
भाग 1
बारिश से भीगी दिल्ली की एक रात में, जब आखिरी बस लगभग खाली थी, 3 नशे में धुत लड़कों ने एक बूढ़े पूर्व सैनिक के जख्मी कुत्ते को लात मारने की कोशिश की—और उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि उसी पल उन्होंने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती कर दी थी।
रात के 11:40 बज रहे थे। डीटीसी की पुरानी नीली बस आईटीओ से कश्मीरी गेट की तरफ धीरे-धीरे बढ़ रही थी। बाहर जून की बारिश सड़क पर ऐसे गिर रही थी जैसे शहर की सारी थकान धो देना चाहती हो। बस के अंदर गीले कपड़ों, डीजल और पुराने लोहे की मिली-जुली गंध भरी थी। पीली ट्यूबलाइट बार-बार झपक रही थी, और खिड़की के शीशों पर पानी की धारियां दिल्ली की रोशनी को धुंधले धब्बों में बदल रही थीं।
सबसे पीछे की सीट पर सूबेदार अर्जुन राठौड़ बैठा था। 58 साल का, चौड़े कंधे, चेहरे पर पुराने घावों की लकीरें, और आंखें ऐसी ठंडी जैसे पहाड़ों की बर्फ के नीचे दबा हुआ पत्थर। उसकी खादी की फीकी जैकेट उसके शरीर को ढक रही थी, लेकिन भीतर छिपी सख्ती को नहीं छिपा पा रही थी। वह अब सेना में नहीं था। अब वह सिर्फ करोल बाग की एक छोटी किराए की कोठरी में रहने वाला एक शांत आदमी था, जिसकी पेंशन समय पर आती थी और नींद कभी समय पर नहीं आती थी।
उसके बाएं पैर से सटा बैठा था शेरू—एक जर्मन शेफर्ड। लेकिन वह किसी अमीर घर का सजावटी कुत्ता नहीं था। उसका शरीर दुबला मगर मजबूत था, फर गहरा भूरा-काला, और दाहिने कान से गर्दन तक एक लंबा निशान था। वह निशान कश्मीर की एक घाटी में हुए धमाके की याद था, जहां अर्जुन ने अपना आधा जीवन पीछे छोड़ दिया था। शेरू ने सांस भी अर्जुन की लय में ली। अर्जुन का अंगूठा उसके कॉलर पर हल्के से 2 बार दबा। शेरू का कान पीछे मुड़ा, पर उसकी नजर बस के दरवाजे पर ही रही।
बस में बस 3 और लोग थे—एक नर्स जो सफदरजंग अस्पताल की ड्यूटी के बाद खिड़की से सिर टिकाए सो रही थी, एक कॉलेज का लड़का जिसने हेडफोन लगाकर दुनिया से रिश्ता तोड़ लिया था, और एक डिलीवरी बॉय जो भीगे जूतों को देखता जा रहा था। सब थके हुए थे। सब बस घर पहुंचना चाहते थे।
फिर दरवाजा खुला।
बारिश के साथ 3 लड़के अंदर चढ़े। महंगे नकली जैकेट, तेज परफ्यूम, शराब की बदबू और आंखों में वह घमंड, जो अक्सर घर की बिगड़ी हुई परवरिश से आता है। आगे वाला लड़का मोटा गला, छोटे बाल और लाल आंखों वाला था। उसका नाम युवराज था। पीछे 2 दोस्त थे—एक लंबा-पतला, बेचैन, जिसका नाम रॉकी था, और दूसरा भारी शरीर वाला, हमेशा बेवकूफी से हंसता हुआ समीर।
युवराज ने कार्ड मशीन पर कार्ड इतनी जोर से मारा कि मशीन बीप करने की जगह कराह उठी।
ड्राइवर ने धीरे से कहा—आगे बढ़ो भाई, रात हो गई है।
युवराज हंसा—बस तेरे बाप की है क्या?
