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उसने पत्नी और 7 साल के बेटे को प्यार से खाना खिलाया, माथा चूमा और फोन पर कहा, “काम हो गया,” लेकिन ज़हर से जूझती माँ ने बाथरूम से जो सच बचाया, उसने पूरे परिवार की इज़्ज़त अदालत में गिरा दी

PART 1

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रात के खाने की मेज पर मुस्कुराते हुए राघव ने अपनी पत्नी और 7 साल के बेटे को ज़हर मिला चिकन परोसा, फिर उनके माथे पर चुंबन देकर फोन पर फुसफुसाया, “काम हो गया… थोड़ी देर में दोनों हमेशा के लिए रास्ते से हट जाएंगे।”

दिल्ली से सटे गुरुग्राम की एक चमकदार सोसाइटी में वह घर बाहर से किसी सफल परिवार का सपना लगता था। सफेद दीवारें, तुलसी का गमला, दरवाज़े पर पीतल की घंटी, ड्रॉइंग रूम में शादी की फ्रेम की हुई तस्वीरें। पड़ोसी अक्सर कहते थे कि नंदिता और राघव की जोड़ी कितनी सुंदर है। किसी को नहीं पता था कि उस घर की रसोई में उस रात मौत चुपचाप भाप बनकर उठ रही थी।

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राघव ने धनिया-पुदीने की ग्रेवी वाला चिकन, जीरा राइस और आरव के लिए मीठा सेब का शरबत बनाया था। नंदिता को हैरानी हुई, क्योंकि राघव महीनों से रसोई में पैर तक नहीं रखता था। वह देर रात लौटता, फोन छिपाता, बाथरूम में घंटों बंद रहता और हर सवाल का जवाब बस एक थकी हुई मुस्कान से देता।

“आज पापा ने होटल जैसा खाना बनाया है,” आरव ने कुर्सी पर चढ़ते हुए कहा।

राघव ने उसके बालों पर हाथ फेरा। “मेरे शेर को सबसे अच्छा खाना मिलना चाहिए।”

नंदिता ने उस स्पर्श को देखा। पहले उसे यह प्यार लगता था, आज वह अभिनय लगा। बहुत साफ, बहुत नपा-तुला, जैसे कोई आदमी आखिरी बार किसी भूमिका को निभा रहा हो।

“तुम नहीं खाओगे?” नंदिता ने पूछा।

राघव ने अपनी प्लेट दूर सरकाई। “भूख नहीं है। तुम दोनों खाओ, मुझे तुम्हें खाते देखना अच्छा लग रहा है।”

यह वाक्य उसके कानों में अटक गया।

आरव स्कूल की बातें करता रहा। उसने बताया कि खेल के मैदान में उसका दोस्त गिर गया था और सब हँसने लगे थे। नंदिता मुस्कुराने की कोशिश करती रही, मगर अचानक उसके हाथ भारी होने लगे। जैसे नसों में खून नहीं, गीली रेत भर गई हो।

कुछ ही मिनट बाद आरव ने चम्मच गिरा दिया।

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“मम्मा… पेट में बहुत दर्द हो रहा है।”

नंदिता उठना चाहती थी, लेकिन उसके पैर ने जवाब दे दिया। कुर्सी पीछे खिसकी, मेज़पोश खिंचा, प्लेटें टूटकर फर्श पर बिखर गईं। हरी ग्रेवी सफेद टाइलों पर फैल गई।

“राघव… मदद करो,” उसके मुँह से टूटी आवाज़ निकली।

राघव नहीं भागा।

वह धीरे से उठा। उसके चेहरे पर घबराहट नहीं थी। नंदिता का दिल वहीं थम गया।

आरव कालीन पर लुढ़क गया। उसकी पलकों में नींद जैसी भारी झपक थी, साँस धीमी थी। नंदिता रेंगकर उसके पास जाना चाहती थी, पर शरीर पत्थर हो चुका था।

राघव उसके पास आया और जूते की नोक से उसे हल्का धक्का दिया।

“शांत रहो, नंदिता,” उसने बेहद धीमी आवाज़ में कहा। “अब सब खत्म होने वाला है।”

फिर उसने काउंटर से अपना फोन उठाया।

“हो गया,” उसने किसी से कहा। “दोनों ने खा लिया। थोड़ी देर में सब खत्म।”

दूसरी तरफ़ एक औरत की आवाज़ आई। “पक्का?”

