
भाग 1
उस रात नंदिनी मेहरा अपने ही परिवार के सामने बेइज्जत होने से बचने के लिए बर्फ में खड़े एक अजनबी से हाथ जोड़कर कह रही थी कि वह बस 1 घंटे के लिए उसका पति बन जाए।
शिमला के बाहर बसे छोटे पहाड़ी कस्बे कुफरी में दिसंबर की ठंड हड्डियों तक उतर रही थी। सड़कें सफेद बर्फ से ढकी थीं, देवदारों की शाखाएँ झुक चुकी थीं और “पहाड़ी रसोई” नाम के पुराने रेस्टोरेंट की खिड़कियों के भीतर गर्म पीली रोशनी, हँसी और बर्तनों की आवाजें गूँज रही थीं। बाहर, रिकवरी वैन के पास खड़ा राघव रावत अपनी जैकेट की जेब में हाथ डाले शीशे से बर्फ खुरच रहा था।
राघव 36 साल का था। कस्बे में लोग उसे उस आदमी के रूप में जानते थे जो रात के 2 बजे भी फोन उठाता था, गाड़ी खाई के किनारे फँसी हो तो पहुँच जाता था, पैसे कम लेता था और चाय का निमंत्रण मिलने से पहले चला जाता था। उसकी पत्नी शालिनी को गुज़रे 4 साल हो चुके थे। बीमारी तेज थी, विदाई छोटी थी, और उसके बाद राघव ने दुनिया से रिश्ता इतना छोटा कर लिया था कि वह उसकी रिकवरी वैन और घर की रसोई की मेज तक सिमट गया था। उस मेज पर 2 कुर्सियाँ थीं, मगर 4 साल से सिर्फ 1 पर कोई बैठता था।
उसी समय रेस्टोरेंट का दरवाजा खुला और नंदिनी तेज कदमों से बाहर निकली। वह शायद रोने से खुद को रोक रही थी। उसकी रेशमी साड़ी का पल्लू हवा में काँप रहा था, माथे की बिंदी थोड़ी तिरछी हो गई थी और आँखों में ऐसा डर था जैसे भीतर कोई अदालत लगी हो। बर्फ पर उसका पैर फिसला, और वह गिरती, उससे पहले राघव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
—सावधान, चोट लग जाती।
नंदिनी ने उसकी ओर देखा। कुछ पल तक वह बोल ही नहीं पाई। फिर उसने रेस्टोरेंट की खिड़की की तरफ देखा। अंदर एक लंबी मेज पर उसकी माँ, मौसियाँ, चचेरे भाई-बहन और सबसे अंत में बैठा करण मल्होत्रा दिखाई दे रहा था। वही करण, जिससे नंदिनी ने 3 साल रिश्ता निभाया था और फिर टूटकर निकल आई थी।
—आप ठीक हैं? राघव ने पूछा।
नंदिनी की आवाज काँप गई।
—नहीं। मैं बिल्कुल ठीक नहीं हूँ। अंदर मेरा पूरा परिवार बैठा है। 2 साल से मैंने उनसे कहा हुआ है कि मेरी शादी हो चुकी है। मैंने एक पति बना लिया था… झूठ में। क्योंकि हर बार वे करण से शादी न करने का ताना देते थे। आज सब उसे देखने आए हैं। और वह आदमी है ही नहीं।
राघव चुप रह गया।
—कृपया, नंदिनी ने लगभग विनती की। आप अंदर चलिए। बस 1 घंटे के लिए। मैं आपको पैसे दूँगी। जितने कहेंगे। बस कह दीजिए कि आप मेरे पति हैं। वरना आज वे मुझे जिंदा निगल जाएँगे।
राघव ने उसका हाथ धीरे से छोड़ दिया।
—नहीं।
नंदिनी का चेहरा बुझ गया। वह पीछे हटने लगी।
—माफ कीजिए। मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए था।
—नहीं, राघव ने फिर कहा। मैं अंदर चलूँगा। तुम्हारे साथ बैठूँगा। लेकिन नाटक नहीं करूँगा।
नंदिनी ठिठक गई।
—मतलब?
