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पति ने 12 करोड़ के बीमा के लिए हमारा घर जलाया, अस्पताल की सीढ़ियों पर सौतेली बेटी ने कहा, “तुम्हें आग में मरना था,” पर मैं चीखी नहीं, बस फोन निकाला, क्योंकि एक धुंधली तस्वीर के कोने में वह सिरिंज दिख रही थी जो दोनों की असली चाल खोलने वाली थी।

PART 1

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अस्पताल की सीढ़ियों पर जली हुई पत्नी को धक्का देकर गिराने के बाद उसकी सौतेली बेटी ने झुककर फुसफुसाया, “तुम्हें उसी आग में मर जाना चाहिए था।”

नंदिता मल्होत्रा का शरीर दिल्ली के एक बड़े निजी अस्पताल की सर्विस सीढ़ियों के ठंडे पत्थर से टकराया तो उसकी टूटी साँस जैसे छाती के भीतर ही अटक गई। 2 सेकंड तक उसे लगा कि दुनिया चुप हो गई है, फिर दर्द उसके कंधे, पसलियों और जले हुए हाथों में ऐसे फैल गया जैसे किसी ने पट्टियों के नीचे फिर से अंगारे दबा दिए हों। 48 घंटे पहले वह गुरुग्राम के अपने आलीशान बंगले की आग से बची थी। धुएँ में रेंगते हुए उसने ड्रेसिंग रूम की खिड़की तोड़ी थी, जलते परदों के बीच से बालकनी तक पहुँची थी, और मदद के लिए चीखी थी। उसे लगा था कि मौत पीछे छूट गई। पर वह नहीं जानती थी कि असली आग अब शुरू हुई थी।

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सफेद हील्स की धीमी आवाज़ सीढ़ियों से उतरी। रिया, राजीव मल्होत्रा की 19 साल की बेटी, उसके सामने आकर खड़ी हो गई। महँगा क्रीम रंग का कुर्ता, कलाई में सोने का कड़ा, आँखों में वही घमंड जो नंदिता ने हर त्योहार, हर परिवारिक पूजा और हर डाइनिंग टेबल पर झेला था।

रिया ने होंठ मोड़कर कहा, “ओह, गिर गईं आप? इतना ड्रामा करने की क्या ज़रूरत थी?”

नंदिता ने उठने की कोशिश की, मगर रिया ने अपनी हील उसकी पट्टी बंधी हथेली पर रख दी। दर्द ने नंदिता की आँखों के आगे सफेद चिंगारियाँ भर दीं।

रिया झुकी। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर ज़हर से भरी हुई।

“पापा ने सब सोच लिया था। बिजली का पुराना बोर्ड, ढीले तार, ओवरलोडेड एसी, सब कुछ। 3 हफ्ते तैयारी की थी उन्होंने। बस तुम जानवर की तरह रेंगकर बाहर निकल आईं।”

नंदिता के गले में धुआँ अब भी खुरदरा बैठा था। वह बस फुसफुसा सकी, “रिया…”

“मासूम मत बनो,” रिया बोली। “तुमने मेरे पापा से शादी उनके नाम, घर और पैसों के लिए की थी। सबको पता है। 5 करोड़ की पॉलिसी काफी थी तुम्हें खत्म करने के लिए।”

उसने नंदिता के जले गाल को उँगलियों से छुआ। वह स्पर्श दया का नहीं, अपमान का था।

“डॉक्टर ने कहा है तुम्हारे फेफड़े खराब हैं,” रिया ने मुस्कुराकर कहा। “रात में कोई मेडिकल कॉम्प्लिकेशन हो जाए तो किसी को शक नहीं होगा। पापा और मैं आज रात तुम्हारी याद में अच्छा खाना खाएँगे।”

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वह चली गई। नंदिता सीढ़ियों पर पड़ी रही। वह रो सकती थी। नर्स को बुला सकती थी। हार मान सकती थी। मगर राजीव मल्होत्रा की पत्नी बनने से पहले वह 19 साल तक बीमा धोखाधड़ी मामलों की जाँच करने वाली अधिकारी रही थी। उसने दुकानों को कर्ज से बचने के लिए जलते देखा था, गोदामों में नकली शॉर्ट सर्किट देखे थे, कारों को बीमा के लिए नहरों में डुबोते देखा था। वह आग की गंध पहचानती थी। गुरुग्राम वाले बंगले में जो फैला था, वह जले तारों की गंध नहीं थी। वह पेट्रोल, भीगे कपड़े और लालच की गंध थी।