“पूरी तरह। फूड पॉइज़निंग लगेगी। कोई शक नहीं करेगा।”

नंदिता के भीतर कुछ टूट गया। यह सपना नहीं था। जिस आदमी ने उसके साथ 10 साल बिताए थे, जिसने आरव के जन्म पर अस्पताल में रोते हुए उसका हाथ पकड़ा था, वही आज उन्हें मारने की कोशिश कर रहा था।

“फिर हम मुंबई निकल जाएंगे,” औरत ने कहा। “अब कोई बीच में नहीं आएगा।”

राघव ने लंबी साँस ली। “नंदिता मुझे कभी आज़ाद नहीं करती। और बच्चा… बच्चा भी हमेशा दीवार बनकर खड़ा रहता।”

नंदिता ने आँखें आधी बंद कर लीं। वह मरने का नाटक करने लगी, क्योंकि उसे समझ आ गया था कि साँस लेना भी अब खतरा था।

राघव झुका, उसके माथे को छुआ और बोला, “शुभ रात्रि, नंदिता।”

दरवाज़ा बंद हुआ। चाबी घुमा दी गई। फिर सन्नाटा।

नंदिता ने कई मिनट इंतज़ार किया। हर पल उसके शरीर में आग और बर्फ साथ-साथ दौड़ रहे थे। जब उसे लगा कि राघव जा चुका है, उसने काँपती उँगलियों से आरव की कलाई छुई।

“बेटा… आँखें मत बंद करना।”

आरव ने बहुत धीमे कहा, “मम्मा, नींद आ रही है…”

“नहीं, मेरे लाल। मेरी तरफ़ देखो।”

अपनी आखिरी बची ताकत से वह बैग तक रेंगी। फोन निकाला और 112 मिलाया। उसने टूटी आवाज़ में बताया कि उसके पति ने उसे और उसके बेटे को ज़हर दिया है।

तभी अनजान नंबर से संदेश आया।

कूड़ेदान देखो। सबूत वहीं है। वह वापस आ रहा है।

और ठीक उसी पल, बाहर गाड़ी के रुकने की आवाज़ आई।

मुख्य दरवाज़े की चाबी फिर से घूमी।

PART 2

“कहाँ गए दोनों?” राघव की आवाज़ ड्रॉइंग रूम से गूँजी। “रसोई में ही पड़े होने चाहिए थे!”

नंदिता मुख्य बाथरूम के भीतर बंद थी। उसने किसी तरह आरव को घसीटकर वहाँ लाया था। उसकी पीठ दरवाज़े से लगी थी, एक हाथ आरव के सिर पर था और दूसरा फोन पकड़े हुए काँप रहा था।

फोन पर महिला ऑपरेटर धीमे बोल रही थी, “मैडम, पुलिस सोसाइटी गेट पर पहुँच रही है। दरवाज़ा मत खोलिए।”

मगर राघव अकेला नहीं था।

गलियारे में चूड़ियों और हील की आवाज़ आई।

“मैंने कहा था, इतना साफ प्लान कभी साफ नहीं रहता,” एक औरत बोली। “शायद मात्रा कम थी।”

नंदिता का खून जम गया। वह आवाज़ पहचानी हुई थी।

मीरा मल्होत्रा।

राघव की नई बिज़नेस पार्टनर। वही औरत, जिसने 3 महीने पहले दिवाली पार्टी में नंदिता को गले लगाकर कहा था, “आप बहुत भाग्यशाली हैं, राघव जैसा पति हर किसी को नहीं मिलता।”

रसोई में चीज़ें गिरने लगीं। कूड़ेदान पलटा।

“फोन इसके पास है!” राघव चिल्लाया। “नंदिता ने फोन कर दिया होगा।”

आरव ने काँपते हुए पूछा, “मम्मा… पापा हमें मार देंगे?”

