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मेरी सुहागरात पर, बेटे का आशीर्वाद पाने की रस्म के नाम पर उन्होंने मुझे अपने पुश्तैनी कमरे में बंद कर दिया—लेकिन रात 3:12 बजे जब मेरे बिस्तर के ऊपर टंगी चमेली की माला हिली, तो मैंने ऊपर देखा और अँधेरे में आँख की तरह टिमटिमाती एक छोटी-सी लाल बत्ती दिखाई दी।

—देव, आपने शादी से पहले मुझे यह नहीं बताया।

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उसका जबड़ा कस गया।

—मैं नहीं चाहता था कि तुम घबरा जाओ।

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उस एक वाक्य ने मुझे थप्पड़ से भी ज़्यादा चोट पहुँचाई।

उसने इसे छिपाया था।

भूला नहीं था।

गलत नहीं समझा था।

छिपाया था।

मैंने अपनी सास की ओर देखा।

—मम्मीजी, पूरे सम्मान के साथ, मैं इसमें सहज महसूस नहीं कर रही हूँ।

उनके चेहरे से कोमलता गायब हो गई।

सिर्फ मुस्कान रह गई।

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—दुल्हन का सुकून उसके पति के घर में आकर बढ़ता है। वह अपने सूटकेस के साथ नहीं आता।

कमरे में सन्नाटा छा गया।

मेरे अपने माता-पिता पहले ही गेस्ट हाउस जा चुके थे।

मेरा फ़ोन मेरे दुल्हन वाले पर्स में साइड टेबल पर रखा था।

मेरे गहने बहुत भारी थे।

मेरा ब्लाउज़ बहुत तंग था।

मेरे बालों में इतनी सारी पिन लगी थीं कि सिर घुमाने में भी दर्द हो रहा था।

मैं एक ही समय में हास्यास्पद भी महसूस कर रही थी और फँसी हुई भी।

देव मेरे करीब आया और धीमी आवाज़ में बोला।

—प्लीज़, नैना। पहली रात कोई तमाशा मत करो। कल सुबह सब कुछ सामान्य हो जाएगा।

मैंने भी फुसफुसाकर जवाब दिया।

—अगर यह सामान्य है, तो आपने इसे छिपाया क्यों?

उसकी नज़र अपनी माँ की ओर गई।

उसने कुछ नहीं कहा।

वही ख़ामोशी मेरा जवाब बन गई।

सावित्री ने मेरे हाथ से दूध का कटोरा लिया और उसे चाँदी के पालने के पास रख दिया।

फिर उन्होंने पालने के भीतर रखे पीले कपड़े को उठाकर मेरे माथे से छुआ।

—अगले साल तक यह पालना खाली नहीं रहना चाहिए।

बुआओँ और चाचियों ने आशीर्वाद बुदबुदाए।

—एक पुत्र का जन्म हो।

—परिवार का नाम आगे बढ़े।

—नई बहू की गोद जल्दी भरे।

गोद भरे।

मानो मैं कोई इंसान नहीं थी।

मानो मैं उनकी खरीदी हुई ज़मीन थी।

देव पीछे हट गया।

मैंने उसकी कलाई पकड़ ली।

—मुझे यहाँ अकेला छोड़कर मत जाइए।

एक पल के लिए मैंने उसकी आँखों में शर्म देखी।

बस एक पल।

फिर सावित्री ने उसके पीछे से आवाज़ दी।

—देवेंद्र।

सिर्फ उसका नाम।

इतना ही काफ़ी था।

उसने धीरे से मेरा हाथ छुड़ा लिया।

—बस सूर्योदय तक की बात है।

फिर वह बाहर चला गया।

बाकी औरतें भी उसके पीछे-पीछे निकल गईं।

सबसे अंत में सावित्री गईं।

दरवाज़े पर पहुँचकर वे मुड़ीं।

—खिड़कियाँ मत खोलना। फूलों की माला मत उतारना। पालने को मत छूना। सिर पूर्व दिशा की ओर करके सोना। आज रात इस कमरे में जो भी हो, वह तुम्हारे और इस घर के बीच ही रहना चाहिए।

मेरे पूरे शरीर में ठंड दौड़ गई।

—जो भी हो?

वे मुस्कुराईं।

—आशीर्वाद कई रूपों में आते हैं।

फिर दरवाज़ा बंद हो गया।

चाबी घूमी।

मैं उस कमरे के बीचोंबीच खड़ी थी, दुल्हन के कपड़ों में सजी हुई, लेकिन एक डरे हुए बच्चे की तरह काँप रही थी।

पहले कुछ मिनटों तक मैं हिली भी नहीं।

मैं बस सुनती रही।

बाहर कदमों की आहट धीरे-धीरे दूर चली गई।

आँगन में औरतों की धीमी फुसफुसाहट सुनाई दी।

कहीं किसी धातु की थाली की आवाज़ आई।

फिर सन्नाटा छा गया।

मैं सीधे दरवाज़े के पास गई और हैंडल घुमाया।

बंद।

मैंने धीरे से दस्तक दी।

—देव?

कोई जवाब नहीं।

मैंने ज़ोर से दस्तक दी।

—देव, दरवाज़ा खोलिए।

दूसरी ओर से उसकी धीमी और तनाव भरी आवाज़ आई।

—कृपया सो जाओ, नैना।

—दरवाज़ा खोलिए।

—सुबह जल्दी हो जाएगी।

—देव!

