Posted in

स्कूल बस में बेटे को बचाने वाला ड्राइवर जब माँ के सामने आया, उसने चीखकर कहा “यह मेरे बच्चे के पास कैसे पहुँचा”, और फिर 7 साल पुराना जहर, झूठी मौत, जला हुआ पति और खून का रिश्ता सबके सामने खुल गया

PART 1

Advertisements

स्कूल बस के दरवाजे पर खड़े उस आदमी को देखकर मीरा त्रिपाठी का गला फट गया—“यह मेरे बेटे के पास कैसे आया?”

दिल्ली के द्वारका सेक्टर 10 की भीड़भाड़ वाली सड़क पर उस शाम बच्चों के बैग, हॉर्न, अभिभावकों की आवाजें और बस के इंजन की घरघराहट अचानक जैसे जम गई। 7 साल का आरव अपनी पानी की बोतल सीने से चिपकाए खड़ा था। उसकी आँखों में डर नहीं, उलझन थी, क्योंकि जिसे उसकी माँ चीखकर धक्का दे रही थी, वही आदमी पिछले 2 महीनों से बस में उसे बचाता आया था।

Advertisements

बस का ड्राइवर सबके लिए “रमेश भैया” था—पतला चेहरा, आधी सफेद दाढ़ी, माथे पर पुरानी टोपी, और दाईं आँख के पास जलन का पुराना निशान। वह बच्चों से ज्यादा बात नहीं करता था, पर जब भी कुछ बड़े लड़के आरव को चिढ़ाते—“तेरे पापा का चेहरा डरावना है”, “तेरे घर में भूत रहता है क्या”—रमेश भैया बस रोक देता।

—किसी के पिता पर हँसना बहादुरी नहीं, कायरता है।

उस दिन भी उसने यही किया था। आरव ने घर आकर मीरा को बताया था कि ड्राइवर अंकल ने उसे बचाया। मीरा ने बस यूँ ही मोबाइल पर स्कूल पिकनिक की वीडियो खोली। वीडियो में वही आदमी बच्चों को लाइन में लगा रहा था। टोपी थोड़ी ऊपर थी। चेहरा साइड से साफ दिखा।

मीरा के हाथ से मोबाइल गिर गया।

उस चेहरे ने 7 साल पहले का पूरा अँधेरा फाड़ दिया—मुंबई का अस्पताल, सफेद चादर, ठंडी स्टील की मेज, उसका शरीर जो मर चुकी घोषित हो गई थी, उसका पहला पति विवान जो 5 साल बाद सड़कों से लौटकर चिल्लाया था—“मीरा जिंदा है”, और करण मल्होत्रा… वही आदमी जिसने प्यार के नाम पर उसका सब कुछ तोड़ दिया था।

अब वही करण, नकली नाम से, उसके बेटे की स्कूल बस चला रहा था।

अगले दिन मीरा और विवान बस स्टैंड पहुँचे। विवान के चेहरे और गर्दन पर पुराने आग के निशान थे। वह कम बोलता था, मगर उसकी आँखें लकड़ी काटने वाले औजार जैसी स्थिर थीं।

बस रुकी। बच्चे उतरने लगे। आरव खुशी से चिल्लाया—

—मम्मा, रमेश भैया ने आज फिर उन्हें डाँटा!

Advertisements

मीरा आगे बढ़ी और आरव को अपनी बाँहों में खींच लिया।

ड्राइवर ने सिर उठाया। एक पल के लिए उसकी साँस रुक गई। उसने पीछे हटना चाहा, मगर विवान ने उसका कॉलर पकड़कर बस की बॉडी से दे मारा।

—तू मेरे बेटे के पास कैसे पहुँचा?

आदमी काँपने लगा।

—मैंने उसे छुआ तक नहीं… कसम से…

मीरा का चेहरा राख जैसा सफेद था।

—तेरी कसमों ने ही मुझे मौत की मेज तक पहुँचाया था, करण।

आरव ने पहली बार सुना—करण।

और बस के चारों तरफ खड़े लोगों के सामने 7 साल से दबी हुई चीख फिर जिंदा हो गई।

PART 2

करण ने भागने की कोशिश नहीं की। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, मगर विवान की पकड़ ढीली नहीं हुई।

—मैंने बस उसे बचाया था, बस इतना ही, करण बुदबुदाया।

मीरा हँसी नहीं। उसकी आवाज ठंडी थी।

—तूने पहले उसके जन्म से पहले उसे चुराने की कोशिश की थी।

आरव काँप गया।

—मम्मा, ये कौन हैं?

