
भाग 1:
अदिति ने अपने ससुराल वालों से रिश्ता बचाने के लिए जो महंगी दावत बनाई थी, घर लौटते ही उसी मेज पर सिर्फ टूटे खोल, खाली बीयर की कैन और उसके 6 साल के बेटे आरव की भूखी आँखें पड़ी मिलीं।
डाइनिंग टेबल पर 8 बड़े लॉब्स्टर के लाल खोल बिखरे पड़े थे। मक्खन सूखकर प्लेटों से चिपक गया था, नींबू के छिलके कुर्सियों के नीचे गिरे थे, और बीच में एक सफेद प्लेट पर 2 ठंडे सिर रखे थे, जैसे किसी ने बहुत सोच-समझकर उसका अपमान सजाया हो।
अदिति बारिश में भीगी हुई दरवाजे पर खड़ी रह गई। उसके बाल चेहरे से चिपके थे, दुपट्टा कंधे से फिसल रहा था, और हाथ अब भी कांप रहे थे। वह और उसका पति राघव मुश्किल से 1 घंटे पहले घर से निकले थे। गुरुग्राम के अपने छोटे से इंटीरियर डिजाइन स्टूडियो में अचानक बैंक अकाउंट से जुड़ी गड़बड़ी की खबर आई थी। साझेदार कबीर ने फोन पर बस इतना कहा था कि कंपनी के दूसरे खाते से अजीब ट्रांसफर हुए हैं।
राघव पूरे रास्ते चुप था। गाड़ी चलाते हुए उसकी उंगलियां स्टीयरिंग पर कस गई थीं, जैसे वह अंदर ही अंदर किसी ऐसे सच से जूझ रहा हो जिसे वह अदिति से छिपाना भी चाहता था और दिखाना भी।
उस रात अदिति ने खुद अपने हाथों से दावत बनाई थी। दिल्ली के आईएनए मार्केट से 8 ताजे लॉब्स्टर खरीदे गए थे। कीमत सुनकर दुकानदार भी मुस्करा दिया था, लेकिन अदिति ने बिना मोलभाव पैसे दे दिए थे। उसने सोचा था, अगर एक अच्छी मेज, अच्छा खाना और थोड़ा सम्मान हो जाए, तो शायद महीनों से जमा ज़हर पिघल जाए।
उसकी सास कमला देवी कई महीनों से रिश्तेदारों में कहती फिर रही थीं कि अदिति को पैसा चढ़ गया है। शादी के शुरुआती दिनों में जो बहू उनके पैर दबाती थी, अब वही खर्चों का हिसाब पूछती है। ननद पूजा हर बार मीठी मुस्कान के साथ ताना मारती थी कि अदिति ने राघव को अपने मायके और अपने बिजनेस में बांध लिया है।
सच अलग था।
अदिति ने ही ससुर महेंद्र के हार्ट चेकअप का पैसा दिया था। पूजा के बेटे की स्कूल फीस 2 बार भरी थी। सास के लिए सोने की पतली चूड़ियां खरीदी थीं, घर का पुराना फ्रिज बदलवाया था, और राघव के छोटे भाई जैसे माने जाने वाले पूजा के पति समीर को नौकरी के इंटरव्यू तक के लिए कपड़े दिलवाए थे। फिर भी हर बार वही लालची, वही घमंडी, वही पराई बहू कहलाती थी।
दोपहर में जब कमला देवी ने फोन पर कहा था कि “आजकल बहुएं पैसा कमाकर घर तोड़ती हैं”, तब अदिति ने जवाब देने के बजाय शाम की दावत तय कर दी।
—आज सब साथ बैठेंगे। बिना ताने, बिना झगड़े। बस खाना और बात।
राघव ने उसे बहुत देर तक देखा था।
—तुम प्यार खरीदने की कोशिश मत करो, अदिति।
—मैं प्यार नहीं खरीद रही। आखिरी बार कोशिश कर रही हूं।
राघव ने कुछ नहीं कहा, लेकिन रसोई में आकर उसके साथ खड़ा हो गया। उसने लहसुन कूटा, अदिति ने मसाले तैयार किए। लॉब्स्टर भाप में पकने लगे तो पूरे घर में मक्खन, लहसुन, धनिया और नींबू की खुशबू फैल गई। आरव दौड़ता हुआ आया, उसकी आंखों में चमक थी।
—मम्मा, मुझे सबसे बड़ा पंजा मिलेगा?
