
PART 1
श्मशान घाट से पिता की अर्थी की राख अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि नर्स ने अनन्या मल्होत्रा की कलाई पकड़कर फुसफुसाया, “बंगले में वापस मत जाना, वे तुम्हें भी खत्म करना चाहती हैं।”
दिल्ली के निगमबोध घाट पर सर्द जनवरी की धुंध पसरी हुई थी। यमुना के किनारे जलती चिताओं का धुआं हवा में ऐसे तैर रहा था जैसे किसी ने पूरे शहर पर राख की चादर डाल दी हो। अनन्या के सामने कुछ ही देर पहले उसके पिता राजीव मल्होत्रा की चिता जली थी। वही राजीव मल्होत्रा, जो करोल बाग की तंग गलियों से उठकर गुरुग्राम और दक्षिण दिल्ली में करोड़ों की रियल एस्टेट कंपनी खड़ी कर चुके थे। वही पिता, जिनके हाथ पकड़कर अनन्या ने चलना सीखा था, जिनकी आवाज़ में कभी कमजोरी नहीं आई थी, पिछले 6 महीनों में बिस्तर से उठने लायक भी नहीं रहे थे।
चारों ओर 40 से ज्यादा लोग खड़े थे। रिश्तेदार, कारोबारी साथी, पड़ोसी, कुछ नेता, कुछ ऐसे लोग भी जिनके चेहरे पर दुख कम और जिज्ञासा ज्यादा थी। सबके बीच राजीव की दूसरी पत्नी माया मल्होत्रा सफेद साड़ी में सिर झुकाए बैठी थी। उसके रोने का तरीका इतना सधा हुआ था कि हर आंसू सही समय पर गिरता था। उसकी बेटी रिया, जिसे राजीव ने शादी के बाद अपने घर में जगह दी थी, थोड़ी दूरी पर खड़ी मोबाइल में कुछ देख रही थी।
“मम्मी, वकील आज ही आएगा न?” रिया ने धीमे से पूछा, पर इतना धीमा नहीं कि अनन्या सुन न सके। “वो 5 करोड़ वाली बात आज साफ हो जानी चाहिए।”
माया ने उसे आंखों से चुप कराया और तुरंत अपने माथे पर हाथ रखकर फिर से रोने लगी।
अनन्या का दिल भीतर से चटक गया। उसने अपने पिता को 1 महीने नहीं, पूरे 6 महीने मरते देखा था। रात को माया उनके लिए तुलसी, अश्वगंधा और जाने कौन-कौन सी जड़ी-बूटियों की काढ़ा बनाकर लाती थी। कहती थी, “आयुर्वेद से शरीर अंदर से साफ होता है।” हर बार उस काढ़े के बाद राजीव उल्टी करते, कांपते, कभी-कभी शब्द भूल जाते। डॉक्टर इसे उम्र, तनाव और नसों की बीमारी बताते रहे। जब अनन्या ने मुंबई के बड़े न्यूरोलॉजिस्ट को दिखाने की बात की, माया ने सबके सामने उसे डांट दिया था।
“तुम्हें अपने पिता की बीमारी से ज्यादा उनके पैसों की चिंता है, अनन्या। हर बात में शक करती हो।”
उस दिन अनन्या चुप हो गई थी, पर उसका शक कभी खत्म नहीं हुआ।
अब वही शक उसके सामने खड़ी नर्स सावित्री के चेहरे पर डर बनकर कांप रहा था। सावित्री पिछले 3 महीनों से राजीव की देखभाल कर रही थी। शांत, कम बोलने वाली, पर हर दवाई, हर प्लेट, हर आवाज़ पर नजर रखने वाली औरत।
“सावित्री जी, आप क्या कह रही हैं?” अनन्या की आवाज़ टूट गई।
सावित्री ने माया और रिया की ओर देखा। उसका चेहरा राख जैसा सफेद हो चुका था।
“यहां नहीं। सबके सामने नहीं। अकेले निकलो। किसी को मत बताना। साहब ने सब इंतज़ाम कर दिया है।”
“साहब?” अनन्या लगभग चीख पड़ी। “मेरे पापा मर चुके हैं।”
सावित्री उसके कान के पास झुकी।
“तो फिर उनकी स्मार्टवॉच आज सुबह मेरी जेब में धड़कन क्यों दिखा रही थी?”
