Posted in

“अगर बच्ची सच बोल देगी, तो हवेली जल जाएगी” — लालची ताऊ ने घायल माँ को अदालत में नीचा दिखाया; मगर दरवाजे से टिकाई सूखी शाखा ने एक ऐसा राज छेड़ दिया जिसे सब दबा चुके थे।

भाग 1:
5 साल की बच्ची ने टूटी हुई नीम की शाखा दोनों हाथों से उठाकर वीर प्रताप सिंह की छाती की तरफ तान दी, जबकि उसकी माँ पीछे सूखी धरती पर बेहोश पड़ी आखिरी साँसों से लड़ रही थी।

Advertisements

राजस्थान के जैसलमेर से 40 किलोमीटर दूर वह कच्चा रास्ता आम दिनों में सिर्फ चरवाहों, ऊँटों और कभी-कभार पुलिस की जीपों को देखता था। दोपहर की धूप इतनी तेज थी कि रेत से भाप जैसी उठती दिख रही थी। वीर अपने घोड़े बादल पर बैठा सीमा के पास वाले अपने पुराने पशु-फार्म की तरफ लौट रहा था, जब उसे एक चीख सुनाई दी। चीख छोटी थी, लेकिन उसके भीतर ऐसा डर था जैसे किसी ने पूरी दुनिया को एक बच्चे के कंधे पर रख दिया हो।

वह तुरंत घोड़े से उतरकर ढलान की तरफ भागा। झाड़ियों के बीच उसने पहले बच्ची को देखा। धूल से भरा पीला फ्रॉक, सूखे होंठ, पैरों में चप्पल नहीं, आँखों में ऐसी सख्ती जैसे 5 साल की उम्र में ही उसने भरोसे की लाश देख ली हो।

Advertisements

उसके पीछे एक औरत पड़ी थी। माथे पर सूखा खून, बाँहों पर नीले निशान, दाईं कलाई अजीब तरह से मुड़ी हुई, और साँस इतनी हल्की कि कोई लापरवाह आदमी उसे मरा हुआ समझकर आगे निकल जाता।

बच्ची ने शाखा और ऊपर उठाई।

—पास मत आना।

वीर रुक गया। उसने दोनों हाथ ऊपर कर दिए।

—मैं तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा।

बच्ची की आँखों में आग भड़क उठी।

—यही उन्होंने भी कहा था।

वीर का गला सूख गया।

—किसने?

Advertisements

—4 आदमी थे। उन्होंने पापा को मारा, माँ को पत्थर से धक्का दिया, हमारे ऊँट और घोड़े ले गए। फिर बोले कि अगर मैं रोई तो माँ को भी मार देंगे।

वीर ने धीरे से जमीन पर घुटना टेका, ताकि वह बच्ची को बड़ा और डरावना न लगे।

—तुम्हारा नाम क्या है?

बच्ची ने जवाब नहीं दिया। उसने बस अपनी माँ के आँचल का किनारा पैर से दबा लिया, जैसे वह अपनी छोटी एड़ी से मौत को रोक सकती हो।

—तुम कितने समय से यहाँ हो?

उसकी पलकों में धूल चिपकी थी। उसने होंठ भींचे।

—2 दिन।

वीर के भीतर कुछ टूट गया। 2 दिन। 5 साल की बच्ची, बिना खाने, बिना पानी, बिना नींद, अपनी बेहोश माँ के सामने खड़ी रही थी। धूप, सियार, डर, प्यास, सबके खिलाफ। सिर्फ एक सूखी शाखा के सहारे।

—पानी पिया?

—माँ को पहले दिया।

—तुमने?

—थोड़ा।

वीर ने अपनी मशक उतारी और दूर से जमीन पर रख दी।

—मैं इसे यहीं छोड़ रहा हूँ। तुम खुद उठा लो। मैं पास नहीं आऊँगा।

बच्ची ने उसे कुछ पल देखा, फिर बिजली की तरह आगे बढ़ी, मशक उठाई, पीछे हटी, पहले अपनी माँ के होंठों पर बूंदें डालीं। जब औरत ने हल्की खाँसी ली, तब बच्ची के चेहरे पर पहली बार डर दिखा।

—माँ मरेंगी नहीं न?

