
भाग 1:
—इस बच्ची को मेज़ से उठाओ, अदिति… आज मेरे बेटे के जन्मदिन पर सिर्फ उसके असली बच्चे उसके साथ बैठेंगे।
सावित्री देवी की आवाज़ डाइनिंग हॉल में ऐसे गिरी जैसे किसी ने गरम तेल में पानी डाल दिया हो।
चाँदी की थालियों में परोसी हुई दाल मखनी, शाही पनीर, जीरा राइस, तंदूरी रोटियाँ और गुलाब जामुन की खुशबू अचानक बेस्वाद हो गई। साउथ दिल्ली के वसंत कुंज वाले उस बड़े फ्लैट में अभी 2 मिनट पहले तक हँसी थी, रिश्तेदारों की आवाज़ें थीं, बच्चों की खिलखिलाहट थी और ब्लूटूथ स्पीकर पर धीमे से पुराना बॉलीवुड गाना बज रहा था।
लेकिन अब सब कुछ जम गया था।
अदिति के हाथ में पकड़ा चम्मच हवा में ही रुक गया। उसकी आँखें सीधे सावित्री देवी पर टिक गईं।
काव्या, 7 साल की छोटी-सी बच्ची, पीले रंग की फ्रॉक पहने अपनी कुर्सी पर बैठी थी। वही फ्रॉक जो अर्जुन ने पिछले रविवार डीएलएफ मॉल से उसे दिलाई थी, क्योंकि काव्या ने शीशे में खुद को देखकर कहा था:
—पापा, मैं इसमें सूरज जैसी लग रही हूँ ना?
अर्जुन हँसा था।
—मेरी गुड़िया तो सूरज से भी ज़्यादा चमकती है।
काव्या ने उसी दिन से तय कर लिया था कि वह यह फ्रॉक अर्जुन के जन्मदिन पर पहनेगी। उसने 3 दिन तक अपने कमरे में छिपकर एक छोटा-सा गिफ्ट भी बनाया था। कार्डबोर्ड का फ्रेम, जिस पर टेढ़े-मेढ़े दिल, पीले सितारे और लाल रंग से लिखा था: “मेरी फैमिली।”
उस फ्रेम में एक फोटो चिपकी थी—इंडिया गेट के पास की, जहाँ अर्जुन ने काव्या को कंधे पर बैठाया हुआ था, अदिति बगल में हँस रही थी, और काव्या के हाथ में कॉटन कैंडी थी।
अर्जुन काव्या का जैविक पिता नहीं था।
काव्या अदिति की पहली ज़िंदगी से आई थी, उस टूटे हुए रिश्ते से जहाँ एक आदमी पिता कहलाने के लायक भी नहीं निकला। जब अदिति की मुलाकात अर्जुन मल्होत्रा से हुई, तब काव्या सिर्फ 3 साल की थी। पहले दिन ही काव्या ने अर्जुन की घड़ी पकड़कर पूछा था:
—आप पुलिस हो?
अर्जुन ने मुस्कुराकर कहा था:
—नहीं, मैं तो बस तुम्हारी मम्मी का दोस्त हूँ।
लेकिन 4 साल में वह दोस्त काव्या की दुनिया का सबसे सुरक्षित नाम बन गया।
स्कूल की फीस भरने वाला अर्जुन था। रात को बुखार में गोद में उठाकर डॉक्टर ले जाने वाला अर्जुन था। पैर में चोट लगती तो पट्टी बाँधने वाला अर्जुन था। पैरेंट्स डे पर सबसे आगे बैठकर ताली बजाने वाला अर्जुन था। होमवर्क में “मेरा परिवार” लिखवाते समय काव्या जिस नाम के आगे “पापा” लिखती थी, वह अर्जुन ही था।
अर्जुन की पहली शादी से 2 बच्चे थे—रोहन, 16 साल का, और मीरा, 13 साल की। उनकी माँ नंदिता थी, जो अब गुरुग्राम में रहती थी। अदिति ने कभी रोहन और मीरा की माँ बनने की कोशिश नहीं की। उसने बस उन्हें सम्मान दिया, जगह दी, और धीरे-धीरे दोनों बच्चों ने भी उसे अपने घर की शांति मान लिया।
काव्या रोहन को “भैया” और मीरा को “दीदी” कहती थी। रोहन उसे मैथ्स पढ़ाता था, मीरा उसके बालों में क्लिप लगाती थी। तीनों में खून का रिश्ता नहीं था, पर रिश्ता था।
सिर्फ एक इंसान को यह रिश्ता कभी मंज़ूर नहीं था।
सावित्री देवी।
अर्जुन की माँ।
उनके लिए काव्या हमेशा “अदिति की लड़की” थी।
कभी पोती नहीं।
कभी घर की बच्ची नहीं।
कभी परिवार नहीं।
उस रात अर्जुन का 39वाँ जन्मदिन था। सावित्री देवी ने हफ्तों से ज़िद की थी कि पार्टी उनके घर पर ही होगी।
—बड़ी पार्टी नहीं चाहिए —उन्होंने फोन पर कहा था— बस अपने लोग। अपने खून के लोग।
अदिति ने उस समय उस वाक्य का ज़हर महसूस किया था, पर अर्जुन ने उसका हाथ दबाकर कहा था:
—मम्मी हैं, आदत है बोलने की। मैं हूँ ना।
लेकिन अब अर्जुन डाइनिंग हॉल में नहीं था। वह बालकनी में किसी ऑफिस कॉल पर गया हुआ था। और शायद सावित्री देवी उसी क्षण का इंतज़ार कर रही थीं।
काव्या ने धीरे से अदिति की साड़ी का पल्लू पकड़ा।
—मम्मी… दादी कह रही हैं मैं सोफे पर चली जाऊँ।
अदिति ने शांत रहने की कोशिश की।
—क्यों?