बस में बैठे लोग और चुप हो गए। नर्स की नींद खुली। रॉकी ने जानबूझकर उसके कंधे से टक्कर मारी।
—सॉरी मैडम, गलती से हो गया, उसने हंसते हुए कहा।
अर्जुन ने सिर नहीं उठाया। वह बस देख रहा था। वह 3 चेहरों को पढ़ चुका था। नशे में। अनुभवहीन। दिखावे में खतरनाक। पर बंद जगह में ऐसे लोग असली खतरा बन जाते हैं।
10 मिनट तक वे गालियां देते, सीटों पर पैर चढ़ाते, और बाकी यात्रियों को घूरते रहे। फिर युवराज की नजर पीछे बैठी उस जोड़ी पर गई—एक बूढ़ा आदमी और एक जख्मी कुत्ता।
उसके चेहरे पर गंदी मुस्कान फैल गई।
—ओए, देखो तो, फौजी अंकल अपना भेड़िया लेकर घूम रहे हैं।
अर्जुन ने धीरे से सांस छोड़ी।
—चुप रह, अपने आप से उसने कहा। बच्चे हैं। बेवकूफ हैं। जाने दे।
लेकिन युवराज आगे बढ़ आया।
—ए बूढ़े, बस में कुत्ते लाना मना है। पढ़ना नहीं आता क्या?
अर्जुन ने पहली बार सिर उठाया।
—यह सेवा कुत्ता है। हम घर जा रहे हैं। बात खत्म करो।
युवराज ने अपने दोस्तों की तरफ देखा और जोर से हंसा।
—बात खत्म करो? सुन रहे हो? अंकल ऑर्डर दे रहे हैं।
वह बिल्कुल पास आ गया। उसने नीचे झुककर शेरू को देखा। शेरू ने आवाज नहीं की। वह भौंका नहीं। उसने बस युवराज की गर्दन की तरफ देखा, जैसे कोई सैनिक निशाना तय करता है।
—बहुत बदसूरत है रे, युवराज बोला। किसने कान चबा लिया इसका?
और फिर उसने शेरू के सिर पर हाथ मारने के लिए हाथ उठाया।
हाथ नीचे आता, उससे पहले अर्जुन की उंगलियां बिजली की तरह उठीं। उसने युवराज की कलाई पकड़ ली। पकड़ इतनी शांत थी कि आवाज भी नहीं हुई, पर युवराज का चेहरा दर्द से पीला पड़ गया।
—कहा था, छोड़ दे।
युवराज ने छुड़ाने की कोशिश की। कलाई हिली तक नहीं। उसी पल उसे समझ आया—यह बूढ़ा कुत्ते को उससे नहीं बचा रहा था। यह उसे कुत्ते से बचा रहा था।
लेकिन उसके दोस्त देख रहे थे। उसका घमंड डर से बड़ा निकला।
—छोड़ मुझे, पागल बूढ़े!
उसने दूसरे हाथ से अर्जुन पर मुक्का चलाया। अर्जुन ने बस सिर थोड़ा हटाया और अपने भारी जूते से उसे सीने पर धक्का दिया। युवराज पीछे फिसलता हुआ रॉकी से टकराया और दोनों सीटों के बीच गिर पड़े।
बस झटके से रुकी। ड्राइवर चिल्लाया—पीछे क्या हो रहा है? पुलिस बुला रहा हूं!
अर्जुन बैठा रहा। फिर उसने धीरे से कहा—
—शेरू। खड़ा।
शेरू उठ गया।
बस की हवा बदल गई।
रॉकी ने जेब से लोहे की भारी टॉर्च निकाली। समीर ने कमर से फोल्डिंग चाकू खोला। युवराज उठते हुए दांत पीसकर बोला—
—अब तू और तेरा कुत्ता, दोनों यहीं खत्म।
अर्जुन ने चाकू देखा। टॉर्च देखी। फिर युवराज की कांपती आंखें देखीं। उसने शेरू की पट्टा क्लिप खोली। धातु की छोटी सी क्लिक बस में हथौड़े जैसी गूंजी।
—आखिरी मौका है। अगले स्टॉप पर उतर जाओ। वरना जान जाओगे कि इसे पट्टे की जरूरत क्यों नहीं पड़ती।
भाग 2