वीर का जवाब तुरंत नहीं आया। झूठ बोलना आसान था, मगर वह उन आँखों के सामने झूठ नहीं बोल पाया।

—अगर हम उन्हें अभी मेरे फार्म पर ले जाएँ, तो बचने की उम्मीद है।

—फार्म पर कौन है?

—मैं।

—और?

—बस मैं।

बच्ची ने शक से पूछा।

—तुम अकेले क्यों रहते हो?

वीर की आँखों में एक पुराना अँधेरा चमका। 7 साल पहले उसकी पत्नी माला और उनका अजन्मा बच्चा सड़क हादसे में चले गए थे। उसके बाद उसने लोगों से दूरी बना ली थी। फार्म बड़ा था, पर घर में सिर्फ 1 थाली, 1 गिलास, 1 बिस्तर और बहुत सारा सन्नाटा बचा था।

—लंबी कहानी है।

—मेरे पास लंबी कहानी सुनने का समय नहीं है।

वीर पहली बार हल्का-सा मुस्कुराया, मगर मुस्कान तुरंत खो गई।

—ठीक है। अभी तुम्हारी माँ को उठाना जरूरी है।

बच्ची ने शाखा फिर कस ली।

—धीरे उठाना। उनकी पसली में दर्द है। और कलाई मत पकड़ना।

वीर ने सिर हिलाया। वह बहुत सावधानी से औरत के पास गया। बच्ची उसकी हर हरकत देख रही थी। उसने औरत को बाँहों में उठाया, कंधे से सहारा दिया, फिर बादल के पीछे बँधी छोटी गाड़ी तक ले गया। बच्ची पूरे समय उसके पास रही, शाखा हाथ में, आँखें वीर पर।

—तुम्हारी माँ का नाम?

—कावेरी।

—और तुम्हारा?

थोड़ी देर बाद उसने कहा।

—गौरी।

—तुम्हारे पापा?

गौरी का चेहरा पत्थर हो गया।

—रघुवीर राठौड़। वो वापस नहीं आए।

वीर ने कुछ नहीं कहा। उसने कावेरी को गाड़ी में लिटाया, अपना साफा मोड़कर उसके सिर के नीचे रखा और गौरी को बैठने का इशारा किया।

—मैं घोड़े को धीरे चलाऊँगा।

—अगर तुमने हमें कहीं बेचने की कोशिश की तो?

वीर ने उसकी शाखा की तरफ देखा।

—तो तुम मुझे इसी से मार देना।

गौरी ने गंभीरता से सिर हिलाया, जैसे उसने सचमुच फैसला कर लिया हो।

फार्म तक पहुँचते-पहुँचते सूरज ढलने लगा। बड़े लोहे के फाटक पर “प्रताप पशु-आश्रय” लिखा था। अंदर 12 गायें, 3 घोड़े, 2 ऊँट और एक बूढ़ा कुत्ता शेरू था, जो अनजान लोगों पर भौंकता था। लेकिन उस दिन शेरू चुपचाप गाड़ी के पास आया, गौरी के पैरों को सूँघा और वहीं बैठ गया।

गौरी ने पहली बार शाखा थोड़ी नीचे की।

—ये काटता है?

—ज्यादातर गलत लोगों को।

—तो ठीक है।

वीर ने कावेरी को अतिथि कमरे में लिटाया। उसने पुराने फौजी मेडिकल बॉक्स से पट्टियाँ निकालीं, घाव साफ किए, कलाई बाँधी, बुखार की दवा दी। वह डॉक्टर नहीं था, पर सेना में 12 साल रह चुका था। गोली, घाव, टूटी हड्डी और मौत की गंध पहचानना उसने सीमा पर सीखा था।

गौरी पलंग के पास खड़ी रही।

—तुम्हें बैठना चाहिए।

—माँ ने कहा था, जब तक मदद न मिले, हटना मत।

—मदद आ गई है।

—अभी साबित नहीं हुआ।

वीर ने सिर झुका दिया।

रात को उसने गौरी को बाजरे की रोटी, दाल और गुड़ दिया। बच्ची ने पहले थाली को देखा, फिर वीर को।

—इसमें कुछ मिलाया तो नहीं?