काँपती उँगलियों से उसने अस्पताल की ढीली गाउन की जेब में हाथ डाला। छोटा प्रीपेड फोन वहीं था, जो उसने एक सफाई कर्मचारी से विनती करके लिया था। उसने फोन खोला और वह तस्वीर निकाली, जो एक नर्स ने उसकी पुरानी सहेली को भेजने के लिए खींची थी। तस्वीर में नंदिता बिस्तर पर बैठी थी, चेहरा पट्टियों से ढका हुआ। पर पीछे खिड़की के शीशे में एक धुंधला प्रतिबिंब दिख रहा था।

राजीव कॉरिडोर में खड़ा डॉक्टर बख्शी से बात कर रहा था। और डॉक्टर के हाथ में एक भरी हुई छोटी सिरिंज चमक रही थी।

नंदिता ने वह नंबर मिलाया जिसे वह कभी नहीं भूल सकती थी।

“अरविंद…” उसने टूटी साँस में कहा।

दूसरी ओर से गंभीर आवाज़ आई, “नंदिता? तुम कहाँ हो?”

अरविंद राठौर दिल्ली फायर सर्विस में अधिकारी था। उसने नंदिता के साथ 7 पुराने आगजनी मामलों में काम किया था। वह संयोगों पर भरोसा नहीं करता था।

“राजीव ने घर जलाया,” नंदिता ने कहा। “मेरे पास अस्पताल की फोटो है। शीशे में देखो। डॉक्टर बख्शी मेरी जाँच करने नहीं आया था।”

कुछ पल सन्नाटा रहा।

“तुम अभी कहाँ हो?”

जवाब देने से पहले ऊपर की मंज़िल का दरवाज़ा खुला। भारी कदम तेजी से नीचे उतरने लगे।

नंदिता ने फोन होंठों से चिपका लिया।

“मैक्स अस्पताल, सर्विस सीढ़ियाँ, ईस्ट विंग, लेवल 3। इस फोन को ट्रेस करवाओ।”

कदम अचानक रुके, फिर और तेज़ हो गए। मोड़ पर डॉक्टर बख्शी दिखा। उसका सफेद कोट आधा खुला था। गले में स्टेथोस्कोप नहीं था। दाहिने हाथ में पारदर्शी द्रव से भरी सिरिंज थी।

नंदिता का खून जम गया।

“फोन काट दीजिए, मिसेज मल्होत्रा,” डॉक्टर बख्शी ने सपाट आवाज़ में कहा।

“राजीव ने कितने दिए?” नंदिता ने पूछा।

डॉक्टर ने निगलते हुए कहा, “आप समझती नहीं हैं। कर्ज है। मेडिकल काउंसिल में शिकायत है। उसने 40 लाख देने को कहा। बस एक रिपोर्ट लिखनी थी—जलने के बाद अचानक पल्मोनरी एम्बोलिज्म। आपको आग में ही मर जाना चाहिए था। अब सब बिगड़ गया है।”

फोन से अरविंद की आवाज़ आई, “नंदिता, बोलती रहो।”

नंदिता ने बची हुई हवा खींची। “बख्शी मेरे सामने है। उसके हाथ में सिरिंज है। शायद पोटैशियम क्लोराइड।”

डॉक्टर झपटा।

नंदिता ने गर्दन बचाने की कोशिश नहीं की। उसका बायाँ कंधा बेकार था, टाँगें काँप रही थीं, मगर दाहिने हाथ की पट्टी अभी भी हथियार बन सकती थी। उसने पूरी ताकत से अपना हाथ डॉक्टर के घुटने पर मारा। डॉक्टर चीखा। सिरिंज उसके हाथ से छूटी और पत्थर पर टूट गई।

नंदिता फर्श पर रेंगते हुए लेवल 2 के दरवाज़े तक पहुँची। उसने कोहनी से हैंडल दबाया और अस्पताल के लॉन्ड्री कॉरिडोर में गिर पड़ी। गर्म कपड़ों, साबुन और दवा की गंध उसके चेहरे से टकराई। वह एक बड़े लिनन ट्रॉली के पीछे छिप गई।

“अरविंद…” उसने फोन में कहा।

“पुलिस रास्ते में है। वहीं रहो।”

“राजीव सिर्फ मुझे नहीं मारना चाहता,” नंदिता ने कहा।

अरविंद की आवाज़ बदल गई। “मुझे अभी बीमा फाइल मिली है। यह 5 करोड़ की साधारण पॉलिसी नहीं है। 12 करोड़ का पारिवारिक दुर्घटना क्लॉज है। अगर घर के 2 सदस्य एक ही घटना या उससे जुड़े कुछ दिनों के भीतर मरते हैं, तो पूरा भुगतान राजीव को मिलेगा।”

नंदिता की साँस रुक गई।

“दूसरा कौन?”