मीरा झुकी, पर शब्द उसके गले में अटक गए। 7 साल तक उसने अपने बेटे से आधा सच छिपाया था। उसे बताया था कि उसका जन्म एक कठिन समय में हुआ, कि विवान उसका पिता है क्योंकि पिता वही होता है जो साथ रहता है। लेकिन यह नहीं बताया था कि जिस आदमी का खून उसके शरीर में है, उसने उसकी माँ को जहर देकर मृत दिखाया था।

करण ने आरव की ओर देखा।

—मैं… मैं तुम्हें चोट नहीं पहुँचाना चाहता था।

विवान गरजा—

—तू चाहता क्या था?

करण ने जेब से एक पुराना लिफाफा निकाला।

—मैं आत्मसमर्पण करने आया था। मगर उससे पहले… मैं अपने बेटे को आखिरी बार सुरक्षित देखना चाहता था।

उसी क्षण पुलिस की जीप बस डिपो के बाहर आकर रुकी।

PART 3

करण मल्होत्रा का असली नाम सुनते ही द्वारका थाने की वरिष्ठ निरीक्षक नंदिता राणा की आँखें सिकुड़ गईं। यह नाम दिल्ली पुलिस की पुरानी फाइलों में धूल नहीं खा रहा था; वह अब भी कई अधूरे केसों के बीच काँटे की तरह अटका था।

7 साल पहले मीरा त्रिपाठी मुंबई में एक सप्लाई चेन कंपनी की सह-संस्थापक थी। उसके साथ 2 आदमी थे—विवान त्रिपाठी, उसका पति, जो खामोश लेकिन तेज दिमाग वाला ऑपरेशंस हेड था, और करण मल्होत्रा, निवेशकों से बात करने वाला चमकदार चेहरा। बाहर से तीनों सफलता की कहानी थे। मैगजीन में फोटो छपती थी, व्यापारिक समारोहों में बुलावा आता था, और लोग कहते थे—“नई पीढ़ी का भारतीय व्यवसाय ऐसे ही बनता है।”

लेकिन करण मीरा से प्यार नहीं करता था। वह उसे अपना अधिकार समझता था।

जब मीरा और विवान ने शादी की, करण ने मुस्कुराकर मिठाई खिलाई। फिर धीरे-धीरे कंपनी के कागजों में, बैंकिंग अधिकारों में, बीमा पॉलिसियों में, और मीरा की थकान में उसने अपने लिए रास्ते बनाने शुरू किए।

5 साल बाद विवान एक बिजनेस मीटिंग के बहाने पुणे हाईवे की तरफ गया और गायब हो गया। पुलिस को उसकी कार मिली, खून के कुछ दाग मिले, पर शरीर नहीं मिला। मीरा ने 11 महीने तक दरवाजे की हर आवाज पर दौड़ना नहीं छोड़ा। करण हर दिन उसके साथ था। वह उसकी फाइलें संभालता, वकीलों से बात करता, कंपनी बचाता, घरवालों को सांत्वना देता। धीरे-धीरे परिवार ने कहा—

—बेटी, जिंदगी रुकती नहीं।

मीरा ने करण से शादी नहीं की, वह थकान से उसके सहारे गिर गई। 2 साल बाद एक अदालत में औपचारिक विवाह हुआ। मीरा ने उस दिन भी लाल साड़ी नहीं पहनी। करण ने कहा था—

—पुराना दुःख पीछे छोड़ दो।

लेकिन दुःख पीछे नहीं था। वह करण की जेब में बंद था।

एक रात मीरा ऑफिस के भूमिगत पार्किंग में बेहोश मिली। अस्पताल पहुँचते-पहुँचते उसकी नाड़ी इतनी धीमी हो चुकी थी कि उसे मृत मान लिया गया। करण ने रोते हुए पोस्टमार्टम रोकने की कोशिश की। उसने डॉक्टरों से विनती की, पैसे की बात की, प्रतिष्ठा की बात की। उसी समय एक फटेहाल आदमी अस्पताल की मोर्चरी में घुसा और चिल्लाया—

—इसे मत छुओ, यह जिंदा है!