—नहीं।

—तुम पहले खाओ।

वीर ने रोटी का टुकड़ा तोड़कर खाया। तब गौरी ने खाना शुरू किया। वह इतनी भूखी थी कि हाथ काँप रहे थे, फिर भी उसने आधी रोटी बचाकर रख दी।

—ये माँ के लिए।

—मैं उनके लिए अलग रख दूँगा।

—नहीं, ये मेरी थाली से। माँ कहती हैं, अपना हिस्सा बाँटना अलग बात होती है।

वीर कुछ पल उसे देखता रह गया।

उस रात गौरी ने पलंग के पास जमीन पर बैठकर नींद से लड़ने की कोशिश की। शाखा उसकी गोद में थी। शेरू दरवाजे पर लेट गया। वीर कमरे के बाहर कुर्सी पर बैठा रहा। 7 साल बाद उसके घर में किसी की साँसों की चिंता थी। उसे डर लगा, मगर वही डर उसे जीवित भी महसूस करा रहा था।

सुबह कावेरी ने आँखें खोलीं। गौरी लगभग चीख पड़ी।

—माँ!

कावेरी की नजर पहले गौरी पर गई, फिर वीर पर। वह तुरंत उठने की कोशिश में दर्द से कराह उठी।

—गौरी… दूर हटो…

—नहीं माँ, ये अच्छे हैं। मैंने परखा है।

कावेरी ने सूखे गले से पूछा।

—रघु?

कमरे में ऐसी चुप्पी फैल गई, जिसमें जवाब खुद मर गया।

गौरी ने माँ का हाथ पकड़ लिया।

—पापा नहीं लौटे।

कावेरी की आँखों से आँसू निकले, लेकिन आवाज नहीं निकली। वीर उठकर बाहर जाने लगा, तभी उसने कावेरी की धीमी फुसफुसाहट सुनी।

—अगर राठौड़ हवेली वालों को पता चला कि गौरी जिंदा है… वो उसे लेने आएँगे।

वीर दरवाजे पर ठिठक गया।

बाहर आँगन में शेरू अचानक जोर से भौंका। फाटक के पास धूल उड़ रही थी। दूर से 2 काली गाड़ियाँ फार्म की तरफ बढ़ती दिखीं।

कमेंट्स में दिए गए लिंक से पूरी कहानी पढ़े 👇

भाग 2:

फाटक खुलने से पहले ही वीर ने गौरी को रसोई के पीछे वाले छोटे कमरे में भेज दिया, मगर बच्ची दरवाजे की दरार से सब देखती रही। काली गाड़ियों से उतरे आदमी गाँव के नहीं लगते थे; सफेद कुर्ते, महंगे चश्मे, हाथों में फाइलें और कमर पर छिपी हुई बंदूकें। उनके बीच मोहनलाल राठौड़ था, कावेरी के दिवंगत पति रघुवीर का बड़ा ताऊ, जिसके बारे में कावेरी ने बाद में बताया कि वह हवेली, जमीन और उस 80 बीघा पुश्तैनी विरासत का असली भूखा था जो गौरी के नाम लिखी गई थी। उसने मीठी आवाज में कहा कि बच्ची को दादी की गोद चाहिए, लेकिन उसकी आँखें हर कोने में संपत्ति ढूँढ़ रही थीं। वीर ने साफ कहा कि माँ के बिना बच्ची कहीं नहीं जाएगी। उसी रात कावेरी ने टूटी आवाज में पूरा सच बताया: रघुवीर ने मरने से 6 महीने पहले वसीयत बदल दी थी, क्योंकि उसे अपने ही रिश्तेदारों पर शक हो गया था। गौरी बालिग होने तक ट्रस्ट की मालकिन थी, और जो भी उसका कानूनी अभिभावक बनता, वही ट्रस्ट चलाता। मोहनलाल ने पहले रघुवीर को समझाया, फिर धमकाया, और जब रघुवीर कावेरी व गौरी को लेकर शहर छोड़ रहा था, तभी रास्ते में हमला हुआ। अगले 5 दिनों में फार्म बदल गया। शेरू गौरी के कमरे के बाहर सोने लगा, घोड़ी चंपा को गौरी ने “लड्डू” नाम दे दिया, और वीर ने पहली बार अपने बंद पड़े आँगन में बच्चों की हँसी सुनी। कावेरी धीरे-धीरे चलने लगी, मगर डर उसके चेहरे से नहीं गया। फिर जिला अदालत से नोटिस आया: मोहनलाल राठौड़ ने गौरी की कस्टडी माँगी थी, आरोप लगाया था कि कावेरी मानसिक रूप से अस्थिर है और वीर एक अजनबी पुरुष है जिसने विधवा और बच्ची को अपने घर में रखकर समाज की मर्यादा तोड़ी है। सुनवाई 12 दिन बाद थी। रात भर वीर छत पर बैठा रहा। सुबह उसने कावेरी से कहा कि कानून रिश्ते देखता है, शक नहीं। अगर वह चाहे तो वह उससे कागज पर शादी कर सकता है, सिर्फ गौरी की सुरक्षा के लिए। कावेरी का चेहरा सफेद पड़ गया, क्योंकि उसके पति की चिता की राख अभी उसके मन में ठंडी भी नहीं हुई थी। लेकिन उसी समय कमरे से गौरी की आवाज आई कि अगर शादी से माँ उसके पास रहेगी, तो वह बारात में अपनी शाखा लेकर खड़ी होगी। 3 दिन बाद मंदिर में बिना शोर, बिना बैंड, बिना मेहमान, कावेरी और वीर ने सात फेरे लिए। गौरी ने दोनों के हाथों पर अपना छोटा हाथ रखा। मगर उसी शाम मोहनलाल का दूसरा नोटिस आया। उसमें लिखा था कि शादी झूठी है, और उसके पास ऐसा गवाह है जो अदालत में साबित करेगा कि वीर प्रताप सिंह ने कावेरी को छुपाकर राठौड़ संपत्ति हड़पने की साजिश की है। सबसे नीचे एक नाम था, जिसे देखकर वीर का चेहरा राख हो गया: महेंद्र प्रताप सिंह, उसका अपना बड़ा भाई।

