
PART 1
“तेरी बेटी को सीखना चाहिए कि दुनिया उसके लहंगे के इर्द-गिर्द नहीं घूमती,” शालिनी देवी ने हँसते हुए कहा, जबकि 7 साल की सान्वी के जन्मदिन का बैंगनी लहंगा अनार के लाल शरबत से भीगकर फर्श पर टपक रहा था।
नंदिता दरवाजे पर थाली पकड़े खड़ी रह गई। थाली में गरम आलू टिक्की थीं, पर उसके हाथ अचानक बर्फ जैसे ठंडे हो गए। सामने उसकी बेटी सान्वी खड़ी थी—काँपती हुई, आँखों में आँसू अटके हुए, जैसे रोने की भी इजाजत माँग रही हो। वह वही लहंगा था जिसे सान्वी ने 3 हफ्ते तक हर रात सोने से पहले मोबाइल में देखकर मुस्कुराया था। जयपुर के एक छोटे डिजाइनर से नाप देकर बनवाया गया था—हल्का बैंगनी रंग, मोतियों की महीन कढ़ाई, पीछे साटन का बड़ा धनुष और दुपट्टे पर चाँदी की किनारी। कीमत ₹42,000 थी। बहुत ज्यादा थी, नंदिता जानती थी। पर सान्वी ने कभी महंगे खिलौने नहीं माँगे थे, कभी मोबाइल के लिए जिद नहीं की थी। उसने बस कहा था, “मम्मा, इस बार मैं राजकुमारी जैसी लगना चाहती हूँ।”
घर में जन्मदिन सादा रखा गया था। मालवीय नगर वाले उनके मकान की छत पर रंगीन झालरें लगी थीं, नीचे आँगन में प्लास्टिक की कुर्सियाँ, रसोई में छोले, टिक्की, गुलाब जामुन और बच्चों के लिए आम पन्ना। रोहन, नंदिता का पति, हमेशा कहता था कि खुशी में शोर नहीं, अपनापन होना चाहिए। इसलिए कोई बड़ा होटल नहीं, बस परिवार और करीबी पड़ोसी।
नंदिता की छोटी बहन काव्या ऑफिस के काम से अहमदाबाद गई हुई थी। उसने अपने 4 साल के जुड़वाँ बेटों, आरव और विवान, को शालिनी देवी के पास छोड़ दिया था। नंदिता ने सोचा था कि नानी हैं, संभाल लेंगी।
लेकिन शालिनी देवी उन्हें संभाल नहीं रही थीं। वे व्हाट्सऐप पर रिश्तेदारों को वीडियो कॉल करके बता रही थीं कि “नातिन का जन्मदिन है”, और दोनों लड़के घर में शरबत के गिलास, केक की क्रीम और चॉकलेट लगी उँगलियों के साथ भाग रहे थे।
जब सान्वी की दबे गले वाली चीख सुनाई दी, नंदिता दौड़कर ड्रॉइंग रूम में पहुँची।
आरव ने अनार का शरबत पूरा लहंगे पर उड़ेल दिया था। विवान नीली क्रीम से सान्वी की पीठ पर हाथ फेर रहा था, जैसे कपड़ा नहीं, कोई दीवार हो। सान्वी चुप थी। बस उसकी साँस तेज चल रही थी।
शालिनी देवी हँसीं।
“अरे नंदिता, इतना मुँह मत बनाओ। बच्चे हैं। देखो तो, लहंगा और भी रंगीन लग रहा है।”
फिर उन्होंने मोबाइल निकाला और फोटो खींच ली।
कमरे में अचानक सन्नाटा जम गया। पड़ोस की आंटी ने नजर झुका ली। रोहन की मुट्ठियाँ कस गईं। नंदिता ने न शोर किया, न बहस। उसने सान्वी का ठंडा हाथ पकड़ा, अपना पर्स उठाया और रोहन से कहा, “हम जा रहे हैं।”
शालिनी देवी ने पीछे से ताना मारा, “दोनों माँ-बेटी नाटक में माहिर हो।”
उस रात सान्वी अपने टूटे हुए धनुष को सीने से लगाकर सोई, जैसे किसी ने उसके बचपन का एक हिस्सा चुरा लिया हो।
अगली सुबह शालिनी देवी का मैसेज आया, “केक बचा है क्या? बच्चों ने बहुत मजे किए।”
नंदिता ने जवाब नहीं दिया।
7 दिन बाद शालिनी देवी का घबराया हुआ फोन आया। उनकी आवाज काँप रही थी।
“नंदिता, मेरी कार्ड मशीन पर रिजेक्ट हो रही है। दुकान वाले सब देख रहे हैं। ये क्या तमाशा है?”