राघव ने पहली बार सीधे उसकी आँखों में देखा।
—मैं बहुत थक चुका हूँ झूठ बोलने से। अगर मैं अंदर जाकर खुद को तुम्हारा पति कहूँगा, तो उस एक रात के लिए मैं सचमुच उसी जिम्मेदारी से बैठूँगा। तुम्हारा हाथ पकड़ूँगा तो दिखावे के लिए नहीं। तुम्हारा अपमान हुआ तो चुप नहीं रहूँगा। कल क्या होगा, यह कल देखेंगे। मगर आज अगर तुम्हारे साथ चलूँगा, तो आधा सच नहीं बोलूँगा।
नंदिनी उसे देखती रह गई। बाहर बर्फ गिर रही थी। अंदर उसकी बरसों की बेइज्जती उसका इंतज़ार कर रही थी।
तभी रेस्टोरेंट का दरवाजा खुला और करण बाहर आया। उसके चेहरे पर मुस्कान थी, मगर आँखों में शिकारी जैसी चमक।
—नंदिनी, उसने ऊँची आवाज में कहा, सब तुम्हारे महान पति का इंतज़ार कर रहे हैं। या फिर आज सच बोलने का मन है?
नंदिनी का हाथ ठंडा पड़ गया। राघव ने बिना सोचे उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया और बोला—
—चलो। अब उन्हें इंतज़ार नहीं करवाते।
भाग 2
रेस्टोरेंट में कदम रखते ही पूरी मेज पर सन्नाटा उतर आया। नंदिनी की माँ सविता देवी ने पहले बेटी को देखा, फिर राघव को, जैसे किसी कपड़े की सिलाई में गलती ढूँढ़ रही हों। नंदिनी ने काँपती आवाज में कहा—माँ, ये राघव हैं… मेरे पति। करण ने गिलास मेज पर रखा और हँस पड़ा—अच्छा? 2 साल बाद दर्शन हुए। राघव ने सबको नमस्ते किया और शांत बैठ गया। सवालों की बारिश शुरू हुई। कहाँ मिले? कब शादी हुई? परिवार क्यों नहीं आया? राघव ने झूठी चमक नहीं लगाई। उसने कहा कि वह पहाड़ों में फँसी गाड़ियाँ निकालने का काम करता है, रातों में काम करता है, और नंदिनी से पहली बार एक बरसाती मोड़ पर मिला था, जब उसकी कार बंद हो गई थी। नंदिनी ने उसकी ओर देखा, क्योंकि यह कहानी सच नहीं थी, पर राघव ने उसे ऐसा कहा जैसे वह उस सच को जन्म दे रहा हो जो दोनों को चाहिए था। करण तुरंत बोला—अजीब है, नंदिनी तो कहती थी तुम दोनों एक बड़े चैरिटी समारोह में मिले थे। मेज की निगाहें राघव पर टिक गईं। राघव मुस्कराया—समारोह में मैंने उसे पहली बार सबके सामने अपना कहा था। पर असली मुलाकात हमेशा चमक में नहीं होती, कभी-कभी ठंडे मोड़ पर होती है, जहाँ कोई छोड़कर चला जाता है और कोई रुक जाता है। करण का चेहरा कस गया। नंदिनी की उँगलियाँ मेज के नीचे राघव की हथेली खोजने लगीं। खाना आगे बढ़ा, पर हवा भारी रही। तभी सविता देवी ने पूछा—पहले शादी हुई थी तुम्हारी? राघव ने सिर झुका दिया—हाँ। शालिनी। 