भाग 3:

अदालत वाले दिन सुबह जैसलमेर की हवा भी भारी लग रही थी। कावेरी ने सफेद सूती साड़ी पहनी, माथे पर हल्की पट्टी अब भी थी। गौरी ने अपना पीला फ्रॉक नहीं पहना; उसने वीर द्वारा लाया हुआ नीला सलवार-कुर्ता पहना, लेकिन टूटी नीम की शाखा छोड़ने को तैयार नहीं हुई।

—इसे अदालत में नहीं ले जा सकते, गौरी।

कावेरी ने धीरे से कहा।

गौरी ने शाखा को सीने से लगा लिया।

—तो बाहर रख दूँगी। पर ये साथ जाएगी। इसने 2 दिन माँ को बचाया था।

वीर ने उसे रोकना ठीक नहीं समझा। कुछ चीजें हथियार नहीं होतीं, सहारा होती हैं।

जिला अदालत के बाहर भीड़ थी। राठौड़ परिवार की 3 गाड़ियाँ, 4 वकील, 2 स्थानीय नेता, और मोहनलाल की पत्नी प्रभा देवी, जो रोने का नाटक करने में मशहूर थी। जैसे ही गौरी उतरी, प्रभा देवी ने अपना आँचल फैलाया।

—मेरी पोती, आ जा। इस अजनबी के घर में कितने दिन रहेगी?

गौरी वीर के पीछे छिपी नहीं। वह सामने खड़ी हो गई।

—आपने मुझे पिछली बार कुलच्छनी कहा था।

प्रभा देवी की आँखें फैल गईं।

—बच्चे गलत याद रखते हैं।

—मैंने 2 दिन धूप में खड़े होकर सब याद करना सीख लिया।

भीड़ में फुसफुसाहट दौड़ गई।

मोहनलाल ने वीर की तरफ देखकर मुस्कुराया।

—फौजी आदमी हो, वीर। सरहद पर बहादुरी अच्छी लगती है। परिवार के मामलों में नहीं।

वीर की आवाज शांत थी।

—बच्ची को लूटना परिवार का मामला नहीं होता।

कावेरी ने गौरी का हाथ पकड़ा और भीतर चली गई।

अदालत में मोहनलाल की तरफ से वकील शर्मा खड़ा हुआ। उसने कावेरी को कमजोर, अस्थिर, गरीब और निर्भर दिखाने की कोशिश की। उसने कहा कि विधवा औरत का अचानक किसी अजनबी से विवाह करना समाज और कानून दोनों के लिए संदेहास्पद है। उसने राठौड़ हवेली की तस्वीरें दिखाईं, अंग्रेजी स्कूल की रसीदें दिखाईं, डॉक्टरों के नाम गिनाए, और कहा कि गौरी जैसी बच्ची को “सम्मानित खानदान” में पलना चाहिए।

फिर उसने वीर की तरफ इशारा किया।

—और यह आदमी? 7 साल से अकेला रहने वाला, पत्नी की मृत्यु के बाद समाज से कटा हुआ, अचानक एक घायल विधवा को घर लाता है, फिर 8 दिन में शादी कर लेता है। क्या यह सेवा है या संपत्ति पर नजर?