अदिति हंसी और उसके बाल सहलाए।
—सबसे बड़ा। क्योंकि तुमने पूरा हफ्ता होमवर्क बिना रोए किया है।
आरव खुशी से उछल पड़ा।
कमला देवी सोफे पर बैठी फोन देख रही थीं। पूजा ने लॉब्स्टर की तरफ देखते हुए होंठ दबाए, जैसे उसे खाना कम और हिसाब ज्यादा दिख रहा हो।
तभी कबीर का फोन आया। राघव का चेहरा बदल गया। उसने अदिति की तरफ देखा। फोन स्पीकर पर नहीं था, फिर भी अदिति ने कुछ शब्द सुन लिए—“सेकेंडरी अकाउंट”, “छोटे-छोटे ट्रांसफर”, “रात के टाइम”, “डिवाइस लॉग”।
अदिति घबरा गई।
—क्या हुआ?
राघव ने धीरे से कहा:
—स्टूडियो के खाते में गड़बड़ है। हमें अभी जाना होगा।
अदिति ने रसोई की तरफ देखा। खाना तैयार था। मेज सज चुकी थी। आरव प्लेट के पास बैठा इंतजार कर रहा था।
उसने कमला देवी से साफ कहा:
—मम्मीजी, कृपया खाना मत शुरू कीजिएगा। हम जल्दी लौटेंगे। आरव हमारे साथ ही खाएगा।
कमला देवी ने बिना सिर उठाए कहा:
—हां, हां, जाओ। खाना भागा नहीं जा रहा।
पूजा ने हंसते हुए कहा:
—बस बहुत देर मत करना, ठंडा लॉब्स्टर गरीबों जैसा लगता है।
अदिति ने बात अनसुनी की। उसने आरव के माथे को चूमा।
—मम्मा जल्दी आएगी। तुम इंतजार करना।
आरव ने मासूमियत से सिर हिलाया।
पर जब अदिति और राघव लौटे, घर किसी सस्ती पार्टी के बाद का कमरा लग रहा था। फर्श पर कैन लुढ़की थीं। समीर दांतों में कुछ फंसा हुआ निकाल रहा था। पूजा पेट पर हाथ रखकर हंस रही थी। कमला देवी संतुष्ट चेहरा लिए पान चबा रही थीं। महेंद्र जी खिड़की की तरफ देखने का नाटक कर रहे थे।
और आरव कमरे के दरवाजे पर खड़ा था। उसकी आंखें लाल थीं।
—मम्मा… दादी ने कहा बच्चों को इतना महंगा खाना देने से बरबादी होती है।
अदिति का गला सूख गया।
आरव ने प्लेट की तरफ इशारा किया।
—उन्होंने कहा आप लोग बहुत कमाते हो, इसलिए सिर भी खा लोगे।
कमला देवी ने ठंडी आवाज में कहा:
—इतना नाटक मत करो। हमने तुम्हारे लिए भी रखा है। देखो, 2 सिर पड़े हैं।
पूजा खिलखिलाई।
—खाना ही तो है भाभी, कोई विरासत थोड़ी छीन ली।
अदिति ने जवाब नहीं दिया। उसे लगा, अगर उसने उस पल मुंह खोला तो वह रो पड़ेगी। राघव धीरे-धीरे मेज तक गया। उसने 1 ठंडा सिर उठाया, फिर वापस प्लेट पर रख दिया।
—अच्छा था?
कमरे में खामोशी उतर आई।
कमला देवी ने भौंहें चढ़ाईं।
—ये कैसा लहजा है अपनी मां से?