अरविंद ने धीरे कहा, “रिया।”

PART 2

नंदिता के भीतर जैसे कोई पुराना ताला टूट गया। रिया की ज़हरीली मुस्कान, सीढ़ियों पर उसका पैर, “तुम्हें मर जाना चाहिए था”—सब याद आया। मगर अब वह लड़की दुश्मन नहीं लग रही थी। वह अगला शिकार थी।

“रिया कहाँ है?” अरविंद ने पूछा।

नंदिता ने आँखें बंद कीं। “राजीव उसे आज रात खान मार्केट के उस महँगे रेस्टोरेंट में ले गया होगा। वही जगह, जहाँ वह हर बड़ी डील के बाद जाता है। रिया को लगता है यह जश्न है।”

“तुम वहीं रहो। पुलिस जाएगी।”

“वह पुलिस पर भरोसा नहीं करेगी,” नंदिता बोली। “वह सोचेगी मैं उसे उसके पिता से अलग कर रही हूँ। अगर मैंने मना किया तो वह जिद में वही पी लेगी।”

तभी लॉन्ड्री का दरवाज़ा धड़ाम से खुला। डॉक्टर बख्शी लंगड़ाता हुआ अंदर आया। उसके हाथ में अग्निशामक सिलिंडर था।

“तुमने सब बर्बाद कर दिया,” वह गुर्राया।

नंदिता भाग नहीं सकती थी। पीछे स्टीम सैनिटाइज़र मशीन चालू थी। उसने लोहे की नली उठाई, सेफ्टी लॉक दबाया और डॉक्टर की ओर निशाना लगाया। जैसे ही वह झपटा, उसने गर्म भाप छोड़ दी। चीख पूरे कमरे में गूँज गई। डॉक्टर पीछे गिरा, और उसी समय 4 पुलिसकर्मी अंदर घुस आए। कुछ ही सेकंड में वह हथकड़ी में था।

एक वार्ड बॉय ने नंदिता को रोकना चाहा। “मैडम, आप इस हालत में नहीं जा सकतीं।”

नंदिता ने काँपते हुए खड़े होकर कहा, “मैं बाद में मर सकती हूँ। अभी 19 साल की लड़की अपने पिता के हाथ से ज़हर पीने वाली है।”

3 मिनट बाद अरविंद गाड़ी लेकर पीछे के गेट पर पहुँचा। नंदिता खून लगी अस्पताल की गाउन पर वार्ड बॉय की जैकेट डालकर बैठ गई।

“खान मार्केट,” उसने कहा।

और दिल्ली की रात सायरन की आवाज़ में फटती चली गई।

PART 3

सड़कें चमक रही थीं। जुलाई की उमस, लाल बत्तियाँ, भागती गाड़ियाँ, सड़क किनारे गोलगप्पे के ठेले, और बीच में पुलिस की नीली बत्ती। नंदिता खिड़की से सिर टिकाए बैठी थी। हर झटका उसकी पसलियों में चाकू की तरह उतरता, पर उसका दिमाग अब पुराने केस फाइल की तरह खुल चुका था।

अरविंद ने फोन उसकी ओर बढ़ाया। “बख्शी बोलने लगा है।”

रिकॉर्डिंग में डॉक्टर की काँपती आवाज़ थी।

“राजीव मल्होत्रा ने 2 मेडिकल नोट तैयार करवाए थे। पहले नंदिता के लिए। दूसरा रिया के लिए। उसने कहा था कि लड़की को वाइन में दवा मिलाकर दिया जाएगा। रिपोर्ट में लिखना था—अल्कोहल और एंटी-एंग्जायटी टैबलेट का रिएक्शन।”

नंदिता ने आँखें मूँद लीं। रिया ने उसे कभी स्वीकार नहीं किया था। गृहप्रवेश के दिन उसने फूलों की थाली उठा कर अलग रख दी थी। करवा चौथ पर रिश्तेदारों के सामने कहा था, “ये मेरी माँ की जगह नहीं ले सकतीं।” दिवाली की रात उसने नंदिता की बनाई रंगोली पर कदम रख दिया था। जन्मदिनों पर वह उसे “पापा की नई गलती” कहकर हँसती थी।

