
एक पल के लिए उसकी नज़र नंदिनी के कपड़ों, उसके डफ़ल बैग, टूटी हुई चप्पलों और थके हुए कंधों पर गई।
फिर उसके होंठ तिरछे हो गए।
—यह कैसी हालत बना रखी है?
नंदिनी ने अपने बैग का पट्टा कसकर पकड़ लिया।
—अम्मा, मैं वापस आ गई हूँ।
सावित्री एक कदम भी आगे नहीं बढ़ीं।
—वापस किसलिए?
नंदिनी ने धीमी आवाज़ में कहा।
—दुबई में मेरी नौकरी चली गई। कंपनी बंद हो गई। मेरा वीज़ा भी खत्म हो गया। अब मेरे पास रहने की कोई जगह नहीं है।
अर्जुन ने नज़रें फेर लीं, लेकिन काव्या हल्का-सा हँस पड़ी।
—कोई जगह नहीं? दुबई में इक्कीस साल कमाने के बाद?
नंदिनी की नज़रें अपनी माँ पर ही टिकी रहीं।
—अम्मा, मुझे बस कुछ दिनों के लिए रहने दीजिए। जब तक मैं कोई इंतज़ाम नहीं कर लेती।
सावित्री का चेहरा सख्त हो गया।
—यहाँ?
—यह मेरा घर भी है।
ये शब्द नंदिनी के मुँह से निकल गए, इससे पहले कि वह खुद को रोक पाती।
गली उस अजीब भारतीय अंदाज़ में शांत हो गई, जहाँ कोई खुलकर बाहर नहीं आता, लेकिन हर पर्दा ज़रूर हिलने लगता है।
सावित्री धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरकर नीचे आईं। उनकी चूड़ियाँ खनक रही थीं।
—तुम्हारा घर?
नंदिनी चुप रही।
सावित्री फाटक तक आईं, लेकिन उसे खोला नहीं।
—तुम बहुत पहले इस घर को छोड़ चुकी हो।
—मैं आप सबके लिए कमाने गई थी।
—तुम अपने बच्चों को छोड़कर गई थी।
यह वाक्य नंदिनी को किसी थप्पड़ की तरह लगा।
आरव तब चार साल का था।
मीरा सिर्फ़ दो साल की।
उसके पति की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी।
कर्ज़दार दरवाज़े पर खड़े थे।
तब सावित्री रोते हुए बोली थीं—
—विदेश चली जा, बेटा। बच्चों को हम पाल लेंगे। तू बस पैसे भेजती रहना। आखिर हम ही तो तेरा अपना खून हैं।
नंदिनी ने उन पर विश्वास कर लिया था।
उसने ऐसे कागज़ों पर हस्ताक्षर कर दिए थे जिन्हें वह समझती भी नहीं थी।
वह विमान में बैठ गई थी, जबकि मीरा एयरपोर्ट पर इतना रोई थी कि उसकी आवाज़ बैठ गई थी।
उसके बाद कई महीनों तक नंदिनी दूसरों के घर साफ़ करते हुए उनकी रसोई के तौलियों में चुपचाप अपने आँसू पोंछती रही।
और आज उसकी अपनी माँ उसी घाव को चाकू की तरह इस्तेमाल कर रही थी।
काव्या ने अपना फ़ोन और ऊपर उठा लिया।
—मम्मी, साफ़-साफ़ बोलिए। नहीं तो कल यह लोगों से कहेगी कि हमने इसे घर से निकाल दिया।
आख़िरकार अर्जुन बोला।
—दीदी, तमाशा मत कीजिए। अंदर मेहमान बैठे हैं।
दीदी।
बड़ी बहन।
उसके मुँह से यह शब्द बेशर्मी जैसा लगा।
नंदिनी ने उसके पार देखा।
हॉल के अंदर उसे लंबी डाइनिंग टेबल, नए परदे, स्प्लिट एसी, अर्जुन के परिवार की बड़ी फ़्रेम की हुई तस्वीर और चाँदी के सामान से भरी काँच की अलमारी दिखाई दी।
उसकी एक भी तस्वीर नहीं थी।
एक भी नहीं।
—अर्जुन, मैं हर महीने पैसे भेजती थी।
उसने झुंझलाकर लंबी साँस छोड़ी।
—फिर वही पैसों की बात? हर एनआरआई औरत को लगता है कि उसी ने अकेले भारत बनाया है।
नंदिनी उसे घूरती रही।
—एनआरआई?
