
सविता अपनी बेटी की ओर मुड़ीं।
—सच सिर्फ़ उन्हीं लोगों को बुरा लगता है जो दिखावे में जीते हैं।
फिर उन्होंने मेरी ओर देखा।
—तुम पाँच सितारा ब्रंच में भी हैंडलूम पहनकर जाती हो। ड्राइवरों को धन्यवाद कहती हो। वेटरों से उनका नाम पूछती हो। करवाचौथ पर मैंने जो हीरों का सेट चुना था, उसे तुमने यह कहकर ठुकरा दिया कि वह “ज़रूरत से ज़्यादा” है। कार होते हुए भी तुम आज तक मेट्रो से अकेले सफ़र करती हो। लोग क्या सोचेंगे?
मैंने खुद को पूछते हुए सुना—
—कि मैं बेबस नहीं हूँ?
आधे सेकंड के लिए उनकी मुस्कान गायब हो गई।
आख़िरकार अर्जुन बोला, लेकिन मेरे लिए नहीं।
—आन्या, बात को इतना मत बढ़ाओ।
मैं धीरे-धीरे उसकी ओर मुड़ी।
—तुम्हारी माँ ने अभी तुम्हारी पत्नी से कहा कि वह तुम्हारे परिवार के साथ दिखने लायक नहीं है।
उसने गला निगला।
—वह बस सामाजिक परिस्थितियों को लेकर चिंतित हैं।
—और तुम उनसे सहमत हो?
उस सवाल के बाद जो ख़ामोशी छाई, वह सविता की बातों से भी ज़्यादा अपमानजनक थी।
अर्जुन ने नैपकिन से अपनी उँगलियाँ पोंछीं।
—मुझे लगता है कि शायद इस बार अगर तुम न आओ तो यह यात्रा आसान रहेगी। बस इस एक बार।
बस इस एक बार।
यह वाक्य अपमान से भी ज़्यादा गहरा लगा।
क्योंकि उस घर में हर अपमान की शुरुआत इन्हीं शब्दों से होती थी।
बस इस एक बार, मम्मी जो कहें वही पहन लो।
बस इस एक बार, रिया को मत टोको।
बस इस एक बार, पापा जी की बात अनसुनी कर दो।
बस इस एक बार, अपने काम का ज़िक्र मत करो।
बस इस एक बार, उनकी पीढ़ी को समझो।
लेकिन यह सिर्फ़ एक बार नहीं था।
यह इत्र लगाकर घूमता हुआ एक पैटर्न था।
सविता की आवाज़ फिर से मीठी हो गई।
—देखा? अर्जुन समझता है। शादी में समझौता करना पड़ता है। तुम यहीं रह सकती हो। सुबह स्टाफ आ जाएगा। मैंने उन्हें पहले ही कह दिया है कि तुम्हें रसोई और गेस्ट रूम का इस्तेमाल करने दिया जाए।
मैं उन्हें देखती रह गई।
—गेस्ट रूम?
—स्वाभाविक है। जब तक हम बाहर रहेंगे, मैं नहीं चाहती कि तुम हमारे मुख्य कमरों का इस्तेमाल करो। रिया के गहने यहीं रहेंगे। कुछ बहुत महँगे गहने ऊपर वाले लॉकर में रखे हैं।
रिया ने बनावटी मासूमियत से आँखें फैलाईं।
—मम्मी, प्लीज़। मैंने कब कहा कि भाभी चोरी करेंगी?
सविता ने हल्की-सी साँस भरी।
—सावधानी बरतना किसी पर आरोप लगाना नहीं होता।
उसी पल मेरे लिए वह कमरा बदल गया।
उस समय तक मेरा सिर्फ़ अपमान हुआ था।
अब मुझे परखा जा चुका था, मेरे ऊपर एक ठप्पा लगा दिया गया था, और मुझे घर के फ़र्नीचर से भी नीचे रख दिया गया था।
अर्जुन फुसफुसाया—
—आन्या, बस करो।
मैंने उसकी ओर देखा।
—नहीं, अर्जुन। अभी बहुत कुछ बाकी है।
सविता के नथुने फूल गए।
—मेरे घर में अपनी आवाज़ संभालकर बात करो।
मैं हल्का-सा मुस्कुराई।
—आपका घर?