राघव ने पहली बार सीधा उनकी आंखों में देखा।
—बहुत अच्छा हुआ कि आपको पसंद आया। क्योंकि ये दावत उसी पैसे से बनी थी, जो आप लोग पिछले 3 महीने से अदिति की कंपनी के खाते से चोरी कर रहे थे।
पूजा का चेहरा सफेद पड़ गया।
समीर के हाथ से कैन गिर गई।
कमला देवी की पान वाली उंगली हवा में ही रुक गई।
अदिति ने राघव की तरफ देखा। उसे समझ आया कि बारिश, फोन, रास्ते की खामोशी और यह अचानक लौटना, सब सिर्फ इत्तेफाक नहीं था।
राघव ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और मेज पर रख दिया।
—और आज रात सिर्फ लॉब्स्टर नहीं पक रहे थे। कुछ और भी पक रहा था।
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भाग 2:
कमरा कुछ सेकंड तक बिल्कुल शांत रहा, फिर कमला देवी ने बेटे पर मां होने का अधिकार फेंककर माहौल पलटने की कोशिश की। उन्होंने चोरी शब्द को अपमान बताया, पूजा ने बैंक की गलती का बहाना बनाया, समीर ने परिवार में बैठकर बात करने की सलाह दी, और महेंद्र जी ने आरव की तरफ देखकर कहा कि बच्चे के सामने तमाशा ठीक नहीं। मगर राघव का चेहरा पत्थर जैसा हो चुका था। उसने मोबाइल की स्क्रीन घुमाई, जिसमें 3 महीने के भीतर ₹8,75,000 की छोटी-छोटी यूपीआई और नेट बैंकिंग एंट्रियां दिख रही थीं। रकम कभी ₹9,999, कभी ₹14,500, कभी ₹21,000 थी, ताकि कोई अलर्ट ज्यादा तेज न बजे। हर ट्रांसफर रात 11 बजे के बाद हुआ था, और 5 बार वही डिवाइस कमला देवी के घर के वाई-फाई से जुड़ा मिला था। अदिति की आंखों के सामने वे सारे दिन घूम गए जब उसने पूजा को किराने के पैसे दिए थे, कमला देवी के लिए दवा खरीदी थी, समीर की बाइक की किश्त भरने में मदद की थी, और बदले में खुद को कंजूस सुनती रही थी। राघव ने फिर एक ऑडियो चलाया। उसमें पूजा की आवाज थी, जो अपनी मां से कह रही थी कि अदिति रोज खाते नहीं देखती, थोड़ा-थोड़ा निकालो तो पता नहीं चलेगा। दूसरा ऑडियो समीर का था, जिसमें वह पूछ रहा था कि बाइक की बाकी रकम कब आएगी। तीसरा सबसे क्रूर था, उसमें कमला देवी कह रही थीं कि राघव का पैसा आखिर घर का ही पैसा है, बहू ने बस उस पर ताला लगा रखा है। अदिति ने आरव को सीने से लगा लिया, क्योंकि वह बच्चा अब भी समझ नहीं पा रहा था कि जिस दादी ने उसे खाना नहीं दिया, वही लोग उसकी मां की मेहनत भी खा रहे थे। तभी राघव ने कहा कि उसे चोरी का शक 4 दिन पहले हो गया था, इसलिए उसने कबीर से झूठा इमरजेंसी फोन करवाया, ताकि देख सके कि उनके जाते ही परिवार क्या करता है। उस रात सबने खुद को बेनकाब कर दिया था। फिर उसने जैकेट से एक मोटी फाइल निकाली और मेज पर पटक दी। फाइल खुलते ही सबसे ऊपर वकील का नोटिस था, और नीचे लाल अक्षरों में लिखा था कि सुबह 10 बजे तक समझौता न हुआ तो एफआईआर दर्ज होगी।
भाग 3:
फाइल के गिरते ही जैसे पूरी हवेली का रंग उतर गया। वही ड्रॉइंग रूम, जहां कुछ मिनट पहले पूजा की हंसी गूंज रही थी, अब अदालत जैसा लगने लगा था। बाहर बारिश अब भी धीमे-धीमे गिर रही थी, लेकिन अंदर हर चेहरे पर पसीना था।
कमला देवी ने फाइल की तरफ हाथ बढ़ाया, फिर तुरंत रोक लिया।
—तू अपनी मां पर पुलिस चढ़ाएगा?