इस बार दूसरी आवाज़ आई।

उसकी नहीं।

उसकी माँ की।

—अच्छी बहू अपनी पहली रात को चिल्लाती नहीं है।

उसके बाद किसी ने कुछ नहीं कहा।

मैं अपना हाथ दरवाज़े पर रखे तब तक खड़ी रही, जब तक मेरी बाँह सुन्न नहीं हो गई।

आख़िरकार मैं मुड़ी।

अब कमरा अलग लग रहा था।

बिस्तर के ऊपर लगी चमेली की माला बहुत नीचे लटकती हुई लग रही थी।

चाँदी का पालना कुछ ज़्यादा ही चमकदार लग रहा था।

पुरानी तस्वीरें जीवित-सी लग रही थीं।

मैंने अपना फ़ोन पर्स से निकाला।

कोई सिग्नल नहीं था।

हवेली की दीवारें मोटी थीं, लेकिन मुझे पता था कि सिर्फ वही वजह नहीं थी।

खिड़की के पास पीतल का एक छोटा डिब्बा रखा था।

मैंने दफ़्तर के कॉन्फ़्रेंस रूम में ऐसे उपकरण पहले भी देखे थे।

सिग्नल जैमर।

मेरी साँस अटक गई।

किसी पारिवारिक परंपरा को सिग्नल जैमर की ज़रूरत क्यों होगी?

मैंने खिड़कियाँ खोलने की कोशिश की।

उन्हें बाहर से बंद किया गया था।

मैंने खुद को शांत करने की कोशिश की।

शायद मैं ज़रूरत से ज़्यादा सोच रही थी।

शायद यह सिर्फ पुरानी सोच वाली कोई बेकार रस्म थी।

शायद सुबह मैं देव को डाँटूँगी, अपने माता-पिता को फ़ोन करूँगी और होटल चली जाऊँगी।

मैंने एक-एक करके अपने हार उतारे।

गर्दन के आसपास की त्वचा जल रही थी।

मैंने अपना दुपट्टा ढीला किया और बिस्तर पर लेटे बिना उसके किनारे बैठ गई।

चमेली की खुशबू दम घोंट रही थी।

मीठी।

सड़ी हुई।

बहुत तेज़।

करीब रात के दो बजे, मैंने अपने ऊपर से किसी चीज़ के घिसटने की आवाज़ सुनी।

मैं बिल्कुल स्थिर हो गई।

बहुत हल्की-सी आवाज़।

मानो कोई धागा किसी हुक से रगड़ खा रहा हो।

मैंने ऊपर देखा।

माला स्थिर थी।

मैंने इंतज़ार किया।

कुछ नहीं।

फिर वही आवाज़ आई।

घिस…

घिस…

मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।

मैं बिस्तर पर खड़ी हुई और माला को छुआ।

वह हल्के से झूल गई।

हवा से नहीं।

क्योंकि हवा थी ही नहीं।

मैं जल्दी से नीचे उतर आई।

अब मेरे हाथ काँप रहे थे।

मैंने लकड़ी की एक कुर्सी घसीटकर माला के नीचे रखी और उस पर चढ़ गई।

चमेली के फूल मेरे चेहरे को छू रहे थे।

फूलों के पीछे मेरी उँगलियों को कोई कठोर चीज़ महसूस हुई।

न हुक।

न कील।

एक बहुत छोटी काली वस्तु।

गोल।

गर्म।

मैंने फूलों को एक तरफ हटाया।

उसी क्षण एक लाल बत्ती टिमटिमाई।

एक बार।

दो बार।

फिर बुझ गई।

मैं लगभग कुर्सी से गिर ही गई।

वह एक कैमरा था।

शादी की माला के भीतर छिपा हुआ।

सीधे बिस्तर की ओर लगा हुआ।

कुछ सेकंड तक मैं साँस भी नहीं ले सकी।

कमरा घूमने लगा।

मेरी सुहागरात।

मेरा दुल्हन वाला कमरा।

मेरा बंद दरवाज़ा।

मेरा ख़ामोश पति।

खाली पालना।

सिग्नल जैमर।

और यह चेतावनी कि आज रात जो भी हो, वह इसी घर के भीतर रहना चाहिए।

सब कुछ एक फाँसी के फंदे की तरह आपस में जुड़ गया।

तभी दीवार से, जहाँ पुरानी तस्वीरें टंगी थीं, एक आवाज़ आई।

हल्की-सी क्लिक।

फिर फुसफुसाहट।

एक आदमी की फुसफुसाहट।

—क्या उसने उसे ढूँढ़ लिया?

मेरा खून जम गया।

मैं जितना हो सके उतनी चुपचाप कुर्सी से नीचे उतर आई।

फिर वही फुसफुसाहट सुनाई दी।

इस बार और पास से।

दीवार के भीतर कहीं छिपी हुई।

—दूसरा एंगल देखो।

दूसरा एंगल।

मतलब एक और कैमरा था।

शायद उससे भी ज़्यादा।

मैंने तस्वीरों की ओर देखा।

चाँदी के पालने की ओर देखा।

पीतल के दीपक की ओर देखा।

नक्काशीदार आईने की ओर देखा।

अचानक उस कमरे की हर चीज़ मुझे एक आँख जैसी लगने लगी।

फिर चमेली की माला फिर से हिली।

हवा की वजह से नहीं।

किसी आशीर्वाद की वजह से नहीं।

बल्कि इसलिए कि कहीं न कहीं कोई उसे नियंत्रित कर रहा था।

और जब मैं चाँदी के पालने की ओर मुड़ी, तो मैंने देखा कि उसमें रखी छोटी-सी सुनहरी खिलौना तलवार अपने-आप ऊपर उठ गई, मानो किसी अदृश्य हाथ ने उसे छू लिया हो।

फिर पालने के भीतर से एक बच्चे की रिकॉर्ड की हुई आवाज़ आई।

—माँ… हमें एक बेटा दो।

मैं चीख उठी।

लेकिन बंद दरवाज़े के बाहर कोई भी नहीं आया।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.