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“तेरी कोई अपनी फैमिली नहीं” — भाभी ने सबके सामने अविवाहित ननद को 4 बच्चों की आया बना दिया; मगर सुबह थाने से आया फोन, झूठा नोट और पड़ोसी का कैमरा एक छिपी चाल खोलने वाले थे।

भाग 1:
—आज से बच्चों की जिम्मेदारी तेरी है, और इस बार मना करने की हिम्मत मत करना।

यह बात जैसे ही हवेली के बड़े भोजन कक्ष में गूंजी, स्टील की थालियों की खनक, बच्चों की चीख-पुकार और रिश्तेदारों की हंसी एक साथ रुक गई।

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लखनऊ के पुराने चौक इलाके से थोड़ा आगे, गोमती नगर की एक बड़ी कोठी में हर रविवार की तरह शर्मा परिवार की दावत लगी थी। डाइनिंग टेबल पर मटर पुलाव, शाही पनीर, पूरी, रायता, गुलाब जामुन और चाय के लिए अलग से रखी केतली थी। दीवार पर टंगे भगवान कृष्ण के बड़े फ्रेम के नीचे परिवार के बुजुर्ग बैठे थे, और फर्श पर 4 बच्चे खिलौने, चप्पलें और मिठाई के डिब्बे उलट-पलट कर जैसे घर पर कब्जा जमाए हुए थे।

उस दोपहर आदित्य ने अचानक गिलास उठाकर सबका ध्यान खींचा। उसके चेहरे पर वही गर्व था जो हर बार परिवार के सामने खुद को सबसे सफल बेटा साबित करते समय आ जाता था। उसके बगल में उसकी पत्नी प्रिया हल्के गुलाबी सूट में बैठी थी, हाथ पेट पर रखे, जैसे पूरा घर पहले से ही उसकी आरती उतारने वाला हो।

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—एक खुशखबरी है —आदित्य ने मुस्कुराते हुए कहा— प्रिया फिर से मां बनने वाली है। हमारा 5वां बच्चा आने वाला है।

बस, इतना सुनना था कि कमरे में तालियां बजने लगीं।

सरोज देवी ने दोनों हाथ आसमान की तरफ उठाए।

—वाह ठाकुर जी, मेरे घर की लकीर और लंबी कर दी आपने।

महेंद्रनाथ शर्मा ने बेटे की पीठ थपथपाई।

—शाबाश बेटा, यही होती है असली वंश की पहचान। घर बच्चों से ही घर लगता है।

प्रिया ने गर्दन झुकाकर मुस्कुराने का अभिनय किया, मगर उसकी आंखों में जीत साफ दिखाई दे रही थी। जैसे हर बच्चा उसके लिए सिर्फ बच्चा नहीं, परिवार में अपनी सत्ता बढ़ाने का प्रमाण था।

एक कोने में बैठी नंदिनी चुपचाप सब देख रही थी।

वह 33 साल की थी, लखनऊ के एक निजी अस्पताल में ऑपरेशन थिएटर कोऑर्डिनेटर थी, किराए के छोटे फ्लैट में अकेली रहती थी और महीने की तनख्वाह से अपना जीवन संभालती थी। परिवार की नजर में उसका अकेला होना उसकी कमजोरी नहीं, उसकी उपलब्धता थी।

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पिछले 8 सालों से वह आदित्य और प्रिया के 4 बच्चों की बिना वेतन वाली आया बनी हुई थी।

कभी स्कूल से लाना।

कभी ट्यूशन छोड़ना।

कभी बुखार में रात भर सिर पर पट्टी रखना।

कभी प्रिया की kitty party के लिए छुट्टी लेना।

कभी आदित्य की बिजनेस मीटिंग के नाम पर पूरा रविवार गंवा देना।

और हर बार एक ही वाक्य सुनना पड़ता था।

—तू तो अकेली है, तुझे क्या काम?