राघव ने शांत आवाज में कहा:
—अगर मेरी मां मेरी पत्नी की मेहनत चुरा सकती है, मेरे बच्चे को भूखा छोड़ सकती है, और फिर उसे सिर परोसे हुए कह सकती है कि यही काफी है, तो हां, मैं पुलिस तक जाऊंगा।
पूजा अचानक रोने लगी।
—भैया, गलती हो गई। मैं वापस कर दूंगी। थोड़ा वक्त दे दो।
अदिति ने पहली बार उसकी तरफ देखा। पूजा के आंसू सच्चे थे या डर के, यह फर्क अब मायने नहीं रखता था। अदिति के कानों में सिर्फ आरव की आवाज गूंज रही थी—“दादी ने कहा बच्चों को इतना महंगा खाना देने से बरबादी होती है।”
समीर ने कुर्सी से उठने की कोशिश की।
—राघव, मैं बाइक बेच दूंगा। थोड़ा सोना भी है। लेकिन एफआईआर मत करना। मेरा नाम खराब हो जाएगा।
—नाम चोरी से खराब हुआ है, फाइल से नहीं।
महेंद्र जी ने दोनों हाथ जोड़ दिए।
—बेटा, घर की बात घर में खत्म कर। इज्जत बाहर चली गई तो लौटेगी नहीं।
अदिति ने धीरे से कहा:
—इज्जत बाहर नहीं जाती, पापा जी। इज्जत पहले घर के अंदर मरती है। आज सिर्फ लाश दिख गई।
महेंद्र जी चुप हो गए।
कमला देवी को यह सबसे ज्यादा चुभा कि बहू, जो इतने साल चुप रहती थी, अब उनके सामने सिर उठाकर बोल रही थी। उनका चेहरा गुस्से से तमतमा गया।
—बहुत बोलने लगी है। यही तो चाहती थी ना? मेरा बेटा मुझसे अलग हो जाए। मेरे ही घर में मुझे चोर बना दिया।
राघव आगे बढ़ा।
—ये आखिरी बार है जब आप अदिति पर इल्जाम डाल रही हैं।
कमला देवी ने झटके से उसकी तरफ देखा।
राघव की आवाज भारी हो गई।
—मैंने कई साल सोचा कि अच्छा बेटा होने का मतलब चुप रहना होता है। मैं देखता था कि आप अदिति को ताने देती हैं, लेकिन कहता था कि जाने दो। पूजा पैसे मांगती थी, मैं कहता था परिवार है। समीर बहाने बनाता था, मैं कहता था मुश्किल होगी। पापा चुप रहते थे, मैं सोचता था उम्र का लिहाज करो। मगर आज मेरे बेटे को भूखा छोड़कर आपने मुझे दिखा दिया कि मेरी चुप्पी ने आपको नहीं, आपकी हिम्मत को बड़ा किया।
अदिति की आंखों में आंसू भर आए। यह वही बात थी जो वह वर्षों से सुनना चाहती थी। उसे पैसे से ज्यादा चोट राघव की चुप्पी ने दी थी। हर त्यौहार पर, हर ताने पर, हर झूठे आरोप पर वह पति की आंखों में जवाब ढूंढती थी। वह साथ खड़ा होता था, पर देर से, आधा, थका हुआ। आज पहली बार वह पूरी तरह उसके सामने नहीं, उसके साथ खड़ा था।
आरव अपनी डायनासोर वाली छोटी बैग लेकर कमरे में वापस आया। वह शायद डरकर अपना बैग खुद ही पैक कर लाया था। उसने अदिति का दुपट्टा पकड़ा।
—मम्मा, हम घर जा रहे हैं?
कमला देवी ने तुरंत मौका पकड़ा।
—आरव, बेटा, दादी के पास आओ। बोलो अपने पापा से कि दादी को जेल नहीं भेजते।
आरव ने 1 कदम भी आगे नहीं बढ़ाया। उसने अपनी मां की तरफ देखा, फिर धीरे से कहा:
—दादी, आपने कहा था मैं लॉब्स्टर खराब कर दूंगा।
कमला देवी का चेहरा बुझ गया।
कमरे में कोई आवाज नहीं हुई। वह छोटा सा वाक्य किसी पुलिस नोटिस से भारी था। बच्चे ने चोरी नहीं समझी थी, अकाउंट नहीं समझा था, वकील नहीं समझा था। पर उसने अपमान समझ लिया था।
राघव ने फाइल उठाई और कमला देवी के सामने रख दी।
—कल सुबह 10 बजे वकील का आदमी आएगा। 2 रास्ते हैं। पूरा पैसा लिखित समझौते से लौटाइए, तारीखों और गारंटी के साथ। या फिर एफआईआर होगी। उसके बाद मैं बेटा नहीं, शिकायतकर्ता रहूंगा।
पूजा फूट-फूटकर रो पड़ी।
—भाभी, माफ कर दो। मम्मी ने कहा था तुम्हारे पास बहुत है। मैंने सोचा थोड़ा लेने से क्या होगा। बच्चों की फीस थी, घर का खर्च था, समीर की बाइक थी…
अदिति ने उसकी बात काटी नहीं। वह सुनती रही। फिर शांत आवाज में बोली:
—अगर जरूरत थी तो मांग सकती थीं। मैंने पहले भी दिया है। मगर आपने मुझसे नहीं लिया, आपने चुराया। फिर उसी पैसे से मेरे सामने मुझे छोटा दिखाया। आज आपको मुझसे माफी नहीं चाहिए। आपको बस जेल से बचना है।
पूजा जमीन पर बैठ गई।
समीर ने सिर पकड़ लिया।
कमला देवी ने आखिरी कोशिश की।
—राघव, याद रख, मां का श्राप लगता है।
राघव ने बहुत धीरे कहा:
—मां का आशीर्वाद भी तभी लगता है जब मां न्याय करना जानती हो।
उस रात वे 3 लोग उस घर से बिना खाना खाए निकले। अदिति, राघव और आरव। सिर्फ आरव का बैग, अदिति का पर्स और राघव की फाइल साथ थी। बाहर बारिश हल्की थी, सड़क पर पीली लाइटें चमक रही थीं। गाड़ी में बैठते ही आरव मां की गोद में सिर रखकर सो गया।
कुछ देर तक दोनों चुप रहे। फिर राघव ने कहा:
—मैंने सेक्टर 45 में एक छोटा फ्लैट किराए पर लिया है। स्टूडियो से पास है। कल से हम वहीं रहेंगे।
अदिति ने उसकी तरफ देखा।
—तुमने मुझसे छिपाया?