कावेरी ने आँखें बंद कर लीं। वीर की मुट्ठियाँ कस गईं।

न्यायाधीश अरोड़ा ने कागज पलटे।

—गवाह बुलाइए।

दरवाजा खुला। महेंद्र प्रताप सिंह भीतर आया। वीर का बड़ा भाई। वही महेंद्र, जिसने पिता की मृत्यु के बाद जमीन बाँटते समय वीर को अकेला छोड़ दिया था। वही आदमी, जो 7 साल से वीर के घर नहीं आया था। आज वह मोहनलाल के साथ खड़ा था।

शर्मा ने पूछा।

—क्या आप वीर प्रताप सिंह को जानते हैं?

—हाँ, मेरा छोटा भाई है।

—क्या वह 7 साल से अकेला रहता था?

—हाँ।

—क्या उसने कभी किसी विधवा या बच्चे को अपने घर में रखा?

—नहीं।

—क्या आपको लगता है कि उसकी यह शादी स्वाभाविक है?

महेंद्र ने वीर की तरफ देखा। उसके चेहरे पर शर्म नहीं थी।

—नहीं। मुझे लगता है कि यह शादी मजबूरी और लालच में हुई है।

कावेरी काँप गई। गौरी ने उसकी उँगलियाँ कस लीं।

शर्मा ने संतोष से कहा।

—क्या वीर प्रताप सिंह को पैसों की जरूरत थी?

महेंद्र ने सिर हिलाया।

—फार्म घाटे में था। बैंक का कर्ज था। अगर उसे राठौड़ ट्रस्ट तक पहुँच मिलती, तो उसका सब ठीक हो जाता।

अदालत में शोर उठ गया। वीर ने पहली बार महेंद्र को सीधे देखा।

—भैया, आपने यह कैसे कह दिया?

महेंद्र ने नजर फेर ली।

न्यायाधीश ने मेज पर हथौड़ा मारा।

—शांति रखिए।

अब कावेरी के वकील, बुजुर्ग और तेज दिमाग वाले अधिवक्ता इकबाल खान उठे। वह वीर के पुराने फौजी साथी के पिता थे, और उन्होंने यह केस पैसे के लिए नहीं लिया था।

—महेंद्र जी, आपने कहा फार्म घाटे में था। क्या आपके पास बैंक का कोई दस्तावेज है?

—नहीं, पर गाँव में सब जानते हैं।

—गाँव में सब यह भी जानते हैं कि आपने 2 साल पहले वीर की जमीन खरीदने की कोशिश की थी?

महेंद्र चुप हो गया।

—क्या यह सच है कि वीर ने आपको जमीन बेचने से मना कर दिया था?

—पर उसका इस केस से क्या—

—जवाब दीजिए।

—हाँ।

—क्या यह भी सच है कि मोहनलाल राठौड़ ने पिछले महीने आपसे मुलाकात की थी?

महेंद्र के होंठ सूख गए।

—सामान्य मुलाकात थी।

इकबाल खान ने फाइल खोली।

—सामान्य मुलाकात में 15 लाख का चेक दिया जाता है?

अदालत में सनसनी फैल गई। मोहनलाल की गर्दन तन गई। शर्मा तुरंत खड़ा हुआ।

—आपत्ति!

इकबाल खान ने कागज हवा में उठाया।

—बैंक स्टेटमेंट। चेक मोहनलाल राठौड़ की कंपनी से महेंद्र प्रताप सिंह के खाते में गया। तारीख नोटिस भेजे जाने से 1 दिन पहले की है।

न्यायाधीश ने दस्तावेज मंगाया। महेंद्र की आवाज टूटने लगी।

—वो… पुराना लेन-देन था।

—किस बात का?