4 साल पहले चली गई। बीमारी से। सन्नाटा बदल गया। पहली बार किसी ने उसे शक से नहीं, दर्द से देखा। करण को यह नरमी बर्दाश्त नहीं हुई। जाते समय वह राघव के पास झुका और फुसफुसाया—कितना ले रही है तुम्हारी गरीबी? मैं दोगुना दूँगा, गायब हो जाओ। राघव ने शांत स्वर में कहा—तुमने नंदिनी को 3 साल जाना, फिर भी यह नहीं समझे कि वह अकेली अपमान सह लेगी, मगर ऐसे आदमी के पास नहीं लौटेगी जो उसे छोटा महसूस कराए। उसी पल करण ने जेब से फोन निकाला और मेज पर एक रिकॉर्डिंग चला दी, जिसमें नंदिनी अपनी सहेली से कह रही थी—मैंने पति बना लिया है, वरना माँ मुझे करण के सामने झुका देंगी।
भाग 3
रिकॉर्डिंग की आवाज रेस्टोरेंट में फैल गई। हर शब्द नंदिनी के चेहरे पर थप्पड़ की तरह पड़ रहा था। उसकी माँ की आँखों में हैरानी, मौसियों के चेहरों पर जीत जैसी जिज्ञासा, और करण के होंठों पर वही पुरानी मुस्कान थी—वह मुस्कान जो कहती थी, “देखा, मैं सही था।”
नंदिनी कुर्सी से उठी। उसका चेहरा सफेद पड़ गया था। उसने कुछ कहना चाहा, पर गला बंद हो गया। 2 साल का झूठ अब उसकी थाली में रखा था, और पूरा परिवार उसे काटकर देख रहा था।
सविता देवी की आवाज बहुत धीमी थी, मगर उसमें पहाड़ टूटने जैसा वजन था।
—नंदिनी… यह सच है?
नंदिनी ने माँ की तरफ देखा। उस नजर में शर्म थी, गुस्सा था, थकान थी और एक बच्ची की पुरानी चोट भी थी।
—हाँ, माँ। सच है। मैंने झूठ बोला। क्योंकि जब मैंने करण को छोड़ा था, आपने मुझे नहीं पूछा कि उसने मुझे क्यों रुलाया। आपने बस पूछा कि मैं उससे शादी करके सुरक्षित क्यों नहीं हो गई। हर त्योहार पर, हर पूजा पर, हर रिश्तेदार के सामने आपने मुझे ऐसा देखा जैसे मैं अधूरी हूँ। तो मैंने एक आदमी बना लिया। कम से कम वह चुप रहता था। ताना नहीं देता था।
मेज पर किसी ने साँस तक नहीं ली।
करण ने तालियाँ बजाने जैसी हरकत की।
—वाह। अब रोना शुरू। यही करती है यह। पहले झूठ, फिर आँसू।
राघव धीरे से खड़ा हुआ। वह ऊँची आवाज वाला आदमी नहीं था। उसके जीवन ने उसे चिल्लाना नहीं, टिकना सिखाया था। लेकिन उस रात उसकी चुप्पी भी आवाज बन गई।
—काफी हो गया।
करण उसकी ओर मुड़ा।
—तुम बोलोगे? किराए के पति?