अनन्या के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई।
कुछ देर बाद वह बिना किसी से मिले घाट से बाहर निकल गई। पीछे से माया की मीठी, जहरीली आवाज़ आई, “अनन्या, घर नहीं चलोगी? आज शाम वकील आ रहे हैं।”
“मुझे हवा चाहिए,” अनन्या ने बिना मुड़े कहा।
घाट की पिछली गली में सावित्री एक पुरानी सफेद इको कार के पास खड़ी थी। अनन्या उसमें बैठ गई। कार दिल्ली की भीड़ से निकली, धौला कुआं पार किया, फिर हाईवे पर चली। लगभग 1 घंटे बाद वे गुरुग्राम की चमकदार इमारतों को छोड़कर हरियाणा के एक पुराने फार्महाउस के सामने रुके। यह राजीव की मां का फार्महाउस था, जिसे वे सालों से बेचने से मना करते आए थे।
बाहर से घर बंद और सुनसान दिख रहा था। मगर अंदर जाते ही अनन्या ने फर्श पर ताजा पैरों के निशान, रसोई में गर्म चाय और पूजा के कमरे में जलता दीपक देखा।
सावित्री ने धीरे से कहा, “ड्राइंग रूम में जाइए।”
अनन्या ने दरवाज़ा खोला।
कमरे के बीच में व्हीलचेयर पर एक आदमी बैठा था। पीठ उसकी ओर थी, पर कंधों की बनावट, सफेद बालों की रेखा, और बाएं हाथ की वह अंगूठी अनन्या कैसे भूल सकती थी? वही अंगूठी जो उसकी मां की मौत के बाद भी राजीव ने कभी नहीं उतारी थी।
“पापा…” उसकी सांस रुक गई।
व्हीलचेयर धीरे-धीरे मुड़ी।
राजीव मल्होत्रा जिंदा थे। बहुत कमजोर, बहुत पीले, आंखों के नीचे गहरे गड्ढे, लेकिन जिंदा।
अनन्या उनके पैरों में गिर पड़ी। “मैंने आपको जलते देखा… सब खत्म हो गया था…”
राजीव का कांपता हाथ उसके सिर पर ठहर गया।
“तुमने मेरी नहीं, खाली अर्थी की चिता देखी थी, बेटा। और आज मैंने आखिरी बार देख लिया कि कौन मेरे मरने का इंतजार कर रहा था।”
कमरे में कुछ मिनट तक सिर्फ रोने की आवाज़ रही। फिर सावित्री ने मेज पर एक टैबलेट रखा। स्क्रीन पर ग्रेटर कैलाश वाले मल्होत्रा बंगले की रसोई दिख रही थी। माया रात में चुपके से डिब्बी खोलकर दूध में सफेद पाउडर मिला रही थी। फिर रिया आई, उसने भूरे रंग की शीशी से 4 बूंदें डालते हुए कहा, “मम्मी, इतनी धीमी दवा से काम नहीं चलेगा। पापा फरवरी तक भी बच गए तो वसीयत बदल देंगे।”
अनन्या की आंखों में खून उतर आया।
“उन्होंने आपको जहर दिया?”
राजीव की आवाज़ भारी थी। “दे रही थीं। सावित्री ने आधी दवा बदल दी। डॉक्टर अरोड़ा ने मुझे नकली नाम से जयपुर के एक निजी अस्पताल में रखा। एक पुराने दोस्त ने मृत्यु प्रमाणपत्र का नाटक किया, ताकि आर्थिक अपराध शाखा इन्हें रंगे हाथ पकड़ सके।”
अनन्या पीछे हट गई। “आपने मुझे क्यों नहीं बताया?”
