
गेंदा के फूलों की मालाएँ छत से लटक रही थीं।
प्रवेश द्वार के पास पीतल का एक दीपक जल रहा था।
दीवार पर, लाल कपड़े में आंशिक रूप से लिपटी हुई, एक चमकदार नेमप्लेट लगी थी।
“अरविंद भसीन और रिया कपूर।”
निशा की साँस रुक गई।
घर की नौकरानी भी जड़ हो गई।
बैठक के अंदर अरविंद मुड़ा।
उसने क्रीम रंग का कुर्ता पहन रखा था, दफ़्तर के कपड़े नहीं। उसकी बाँहें मुड़ी हुई थीं। उसके माथे पर ताज़ा तिलक लगा था। उसके पास रिया लाल रेशमी साड़ी में खड़ी थी, दोनों कलाइयों में सोने की चूड़ियाँ चमक रही थीं।
निशा उन चूड़ियों को पहचानती थी।
कुछ महीने पहले उसने बैंक से डेबिट का संदेश देखा था।
₹4,80,000।
अरविंद ने कहा था कि वह एक वरिष्ठ ग्राहक की पत्नी के लिए कॉर्पोरेट उपहार था।
अब वही चूड़ियाँ रिया के हाथों में थीं।
कबीर ने भी उन्हें देखा।
फिर उसने अपने पिता का हाथ रिया की कमर के निचले हिस्से पर टिका हुआ देखा।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
अरविंद शर्मिंदा नहीं लग रहा था।
वह केवल असुविधा महसूस कर रहा था।
—निशा? उसने तीखी आवाज़ में कहा। तुम यहाँ क्या कर रही हो?
उसके हाथ में मिठाई का डिब्बा तिरछा हो गया।
काजू कतली का एक टुकड़ा ढक्कन से हल्के, बेकार-सी आवाज़ के साथ टकराया।
रिया की नज़र निशा से कबीर पर गई। एक पल के लिए उसके चेहरे पर हैरानी आई। फिर वह एक सधे हुए, ज़हरीले शांत भाव के नीचे गायब हो गई।
—तुम बच्चे को भी साथ ले आई? उसने पूछा, मानो निशा ने कोई अशोभनीय काम किया हो।
कबीर अपनी माँ के पीछे आकर खड़ा हो गया।
निशा ने गेंदे के फूलों की मालाओं को देखा।
पीतल के दीपक को देखा।
नेमप्लेट को देखा।
अपने पति को देखा।
—इन्वेस्टर मीटिंग? उसने पूछा।
अरविंद का जबड़ा कस गया।
—यह इस बारे में बात करने की जगह नहीं है।
निशा हल्के से हँसी।
—सच? क्योंकि ऐसा तो लग रहा है कि यही वह जगह है जहाँ तुम अपनी ज़िंदगी की बातें करते हो।
रिया ने अपनी बाँहें मोड़ लीं।
—निशा, कृपया नाटक मत करो। अरविंद यह सब समझदारी से संभालने वाला था।
संभालने वाला।
यह शब्द।
मानो निशा कोई फ़ाइल हो।
एक लंबित परेशानी।
कबीर की साँसें अनियमित हो गईं।
—पापा, उसने धीमे से कहा। क्या यह आपका घर है?
अरविंद ने उसकी ओर देखा, लेकिन उसके चेहरे का भाव नरम नहीं पड़ा।
—कबीर, जाकर लिफ्ट के पास इंतज़ार करो।
निशा इतनी तेज़ी से उसकी ओर मुड़ी कि रिया भी एक कदम पीछे हट गई।
—मेरे बेटे को यह सब दिखाने के बाद उसे आदेश मत दो।
—हमारा बेटा, अरविंद ने कहा।
—नहीं, निशा ने जवाब दिया। एक पिता दूसरा घर नहीं बसाता और अपने बच्चे को उसके बारे में किसी गंदे राज़ की तरह पता चलने देता।
छोटे से मंदिर वाले कोने के पास अब भी बैठे पंडितजी ने नज़रें झुकाकर अपना फ़ोन देखने लगे। भोजन कक्ष के पास खड़े दो बुज़ुर्ग पड़ोसी, जिन्हें स्पष्ट रूप से पूजा में बुलाया गया था, अब सुनने का नाटक नहीं कर रहे थे, जबकि वे हर साँस पर ध्यान लगाए हुए थे।
रिया अरविंद के और पास आ गई।
—अरविंद, बस इन्हें बता दो। अब और मत छिपाओ।
निशा के पेट में मरोड़ उठी।
—मुझे क्या बताओ?
अरविंद ने लंबी साँस ली, बिल्कुल उसी तरह जैसे वह कर्मचारियों को डाँटने से पहले लेता था।
—रिया और मैं साथ हैं। ऐसा हो गया। शादियों में ऐसा हो जाता है जब दो लोग एक-दूसरे के अनुकूल नहीं रह जाते।
निशा उसे घूरती रही।
—अनुकूल नहीं?