राघव ने कोई गुस्सा नहीं दिखाया।
—मैं किराए पर नहीं आया। मुझे पैसे की पेशकश हुई थी, मैंने नहीं लिए। मैं यहाँ इसलिए आया क्योंकि बर्फ में एक औरत ने मुझसे मदद माँगी थी, और मैं 4 साल से किसी की मदद करके भी इंसान की तरह जीना भूल गया था।
सविता देवी ने सिर उठाया।
राघव ने आगे कहा—
—हाँ, आज तक इनकी शादी मुझसे नहीं हुई थी। यह सच है। मगर यह भी सच है कि करण जैसे आदमी ने इन्हें इतना अकेला कर दिया कि इन्होंने झूठे पति को असली लोगों से बेहतर समझा। आप सब सोचिए, कोई लड़की क्यों अपने लिए पति गढ़ती है? मज़े के लिए? नहीं। क्योंकि उसके घर में उसकी बात की कीमत उसके मंगलसूत्र से कम समझी गई।
नंदिनी की आँखों से आँसू गिरने लगे।
राघव ने पहली बार पूरे परिवार की तरफ देखा।
—मेरी पत्नी शालिनी जब मर रही थी, उसने मुझसे कहा था कि उसके जाने के बाद दुनिया का दरवाजा बंद मत करना। मैंने अगले ही दिन दरवाजा बंद कर दिया। घर की मेज पर 2 कुर्सियाँ थीं, मगर 1 कुर्सी खाली रखकर मैंने खुद को समझा लिया कि वफादारी का मतलब उम्र भर अकेले बैठना है। 4 साल तक मैं रात में गाड़ियाँ खाई से निकालता रहा और सुबह खुद अपने भीतर की खाई में उतर जाता था। फिर आज यह स्त्री बर्फ में खड़ी मिली और उसने कहा, मेरे साथ अंदर चलो। उसे लगा वह मुझसे बचाई जाएगी। सच यह है कि उसने मुझे बचाया।
करण हँसा, पर आवाज कमजोर थी।
—क्या भाषण है। दुख बेचोगे अब?
राघव ने उसकी तरफ मुड़कर कहा—
—दुख बेचने की चीज नहीं होती, करण। दुख छिपाने की चीज भी नहीं होती। तुमने 3 साल नंदिनी को यह सिखाया कि वह कम है। आज तुमने सोचा, इस रिकॉर्डिंग से वह टूट जाएगी। मगर तुमने गलती कर दी। तुमने झूठ पकड़ा, वजह नहीं पकड़ी।
नंदिनी काँपते हुए बोली—
—राघव, रहने दीजिए।
—नहीं, उसने कोमल पर दृढ़ स्वर में कहा। आज कोई तो पूरा सच बोलेगा।
सविता देवी की आँखें अब नंदिनी पर थीं। पहली बार उनमें गुस्से से ज्यादा पछतावा दिखाई दे रहा था।
करण ने फोन उठाया और बोला—
—आंटी, आप देख रही हैं न? आपकी बेटी ने 2 साल आपको बेवकूफ बनाया। और यह आदमी भी उसी झूठ में शामिल है।
सविता देवी ने धीमे से पूछा—
—करण, तुमने यह रिकॉर्डिंग कैसे पाई?
करण का चेहरा एक पल को बदल गया।
—मुझे भेजी गई थी।
—किसने?
वह चुप हो गया।
नंदिनी की छोटी चचेरी बहन अनन्या, जो अब तक सिर झुकाए बैठी थी, अचानक रो पड़ी।
—मैंने भेजी थी, मासी। करण भैया ने कहा था अगर न भेजी तो वह मेरी कॉलेज वाली तस्वीरें घर में दिखा देंगे। उन्होंने कहा था नंदिनी दीदी झूठी हैं और उन्हें सबके सामने रोकना जरूरी है।
मेज पर जैसे बिजली गिर गई।
नंदिनी ने अनन्या की तरफ देखा। अनन्या हाथ जोड़कर बोली—
—दीदी, माफ कर दो। मैं डर गई थी।
करण उठ खड़ा हुआ।
—बकवास! बच्ची झूठ बोल रही है।
सविता देवी अब धीरे-धीरे खड़ी हुईं। उनकी उम्र चेहरे पर थी, पर आवाज में पहली बार वह कठोरता थी जो किसी माँ को देर से आती है, मगर जब आती है तो दीवार बन जाती है।
—करण, तुमने मेरी बेटी को 3 साल छोटा महसूस कराया। फिर 2 साल उसके झूठ का इंतज़ार किया, ताकि उसे सबके सामने नंगा कर सको। और अब मेरी भांजी को धमका रहे हो?
