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अस्पताल के सफेद गलियारे में पिता को जब डॉक्टर ने कहा, “बेटी को कभी कैंसर था ही नहीं”, तो मां की ममता का नकाब टूट गया और हर सुबह की रसोई से निकला वह सच, जिसने पूरे घर को जहर बना दिया

PART 1

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“आपकी बेटी को कभी कैंसर था ही नहीं, मिस्टर मल्होत्रा।”

दिल्ली के एम्स के बच्चों वाले वार्ड के बाहर सफेद दीवारें जैसे अचानक अर्जुन मल्होत्रा के ऊपर झुक आईं। उसकी उंगलियों में 7 साल की अनाया की छोटी-सी हथेली थी। अनाया ने अपनी गुलाबी गुड़िया को सीने से ऐसे चिपका रखा था, जैसे वह किसी गहरी नदी में आखिरी तिनका हो। उसके सिर पर बैंगनी टोपी थी, जिसके नीचे से झड़ चुके बालों की जगह सूनी त्वचा झलक रही थी। चेहरा पीला, होंठ सूखे, आंखें इतनी बड़ी और थकी हुई कि लगता था बचपन उससे पहले ही बूढ़ा हो गया हो।

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अर्जुन के मुंह से एक टूटी हुई हंसी निकली।

“डॉक्टर, आप समझ नहीं रहीं। वह 6 महीने से उल्टियां कर रही है। सीढ़ियां नहीं चढ़ पाती। उसके बाल झड़ गए। वह दिन में 14 घंटे सोती है।”

डॉ. मीरा सिन्हा ने स्क्रीन उसकी तरफ घुमाई। उनकी आवाज में करुणा थी, पर शब्द चाकू जैसे थे।

“इसीलिए मैंने आपको बुलाया है। मैंने सारे नए और पुराने टेस्ट दोबारा देखे। कोई ट्यूमर नहीं। कोई कैंसर सेल नहीं। ल्यूकेमिया का कोई मार्कर नहीं। ऐसा कुछ भी नहीं, जो कीमोथेरेपी को सही ठहराए।”

अनाया ने धीरे से चेहरा उठाया।

“पर मम्मी कहती हैं मैं शेरनी हूं।”

अर्जुन के भीतर कुछ टूटकर गिरा। 6 महीने से उसकी पत्नी काव्या यही वाक्य हर जगह दोहरा रही थी। रिश्तेदारों के सामने, पड़ोस की आंटियों के सामने, मंदिर में, व्हाट्सऐप ग्रुप में, और फेसबुक पेज “अनाया की मुस्कान” पर। काव्या सुबह की तकलीफें रिकॉर्ड करती, अस्पताल जाते समय वीडियो बनाती, इंडिया गेट के पास छोटे-छोटे ब्रेसलेट बेचती, दान मांगती और रोते हुए कहती, “मेरी बच्ची लड़ रही है।”

अर्जुन उसे पूजता था। उसे लगता था उसने दुनिया की सबसे मजबूत मां से शादी की है।

“डॉ. रस्तोगी ने कहा था बीमारी बहुत तेज है,” अर्जुन ने बमुश्किल कहा।

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“डॉ. रस्तोगी 1 महीने से छुट्टी पर हैं,” मीरा ने कहा। “और अनाया की फाइल अधूरी है। कई असली रिपोर्ट गायब हैं। मुझे जानना है, घर पर बच्ची क्या-क्या लेती है?”

“विटामिन,” अनाया ने मासूमियत से कहा।

अर्जुन ने चौंककर बेटी को देखा।

“कौन से विटामिन?”