“क्योंकि तुम जानतीं, तो माया तुम्हारी आंखों में सच पढ़ लेती। फिर अगला काढ़ा तुम्हारे लिए बनता।”
सावित्री ने एक काली ब्रोच निकाली। “इसमें कैमरा और माइक्रोफोन है। आज रात तुम घर लौटोगी। वे समझेंगी कि तुम अकेली हो, टूट चुकी हो।”
राजीव ने विरोध किया, पर अनन्या खड़ी हो गई।
“अब मेरी बारी है, पापा। उन्होंने आपकी चिता जलाई है। अब मैं उनकी असलियत जलते देखूंगी।”
रात को जब अनन्या बंगले लौटी, ग्रेटर कैलाश की वह कोठी किसी शोक-सभा जैसी नहीं, लूट के इंतजार में बैठे दरबार जैसी लग रही थी। ड्राइंग रूम में माया राजीव की पसंदीदा कुर्सी पर बैठी थी। रिया सोफे पर पैर चढ़ाकर दुबई के पेंटहाउस देख रही थी। वकील देवेंद्र सूरी अपनी चमड़े की फाइल खोल रहा था।
“आ गई महारानी,” रिया हंसी। “रोना खत्म हुआ?”
अनन्या चुपचाप बैठ गई।
देवेंद्र सूरी ने पुरानी वसीयत पढ़ी। उसमें कंपनी का बड़ा हिस्सा अनन्या को, माया को घर और जीवनभर की देखभाल, और रिया को अच्छी रकम दी गई थी। माया का चेहरा सख्त हो गया।
“यह पुराना कागज है,” उसने कहा।
फिर उसने एक क्रीम रंग का लिफाफा निकाला।
नई वसीयत में लिखा था कि राजीव ने सारी होल्डिंग्स माया को, 5 करोड़ रिया को, और अनन्या को सिर्फ द्वारका का 2 कमरों का फ्लैट दिया है, ताकि वह “मेहनत का मूल्य सीख सके।”
अनन्या ने कागज देखा। हस्ताक्षर टेढ़े थे। शब्द उसके पिता के नहीं थे।
उसने धीरे से कहा, “पापा ने यह नहीं लिखा।”
माया मुस्कुराई। “तुम अपने पिता को उतना नहीं जानती थीं जितना समझती थीं।”
अनन्या ने रिया को देखा। “और तुम बूंदें गिनती थीं, है न?”
रिया का चेहरा सफेद पड़ गया।
उसी क्षण ऊपर की मंजिल से किसी भारी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई। तीनों चौंके। अनन्या के दिल में अचानक एक अजीब डर उठा।
क्योंकि बंगले में कोई चौथा भी था।
PART 2
आधी रात के बाद बंगले की सारी लाइट अचानक बंद हो गई। अनन्या ने वही किया था जो राजीव ने उसे फोन पर समझाया था—मुख्य स्विच गिराया, फिर स्टडी रूम की पुरानी स्पीकर प्रणाली चालू की। अंधेरे में राजीव की रिकॉर्ड की हुई आवाज़ पूरे घर में गूंजी।
“माया… मेरा काढ़ा ठंडा हो रहा है…”
माया चीख पड़ी। रिया फर्श पर बैठ गई। देवेंद्र सूरी मंत्र बुदबुदाने लगा। पर अनन्या की नजर सीढ़ियों पर टिक गई। अंधेरे में एक काली परछाईं रिया के कमरे की ओर गई।
अनन्या चुपचाप उसके पीछे गई। कमरे के भीतर किसी ने बिस्तर पर एक पुरानी गुलाबी गुड़िया रखी, जिसका पेट फटा हुआ था। उसमें एक पिन लगी थी और कागज पर लिखा था—