नंदिता ने उसकी आँखों पर हाथ रख दिया। “कुछ नहीं होगा।”

दरवाज़े की कुंडी हिली।

“नंदिता,” राघव ने नकली नरमी से कहा, “दरवाज़ा खोलो। बात करते हैं।”

मीरा फुसफुसाई, “भाग चलते हैं। अगर पुलिस आई तो सब खत्म।”

“चुप रहो!” राघव गुर्राया।

पहला धक्का दरवाज़े पर पड़ा। आरव सिसक उठा।

तभी मीरा की घबराई आवाज़ आई, “यह सब तुम्हारे पिता की कोठी, बीमा और उस गुप्त खाते के लिए था। तुमने कहा था कोई नहीं बचेगा।”

नंदिता सुन्न रह गई।

बीमा? गुप्त खाता? कोठी?

राघव ने कहा, “वह तलाक में आधी संपत्ति लेती। और लड़का… वह सबसे बड़ा बोझ था।”

आरव ने माँ की ओर देखा। उसकी आँखों में वह सवाल था, जो किसी बच्चे की आँखों में कभी नहीं होना चाहिए।

दूसरा धक्का पड़ा। लकड़ी चरमरा गई।

बाहर पुलिस की गाड़ियों की लाल-नीली रोशनी खिड़की से भीतर आने लगी।

राघव ने गरजकर कहा, “अगर मैं पकड़ा गया, तो तुम दोनों भी ज़िंदा नहीं निकलोगे।”

कुंडी टूट गई।

दरवाज़ा खुला।

और उसके हाथ में जो चीज़ थी, उसे देखकर नंदिता की साँस रुक गई।

PART 3

“राघव, नीचे रखो उसे!” नंदिता ने जितनी आवाज़ बची थी, उतनी से चिल्लाया।

राघव के हाथ में वही छोटी सफेद शीशी थी, जिसे वह शायद कूड़ेदान से उठा लाया था। उसके चेहरे पर अब पति का मुखौटा नहीं था। वह किसी ऐसे आदमी जैसा लग रहा था, जिसने अपनी हार देख ली हो और अब दुनिया को साथ डुबो देना चाहता हो।

आरव माँ से लिपट गया।

“पापा… प्लीज़…”

उस एक शब्द ने कमरे की हवा काट दी।

राघव की उँगलियाँ एक पल के लिए ढीली पड़ीं। बस 1 पल।

उसी पल 2 पुलिसकर्मी गलियारे से भीतर घुसे।

“हाथ ऊपर! अभी!”

राघव ने मुड़ने की कोशिश की, पर उसकी हालत पहले से टूट चुकी थी। एक पुलिसकर्मी ने उसे पकड़कर फर्श पर गिरा दिया। शीशी लुढ़ककर वॉशबेसिन के नीचे जा फँसी। मीरा बाहर से चीख रही थी कि उसने कुछ नहीं किया, उसे मजबूर किया गया, उसे असली योजना नहीं पता थी।

उसकी आवाज़ में डर था, पछतावा नहीं।

कुछ सेकंड बाद पैरामेडिक अंदर आए। एक ने आरव को सावधानी से उठाया, दूसरे ने नंदिता को ऑक्सीजन मास्क लगाया। नंदिता बार-बार बस एक ही शब्द कह रही थी।

“आरव… मेरा बेटा… उसे बचा लो…”

“उसकी साँस चल रही है,” पैरामेडिक ने कहा। “हम उसे तुरंत अस्पताल ले जा रहे हैं।”

नंदिता ने राहत महसूस नहीं की। राहत बहुत दूर थी। उस समय सिर्फ डर था। ऐसा डर जो शरीर से नहीं, आत्मा से चिपक जाता है।

जब स्ट्रेचर रसोई से गुज़रा, उसने अपना घर देखा। वही घर जहाँ कभी करवाचौथ की थाली सजती थी, जहाँ आरव की पहली जन्मदिन की मोमबत्तियाँ जली थीं, जहाँ नंदिता ने सोचा था कि उसने अपना संसार बना लिया है। आज वही घर टूटे बर्तनों, फैली ग्रेवी, उलटे कूड़ेदान और पुलिस की पीली टेप के बीच किसी अपराध की गवाही दे रहा था।

राघव को हथकड़ी लगाकर बाहर ले जाया जा रहा था। सोसाइटी के लोग बालकनी से झाँक रहे थे। किसी के हाथ में फोन था, कोई सिर पर हाथ रखे खड़ा था। चौकीदार बार-बार कह रहा था, “साहब तो इतने शरीफ लगते थे…”

