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✈️🌻 एयरपोर्ट पर 5 साल बाद लौटे मेरे होने वाले पति को मैंने फूलों के साथ इंतजार किया, लेकिन एक लड़की उससे लिपटकर बोली, “मैंने तुम्हें सारी उम्र चाहा”; मैं रोई नहीं, बस वकील को फोन किया और 300 करोड़ का कर्ज रोक दिया, तभी पता चला वह लड़की प्यार नहीं, बदले की आग लेकर आई थी।

भाग 1:
अगर उसे ही पूरी उम्र से इंतजार था, अर्जुन, तो उसी के साथ चले जाओ… और अपने घराने को मेरे बिना डूबते हुए देखना।

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नायरा मल्होत्रा ने यह बात इतनी धीमी आवाज़ में कही कि दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के टर्मिनल 3 की भीड़ में शायद ही किसी ने सुना हो, लेकिन अर्जुन राठौर के चेहरे का रंग उसी पल उतर गया।

नायरा के हाथों में गेंदे और गुलाब का बड़ा सा गुलदस्ता था। वही फूल, जो अर्जुन को पसंद थे। वही फूल, जिन्हें खरीदते समय उसने सोचा था कि 5 साल का इंतजार आखिर आज खत्म होगा।

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5 साल पहले अर्जुन राठौर भारतीय सेना की एक गुप्त शांति मिशन पर देश से बाहर गया था। जाते समय उसने नायरा की आंखों में देखकर कहा था—

—मैं लौटकर आऊंगा तो सबसे पहले तुमसे शादी करूंगा। मेरा इंतजार करना।

और नायरा ने इंतजार किया।

उसने लंदन की नौकरी छोड़ी। अपने पिता के बिजनेस साम्राज्य से दूरी बनाई। अपनी मां की नाराजगी सही। और राठौर परिवार के टूटते हुए घर को अपने कंधों पर संभाला।

जयपुर के सिविल लाइंस में राठौरों की पुरानी हवेली कभी शान की निशानी हुआ करती थी, लेकिन अर्जुन के जाने के बाद सब कुछ बिखरने लगा था। अर्जुन के पिता, महेंद्र राठौर, रियल एस्टेट के कर्जों में डूब चुके थे। उनकी कंपनी राठौर इंफ्राकॉन पर 300 करोड़ से ज्यादा का बोझ था। बैंक रोज फोन करते थे। टैक्स अधिकारी नोटिस भेजते थे। पुराने साझेदार मुंह मोड़ रहे थे।

और अर्जुन की मां, सावित्री देवी, नायरा को कभी बहू नहीं मानती थीं।

—लड़की कितनी भी पढ़ी-लिखी हो, बहू बनने के लिए झुकना सीखना पड़ता है —सावित्री देवी अक्सर कहतीं।

नायरा मुस्कुरा देती। वह उनके लिए डॉक्टर लाती, दवाइयां समय पर मंगवाती, महेंद्र राठौर के खातों की गड़बड़ी ठीक करती, वकीलों से बात करती, बैंकों को भरोसा दिलाती और रात-रात भर बैठकर उन दस्तावेजों को पढ़ती जिन पर राठौर परिवार ने बिना समझे हस्ताक्षर कर दिए थे।

कई बार उसे अपमानित किया गया।

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कई बार चाय की ट्रे उसके सामने रखते हुए सावित्री देवी नौकरानी से कहतीं—

—इसे भी दे दो, आखिर घर का काम तो यही करती है।

नायरा तब भी चुप रहती।

क्योंकि अर्जुन ने वादा किया था।

उस दिन हवाई अड्डे पर वह सफेद चिकनकारी कुर्ते और हल्के सुनहरे दुपट्टे में खड़ी थी। बाल करीने से बंधे थे, आंखों में नींद कम और उम्मीद ज्यादा थी। फ्लाइट की घोषणा हुई तो उसके सीने में 5 साल से जमा हुआ दर्द जैसे एक साथ धड़क उठा।

दरवाजा खुला। सैनिकों और यात्रियों की भीड़ बाहर आने लगी। फिर अर्जुन दिखा।

वह पहले से दुबला लग रहा था। चेहरा धूप में तपकर गहरा हो चुका था। आंखों के नीचे थकान थी। कंधे पर काला डफल बैग था। उसने नायरा को देखा, और एक पल के लिए रुक गया।

नायरा को लगा, सब ठीक हो जाएगा।

लेकिन तभी भीड़ के बाएं कोने से एक लड़की भागती हुई आई।

सफेद साड़ी, खुले बाल, कांपते हाथ।

—अर्जुन!