बच्चों से नंदिनी को नफरत नहीं थी। आरव, काव्या, रोहन और छोटी मीरा उसके दिल के करीब थे। वे उसे नंदू बुआ कहते थे और उसके कमरे में जाकर उसके कुशन खराब कर देते थे। लेकिन बच्चों की मासूमियत के पीछे बड़े लोगों की चालाकी छिपी थी। आदित्य अपने पिता का लाडला था, प्रिया घर की बहू होकर भी रानी की तरह पेश आती थी, और सरोज देवी ने कब का तय कर लिया था कि अविवाहित बेटी का जीवन परिवार की सेवा में लगना चाहिए।

तालियां थमते ही सरोज देवी ने नंदिनी की ओर देखा।

—अब सुन ले, इस बार प्रिया को पूरा आराम चाहिए। 4 बच्चे पहले से हैं, 5वां आने वाला है। तू रोज शाम को आ जाया कर। स्कूल, खाना, होमवर्क, सब संभालना पड़ेगा।

नंदिनी ने चम्मच नीचे रख दिया।

—नहीं।

कमरे में जैसे किसी ने बिजली काट दी।

आदित्य ने भौंहें सिकोड़ लीं।

—क्या मतलब नहीं?

—मतलब नहीं —नंदिनी की आवाज धीमी थी, मगर साफ थी— मैं अब बच्चों की नियमित जिम्मेदारी नहीं उठाऊंगी।

प्रिया ने हल्की हंसी छोड़ी।

—वाह, आजकल बहुत attitude आ गया है। अस्पताल में 2 डॉक्टरों से बात क्या करने लगी, खुद को बहुत बड़ी अफसर समझने लगी?

नंदिनी ने उसकी तरफ देखा।

—यह attitude नहीं, सीमा है।

सरोज देवी का चेहरा कसैला हो गया।

—बेटी होकर घर के काम में सीमा दिखाएगी?

—मां, घर का काम और किसी के बच्चों की पूरी जिम्मेदारी अलग बात है।

आदित्य कुर्सी से थोड़ा आगे झुका।

—तेरे भतीजे-भतीजी हैं। पराए थोड़े हैं।

—पर उनके माता-पिता तुम दोनों हो।

प्रिया की मुस्कान अब गायब हो गई थी।

—सच कहूं नंदिनी, तेरी समस्या बच्चे नहीं हैं। तेरी समस्या यह है कि तेरी अपनी कोई family नहीं है। इसलिए दूसरों की खुशी देखकर जलन होती है।

यह शब्द हवा में चाकू की तरह लटक गया।

महेंद्रनाथ ने नजरें झुका लीं। सरोज देवी ने कुछ नहीं कहा। आदित्य ने भी पत्नी को रोकने की कोशिश नहीं की।

नंदिनी की उंगलियां थाली के किनारे पर कस गईं।

प्रिया फिर बोली।

—और वैसे भी, तू practice कर ले। कभी तेरी शादी हुई तो काम आएगा। मां बनना किताब पढ़ने से नहीं आता।

नंदिनी के भीतर कुछ टूटकर गिरा, मगर इस बार वह बिखरी नहीं।

वह धीरे से उठी।

—तुम लोगों ने ठीक कहा। मेरी अपनी family यहां नहीं है। क्योंकि family वह होती है जो इंसान को इस्तेमाल नहीं करती।

सरोज देवी भी उठ खड़ी हुईं।

—नाटक मत कर। कल सुबह तक दिमाग ठंडा हो जाएगा।

नंदिनी ने अपना बैग उठाया।

—कल सुबह से मेरा जीवन ठंडा नहीं, साफ होगा।

आदित्य हंसा।

—देखते हैं कितने दिन टिकती है तेरी अकड़।

नंदिनी दरवाजे तक गई, तभी छोटी मीरा भागकर उसके पैरों से लिपट गई।

—नंदू बुआ, आप कल आओगी न?