नंदिता को पता था कि अब असली तमाशा शुरू होने वाला था।
PART 2
नंदिता जानती थी कार्ड क्यों नहीं चल रही थी।
क्योंकि वह शालिनी देवी की कार्ड थी ही नहीं।
वह नंदिता की अतिरिक्त क्रेडिट कार्ड थी, जो उसने 3 साल पहले माँ को दी थी, जब पिता की कपड़ों की दुकान घाटे में चली गई थी। तब शालिनी देवी ने कहा था, “बस कुछ महीनों की मदद चाहिए।” फिर वे राशन, दवाइयाँ, त्योहार के कपड़े और नाती-पोतों के उपहार उसी से लेने लगीं। नंदिता चुप रही।
लेकिन उस दिन नहीं।
“कार्ड मैंने बंद कर दी,” नंदिता ने शांत आवाज में कहा।
दूसरी तरफ कुछ पल खामोशी रही।
“एक छोटे से लहंगे के लिए तू अपनी माँ को बाजार में बेइज्जत करेगी?”
छोटा सा लहंगा।
नंदिता के भीतर वर्षों से जमा अपमान दरक गया।
“लहंगा नहीं, माँ। मेरी बेटी की आँखें थीं। उसका चुप हो जाना था। तुम्हारी हँसी थी।”
शालिनी देवी बोलीं, “तू हमेशा से ज्यादा भावुक रही है।”
“नहीं,” नंदिता ने कहा, “मैं हमेशा से ज्यादा चुप रही हूँ। अब नहीं।”
फोन कट गया।
2 घंटे बाद बड़ी बहन मीरा का फोन आया। वह गुस्से में थी। “माँ रो रही हैं। तूने बच्चों की शरारत पर कार्ड बंद कर दी? पैसे से परिवार को कंट्रोल करेगी?”
“उन्हें अपने केले खुद खरीदने बोल दो,” नंदिता ने कहा।
शाम तक शालिनी देवी ने फेसबुक पर लिख दिया, “जब अपनी ही बेटी माँ को राशन तक न लेने दे, तो समझो जमाना बदल गया।”
सान्वी ने वह पोस्ट देख ली। उसने कुछ नहीं कहा। बस मोबाइल वापस रखकर कमरे में चली गई।
रात में काव्या अहमदाबाद से लौटी। उसने लहंगे की तस्वीर देखी, फिर धीमे से बोली, “कल सुबह मेरे पास आना। मुझे तुझे कुछ दिखाना है।”
अगले दिन उसके हाथ में पीला लिफाफा था।
अंदर कार्ड के स्टेटमेंट थे—ब्यूटी पार्लर, सोने की चूड़ियाँ, ऑनलाइन महंगे खिलौने, स्पा, होटल, और काव्या के बेटों के लिए ब्रांडेड कपड़े।
राशन नहीं।
दवाइयाँ नहीं।
शालिनी देवी महीनों से बेटी की कार्ड से अपने शौक पाल रही थीं।
कुल रकम ₹1,86,000 निकली।
तभी परिवार के ग्रुप में पिता विजय का मैसेज आया, “शालिनी, अब झूठ मत बोलो। बेटियाँ जान गई हैं। मैं भी।”
और उसी पल शालिनी देवी ने अपना फोन बंद कर दिया।
PART 3
रविवार की दोपहर नंदिता के घर का वही ड्रॉइंग रूम, जहाँ सान्वी का लहंगा बर्बाद हुआ था, अब किसी अदालत जैसा लग रहा था। पर्दे खुले थे, पर हवा भारी थी। सेंटर टेबल पर कोई चाय नहीं रखी गई। कोई मिठाई नहीं। कोई रिश्तेदारी वाली मुस्कान नहीं। केवल कागज, बिल, चुप्पी और ऐसे चेहरे, जिन पर सालों की अनकही बातें जमा थीं।
सान्वी को नंदिता ने अपनी स्कूल की सहेली के घर भेज दिया था। वह नहीं चाहती थी कि 7 साल की बच्ची बड़े लोगों को टूटते हुए देखे। वह नहीं चाहती थी कि सान्वी को लगे कि उसकी वजह से परिवार लड़ रहा है। असल में लड़ाई सान्वी की वजह से नहीं, सान्वी के बहाने उजागर हुई थी।