लड़की ने बिना रुके अर्जुन को पकड़ लिया। उसने अपना चेहरा अर्जुन के सीने में छिपा लिया और रोते हुए कहा—

—तुम लौट आए… मैंने तुम्हारा पूरी जिंदगी इंतजार किया। मुझे पता था तुम मुझे छोड़कर नहीं जाओगे।

नायरा के हाथों में फूल कांप गए।

वह चेहरा उसने पहले भी देखा था।

रिया सूद।

अर्जुन के बचपन की पड़ोसन। वही लड़की, जिसके बारे में सावित्री देवी कभी-कभी पुराने दिनों में कहती थीं, “काश अर्जुन की शादी रिया जैसी सीधी लड़की से होती।” वही रिया, जिसकी एक पुरानी तस्वीर अर्जुन के पर्स में छिपी रहती थी और जिसे देखने पर वह हमेशा कहता था, “बस बचपन की दोस्त है।”

अर्जुन का चेहरा सख्त हो गया।

—रिया… तुम यहां कैसे?

नायरा ने इंतजार किया कि वह उसे अलग करेगा।

अर्जुन ने ऐसा नहीं किया।

उसने उल्टा रिया की पीठ पर हाथ रख दिया, जैसे कोई टूटा हुआ इंसान संभाल रहा हो।

नायरा की उंगलियों से एक गुलाब फिसलकर चमकदार फर्श पर गिरा। भीड़ में चलते हुए किसी ने उसे कुचल दिया।

अर्जुन ने नायरा की तरफ देखा।

—नायरा, मेरी बात सुनो। जैसा दिख रहा है, वैसा नहीं है।

नायरा मुस्कुराई। वह मुस्कान इतनी शांत थी कि अर्जुन का डर और बढ़ गया।

वह धीरे-धीरे पास के कूड़ेदान तक गई और पूरा गुलदस्ता उसमें डाल दिया।

फिर उसने फोन निकाला और एक नंबर मिलाया।

—मामा राजीव —उसने कहा— राठौर इंफ्राकॉन के गुड़गांव टाउनशिप प्रोजेक्ट के लिए जो 300 करोड़ की क्रेडिट लाइन खुल रही थी, उसे आज ही रोक दीजिए।

दूसरी तरफ कुछ सेकंड सन्नाटा रहा।

—नायरा, यह वही प्रोजेक्ट है जिसके लिए तुमने 2 साल मेहनत की थी।

नायरा की नजर अर्जुन पर थी। रिया अब भी उसकी बांह पकड़े खड़ी थी।

—मल्होत्रा परिवार दरवाजे खोलता है, मामा। लेकिन अपमान के बाद ताले भी लगाना जानता है।

उसने फोन काट दिया।

अर्जुन आगे बढ़ा।

—नायरा, एक बार मेरी बात तो सुनो।

—5 साल सुनती रही, अर्जुन। अब तुम सुनोगे।

रिया ने आंसू पोंछते हुए धीमे से कहा—

—दीदी, आप गलत समझ रही हैं। अर्जुन मेरे लिए…

नायरा ने उसकी तरफ देखा।

—मुझे दीदी मत कहो। जिस आदमी के सीने पर अभी रो रही हो, उसकी मंगेतर मैं हूं।

रिया चुप हो गई, लेकिन उसकी आंखों में डर नहीं था। वहां कुछ और था। जैसे वह यही चाहती थी।

नायरा उस दिन हवाई अड्डे से अकेली नहीं निकली। उसके साथ उसका टूटा हुआ भरोसा था, उसका अपमान था, और वह ठंडा फैसला था जो बड़े घरानों की औरतें तभी लेती हैं जब वे रोना बंद कर चुकी होती हैं।

उसी रात नायरा 5 साल बाद दिल्ली के छतरपुर फार्महाउस लौटी। मल्होत्रा एस्टेट की लोहे की बड़ी गेटें खुलीं तो सुरक्षा गार्ड सीधा खड़ा हो गया।

—मैम… बड़े साहब आपका इंतजार कर रहे हैं।

उसके दादा, रणविजय मल्होत्रा, पूर्व रक्षा सलाहकार और उद्योगपति, बरामदे में खड़े थे। उम्र 82 हो चुकी थी, लेकिन चाल अब भी सैनिकों जैसी थी।

—आखिर याद आ गया कि तुम्हारा घर कहां है?