आख़िरकार महेश जी ने सिर उठाया।
—इसका क्या मतलब है?
—कुछ नहीं, पापा जी। मैं बस इन व्यवस्थाओं को समझने की कोशिश कर रही हूँ।
सविता ने ठुड्डी ऊँची कर ली।
—समझने जैसा कुछ नहीं है। बुकिंग हो चुकी है। तीन ओशन-व्यू सुइट्स, वीआईपी डाइनिंग, निजी तट स्थानांतरण, स्पा एक्सेस और कप्तान की मेज़ पर विशेष निमंत्रण। हम शनिवार को कोच्चि से रवाना होंगे।
रिया ने गर्व से कहा—
—सूर्यगढ़ सैफ़ायर कोई सस्ती फ़ेरी नहीं है, भाभी। वहाँ तो इन्फ्लुएंसर्स को भी आसानी से मंज़ूरी नहीं मिलती। मम्मी को अपने संपर्क लगाने पड़े।
मेरी उँगलियाँ नैपकिन पर थम गईं।
सूर्यगढ़ सैफ़ायर।
उस शाम पहली बार मेरा गुस्सा ठंडा होकर एक साफ़, शांत एहसास में बदल गया।
मैं उस नाम को जानती थी।
मैं उस जहाज़ के मूल डिज़ाइन ड्रॉइंग्स जानती थी।
मैं उस वास्तुकार को जानती थी जिसने उसके सागौन वाले बॉलरूम को फिर से तैयार किया था।
मुझे पता था कि पाँचवें डेक पर स्टील की जगह पीतल की रेलिंग क्यों लगी थी।
क्योंकि मैंने अपनी दो गर्मियों की छुट्टियाँ उस शिपयार्ड में नंगे पाँव घूमते हुए बिताई थीं, जहाँ मेरे पिता इंजीनियरों से सुरक्षा, सुगमता और गरिमा को लेकर बहस किया करते थे।
मेरे पिता, देवेंद्र राव, कभी अपना नाम प्रचारित नहीं करते थे।
उनके पास सूर्यगढ़ वॉयेज़ की मालिकाना हिस्सेदारी एक होल्डिंग कंपनी के माध्यम से थी, जिसका संबंध लोग उनसे कभी जोड़ नहीं पाए।
दुनिया के लिए वे बस मंगलुरु के एक शांत स्वभाव वाले इंफ्रास्ट्रक्चर निवेशक थे।
मेरे लिए वे अप्पा थे।
और सविता भसीन के लिए वे अब ऐसा नाम बनने वाले थे जिसे वह कभी नहीं भूल पाएँगी।
मैंने अपना फ़ोन उठाया।
सविता ने आँखें सिकोड़ लीं।
—तुम क्या कर रही हो?
—बस कुछ जाँच रही हूँ।
—मेरी डाइनिंग टेबल पर कोई तमाशा मत करना।
मैंने सीधे उनकी आँखों में देखा।
—मम्मीजी, तमाशा आपने शुरू किया है। मैं तो सिर्फ़ कागज़ देखने की बात कर रही हूँ।
रिया फिर हँस पड़ी।
—कागज़? भाभी, यह कोई सरकारी दफ़्तर नहीं है।
—रिया, लग्ज़री हॉस्पिटैलिटी पूरी तरह कागज़ों पर चलती है।
अब अर्जुन मुझे उलझन से देख रहा था।
—आन्या, तुम कर क्या रही हो?