करण ने चारों तरफ देखा, जैसे कोई उसका पक्ष लेगा। मगर आज मेज पर कोई नहीं था। जिन मौसियों ने अभी तक फुसफुसाकर नंदिनी का न्याय किया था, वे भी चुप थीं।
सविता देवी ने दरवाजे की ओर इशारा किया।
—जाओ। अभी। और आज के बाद मेरे घर, मेरी बेटी, मेरे परिवार के पास मत आना।
करण ने ताना मारने की कोशिश की, पर शब्द सूख गए। उसने फोन जेब में डाला, कुर्सी को धक्का दिया और बाहर चला गया। खिड़की से दिखा, बर्फ अब भी गिर रही थी। फर्क बस इतना था कि इस बार नंदिनी अकेली बाहर नहीं थी।
उस रात खाना अधूरा रह गया। रिश्तेदार धीरे-धीरे उठने लगे। कुछ ने नंदिनी से आँखें चुराईं, कुछ ने उसके कंधे पर हाथ रखा। अनन्या उसके पैरों में गिरने लगी, पर नंदिनी ने उसे उठाकर सीने से लगा लिया।
—गलती तेरी नहीं है। डर की है। और डर वही लगाता है जिसे पता होता है कि वह प्यार से जीत नहीं सकता।
सविता देवी पास आईं। उनका चेहरा टूट चुका था।
—नंदिनी, मैंने तेरी बात कभी पूरी सुनी ही नहीं।
नंदिनी ने आँसू पोंछे।
—आपने सुनी होती तो शायद मुझे पति बनाने की जरूरत नहीं पड़ती, माँ।
यह वाक्य सविता देवी को भीतर तक चीर गया। उन्होंने बेटी का हाथ पकड़ लिया।
—मुझे माफ कर दे। मैं समाज से डरती रही। लोगों से डरती रही। उम्र निकल रही है, लड़की अकेली है, रिश्तेदार क्या कहेंगे… यही सोचती रही। यह नहीं देखा कि मेरी बेटी हर बार मेरे सामने थोड़ी और चुप हो जाती थी।
राघव पीछे हट गया। यह माँ-बेटी का क्षण था। वह बाहर आ गया और अपनी रिकवरी वैन के पास खड़ा हो गया। ठंडी हवा में उसकी साँस धुआँ बनकर उठ रही थी। कुछ देर बाद नंदिनी बाहर आई।
—आप फिर भाग आए, उसने हल्की आवाज में कहा।
—आदत है। काम करके निकल जाने की।
—आज मत जाइए।
राघव ने उसकी ओर देखा।
—आज अगर रुक गया तो फिर सच बोलना पड़ेगा।
—तो बोलिए।
राघव ने बर्फ की तरफ देखा।
—4 साल से मेरे घर की मेज पर 2 कुर्सियाँ हैं। 1 पर मैं बैठता हूँ, दूसरी पर मेरी याद बैठती थी। आज पहली बार लगा कि शायद वह कुर्सी किसी जीवित इंसान के इंतज़ार में थी, सिर्फ दुख के नहीं।
नंदिनी की आँखें भर आईं।
—मेरे पास देने को कुछ नहीं है, राघव। न बड़ी नौकरी, न बड़ी जमा-पूँजी, न साफ अतीत। मेरे पास उलझा हुआ परिवार है, झूठ है, डर है।
—मेरे पास भी क्या है? एक पुरानी वैन, एक बहिरा कुत्ता शेरू, पहाड़ी रास्तों की धूल, और एक दिल जिसे 4 साल से खोलने की हिम्मत नहीं हुई। बराबरी ठीक है।
नंदिनी हँसते-हँसते रो पड़ी।
—क्या मैं कभी आपके घर खाना बनाने आ सकती हूँ? पैसे चुकाने के लिए नहीं। बस… सच में मिलने के लिए।
राघव ने सिर हिला दिया।
—हाँ। मगर एक शर्त है।
—क्या?