“मुझे भी पता है तुमने क्या किया।”
परछाईं पीछे के दरवाजे से गायब हो गई।
सुबह रिया का चेहरा बुझा हुआ था। वह नाश्ता छोड़े बिना सीधे बेसमेंट में गई। अनन्या ने छिपकर देखा—रिया ने दीवाली की पुरानी सजावट के पीछे रखे लोहे के संदूक से नीली फाइल निकाली। उसके जाते ही अनन्या ने संदूक खोला।
अंदर एक पीली तस्वीर थी। माया 7 महीने की गर्भवती थी और देवेंद्र सूरी ने उसे बांहों में पकड़ा हुआ था। पीछे लिखा था—“हमारी रिया, हमारा राज।”
फाइल में डीएनए रिपोर्ट थी।
रिया राजीव की बेटी नहीं थी।
उसी शाम पुलिस बंगले में घुसी। माया ने जैसे उनका इंतजार किया हो।
“अनन्या मल्होत्रा?” इंस्पेक्टर बोला।
“जी।”
“आपको कंपनी के धन के गबन, नकली दस्तावेज और वसीयत से छेड़छाड़ के आरोप में हिरासत में लिया जाता है।”
रिया ने मुस्कुराकर कहा, “अब समझी? पापा ने आखिर जान लिया कि असली समस्या कौन थी।”
माया ने अनन्या के कान में फुसफुसाया, “तेरा कमरा अब रिया का ड्रेसिंग रूम बनेगा।”
हथकड़ी लगते समय अनन्या ने सड़क के किनारे सावित्री को देखा।
सावित्री ने चुपचाप अंगूठा ऊपर किया।
अनन्या समझ गई—गिरफ्तारी उसकी नहीं, उनका जाल था।
PART 3
पुलिस की गाड़ी थाने नहीं गई। वह दिल्ली की भीड़ छोड़कर एक सरकारी इमारत के भूमिगत प्रवेश द्वार में घुस गई। अंदर जाते ही अनन्या की हथकड़ियां खोल दी गईं। सामने आर्थिक अपराध शाखा के संयुक्त आयुक्त अरविंद राणा खड़े थे। उनके बगल में सावित्री थी, थकी हुई, मगर उसकी आंखों में पहली बार डर से ज्यादा संतोष था।
“माफ कीजिए, अनन्या जी,” राणा ने कहा। “यह नाटक जरूरी था। माया, रिया और देवेंद्र को लगना चाहिए था कि आप रास्ते से हट चुकी हैं।”
अनन्या की पहली चिंता वही थी। “मेरे पापा?”
पीछे का दरवाज़ा खुला।
राजीव अंदर आए। इस बार व्हीलचेयर पर नहीं, छड़ी के सहारे। उनके कदम कमजोर थे, पर आंखों में वही पुरानी आग लौट आई थी।
अनन्या ने उन्हें पकड़ लिया। “कृपया अब और झूठ मत बोलिएगा।”
राजीव ने उसका हाथ दबाया। “अब नहीं। आज सब खत्म होगा।”
दीवार पर लगे बड़े स्क्रीन पर ग्रेटर कैलाश का ड्राइंग रूम लाइव दिख रहा था। माया, रिया और देवेंद्र सूरी सोफे पर बैठे थे। टेबल पर शैंपेन, बैंक फाइलें, पासपोर्ट और लैपटॉप खुले पड़े थे। देवेंद्र की उंगलियां कीबोर्ड पर चल रही थीं।
“अनन्या के नाम वाले शेयरों को पहले ट्रस्ट में डालूंगा,” देवेंद्र कह रहा था। “फिर दुबई की कंपनी से रूट करेंगे। 24 घंटे में पैसा सुरक्षित।”