वह विवान था।

वह सड़क से लौटा हुआ आदमी था, टूटी यादों और बिना पहचान के 5 साल जीकर आया हुआ। उसने कहा कि करण ने उसे मरवाने की कोशिश की थी। पहले किसी ने विश्वास नहीं किया। फिर डॉक्टर ने मीरा की गर्दन पर उँगलियाँ रखीं। एक हल्की धड़कन मिली। जाँच हुई तो पता चला—उसके शरीर में ऐसा नशीला पदार्थ था जिसने उसे मौत जैसा शांत बना दिया था।

मीरा बच गई। करण फरार हो गया।

कुछ ही हफ्तों बाद उसे पता चला कि वह गर्भवती है। बच्चा करण का था।

विवान उस दिन घंटों चुप रहा। मीरा ने उससे आँख तक नहीं मिलाई। वह खुद को गंदा, टूटा हुआ, अपराधी महसूस कर रही थी, जबकि अपराध उसका नहीं था।

रात को विवान ने उसके सामने पानी का गिलास रखा।

—बच्चे ने कुछ नहीं किया।

मीरा रो पड़ी।

—हर बार उसका चेहरा देखोगे तो करण याद आएगा।

विवान ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा—

—शायद पहले याद आएगा। फिर वह बच्चा अपना चेहरा खुद बना लेगा।

आरव का जन्म मुंबई के एक निजी अस्पताल में हुआ। मीरा प्रसव के बाद कमजोर थी। विवान ने बच्चे को पहली बार गोद में लिया तो आरव ने उसकी जली हुई उँगली पकड़ ली। उस पकड़ में कोई सवाल नहीं था। विवान वहीं टूट गया।

लेकिन करण ने हार नहीं मानी थी।

जन्म के 2 दिन बाद आरव पालने से गायब हो गया। पूरे अस्पताल में भगदड़ मच गई। सीसीटीवी में एक अस्थायी नर्स बच्चे को कपड़ों के बैग में ले जाती दिखी। वह नर्स करण की पुरानी प्रेमिका निकली। उसने बाद में रोते हुए कहा—

—करण ने कहा था बच्चा उसका है, मीरा उसे उससे छीन रही है।

आरव 6 घंटे बाद मिल गया। करण फिर भी नहीं मिला।

कुछ महीनों बाद कंपनी के गोदाम में आग लगी। रिकॉर्ड रूम में एक सफाईकर्मी फँस गई। विवान अंदर घुसा। उसने उसे बचा लिया, मगर खुद बुरी तरह जल गया। चेहरा, गर्दन, कंधा—सब पर आग के निशान रह गए। जाँच में पता चला कि आग किसी पुराने एक्सेस कार्ड से लगाई गई थी। कैमरे में चेहरा साफ नहीं था, लेकिन मीरा ने चाल पहचान ली। करण की चाल थी—हल्की झुकाव वाली, जैसे हर जगह भीड़ को अपना रास्ता मानता हो।

कंपनी डूब गई। बीमा अटका, ग्राहक चले गए, कर्ज बढ़ गया। मीरा और विवान ने मुंबई छोड़ दिया। वे दिल्ली आ गए। विवान ने नजफगढ़ के पास एक छोटे फर्नीचर वर्कशॉप में काम शुरू किया। बाद में उसने अपनी छोटी सी लकड़ी की दुकान खोल ली। मीरा ने गुरुग्राम की एक कोऑपरेटिव में अकाउंट्स संभालना शुरू किया।

आरव ने विवान को ही “पापा” कहा। पहली बार उसने यह शब्द बोला तो मीरा ने रसोई में छिपकर रोया था। विवान ने बस बच्चे को उठाया और माथे से लगा लिया। उसे कभी यह कहने की जरूरत नहीं पड़ी कि वह पिता है। आरव की उँगलियाँ, उसकी नींद, उसका बुखार, उसका स्कूल बैग—सबने उसे पिता बना दिया था।

लेकिन दुनिया इतनी दयालु नहीं थी।

स्कूल के बाहर कुछ बच्चे विवान के चेहरे को देखकर हँसते। कोई कहता—

—तेरे पापा जल गए थे क्या?