नायरा ने कुछ नहीं कहा। बस आंखें भर आईं।

—दादू, मुझे परिवार की मुहर चाहिए।

रणविजय की भौंहें उठीं।

—मुहर खिलौना नहीं होती, नायरा। उससे घर बनते भी हैं और घर गिरते भी हैं।

—आज एक घर गिराना है।

बूढ़े आदमी ने कुछ देर उसकी आंखों में देखा। फिर धीरे से रास्ता छोड़ दिया।

—जाओ। अपने पिता के कमरे से ले लो।

उधर अर्जुन उसी रात छतरपुर एस्टेट के बाहर पहुंचा, लेकिन गार्डों ने उसे गेट पर रोक दिया।

—मैडम ने आदेश दिया है, आपको अंदर आने की अनुमति नहीं है।

अर्जुन ने पहली बार समझा कि जिस लड़की को वह 5 साल तक इंतजार करवाता रहा, वह सिर्फ उसकी मंगेतर नहीं थी।

वह मल्होत्रा समूह की इकलौती उत्तराधिकारी थी।

और सुबह होते-होते दिल्ली, जयपुर और मुंबई के कारोबारियों को पता चलने वाला था कि नायरा मल्होत्रा अब लौट आई है।

कमेंट्स में दिए गए लिंक से पूरी कहानी पढ़े 👇

भाग 2:

अगली सुबह 9 बजे महेंद्र राठौर को पहला फोन आया और उसके बाद जैसे हर घंटे उनका साम्राज्य टूटने लगा। गुड़गांव टाउनशिप की 300 करोड़ की क्रेडिट लाइन रुक गई, जयपुर रिंग रोड प्रोजेक्ट की जमीनों पर बैंक ने दोबारा जांच बैठा दी, नोएडा के कमर्शियल टावर की मंजूरी अटक गई और जिन निवेशकों ने कल तक हाथ जोड़कर मुलाकात मांगी थी, वे अब फोन तक नहीं उठा रहे थे। नायरा उसी दिन गुरुग्राम के साइबर सिटी में अपने नए ऑफिस में बैठी थी, जिसकी कांच की दीवारों से राठौर इंफ्राकॉन का आधा खाली टावर साफ दिखता था। दरवाजे पर नया नाम चमक रहा था: मल्होत्रा कैपिटल। उसके वित्त निदेशक करण मेहरा ने बताया कि उन्होंने राठौर इंफ्राकॉन के 4.8 प्रतिशत शेयर खरीद लिए हैं, बस 0.2 प्रतिशत और मिलते ही बाजार को सार्वजनिक सूचना देनी होगी। नायरा ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा कि खरीद पूरी करो, आज रात सबको पता चलना चाहिए कि इंतजार करने वाली लड़की अब हिसाब करने आई है। शाम को वह राठौर हवेली पहुंची। सावित्री देवी ने उसे देखकर मीठी मुस्कान ओढ़ ली, लेकिन जब नायरा ने मल्होत्रा कैपिटल के उद्घाटन का निमंत्रण मेज पर रखा और बताया कि टावर राठौरों के सामने खरीदा गया है ताकि उनकी देनदारियां नजदीक से देखी जा सकें, तो सावित्री देवी के हाथ से चाय का कप गिर गया। जाते समय नायरा ने ऊपर की खिड़की पर रिया को छिपकर देखते हुए देखा। रात को रिया का फोन आया। उसकी आवाज पहले बहुत कोमल थी, लेकिन जब नायरा ने उसके पिता के जुए के कर्ज, गोवा के एक शादीशुदा कारोबारी से लिए पैसों और 2 साल पुराने फर्जी अस्पताल रिकॉर्ड का जिक्र किया, तो वह आवाज जहरीली हो गई। रिया ने कहा कि मजबूत औरतें कभी प्यार नहीं जीततीं, क्योंकि मर्द उन औरतों के पास लौटते हैं जिन्हें बचाने का भ्रम हो। अगले दिन मल्होत्रा कैपिटल का उद्घाटन राठौर परिवार की सार्वजनिक बेइज्जती बन गया। अर्जुन वहां रिया के साथ आया, लेकिन नायरा ने उसके सामने एक फाइल रख दी जिसमें रिया के कर्ज, लेन-देन और अर्जुन के पास लौटने की पूरी योजना थी। अर्जुन ने कागज पढ़े और रिया का हाथ छोड़ दिया। उसी रात मामा राजीव ने नायरा को फोन कर बताया कि रिया अकेली नहीं है। उसके पीछे विक्रम तेजपाल नाम का आदमी है, जिसके परिवार की 17 साल पुरानी दुश्मनी मल्होत्राओं से जुड़ी है। नायरा के हाथ ठंडे पड़ गए, क्योंकि 17 साल पहले उसके पिता ने सेना के एक अधिकारी को देशद्रोह के आरोप में जेल भिजवाया था, और अब वही दबी हुई आग उसके दरवाजे तक पहुंच चुकी थी।