“जो मम्मी दूध में डालती हैं। और सेब की चटनी में भी, जब पेट दुखता है।”

डॉ. मीरा 1 पल के लिए बिल्कुल स्थिर हो गईं। फिर उन्होंने अपना नंबर कागज पर लिखा।

“घर से सब कुछ लाइए। दवाइयां, पाउडर, सिरप, आयुर्वेदिक चूर्ण, दूध का डिब्बा, कॉर्नफ्लेक्स, बिस्किट, कुछ भी। हमें टॉक्सिकोलॉजी टेस्ट करने होंगे।”

“जहर वाला टेस्ट?” अर्जुन की आवाज कांप गई।

“मुझे किसी जहरीले पदार्थ की संभावना हटानी है। और हमें जल्दी करनी होगी।”

घर लौटते समय मेट्रो में अनाया उसके कंधे पर सो गई। अर्जुन खिड़की में अपना चेहरा देख रहा था। 38 साल का आदमी, पर आंखों में कई जन्मों की थकान। उसने अपनी पुरानी रॉयल एनफील्ड बेच दी थी, फिक्स्ड डिपॉजिट तोड़ दिया था, करोल बाग की अपनी छोटी ऑटो पार्ट्स दुकान गिरवी रख दी थी। काव्या ने ऑनलाइन दान शुरू किया था, कहते हुए, “अहंकार से बच्ची नहीं बचती।”

उस रात अनाया के सो जाने के बाद अर्जुन ने रसोई के सारे डिब्बे खोल दिए। कॉर्नफ्लेक्स, हेल्थ ड्रिंक, शहद, तुलसी चाय, बादाम पाउडर, ग्लूटेन-फ्री बिस्किट, सिरप, रंग-बिरंगी विटामिन गोलियां। वह 2 बड़े थैले भर ही रहा था कि काव्या दरवाजे पर आ खड़ी हुई।

“क्या कर रहे हो?”

उसका चेहरा वही था, जिसे पूरा मोहल्ला जानता था—थकी हुई, पर पवित्र मां। पर उस रात अर्जुन ने उसकी आंखों में 1 तेज चमक देखी, इतनी तेज कि प्यार करने वाला आदमी उसे भ्रम भी समझ सकता था।

“डॉक्टर सब जांचना चाहती हैं,” उसने कहा।

काव्या मुस्कुराई।

“ठीक है। अनाया जो खाती है, उसमें सावधानी जरूरी है।”

पर उसकी उंगलियां साड़ी के पल्लू को ऐसे भींच रही थीं, जैसे कोई राज खुलने वाला हो।

अगले दिन अस्पताल में थैले जमा हुए। कुछ शुरुआती रिपोर्ट सामान्य आईं, पर अनाया के खून में भारी धातुओं और दवाइयों के अजीब अंश मिले। डॉ. मीरा ने शाम को फोन किया।

“मिस्टर मल्होत्रा, आपकी बेटी को बार-बार कोई जहरीला पदार्थ मिल रहा है। मुझे घर के खाने के अलग-अलग नमूने चाहिए, बिना किसी को छुए हुए।”

“बिना किसी को छुए हुए” यह वाक्य अर्जुन के दिमाग में कील की तरह धंस गया।

3 दिन तक उसने हर खाने का थोड़ा हिस्सा अलग शीशियों में रखा। काव्या उसे चुपचाप देखती रही। कैमरे पर वह अब भी अनाया का माथा चूमती और कहती, “आज हमारी शेरनी फिर लड़ेगी।”

उसी रात अर्जुन ने फेसबुक पेज पर एक टिप्पणी देखी। एक नाम बार-बार लिखा था—राघव मेहरा।

“दान मत दो। इस औरत ने पहले भी 1 बच्चा बर्बाद किया है।”

अर्जुन ने गुस्से में संदेश भेजा।

“तुम कौन हो मेरी पत्नी और बेटी पर कीचड़ उछालने वाले?”

2 मिनट बाद जवाब आया।

“कल सुबह 9:30। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के सामने चाय की दुकान। अकेले आना। काव्या को मत बताना।”

PART 2

अर्जुन पूरी रात नहीं सोया। सुबह उसने अनाया को अपनी पड़ोसन सावित्री आंटी के पास छोड़ा और स्टेशन पहुंचा। राघव मेहरा कोने की मेज पर बैठा था। आंखें धंसी हुईं, जैसे दुख ने भीतर से उसका चेहरा खा लिया हो।

अर्जुन के बैठने से पहले ही राघव बोला, “तुम्हारी बेटी को कैंसर नहीं है, सही?”