—नाटक नहीं। धीरे-धीरे। जो सच होगा, वही रहेगा। जो नहीं होगा, उसे मजबूर नहीं करेंगे।
नंदिनी ने पहली बार बिना डर के उसका हाथ पकड़ा।
—ठीक है। नाटक नहीं।
अगले हफ्ते नंदिनी राघव के छोटे से घर पहुँची। घर कस्बे के किनारे था, जहाँ से नीचे घाटी की रोशनियाँ तारों जैसी लगती थीं। दरवाजे पर पुराना पीतल का घंटा था और भीतर शेरू नाम का बूढ़ा कुत्ता, जिसे अब आधी आवाजें सुनाई नहीं देती थीं, मगर नंदिनी के आने पर उसने पूँछ हिलाई।
नंदिनी ने रसोई की मेज देखी।
—2 कुर्सियाँ।
राघव ने धीमे से कहा—
—हाँ। 1 शालिनी की थी। हटाई नहीं गई।
नंदिनी ने कुर्सी को छुआ, जैसे किसी की याद को बिना चोट पहुँचाए सलाम कर रही हो।
—क्या मैं बैठ सकती हूँ?
राघव कुछ पल चुप रहा। फिर बोला—
—शायद इसी के लिए तो रखी थी।
उस दिन नंदिनी ने आलू के पराठे बनाए। पहले वाला जल गया। दूसरा आधा कच्चा रहा। तीसरा ठीक बना। राघव ने कहा कि शालिनी इससे भी खराब खाना बनाती थी, और दोनों पहली बार खुलकर हँसे। उस हँसी में कोई अपराधबोध नहीं था। वह शालिनी को मिटा नहीं रही थी। वह घर में फिर से आवाज ला रही थी।
धीरे-धीरे नंदिनी आती रही। कभी हिसाब-किताब संभालती, क्योंकि राघव का रिकवरी वैन का काम कागजों में बिखरा पड़ा था। कभी शेरू को दवा देती। कभी देर शाम चाय बनाती। राघव उसकी कार ठीक करता, पैसे नहीं लेता, और वह झगड़ती कि मुफ्त में नहीं चलेगा। तब वह कहता—
—ठीक है, हिसाब चुकाना हो तो अगली बार खाना बना देना।
एक झूठी कहानी धीरे-धीरे सच में बदलने लगी। वह बरसाती मोड़, वह बंद कार, वह रात का खाना—जो कभी बना नहीं था—अब सचमुच बनने लगा।
लेकिन करण पूरी तरह गया नहीं था। ऐसे आदमी हार को प्यार की तरह नहीं, अपमान की तरह याद रखते हैं। उसने कस्बे में अफवाह फैलाई कि राघव विधुर होकर अकेली औरत को फँसा रहा है। उसने सविता देवी को पुराने संदेश भेजे, नंदिनी को डराया कि लोग हँसेंगे। कुछ दिन नंदिनी डगमगाई। एक रात वह राघव के दरवाजे पर आई और बोली—
—शायद हमें रुक जाना चाहिए। शायद मैं फिर किसी सहारे से चिपक रही हूँ। मुझे खुद पर भरोसा नहीं है।
राघव ने दरवाजा पूरा खोला।
—अगर तुम डर की वजह से रुकोगी तो मैं रोकूँगा नहीं। मगर अगर करण की आवाज तुम्हारे भीतर बोल रही है, तो उसे आखिरी शब्द मत दो।
नंदिनी रो पड़ी।
—मुझे फर्क समझ नहीं आता। शुरुआत में करण भी अच्छा था।
राघव ने सिर झुका लिया।
—मैं अच्छा इसलिए नहीं हूँ कि तुम मुझ पर एहसान मानो। मैं अच्छा इसलिए बनने की कोशिश कर रहा हूँ क्योंकि शालिनी ने मरते वक्त मुझसे कहा था कि दुनिया से मुँह मत मोड़ना। मैंने उसे धोखा दिया। आज तुम्हें छोटा करके मैं दूसरी बार उसे धोखा नहीं दे सकता।
नंदिनी धीरे से उसके सीने से लग गई।
—मैं भागना नहीं चाहती।
—मैं भी नहीं।
नए साल की रात कस्बे के सभा भवन में सामूहिक मिलन था। सविता देवी ने इस बार नंदिनी और राघव दोनों को बुलाया। माहौल संभला हुआ था, पर करण भी वहाँ आ गया। शायद आखिरी वार के लिए।
करीब 11 बजे वह सबके सामने खड़ा हुआ।
—कितना सुंदर खेल है। पहले झूठा पति, फिर असली बनता हुआ पति। पहाड़ी रिकवरी वाला आदमी अचानक परिवार में जगह बना रहा है। सोचिए, किसे फायदा है?