कोई फुसफुसाता—

—राक्षस जैसे लगते हैं।

आरव लड़ने लगता। घर आकर चुप हो जाता। विवान ने एक दिन मीरा से कहा—

—मैं उसे लेने स्कूल न जाऊँ तो अच्छा रहेगा।

मीरा ने थाली जोर से रख दी।

—हम अपने प्यार को छिपाकर दूसरों की बदतमीजी को आराम नहीं देंगे।

इसी दौरान नया बस ड्राइवर आया—रमेश भैया। वह बच्चों से दूर रहता था, पर आरव को अपमानित होते नहीं देख पाता। उसने सीट बदलवाई, शिकायत लिखी, 2 बच्चों के माता-पिता को बुलवाया। आरव धीरे-धीरे उसे भरोसे की नजर से देखने लगा।

करण, नकली पहचान में, उसी भरोसे से टूट रहा था।

वह 7 साल से भाग रहा था। जयपुर में मजदूरी, लुधियाना में गोदाम, इंदौर में नकली नाम से ट्रांसपोर्ट, फिर दिल्ली में स्कूल बस। उसने धन खो दिया था, दोस्त खो दिए थे, मगर डर नहीं खोया था। हर पुलिस सायरन उसे पसीने से भिगो देता। हर अखबार में वह अपना नाम ढूँढ़ता। फिर एक दिन बस में आरव चढ़ा—चेहरे पर मीरा की आँखें और ठोड़ी पर करण की हल्की बनावट।

पहले ही दिन करण समझ गया था।

उसने नौकरी छोड़ने का फॉर्म भरा। फिर देखा कि बस के पीछे वाले बच्चे आरव को चिढ़ा रहे हैं। वह रुक गया। शायद अपराधी का सबसे बड़ा दंड यही था कि उसका अपना बेटा उस आदमी के लिए रो रहा था जिसे उसने जलवाया था।

अब थाने में वही बच्चा उसके सामने बैठा था।

आरव मीरा के दुपट्टे का कोना पकड़े हुए था। विवान उसके दूसरी तरफ खड़ा था। करण सामने कुर्सी पर, हथकड़ी में, सिर झुकाए बैठा था।

निरीक्षक नंदिता ने धीमी आवाज में कहा—

—बच्चे से झूठ नहीं बोला जाएगा, लेकिन पूरा सच उम्र के हिसाब से बताया जाएगा।

मीरा ने सिर हिलाया। उसकी आँखें लाल थीं।

करण ने आरव से कहा—

—मैंने तुम्हारी माँ और तुम्हारे पापा को बहुत दुख दिया है।

आरव ने तुरंत कहा—

—मेरे पापा विवान हैं।

करण ने पहली बार बिना बचाव के सिर झुका दिया।

—हाँ। वही हैं।

आरव ने पूछा—

—फिर आपने मेरा बचाव क्यों किया?

करण के होंठ काँपे।

—क्योंकि इस बार मैं एक बुरी चीज के बीच एक छोटी अच्छी चीज करना चाहता था। लेकिन उससे मेरे पुराने पाप छोटे नहीं होते।

विवान की मुट्ठी बंधी हुई थी। मीरा ने उसका हाथ दबाया। वह जानती थी कि विवान करण पर टूट पड़ना चाहता है। पर वह यह भी जानती थी कि आरव को उस दिन नफरत की विरासत नहीं, सच की ताकत चाहिए थी।

करण ने पुलिस के सामने सब कबूल किया—विवान पर हमला करवाना, मीरा को दवा दिलवाना, अस्पताल में पोस्टमार्टम रुकवाने की कोशिश, बच्चे को उठवाना, गोदाम में आग लगवाना, नकली कागज बनाकर भागना। उसने उन 2 आदमियों के नाम भी बताए जिन्होंने विवान को हाईवे के पास पीटा था। पुरानी प्रेमिका और नकली नर्स का बयान जोड़ा गया। बैंक खातों, पुराने संदेशों और छिपाए गए पैसों की परतें खुलीं।

मुकदमा 10 महीने चला। मीडिया ने इसे सनसनी बना दिया—“मरा हुआ पति लौटा”, “बस ड्राइवर निकला भगोड़ा करोड़पति”, “बेटे की रक्षा करते पकड़ा गया अपराधी पिता।” मीरा को ये शीर्षक चुभते थे। किसी के लिए यह कहानी थी। उसके लिए यह 7 साल की नींद उड़ाने वाली रातें थीं।

करण को 20 साल की सजा हुई। नकली नर्स को 6 साल। हमलावरों को भी सजा मिली। कुछ छिपा पैसा बरामद हुआ। मीरा और विवान चाहें तो फिर बड़ा व्यापार शुरू कर सकते थे। उन्होंने नहीं किया।

उन्होंने द्वारका के पास अपना छोटा फर्नीचर स्टूडियो खोला—“आरव वुडवर्क्स।” मीरा ऑर्डर संभालती, हिसाब रखती, ग्राहकों से बात करती। विवान लकड़ी को छूता तो जैसे उसे भाषा मिल जाती। टूटी मेजें, जली किनारों वाले पुराने दरवाजे, विरासत की अलमारियाँ—वह उन्हें फेंकता नहीं था। वह कहता—