अर्जुन जम गया।

“तुम्हें कैसे पता?”

राघव ने मोबाइल खोला। स्क्रीन पर काव्या की पुरानी तस्वीर थी—सफेद नर्सिंग यूनिफॉर्म में, एक छोटे गंजे बच्चे के बगल में मुस्कुराती हुई।

“मेरे बेटे विवान को भी कैंसर नहीं था,” राघव ने कहा।

अर्जुन की सांस अटक गई।

“तुम कौन हो?”

“वह पिता, जिसने अपने बच्चे को दफना दिया, क्योंकि पूरी दुनिया ने काव्या के आंसुओं पर यकीन किया।”

तभी अर्जुन का फोन बजा। डॉ. मीरा थीं।

“अनाया को तुरंत लाइए। खाने के नमूनों में आर्सेनिक और खून पतला करने वाली दवा के अंश मिले हैं। खासकर कॉर्नफ्लेक्स और सेब की चटनी में।”

अर्जुन की आंखों के आगे अंधेरा छा गया।

डॉ. मीरा की आवाज धीमी थी।

“कोई उसे जहर दे रहा है। और यह 1 बार नहीं हुआ।”

राघव ने आंखें बंद कर लीं।

“सबूत चाहिए, अर्जुन। वरना वह रोएगी, और सब उसे मां कहकर बचा लेंगे।”

PART 3

अर्जुन घर लौटा तो उसके कदमों में आग थी और दिल में बर्फ। उस रात काव्या रसोई में खिचड़ी बना रही थी। रेडियो पर पुराना गाना बज रहा था। वह कभी-कभी गुनगुना भी रही थी, जैसे इस घर में कोई डर, कोई शक, कोई पाप नहीं रहता हो।

अर्जुन ने कुछ नहीं कहा। उसने चुपचाप फ्रिज के ऊपर वाली लकड़ी की शेल्फ में एक छोटा कैमरा छिपा दिया, जिसका मुंह रसोई के स्लैब की तरफ था। अगले सुबह उसने दुकान जाने का नाटक किया। नीचे पार्किंग में कार के अंदर बैठा, मोबाइल खोला और लाइव वीडियो पर नजर गड़ा दी।

सुबह 8:12 पर काव्या रसोई में आई। उसने अनाया का पसंदीदा कटोरा निकाला, वही पीला कटोरा जिस पर छोटे हाथी बने थे। उसने कॉर्नफ्लेक्स डाले, फिर गर्दन घुमाकर गलियारे की तरफ देखा। उसके बाद उसने चीनी के डिब्बे के पीछे हाथ डाला और बिना लेबल की छोटी शीशी निकाली।

अर्जुन का दिल जैसे रुक गया।

काव्या ने 2 सफेद गोलियां निकालीं, चम्मच के पीछे से उन्हें पीसा, पाउडर दूध में मिलाया, फिर कटोरे को ऐसे सजाया जैसे बेटी के लिए प्यार परोस रही हो।

“अनाया, मेरी जान,” उसने मीठी आवाज में पुकारा, “नाश्ता तैयार है।”

अर्जुन भागा। सीढ़ियां 4-4 करके चढ़ा, दरवाजा धक्का देकर खोला और रसोई में ठीक उस पल पहुंचा जब अनाया पहला चम्मच मुंह तक ला रही थी। उसने कटोरा झपटकर जमीन पर दे मारा। दूध और कॉर्नफ्लेक्स फर्श पर फैल गए।

अनाया चीख पड़ी।

काव्या ने अर्जुन को देखा। वह रोई नहीं। घबराई नहीं। उसके चेहरे पर पहली बार असली भाव आया—नफरत।

