
PART 1
रविवार की रात 11 बजे, 5 साल का विहान बिस्तर पर सिकुड़कर लेटा था और उसकी माँ काव्या रसोई में खड़ी अपने पति रोहन से कह रही थी, “अगर अगली बार तुम्हारी माँ ने उसे वह कड़वा काढ़ा पिलाया, तो मैं विहान को लेकर इस घर से चली जाऊँगी।”
दिल्ली के लाजपत नगर की उस छोटी-सी फ्लैट रसोई में दूध उबलने की गंध थी, पर घर में अजीब ठंडक पसरी हुई थी। रोहन फोन देखते हुए बोला, “माँ ने जिंदगी भर दवाखाने में काम किया है। उन्हें पता है बच्चे को क्या देना चाहिए।”
काव्या की आँखें भर आईं। “उन्हें मेरे बच्चे को बिना बताए कुछ भी देने का हक नहीं है।”
रोहन की माँ, शांति देवी, पास की गली में पुराने मकान में रहती थीं। पति के गुजरने के बाद उनका सारा गर्व इसी बात पर टिक गया था कि उन्होंने 28 साल एक मेडिकल स्टोर में काम किया था। मोहल्ले की औरतें उनसे बुखार, खांसी, पेट दर्द तक की सलाह लेती थीं। लेकिन विहान के जन्म के बाद उन्होंने काव्या को कभी माँ माना ही नहीं। कभी कहतीं, “दूध कम पिलाती है।” कभी कहतीं, “बच्चे को नजर लगवा दी।” कभी ताने देतीं, “आजकल की बहुएँ मोबाइल जानती हैं, बच्चा पालना नहीं।”
हर रविवार रोहन उन्हें लेकर शांति देवी के घर जाता। वहाँ राजमा, चावल, परांठे और मीठी खीर बनती। खाना खत्म होते ही शांति देवी विहान को रसोई में ले जातीं और कहतीं, “चल बेटा, दादी की ताकत वाली दवा पी ले।”
विहान उस दवा से डरता था।
एक दिन काव्या ने देखा था—काले काँच की छोटी शीशी, सफेद ढक्कन, कोई नाम नहीं, कोई पर्ची नहीं। अंदर गाढ़ा भूरा तरल था, जिसकी गंध से ही जी मिचलाता था।
“क्या है इसमें?” काव्या ने पूछा था।
शांति देवी ने हँसकर कहा था, “अजवाइन, शहद, कुटकी, पुरानी जड़ी-बूटी। भूख खुलती है। तुम नहीं समझोगी।”
उस शनिवार शाम विहान खिलौना ट्रेन पकड़कर काव्या के पास आया। आवाज बहुत धीमी थी, “मम्मा, कल दादी के घर नहीं जाना।”
काव्या उसके सामने घुटनों के बल बैठ गई। “क्यों बेटा?”
विहान ने होंठ भींच लिए। “वो मुँह पकड़ती हैं। कहती हैं, अगर दवा नहीं पी तो मैं सूखकर बदसूरत हो जाऊँगा। कहती हैं, मम्मा को कुछ नहीं आता।”
काव्या का दिल जैसे किसी ने मुट्ठी में दबा दिया।
अगले दिन भी रोहन ने कहा, “एक रविवार की बात है, बात मत बढ़ाओ।”
लेकिन उस रविवार जब खाना खत्म हुआ और शांति देवी ने कहा, “चल, दादी की दवा पी ले,” विहान ने काव्या की साड़ी कसकर पकड़ ली। उसकी आँखों में वह डर था, जो किसी जिद्दी बच्चे का नहीं, किसी मजबूर कैदी का होता है।
काव्या उठी। “आज मैं भी देखूँगी।”
शांति देवी का चेहरा कठोर हो गया। “बहू, मेरे घर में मुझ पर शक?”