पर नंदिता हमेशा उस घृणा के पीछे 12 साल की एक बच्ची देखती थी, जिसने माँ खोई थी और पिता के शब्दों से अपनी यादें बनाई थीं। राजीव ने उसे यही बताया था कि उसकी माँ कमज़ोर थी, अवसाद में थी, और नंदिता जैसी औरतें परिवार तोड़ती हैं। उसने अपनी बेटी के दुःख को हथियार बनाया था।

खान मार्केट का रेस्टोरेंट रोशनी में चमक रहा था। अंदर सफेद मेजपोश, पीतल के लैंप, धीमा संगीत और महँगे लोगों की धीमी हँसी थी। बाहर पोर्टर ने नंदिता को रोकना चाहा, पर उसके चेहरे की पट्टियाँ और आँखों की आग देखकर पीछे हट गया।

जैसे ही वह अंदर दाखिल हुई, लोगों की बातें टूटने लगीं। कुछ ने फोन उठाए, कुछ ने चेहरा फेर लिया। नंदिता ने टेबलों के बीच नज़र दौड़ाई और उन्हें कोने वाली मेज पर देख लिया।

राजीव मल्होत्रा नीले बंदगले में बैठा था, घड़ी चमक रही थी, चेहरा उतना ही शांत जितना वह मीडिया इंटरव्यू में रखता था। सामने रिया बैठी थी। उसकी हँसी आधी खुली रह गई थी। उसके सामने लाल रंग का पेय अभी-अभी परोसा गया था।

नंदिता ने पूरी ताकत से कहा, “रिया, वह मत पीना।”

पूरा रेस्टोरेंट थम गया।

रिया का हाथ गिलास पर था। उसने भौंहें चढ़ाईं। “अब आप मुझे पापा के साथ डिनर भी नहीं करने देंगी?”

नंदिता आगे बढ़ी। “उसमें ज़हर है।”

राजीव हल्का-सा हँसा। “नंदिता सदमे में है। धुएँ और दर्द की दवाओं से भ्रम हो सकता है। बेटा, गिलास नीचे रख दो, ताकि यह और तमाशा न करे।”

“बेटा?” नंदिता की आवाज़ टूटकर भी तेज़ थी। “इसे बेटा कहने से पहले तुमने बीमा की वह धारा पढ़ी थी या बाद में? 12 करोड़ तभी मिलेंगे जब पहले मैं मरूँ और फिर रिया।”

रिया का चेहरा सफेद पड़ गया। “पापा?”

राजीव ने गहरी साँस ली, जैसे कोई दुखी पति अपमान सह रहा हो। “देखा? यही औरत हमारी फाइलें खोदती रहती है। इसे हमेशा लगा कि तुम और मैं इसके खिलाफ हैं।”

नंदिता ने फोन मेज पर रखा। रिकॉर्डिंग चल पड़ी।

“राजीव मल्होत्रा ने कहा था कि उसकी बेटी को कुछ महसूस नहीं होगा अगर दवा पेय में घोल दी जाए…”

रिया के होंठ काँप गए। उसने गिलास से हाथ पीछे खींच लिया। उसकी आँखें राजीव पर जम गईं।

“आप मुझे मारना चाहते थे?”

राजीव कुछ क्षण चुप रहा। वही चुप्पी सबसे बड़ा जवाब थी।

फिर उसने धीमी आवाज़ में कहा, “तुम समझती नहीं हो, रिया। तुम्हारी माँ ने बहुत कर्ज छोड़ा था। यह घर, तुम्हारी पढ़ाई, तुम्हारी जिंदगी—सब मैंने संभाला। नंदिता सब जान जाती तो सब खत्म हो जाता। मैं यह परिवार बचाने के लिए कर रहा था।”

“परिवार?” नंदिता ने कहा। “तुमने घर जलाया। मुझे कमरे में बंद किया। डॉक्टर को खरीदा। अपनी बेटी के गिलास में मौत मिलाई। और तुम इसे परिवार कहते हो?”