समीर ने चाकू कसकर पकड़ा, मगर उसकी उंगलियों में पसीना चमक रहा था। युवराज चीखा—मार इसे! बूढ़ा डर रहा है! लेकिन डर अर्जुन के चेहरे पर नहीं, युवराज की आवाज में था। बस के पीछे बैठा कॉलेज लड़का सीट पर सिकुड़ गया। डिलीवरी बॉय ने आंखें बंद कर लीं। ड्राइवर ने शीशे के केबिन से फिर चिल्लाया—मैंने पुलिस को फोन कर दिया है! कोई हिलेगा नहीं! अर्जुन ने उसकी ओर देखा भी नहीं। समीर चाकू लेकर लपका। वार सीधा नहीं था, नशे और घबराहट से भरा हुआ था। अर्जुन बस आधा कदम किनारे हुआ। चाकू हवा चीरता निकल गया। उसी पल अर्जुन की हथेली समीर की कलाई पर पड़ी। एक सूखी सी आवाज आई। चाकू फर्श पर गिर गया। समीर दर्द से चीखते हुए घुटनों पर आ गिरा। रॉकी ने टॉर्च उठाकर अर्जुन के सिर की तरफ झटका। अर्जुन ने पहली बार तेज आवाज में कहा—शेरू! शेरू अंधेरे की एक लकीर बनकर उछला। उसने रॉकी के हाथ को पकड़ा, गर्दन को नहीं। दांत कपड़े और मांस पर बंद हुए। रॉकी जमीन पर गिर पड़ा, चीखता हुआ। शेरू ने उसे फाड़ा नहीं, बस जकड़ लिया—जैसे उसे सिखाया गया था। युवराज अकेला रह गया। उसका चेहरा सफेद था। फिर भी उसने कमर की तरफ हाथ बढ़ाया। अर्जुन की आंखें बदल गईं। वह एक बूढ़ा आदमी नहीं रहा। वह फिर वही सूबेदार था जिसने पहाड़ों में रातें काटी थीं। उसने आगे बढ़कर युवराज के घुटने पर जूते की एड़ी मारी। युवराज का शरीर मुड़ गया। फिर अर्जुन की उंगलियां उसके सीने के नीचे लगीं। युवराज हवा के लिए मुंह खोलता हुआ फर्श पर गिर पड़ा। सब खत्म हो गया था। लेकिन तभी बस के बाहर लाल-नीली बत्तियां चमकीं। पुलिस आ चुकी थी। और अगले ही पल घायल रॉकी ने रोते हुए चीखा—इसी बूढ़े ने हम पर हमला किया! इसका कुत्ता पागल है! इसे गिरफ्तार करो!
भाग 3
बस के अंदर फिर वही चुप्पी लौट आई, लेकिन अब वह पहले जैसी डर की चुप्पी नहीं थी। यह वह चुप्पी थी जिसमें हर कोई सच जानता था, फिर भी कोई बोलने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था।
अर्जुन ने धीरे से शेरू के कॉलर पर हाथ रखा।
—छोड़।
शेरू ने तुरंत रॉकी का हाथ छोड़ दिया। उसने एक बार सिर झटका, फिर आकर अर्जुन के बाएं पैर से सटकर बैठ गया। उसका सीना तेज उठ-गिर रहा था, लेकिन आंखें अब भी आदेश की प्रतीक्षा में थीं। अर्जुन ने पट्टा फिर से लगा दिया। 2 हल्के थपथपाहट। शेरू शांत।
बस का दरवाजा खुला। 2 पुलिसवाले चढ़े। उनके पीछे एक महिला सब-इंस्पेक्टर थी—इंस्पेक्टर कविता नायर। बारिश उसके कंधों से टपक रही थी, पर उसकी नजर सीधी थी। उसने पहले फर्श पर पड़े चाकू को देखा, फिर रोते हुए रॉकी को, फिर समीर को जो अपनी कलाई पकड़े कराह रहा था, फिर युवराज को जो अब भी ठीक से सांस लेने की कोशिश कर रहा था।
—किसने शुरू किया? उसने सख्त आवाज में पूछा।
युवराज ने तुरंत उंगली अर्जुन की तरफ उठा दी।
—मैडम, इसने! हम तो चुपचाप बैठे थे। इसके कुत्ते ने काट लिया। यह पागल फौजी है। इसे बंद करो!
समीर दर्द में था, पर झूठ में साथ देने से पीछे नहीं हटा।
—हाँ मैडम, हमसे बिना वजह भिड़ गया। इसका कुत्ता खतरनाक है।
रॉकी की आंखों से आंसू बह रहे थे।
—मैडम, मेरा हाथ देखिए। मेरे बाप साहब विधायक के साथ काम करते हैं। इस बूढ़े को छोड़ना मत।
बस में बैठे लोग नीचे देखने लगे। नर्स उतर चुकी थी। डिलीवरी बॉय ने होंठ भींच लिए। कॉलेज का लड़का कांप रहा था। ड्राइवर अपने केबिन में सुरक्षित था, लेकिन उसका चेहरा बता रहा था कि उसने सब देखा है और फिर भी बोलना उसके लिए आसान नहीं होगा।
कविता नायर ने अर्जुन की तरफ देखा।
—नाम?