माया ने गिलास उठाया। “उस लड़की ने मुझे 12 साल इस घर में नौकरानी जैसा महसूस कराया। अब देखना, कल से सब मुझे राजीव मल्होत्रा की असली उत्तराधिकारी कहेंगे।”
रिया बेचैन थी। “मम्मी, मुझे उस आवाज़ से डर लग रहा है। कल रात सच में लगा कि पापा वापस आ गए।”
माया झुंझलाई। “मरे हुए लोग वापस नहीं आते। और जो आते हैं, उन्हें दोबारा भेज दिया जाता है।”
कमरे में बैठे अधिकारियों ने एक-दूसरे की ओर देखा। राणा ने तकनीकी टीम को इशारा किया। कुछ ही सेकंड में देवेंद्र का लैपटॉप बंद हो गया। बंगले के दरवाजों की इलेक्ट्रॉनिक लॉकिंग चालू हो गई। खिड़कियों के शटर नीचे गिरने लगे।
“ये क्या है?” रिया चिल्लाई।
ड्राइंग रूम की टीवी स्क्रीन अपने आप जल उठी। उस पर अनन्या दिखाई दी, सावित्री और अधिकारियों के बीच बैठी हुई।
“नमस्ते, परिवार,” अनन्या ने कहा। “पार्टी कैसी चल रही है?”
माया पीछे हट गई। “तुम तो गिरफ्तार हो गई थीं…”
“रिकॉर्डिंग आप लोगों की हो रही थी।”
देवेंद्र के माथे पर पसीना छलक आया। “ये गैरकानूनी है।”
अनन्या की आवाज़ ठंडी थी। “गैरकानूनी? नकली वसीयत लिखने वाले वकील को कानून याद आ रहा है?”
माया ने टीवी पर हाथ उठाया। “यह मेरा घर है!”
ऊपर की सीढ़ियों से एक आवाज़ आई।
“नहीं, माया। यह कभी तुम्हारा घर था ही नहीं।”
तीनों ने मुड़कर देखा।
राजीव मल्होत्रा सीढ़ियों से उतर रहे थे। काला नेहरू जैकेट, सफेद कुर्ता, हाथ में छड़ी, चेहरा दुबला लेकिन जिंदा। वे किसी भूत की तरह नहीं, किसी ऐसे आदमी की तरह उतर रहे थे जिसने अपने कातिलों को खुद अपनी मौत का निमंत्रण भेजते देखा हो।
रिया की चीख दीवारों से टकराई। देवेंद्र कुर्सी से गिरते-गिरते बचा। माया ने अपने गले पर हाथ रख लिया।
“नहीं… मैंने… मैंने तुम्हें जाते देखा था…”
राजीव ठहर गए। “क्या देखा था, माया? मेरा मरना? या अपनी मिलाई हुई दवा का असर?”
माया ने मुंह बंद कर लिया, पर देर हो चुकी थी।
राजीव ने आगे कहा, “कौन सी चीज़ ने तुम्हें ज्यादा जल्दी थी? मेरी सांस रुकने की, या मेरे दस्तखत नकली बनवाने की?”
माया का चेहरा विकृत हो गया। दुख का नकाब टूट चुका था।
“क्योंकि सब कुछ हमेशा अनन्या के लिए था!” वह चीखी। “तुम्हारी बेटी, तुम्हारी राजकुमारी, तुम्हारी वारिस! मैं क्या थी? मेहमान? तुम्हारे बिस्तर के पास बैठी औरत? मैंने तुम्हारे रिश्तेदारों के ताने सुने, तुम्हारी पार्टियां संभालीं, तुम्हारी बीमारी में सेवा की, और बदले में क्या? घर में रहने की इजाजत और मासिक खर्च?”
“तुम्हें सम्मान मिला था,” राजीव ने कहा।
“मुझे सत्ता चाहिए थी!”