—लकड़ी टूटने के बाद भी काम आना चाहती है।

आरव स्कूल से लौटकर कभी-कभी दराजों के अंदर छोटी-छोटी पतंगें बना देता। वह कहता—

—जो लोग ध्यान से देखेंगे, उन्हें सरप्राइज मिलेगा।

समय धीरे-धीरे मरहम की तरह नहीं, मेहनत की तरह आया। विवान ने कुछ ऑपरेशन करवाए। उसका चेहरा पहले जैसा नहीं हुआ, पर उसने दुपट्टा और मफलर से खुद को ढकना कम कर दिया। एक दिन दुकान के आईने में वह खुद को देख रहा था। आरव पीछे आकर खड़ा हो गया।

—पापा, आप ऐसे ही अच्छे लगते हो।

विवान हँसना चाहता था, पर गला भर आया।

—तुझे आदत है इसलिए।

आरव ने कंधे उचकाए।

—आदत भी प्यार ही होती है न?

मीरा ने बाहर से यह सुना और चुपचाप दरवाजे के पास खड़ी रह गई। 7 साल पहले वही बच्चा उसके जीवन की सबसे डरावनी याद से आया था। आज वही बच्चा उसके घर की रोशनी था।

कुछ साल बाद, जब मीरा 41 की हुई, उसे फिर गर्भ ठहरने का पता चला। वह बाथरूम की टाइल पर बैठ गई, हाथ में टेस्ट पकड़े, आँखों में डर और हँसी साथ-साथ।

—विवान, अगर फिर कुछ बुरा हुआ तो?

विवान उसके सामने घुटनों के बल बैठा। उसने अपना जला हुआ हाथ उसके पेट पर रखा।

—तो इस बार हम डर से पहले एक-दूसरे का हाथ पकड़ेंगे।

आरव, जो अब 10 साल का था, दरवाजा खोले बिना नहीं रह पाया।

—क्या मैं बड़ा भाई बनने वाला हूँ?

मीरा रोते हुए हँस पड़ी। विवान ने दोनों को बाँहों में भर लिया। उस छोटे से बाथरूम में न कोई अदालत थी, न मोर्चरी, न आग, न स्कूल बस। बस एक परिवार था, जो राख से लौटकर खड़ा था।

सालों बाद आरव ने एक दिन पूछा—

—क्या मुझे उस आदमी को माफ कर देना चाहिए?

विवान ने तुरंत उत्तर नहीं दिया। वह लकड़ी पर रेती चला रहा था। बहुत देर बाद बोला—

—माफी का मतलब भूलना नहीं होता। माफी का मतलब यह भी नहीं कि जिसने चोट दी, वह सही हो गया। कभी-कभी माफी बस इतनी होती है कि तुम अपनी जिंदगी की बस नफरत को चलाने नहीं देते।

आरव सोचता रहा।

—और आपने?

विवान ने मीरा को आँगन में छोटी बेटी के साथ हँसते देखा। फिर अपने हाथों के निशान देखे।

—मुझे नहीं पता मैंने माफ किया या नहीं। लेकिन इतना जानता हूँ कि वह जीत नहीं पाया।

उस रात आरव वर्कशॉप में गया और एक छोटी सागौन की पट्टी के नीचे चुपचाप एक वाक्य उकेर दिया—

“परिवार वह नहीं जो खून देता है, परिवार वह है जो आग लगने पर भी साथ रहता है।”

विवान ने वह पंक्ति कई हफ्ते बाद देखी। वह लकड़ी पर झुका रहा, फिर धीरे से बैठ गया। उसके आँसू लकड़ी की धूल में गिरते रहे। यह दर्द का रोना नहीं था, या सिर्फ दर्द का नहीं था। यह उस आदमी का रोना था जिसे कभी जिंदा मिटा दिया गया था, जिसने अपनी पत्नी को मौत की मेज से लौटते देखा था, जिसने अपने दुश्मन के खून से जन्मे बच्चे को सीने से लगाया था, और जिसने अंत में समझा था—

कुछ रिश्ते जन्म से नहीं बनते।

कुछ रिश्ते तब बनते हैं, जब कोई बच्चा आपकी जली हुई उँगली पकड़कर बिना डरे कहता है—पापा।

Disclaimer: This story is a work of fiction created for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.