—सूबेदार अर्जुन राठौड़। सेवानिवृत्त।
—कुत्ता?
—शेरू। सेवा कुत्ता। सेना से रिटायर।
युवराज हंसा, मगर हंसी में दर्द था।
—सेवा कुत्ता? मैडम, ये सब ड्रामा है। ये दोनों रोड पर घूमने वाले गुंडे हैं।
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा तक नहीं। उसने अपनी जैकेट की अंदरूनी जेब से पुराना प्लास्टिक कार्ड निकाला। कार्ड भीग चुका था, किनारे मुड़े हुए थे। उस पर सेना की मुहर थी। नाम, सेवा संख्या, और नीचे लिखा था—कैनाइन हैंडलर यूनिट।
कविता ने कार्ड लिया। उसका चेहरा हल्का सा बदल गया। सम्मान और सावधानी साथ-साथ आ गए।
—आपने रिपोर्ट क्यों नहीं की कि आप इस रूट पर सेवा कुत्ते के साथ यात्रा करते हैं?
अर्जुन की आवाज थकी हुई थी।
—हर बार बताना पड़े कि आदमी और कुत्ता दोनों जिंदा बचे हैं, मैडम? टिकट खरीदा था। चुपचाप घर जा रहे थे।
बस में पहली बार किसी के चेहरे पर शर्म की छाया आई।
युवराज ने फिर चिल्लाने की कोशिश की।
—मैडम, आप इन्हें जानती नहीं! इन्होंने हम पर हमला किया। इनके कुत्ते को गोली मारनी चाहिए!
शेरू ने बस कान हिलाया। वह अब भी शांत बैठा था। अर्जुन की उंगलियां उसके सिर पर टिक गईं।
कविता ने ड्राइवर की तरफ देखा।
—सीसीटीवी चलता है?
ड्राइवर ने गला साफ किया।
—मैडम… कभी-कभी बंद रहता है।
—आज?
ड्राइवर चुप।
कविता की नजर तेज हो गई।
—आज?
ड्राइवर ने धीरे से कहा—
—चल रहा था।
युवराज का चेहरा पहली बार सचमुच डर से भर गया।
—वीडियो देखिए, कविता ने कहा।
ड्राइवर ने अनिच्छा से स्क्रीन चालू की। पुरानी फुटेज झटकों में चल रही थी, पर सब साफ था—तीनों लड़कों का चढ़ना, नर्स को धक्का देना, युवराज का अर्जुन को छेड़ना, शेरू पर हाथ उठाना, चाकू निकालना, टॉर्च उठाना, और अर्जुन का हर वार सिर्फ रोकने के लिए करना।
कविता ने बिना कुछ कहे वीडियो देखा। फिर युवराज की तरफ मुड़ी।
—तुम्हारे पिता कौन हैं, यह बाद में देखेंगे। पहले यह देखेंगे कि रात की बस में 3 लड़कों ने बुजुर्ग पूर्व सैनिक और उसके सेवा कुत्ते पर चाकू लेकर हमला क्यों किया।
युवराज चीखा—
—मैडम, आप समझ नहीं रहीं। मेरा नाम युवराज मल्होत्रा है!