कमरे में फिर वही पुराना सन्नाटा आ गया। नंदिनी का चेहरा पीला पड़ा, पर इस बार उसने हाथ नहीं छोड़ा। राघव उठ खड़ा हुआ।
—करण सही कह रहा है, कुछ बातों में। मैं रिकवरी वैन चलाता हूँ। मैं विधुर हूँ। मैं अकेला था। और सच यह भी है कि पहली रात नंदिनी ने मुझसे झूठ में साथ देने को कहा था।
करण की मुस्कान फैल गई।
राघव ने आगे कहा—
—पर वह मुझे खरीद नहीं रही थी। वह मदद माँग रही थी। फर्क वही समझ सकता है जिसने कभी किसी को सचमुच गिरते देखा हो। मैं 4 साल से लोगों की गाड़ियाँ खाइयों से निकालता रहा। उस रात नंदिनी ने मुझे मेरी अपनी खाई से निकाला। अगर यह फायदा है, तो फायदा मुझे हुआ है।
कई लोग चुपचाप सुन रहे थे। कुछ वे लोग भी थे जिनकी गाड़ी राघव ने कभी रात में बचाई थी।
—मैंने उस रात कहा था कि मैं नाटक नहीं करूँगा। आज भी यही कहता हूँ। नंदिनी झूठी नहीं है। वह डरी हुई थी। और डर में बोला गया झूठ कभी-कभी उस सच से छोटा होता है, जिसे परिवार सुनना ही नहीं चाहता।
सविता देवी उठीं। इस बार उनकी आवाज में कोई हिचक नहीं थी।
—करण, मैंने 2 महीने तुम्हारी बातों में आकर अपनी बेटी को शक की नजर से देखा। आज समझ आया कि एक आदमी जो सचमुच छोटा होता है, वही किसी और को बार-बार छोटा साबित करना चाहता है। अब तुम जाओ।
सभा भवन में धीमे-धीमे लोग खड़े होने लगे। किसी ने करण के लिए रास्ता नहीं रोका, पर किसी ने उसे सहारा भी नहीं दिया। वह बाहर चला गया। उस रात के बाद उसने कस्बा छोड़ दिया। लोग कहते थे वह चंडीगढ़ लौट गया, उन चमकदार समारोहों में जहाँ लोग कपड़ों से पहचाने जाते हैं, चरित्र से नहीं।
कुछ महीनों बाद राघव और नंदिनी ने शादी की। बड़ी नहीं, मगर सच्ची। उसी सभा भवन में, देवदार की टहनियों और गेंदे के फूलों के बीच। सविता देवी ने अपनी बेटी के सिर पर हाथ रखा और राघव से कहा—
—शालिनी कैसी थीं?