महेंद्र चुप।

अब इकबाल खान ने दूसरा कागज निकाला।

—और यह मोबाइल लोकेशन रिपोर्ट। हमले वाली रात आपका फोन उसी कच्चे रास्ते के पास था, जहाँ रघुवीर राठौड़ मारे गए।

कावेरी का चेहरा जम गया। गौरी ने कुछ समझा नहीं, पर उसने अपनी माँ की साँस बदलते महसूस की।

मोहनलाल अचानक खड़ा हुआ।

—यह झूठ है!

इकबाल खान ने शांत आवाज में कहा।

—झूठ या सच, पुलिस जाँच करेगी। लेकिन अदालत को इतना समझना होगा कि जो लोग इस बच्ची की कस्टडी माँग रहे हैं, वे सिर्फ दादी-दादा नहीं, संपत्ति के दावेदार भी हैं।

शर्मा ने मामला पलटने की कोशिश की।

—भावनाओं से कानून नहीं चलता। बच्ची से पूछिए। वह 5 साल की है। उसे क्या मालूम सुरक्षा किसे कहते हैं?

न्यायाधीश अरोड़ा ने गौरी की तरफ देखा।

—गौरी राठौड़, क्या तुम कुछ कहना चाहती हो?

कावेरी घबरा गई।

—माननीय न्यायाधीश, वह बच्ची है…

—बच्चे कभी-कभी वह सच बताते हैं, जिसे बड़े लोग फाइलों में छुपा देते हैं।

गौरी धीरे-धीरे आगे आई। उसकी शाखा बाहर दरवाजे के पास रखी थी, लेकिन उसकी चाल में वही पहरा था।

न्यायाधीश ने नरम आवाज में पूछा।

—तुम किसके साथ रहना चाहती हो?

—माँ के साथ।

—और वीर प्रताप सिंह?

गौरी ने पीछे मुड़कर वीर को देखा।

—उनके साथ भी।

—क्यों?

गौरी ने बहुत सोचकर कहा।

—क्योंकि उन्होंने मेरी माँ को उठाते समय उनकी कलाई नहीं पकड़ी। मैंने उन्हें बताया था कि वहाँ दर्द है, और उन्होंने याद रखा।

अदालत में सन्नाटा फैल गया।

—और?

—उन्होंने मुझे खाना दिया, पर पहले खुद खाया, क्योंकि मुझे डर था। उन्होंने मेरी शाखा फेंकी नहीं। उन्होंने उसे कमरे की दीवार के पास रखा, ताकि मैं सोते समय देख सकूँ। शेरू को मेरे दरवाजे पर सोने दिया। और जब मैंने उनकी घोड़ी का नाम लड्डू रखा, उन्होंने कहा नहीं कि यह मेरी घोड़ी है, तुम कौन होती हो।

न्यायाधीश ने पूछा।

—तुम्हें राठौड़ हवेली याद है?

गौरी का चेहरा सख्त हो गया।

—हाँ। वहाँ मुझे चुप रहना पड़ता था। दादी कहती थीं कि लड़कियाँ ज्यादा सवाल करें तो घर की इज्जत गिरती है। मोहन ताऊ पापा से कहते थे कि गौरी को माँ से दूर करो, नहीं तो वसीयत बिगड़ जाएगी।

मोहनलाल के चेहरे से रंग उतर गया।

शर्मा घबरा गया।

—माननीय, बच्ची को सिखाया गया है।

गौरी तुरंत मुड़ी।

—मुझे किसी ने नहीं सिखाया। 2 दिन तक माँ बेहोश थीं। तब कोई नहीं था सिखाने वाला।

यह वाक्य अदालत की दीवारों से टकराकर जैसे सबके भीतर उतर गया।

फिर कावेरी को कटघरे में बुलाया गया। शर्मा ने तीखे सवाल किए।

—क्या आपने वीर प्रताप सिंह से इसलिए शादी की कि अदालत में आपको फायदा मिले?

कावेरी ने सीधा जवाब दिया।

—हाँ।

भीड़ में हलचल हुई। शर्मा मुस्कुराया।

—तो आप मानती हैं कि यह विवाह रणनीति था?

कावेरी की आँखें भीग गईं, पर आवाज नहीं टूटी।

—रणनीति नहीं, ढाल था। एक माँ अपनी बच्ची को उन लोगों से बचाने के लिए किसी भी दरवाजे पर दस्तक देती है, जिन्होंने उसके पति को रास्ते में मरने के लिए छोड़ दिया। वीर ने दरवाजा खोला। उसने बदले में मेरा पैसा, जमीन, नाम कुछ नहीं माँगा। उसने सिर्फ कहा कि बच्ची सुरक्षित रहे।

—क्या आप वीर से प्रेम करती हैं?