शालिनी देवी सबसे आखिर में आईं। आँखों पर काला चश्मा था, जबकि बाहर धूप भी तेज नहीं थी। हाथ खाली थे। न मिठाई, न खिलौना, न वह पुरानी आदत कि घर में आते ही सबको निर्देश देना शुरू कर दें। उनके पीछे विजय धीमे कदमों से अंदर आए। उनकी आँखें लाल थीं, जैसे कई रातों से नींद उनसे नाराज हो।
मीरा सोफे के कोने पर बैठी थी। वही मीरा जो हमेशा परिवार में फैसला सुनाती थी और हर फैसले में माँ को निर्दोष बना देती थी। इस बार उसका चेहरा झुका हुआ था। काव्या ने लिफाफा अपनी गोद में रखा था। रोहन नंदिता के पास बैठा था, पर उसने एक बार भी बीच में बोलने की कोशिश नहीं की। वह जानता था, यह नंदिता की लड़ाई थी। उसकी पत्नी की, उसकी बेटी की, उसकी चुप्पियों की।
सबसे पहले शालिनी देवी बोलीं।
“मुझसे गलती हुई,” उन्होंने धीमे से कहा, “पर मैंने सोचा नहीं था कि बात इतनी बड़ी हो जाएगी।”
नंदिता ने उन्हें देखा। उसकी आँखों में आँसू नहीं थे। केवल थकान थी।
“₹1,86,000 गलती नहीं होते, माँ। वह चोरी होती है।”
शालिनी देवी के होंठ काँपे। “मैंने सोचा, तू बड़ी बेटी जैसी है। तेरे पास है। तुझे क्या फर्क पड़ेगा?”
वही वाक्य नंदिता के सीने में चाकू की तरह उतर गया।
तुझे क्या फर्क पड़ेगा।
यही तो हमेशा हुआ था। उसे बुखार हो, फर्क नहीं। उसे स्कूल में पुरस्कार मिले, फर्क नहीं। उसकी शादी में गहने कम मिले, फर्क नहीं। उसके बच्चे को पुराना खिलौना मिले, फर्क नहीं। वह कमाए, दे, चुप रहे, सहती रहे—फर्क नहीं।
नंदिता ने धीरे से कहा, “तुमने कभी सोचा ही नहीं कि मुझे भी फर्क पड़ता है।”
कमरे में खामोशी फैल गई।
काव्या ने लिफाफा खोला। “माँ, यह देखिए। स्पा का बिल। होटल का बिल। ज्वेलरी का बिल। आपने मुझसे कहा था कि नंदिता आपको बस दवा और राशन के लिए कार्ड देती है। आपने झूठ बोला।”
शालिनी देवी ने काव्या की तरफ देखा। उनकी आँखों में पहली बार डर था। “मैं तेरे बच्चों के लिए भी तो खरीदती थी।”
काव्या का चेहरा सफेद पड़ गया। “मेरे बच्चों के लिए? आरव और विवान को आपने कभी रोकना नहीं सिखाया। आपने उन्हें सिखाया कि जो चाहिए, छीन लो। उस दिन उन्होंने सान्वी का लहंगा खराब किया, पर आपने उन्हें रोका नहीं। आपने फोटो खींची। आपने मेरी औलाद को भी गलत बनाया।”
यह सुनकर मीरा ने पहली बार सिर उठाया। उसकी आवाज टूटी हुई थी। “माँ, आपने मुझसे कहा था नंदिता ने आपको सब्जी तक खरीदने नहीं दी। आपने यह नहीं बताया कि कार्ड उसकी थी। आपने यह नहीं बताया कि आपने पोस्ट में झूठ लिखा।”
शालिनी देवी रो पड़ीं। “मैं अकेली महसूस करती थी। तुम्हारे पापा दुकान में लगे रहते थे। नंदिता हमेशा संभली हुई रहती है, उसे किसी की जरूरत नहीं लगती। काव्या के बच्चे मेरे गले लगते हैं, मेरे पीछे भागते हैं। मुझे लगता था, मैं उनके साथ जरूरी हूँ।”
“और सान्वी?” नंदिता ने पूछा। “वह क्या थी? सजावट? वह तुम्हारे पास धीरे से आती थी। तुम्हें अपनी ड्रॉइंग दिखाती थी। तुम कहती थीं, बाद में। वह तुम्हें राखी पर कार्ड बनाकर देती थी। तुम कहती थीं, रख दो। वह तुम्हें फोन करती थी, तुम पूछती थीं, आरव-विवान क्या कर रहे हैं। क्या उसे जोर से चिल्लाना आता तो तुम उसे प्यार करतीं?”