काव्या हँस पड़ी।
—और क्या? तुम लोग विदेश जाते हो, कमाते हो, फिर यहाँ आकर अपने त्याग का ढोल पीटते हो। हमने भी यहाँ बहुत कुछ सहा है। हमने मम्मी का ध्यान रखा। सोसायटी संभाली। घर की देखभाल की।
—मेरे पैसों से।
शब्द बहुत धीमे निकले, लेकिन फाटक के पास खड़े हर व्यक्ति ने उन्हें सुन लिया।
सावित्री की आँखें चमक उठीं।
—मेरे पड़ोसियों के सामने अपनी आवाज़ मत ऊँची करो।
—तो फाटक खोलिए और अंदर बात कीजिए।
—नहीं।
यह एक शब्द उनके बीच खड़ी लोहे की सलाखों से भी ज़्यादा ठंडा था।
नंदिनी की उँगलियाँ और कस गईं।
—अम्मा, मैं स्टोररूम में सो जाऊँगी। किसी को परेशान नहीं करूँगी।
काव्या तुरंत बोली—
—स्टोररूम में मेरा योगा का सामान रखा है।
नंदिनी ने उसकी ओर देखा।
—तो बरामदे में।
अर्जुन झल्लाकर बोला—
—तुम पागल हो गई हो क्या? लोग देखेंगे।
सावित्री ने ठुड्डी ऊँची कर ली।
—मंदिर के पास जो महिलाओं का आश्रय है, वहाँ चली जाओ। वहाँ छोड़ी हुई औरतों को रखते हैं।
छोड़ी हुई औरतें।
नंदिनी ने इन्हीं लोगों को पालने के लिए रेगिस्तान पार किए थे।
और अब वे उसे आश्रय गृह का पता दे रहे थे।
पीछे खड़ी नौकरानी असहज महसूस कर रही थी।
पड़ोस का एक बच्चा स्कूल बैग लेकर वहीं रुक गया और उसे देखने लगा।
नंदिनी ने खुद को गहरी साँस लेने पर मजबूर किया।
—अम्मा, कम से कम मुझे आरव और मीरा से मिलने दीजिए।
एक सन्नाटा छा गया।
बहुत जल्दी।
बहुत भारी।
सावित्री की नज़रें बदल गईं।
अर्जुन ने काव्या की ओर देखा।
काव्या मुस्कुराना भूल गई।
नंदिनी को लगा जैसे उसके सीने के भीतर कुछ टूट गया हो।
—मेरे बच्चे कहाँ हैं?
सावित्री की आवाज़ तेज़ हो गई।
—वे अब बच्चे नहीं रहे। बड़े हो गए हैं। उनकी अपनी ज़िंदगी है।
—वे कहाँ हैं?
—तुम्हें अचानक उनकी याद कैसे आ गई?
नंदिनी फाटक के और पास आ गई।
—मैंने उनकी स्कूल फीस भेजी। कॉलेज की फीस भेजी। कपड़ों के पैसे भेजे। हर साल तुमने कहा कि वे पढ़ रहे हैं। तुमने मुझे उनकी मार्कशीट भी भेजी।
काव्या बड़बड़ाई—
—फिर वही पुरानी कहानी।
नंदिनी की आवाज़ काँप रही थी, लेकिन वह टूटी नहीं।
—मैं अपने बच्चों से मिलना चाहती हूँ।
सावित्री सलाखों के और करीब झुक गईं।
—वे तुमसे मिलना ही नहीं चाहते।
एक पल के लिए पूरी गली नंदिनी की आँखों के सामने धुँधली हो गई।
—यह झूठ है।
—उन्हें पता है कि तुम कैसी औरत हो।
—मैं कैसी हूँ?
काव्या ने मीठे ज़हर जैसी आवाज़ में जवाब दिया—
—ऐसी माँ जिसने अपने बच्चों से ज़्यादा दुबई के पैसों को चुना।
नंदिनी ने आँखें बंद कर लीं।
इक्कीस साल तक उसने अकेलेपन को सूखे चावल की तरह निगला था।
वह बच्चों के बुखार में उनके साथ नहीं थी।
स्कूल के पहले दिन नहीं थी।
जन्मदिन के केक नहीं देखे।
परीक्षा के नतीजे नहीं देखे।
किशोरावस्था की नाराज़गियाँ नहीं देखीं।
बेटी की पहली साड़ी नहीं देखी।
बेटे की पहली नौकरी नहीं देखी।
लेकिन उसने एक भी बार पैसे भेजना नहीं छोड़ा।
एक भी बार नहीं।
सावित्री ने नौकरानी की ओर मुड़कर कहा—
—साइड वाले कमरे से वह पुराना सूटकेस ले आओ।
नौकरानी हिचकिचाई।
—मैडम?