“मेरे बच्चे की बात है,” काव्या ने कहा।
रोहन ने धीमे से कहा, “काव्या, सबके सामने तमाशा मत करो।”
लेकिन शांति देवी ने शीशी निकाल ही ली। काँच में चिपका गाढ़ा तरल रोशनी में चमक रहा था। विहान रोने लगा।
“मुँह खोल,” शांति देवी ने कहा।
काव्या ने उनका हाथ पकड़ लिया। “बस। आज नहीं।”
उस रात घर लौटने के बाद विहान चुप था। उसने दूध नहीं पिया, खाना नहीं खाया। आधी रात के बाद उसके पेट में ऐंठन उठी। वह पसीने से भीग गया, चेहरे का रंग उड़ गया। अचानक कमरे से घुटी हुई आवाज आई।
काव्या दौड़ी।
विहान उल्टी कर रहा था। उसका छोटा शरीर काँप रहा था, आँखें आधी खुली थीं।
“रोहन!” काव्या चीखी। “अभी एम्बुलेंस बुलाओ!”
और विहान को बाँहों में संभालते हुए काव्या को पहली बार समझ आया कि उसका बच्चा 2 साल से नखरे नहीं कर रहा था—वह मदद माँग रहा था।
PART 2
अस्पताल की सफेद रोशनी में विहान और भी छोटा लग रहा था। उसके हाथ में सुई लगी थी, होंठ सूखे थे, और वह बार-बार नींद में बुदबुदा रहा था, “दादी के घर नहीं जाना।”
डॉक्टर नंदिता ने काव्या से पूछा, “बच्चे ने कोई दवा, टॉनिक, घरेलू काढ़ा लिया है?”
काव्या ने बिना रोहन की ओर देखे कहा, “हाँ। उसकी दादी हर रविवार बिना लेबल वाली शीशी से कुछ पिलाती हैं।”
रोहन तड़पकर बोला, “माँ नुकसान नहीं करेंगी।”
डॉक्टर का चेहरा सख्त हो गया। “नुकसान इरादे से नहीं, अज्ञान से भी होता है।”
सुबह रिपोर्ट आई। विहान के खून और पेशाब में लोपरामाइड के अंश मिले थे। डॉक्टर ने बताया कि यह दस्त रोकने की दवा है, छोटे बच्चों में बार-बार देने पर खतरनाक हो सकती है।
रोहन के हाथ काँपने लगे।
काव्या ने कहा, “अपनी माँ को फोन करो।”
स्पीकर पर शांति देवी की आवाज आई। पहले चुप्पी, फिर ठंडी सफाई, “थोड़ा-सा ही मिलाती थी। बच्चा कमजोर था। बहू तो सुनती नहीं थी।”
काव्या की आँखों से आँसू नहीं निकले। भीतर कुछ पत्थर हो गया।
फिर शांति देवी अस्पताल पहुँच गईं। काली थैली से वही शीशी निकालकर बोलीं, “लो, जांच करवा लो, इतना नाटक है तो।”
रोहन ने शीशी ली।
काव्या ने हाथ बढ़ाया।
लेकिन रोहन ने उसे अपनी जैकेट में रख लिया।
PART 3
काव्या ने रोहन की आँखों में सीधा देखा। “वह शीशी मुझे दो।”
अस्पताल के गलियारे में कुछ रिश्तेदार, दो नर्सें और शांति देवी खड़ी थीं। शांति देवी के चेहरे पर अब भी वही घमंड था, जैसे पूरा मामला केवल उनकी इज्जत गिराने की साजिश हो।
रोहन ने जेब पर हाथ रखा। “पहले घर चलकर बात करते हैं।”
काव्या की आवाज काँपी नहीं। “घर? जिस घर में मेरे बच्चे की तकलीफ को 2 साल तक नखरा कहा गया? यह सबूत है, रोहन।”
शांति देवी फट पड़ीं। “सबूत? अपनी सास को अपराधी बना रही है? अरे, मैंने तेरे बेटे को बचाया है। वह हड्डियों का ढाँचा हो रहा था।”
काव्या ने पहली बार उन्हें बीच में काटा। “वह बीमार हो रहा था। आपकी वजह से।”
रोहन की आँखें झुक गईं। शायद पहली बार उसे वे सारे सोमवार याद आए—विहान का पेट पकड़कर बैठना, काव्या का चिंता में अस्पताल ले जाने की बात करना, और उसका हर बार कहना, “माँ जानती हैं।” उसे अपनी ही आवाज से घिन आ गई।
शांति देवी उसके पास आईं। “बेटा, तू अपनी माँ पर शक करेगा? इस औरत ने तुझे मुझसे दूर करने के लिए सब किया है।”
रोहन ने धीरे से जेब से शीशी निकाली। शांति देवी के चेहरे पर राहत चमकी, जैसे वह मान चुकी हों कि बेटा फिर माँ को बचा लेगा।
लेकिन रोहन रिसेप्शन पर गया और शीशी नर्स को दे दी। “कृपया इसे डॉक्टर नंदिता तक पहुँचा दीजिए। यही दवा मेरे बेटे को दी गई थी।”
शांति देवी का चेहरा सफेद पड़ गया। “रोहन!”