शालिनी देवी ने चेहरा ढक लिया।
विजय ने पहली बार बोलना शुरू किया। “शालिनी, बस। अब बचाव मत करो। मैंने भी गलती की। मैं देखता रहा कि तुम नंदिता से पैसे लेती हो। मैं सोचता रहा, घर की बात है। मैंने देखा कि सान्वी को कम प्यार मिलता है। मैं सोचता रहा, बच्चे समझ नहीं पाते। पर बच्चे सबसे ज्यादा समझते हैं।”
उनकी आवाज भर्रा गई। “उस रात सान्वी ने मुझे वीडियो कॉल पर कहा था, ‘नानाजी, क्या मेरा लहंगा सच में खराब लग रहा था?’ मैं जवाब नहीं दे पाया।”
नंदिता की आँखें भर आईं। उसे यह बात पता नहीं थी।
रोहन ने धीरे से उसका हाथ थाम लिया।
विजय ने जेब से एक छोटी डायरी निकाली। “मैंने पिछले 6 महीनों के खर्च लिखे हैं। जो भी शालिनी ने कार्ड से लिया, मैं अपनी दुकान बेचकर नहीं, मेहनत करके लौटाऊँगा। हर महीने ₹15,000 दूँगा। यह मेरा वादा है।”
“नहीं पापा,” नंदिता ने कहा, “यह आपका कर्ज नहीं है।”
विजय बोले, “कर्ज केवल पैसों का नहीं होता। मैं पिता होकर तुम्हारे साथ खड़ा नहीं हुआ। यह मेरी जिम्मेदारी है कि अब खड़ा रहूँ।”
शालिनी देवी ने काँपती आवाज में पूछा, “तो अब क्या चाहती है तू? मैं क्या करूँ?”
नंदिता ने गहरी साँस ली। “पहली बात, कार्ड हमेशा के लिए बंद रहेगी। दूसरी बात, फेसबुक पोस्ट हटेगी और उसी जगह सच लिखा जाएगा कि आपने झूठ बोला। तीसरी बात, आप सान्वी से माफी माँगेंगी, लेकिन उसे गले लगाने, रोने या माफी मनवाने की कोशिश नहीं करेंगी। फैसला उसका होगा। चौथी बात, जब तक वह खुद न चाहे, आप उसके जन्मदिन, स्कूल कार्यक्रम या घर की किसी निजी चीज में शामिल नहीं होंगी।”
शालिनी देवी ने जैसे यह सुनकर खुद को कुर्सी में डूबता हुआ महसूस किया। “मेरी नातिन मुझसे दूर हो जाएगी।”
नंदिता की आवाज शांत थी, पर पत्थर जैसी मजबूत। “आपने उसे पहले ही दूर कर दिया था। अब मौका उसे मिलेगा तय करने का कि वह लौटना चाहती है या नहीं।”
मीरा ने आँसू पोंछे। “मैंने भी गलती की। मैंने हर बार माँ की बात सुनकर नंदिता को दोषी मान लिया। मुझे माफ कर देना।”
नंदिता ने उसे देखा। “माफी भी समय से मिलती है, मीरा दी। अभी बस सच मान लो।”
उसी शाम काव्या ने परिवार को एक काउंसलर के पास जाने की सलाह दी। पहले तो शालिनी देवी ने मना किया। उन्हें लगा यह घर की इज्जत बाहर ले जाने जैसा है। लेकिन विजय ने साफ कहा, “इज्जत झूठ से नहीं बचती।”
अगले दिन वे सब एक पारिवारिक परामर्शदाता के छोटे से क्लिनिक में बैठे थे। दीवार पर नीम के पेड़ की पेंटिंग थी और कोने में पानी का मटका। पर वहाँ पूछे गए सवाल किसी हथौड़े से कम नहीं थे।
परामर्शदाता ने शालिनी देवी से पूछा, “आपको कब लगा कि बेटी का पैसा आपका अधिकार है?”