देवेंद्र ने हाथ उठाए। “राजीव, मेरी बात सुनो। माया ने मुझे मजबूर किया था। उसने धमकी दी थी कि—”
माया उसकी ओर झपटी। “चुप रहो! नकली वसीयत किसने बनाई? डॉक्टर से गलत दवाएं किसने लिखवाईं? किसने कहा कि एक बीमार बूढ़े आदमी की मौत पर कोई सवाल नहीं उठाएगा?”
रिया दोनों को देख रही थी। उसकी आंखों का काजल गालों पर बह रहा था।
“आप दोनों ने सच में किया?” उसकी आवाज़ बच्ची जैसी हो गई। “आपने मुझे भी इसमें शामिल किया?”
राजीव ने मेज पर पड़ी नीली फाइल उठाई और उसकी ओर सरका दी।
“और अब तुम्हें यह भी जानना चाहिए कि देवेंद्र ने तुम्हारे लिए इतना सब क्यों किया।”
रिया ने फाइल खोली। तस्वीर देखी। रिपोर्ट पढ़ी। उसके हाथ कांपने लगे।
राजीव मल्होत्रा से जैविक संबंध: 0 प्रतिशत।
देवेंद्र सूरी से जैविक संबंध: 99.9 प्रतिशत।
रिया ने कागज गिरा दिए। “मैं आपकी बेटी नहीं हूं?” उसने राजीव से पूछा।
राजीव की आंखें भर आईं। “खून से नहीं। पर मैंने तुम्हें कभी पराया नहीं माना।”
रिया माया की ओर मुड़ी। “आपने मुझे पूरी जिंदगी झूठ में रखा?”
माया रोने लगी। “मैंने तुम्हारी सुरक्षा के लिए—”
“नहीं,” रिया चीखी। “आपने मुझे हथियार बनाया। आपने मुझे सिखाया कि अनन्या मेरी दुश्मन है। आपने मुझसे उस आदमी के दूध में बूंदें डलवाईं जिसने मेरा पहला स्कूल बैग खरीदा, जिसने मेरी फीस भरी, जिसने हर राखी पर मुझे भी उपहार दिया, जबकि मैं उसकी बेटी भी नहीं थी।”
देवेंद्र सिर झुकाए खड़ा था। रिया उसकी ओर मुड़ी।
“और आप? आप मेरे पिता थे?”
देवेंद्र ने हकलाते हुए कहा, “हालात ऐसे थे…”
रिया हंस पड़ी। वह हंसी इतनी टूटी हुई थी कि कमरे में बैठे अधिकारियों तक सिहर गए।
“हालात नहीं थे। कायरता थी।”
बाहर से पुलिस टीम संकेत का इंतजार कर रही थी। तभी माया ने टेबल पर पड़े फल काटने वाले चाकू को उठा लिया। उसकी आंखों में अब डर नहीं, पागलपन था।
“राजीव, अगर मैं बर्बाद हुई, तो तुम भी बचोगे नहीं!”
वह पूरी ताकत से उनकी ओर दौड़ी।
दिल्ली वाले नियंत्रण कक्ष में अनन्या कुर्सी से उछल पड़ी। “पापा!”
लेकिन राजीव पीछे नहीं हटे। उसी क्षण मुख्य दरवाजा तोड़कर कमांडो अंदर घुसे। एक महिला अधिकारी ने माया को जमीन पर गिरा दिया। चाकू संगमरमर के फर्श पर दूर जा गिरा। देवेंद्र घुटनों के बल बैठ गया। “मैं सरकारी गवाह बनूंगा! सब बताऊंगा! सब माया ने किया!”
माया ने थूकते हुए कहा, “झूठे!”