रोहन ने पहली बार अपनी माँ की आँखों में देखते हुए कहा, “आज मैं बेटा नहीं, पिता हूँ।”
वे शब्द गलियारे में गूँज गए।
अगले 2 दिन विहान निगरानी में रहा। जांच से साफ हुआ कि उस शीशी में शहद और जड़ी-बूटी के साथ लोपरामाइड की कुचली हुई गोलियाँ मिलाई गई थीं। मात्रा जानलेवा नहीं थी, पर 5 साल के बच्चे के शरीर को धीरे-धीरे कमजोर करने के लिए काफी थी। डॉक्टर ने कहा, “यह इलाज नहीं था। यह बिना अनुमति दी गई दवा थी, और बच्चे ने डर के कारण विरोध करना भी छोड़ दिया था।”
काव्या ने रिपोर्ट हाथ में पकड़ी तो उसकी उंगलियाँ ठंडी थीं। उसे रोना चाहिए था, लेकिन आँसू जैसे कहीं बंद हो गए थे। उसके भीतर अब केवल एक ही वाक्य बज रहा था—अब कोई उसे चुप नहीं कराएगा।
विहान 4 दिन बाद अस्पताल से निकला। आँखों के नीचे हल्के काले घेरे थे, पर उसने टैक्सी में बैठते ही पूछा, “मम्मा, घर जाकर आलू पराठा मिलेगा?”
काव्या मुस्कुराई और पहली बार रो पड़ी। इतने दिनों बाद बेटे ने कुछ खाने की इच्छा जताई थी। वह इच्छा उसके लिए किसी बड़े चमत्कार से कम नहीं थी।
लेकिन वह रोहन के घर नहीं लौटी। उसी शाम वह विहान को लेकर जयपुर में अपनी माँ सुमित्रा के घर चली गई। गुलाबी शहर की पुरानी कॉलोनी में उनका घर बड़ा नहीं था, पर दरवाजे पर तुलसी का गमला था, रसोई में घी की खुशबू थी और कमरे में विहान के लिए पहले से बिछा बिस्तर था।
सुमित्रा ने बेटी को गले लगाते हुए कहा, “यहाँ कोई मेरे नाती को बिना तुम्हारी अनुमति के पानी तक नहीं देगा।”
उस रात विहान कंबल ओढ़कर सो गया। काव्या बरामदे में बैठी रही। उसने माँ को सब बताया—रविवार, काली शीशी, शांति देवी के ताने, रोहन की चुप्पी, डॉक्टर की रिपोर्ट, फोन पर कबूल की गई बात।
सुमित्रा ने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा। फिर बोलीं, “कई औरतें घर बचाने के लिए चुप रहती हैं, और उसी चुप्पी में बच्चे टूट जाते हैं। तूने देर की, पर तू जाग गई।”
काव्या ने सिर झुका लिया। “मैंने विहान को बचाने में देर कर दी।”
सुमित्रा ने उसका हाथ पकड़ा। “देर तब होती जब तू फिर चुप रहती।”
उधर दिल्ली में शांति देवी ने मोहल्ले में अलग कहानी फैला दी। वह कहतीं, “बहू ने मेरा पोता छीन लिया। मैंने तो देसी दवा दी थी। आजकल की लड़कियाँ सास को माँ मानती ही नहीं।” कुछ पड़ोसिनें उनके पक्ष में थीं, क्योंकि वे बरसों से उनकी सलाह लेकर दवाइयाँ खाती थीं। कुछ चुप थीं, क्योंकि अस्पताल की बात सुनकर उन्हें डर लगने लगा था।
काव्या ने पुलिस में शिकायत दी और बाल सुरक्षा विभाग को रिपोर्ट भेजी। उसने अदालत से आदेश माँगा कि शांति देवी विहान के पास न आ सकें। रोहन ने शुरुआत में फोन किया, समझाने की कोशिश की, “माँ बूढ़ी हैं, गलती हो गई।”