उन्होंने पहले कहा, “मैं माँ हूँ।” फिर चुप हो गईं। फिर बोलीं, “जब उसने मना करना बंद कर दिया।”
नंदिता के भीतर कुछ टूटकर साफ हो गया। उसका चुप रहना दूसरों के लिए अनुमति बन गया था।
परामर्शदाता ने नंदिता से पूछा, “आपने सीमा पहले क्यों नहीं बनाई?”
नंदिता ने बहुत देर बाद कहा, “क्योंकि मुझे डर था कि अगर मैंने ना कहा तो माँ मुझे कम प्यार करेंगी। फिर समझ आया, वह पहले ही कम प्यार कर रही थीं।”
कमरे में कोई आवाज नहीं हुई। शालिनी देवी ने सिर झुका लिया।
काव्या से पूछा गया, “आपकी चुप्पी किसके पक्ष में थी?”
काव्या बोली, “मैं सोचती थी बीच में न पड़ना शांति है। पर मेरी चुप्पी से मेरे बच्चों को गलत छूट मिली और सान्वी को चोट।”
मीरा से पूछा गया, “आप न्याय चाहती थीं या माँ को बचाना?”
मीरा रोते हुए बोली, “मैं माँ को बचाना चाहती थी, क्योंकि सच देखने से डरती थी।”
उस दिन कोई चमत्कार नहीं हुआ। कोई गले लगकर सब ठीक नहीं हो गया। पर झूठ की दीवार में पहली दरार पड़ गई।
2 दिन बाद शालिनी देवी ने फेसबुक पर पोस्ट लिखा। इस बार शब्द छोटे थे, पर भारी।
“मैंने अपनी बेटी के भरोसे का गलत इस्तेमाल किया। मैंने अपनी नातिन के दुख को हल्का समझा। पिछली पोस्ट अधूरी और गलत थी। मुझे शर्म है।”
कई रिश्तेदारों ने चुप्पी साध ली। कुछ ने फोन करके पूछा, “इतना सार्वजनिक क्यों लिखा?” शालिनी देवी ने पहली बार कहा, “क्योंकि झूठ भी सार्वजनिक था।”
नंदिता ने पोस्ट पढ़ी, पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
तीसरे दिन शाम को दरवाजे पर एक पैकेट रखा मिला। उसमें नया बैंगनी लहंगा था। वह पुराने जैसा नहीं था, पर उसमें वही कोमलता थी—हल्का रंग, छोटी मोती की बेल, और पीछे सुंदर-सा धनुष। साथ में हाथ से लिखा कार्ड था।
“सान्वी, यह तुम्हारे लिए है। इस बार इसे कोई हाथ नहीं लगाएगा, जब तक तुम खुद न चाहो। उस दिन तुम बहुत सुंदर थीं। मुझे यह कहना चाहिए था। माफ करना। नानी।”
नंदिता ने पैकेट तुरंत सान्वी को नहीं दिया। उसे लगा बच्ची को उपहार नहीं, भरोसा चाहिए। उसने लहंगा अलमारी में रख दिया।
सान्वी ने वह 2 दिन बाद खुद देखा। वह देर तक उसे देखती रही। फिर धीरे से बोली, “मम्मा, यह नानी ने भेजा?”
“हाँ,” नंदिता ने कहा।
“क्या मुझे पहनना पड़ेगा?”
यह सवाल सुनकर नंदिता का दिल काँप गया। उसने बेटी को बाँहों में लिया। “नहीं। तुम्हें कुछ भी नहीं करना पड़ेगा। यह तुम्हारा है। फैसला भी तुम्हारा।”
शनिवार को शालिनी देवी आईं। इस बार वे दरवाजे पर खड़ी रहीं। उन्होंने घंटी बजाने के बाद अंदर आने की जल्दी नहीं की। नंदिता ने दरवाजा खोला तो उन्होंने पूछा, “आ सकती हूँ?”