भाग 3:

विक्रम तेजपाल का नाम सुनते ही नायरा के सामने बचपन की एक धुंधली, डरावनी रात लौट आई।

वह तब सिर्फ 11 साल की थी। छतरपुर फार्महाउस में हर रात सख्त अनुशासन रहता था। डिनर 8 बजे, दादा की दवा 8:30 बजे, और उसके पिता विराज मल्होत्रा की आवाज पूरे घर में गूंजती रहती थी। लेकिन उस साल कई हफ्तों तक घर चुप रहा।

विराज मल्होत्रा पहले सेना की खुफिया इकाई में वरिष्ठ अधिकारी थे। बाद में उन्होंने परिवार का कारोबार संभाला, मगर उनका नाम अब भी रक्षा गलियारों में सम्मान और डर दोनों से लिया जाता था। 17 साल पहले एक अधिकारी, मोहन तेजपाल, पर सैन्य गोपनीय जानकारी बाहर भेजने का आरोप लगा था। जांच विराज ने की थी। मोहन तेजपाल जेल गया और कुछ साल बाद वहीं मर गया।

उसके बेटे विक्रम ने शायद उसी दिन कसम खाई थी कि मल्होत्रा परिवार से बदला लेगा।

नायरा ने पिता को फोन किया।

—पापा, मोहन तेजपाल के केस में सच क्या था?

विराज कुछ पल चुप रहे।

—जो कागजों में था, वही सच था।

—पूरा सच?

दूसरी तरफ सांस भारी हुई।

—कुछ फाइलें सीलबंद थीं। मामला सिर्फ गद्दारी का नहीं था। एक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क था। मोहन शायद अकेला नहीं था।

—क्या उसके परिवार को धमकी दी गई थी?

—उसकी पत्नी ने कहा था कि उनके बेटे को उठा लिया गया था। लेकिन जब जांच हुई तो बच्चा सरकारी सुरक्षा में मिला। किसी ने परिवार को गलत जानकारी दी थी। मामला बंद कर दिया गया।

नायरा ने आंखें बंद कर लीं।

—तो विक्रम ने 17 साल गलत कहानी पर जिया।

—बेटी, इससे वह खतरनाक कम नहीं हो जाता।

—मुझसे ज्यादा खतरनाक नहीं।

सुबह नायरा ने करण मेहरा, आपराधिक वकील मीरा चौहान और अपने पुराने सुरक्षा सलाहकार इमरान अली को बुलाया। इमरान कभी सेना में अर्जुन के साथ काम कर चुका था, लेकिन उसकी वफादारी हमेशा सच के साथ रही थी।

मीरा ने मेज पर दस्तावेज फैलाए।

—रिया सूद के खाते में 3 साल से अजीब लेन-देन हैं। पैसे सीधे नहीं आते थे। पहले गोवा की एक शेल कंपनी, फिर जयपुर की इवेंट एजेंसी, फिर रिया के भाई के खाते से।

करण ने कहा—

—और वह शेल कंपनी विक्रम तेजपाल से जुड़ी है।

इमरान ने एक फोटो मेज पर रखी।

—यह आदमी कल रात राठौर हवेली के बाहर देखा गया। नाम है भूपेन नायक। पहले अवैध हथियारों के मामले में पकड़ा गया था। अब विक्रम के लिए काम करता है।

नायरा ने फोटो उठाई।

—विक्रम कहां है?