“तुमने सब खराब कर दिया, अर्जुन,” उसने दांत भींचकर कहा।

दरवाजा पीछे से खुला रह गया था। उसी समय राघव अंदर आया, हाथ में पिस्तौल थी। उसका चेहरा राख जैसा सफेद था।

“नमस्ते, काव्या,” वह बोला। “इस बार तुम्हारे आंसू काम नहीं आएंगे।”

अनाया और जोर से रोने लगी। अर्जुन उसके सामने ढाल बनकर खड़ा हो गया।

“राघव, हथियार नीचे करो,” अर्जुन ने कहा। “वीडियो हमारे पास है। पुलिस आएगी।”

“पुलिस?” राघव हंसा, पर वह हंसी टूटे कांच जैसी थी। “जब विवान मरा था, मैं भी पुलिस गया था। उन्होंने कहा मैं बीमारी स्वीकार नहीं कर पा रहा। उसने वहां भी रोकर पानी मंगवा लिया था।”

काव्या ने अचानक अपना चेहरा बदल लिया। आंखों में आंसू भर आए, आवाज कांप गई।

“अर्जुन, देखो इसे। यह हमारे घर में हथियार लेकर आया है। हमारी बेटी के सामने!”

“हमारी बेटी मत कहो,” अर्जुन ने कठोर आवाज में कहा।

काव्या की पलकें थम गईं।

“किसने उसे रात-रात भर गोद में रखा? किसने डॉक्टरों से बात की? किसने दान जुटाया, जब तुम दुकान में छिपे रहते थे क्योंकि अपनी बेटी को दर्द में नहीं देख पाते थे?”

“तुम उसे दर्द दे रही थीं।”

अनाया सिसकते हुए बोली, “पापा, आप मम्मी को ऐसा क्यों बोल रहे हो?”

अर्जुन के पास कोई ऐसा शब्द नहीं था, जो 7 साल की बच्ची का दिल न तोड़ता।

राघव की पिस्तौल अब भी काव्या की तरफ थी।

“विवान 6 साल का था,” उसने कहा। “कहता था पेट जल रहा है। तुम कहती थीं इलाज कठिन है। तुम मेरा हाथ पकड़ती थीं, और उसी हाथ से मेरे बेटे को धीरे-धीरे मार रही थीं।”

“चुप रहो,” काव्या गुर्राई।

“अब नहीं।”

अर्जुन को याद आया कि ऊपर आते समय उसने घबराहट में 112 डायल कर दिया था और कॉल खुली छोड़ दी थी। शायद वे सुन रहे थे। शायद नहीं। शायद वे रास्ते में थे। शायद वह सचमुच अकेला था—अपनी बेटी, अपनी पत्नी और एक टूटे हुए पिता के बीच।

तभी काव्या ने झपटकर अनाया की बांह पकड़ी और उसे अपने सामने खींच लिया।

“तुम एक मां पर गोली नहीं चलाओगे, जब उसकी बच्ची उसकी बांहों में हो।”

अर्जुन की आंखों में खून उतर आया।

“उसे छोड़ो!”

अनाया तड़प रही थी। उसका चेहरा आंसुओं से भीगा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वही हाथ, जो उसके बालों पर तेल लगाता था, आज उसकी कलाई क्यों दर्द से मोड़ रहा था।

राघव 1 कदम बढ़ा। अर्जुन उस पर टूट पड़ा। गोली चली और छत में धंस गई। सफेद प्लास्टर फर्श पर बरस पड़ा। दोनों आदमी दूध और टूटे कटोरे के बीच लुढ़क गए। अर्जुन ने राघव की कलाई फर्श पर पटकी, जब तक पिस्तौल मेज के नीचे सरक नहीं गई।

“अनाया, सावित्री आंटी के घर भागो!” अर्जुन चीखा।

बच्ची वहीं जमी रही। उसकी आंखें मां पर थीं।

काव्या ने हाथ बढ़ाया।

“आओ बेटा। मम्मी सब समझाएगी।”