राजीव की आँखें पहली बार असली हो गईं—ठंडी और खाली।

“तुम कभी मेरा परिवार थीं ही नहीं,” उसने कहा।

वह वाक्य नंदिता को इसलिए नहीं तोड़ पाया कि वह अब उससे प्रेम करती थी। उसने उसे इसलिए घायल किया क्योंकि उसे समझ आया कि वह वर्षों से एक ऐसे आदमी के साथ चाय पीती रही, जो सुबह माथे पर चुंबन दे सकता था और रात को परदों पर पेट्रोल डाल सकता था।

तभी दरवाज़े से 2 पुलिसकर्मी भीतर आए। अरविंद ने कहा, “राजीव मल्होत्रा, आपको आगजनी, हत्या के प्रयास, बीमा धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश के आरोप में गिरफ्तार किया जाता है।”

राजीव पीछे हटा। उसकी नज़र मेज पर पड़े स्टेक चाकू पर गई। नंदिता ने देखा, पर उसका शरीर देर से हिला। राजीव ने चाकू उठा लिया, रिया को बालों से खींचा और धार उसके गले पर लगा दी।

रिया की चीख रेस्टोरेंट की दीवारों से टकराई।

“कोई आगे नहीं आएगा,” राजीव गरजा।

पुलिस रुक गई। अरविंद ने हाथ उठाए। “राजीव, लड़की को छोड़ दो।”

“रास्ता खोलो,” राजीव बोला। “वह मेरे साथ जाएगी।”

रिया काँप रही थी। उसकी आँखें नंदिता से मिलीं। उनमें अब घमंड नहीं था। सिर्फ भय था। एक बच्ची की तरह वह पूछ रही थी—अब कौन बचाएगा?

नंदिता ने मेज के बीच रखा भारी पीतल का फूलदान देखा। उसमें ताज़े गेंदे और गुलाब लगे थे, जैसे किसी शादी के मंडप से सजावट चुरा कर यहाँ रख दी गई हो। उसका बायाँ हाथ जलन से सुन्न था। दाहिना हाथ पट्टियों में था। फिर भी उसने फूलदान पकड़ा। दर्द से उसकी आँखों में आँसू आ गए, मगर उसने आवाज़ नहीं निकाली।

“राजीव,” उसने कहा।

उसने गर्दन घुमाई। “तुम चुप रहो।”

नंदिता ने पूरी देह का वजन फूलदान में डालकर उसे राजीव के सिर के किनारे दे मारा। धातु की भारी आवाज़ हुई। राजीव ने रिया को छोड़ दिया। चाकू कालीन पर गिरा। पुलिस ने उसे तुरंत दबोच लिया। हथकड़ियों की आवाज़ कमरे की सबसे साफ आवाज़ थी।

रिया वहीं बैठ गई, फिर रोते हुए नंदिता की जैकेट पकड़ ली।

“मैंने आपको सीढ़ियों से धक्का दिया,” वह हिचकियों में बोली। “मुझे पता था आप दर्द में हैं। मैंने चाहा कि आप चली जाएँ। मैंने सोचा आप हमारी दुश्मन हैं।”

नंदिता ने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा। उसने उस लड़की को देखा, जिसका मेकअप बह चुका था, गले पर पिता की धार का लाल निशान था, और आँखों में पहली बार सच का डर था।

“आपने मुझे क्यों बचाया?” रिया ने पूछा। “मैंने तो आपको मरने को कहा था।”

नंदिता ने अपनी पट्टी बंधी हथेली उसके गाल पर रखी। दर्द फिर बिजली की तरह उठा, पर उसने हाथ नहीं हटाया।

“क्योंकि तुम्हारा पिता राक्षस है,” उसने धीमे कहा। “और नंदिता मल्होत्रा ने 19 साल राक्षसों को पकड़ना सीखा है, उनके जैसा बनना नहीं।”

एम्बुलेंस आई। इस बार नंदिता ने विरोध नहीं किया। उसे स्ट्रेचर पर लिटाया गया। रिया बिना पूछे उसके साथ एम्बुलेंस में चढ़ गई। सुनहरी आपातकालीन चादर में लिपटी वह पूरे रास्ते अपने हाथों को देखती रही। आईटीओ की रेड लाइट पर उसने धीरे पूछा, “मेरी माँ ने सच में खुदकुशी की थी?”