नंदिनी की आंखें भर आईं। उसने झुककर बच्ची के बाल सहलाए।

—मीरा, बुआ तुमसे प्यार करती है। लेकिन हर प्यार का मतलब यह नहीं होता कि बुआ हमेशा सबकी गलती उठाए।

मीरा समझी नहीं, बस उसका दुपट्टा पकड़कर खड़ी रही।

नंदिनी ने खुद को छुड़ाया और बाहर निकल गई।

उस रात बारिश हल्की-हल्की पड़ रही थी। वह ऑटो में बैठी तो गोमती नगर की चमकती सड़कों पर पानी के धब्बे भागते हुए दिख रहे थे। फोन बार-बार बजता रहा। कभी मां, कभी आदित्य, कभी प्रिया। फिर WhatsApp पर संदेश आने लगे।

“घर की इज्जत मिट्टी में मत मिला।”

“इतना भी क्या ego?”

“कल सुबह बच्चों को छोड़ना है, तैयार रहना।”

“तू मना करेगी तो अच्छा नहीं होगा।”

नंदिनी ने कोई जवाब नहीं दिया।

अपने छोटे फ्लैट में पहुंचकर उसने चप्पल उतारी, बैग कुर्सी पर रखा और बिस्तर पर बैठ गई। दीवार पर टंगी घड़ी 11:42 दिखा रही थी। कमरे में सन्नाटा था, पर उसके भीतर बरसों की आवाजें घूम रही थीं।

काव्या का बुखार।

आरव की स्कूल फीस।

रोहन का टूटा हाथ।

मीरा की पहली बोली।

और हर घटना के बाद वही ताना।

—तेरे पास और है ही क्या?

सुबह 7:16 पर उसका फोन फिर बजा।

नंबर अनजान था।

नंदिनी ने सोचा अस्पताल से emergency call होगा। उसने जल्दी से फोन उठाया।

—हेलो?

दूसरी तरफ एक गंभीर पुरुष आवाज आई।

—क्या मैं सुश्री नंदिनी शर्मा से बात कर रहा हूं?

—जी, कौन?

—मैं इंस्पेक्टर राघव सिंह बोल रहा हूं, विभूति खंड पुलिस स्टेशन से। आपको तुरंत थाने आना होगा।

नंदिनी का दिल धक से रह गया।

—क्यों? क्या हुआ?

कुछ सेकंड की चुप्पी के बाद इंस्पेक्टर ने कहा।

—आपका नाम आज सुबह 4 नाबालिग बच्चों की जिम्मेदार अभिभावक के रूप में लिखकर छोड़ा गया है।

नंदिनी कुर्सी से उठते-उठते रुक गई।

—क्या?

—बच्चे घर में अकेले मिले। उनमें से 1 बच्चा मुख्य सड़क के पास नंगे पैर रोता हुआ मिला। पड़ोसी ने पुलिस को फोन किया।

नंदिनी का गला सूख गया।

—मैं वहां नहीं थी। मुझे किसी ने नहीं बताया।

इंस्पेक्टर की आवाज अब और सावधान थी।

—तो आपको आकर बयान देना होगा। क्योंकि कागज पर लिखा है कि बच्चे आपकी निगरानी में थे।

नंदिनी ने आंखें बंद कर लीं।

कल रात उसके “नहीं” को उन्होंने सुना नहीं था।

आज सुबह उसके नाम से झूठ लिख दिया गया था।

और अब 4 बच्चों की जान को दांव पर लगाकर वे उसे फिर उसी पिंजरे में धकेलना चाहते थे।

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भाग 2:

नंदिनी थाने पहुंची तो उसके हाथ में एक नीली फाइल थी, जिसमें पिछले 6 सालों के संदेश, कॉल रिकॉर्ड, छुट्टी के आवेदन, अस्पताल की ड्यूटी शिफ्ट और प्रिया की आवाज वाले audio सुरक्षित थे। इंस्पेक्टर राघव सिंह ने उसे एक छोटी मेज के सामने बैठाया और पहले ही वाक्य में कहा —बच्चे सुरक्षित हैं, मगर मामला छोटा नहीं है। सबसे छोटा बच्चा, रोहन, सोसाइटी के गेट के बाहर मिला था। नंदिनी का चेहरा पीला पड़ गया। उसने तुरंत कहा —मैंने बच्चों को नहीं छोड़ा, मैं कल रात उस घर से निकल गई थी और फिर वापस नहीं गई। इंस्पेक्टर ने पारदर्शी थैली में रखा एक कागज उसके सामने रखा। उस पर लिखा था, “नंदिनी दीदी बच्चों के साथ हैं। हम डॉक्टर के पास जा रहे हैं। उन्हें सब पता है।” नंदिनी ने लिखावट पहचान ली। वह प्रिया की थी। उसने फाइल खोली। पहला संदेश आदित्य का था, “सुबह 8 बजे आ जाना, बच्चों को संभालना है।” नंदिनी का जवाब साफ था, “मैं नहीं आऊंगी।” फिर प्रिया का संदेश था, “तू देख लेना, घर से मुंह मोड़ने वाली लड़की कभी चैन से नहीं रहती।” फिर सरोज देवी की voice note चली, जिसमें वह कह रही थीं —बिना शादी की लड़की अगर अपने भाई के बच्चों के काम न आए तो ऐसी पढ़ाई किस काम की? इंस्पेक्टर ने स्क्रीन पर नजर टिकाए रखी। उसने पूछा —क्या आपने आज सुबह किसी जिम्मेदारी के लिए हां कहा था? नंदिनी ने कहा —नहीं। —क्या आपको बच्चों के अकेले छोड़े जाने की जानकारी थी? —नहीं। तभी बाहर से तेज आवाजें आने लगीं। सरोज देवी रोते हुए भीतर घुसीं। उनके पीछे आदित्य, प्रिया और महेंद्रनाथ थे। प्रिया पेट पर हाथ रखकर चिल्लाई —एक गर्भवती औरत पर पुलिस बुलाकर तू खुश है? इंस्पेक्टर ने सख्ती से कहा —पुलिस को आपकी पड़ोसी ने बुलाया था, क्योंकि आपका बच्चा सड़क पर था। आदित्य ने नंदिनी की तरफ उंगली उठाई। —इसकी आदत है drama करने की। यह हमेशा बच्चों को देखती है। नंदिनी धीरे से खड़ी हुई। —हमेशा देखना और आज जिम्मेदारी लेना एक बात नहीं है। इंस्पेक्टर ने कागज मेज पर रखा। —यह नोट किसने लिखा? सब चुप हो गए। प्रिया ने नजरें झुका लीं। तभी थाने का दरवाजा खुला और उनकी सोसाइटी की बुजुर्ग पड़ोसी शकुंतला आंटी अंदर आईं। उनके हाथ में मोबाइल था। उन्होंने कांपती आवाज में कहा —साहब, मेरे camera में सब record है। सुबह 6:12 पर ये लोग बच्चों को घर में बंद करके निकले थे। नंदिनी वहां आई ही नहीं।

भाग 3:

इंस्पेक्टर राघव सिंह ने शकुंतला आंटी के मोबाइल की तरफ हाथ बढ़ाया।

कमरे में मौजूद हर चेहरा बदल गया।

सरोज देवी का रोना अचानक बंद हो गया। आदित्य की गर्दन तन गई। प्रिया के चेहरे पर पहली बार घबराहट साफ दिखाई दी। महेंद्रनाथ ने चश्मा उतारकर हथेली में दबा लिया, जैसे उन्हें पहले से अंदाजा था कि सच अब बचने वाला नहीं।

मोबाइल में CCTV फुटेज खुली।

सुबह 6:12।

शर्मा कोठी का मुख्य दरवाजा।

आदित्य नीली शर्ट में जल्दी-जल्दी बाहर आता दिखा। उसके हाथ में कार की चाबी थी। प्रिया पीछे थी, हाथ में पर्स और मोबाइल। सरोज देवी दरवाजे पर खड़ी थीं। अंदर से मीरा की रोने की आवाज सुनाई दे रही थी। वीडियो में प्रिया मुड़कर कुछ कहती दिखी, फिर दरवाजा बाहर से बंद कर दिया गया।

इंस्पेक्टर ने वीडियो रोक दिया।

—इस समय नंदिनी शर्मा कहां दिख रही हैं?