तभी अनाया की नजर जमीन पर गिरी छोटी शीशी पर गई। उसने चम्मच पर चिपका सफेद पाउडर देखा। उसने पिता की भौंह से बहता खून देखा। और शायद पहली बार उसके छोटे दिल ने उस सच को छुआ, जिसे शब्द अभी नहीं दे सकते थे।

वह भाग गई।

बाहर दरवाजे खुले। पड़ोसियों की आवाजें उठीं। सावित्री आंटी की चीख सुनाई दी। 4 मिनट से कम समय में सायरन नीचे आ रुके। पुलिस वाले घर में घुसे। अर्जुन ने दोनों हाथ ऊपर कर दिए। राघव घुटनों पर गिर गया। काव्या उसी क्षण फूट-फूटकर रोने लगी।

“इसने हमें मारने की कोशिश की! मैं अपनी बेटी को बचा रही थी!”

पर कैमरा अब भी चल रहा था।

एक महिला कॉन्स्टेबल ने काव्या को दीवार से लगाकर हथकड़ी पहनाई। अर्जुन बस दोहराता रहा, “मेरी बेटी पड़ोस में है। कृपया उसे देखिए। कृपया मेरी बच्ची को देखिए।”

जब पुलिस वाली अनाया को चांदी की इमरजेंसी चादर में लपेटकर लाई, जिंदा मगर कांपती हुई, अर्जुन दरवाजे के पास बैठ गया। उसकी सांस जैसे पहली बार लौटी।

अस्पताल में डॉ. मीरा तैयार खड़ी थीं। अनाया को तुरंत इलाज मिला। शरीर से जहरीले पदार्थ निकालने की दवाएं शुरू हुईं। हर सुई पर वह रोती और कहती, “मम्मी दुखी होंगी। मुझे मम्मी के पास जाना है।”

अर्जुन उसका हाथ पकड़े बैठा रहता।

“मैं हूं, गुड़िया। मैं कहीं नहीं जाऊंगा।”

उसी शाम क्राइम ब्रांच की अधिकारी नंदिता राव एक फाइल लेकर आईं।

“हमें वीडियो, शीशी, कॉर्नफ्लेक्स और रसोई के कई सामान मिल गए हैं। बेडरूम की अलमारी में एक डायरी भी मिली है।”

अर्जुन ने सिर उठाया।

“कौन सी डायरी?”

नंदिता ने 1 पल रुककर कहा, “काव्या अनाया के लक्षण लिखती थी। कितनी मात्रा दी। कब उल्टी हुई। कब भूख लौटी। कब कमजोरी बढ़ी। और उसमें कुछ और बच्चों के नाम भी हैं।”

कमरा घूम गया।

“कितने?”

“अनाया के अलावा 3 बच्चे। उनमें विवान मेहरा भी है।”

अर्जुन ने सोती हुई अनाया को देखा। उसे लगा वह अपने घर की त्रासदी नहीं, एक छिपे हुए कब्रिस्तान का दरवाजा खोल चुका था।

अगले हफ्तों में सच परत-दर-परत बाहर आया। काव्या पहले 2 निजी अस्पतालों में नर्सिंग असिस्टेंट रह चुकी थी—जयपुर और दिल्ली में। हर जगह वह बीमार बच्चों के परिवारों के बहुत करीब हो जाती। वह थके हुए माता-पिता को सहारा देती, डॉक्टरों से बात करती, दवाइयों का हिसाब रखती, और धीरे-धीरे घर की जरूरत बन जाती। कुछ लोगों ने उसके व्यवहार पर शक किया था, पर अस्पतालों ने बदनामी से बचने के लिए बात दबा दी। उसे चुपचाप निकाल दिया गया, बिना पुलिस रिपोर्ट के, बिना चेतावनी के।