—हर महीने की 15 तारीख को वह अजमेर जाता है। अपने पिता की कब्र पर। आज 15 है।

दोपहर तक नायरा अजमेर पहुंच चुकी थी। उसने परिवार की आधिकारिक सुरक्षा नहीं ली। वह इसे मीडिया तमाशा नहीं बनाना चाहती थी। उसके साथ सिर्फ इमरान था, लेकिन वह भी दूरी पर रहा।

कब्रिस्तान शांत था। हवा में धूप, धूल और चंदन की मिली हुई गंध थी। सफेद फूलों का गुच्छा एक पुरानी कब्र पर रखा था।

मोहन तेजपाल।

पीछे से आवाज आई—

—मल्होत्रा की बेटी को आने में देर नहीं लगी।

विक्रम तेजपाल नीम के पेड़ के नीचे खड़ा था। साधारण कुर्ता, शांत चेहरा, मगर आंखों में जमा हुआ जहर।

नायरा ने कहा—

—रिया को तुमने भेजा।

—रिया को मैंने मौका दिया। वह डूबी हुई थी, मैंने किनारा दिखाया।

—किनारा नहीं, जाल।

विक्रम हल्के से मुस्कुराया।

—तुमने भी तो राठौरों को संभाला। फर्क क्या है?

—मैंने किसी को तोड़ने के लिए प्यार का नाटक नहीं किया।

विक्रम की आंखें कठोर हो गईं।

—तुम्हारे पिता ने मेरे पिता को मार दिया।

—तुम्हारे पिता को अदालत ने सजा दी थी।

—अदालतें कागज देखती हैं, दर्द नहीं।

—और बदला सच नहीं देखता, सिर्फ जख्म चाटता है।

विक्रम आगे आया। उसके हाथ में एक छोटा पेन ड्राइव था।

—इसमें वे फाइलें हैं जो तुम्हारे पिता ने छिपाईं। मैं इसे मीडिया को दे दूंगा। तुम्हारा परिवार, तुम्हारा कारोबार, तुम्हारा नाम… सब खत्म।

नायरा ने शांत स्वर में कहा—

—तो दे दो।

विक्रम पल भर रुका। शायद उसे उम्मीद थी कि नायरा डर जाएगी।

—तुम्हें समझ नहीं आ रहा।

—मुझे सब समझ आ रहा है। तुम चाहते हो मैं तुम्हारे पिता की कब्र के सामने झुककर माफी मांगूं। ताकि तुम अपने 17 साल के गुस्से को जीत समझ सको।

विक्रम ने दांत भींचे।

—तुम्हारे जैसे लोगों को झुकना सीखना चाहिए।

तभी दूर से टायरों की तेज आवाज आई। 2 काली एसयूवी कब्रिस्तान के बाहर रुकीं। भूपेन नायक और उसके 5 आदमी अंदर घुसे। उनके हाथों में पिस्तौलें थीं।

इमरान तुरंत दीवार के पीछे से निकला।

—मैम, नीचे हो जाइए!

पहली गोली हवा चीरती हुई कब्र के पास पत्थर से टकराई। सफेद फूल बिखर गए। नायरा झुक गई। विक्रम चौंककर पीछे हट गया।

—भूपेन! यह क्या कर रहे हो? मैंने गोली चलाने को नहीं कहा था!

भूपेन हंसा।

—अब खेल तुम्हारे हाथ में नहीं है, विक्रम साहब। माल हमें चाहिए। पेन ड्राइव दो और लड़की भी।

विक्रम का चेहरा पहली बार डर से भर गया।

नायरा ने तुरंत समझ लिया। विक्रम भी किसी और के जाल में था। रिया, विक्रम, राठौर परिवार—सबकी डोर शायद कहीं और थी।

इमरान ने नायरा को कब्रों के बीच खींच लिया। भूपेन के लोग आगे बढ़े। इमरान ने चेतावनी दी, फिर जवाबी गोली चलाई। गोलियों की आवाज कब्रिस्तान की दीवारों से टकराकर गूंजने लगी। नायरा ने पास पड़े पत्थर के पीछे बैठकर फोन निकाला और पहले से तैयार इमरजेंसी लोकेशन पुलिस को भेज दी।

विक्रम दूसरी तरफ फंसा था। भूपेन उसके हाथ से पेन ड्राइव छीनने बढ़ा। विक्रम ने उसे धक्का दिया।

—मैंने कहा था, किसी को मारना नहीं!