रिया वहीं जड़ खड़ी रही। फिर अचानक उसने मेज से भारी पीतल की गणेश प्रतिमा उठा ली और देवेंद्र के सामने फेंक दी। प्रतिमा उसके कंधे से टकराई, वह दर्द से चिल्ला उठा।
“बाप कहलाने लायक भी नहीं थे आप,” रिया रोती रही।
पुलिस ने रिया को भी पकड़ लिया। उसके चेहरे पर अपराध से ज्यादा ढह चुकी जिंदगी का बोझ था। वह बार-बार कह रही थी, “मेरे पास अब कोई नहीं है…”
राजीव ने माया को हथकड़ियों में जाते देखा। वह अब भी उससे विनती कर रही थी।
“राजीव, तुमने मुझसे प्यार किया था। मुझे इस तरह मत भेजो।”
राजीव ने बहुत देर बाद कहा, “मैंने एक चेहरा प्यार किया था, माया। इंसान नहीं।”
माया ने पहली बार आंखें झुका लीं।
उस रात के बाद मल्होत्रा परिवार की कहानी पूरे देश में फैल गई। न्यूज चैनलों ने इसे “दिल्ली की जहर वाली विधवा”, “खाली चिता का रहस्य” और “वकील का छिपा हुआ खून” जैसे नाम दिए। सोशल मीडिया पर लोग बहस करने लगे। कुछ राजीव को निर्दयी कहते, क्योंकि उन्होंने अपनी बेटी को खाली चिता पर रोने दिया। कुछ कहते, इंसान जब अपने ही घर में मरने लगे, तो उसे भूत बनकर लौटना ही पड़ता है।
अनन्या ने कुछ नहीं पढ़ा। उसने बहुत कुछ देख लिया था।
मुकदमा 8 महीने चला। अदालत में माया के चेहरे से वह चमक गायब थी जो कभी पार्टियों में सबको चकाचौंध कर देती थी। देवेंद्र सूरी का लाइसेंस रद्द हो चुका था। वह झुककर चलता था जैसे हर झूठ उसकी रीढ़ पर पत्थर बन गया हो। रिया सादे सूट में आती, बिना मेकअप, बिना किसी दिखावे के। उसकी आंखें हमेशा जमीन पर रहतीं।
अदालत ने माया को हत्या के प्रयास, जहर देने की साजिश, नकली वसीयत, आर्थिक धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र में कठोर सजा सुनाई। देवेंद्र को जालसाजी, धन शोधन और संपत्ति हड़पने की साजिश में दोषी ठहराया गया। रिया को कम सजा मिली, क्योंकि रिकॉर्डिंग और मेडिकल रिपोर्ट से साफ हुआ कि उसे लंबे समय तक मां ने डर और लालच के बीच रखा था, पर अपराध में उसकी भागीदारी माफ नहीं की जा सकती थी।
फैसले के बाद रिया ने जाते-जाते अनन्या को देखा।
“मुझे माफ कर दो,” उसने धीमे से कहा।
अनन्या ने उसे गले नहीं लगाया। उसने उसे धक्का भी नहीं दिया। बस चुपचाप सिर झुका दिया। कुछ माफियां ऐसी होती हैं जो दिल के दरवाजे पर आकर बैठ जाती हैं, पर भीतर आने में सालों लगा देती हैं।
अदालत से निकलकर राजीव और अनन्या सीधे बंगले नहीं गए। वे लोधी रोड के एक शांत श्मशान के पास बने छोटे से कब्रिस्तान जैसी जगह पर पहुंचे, जहां सावित्री की अस्थियां रखने के बाद उसके परिवार ने एक साधारण स्मृति-फलक लगाया था। मुकदमे का फैसला आने से 1 महीने पहले सावित्री कैंसर से चली गई थी। उसने अपनी बीमारी छिपाई थी, ताकि राजीव को बचाने का काम अधूरा न रह जाए।
अनन्या ने वहां सफेद चमेली रखी।
“परिवार खून से नहीं होता, पापा,” उसने कहा। “कभी-कभी वह नर्स की सफेद वर्दी में आता है।”