—हां। क्योंकि मुझे डर था तुम फिर कहोगी कि थोड़ा और सह लेते हैं।
अदिति खिड़की से बाहर देखने लगी। उसे चोट लगी थी, लेकिन सच यह भी था कि राघव गलत नहीं था। वह सचमुच हर बार थोड़ा और सहने को तैयार हो जाती थी। उसे लगता था परिवार बचाना उसकी जिम्मेदारी है। उसे लगता था बहू होना मतलब हर चोट को मुस्कान में छिपाना है।
पर अब आरव बीच में आ गया था। बच्चे के सामने झुकी हुई मां, भूखा बच्चा और अपमान से भरी मेज—यह कोई परिवार नहीं था।
अगली सुबह वकील का नोटिस भेजा गया। पहले कमला देवी ने जवाब नहीं दिया। फिर पूजा ने 23 वॉइस मैसेज भेजे। समीर ने कहा कि वह आधा पैसा तुरंत देगा। महेंद्र जी ने राघव से अकेले मिलकर “मर्दों की तरह” बात करने को कहा। राघव ने सिर्फ 1 जवाब भेजा:
—सब लिखित में होगा।
3 दिन बाद समझौता साइन हुआ। समीर की नई बाइक बिक गई। पूजा ने अपने कंगन गिरवी रखे। कमला देवी को वह सोने का सेट लौटाना पड़ा, जो उन्होंने पिछले महीने रिश्तेदारों के सामने दिखाया था। बाकी रकम 6 महीनों की किस्तों में लिखी गई, गारंटी चेक और कानूनी दस्तावेजों के साथ।
राघव ने किसी को सार्वजनिक रूप से बदनाम नहीं किया। उसने रिश्तेदारों के व्हाट्सएप ग्रुप में कुछ नहीं लिखा। उसने सोशल मीडिया पर कुछ नहीं डाला। उसने बस दरवाजा बंद कर दिया। और यही ससुराल वालों को सबसे ज्यादा दर्द दे गया।
क्योंकि वे अपमान से नहीं, पहुंच खत्म होने से टूटे।
2 हफ्ते बाद अदिति, राघव और आरव नए फ्लैट में शिफ्ट हो गए। वह घर छोटा था, पर साफ था। रसोई में सफेद टाइलें थीं, खिड़की से शाम की धूप आती थी, और डाइनिंग टेबल पर सिर्फ 3 कुर्सियां थीं। अदिति ने पहली बार महसूस किया कि छोटा घर भी बड़ा हो सकता है, अगर वहां कोई आपकी थाली पर अधिकार न जताए।
आरव कई दिनों तक पूछता रहा:
—दादी अब भी नाराज हैं?
अदिति हर बार बस इतना कहती:
—कभी-कभी बड़े लोग गलतियां करते हैं। प्यार का मतलब यह नहीं कि हम उन्हें हमें दुख देने दें।
राघव अब बदल चुका था। उसने अपने परिवार से बात पूरी तरह बंद नहीं की, लेकिन हर बात लिखित में रखी। जब महेंद्र जी की तबीयत खराब हुई, उसने अस्पताल का बिल सीधे जमा किया, नकद नहीं दिया। जब पूजा ने बच्चों के नाम पर मदद मांगी, उसने स्कूल में फीस सीधे भेजने की बात कही। पूजा ने दोबारा फोन नहीं किया।
कमला देवी ने कई बार रिश्तेदारों से कहलवाया कि बहू ने घर तोड़ दिया। मगर अब अदिति जवाब देने नहीं जाती थी। पहले वह हर झूठ सुधारना चाहती थी। अब उसे समझ आ गया था कि कुछ लोग सच नहीं चाहते, बस नई कहानी चाहते हैं जिसमें वे पीड़ित दिखें।
एक शाम राघव घर लौटा तो उसके हाथ में समुद्री खाने की थैली थी। अदिति ने देखते ही सांस रोक ली।
—फिर से लॉब्स्टर?