सावित्री देवी ने अपनी बनारसी साड़ी की प्लीट्स ठीक कीं और ठंडी मुस्कान के साथ बोलीं:
—क्योंकि रोहन और मीरा आ गए हैं। अर्जुन के असली बच्चे। उन्हें अपने पिता के पास बैठना चाहिए।
अदिति की आँखों में अपमान की आग भर गई।
—काव्या भी अर्जुन की बेटी है।
सावित्री देवी हँसीं। वह हँसी इतनी सूखी थी कि कमरे की हवा तक कट गई।
—बहू, अच्छे आदमी का फायदा मत उठाओ। अर्जुन दयालु है, इसका मतलब यह नहीं कि हम रिश्तों की परिभाषा बदल दें।
काव्या ने मासूमियत से पूछा:
—दादी, मैं असली नहीं हूँ?
कमरे में बैठे अर्जुन के मामा, चाचा, बुआ, कज़िन—सबने नज़रें झुका लीं। किसी ने कौर उठाया, किसी ने पानी पिया, पर किसी ने बच्ची के लिए आवाज़ नहीं उठाई।
अदिति कुर्सी से उठी।
—काव्या कहीं नहीं जाएगी।
सावित्री देवी ने उसकी बात अनसुनी कर दी। उन्होंने काव्या के कंधे पर हाथ रखा।
—चलो, बेटा। वहाँ टीवी चल रहा है। तुम कार्टून देखो। यहाँ बड़े लोग परिवार के साथ खाना खाएँगे।
—मम्मी…
काव्या की आवाज़ काँप गई।
अदिति ने आगे बढ़कर काव्या का हाथ पकड़ना चाहा, लेकिन सावित्री देवी ने बच्ची को हल्के से धक्का दिया। धक्का इतना तेज़ नहीं था कि चोट लगे, लेकिन इतना ज़रूर था कि पूरे हॉल ने देख लिया कि काव्या को मेज़ से हटाया जा रहा है।
काव्या कालीन के किनारे से ठोकर खाकर लड़खड़ा गई।
उसके हाथ से रंगीन कागज़ में लिपटा छोटा-सा गिफ्ट गिर गया।
फ्रेम की लकड़ी का एक कोना टूट गया।
और उसी पल अर्जुन अंदर आया।
उसके हाथ में फोन था। चेहरे पर थकान भरी मुस्कान थी, जो काव्या की आँखों में आँसू देखकर तुरंत गायब हो गई।
पहले उसने काव्या को देखा।
फिर अदिति को।
फिर अपनी माँ को।
—क्या हुआ?
किसी ने जवाब नहीं दिया।
काव्या ने अपना चेहरा पोंछा और हिचकते हुए कहा:
—दादी ने कहा… यह मेज़ आपके असली बच्चों के लिए है। मैं सोफे पर बैठ जाऊँ।
अर्जुन ने चीखा नहीं।
उसने प्लेट नहीं फेंकी।
उसने कोई तमाशा नहीं किया।
बस अपना फोन धीरे से मेज़ पर रखा। उसकी शांति इतनी ठंडी थी कि सावित्री देवी का चेहरा पहली बार थोड़ा पीला पड़ा।
अर्जुन काव्या के पास गया, घुटनों के बल बैठा और गिरे हुए गिफ्ट को उठाया।
—चोट लगी?