किसी ने जवाब नहीं दिया।

शकुंतला आंटी बोलीं।

—साहब, मैं दूध लेने निकली थी। मुझे लगा घर में कोई बड़ा होगा। फिर 7 बजे के बाद रोहन बाहर गेट के पास मिला। पता नहीं कैसे अंदर से पिछला दरवाजा खुल गया। बच्चा रोते-रोते सड़क की तरफ जा रहा था।

नंदिनी ने सांस रोक ली। रोहन की उम्र 4 साल थी। वह अक्सर डरने पर अपनी चप्पल भी ठीक से नहीं पहन पाता था। सड़क पर सुबह के school vans, दूध वाले, बाइक और तेज गाड़ियां चलती थीं। सिर्फ एक गलती, और सब खत्म हो सकता था।

उसने आदित्य की तरफ देखा।

—तुमने सच में बच्चों को बंद करके छोड़ दिया?

आदित्य ने तुरंत कहा।

—हम 20 मिनट के लिए गए थे।

इंस्पेक्टर ने कठोर आवाज में पूछा।

—कहां?

प्रिया बोली।

—Doctor के पास। मेरी तबीयत खराब थी।

इंस्पेक्टर ने कागज उठाया।

—तो फिर नोट में क्यों लिखा कि नंदिनी दीदी बच्चों के साथ हैं?

प्रिया चुप रही।

—और अगर आप doctor के पास गए थे, तो बच्चों को साथ क्यों नहीं ले गए? पड़ोसी को क्यों नहीं बताया? किसी relative को फोन क्यों नहीं किया?

आदित्य अब चिढ़ गया।

—साहब, घर का मामला है। हम संभाल लेंगे।

इंस्पेक्टर की आंखें सख्त हो गईं।

—जब 4 साल का बच्चा सड़क पर मिलता है, तब वह सिर्फ घर का मामला नहीं रहता।

यह सुनते ही प्रिया ने कुर्सी पकड़ ली।

—मैं pregnant हूं। मुझे stress मत दीजिए।

नंदिनी की आवाज पहली बार टूटकर बाहर आई।

—तुम्हें stress की चिंता है, लेकिन रोहन की जान की नहीं?

प्रिया ने उसे घूरा।

—तू चुप रह। अगर तू जिद न करती तो ये सब होता ही नहीं।

नंदिनी ने सिर हिलाया।

—नहीं प्रिया। अगर तुम अपने बच्चों को अपनी जिम्मेदारी मानती, तो ये सब नहीं होता।

सरोज देवी ने हाथ जोड़ दिए।

—नंदू, बेटी, बात बढ़ा मत। परिवार की इज्जत है।

नंदिनी की आंखों में आग भर आई।

—मां, परिवार की इज्जत बच्चे की जान से बड़ी कब हो गई?

सरोज देवी ने होंठ भींच लिए।

महेंद्रनाथ ने धीमे से कहा।

—सरोज, अब चुप रहो।

सबने उनकी तरफ देखा। इतने सालों में शायद पहली बार उन्होंने इतने साफ शब्दों में पत्नी को रोका था।

इंस्पेक्टर ने प्रिया से पूछा।

—नोट आपने लिखा?

प्रिया ने गर्दन झुका ली।

—मैंने सोचा था नंदिनी आ जाएगी।

—मेरे सवाल का जवाब दीजिए।

—हां, मैंने लिखा।

—क्या नंदिनी ने जिम्मेदारी स्वीकार की थी?

प्रिया ने आदित्य की तरफ देखा।

आदित्य ने नजर फेर ली।

—नहीं।

यह 1 शब्द जैसे थाने की दीवारों से टकराकर वापस आया।

नहीं।

नंदिनी ने जिम्मेदारी नहीं ली थी।

नंदिनी वहां नहीं थी।

नंदिनी झूठी नहीं थी।

नंदिनी स्वार्थी नहीं थी।

वह सिर्फ इंसान थी, जिसके पास अपना जीवन था।

इंस्पेक्टर ने रिपोर्ट लिखी। बाल संरक्षण विभाग को सूचना दी गई। बच्चों की medical जाँच हुई। सोसाइटी के CCTV, पड़ोसी का बयान और नंदिनी के संदेश सब दर्ज हुए। आदित्य और प्रिया को औपचारिक चेतावनी मिली, और अगले 3 महीनों के लिए बच्चों की सुरक्षा योजना जमा करने का आदेश दिया गया। घर में आया रखने, स्कूल transport की व्यवस्था करने और emergency contact list पुलिस व बाल संरक्षण अधिकारी को देने की शर्त रखी गई।