राघव ने हल्की मुस्कान के साथ कहा:
—इस बार परीक्षा नहीं है। बस हमारा खाना है।
अदिति ने थैली ली। लहसुन कूटा गया, नींबू काटे गए, मक्खन पिघला। भाप उठी तो वही पुरानी खुशबू रसोई में भर गई। अदिति का गला अचानक भर आया। उसे उस रात की मेज याद आ गई—ठंडे सिर, खाली कैन, पूजा की हंसी, आरव की भूख, और कमला देवी की आंखों में वह निर्दय संतोष।
राघव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
—हर याद को सजा बनाकर नहीं रखना पड़ता।
आरव दौड़ता हुआ आया।
—मम्मा, आज मुझे सच में बड़ा पंजा मिलेगा?
अदिति घुटनों के बल बैठी और उसके गाल पर लगी पेंसिल की हल्की रेखा साफ की।
—आज सबसे बड़ा पंजा तुम्हारा है।
रात को जब वे बैठे, राघव ने पहला टुकड़ा आरव की प्लेट में रखा। दूसरा अदिति की प्लेट में। फिर खुद लिया। किसी ने नहीं पूछा कि कीमत कितनी थी। किसी ने नहीं कहा कि बच्चे को महंगा खाना क्यों। किसी ने बहू को एहसान नहीं गिनाया। सिर्फ खाना था, 3 लोग थे, और एक ऐसी शांति थी जिसमें कोई कांटा छिपा नहीं था।
आरव ने लॉब्स्टर के सिर की तरफ देखकर पूछा:
—मम्मा, ये सिर भी खाते हैं?
अदिति कुछ पल चुप रही। फिर बोली:
—कभी-कभी खाते हैं बेटा। लेकिन किसी को सिर्फ सिर देकर यह महसूस नहीं कराना चाहिए कि वह कम है।
आरव पूरी बात नहीं समझा, पर मुस्कराकर खाने लगा।
अदिति ने उस रात महसूस किया कि वही 2 ठंडे सिर, जिन्हें देखकर उसका दिल टूटा था, असल में उसकी आजादी की शुरुआत थे। वे अपमान की निशानी थे, लेकिन उसी अपमान ने उसे चुप्पी से बाहर धकेला। उसने सीखा कि भरी मेज हमेशा घर नहीं होती, मां कहलाने वाली हर औरत ममता नहीं जानती, बहन कहलाने वाला हर रिश्ता भरोसे लायक नहीं होता, और पति की सबसे बड़ी कमाई पैसा नहीं, सही समय पर पत्नी के साथ खड़ा होना है।
कई महीने बाद कमला देवी का संदेश आया।
—मुझे नहीं पता था कि तुम्हें इतना दुख हुआ था।
अदिति ने फोन देर तक हाथ में पकड़े रखा। पहले वाली अदिति होती तो लंबा जवाब लिखती, अपने दर्द को सभ्य शब्दों में समझाती, उम्मीद करती कि सामने वाली शायद पिघल जाए। मगर अब उसे सफाई की भूख नहीं रही थी।
उसने बस लिखा:
—आपको पता था। बस आपको लगा था कि मैं कभी जाऊंगी नहीं।
उस संदेश के बाद कोई जवाब नहीं आया।
और इस बार खामोशी ने अदिति को घायल नहीं किया। वह खामोशी राहत जैसी थी। जैसे कोई भारी दरवाजा बंद हुआ हो और भीतर पहली बार हवा साफ हुई हो।
उस रात कमला देवी ने सोचा था कि 2 ठंडे लॉब्स्टर सिर रखकर वह बहू को उसकी जगह दिखा देंगी।
उन्हें क्या पता था, उसी प्लेट में उन्होंने अपने बेटे, बहू और पोते को वह वजह परोस दी थी, जिसकी उन्हें सालों से जरूरत थी—उठकर चले जाने की वजह।
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