—तुम वर्षों से भावनात्मक रूप से दूर रही हो, उसने कहा। तुम्हारी दुनिया सिर्फ कबीर, घर और छोटी-छोटी बातों तक सीमित रही। मुझे साझेदारी चाहिए थी, महत्वाकांक्षा चाहिए थी, बौद्धिक साथ चाहिए था।
निशा के पीछे कबीर के मुँह से टूटी हुई-सी हल्की आवाज़ निकली।
निशा ने महसूस किया कि उसके भीतर कुछ ठंडा और बिल्कुल स्पष्ट हो गया है।
—तुम्हें बौद्धिक साथ चाहिए था, इसलिए तुमने इसके लिए एक फ्लैट खरीद दिया?
अरविंद की आँखें झपकीं।
बस एक बार।
लेकिन निशा ने देख लिया।
—यह फ्लैट एक व्यावसायिक संपत्ति है।
रिया हल्के से मुस्कुराई।
—कृपया ऐसे आरोप मत लगाइए जिन्हें आप समझती नहीं हैं।
निशा ने उसकी ओर देखा।
—मैडम, जब मैंने दीवार पर आपका नाम पढ़ लिया, तब मैं काफ़ी कुछ समझ गई थी।
रिया की मुस्कान गायब हो गई।
अरविंद आगे बढ़ा।
—अपनी आवाज़ नीचे रखो।
तेरह वर्षों तक यह एक वाक्य काम करता रहा था।
रात के खाने की मेज़ पर।
कार में।
उसके माता-पिता के घर।
हर उस बहस में जहाँ अंत में निशा को ही आहत होने के लिए माफ़ी माँगनी पड़ती थी।
लेकिन आज उसके पास कानूनी लिफ़ाफ़े में बयासी करोड़ रुपये थे।
और उसके बेटे का काँपता हुआ हाथ उसके हाथ में था।
उसने अपनी आवाज़ नीचे नहीं की।
—नहीं।
एक शब्द।
साफ़।
अंतिम।
अरविंद उसे ऐसे घूरने लगा मानो उसने उसे थप्पड़ मार दिया हो।
—तुमने क्या कहा?
—मैंने कहा नहीं। मैं यहाँ तुम्हें कुछ बताने आई थी, जो हमारी ज़िंदगी बदल देता। लेकिन तुमने तो उसे पहले ही बदल दिया है।
रिया की नज़र भूरे रंग के लिफ़ाफ़े पर गई।
—उसमें क्या है?
निशा ने नीचे उसकी ओर देखा।
एक ख़तरनाक पल के लिए उसने लगभग उन्हें सब कुछ बता ही दिया था।
तभी कंसोल टेबल पर रखा अरविंद का फ़ोन बज उठा।
स्क्रीन चमक उठी।
“माँ”
उसने कॉल काट दी।
तुरंत एक संदेश आया।
“क्या उसने ब्रुकफ़ील्ड के कागज़ों पर हस्ताक्षर कर दिए या नहीं? देर मत करो। ज़मीन के पैसे आने से पहले रिया का नाम सुरक्षित होना चाहिए।”
निशा ने उल्टा रखा फ़ोन देखकर भी संदेश पढ़ लिया।
फ्लैट की हर आवाज़ जैसे गायब हो गई।
अरविंद ने झटके से फ़ोन उठा लिया।
बहुत देर हो चुकी थी।
निशा ने उसकी ओर देखा।
—ज़मीन के कौन-से पैसे?
उसका चेहरा बदल गया।
पछतावे से नहीं।
डर से।
रिया आगे बढ़ी।
—अरविंद।
निशा की उँगलियाँ मिठाई के डिब्बे पर धीरे-धीरे ढीली पड़ गईं।
डिब्बा गिर गया।
चाँदी का ढक्कन, टूटी हुई मिठाइयाँ और बिखरी हुई चीनी।
कबीर सहम गया।
अरविंद की आवाज़ फिर से नियंत्रित हो गई।
—निशा, कबीर को घर ले जाओ। हम आज रात बात करेंगे।
लेकिन तब तक निशा अपने पर्स में हाथ डाल चुकी थी।
उसका हाथ अदालत वाले लिफ़ाफ़े को छू गया।
उसी के साथ एक और मुड़ा हुआ दस्तावेज़ बाहर फिसल आया।
उसे याद नहीं था कि उसने उसे वहाँ रखा था।
उस पर एक निजी वित्तीय कंपनी की मुहर लगी हुई थी।
“पति/पत्नी की सहमति, संपत्ति गिरवी रखने तथा अपरिवर्तनीय प्राधिकरण।”
सबसे ऊपर उसका नाम टाइप किया हुआ था।
निशा राव भसीन।
सबसे नीचे उसके हस्ताक्षर थे।
बिल्कुल सही।
कुछ ज़्यादा ही सही।
और उसके बगल में, लाभार्थी तथा अधिकृत सह-नियंत्रक के रूप में एक और नाम लिखा था।
रिया कपूर।
निशा ने धीरे-धीरे सिर उठाया।
अरविंद का चेहरा पीला पड़ चुका था।
रिया का हाथ नेमप्लेट पर जा टिका, मानो उसे सहारे की ज़रूरत हो।
कबीर फुसफुसाया—
—मम्मा, उनके कागज़ पर आपका नाम क्यों है?
निशा कोई जवाब नहीं दे सकी।
क्योंकि वे हस्ताक्षर बिल्कुल उसके अपने हस्ताक्षरों जैसे दिख रहे थे।
और उसने उन पर कभी हस्ताक्षर किए ही नहीं थे।
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