भूपेन ने पिस्तौल सीधी नायरा की तरफ उठाई।

तभी अर्जुन की आवाज गूंजी—

—हथियार नीचे!

नायरा ने मुड़कर देखा। अर्जुन 3 स्थानीय पुलिसकर्मियों और अपने पुराने सैन्य संपर्कों के साथ अंदर आ चुका था। चेहरे पर पछतावा था, लेकिन आंखों में वही सैनिक वाली सख्ती लौट आई थी।

भूपेन ने गोली चलाई। अर्जुन ने नायरा को धक्का देकर नीचे गिराया। गोली उसके कंधे को छूती हुई निकल गई। वह लड़खड़ाया, मगर गिरा नहीं।

इमरान और पुलिस ने भूपेन के 2 आदमियों को काबू कर लिया। बाकी भागने लगे, लेकिन बाहर पहले से घेराबंदी थी। कुछ ही मिनटों में कब्रिस्तान का सन्नाटा टूटे हुए पत्थरों, बिखरे फूलों और हथकड़ियों की आवाज से भर गया।

विक्रम वहीं खड़ा था। उसके हाथ कांप रहे थे।

—मैंने यह नहीं चाहा था।

नायरा धीरे-धीरे उठी। उसके दुपट्टे पर धूल थी, हाथ पर खरोंच थी, लेकिन आवाज स्थिर थी।

—बदला कभी वहीं नहीं रुकता जहां तुम उसे रोकना चाहते हो।

पुलिस ने भूपेन को घसीटते हुए बाहर किया। उसके फोन से जो संदेश मिले, उन्होंने असली चेहरा खोल दिया। रिया सीधे भूपेन से संपर्क में थी। वह विक्रम से ज्यादा खतरनाक थी। उसका इरादा केवल बदला नहीं था। वह मल्होत्रा कैपिटल और राठौर इंफ्राकॉन के विलय से जुड़ी गोपनीय वित्तीय फाइलें विदेश में बेचने वाली थी। विक्रम को उसने पिता की झूठी कहानी दिखाकर मोहरे की तरह इस्तेमाल किया था।

नायरा ने विक्रम की तरफ देखा।

—पेन ड्राइव दो।

विक्रम ने धीरे से पेन ड्राइव उसके हाथ में रख दिया।

—अगर इसमें मेरे पिता की पूरी सच्चाई है, तो उसे दबाना मत।

नायरा ने कहा—

—सच दबाऊंगी नहीं। लेकिन झूठ से किसी को मरने भी नहीं दूंगी।

3 दिन बाद रिया सूद को नेपाल सीमा के पास पकड़ा गया। उसके पास फर्जी पासपोर्ट, 40 लाख नकद, कई एन्क्रिप्टेड ड्राइव और विदेशी खातों की जानकारी मिली। पूछताछ में उसने कबूल किया कि उसने अर्जुन की बचपन की यादों, सावित्री देवी की लालच और विक्रम के बदले का इस्तेमाल किया।

उसी शाम अर्जुन अस्पताल से सीधे नायरा के ऑफिस आया। कंधे पर पट्टी थी। चेहरा थका हुआ था।

नायरा कांच की दीवार के सामने खड़ी थी। नीचे गुरुग्राम की रोशनियां चमक रही थीं।

—नायरा —अर्जुन ने धीमे से कहा— मुझे माफ कर दो।

वह मुड़ी।

—किस बात के लिए? एयरपोर्ट वाली रिया के लिए? अपनी मां की हर बेइज्जती पर चुप रहने के लिए? 5 साल मुझे इंतजार में रखने के लिए? या इस बात के लिए कि तुम्हें मेरा प्यार तब दिखा जब तुम्हारा घर डूबने लगा?