यह सवाल हवा में तीर की तरह गया। कावेरी चुप हो गई। वीर ने सिर झुका लिया।

कुछ पल बाद कावेरी ने कहा।

—मुझे नहीं पता प्रेम इतने जल्दी किस नाम से आता है। पर जब मेरी बेटी डरकर जागती है, तो वह पहले मुझे पुकारती है और फिर उसे। शायद परिवार वहीं बनता है जहाँ बच्चा दूसरी बार भी किसी को पुकार सके।

वीर की आँखें भर आईं।

अब अदालत ने वीर को बुलाया। शर्मा ने आखिरी हमला किया।

—अगर आपका लगाव सच्चा है, तो क्या आप अपनी पूरी फार्म-जमीन गौरी के नाम सुरक्षा के रूप में लिख देंगे, ताकि साबित हो कि आप राठौड़ ट्रस्ट के लिए नहीं आए?

कावेरी ने घबराकर वीर की तरफ देखा।

—नहीं, यह मत कीजिए…

वीर ने न्यायाधीश की तरफ देखा।

—मैं तैयार हूँ।

अदालत जम गई।

—यह जमीन मेरे पिता की थी। मेरे पास और कुछ नहीं। लेकिन एक बच्ची की सुरक्षा जमीन से बड़ी है। अगर कल को कावेरी मुझे छोड़कर भी चली जाए, तो भी गौरी के सिर पर छत रहेगी।

गौरी ने पहली बार रोना शुरू कर दिया। वह आवाज दबाकर रो रही थी, जैसे उसे अब भी लगता था कि ज्यादा रोने से माँ परेशान हो जाएगी।

न्यायाधीश अरोड़ा ने फाइल बंद कर दी।

—इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी।

फैसले से पहले 45 मिनट का विराम हुआ। बाहर बरामदे में कावेरी, वीर और गौरी साथ बैठे। शेरू अदालत में नहीं था, लड्डू फार्म पर थी, शाखा दरवाजे के पास टिकाई थी। लेकिन गौरी बार-बार उसे देखती रही।

वीर ने धीरे से पूछा।

—डर लग रहा है?

गौरी ने सिर हिलाया।

—थोड़ा।

—बहादुरों को भी डर लगता है।

—तो आप बहादुर हैं?

—कभी-कभी।

—माँ बहादुर हैं?

—सबसे ज्यादा।

—और मैं?

वीर ने उसकी तरफ देखा।

—तुमने 2 दिन तक मौत को माँ के पास नहीं आने दिया। तुम हम सबकी कप्तान हो।

गौरी ने आँसू पोंछ लिए।

जब अदालत फिर बैठी, न्यायाधीश ने लंबा आदेश पढ़ा। उन्होंने कहा कि संपत्ति, हवेली, स्कूल और धन महत्वपूर्ण हो सकते हैं, पर बच्चे की इच्छा, माँ से उसका भावनात्मक संबंध, संभावित षड्यंत्र, और कस्टडी माँगने वालों की नीयत उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

फिर उन्होंने साफ कहा।

—गौरी राठौड़ की अभिरक्षा उसकी माँ कावेरी प्रताप सिंह के पास रहेगी। मोहनलाल राठौड़ की याचिका खारिज की जाती है। बैंक लेन-देन और हमले से जुड़े तथ्यों की जाँच पुलिस को सौंपी जाती है।

प्रभा देवी वहीं कुर्सी पर बैठ गईं। मोहनलाल गुस्से में बाहर निकलने लगा, लेकिन दरवाजे पर 2 पुलिसवाले खड़े थे। महेंद्र की आँखें झुक चुकी थीं। वीर ने उसे देखा, मगर कुछ नहीं कहा। कभी-कभी रिश्ते अदालत में नहीं टूटते, सिर्फ वहाँ उनका टूटना दर्ज हो जाता है।

गौरी ने कोई विजय-नारा नहीं लगाया। उसने बस माँ की गोद में चेहरा छिपा लिया और फूटकर रो पड़ी। कावेरी ने उसे ऐसे पकड़ा जैसे 2 दिन बाद नहीं, जन्म के बाद पहली बार बच्ची वापस मिली हो।

फार्म लौटते समय शाम हो रही थी। जैसलमेर की रेत सुनहरी थी। बादल धीरे-धीरे चल रहा था। गौरी माँ की गोद में सो गई थी, हाथ में वही नीम की शाखा थी। वीर गाड़ी चला रहा था। कावेरी ने लंबी चुप्पी के बाद कहा।

—आपको जमीन लिखने की बात नहीं कहनी चाहिए थी।

—क्यों?