कविता ने ठंडी आवाज में कहा—
—और कानून का नाम भारत है।
2 कांस्टेबलों ने तीनों लड़कों को उठाया। युवराज ने दर्द से कराहते हुए विरोध किया, पर अब उसके शब्दों में वह जहर नहीं था। उसकी आंखों में सिर्फ घबराहट थी।
रॉकी रो रहा था।
—मैडम, मेरा हाथ…
—अस्पताल ले जाएंगे, कविता ने कहा। और फिर थाने।
समीर कराहते हुए बोला—
—हमसे गलती हो गई।
अर्जुन ने पहली बार उसकी तरफ देखा।
—गलती तब होती है जब पैर फिसलता है। तुम लोगों ने किसी को कमजोर समझकर चुना था।
यह वाक्य बस के अंदर पत्थर की तरह गिरा।
कविता ने अर्जुन से कहा—
—आपको भी बयान देना होगा।
अर्जुन ने सिर हिलाया।
—दूंगा। लेकिन शेरू को भीगने मत दीजिए। उसके पुराने घाव में ठंड लगती है।
कविता कुछ पल उसे देखती रही। शायद उसने पहली बार उस आदमी को सिर्फ एक कठोर पूर्व सैनिक की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसे थके हुए इंसान की तरह देखा जिसके पास दुनिया से बचा हुआ बस एक साथी था।
—आप दोनों जीप में बैठिए, उसने कहा। बयान थाने में ले लेंगे।
अर्जुन ने शेरू को साथ चलने का इशारा किया। वह बस से उतरने लगा, तभी पीछे से कांपती आवाज आई।
—अंकल…
कॉलेज वाला लड़का खड़ा था। उसके हेडफोन गले में लटक रहे थे। चेहरा पीला था, पर आंखों में कुछ बदल चुका था।
—मैंने वीडियो बनाया है। जब उन्होंने कुत्ते को मारने की कोशिश की थी। मैं… मैं डर गया था। लेकिन अगर जरूरत पड़े तो मैं गवाही दूंगा।
अर्जुन रुक गया।
पूरी बस ने उस लड़के को देखा। डिलीवरी बॉय ने भी धीरे से हाथ उठाया।
—मैडम, मैंने भी देखा। गलती उन लड़कों की थी।
ड्राइवर ने शर्मिंदा होकर कहा—
—मैडम, सीसीटीवी की कॉपी दे दूंगा।
कविता ने सबके बयान नोट करने को कहा।
अर्जुन ने कॉलेज लड़के को देखा। उसकी आंखों में पहली बार कठोरता कम हुई।
—डरना गलत नहीं है, बेटा। डरकर चुप रह जाना गलत है।
लड़के ने सिर झुका लिया।
थाने पहुंचते-पहुंचते रात 12:30 हो गई। बाहर बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी। थाने के बरामदे में पुरानी चाय की गंध, भीगे जूतों की मिट्टी और टेबल फैन की खरखराहट फैली थी। शेरू अर्जुन की कुर्सी के पास बैठा रहा। हर बार जब कोई बहुत तेज आवाज में बोलता, उसका कान उठ जाता, लेकिन अर्जुन की उंगलियां उसके कॉलर को छूतीं तो वह शांत हो जाता।
बयान लिखे गए। वीडियो सुरक्षित किया गया। चाकू जब्त हुआ। युवराज के पिता का फोन आया। फिर किसी बड़े आदमी का फोन आया। फिर एक और फोन। कविता नायर ने हर फोन पर बस एक ही जवाब दिया—
—मामला दर्ज हो चुका है।
युवराज की आंखों से अब नशा उतर चुका था। पट्टी बंधे घुटने के साथ वह कुर्सी पर बैठा था। उसके पिता, महंगे कुर्ते और घबराई हुई इज्जत के साथ थाने आए। उन्होंने पहले बेटे को देखा, फिर अर्जुन को।
—देखिए सूबेदार साहब, बच्चे हैं। गलती हो जाती है। आप चाहें तो हम इलाज का खर्च, मुआवजा…
अर्जुन ने उनकी बात बीच में नहीं काटी। वह सुनता रहा। फिर उसने धीरे से पूछा—
—जब आपका बेटा नर्स को धक्का दे रहा था, वह भी बच्चा था? जब उसने सेवा कुत्ते को मारने के लिए हाथ उठाया, तब भी बच्चा था? जब चाकू निकला, तब भी बच्चा था?
युवराज के पिता की आवाज धीमी पड़ गई।
—समाज में इज्जत होती है हमारी।
अर्जुन ने कहा—
—इज्जत घर की दीवारों पर लगी नेमप्लेट से नहीं बनती। सड़क पर अनजान इंसान के साथ कैसा व्यवहार करते हो, उससे बनती है।
कुछ देर कोई बोला नहीं।
तभी शेरू ने हल्की सी कराह निकाली। अर्जुन तुरंत झुका। उसने शेरू के पुराने निशान के पास हाथ रखा। ठंड और तनाव से कुत्ते का शरीर थोड़ा कांप रहा था। अर्जुन ने अपनी जैकेट उतारी और शेरू पर डाल दी।
कविता यह दृश्य देख रही थी। उसने धीरे से पूछा—
—कश्मीर में था यह आपके साथ?