काव्या ने शांत स्वर में कहा, “गलती तब होती है जब किसी को पता न हो। उन्होंने कहा था, ‘थोड़ा-सा ही मिलाती थी।’ इसका मतलब उन्हें पता था।”
फोन के दूसरी तरफ रोहन चुप हो गया।
कुछ दिनों बाद वह जयपुर आया। सुमित्रा के घर के बाहर खड़ा रहा, हाथ में विहान के लिए रंगों का डिब्बा था। काव्या ने उसे बरामदे में बैठाया, भीतर नहीं बुलाया। विहान कमरे से झाँककर वापस माँ की गोद में छिप गया।
रोहन की आँखें भर आईं। “मैंने उसे डरते हुए कभी सच में देखा ही नहीं।”
काव्या बोली, “क्योंकि तुम हमेशा अपनी माँ की आवाज सुनते रहे। बच्चे की नहीं।”
रोहन ने सिर झुका लिया। “मुझे माफ कर दो।”
“मैं नहीं जानती कि मैं कर पाऊँगी या नहीं,” काव्या ने कहा। “लेकिन अगर विहान की जिंदगी में रहना है, तो पहला नियम यही है—उसकी सुरक्षा से ऊपर कोई रिश्ता नहीं।”
रोहन ने हामी भरी। उसने तलाक रोकने की विनती नहीं की। शायद वह समझ चुका था कि पत्नी को खोने से पहले उसने उसका भरोसा खोया था।
महीनों तक विहान की वापसी धीमी रही। वह खाना सूँघकर खाता। पानी पीने से पहले पूछता, “इसमें दवा तो नहीं?” किसी बूढ़ी औरत की तेज आवाज सुनकर माँ की साड़ी पकड़ लेता। जब कोई कहता, “मुँह खोलो,” तो उसके होंठ अपने आप बंद हो जाते।
काव्या हर बार उसके सामने बैठती और कहती, “तुम्हारे शरीर पर तुम्हारा अधिकार है। कोई जबरदस्ती नहीं करेगा।”
धीरे-धीरे विहान ने भरोसा सीखा। उसने स्कूल जाना शुरू किया। टिफिन में पराठा पूरा खाया। पार्क में दौड़ते हुए गिरा, घुटना छिला, फिर खुद उठकर बोला, “मैं ठीक हूँ।” एक शाम उसने पूरा कटोरा खिचड़ी खत्म किया और अचानक कहा, “मम्मा, अब पेट नहीं दुखता।”
काव्या रसोई में जाकर दीवार पकड़कर खड़ी रह गई। वह चाहती थी कि विहान उसे रोते हुए न देखे, पर उस दिन उसके आँसू दुख के नहीं, राहत के थे।
अदालत में मामला लंबा नहीं चला। अस्पताल की रिपोर्ट साफ थी। शीशी की जांच साफ थी। डॉक्टर नंदिता का बयान साफ था। सबसे भारी बात विहान का छोटा-सा बयान था। उसने महिला अधिकारी के सामने धीमी आवाज में कहा, “दादी मेरा मुँह पकड़ती थीं। मैं नहीं पीना चाहता था।”
शांति देवी अदालत में सफेद साड़ी पहनकर आईं। अपने पुराने मेडिकल स्टोर के प्रमाणपत्र लाईं। कहती रहीं, “मैंने प्यार में किया। मुझे लगा बच्चा कमजोर है। बहू मुझे नफरत करती है।” लेकिन न्यायाधीश ने कहा, “प्यार किसी बच्चे की इच्छा, शरीर और सुरक्षा से बड़ा नहीं हो सकता।”