दान खाते में 38,000 नहीं, बल्कि 11 लाख रुपये से ज्यादा जमा हुए थे। काव्या ने अनाया की कमजोर तस्वीरें, उल्टी के वीडियो, झड़ते बालों की रीलें, मंदिर में मन्नतों की पोस्ट, सबको हथियार बना दिया था। उसने लिखा था कि इलाज मुंबई में महंगा है, विदेश से दवा मंगानी पड़ेगी, और सरकारी मदद देर से मिलेगी। अजनबियों ने 100, 500, 5000 भेजे। अर्जुन की मां ने अपने शादी के कंगन बेच दिए। अर्जुन के छोटे भाई रोहित ने एक बार कहा था, “भाभी कुछ ज्यादा दिखावा कर रही हैं।” पूरा परिवार उस पर टूट पड़ा था।

अब वही रोहित अस्पताल के बाहर चुपचाप बैठा रहता, अपराधबोध से झुका हुआ।

सबसे कठिन अनाया थी। वह हर रात पूछती, “मम्मी ने बुरी चीज दी तो क्या मैं अच्छी बच्ची नहीं थी?”

अस्पताल की मनोवैज्ञानिक डॉ. श्रुति ने अर्जुन से कहा, “बच्चे कभी-कभी उसी से प्यार करते रहते हैं, जिसने उन्हें तोड़ा हो। क्योंकि उनके दिल के पास प्यार की भाषा बदलने में समय लगता है।”

समय सचमुच पहाड़ बन गया। अनाया के बाल लौटने का समय। उसके लिवर और किडनी संभलने का समय। पुलिस को बयान देने का समय। इंटरनेट की नफरत झेलने का समय। कुछ लोग अर्जुन को दोष देते कि उसने पहले क्यों नहीं देखा। कुछ कहते काव्या मानसिक रूप से बीमार होगी, उसे माफ कर देना चाहिए। पर वे लोग उस पिता की रातें नहीं जानते थे, जो हर कटोरे को देखकर कांपता था।

राघव पर हथियार लाने का केस चला, पर उसकी गवाही ने मुख्य मामले को मजबूत कर दिया। अर्जुन उसे माफ नहीं कर पाया, पर जब उसके वकील के जरिए एक चिट्ठी आई, उसने पढ़ी।

“मैंने अनाया को खतरे में डाल दिया। इसकी कोई माफी नहीं। पर जब मैंने उसकी वीडियो देखी, मुझे विवान दिखा। वही चेहरा, वही औरत, वही आंसू। अगर आपकी बेटी बच गई, तो शायद मेरा बेटा उसके जरिए आखिरी बार चीखा।”

अर्जुन ने जवाब नहीं दिया। लेकिन उसने राघव से नफरत करना बंद कर दिया।

3 महीने बाद अनाया अस्पताल से निकली। सिर पर पीली टोपी थी, कंधे पर छोटा बैग। सावित्री आंटी बाहर खीर का डिब्बा लेकर खड़ी थीं।

“मुझे समझ नहीं आया क्या लाऊं,” वह रोते हुए बोलीं। “तो मीठा ले आई।”

अर्जुन पुराने फ्लैट में लौटा, पर 2 मिनट भी टिक नहीं पाया। रसोई साफ थी, मगर छत में गोली का निशान अभी भी था। अनाया ने ऊपर देखा।

“यहीं आवाज हुई थी?”

अर्जुन घुटनों पर बैठ गया।

“हम यहां नहीं रहेंगे।”

10 दिन बाद वे द्वारका के एक छोटे फ्लैट में चले गए। खुली रसोई थी, खिड़की से गुलमोहर का पेड़ दिखता था। अनाया ने खुद पर्दे चुने—नीले, जिन पर बादल बने थे। अर्जुन ने पुराने बर्तन, कटोरे, डिब्बे सब फेंक दिए। वह नहीं चाहता था कि किसी चीज पर काव्या के हाथों की याद बची रहे।

पहले अनाया खाना नहीं खाती थी।

“आपने इसमें क्या डाला?”