—ले आओ।
कुछ मिनट बाद वह धूल से भरा, आधा टूटा हुआ छोटा-सा नीला सूटकेस लेकर लौटी।
नंदिनी उसे पहचान गई।
वही सूटकेस जिसे वह भारत में छोड़कर गई थी।
सावित्री ने उसे फाटक के नीचे की खाली जगह से बाहर धक्का दे दिया।
वह पत्थर पर घिसटता हुआ नंदिनी के पैरों के पास आकर रुक गया।
—अपना सामान ले जाओ।
नंदिनी ने नीचे देखा।
—मेरा सामान?
—दो पुरानी साड़ियाँ, कुछ कागज़ और बेकार तस्वीरें। मैंने दया करके संभालकर रखी थीं।
अर्जुन ने भी जोड़ दिया—
—और अगली बार बिना फ़ोन किए मत आना। हमारी भी एक इज़्ज़त है।
नंदिनी धीरे-धीरे झुकी और सूटकेस का हैंडल पकड़ लिया।
फिर उसने सिर उठाया।
—इस घर की कीमत मैंने अपनी ज़िंदगी देकर चुकाई है।
सावित्री ज़ोर से हँस पड़ीं।
—अपनी ज़िंदगी? फ़िल्मी मत बनो। यह घर मेरे और अर्जुन के नाम पर है। कहीं भी जाकर जाँच लो।
काव्या फिर मुस्कुराई।
—बिल्कुल। कागज़ मायने रखते हैं, दीदी। भावनात्मक ड्रामा नहीं।
नंदिनी का चेहरा बिल्कुल स्थिर हो गया।
—कागज़ मायने रखते हैं?
अर्जुन एक कदम आगे बढ़ा।
—हाँ। कागज़ मायने रखते हैं। और कागज़ों में तुम्हारा यहाँ कुछ भी नहीं है।
तभी अंदर से किसी ने आवाज़ लगाई—
—अर्जुन, ख़रीदार पूछ रहा है कि मालिक तैयार हैं या नहीं।
नंदिनी का सिर झटके से उठा।
ख़रीदार।
यह शब्द किसी पत्थर की तरह आकर गिरा।
सावित्री तुरंत हॉल की ओर मुड़ीं।
काव्या ने फ़ोन थोड़ा नीचे कर लिया।
अर्जुन के चेहरे का रंग आधे पल के लिए उड़ गया।
नंदिनी ने एक-एक करके सबकी ओर देखा।
—कौन-सा ख़रीदार?
किसी ने जवाब नहीं दिया।
दोपहर की तपती गर्मी पूरी गली पर छाई हुई थी।
मंदिर की घंटी फिर बजी।
तभी मुख्य सड़क की ओर से एक तेज़ हॉर्न सुनाई दिया।
एक सफ़ेद इनोवा गली में मुड़ी।
फिर दूसरी।
फिर एक पुलिस की जीप।
वे गाड़ियाँ धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थीं।
न मेहमानों की तरह।
न रिश्तेदारों की तरह।
बल्कि ऐसे लोगों की तरह जिन्हें पहले से पता था कि किस पते पर आना है और जो अपना काम किए बिना लौटने वाले नहीं थे।
वे आकर राव निलयम के सामने रुक गईं।
फाटक के आसपास धूल उड़ने लगी।
सबसे पहले काले कोट में एक महिला वकील उतरी।
उसके पीछे दो अदालत के अधिकारी, एक बैंक मैनेजर और एक महिला कांस्टेबल उतरी, जिसके हाथ में भूरी रंग की सीलबंद फ़ाइल थी।
काव्या के हाथ से फ़ोन थोड़ा फिसल गया।
सावित्री फुसफुसाईं—
—अर्जुन… ये लोग कौन हैं?
नंदिनी अपनी जगह से नहीं हिली।
वकील सीधे फाटक तक आई, नंदिनी की ओर देखा और साफ़ आवाज़ में बोली—
—मैडम, क्या अब हम निरीक्षण की कार्यवाही शुरू करें?
और उस दिन पहली बार सावित्री राव ने अपनी बड़ी बेटी को ऐसे देखा, मानो वह उसे कभी जानती ही न रही हों।
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