अर्जुन ने सिर हिलाया।
—3 साल। उससे पहले ट्रेनिंग सेंटर। एक रात बर्फबारी में पोस्ट पर हमला हुआ। धुआं, गोलियां, चीखें। मुझे कुछ दिख नहीं रहा था। इसी ने मुझे खींचकर पत्थर के पीछे गिराया। उसी धमाके में इसका कान गया। मेरी जान बची।
कविता ने पूछा—
—और इसके बाद?
—इसके बाद मैं लौट आया। यह भी लौट आया। बाकी लोग नहीं लौटे।
यह सुनकर थाने की हवा भारी हो गई। डिलीवरी बॉय, जो बयान देने रुका था, चुपचाप नीचे देखने लगा। कॉलेज लड़के ने गहरी सांस ली। युवराज भी पहली बार चुपचाप अर्जुन और शेरू को देख रहा था। शायद पहली बार उसे समझ आया कि जिसे वह मजाक समझ रहा था, वह किसी की बची हुई दुनिया थी।
सुबह 4 बजे तक सारी कार्रवाई पूरी हुई। युवराज, रॉकी और समीर पर हमला, धमकी, सार्वजनिक परिवहन में हिंसा और हथियार रखने की धाराएं लगीं। मेडिकल के लिए ले जाते समय युवराज ने अर्जुन की तरफ देखा। उसके चेहरे पर अब गुस्सा नहीं था।
—मुझे नहीं पता था… उसने धीमे से कहा।
अर्जुन ने जवाब दिया—
—पता करना जरूरी नहीं था। इंसान होना काफी था।
युवराज ने सिर झुका लिया।
कुछ महीनों बाद मामला अदालत में गया। बस का वीडियो सोशल मीडिया पर फैल गया, लेकिन अर्जुन ने किसी चैनल को इंटरव्यू नहीं दिया। लोग उसे हीरो कहने लगे। किसी ने लिखा—दिल्ली बस का असली शेर। किसी ने लिखा—बूढ़ा फौजी और उसका योद्धा कुत्ता। किसी ने शेरू की तस्वीर पर फूलों वाली एडिट बना दी। लेकिन अर्जुन को इन सब से फर्क नहीं पड़ा। उसे वायरल होना नहीं था। उसे बस रातों में चैन चाहिए था।
अदालत में नर्स भी आई। वह वही थी जो उस रात पहले स्टॉप पर उतर गई थी। उसने रोते हुए कहा—
—मैं डर गई थी। मुझे उतरना नहीं चाहिए था। पर मैंने उन्हें मुझे धक्का देते देखा था। मैंने सोचा अगर मैं चुप रही तो पूरी जिंदगी शर्मिंदा रहूंगी।
कॉलेज लड़के ने वीडियो दिया। डिलीवरी बॉय ने बयान दोहराया। ड्राइवर ने फुटेज की पुष्टि की। इंस्पेक्टर कविता नायर ने साफ कहा कि अर्जुन ने सिर्फ आत्मरक्षा में कार्रवाई की और शेरू प्रशिक्षित सेवा कुत्ता है, खतरनाक आवारा जानवर नहीं।
अदालत ने अर्जुन को पूरी तरह निर्दोष माना। युवराज और उसके दोनों साथियों को सजा मिली—जेल, जुर्माना, सार्वजनिक माफी और 1 साल तक पूर्व सैनिक पुनर्वास केंद्र में सेवा का आदेश।
अर्जुन ने उस आदेश पर कोई मुस्कान नहीं दिखाई। लेकिन जब उसने सुना कि युवराज को उन्हीं सैनिकों की सहायता करनी होगी जो युद्ध से लौटे थे, तो उसने बस इतना कहा—
—शायद देर से ही सही, वह कुछ सीखेगा।
सजा के बाद युवराज को पहली बार एक पुनर्वास केंद्र भेजा गया। वहां उसने ऐसे जवान देखे जिनके पैर नहीं थे, जिनकी आंखें नहीं थीं, जिनकी नींद नहीं थी। उसने ऐसे कुत्ते देखे जो इंसानों को भीड़ में रास्ता दिलाते थे, दौरे से पहले उन्हें सचेत करते थे, और रात के डर से बाहर खींचते थे। एक दिन उसने शेरू जैसा ही एक बूढ़ा लैब्राडोर देखा, जो एक सैनिक के सीने पर सिर रखे बैठा था ताकि उसका कांपना रुक सके।
उस दिन युवराज बहुत देर तक चुप रहा।
करीब 8 महीने बाद अर्जुन अपनी गली में सुबह चाय लेने निकला। शेरू उसके साथ था। बरसात का मौसम फिर लौट आया था। सड़क किनारे पीपल के पत्तों से पानी टपक रहा था। चायवाले ने कहा—
—सूबेदार साहब, आज शेरू के लिए बिस्कुट?