अर्जुन हर पैकेट उसके सामने खोलता। खुद पहले चखता। वे एक नया नियम बनाते—अनाया लेबल पढ़ती, सुरक्षित खाने पर छोटा सूरज वाला स्टिकर लगाती, फिर खुद चम्मच मिलाती।

पहले दिन उसने दाल की 3 चम्मच खाई। अर्जुन बाथरूम में जाकर रोया। 5वें दिन उसने आधा पराठा खाया। 12वें दिन उसने कहा, “पनीर थोड़ा और डालो।” अर्जुन को लगा उसने युद्ध जीत लिया।

6 महीने बाद मुकदमा शुरू हुआ। काव्या सफेद सलवार-कमीज पहनकर अदालत में आई, बाल बंधे, चेहरा शांत। वह अब भी ऐसी दिख रही थी जैसे दुनिया ने उसे गलत समझा हो। अर्जुन का पेट मिचलाने लगा। इतने सबूतों के बाद भी वह मासूमियत को कपड़े की तरह पहन सकती थी।

पहले दिन वीडियो चला। स्क्रीन पर काव्या शीशी निकालती, गोलियां पीसती, दूध में मिलाती और मीठी आवाज में अनाया को बुलाती दिखी। अदालत में किसी ने सिसकी दबाई। अर्जुन की मां बाहर चली गईं।

डॉ. मीरा ने कहा कि अनाया को कभी कैंसर नहीं था। उसके लक्षण धीरे-धीरे दिए गए जहरीले पदार्थों से बने थे। विशेषज्ञ ने बताया कि मात्रा ऐसी थी कि बच्ची तुरंत न मरे, पर बहुत बीमार दिखे, ताकि दया, पैसा और ध्यान मिलता रहे।

राघव ने तीसरे दिन गवाही दी। उसने विवान की तकलीफ, पेट की जलन, अस्पताल की रातें और काव्या की बनावटी ममता सब बताया।

“वह ठीक समय पर रोती थी,” उसने कहा। “वह आपका हाथ पकड़कर आपको यकीन दिलाती थी कि आप अकेले नहीं हैं। और उसी समय आपका बच्चा खो रहा होता था।”

अर्जुन जब गवाही देने खड़ा हुआ, काव्या के वकील ने उसे कमजोर साबित करने की कोशिश की।

“आप कर्ज में थे, थके हुए थे। क्या यह संभव नहीं कि आपने बेटी की बीमारी का दोष किसी पर डालना चाहा?”

अर्जुन ने जज की तरफ देखा।

“मैं थका हुआ था। टूटा हुआ था। मेरी बेटी मेरी आंखों के सामने मर रही थी। लेकिन वीडियो थका हुआ नहीं था। रिपोर्ट टूटी हुई नहीं थीं। और जहर ने किसी दोष की तलाश नहीं की थी।”

चौथे दिन काव्या ने बोलने की जिद की। उसकी आवाज फिर वही मीठी थी।

“मैं बस चाहती थी कि लोग अनाया को देखें। हमें प्यार मिले। शुरुआत में लगा सब मेरे नियंत्रण में है। फिर लोग इतने करीब आ गए कि मैं अकेली नहीं रही।”

सरकारी वकील खड़ी हुईं।

“आप अकेली नहीं रहीं, जबकि आपकी बेटी उल्टियां कर रही थी?”

काव्या ने आंखें झुका लीं।

“मैं भी दुखी थी।”

“गोलियां पीसते समय भी?”

काव्या चुप रही।

वकील ने डायरी खोली।

“यहां लिखा है—भूख लौटे तो मात्रा बढ़ानी है। इसे आप दुख कहती हैं?”