मैंने उसे कोई जवाब नहीं दिया।
मैंने अपने कॉन्टैक्ट्स खोले और उस नंबर पर फ़ोन मिलाया, जिस पर मैंने इस घर से पहले कभी कॉल नहीं किया था।
दो घंटियों के बाद फ़ोन जुड़ गया।
—सूर्यगढ़ वॉयेज़ एग्ज़ीक्यूटिव डेस्क, शुभ संध्या।
सविता का चेहरा बदल गया।
बस थोड़ा-सा।
लेकिन काफ़ी था।
मैंने शांत स्वर में कहा—
—शुभ संध्या। मैं आन्या राव बोल रही हूँ। कृपया मुझे श्री देवेंद्र राव के कार्यालय से जोड़ दीजिए।
कुछ पल की चुप्पी रही।
फिर रिसेप्शनिस्ट का लहज़ा तुरंत बदल गया।
—जी अवश्य, मैडम। कृपया एक क्षण।
महेश जी के हाथ से चम्मच प्लेट से टकरा गया।
रिया ने रिकॉर्डिंग बंद कर दी।
अर्जुन मुझे ऐसे देख रहा था जैसे मैंने कोई विदेशी भाषा बोल दी हो।
सविता की उँगलियाँ नैपकिन पर कस गईं।
—राव? तुमने राव उपनाम कब से इस्तेमाल करना शुरू किया?
मैंने उनकी ओर देखा।
—जन्म से।
वे कुछ कह पातीं, उससे पहले स्पीकर से दूसरी आवाज़ आई।
—आन्या? सब ठीक है न, कन्ना?
मेरे पिता की आवाज़ पूरे डाइनिंग रूम में गूँज उठी।
गरमजोशी भरी।
स्थिर।
और सिर्फ़ उन्हीं लोगों के लिए ख़तरनाक, जिन्होंने कोई बहुत बड़ी मूर्खता की हो।
मैंने सविता की आँखों में देखते हुए कहा—
—अप्पा, मुझे इस शनिवार कोच्चि से रवाना होने वाली सूर्यगढ़ सैफ़ायर की एक बुकिंग की समीक्षा करनी है।
पूरा कमरा बिल्कुल शांत हो गया।
—किसकी बुकिंग?
—भसीन परिवार। तीन ओशन-व्यू सुइट्स। वीआईपी पैकेज।
मेरे पिता ने यह नहीं पूछा कि क्यों।
यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी।
वे पहले सुनते थे।
—मुझे स्पीकर पर कर दो।
—आप पहले से ही स्पीकर पर हैं।
कुछ क्षणों की चुप्पी रही।
फिर अप्पा बोले—
—अच्छा। तब सब लोग साफ़-साफ़ सुन सकेंगे। मैं अभी हमारी कंप्लायंस टीम से फ़ाइल खुलवा रहा हूँ।
सविता अचानक खड़ी हो गईं।
—यह बिल्कुल अनुचित है।
मैंने उनकी ओर देखा।
—रात के खाने की मेज़ पर अपनी बहू को पारिवारिक यात्रा से बाहर करना उससे ज़्यादा अनुचित नहीं था?
अर्जुन फुसफुसाया—
—आन्या, प्लीज़ कॉल काट दो।
मैं उसकी ओर मुड़ी।
—क्यों? अब शर्म आ रही है?
उसके पास कोई जवाब नहीं था।
लाइन पर एक नई आवाज़ जुड़ी।
—मैडम, मैं गेस्ट कंप्लायंस से निखिल बोल रहा हूँ। मेरे सामने भसीन परिवार की बुकिंग खुली हुई है।
मेरे पिता बोले—
—सिर्फ़ ज़रूरी बातें पढ़ो।
निखिल थोड़ा रुका।
—सर… इस बुकिंग के साथ एक विशेष निर्देश जुड़ा हुआ है।
सविता के चेहरे का रंग उड़ गया।
मेरी धड़कन धीमी हो गई।
मुझे पहले से पता था।
फिर भी मैंने पूछा—
—क्या निर्देश?
निखिल की आवाज़ सावधान हो गई।
—मैडम, नोट में लिखा है कि यदि आन्या राव भसीन नाम की कोई व्यक्ति चेक-इन पर पहुँचे, तो उसे जहाज़ पर चढ़ने की अनुमति न दी जाए। इसमें लिखा है कि वह मुख्य अतिथियों के लिए शर्मिंदगी का कारण बन सकती हैं।
कोई हिला नहीं।
किसी ने साँस तक नहीं ली।
फिर निखिल ने कहा—
—मैडम, इसके साथ एक दूसरा नोट भी है।
सविता ने मेज़ का किनारा कसकर पकड़ लिया।
—यह बकवास बंद करो।
मैंने बिना पलक झपकाए कहा—
—उसे पढ़िए।
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