नंदिता ने उसकी ओर देखा। यह सवाल कई वर्षों से उस घर की दीवारों, पुराने फोटो फ्रेमों और बंद अलमारियों में फँसा था।

“मुझे नहीं पता,” नंदिता ने कहा। “लेकिन अब हम पता करेंगे।”

“हम” सुनते ही रिया फूटकर रो पड़ी।

जाँच 8 महीने चली। राजीव के दफ्तर के लॉकर से बीमा कागज़, नकली मेडिकल नोट, डॉक्टर बख्शी को भेजे गए पैसे और जले हुए बंगले की मरम्मत से जुड़ी झूठी रसीदें मिलीं। पुराने बैंक रिकॉर्ड से पता चला कि रिया की माँ, शालिनी, उतनी बीमार नहीं थी जितना राजीव ने सबको बताया था। उसकी मौत का मामला फिर खोला गया। अदालत में यह सिद्ध नहीं हो पाया कि राजीव ने उसे मारा था, पर यह जरूर साबित हुआ कि उसने उसकी छवि को जानबूझकर खराब किया था, ताकि बेटी कभी सवाल न पूछे।

रिया के लिए यह सज़ा से कम नहीं था। उसे पहली बार समझ आया कि उसने जिस पिता को ढाल समझा, वही उसके बचपन की सबसे बड़ी कैद था।

गुरुग्राम का बंगला राख में खड़ा रहा। काली दीवारें, जले हुए दरवाज़े, सुरक्षा टेप और भीतर बिखरे हुए टूटे शीशे। नंदिता वहाँ सिर्फ 1 बार लौटी, रिया के साथ। राख में उन्हें एक फटी हुई चाय की प्याली, जला हुआ फोटो फ्रेम और लोहे का छोटा डब्बा मिला। डब्बे में कुछ तस्वीरें बच गई थीं।

एक तस्वीर रिया के 17वें जन्मदिन की थी। रिया सामने खड़ी आँखें घुमा रही थी। पीछे नंदिता के हाथ में केक था, चेहरा थोड़ा असहज, जैसे वह प्यार देना चाहती हो पर रास्ता न जानती हो। तस्वीर को ध्यान से देखने पर दिखता था कि रिया की उँगलियाँ चुपचाप नंदिता की बाँह को छू रही थीं। जैसे उसका मन स्वीकार न करे, पर उसका अकेलापन पहले ही माँ ढूँढ चुका था।

राजीव को सज़ा हुई। डॉक्टर बख्शी को भी। अखबारों ने कई दिन तक “12 करोड़ बीमा कांड” लिखा। टीवी बहसों में लोग चिल्लाए। कुछ ने रिया को दोषी कहा, कुछ ने नंदिता को बहादुर। कई लोग पूछते रहे कि कोई आदमी इतने साल साथ रहकर भी इतना अजनबी कैसे रह सकता है।

नंदिता ने किसी टीवी शो में जाने से मना कर दिया। उसने बस वह अस्पताल वाली तस्वीर एक फाइल में रख ली। डर याद रखने के लिए नहीं, बल्कि यह याद रखने के लिए कि सच अक्सर तस्वीर के बीच में नहीं होता। वह कोने के धुंधले प्रतिबिंब में छिपा इंतज़ार करता है, जब तक कोई घायल औरत चुपचाप मरने से इनकार न कर दे।

कुछ महीने बाद, जब उसकी चोटों के निशान हल्के पड़ने लगे, रिया उसे फिजियोथेरेपी सेंटर के बाहर लेने आई। इस बार उसके पास महँगी हील्स नहीं थीं। वह साधारण सलवार-कुर्ता पहने थी, बाल ढीले बंधे थे, हाथ में स्टील का डिब्बा था।

“मैंने आलू पराठे बनाए हैं,” उसने संकोच से कहा। “शायद ठीक न बने हों।”

नंदिता ने उसे देखा। उस साधारण वाक्य में कोई अदालत नहीं थी, कोई चीख नहीं, कोई आग नहीं। सिर्फ एक कोशिश थी।

वह मुस्कुराई। “इस परिवार ने जले हुए घर से बचकर दिखाया है। कच्चे पराठों से भी बच जाएगा।”

रिया हँसते-हँसते रो पड़ी। वह माफी का पूरा अंत नहीं था, न ही कोई फिल्मी सुखद समापन। वह 2 औरतें थीं, एक अस्पताल के बाहर, जिनके बीच आग, विश्वासघात, अपराध और एक अधूरा सच खड़ा था। फिर भी जब रिया ने धीरे से नंदिता का हाथ थामा और उसे फुटपाथ से नीचे उतरने में सहारा दिया, नंदिता ने समझ लिया कि कुछ घर राख होकर खत्म नहीं होते। कभी-कभी उन्हीं राखों के बीच एक नया परिवार सच बोलना शुरू करता है।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.