पहली बार काव्या का चेहरा कठोर हुआ। नकाब खिसक गया।

“आप नहीं जानतीं अदृश्य होना क्या होता है। अनाया बीमार होने से पहले कोई मुझे देखता ही नहीं था।”

अदालत में ऐसा सन्नाटा छाया, जैसे किसी ने हवा रोक दी हो।

वकील ने धीमे कहा, “आपकी बेटी आपके लिए बच्ची नहीं थी। वह आईना थी, जिसमें आप अपनी पूजा देखना चाहती थीं।”

काव्या ने अर्जुन की तरफ देखा।

“तुम उसके बिना कुछ नहीं कर पाते।”

अर्जुन ने अनाया को याद किया—सूरज वाले स्टिकर लगाते हुए, डरते हुए भी रोटी तोड़ते हुए, रात में उसकी उंगली पकड़ते हुए।

“अब वह सीख रही है,” उसने शांत आवाज में कहा, “कि प्यार इस्तेमाल नहीं करता।”

फैसला 8 घंटे बाद आया। काव्या दोषी ठहरी—नाबालिग पर जहर देने की कोशिश, गंभीर हिंसा, धोखाधड़ी, जीवन को खतरे में डालना। उसे 30 साल की सजा हुई और अनाया से जीवन भर संपर्क पर प्रतिबंध लगा। अदालत ने उन अस्पतालों की भी जांच का आदेश दिया, जिन्होंने पहले चेतावनियां दबाई थीं।

अर्जुन को जीत जैसा कुछ महसूस नहीं हुआ। सिर्फ भारी थकान थी। न्याय जरूरी था, पर वह उस जीवन को वापस नहीं ला सकता था, जिसे वह सच मानता था।

उस शाम वह अनाया को इंडिया गेट के पास पार्क में ले गया। घास पर बच्चे दौड़ रहे थे। आसमान में पतंगें थीं।

“वह अब मुझे चोट नहीं पहुंचाएगी?” अनाया ने पूछा।

अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“कभी नहीं।”

“मुझे मम्मी के लिए दुखी होने का हक है?”

अर्जुन की आंखें भर आईं।

“हां, बेटा। दुखी, गुस्सा, उलझी हुई—सब होने का हक है। मैं हर हिस्से में तुम्हारे साथ रहूंगा।”

1 साल बाद अनाया के बाल भूरे घुंघराले होकर लौट आए थे। वह स्कूल जाने लगी थी। रविवार को वह अर्जुन के साथ पैनकेक बनाती, अंडा तोड़ते समय सर्जन जैसी गंभीरता दिखाती और आटा नाक पर लगते ही हंस पड़ती। कभी-कभी अब भी पूछती, “आपने पहले चखा?”

अर्जुन हर बार चखता, चाहे खाना ठंडा हो, चाहे वह पहले 2 बार चख चुका हो।

फिर एक गुरुवार शाम उसने खाली प्लेट सिंक में रखी और बस इतना कहा, “पापा, आज मैंने बिना डर के खाया।”

अर्जुन के हाथ साबुन से भरे थे। वह मुस्कुराना चाहता था, पर आंसू पहले आ गए।

अनाया ने उसकी कमर पकड़ ली।

“कोई बात नहीं,” वह बोली। “आप भी ठीक हो रहे हो।”

उस छोटी-सी रसोई में, बिना कैमरे, बिना दान, बिना तालियों के, अर्जुन ने जाना कि सच्चा प्यार दिखावे के लिए नहीं जीता। वह चुपचाप खाना बनाता है। लेबल पढ़ता है। बच्ची को उस मां के लिए रोने देता है जिसने उसे तोड़ा। और हर सुबह फिर शुरू करता है, जब तक डर 1 कदम पीछे न हट जाए।

कुछ राक्षस मुस्कान, सफेद कपड़ों और मीठी आवाज के पीछे छिपते हैं। पर कुछ सच देर से सही, पहुंच जाते हैं। और जब कोई बच्ची मिटा दिए जाने से बच जाती है, तो उसका हर निडर कौर ऐसी जीत बन जाता है, जिसे दुनिया की कोई काव्या उससे छीन नहीं सकती।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.