अर्जुन की आंखें भर आईं।

—मैं कमजोर था।

—नहीं, अर्जुन। तुम आराम में थे। तुम्हें अच्छा लगता था कि कोई तुम्हारे माता-पिता को संभाले, तुम्हारे कर्ज बचाए, तुम्हारा इंतजार करे और बदले में सिर्फ एक वादा पकड़े रहे।

—मैं तुमसे प्यार करता था।

—तुम्हें मेरा होना पसंद था। प्यार नहीं।

अर्जुन ने सिर झुका लिया।

—क्या कभी फिर से शुरू हो सकता है?

नायरा ने उसकी तरफ बिना नफरत के देखा। यही अर्जुन के लिए सबसे बड़ी सजा थी।

—हां। तुम शुरू कर सकते हो। लेकिन मेरे बिना।

अर्जुन ने कुछ कहना चाहा, पर शब्द नहीं निकले। वह चुपचाप चला गया।

अगले हफ्ते राठौर इंफ्राकॉन का नियंत्रण मल्होत्रा कैपिटल के हाथ में आ गया। महेंद्र राठौर ने कागजों पर कांपते हाथों से हस्ताक्षर किए। सावित्री देवी की आंखों में पहली बार वह घमंड नहीं था जिससे वह नायरा को देखती थीं।

उन्होंने धीमे से कहा—

—मुझे नहीं पता था कि तुम इतनी बड़ी हो।

नायरा ने सीधा उत्तर दिया—

—आपको यह जानने की जरूरत नहीं थी कि मैं कितनी बड़ी हूं। आपको सिर्फ इतना याद रखना था कि मैं इंसान हूं।

सावित्री देवी चुप हो गईं।

कुछ महीनों बाद मोहन तेजपाल की फाइल दोबारा खोली गई। सच बाहर आया। वह पूरी तरह निर्दोष नहीं था, लेकिन अकेला गद्दार भी नहीं था। असली नेटवर्क में कई बड़े नाम थे, जो सालों तक छिपे रहे। विक्रम ने अदालत में गवाही दी। उसका बदला टूट गया, मगर शायद पहली बार उसे अपने पिता की मौत से आगे जीने का रास्ता मिला।

नायरा उस शाम छतरपुर फार्महाउस लौटी। बरामदे में दादा रणविजय शतरंज की बिसात लगाए बैठे थे। पिता विराज खिड़की के पास खड़े थे। मां ने डाइनिंग टेबल पर 1 अतिरिक्त थाली रखी थी।

वही थाली, जो वे 5 साल से हर त्योहार पर लगाती थीं, भले नायरा घर न आए।

नायरा दरवाजे पर ठिठक गई।

मां ने बस इतना कहा—

—खाना ठंडा हो जाएगा।

नायरा की आंखें भर आईं। वह धीरे-धीरे मां के पास गई और उनके गले लगकर रो पड़ी। 5 साल के इंतजार, अपमान, अकेलेपन और टूटे वादों का भार उसी रोने में बह गया।

रणविजय ने खांसकर चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।

—बहुत देर कर दी आने में।

नायरा ने आंसुओं के बीच मुस्कुराकर कहा—

—लेकिन आ गई, दादू।

रात को छत पर खड़े होकर उसने दिल्ली की रोशनियों को देखा। उसे एयरपोर्ट का कुचला हुआ गुलाब याद आया। अर्जुन का चुप रहना याद आया। रिया का झूठा रोना, सावित्री देवी का तिरस्कार, विक्रम का गुस्सा और अपनी मां की खाली थाली याद आई।

सुबह जब मल्होत्रा कैपिटल के नए बोर्ड पर उसका नाम लगा, तो नायरा ने कोई विजय भाषण नहीं दिया। उसने बस कागज पर हस्ताक्षर किए और बाहर आकर आसमान की तरफ देखा।

क्योंकि नायरा मल्होत्रा ने समझ लिया था कि इंतजार प्यार की निशानी हो सकता है, लेकिन अपने सम्मान को गिरवी रख देना मोहब्बत नहीं, आत्मघात है।

और जो औरत एक बार अपना मूल्य याद कर लेती है, वह फिर किसी हवाई अड्डे के कूड़ेदान से अपने फूल नहीं उठाती।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.