शांति देवी को विहान से मिलने से रोका गया। उनके खिलाफ कानूनी निगरानी और जुर्माने का आदेश हुआ। उन्हें अनिवार्य परामर्श के लिए भी भेजा गया। बाहर निकलते हुए उन्होंने काव्या की ओर देखा तक नहीं, पर उनके चेहरे पर पहली बार जीत का घमंड नहीं था।
रोहन को भी अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया कि वह विहान से केवल तय स्थान और तय समय पर मिल सकेगा, और किसी भी हालत में बच्चे को शांति देवी के संपर्क में नहीं लाएगा। उसने नियम माने। वह हर बार जयपुर आता, विहान के साथ चित्र बनाता, कहानियाँ पढ़ता, और जब विहान थक जाता तो बिना ज़ोर दिए चला जाता।
एक दिन विहान ने उससे पूछा, “पापा, दादी क्यों कहती थीं मम्मा को कुछ नहीं आता?”
रोहन के पास कोई आसान जवाब नहीं था। उसने कहा, “क्योंकि दादी गलत थीं। तुम्हारी मम्मा ने तुम्हें बचाया।”
विहान ने बहुत देर तक उसे देखा। फिर रंग भरने लगा। उस दिन पहली बार उसने पिता से डरकर नहीं, सोचकर बात की।
काव्या ने तलाक पूरा किया। उसने जयपुर में बच्चों के लिए कपड़ों का छोटा काम शुरू किया। पहले मोहल्ले की 3 औरतें जुड़ीं, फिर 7। घर की छत पर सिलाई मशीनों की आवाज गूँजने लगी। सुमित्रा विहान को स्कूल से लातीं। शाम को सब साथ बैठकर चाय पीते। यह कोई फिल्मी खुशहाली नहीं थी, पर यह डर से आजादी थी।
रविवार अब काव्या के लिए भय का दिन नहीं रहा। वह विहान को बिरला मंदिर के पास कबूतर दिखाने ले जाती, कभी नाहरगढ़ की पहाड़ी से शहर दिखाती, कभी बस घर में आलू टिक्की बनाती। विहान अब रविवार को पूछता, “आज कहाँ चलेंगे?” और काव्या के भीतर कोई पुराना घाव थोड़ा और भर जाता।
एक बरसाती शाम विहान ने कॉपी में घर बनाया। एक बड़ा दरवाजा, खुली खिड़की, बरामदे में तुलसी, और 2 लोग हाथ पकड़े हुए।
“मम्मा, ये हम हैं,” उसने कहा। “और ये हमारा घर है। यहाँ कोई कड़वी दवा नहीं देगा।”
काव्या उसके पास बैठ गई। उसने विहान का चेहरा दोनों हथेलियों में लिया, बहुत हल्के से, जैसे टूटे हुए भरोसे को छू रही हो।
“यहाँ कोई तुम्हें चुप नहीं कराएगा,” उसने कहा। “तुम्हारा डर भी सुना जाएगा, तुम्हारी ना भी सुनी जाएगी।”
विहान मुस्कुराकर फिर रंग भरने लगा।
बारिश खिड़की पर पड़ रही थी। रसोई में गरम दूध की भाप उठ रही थी। सुमित्रा पूजा के दीये में बाती ठीक कर रही थीं। और काव्या ने पहली बार समझा कि परिवार खून, उपनाम या समाज की इज्जत से नहीं बनता। परिवार वहाँ बनता है जहाँ एक बच्चे की काँपती आवाज को गंभीरता से सुना जाए।
उसने बहुत देर से सही, पर दरवाजा बंद किया था—और उसी बंद दरवाजे के पीछे उसके बेटे की जिंदगी दोबारा खुल गई थी।
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