काव्या ने सिर हिलाया, पर आँसू बहते रहे।
अर्जुन ने उसके गाल पोंछे।
—मेरे साथ चलो।
उसने काव्या का हाथ पकड़ा और डाइनिंग टेबल के सिरहाने खड़ा हो गया।
कमरे में कोई साँस भी ज़ोर से नहीं ले रहा था।
अर्जुन ने अपनी माँ की ओर देखा।
—माँ, दोबारा बोलिए। आपने क्या कहा?
सावित्री देवी ने गला साफ़ किया।
—अर्जुन, मैंने बस जगह बनाने को कहा था। तुम बात को बढ़ा रहे हो।
—मैंने पूछा, आपने क्या कहा?
—मैंने कहा कि रोहन और मीरा तुम्हारे असली बच्चे हैं। आज तुम्हारे जन्मदिन पर उन्हें तुम्हारे पास बैठना चाहिए।
रोहन ने नज़र झुका ली। मीरा की आँखें फैल गईं।
अदिति का दिल चाहा कि वह काव्या को लेकर अभी चली जाए, लेकिन अर्जुन ने उससे पहले बोलना शुरू किया।
—काव्या मेरी बेटी है।
सावित्री देवी ने होंठ सिकोड़कर कहा:
—नहीं, बेटा। वह अदिति की बेटी है।
अर्जुन ने अपनी माँ को ऐसे देखा जैसे पहली बार पहचान रहा हो।
—काव्या मेरी बेटी है क्योंकि मैंने उसे चुना है। क्योंकि जब उसे बुखार होता है तो वह मुझे पुकारती है। क्योंकि स्कूल में जब उसे डर लगता है तो टीचर मुझे फोन करती है। क्योंकि जब वह परिवार बनाती है तो मेरे बाल हमेशा बहुत काले बनाती है और कहती है, ‘पापा ऐसे ही दिखते हैं।’ क्योंकि प्यार खून से कमज़ोर नहीं होता, माँ।
सावित्री देवी ने धीमे से कहा:
—तुम्हें समझ नहीं आ रहा…
—नहीं। आज मुझे सब समझ आ रहा है।
अर्जुन ने टूटा हुआ फ्रेम उठाया।
—अगर इस घर में किसी को लगता है कि खून प्यार से बड़ा है, तो वह अभी इस मेज़ से उठ सकता है।
कोई नहीं उठा।
सावित्री देवी ने अपनी हार को अपमान समझा। उन्होंने काव्या की तरफ देखकर आखिरी वार किया:
—तुम चाहे जितना चिपक लो, रोहन और मीरा जैसी कभी नहीं बन पाओगी।
काव्या का चेहरा बुझ गया।
और अर्जुन की आँखों की शांति पहली बार टूट गई।
—बस। यह खाना यहीं खत्म हुआ।
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भाग 2:
केक वैसे ही पड़ा रहा, मोमबत्तियाँ कभी नहीं जलीं, और सावित्री देवी ऐसे उठीं जैसे अपमान उनका हुआ हो। —तुम अपना जन्मदिन एक ऐसी बच्ची के लिए बर्बाद कर रहे हो जो तुम्हारा सरनेम तक नहीं लगाती? अदिति ने काव्या को सीने से लगा लिया। बच्ची अब ज़ोर से नहीं रो रही थी, और यही बात सबसे ज़्यादा डरावनी थी। वह चुप थी, जैसे खुद को छोटा करके गायब हो जाना चाहती हो। अर्जुन ने दीवार के पास रखी 2 खाली कुर्सियों की ओर इशारा किया। —जगह कम नहीं थी, माँ। इंसानियत कम थी। तभी रोहन अचानक खड़ा हुआ। —दादी, काव्या 7 साल की है। आप किसी बच्चे से ऐसे कैसे बोल सकती हैं? मीरा अपनी कुर्सी से उठकर काव्या के पास आई और बोली: —तुम मेरे साथ बैठती। मैं ऐसी मेज़ पर नहीं बैठना चाहती जहाँ किसी को नीचा दिखाया जाए। सावित्री देवी के चेहरे का रंग उड़ गया। —तुम लोगों को यह औरत मेरे खिलाफ कर रही है। अर्जुन ने हाथ उठाकर उन्हें रोका। —अदिति को मत घसीटिए। आपने जो किया, सबने देखा। काव्या ने काँपते हाथों से अर्जुन को अपना गिफ्ट दिया। —यह आपके लिए