राघव ने जाते-जाते नंदिता की ओर देखा।

उसकी आँखों में शर्म नहीं थी।

“तुमने मेरी ज़िंदगी बर्बाद कर दी,” उसने दाँत भींचकर कहा।

नंदिता ने जवाब नहीं दिया। उसके पास शब्द नहीं बचे थे। वह सिर्फ उसे देखती रही और पहली बार समझी कि कुछ लोग अपराध करने के बाद भी खुद को पीड़ित समझते हैं।

अस्पताल की रात लंबी थी। सफेद रोशनी, दवाइयों की गंध, मशीनों की बीप, डॉक्टरों की तेज़ आवाज़ें, पुलिस के सवाल। आरव को बाल रोग आपात कक्ष में ले जाया गया। नंदिता को अलग बेड पर रखा गया, पर वह बार-बार उठने की कोशिश करती रही।

“मुझे मेरे बेटे के पास जाना है,” वह कहती रही।

नर्स ने उसका हाथ पकड़ा। “मैडम, आप खुद भी खतरे से बाहर नहीं हैं। पहले आपको स्थिर करना होगा।”

स्थिर।

यह शब्द उसे क्रूर लगा। एक माँ कैसे स्थिर रह सकती है, जब उसके बच्चे की साँस मशीनों और दवाओं के भरोसे हो?

सुबह 5 बजे अपराध शाखा की अधिकारी एसीपी कविता नायर उसके कमरे में आईं। उनका चेहरा कठोर था, पर आँखों में नरमी थी।

“नंदिता जी, हमें रसोई और बाथरूम से सबूत मिले हैं,” उन्होंने कहा। “कूड़ेदान में पैकेट था, शीशी भी बरामद हुई है। खाना सील कर दिया गया है। आपके फोन की कॉल रिकॉर्डिंग भी सुरक्षित है।”

नंदिता ने आँखें बंद कर लीं। उसे लगा जैसे वह फिर उसी ठंडे फर्श पर पड़ी है।

कविता नायर ने आगे कहा, “राघव और मीरा की चैट मिली है। योजना कई हफ्तों से चल रही थी।”

“क्यों?” नंदिता की आवाज़ पत्थर जैसी सूखी थी।

एसीपी ने कुछ पल चुप रहकर कहा, “बीमा पॉलिसी। आपके और आरव के नाम पर बड़ी रकम। साथ ही आपके ससुर की पुरानी कोठी का मामला। वह संपत्ति कानूनी रूप से राघव, आप और आरव के संयुक्त अधिकार में आ सकती थी। तलाक में राघव को नुकसान होता।”

नंदिता को याद आया। ससुर के निधन के बाद लखनऊ की वह पुरानी हवेली, जिसके बारे में राघव हमेशा कहता था कि कागज़ात उलझे हुए हैं। नंदिता ने कभी दबाव नहीं डाला। उसे लगता था, परिवार का मामला है। अब समझ आया कि राघव महीनों से कुछ छिपा रहा था।

“उसने मेरे बेटे को भी इसलिए…” नंदिता बोलते-बोलते रुक गई।

कविता नायर ने धीमे कहा, “मैसेज में आरव का नाम नहीं लिखा गया था। उसे सिर्फ ‘बाधा’ कहा गया है।”

नंदिता का सीना फटने लगा।

बाधा।

जिस बच्चे ने अपने पिता के लिए हर जन्मदिन पर कार्ड बनाया, जो रात को सोते समय कहता था, “पापा जल्दी आना,” वह उस आदमी की नज़र में सिर्फ बाधा था।

दोपहर तक मामला मीडिया में फैल गया। “गुरुग्राम में पति ने पत्नी-बेटे को ज़हर देने की कोशिश की” जैसे शीर्षक फोन स्क्रीन पर चमकने लगे। रिश्तेदारों के फोन आने लगे। कुछ रोए, कुछ सचमुच टूट गए, और कुछ ने वही पुराने सवाल पूछे जो हमेशा पीड़ितों से पूछे जाते हैं।

“तुम्हें पहले शक क्यों नहीं हुआ?”

“क्या तुम्हारे बीच झगड़े होते थे?”

“किसी औरत की बात थी क्या?”

“घर में इतना बड़ा तनाव था तो तुमने मायके वालों को बताया क्यों नहीं?”