राजीव रो पड़े। “उसने पैसे नहीं लिए। कहती थी, सच जीत जाए, बस वही काफी है।”
कुछ देर वे दोनों चुप रहे। हवा में अगरबत्ती की हल्की गंध थी। पहली बार अनन्या को लगा कि सन्नाटा अब खतरा नहीं, शांति है।
कुछ सप्ताह बाद राजीव ने ग्रेटर कैलाश का बंगला बेच दिया। उन्होंने कहा, “जिस घर की दीवारों ने जहर की खुशबू सीख ली हो, उसमें नींद वापस नहीं आती।” वे जयपुर के बाहर एक छोटे फार्महाउस में रहने लगे। वहां 2 नीम के पेड़ थे, छोटा सा मंदिर था, और रसोई में हर बार काढ़ा बनते ही राजीव हंसकर कहते, “पहले सावित्री का भूत चेक करेगा।”
अनन्या धीरे-धीरे कंपनी संभालने लगी। बोर्ड मीटिंग में कुछ उम्रदराज साझेदार फुसफुसाते थे कि वह बहुत भावुक है, बहुत टूटी हुई है, इतनी बड़ी कंपनी कैसे चलाएगी। उन्हें नहीं पता था कि जो लड़की अपनी आंखों से पिता की झूठी चिता, सौतेली मां की साजिश, बहन का झूठा खून और वकील का लालच देख चुकी हो, वह बैलेंस शीट से नहीं डरती।
पहली बड़ी बैठक में अनन्या ने सबकी ओर देखा और कहा, “मल्होत्रा इंफ्रा अब सिर्फ इमारतें नहीं बनाएगी। अब कोई भी प्रोजेक्ट बुजुर्ग मालिकों, विधवाओं या कमजोर परिवारों की जमीन धोखे से नहीं खरीदेगा। लाभ कम होगा, पर नींद साफ होगी।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। फिर राजीव, जो पीछे की कुर्सी पर चुप बैठे थे, धीरे से मुस्कुराए।
एक रविवार अनन्या जयपुर गई। राजीव मिट्टी में बैठे गुलाब लगा रहे थे। उनके कुर्ते पर धूल थी, हाथ गंदे थे, पर चेहरा शांत था।
“आपको मिट्टी में देखकर अजीब लगता है,” अनन्या ने कहा।
राजीव हंसे। “जब आदमी सचमुच मिट्टी में जाने से बच जाए, तो मिट्टी से डरना बंद कर देता है।”
अनन्या उनके पास बैठ गई। “वादा कीजिए, अब कभी मुझे किसी ऐसे इंसान का अंतिम संस्कार नहीं करवाएंगे जो जिंदा हो।”
राजीव ने उसके सिर पर हाथ रखा। “वादा। अब हम जिएंगे। बिना नाटक, बिना भूत, बिना झूठ।”
शाम को दिल्ली लौटते हुए अनन्या ने पुरानी कोठी के सामने कार रुकवाई। गेट बंद था। खिड़कियां अंधेरी थीं। वही घर, जहां कभी रोशनी, गाड़ियों और मेहमानों का शोर रहता था, अब खाली खोल जैसा दिखता था। अनन्या को न गुस्सा आया, न डर। बस उन दीवारों पर दया आई, जिन्होंने इतने महंगे पर्दों के पीछे इतना सस्ता प्यार देखा था।
उसने ड्राइवर से कहा, “चलो।”
कार आगे बढ़ गई।
पीछे छूट गया जहर, नकली वसीयत, खाली चिता, झूठी चीखें और वे लोग जिन्होंने विरासत को प्रेम समझने की गलती की थी। आगे एक कठिन, मगर सच्ची जिंदगी थी।
और उस रात अनन्या ने पहली बार समझा—खून के रिश्ते झूठ बोल सकते हैं, कागजों पर दस्तखत नकली हो सकते हैं, आंसू श्मशान में अभिनय कर सकते हैं; लेकिन सच, चाहे उसे कितनी भी बार जला दिया जाए, एक दिन राख से उठकर घर लौट ही आता है।
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