राघव ने मुस्कुराकर कहा—
—खाना बहुत खराब बनाती थीं। मगर दरवाजे की बत्ती हमेशा जलाकर रखती थीं। कहती थीं, पता नहीं किसे लौटने में देर हो जाए।
सविता देवी की आँखें भर आईं।
—तो आज वह बत्ती सही जगह जल रही है।
फेरों के समय नंदिनी ने राघव से कहा—
—मैंने पति इसलिए बनाया था क्योंकि मुझे लगता था कोई असली आदमी मुझे पूरी कहानी सहित स्वीकार नहीं करेगा। तुम आए, और तुमने मेरे झूठ से ज्यादा मेरी वजह सुनी। मैं चमकदार समारोह नहीं चाहती। मुझे वह ठंडी रात चाहिए, जिसमें तुमने मेरा हाथ छोड़ा नहीं।
राघव ने जवाब दिया—
—मैंने 4 साल सोचा कि जिसे कुछ नहीं चाहिए, वह सुरक्षित रहता है। तुमने सिखाया कि जिसे कुछ नहीं चाहिए, उसके पास जीने की वजह भी नहीं बचती। मैं वादा करता हूँ, दरवाजा बंद नहीं करूँगा। बत्ती जलती रहेगी।
शादी के बाद वे उसी छोटे घर में रहे। रसोई की मेज वही रही। 2 कुर्सियाँ भी वही रहीं। फर्क बस इतना था कि दूसरी कुर्सी अब खालीपन की निशानी नहीं रही। वह इंतज़ार की जीत बन गई।
शेरू अगली सर्दी में चला गया। बूढ़ा, बहिरा, मगर नंदिनी की गोद में सिर रखकर। उन्होंने उसे देवदार के पेड़ के नीचे दफनाया। कुछ महीनों बाद नंदिनी एक छोटा पिल्ला घर ले आई, जो हर बर्फ के टुकड़े पर भौंकता था। राघव ने पहले कहा कि घर में बहुत शोर होगा। नंदिनी ने कहा—
—यही तो चाहिए।
अब भी रात के 2 बजे फोन बजता है। राघव उठता है, जैकेट पहनता है और फँसी गाड़ी निकालने निकल जाता है। फर्क बस इतना है कि लौटते समय घर अँधेरा नहीं होता। दरवाजे की बत्ती जल रही होती है। रसोई में चाय गरम होती है। और 2 कुर्सियों वाली मेज पर कोई उसका इंतज़ार करता है।
लोग पूछते हैं, तुम दोनों मिले कैसे?
नंदिनी मुस्कुराकर कहती है—
—मैंने उनसे 1 रात के लिए मेरा पति बनने को कहा था।
फिर राघव जोड़ता है—
—और मैंने कहा था, मैं नाटक नहीं करूँगा।
लोग हँसते हैं, मगर नंदिनी हर बार उसकी तरफ ऐसे देखती है जैसे उस वाक्य में पूरी जिंदगी छिपी हो। क्योंकि सच भी यही था। वह 1 रात की बात नहीं थी। वह उस दरवाजे की बात थी जिसे राघव ने 4 साल बंद रखा था, और उस स्त्री की बात थी जिसने झूठ बोलते-बोलते भी किसी सच्चे हाथ की तलाश नहीं छोड़ी थी।
बर्फ हर साल फिर गिरती है। रास्ते फिर बंद होते हैं। गाड़ियाँ फिर फँसती हैं। मगर उस पहाड़ी घर की खिड़की से अब हमेशा रोशनी बाहर गिरती है, जैसे कोई अदृश्य आवाज कह रही हो—कभी-कभी जिंदगी किसी बड़े समारोह में नहीं बदलती। कभी-कभी वह तब बदलती है जब बर्फ में काँपती एक औरत कहती है, “मेरे साथ चलिए,” और एक टूटा हुआ आदमी जवाब देता है, “मैं चलूँगा, मगर झूठ नहीं जीऊँगा।”
Disclaimer: This story is a work of fiction created for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.