नंदिता ने किसी को जवाब नहीं दिया। उसे अब समाज की अदालत से लड़ने की ताकत नहीं थी। वह असली अदालत तक पहुँचने के लिए जिंदा बची थी, वही काफी था।

2 दिन बाद आरव ने आँखें खोलीं।

वह बहुत पीला था। उसके होंठ सूखे थे। हाथ में सलाइन लगी थी। नंदिता उसकी चारपाई के पास बैठी थी, जैसे 48 घंटे में वह साँस लेना भूलकर सिर्फ उसे देखना सीख गई हो।

आरव ने धीमे पूछा, “मम्मा… पापा जेल में हैं?”

नंदिता की आँखें भर आईं। उसने उसके बाल सहलाए।

“हाँ, बेटा। अब वह हमें नुकसान नहीं पहुँचा पाएँगे।”

आरव ने दीवार की ओर देखा। कुछ देर तक चुप रहा।

“क्या मैं बुरा बच्चा था?”

यह सवाल किसी भी ज़हर से ज़्यादा घातक था।

नंदिता ने झुककर उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया।

“नहीं, आरव। तुम इस दुनिया की सबसे प्यारी चीज़ हो। किसी बड़े आदमी की गलती से बच्चा बुरा नहीं हो जाता। तुम्हारे पापा ने बहुत गलत किया। यह उनकी कमी थी, तुम्हारी नहीं।”

आरव की आँखों से आँसू बह निकले। “मैंने तो उनका कार्ड बनाया था…”

“मुझे पता है,” नंदिता ने उसे सीने से लगाया। “और वह कार्ड तुम्हारे प्यार का सबूत है। उनके लायक न होना तुम्हारी गलती नहीं।”

उस दिन नंदिता भी रोई। बहुत रोई। पहली बार उसने खुद को मजबूत दिखाने की कोशिश नहीं की। माँ-बेटे ने अस्पताल के उस कमरे में एक-दूसरे को पकड़े हुए उस प्यार का शोक मनाया, जो कभी सच था या शायद हमेशा झूठ था।

जाँच में धीरे-धीरे सारी परतें खुलीं। राघव ने 6 महीने पहले गुप्त रूप से कई खाते खोले थे। घर के खर्च के नाम पर पैसे हटाए जा रहे थे। नंदिता की नकली सहमति दिखाकर बीमा दस्तावेज़ तैयार करवाए गए थे। मीरा ने अपने पुराने औद्योगिक संपर्कों से वह पदार्थ जुटवाया था, जिसे उसने “सिर्फ डराने के लिए” बताया। पर चैट में साफ था कि वे मौत की योजना बना चुके थे।

“जब दोनों नहीं रहेंगे, कोई सवाल नहीं करेगा।”

“बच्चे के बिना संपत्ति सीधी रास्ते पर आ जाएगी।”

“पोस्टमॉर्टम से पहले असर खत्म हो जाएगा क्या?”

हर संदेश एक कील था। हर शब्द नंदिता के विश्वास के ताबूत में धँसता चला गया।

अदालत में पहली पेशी के दिन राघव ने चेहरा नीचे रखा। उसके वकील ने कहा कि यह घरेलू विवाद था, मानसिक तनाव था, इरादा साबित नहीं हुआ। मीरा ने खुद को प्रेम में फँसी बेवकूफ औरत बताया। लेकिन रिकॉर्डिंग, शीशी, खाना, संदेश, टिकट और बीमा दस्तावेज़ सब सामने थे।

कविता नायर ने अदालत में कहा, “यह अचानक की गई गलती नहीं थी। यह योजनाबद्ध अपराध था, जिसमें 7 साल के बच्चे को भी जानबूझकर निशाना बनाया गया।”

उस वाक्य पर अदालत में सन्नाटा फैल गया।

नंदिता पीछे बैठी थी। उसके साथ उसकी माँ सुजाता थीं, जो जयपुर से रातोंरात आई थीं। सुजाता ने बेटी का हाथ पकड़ा हुआ था। वर्षों पहले उन्होंने नंदिता की शादी में राघव को आशीर्वाद दिया था। आज वही हाथ काँप रहे थे, लेकिन पकड़ मजबूत थी।

“डर मत,” सुजाता ने धीमे कहा। “अब तू अकेली नहीं है।”