सान्वी ड्रॉइंग रूम के कोने में अपनी रंगों की किताब लेकर बैठी थी। उसने नानी को देखा, फिर नजर झुका ली।
शालिनी देवी ने कोई जोर नहीं दिया। वे दूर वाली कुर्सी पर बैठ गईं। उनका चेहरा बिना मेकअप, बिना बनावट, थका हुआ था।
“सान्वी,” उन्होंने धीरे से कहा, “मैं तुमसे माफी माँगने आई हूँ। उस दिन जब तुम्हारा लहंगा खराब हुआ, मुझे तुम्हारे पास आना चाहिए था। मुझे आरव और विवान को रोकना चाहिए था। मुझे तुम्हारी आँखें देखनी चाहिए थीं। पर मैं हँसी। वह मेरी बहुत बड़ी गलती थी।”
सान्वी चुप रही।
शालिनी देवी ने आगे कहा, “तुम्हें कभी यह महसूस नहीं होना चाहिए था कि तुम कम हो। तुम कम नहीं हो। तुम बहुत प्यारी हो। और अगर तुम मुझसे बात नहीं करना चाहो, तो भी मैं इंतजार करूँगी।”
फिर उन्होंने अपने पर्स से एक छोटा-सा फ्रेम निकाला। उसमें सान्वी की तस्वीर थी—जन्मदिन से पहले वाली, जब वह आईने के सामने पुराने लहंगे में घूम रही थी। उसके चेहरे पर संकोची खुशी थी। फ्रेम के पीछे लिखा था, “उस दिन तुम सचमुच राजकुमारी लग रही थीं। मुझे सबसे पहले ताली बजानी चाहिए थी।”
सान्वी ने फ्रेम लिया। बहुत देर तक देखा। फिर वह बिना कुछ बोले अपने कमरे में चली गई।
कमरे में बैठे बड़े लोग साँस रोककर बैठे रहे। किसी ने उसे बुलाया नहीं। किसी ने उसे मनाया नहीं।
कुछ मिनट बाद दरवाजा खुला।
सान्वी बाहर आई। उसने नया बैंगनी लहंगा पहन रखा था। दुपट्टा थोड़ा तिरछा था, पीछे की चेन आधी खुली थी। वह धीरे-धीरे शालिनी देवी के पास आई।
“नानी,” उसने बहुत धीमे कहा, “चेन बंद कर दोगी?”
शालिनी देवी के हाथ काँप गए। उन्होंने उठकर पहले नंदिता की ओर देखा, जैसे अनुमति माँग रही हों। नंदिता ने सान्वी को देखा। सान्वी ने हल्का-सा सिर हिलाया।
शालिनी देवी ने बहुत सावधानी से चेन ऊपर खींची। कोई जल्दबाजी नहीं, कोई रोना नहीं, कोई नाटक नहीं। सिर्फ एक टूटी हुई जगह पर धीरे-धीरे रखा जा रहा हाथ।
सान्वी ने फिर एक छोटा-सा चक्कर लगाया। इस बार कोई शोर नहीं हुआ। बस रोहन ने सबसे पहले धीमे से ताली बजाई। फिर विजय, काव्या, मीरा और आखिर में नंदिता।
शालिनी देवी की आँखों से आँसू गिर रहे थे, पर उन्होंने सान्वी को छुआ नहीं। उन्होंने वादा निभाया।
सब कुछ ठीक नहीं हुआ था। कार्ड बंद ही रही। पैसे लौटाने का हिसाब कागज पर लिखा रहा। आरव और विवान को काव्या ने बाल मनोवैज्ञानिक के पास ले जाना शुरू किया, ताकि उन्हें समझाया जा सके कि शरारत और चोट में फर्क होता है। मीरा ने हर पारिवारिक विवाद में खुद को जज बनाना बंद किया। विजय हर महीने रकम भेजते रहे, पर नंदिता ने हर बार रसीद रखी, क्योंकि प्यार और सीमा साथ-साथ रह सकते हैं।
शालिनी देवी अब भी नानी थीं, लेकिन अब उन्हें नानी बने रहने के लिए भरोसा कमाना था।
उस रात नंदिता सान्वी के कमरे में पानी रखने गई। बिस्तर के पास वही फ्रेम रखा था। उसके नीचे एक छोटा कागज रखा था, जिस पर सान्वी ने रंगीन पेंसिल से लिखा था—
“शायद नानी मुझे सच में प्यार करती हैं। पर अब मैं अपना लहंगा खुद संभालूँगी।”
नंदिता दरवाजे के पास खड़ी रह गई। उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
क्योंकि कभी-कभी न्याय बदले की आवाज में नहीं आता।
कभी-कभी वह एक बच्ची की आधी खुली चेन के धीरे-धीरे बंद होने की आवाज में आता है।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.