—क्योंकि वह आपकी आखिरी निशानी है।

वीर ने दूर फार्म की छत देखी।

—निशानी वह नहीं होती जो कागज पर हो। निशानी वह होती है जो घर को खाली नहीं रहने देती।

कावेरी ने उसकी तरफ देखा।

—यह शादी कागज पर शुरू हुई थी, वीर।

—हाँ।

—लेकिन मैं नहीं चाहती कि यह सिर्फ कागज पर रहे।

वीर ने जवाब देने से पहले गौरी को देखा। बच्ची नींद में बुदबुदाई।

—लड्डू को बताना… हम जीत गए…

कावेरी और वीर दोनों हल्का मुस्कुरा दिए। उस मुस्कान में थकान भी थी, शोक भी, और एक नया आरंभ भी।

फार्म पहुँचते ही शेरू दौड़ता हुआ आया। गौरी जाग गई और सीधे अस्तबल की तरफ भागी।

—लड्डू! हम माँ को वापस ले आए!

घोड़ी ने गर्दन झुकाई। गौरी ने उसकी नाक थपथपाई। शेरू उसके पैरों के पास घूमता रहा। कावेरी दरवाजे पर खड़ी रो रही थी, मगर इस बार आँसू डर के नहीं थे।

वीर आँगन में खड़ा था। वही घर, वही दीवारें, वही पुराना कुआँ, वही चुप्पी। पर अब चुप्पी नहीं बची थी। रसोई में 3 थालियाँ रखी जाने लगीं। दीवार के पास नीम की शाखा टंगी रही, किसी हथियार की तरह नहीं, बल्कि उस दिन की गवाही की तरह जब 5 साल की बच्ची ने हार मानने से इनकार किया था।

कुछ महीने बाद पुलिस जाँच में महेंद्र ने कबूल किया कि उसने रास्ते की खबर मोहनलाल को दी थी। हमला करने वाले पकड़े गए। रघुवीर को न्याय देर से मिला, मगर मिला। राठौड़ हवेली के बड़े फाटक बंद हो गए, और प्रताप फार्म का छोटा फाटक हर शाम गौरी की हँसी से खुलता रहा।

कावेरी ने धीरे-धीरे खेतों का हिसाब सँभालना शुरू किया। वीर ने पशु-आश्रय बढ़ाया। गौरी स्कूल जाने लगी, मगर लौटते ही लड्डू, शेरू और बादल को दिनभर की कहानी सुनाती। कभी-कभी रात को डरकर उठ जाती, तो पहले माँ को पुकारती, फिर धीमे से कहती।

—वीर बाबा?

एक रात वीर दरवाजे पर आया। कावेरी ने उसे देखा, और बिना शब्दों के समझ गई कि यह रिश्ता अब किसी अदालत, किसी कागज, किसी समाज की मोहर से बड़ा हो चुका है।

गौरी ने उनींदी आवाज में पूछा।

—आपने कहा था न, हमें नुकसान नहीं पहुँचाएँगे?

वीर ने उसके सिर पर हाथ रखा।

—कहा था।

—और आप झूठ नहीं बोलते?

—नहीं।

गौरी ने आँखें बंद कर लीं।

—तो ठीक है। अब सो सकते हैं।

कावेरी ने दीपक बुझा दिया। बाहर नीम की शाखा दीवार पर टँगी थी। हवा चलती तो वह हल्की-सी हिलती, जैसे अब भी पहरा दे रही हो।

कभी-कभी जिंदगी तलवार, अदालत या दौलत से नहीं बचती। कभी-कभी वह तब बचती है, जब कोई आदमी घोड़े से उतरकर एक डरी हुई बच्ची के सामने हाथ उठा देता है और दुनिया का सबसे सरल वादा निभा देता है।

—मैं तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.