मगर असली सजा कागज पर नहीं लिखी गई थी।

असली सजा वह थी जब प्रिया पहली बार थाने से बाहर निकलते हुए लोगों की नजरों से बच रही थी।

असली सजा वह थी जब आदित्य को अपने पिता के सामने सिर झुकाना पड़ा।

असली सजा वह थी जब सरोज देवी को समझ आया कि जिस बेटी को वे “खाली” समझती थीं, उसी बेटी ने वर्षों तक उनके बेटे का घर मुफ्त में संभाला था।

थाने से बाहर आते समय मीरा नंदिनी को देखते ही दौड़ी।

—नंदू बुआ!

बच्ची को बाल संरक्षण अधिकारी ने थोड़ी देर के लिए बाहर बैठाया था। उसकी आंखें रो-रोकर सूज गई थीं। नंदिनी झुककर उसे सीने से लगा लिया।

—बुआ, आप नाराज हो?

नंदिनी ने उसकी पीठ सहलाई।

—तुमसे नहीं, कभी नहीं।

—तो आप आओगी न घर?

नंदिनी के गले में शब्द अटक गए।

—मैं मिलने आऊंगी, लेकिन मैं तुम्हारे मम्मी-पापा की जगह नहीं बन सकती।

मीरा को बात पूरी समझ नहीं आई, पर उसने नंदिनी का चेहरा पकड़कर कहा।

—आप अच्छी बुआ हो।

नंदिनी वहीं टूट गई। लेकिन उसने आंसू पोंछ लिए, क्योंकि अब उसका टूटना भी किसी और के काम नहीं आना था।

उस शाम वह अपने फ्लैट लौटी तो घर अजीब शांत था। पहले यह शांति उसे काटती थी। आज वही शांति उसे बचा रही थी।

फोन लगातार बज रहा था।

आदित्य का संदेश आया।

“तूने मेरी नौकरी, मेरी इज्जत, सब खतरे में डाल दिया।”

फिर प्रिया का संदेश।

“5वें बच्चे की मां को इतना अपमानित करके तुझे क्या मिला?”

फिर मां का संदेश।

“बेटी, तूने घर तोड़ दिया।”

नंदिनी ने तीनों संदेश पढ़े। पहली बार उसकी उंगलियां जवाब लिखने को नहीं दौड़ीं।

उसने सिर्फ 1 वाक्य लिखा।

“घर मैंने नहीं तोड़ा, मैंने सिर्फ दरवाजा खोल दिया ताकि सब देख सकें अंदर क्या हो रहा था।”

फिर उसने फोन बंद कर दिया।

अगले 30 दिन कठिन थे। रविवार को वह खुद ही चाय बनाती, खुद ही नाश्ता करती और खिड़की से बाहर देखते हुए सोचती कि क्या सच में अकेलापन इतना बुरा होता है। फिर उसे याद आता कि भीड़ में अदृश्य रहना अकेले रहने से ज्यादा दर्द देता है।

वह फिर से अपने जीवन में लौटने लगी।

शनिवार को कथक क्लास जॉइन की, जिसे उसने 4 साल पहले रोहन की बीमारी के कारण छोड़ा था।

एक शाम सहेली समीरा के साथ हजरतगंज में कॉफी पीने गई और पूरा फोन silent रखा।

अस्पताल में उसने अतिरिक्त shift लेना बंद कर दिया, क्योंकि अब उसे किसी की स्कूल pickup के लिए पैसे जोड़ने की जरूरत नहीं थी।

धीरे-धीरे लोग भी बदलने लगे।

महेंद्रनाथ ने 1 दिन उसे फोन किया। उनकी आवाज भारी थी।

—नंदिनी, मैंने बहुत देर से समझा।

वह खिड़की के पास खड़ी थी।

—क्या समझा, पापा?