नंदिता ने पहली बार सिर हिलाया।

अगले महीनों में जिंदगी आसान नहीं हुई। आरव रात को चीखकर उठता। खाने की थाली देखते ही उसका चेहरा उतर जाता। नंदिता धनिया की गंध से काँप जाती। वह रसोई में जाते ही दरवाज़ा खुला रखती। अस्पताल, पुलिस स्टेशन, वकील, बयान, सोसाइटी की फुसफुसाहटें—सब एक लंबी सुरंग बन गए।

कुछ रिश्तेदारों ने सलाह दी, “बच्चे के लिए मामला शांत कर दो। बाप तो बाप होता है।”

नंदिता ने पहली बार गुस्से में जवाब दिया, “जो बाप बच्चे की साँस का सौदा करे, वह सिर्फ अपराधी होता है।”

यह बात पूरे परिवार में फैल गई। कुछ लोगों ने उसे कठोर कहा। कुछ ने कहा कि वह घर तोड़ रही है। लेकिन सुजाता ने हर बार दरवाज़े पर खड़े होकर कहा, “घर उस रात टूटा था, जब उसने ज़हर परोसा था। मेरी बेटी तो सिर्फ मलबे से बाहर आई है।”

आखिरकार अदालत ने राघव और मीरा को न्यायिक हिरासत में भेजा। मुकदमा लंबा चलना था, मगर नंदिता को सुरक्षा मिल गई। घर सील रहा। बैंक खातों की जाँच शुरू हुई। बीमा कंपनी ने पॉलिसी रोक दी। संपत्ति का मामला अदालत की निगरानी में चला गया। आरव के लिए काउंसलिंग शुरू हुई।

नंदिता ने वह घर कभी वापस नहीं लिया।

वह जयपुर में माँ के पुराने मकान में रहने लगी। सामने नीम का पेड़ था, आँगन में सुबह धूप गिरती थी, और गली में बच्चे शाम को क्रिकेट खेलते थे। शुरुआत में आरव बस खिड़की से देखता। फिर एक दिन उसने धीरे से पूछा, “मम्मा, मैं खेलने जाऊँ?”

नंदिता ने उसकी ओर देखा। उसके हाथ में वही छोटा लाल बैट था, जो अस्पताल की एक नर्स ने उसे दिया था।

“जाओ,” उसने कहा। “मैं यहीं हूँ।”

आरव बाहर भागा। पहली गेंद पर वह चूक गया। दूसरी पर भी। तीसरी पर उसने हल्का सा शॉट लगाया और गेंद नीम के नीचे लुढ़क गई। बच्चे हँसे, मगर वह भी हँसा।

नंदिता बरामदे में खड़ी रही। उसकी आँखों में आँसू थे, पर इस बार वे सिर्फ दुख के नहीं थे। उनमें राहत थी, आग थी, और एक नई शुरुआत की बेहद धीमी रोशनी थी।

राघव चाहता था कि उनकी कहानी एक खूबसूरत डाइनिंग टेबल पर खत्म हो जाए—गरम रोटियों, चमकती प्लेटों, नकली मुस्कान और झूठे शुभ रात्रि चुंबन के बीच।

वह चाहता था कि लोग कहें, “बेचारी माँ-बेटा, शायद खाना खराब था।”

वह चाहता था कि आरव का नाम कागज़ों में बस एक बीमा दावा बनकर रह जाए।

लेकिन कहानी वहाँ खत्म नहीं हुई।

वह बाथरूम के टूटे दरवाज़े से बाहर निकली। पुलिस की सायरन में साँस लेती हुई अस्पताल पहुँची। अदालत की फाइलों में सच बनकर खड़ी हुई। और एक दिन जयपुर के छोटे से आँगन में, 7 साल का बच्चा फिर से हँस पड़ा।

कभी-कभी धोखा प्रेम की शक्ल पहनकर घर में आता है, थाली सजाता है, माथे को चूमता है और मौत को भोजन में छिपा देता है।

लेकिन माँ का प्रेम भी अजीब होता है।

वह ज़हर से भारी शरीर को घसीट सकता है।

टूटती साँसों के बीच 112 मिला सकता है।

बच्चे की आँखों से यह झूठ मिटा सकता है कि वह बोझ था।

और सच को इतना ज़िंदा रख सकता है कि सबसे खूबसूरत झूठ भी आखिरकार हथकड़ियों में बाहर ले जाया जाए।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.