अर्जुन ने सिर हिलाया।
तभी पीछे से आवाज आई—
—सूबेदार साहब।
अर्जुन मुड़ा। युवराज खड़ा था। पहले वाला घमंड नहीं था। बाल सामान्य थे, कपड़े सादे, आंखों में थकान और शर्म। उसके हाथ में एक छोटा पैकेट था।
शेरू ने उसे पहचाना। कान तन गए। अर्जुन की उंगलियां तुरंत कॉलर पर गईं।
युवराज ने धीरे से दोनों हाथ ऊपर कर दिए।
—मैं पास नहीं आऊंगा। बस… माफी मांगनी थी।
अर्जुन चुप रहा।
युवराज ने पैकेट जमीन पर रखा।
—यह शेरू के लिए है। डॉक्टर से पूछकर लिया है। जोड़ों के लिए सप्लीमेंट है। मुझे पता है इससे कुछ ठीक नहीं होगा। उस रात मैंने जो किया… मैं इंसान नहीं था।
अर्जुन ने पैकेट नहीं उठाया।
—अब इंसान हो?
युवराज की आंखें भर आईं।
—कोशिश कर रहा हूं।
यह जवाब सुनकर अर्जुन के चेहरे पर पहली बार हल्की सी नरमी आई। उसने शेरू की तरफ देखा। शेरू अब भी सावधान था, पर गरज नहीं रहा था।
अर्जुन ने कहा—
—माफी शब्द से शुरू होती है। भरोसा काम से लौटता है।
युवराज ने सिर झुका लिया।
—मैं पुनर्वास केंद्र में सेवा जारी रखना चाहता हूं। सजा खत्म होने के बाद भी। मैंने आवेदन दिया है।
अर्जुन ने कुछ नहीं कहा। वह चाय उठाकर जाने लगा। फिर 2 कदम बाद रुका।
—कभी किसी शांत आदमी को कमजोर मत समझना।
युवराज ने कहा—
—कभी नहीं।
अर्जुन और शेरू आगे बढ़ गए।
उस शाम अर्जुन ने अपने छोटे कमरे में शेरू के लिए चावल और चिकन मिलाया। बाहर बारिश फिर तेज हो गई थी। दीवार पर पुराने मेडल टंगे थे, मगर उन पर धूल जमी थी। बिस्तर के पास एक फोटो थी—जवान अर्जुन, बर्फ से ढकी पोस्ट, और उसके पास जवान शेरू, कान पूरे, आंखें चमकती हुईं।
शेरू अब बूढ़ा हो चुका था। चलते समय उसका पिछला पैर हल्का कांपता था। रात में कभी-कभी वह नींद में धीमे से कराहता था। अर्जुन तब उठकर उसके पास बैठ जाता, ठीक वैसे ही जैसे शेरू कभी उसके बुरे सपनों के समय उसके सीने से सट जाता था।
उस रात भी बिजली कड़की। अर्जुन की नींद टूटी। उसका हाथ अनजाने में खाली जगह टटोलने लगा, जैसे किसी अदृश्य हथियार को पकड़ना चाहता हो। तभी शेरू धीरे से उठा, उसके बिस्तर के पास आया और अपना सिर अर्जुन के हाथ के नीचे रख दिया।
अर्जुन की सांसें धीरे हुईं।
—हां भाई, उसने फुसफुसाकर कहा। युद्ध खत्म हो गया।
शेरू ने आंखें बंद कर लीं।
बाहर दिल्ली की बारिश शहर को धोती रही। कहीं कोई बस देर रात खाली सड़कों पर चल रही होगी। कहीं कोई आदमी घर पहुंचने की कोशिश कर रहा होगा। कहीं कोई चुप आदमी बस चुप रहना चाहता होगा।
और करोल बाग की उस छोटी सी कोठरी में, एक बूढ़ा सैनिक और उसका जख्मी कुत्ता एक-दूसरे की पहरेदारी करते रहे—जैसे दुनिया कितनी भी निर्दयी हो जाए, कुछ रिश्ते आदेश से नहीं, बलिदान से बनते हैं।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.