—कि चुप रहना भी अन्याय में शामिल होना होता है।

नंदिनी कुछ नहीं बोली।

महेंद्रनाथ बोले।

—तू जब छोटी थी, तो हर बात पर कहती थी कि मैं अपनी जिंदगी खुद बनाऊंगी। हमने सोचा था जिद है। पर शायद वही तेरी ताकत थी।

नंदिनी की आंखें नम हो गईं।

—पापा, मुझे आपसे लड़ना नहीं था। मुझे बस दिखना था।

दूसरी तरफ लंबी चुप्पी रही।

—अब दिख रही है, बेटी।

वह फोन रखकर काफी देर तक रोती रही। यह दुख का रोना नहीं था। यह उन वर्षों की थकान थी, जिन्हें किसी ने पहली बार नाम दिया था।

3 महीने बाद बाल संरक्षण अधिकारी की follow-up बैठक हुई। आदित्य और प्रिया ने घर में trained nanny रखी थी। बच्चों के लिए अलग transport था। emergency contacts में नंदिनी का नाम नहीं था। यह देखकर उसका दिल अजीब तरह से हल्का हुआ।

प्रिया उस दिन भी उससे ठीक से नहीं बोली। मगर उसकी आंखों में पहले जैसा विष नहीं था, बल्कि ऐसी बेचैनी थी जैसे उसे पहली बार अपनी सुविधा की कीमत समझ आई हो।

बैठक के बाद आदित्य बाहर आया।

—नंदू।

नंदिनी रुकी।

वह कुछ सेकंड चुप रहा।

—मैंने गलत किया।

यह वाक्य छोटा था, अधूरा था, शायद बहुत देर से आया था। लेकिन नंदिनी ने उसे सुना।

—गलती बच्चों को छोड़ना नहीं थी सिर्फ —उसने कहा— गलती यह थी कि तुमने मान लिया था मैं मना करने का अधिकार नहीं रखती।

आदित्य की आंखें झुक गईं।

—मुझे लगा तू family के लिए कर देगी।

—मैं family के लिए बहुत कुछ करती रही। लेकिन तुम लोगों ने मुझे family नहीं, सुविधा समझा।

आदित्य ने जवाब नहीं दिया।

उसी समय काव्या बाहर आई। उसके हाथ में drawing थी। उसमें एक घर बना था, 4 बच्चे थे, मम्मी-पापा थे, दादा-दादी थे और एक महिला नीले दुपट्टे में थोड़ी दूर खड़ी थी।

काव्या ने drawing नंदिनी को दी।

—बुआ, ये आप हो। टीचर ने बोला family बनाओ। मैंने आपको भी बनाया।

नंदिनी का दिल कांप गया।

—मैं इतनी दूर क्यों खड़ी हूं?

काव्या ने मासूमियत से कहा।

—क्योंकि आप अब जल्दी चली जाती हो। लेकिन आप फिर भी हमारी family हो।

नंदिनी ने drawing सीने से लगा ली।

उसने समझा कि बच्चों ने कभी उसे इस्तेमाल नहीं किया था। वे तो बस वही सीख रहे थे जो बड़े उन्हें दिखा रहे थे।

6 महीने बाद प्रिया ने 5वें बच्चे को जन्म दिया। घर में फिर मिठाई बंटी। इस बार सरोज देवी ने नंदिनी को फोन किया।

—रविवार को आ सके तो आ जाना। सिर्फ मिलने। कोई काम नहीं कहूंगी।

नंदिनी ने कुछ पल सोचा।

—आऊंगी। लेकिन अगर किसी ने मुझे बच्चों की जिम्मेदारी देकर खुद गायब होने की कोशिश की, तो मैं तुरंत निकल जाऊंगी।

सरोज देवी ने पहली बार बिना बहस कहा।

—ठीक है।

रविवार को नंदिनी सफेद चिकनकारी कुर्ते में कोठी पहुंची। वही बड़ा भोजन कक्ष था, वही कृष्ण भगवान का फ्रेम, वही बच्चों की आवाजें। फर्क सिर्फ इतना था कि इस बार कोने में nanny बैठी थी, बच्चों के बैग व्यवस्थित रखे थे, और सरोज देवी बार-बार नंदिनी की थाली में जबरन कुछ रखने से पहले पूछ रही थीं।

