढ़ी। 3 पन्ने के बाद आरव ने किताब बंद कर दी।

“बस।”

रोहन ने सिर हिलाया।

“ठीक है।”

उसने न मिन्नत की, न मुँह लटकाया, न कहा कि पापा को बुरा लग गया। काव्या ने पहली बार उसे पिता बनने की कोशिश करते देखा, बेटे का मालिक बनने की नहीं।

फिर आरव का 6वाँ जन्मदिन आया। इस बार कोई बड़ा परिवार नहीं, कोई जबरन मिठाई नहीं, कोई दादी की टिप्पणी नहीं। मीरा के घर की बालकनी में रंगीन कागज की झालरें लगी थीं। चॉकलेट केक था, 6 मोमबत्तियाँ थीं, और आरव ने खुद तय किया कि कौन उसे प्लेट देगा, कौन केक काटने में मदद करेगा।

मोमबत्ती बुझाने से पहले उसने अचानक पूछा, “मम्मा, इच्छा बोलनी होती है?”

काव्या मुस्कराई।

“मन में बोलते हैं।”

आरव ने आँखें बंद कीं। बहुत देर तक बंद रखीं। फिर मोमबत्तियाँ एक साथ बुझा दीं।

बाद में उसने स्कूल की ड्राइंग कॉपी से एक पन्ना फाड़कर सबको दिखाया। उसमें एक घर बना था। बड़ी खिड़कियाँ, पीला सूरज, दरवाजे पर काव्या और आरव हाथ पकड़े खड़े थे। थोड़ा दूर एक बेंच पर रोहन बैठा था, हाथ में डायनासोर की किताब। घर के पीछे दूर जाती एक पतली ग्रे सड़क थी।

काव्या ने पूछा, “यह सड़क कहाँ जाती है?”

आरव ने ग्रे रंग की पेंसिल उठाई।

“दादी वहाँ हैं। दूर। वह अंदर नहीं आ सकतीं।”

कमरे में बैठे बड़े लोग चुप हो गए।

फिर उसने बहुत गंभीर होकर कहा, “हमारे घर में दवा देने से पहले पूछा जाता है।”

रोहन ने सिर झुका लिया। उसकी आँखों में पछतावा था, मगर इस बार उसने बेटे की बात पर अपना दर्द नहीं रखा। उसने उसे वैसा ही रहने दिया।

काव्या आरव के पास बैठी। उसने उसके गालों को हल्के से छुआ, बिना पकड़े, बिना रोकते हुए।

“हमारे घर में बच्चा ‘नहीं’ कहे तो उसे सुना जाता है।”

आरव ने जैसे यह वाक्य अपने भीतर कहीं सुरक्षित रख लिया। फिर वह केक खाने लगा, मुँह पर चॉकलेट लगाकर हँसते हुए। उस हँसी में पूरी जीत नहीं थी, मगर एक रास्ता था। ऐसा रास्ता जहाँ बच्चा डर से नहीं, भरोसे से बड़ा हो सकता था।

रात में जब सब सो गए, काव्या ने वही ड्राइंग उठाई। रसोई की हल्की रोशनी में वह देर तक उसे देखती रही। घर, पीला सूरज, बंद दरवाजा, दूर जाती ग्रे सड़क।

उसे अपनी जैसी कितनी औरतें याद आईं जो परिवार की मेज पर बैठकर अपनी शंका निगल जाती हैं। कितने बच्चे याद आए जिन्हें कहा जाता है कि बड़े कभी गलत नहीं होते। कितनी खतरनाक बातें याद आईं जिन्हें प्यार के नाम पर स्वीकार कराया जाता है।

“वह बुरा नहीं सोचतीं।”

“बुजुर्गों का तरीका अलग होता है।”

“इतनी-सी बात पर घर मत तोड़ो।”

काव्या ने समझ लिया था कि उसने घर नहीं तोड़ा। उसने उस चुप्पी को तोड़ा था जो उसके बच्चे के शरीर में जहर बनकर उतर रही थी।

उसने ड्राइंग को मोड़कर एक डिब्बे में रख दिया। यह अदालत का सबूत नहीं था। यह उसके लिए सबूत था। उस दिन के लिए, जब कोई फिर उसे समझाने की कोशिश करे कि माँ डर रही है, बढ़ा-चढ़ाकर सोच रही है, परिवार तोड़ रही है।

आरव कमरे में सो रहा था। इस बार उसके हाथ पेट पर नहीं थे। वह खुलकर, फैलकर, बेफिक्र सोया था।

और काव्या ने पहली बार महसूस किया कि कभी-कभी एक माँ की सबसे बड़ी जीत यह नहीं होती कि वह दुनिया को गलत साबित कर दे। सबसे बड़ी जीत यह होती है कि उसका बच्चा फिर से अपने शरीर को अपना घर समझने लगे।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.