महेंद्रनाथ ने उसके लिए पानी डाला।

—आज बहुत अच्छी लग रही है।

नंदिनी मुस्कुराई।

—शायद क्योंकि आज थकी हुई नहीं हूं।

प्रिया बच्चे को लेकर आई। उसके चेहरे पर संकोच था। उसने धीरे से कहा।

—थोड़ी देर पकड़ोगी?

कमरा जम गया।

नंदिनी ने बच्चे की तरफ देखा। छोटा सा चेहरा, बंद आंखें, गुलाबी हाथ। वह किसी का अपराध नहीं था। वह बस एक नया जीवन था।

—हां —नंदिनी ने कहा— थोड़ी देर।

उसने बच्चे को गोद में लिया। सावधानी से सिर संभाला। बच्चे ने नींद में उंगली हिलाई और नंदिनी के दुपट्टे को छू लिया।

प्रिया वहीं खड़ी रही।

—मैं बस पानी पीकर आती हूं।

नंदिनी ने उसकी आंखों में देखा।

—मैं 5 मिनट यहीं हूं।

प्रिया ने सिर हिलाया।

—5 मिनट।

यह छोटा सा उत्तर उस घर में बहुत बड़ा बदलाव था।

कुछ देर बाद प्रिया वापस आई और बच्चे को ले लिया। नंदिनी ने मुस्कुराकर उसे सौंप दिया। फिर वह उठी।

—मैं चलती हूं।

सरोज देवी चौंकीं।

—अभी? खाना तो खा ले।

—खा लिया। अब आराम करूंगी।

इस बार किसी ने नहीं कहा कि रुकना ही पड़ेगा।

किसी ने नहीं कहा कि परिवार के लिए खुद को भूल जा।

किसी ने नहीं कहा कि अकेली लड़की का समय खाली होता है।

दरवाजे पर मीरा फिर आई और उसके गले लग गई।

—बुआ, आप फिर आना।

नंदिनी ने बच्ची के माथे को चूमा।

—आऊंगी। जब मेरा मन होगा। और जब आऊंगी, सिर्फ प्यार लेकर आऊंगी, बोझ नहीं।

रात को अपने फ्लैट में लौटकर उसने खिड़की खोली। बाहर लखनऊ की हवा में कहीं दूर से मंदिर की घंटी सुनाई दे रही थी। मेज पर काव्या की drawing रखी थी। उसने उसे फ्रेम करवाने का फैसला किया।

करीब 12 बजे फोन बजा।

स्क्रीन पर आदित्य का नाम चमक रहा था।

पुरानी नंदिनी होती तो तुरंत उठाती। डरती कि शायद किसी बच्चे को बुखार हो, शायद घर में झगड़ा हो, शायद उसे अभी जाना पड़े।

नई नंदिनी ने फोन को बजने दिया।

कुछ देर बाद संदेश आया।

“कल बात कर सकते हैं? बस बात।”

नंदिनी ने जवाब दिया।

“कल शाम 7 बजे। आज मैं सो रही हूं।”

फिर उसने फोन उल्टा रख दिया।

बत्ती बंद की।

और बरसों बाद पहली बार बिना अपराधबोध के सो गई।

कुछ रिश्ते “नहीं” कहने से टूटते नहीं।

वे पहली बार अपने असली रूप में दिखाई देते हैं।

और नंदिनी ने उस दिन समझ लिया था कि परिवार का अर्थ किसी की जिंदगी पर कब्जा करना नहीं होता।

परिवार वह होता है जहां प्यार जिम्मेदारी से भागता नहीं, और त्याग केवल उसी से नहीं मांगा जाता जो सबसे कम आवाज उठाता है।

उसके कमरे में शांति थी।

पर इस बार वह शांति खालीपन नहीं थी।

वह उसकी अपनी चुनी हुई आजादी थी।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.