था, पापा… पर अगर अब बर्थडे नहीं मनाना तो कोई बात नहीं। अर्जुन ने फ्रेम खोला। अंदर वही फोटो थी—अर्जुन, अदिति और काव्या की। नीचे लिखा था: “मेरी फैमिली।” अर्जुन की आँखें लाल हो गईं। —माँ, आपने कहा था आपको मेरी असली फैमिली चाहिए। आपने अभी उसे ही धक्का देकर बाहर भेजा है। सावित्री देवी ने नज़र झुका ली, पर माफ़ी नहीं माँगी। अर्जुन ने अपनी जैकेट उठाई। —हम जा रहे हैं। उसके पिता महेंद्र ने कहा: —बेटा, माँ पुरानी सोच की हैं। इतना बड़ा मत बनाओ। —बड़ा आपने बनाया, जब 7 साल की बच्ची के आँसू छोटे समझे। रोहन बोला: —मैं भी चल रहा हूँ। मीरा ने अपना बैग उठाया। —मैं भी। सावित्री देवी चीखीं: —तुम दोनों यहीं रुको। तुम्हारी माँ ने तुम्हें वीकेंड के लिए मेरे पास भेजा है। रोहन ने ठंडी आवाज़ में कहा: —माँ ने हमें किसी बच्चे का अपमान देखने नहीं भेजा। कार में काव्या फ्रेम पकड़े बैठी रही। कुछ दूर जाकर उसने बहुत धीमे पूछा: —क्या मैं अब भी आपको पापा बोल सकती हूँ? अर्जुन ने कार रोक दी, पीछे का दरवाज़ा खोला और उसके सामने घुटनों पर बैठ गया। —मैं कल भी तुम्हारा पापा था, आज भी हूँ, कल भी रहूँगा। चाहे कोई माने या न माने। उसी रात सावित्री देवी का ऑडियो आया: —तुम पछताओगे। वह लड़की कभी हमारी नहीं होगी। जब अदिति तुम्हें छोड़ देगी, तुम पत्नी, बेटी और परिवार सब खो दोगे। अर्जुन ने ऑडियो सेव कर लिया। अदिति ने पूछा: —क्यों? अर्जुन ने धीमे कहा: —क्योंकि इस बार माँ अपनी बात से पलट नहीं पाएँगी।
भाग 3:
अगले 7 दिन सावित्री देवी ने पूरी कहानी बदलने में लगा दिए।
उन्होंने करोल बाग वाली बुआ को फोन किया, नोएडा वाले चाचा को बताया, पड़ोस की शर्मा आंटी से कहा, मंदिर की कीर्तन मंडली तक बात पहुँचा दी।
उनके हिसाब से अदिति ने बिना बात का ड्रामा किया था।
उनके हिसाब से काव्या बहुत “नाज़ुक दिल” थी।
उनके हिसाब से उन्होंने कभी “असली बच्चे” नहीं कहा था।
उनके हिसाब से अर्जुन अपनी पत्नी के हाथों की कठपुतली बन गया था।
लेकिन इस बार कहानी उनके हाथ से निकल चुकी थी।
रोहन ने सारी बात अपनी माँ नंदिता को बताई। अदिति को लगा था कि नंदिता शायद चुप रहेगी। आखिर कई रिश्तों में पुरानी पत्नी नई पत्नी की तकलीफ देखकर संतोष महसूस करती है। लेकिन नंदिता वैसी नहीं निकली।
उसी रात अदिति के फोन पर नंदिता का कॉल आया।
—अदिति, रोहन और मीरा ने सब बताया।
अदिति कुछ पल चुप रही।
—मुझे नहीं पता था वे इतना परेशान हो गए।
—परेशान होना चाहिए था। जो हुआ, वह बहुत गलत था।
अदिति की आँखें भर आईं।
—धन्यवाद।
—मुझे धन्यवाद मत कहो। काव्या बच्ची है। कोई भी सभ्य इंसान 7 साल की बच्ची को खाने की मेज़ से इसलिए नहीं हटाता कि उसका खून अलग है।
उस एक वाक्य ने अदिति को भीतर तक सहारा दिया।
अर्जुन ने भी रोहन और मीरा से बात की। वह अपनी माँ के खिलाफ ज़हर नहीं भरना चाहता था। उसने बस सच कहा।
—तुम अपनी दादी से प्यार कर सकते हो। लेकिन किसी से प्यार करने का मतलब यह नहीं कि वह किसी और को चोट पहुँचाए और तुम चुप रहो।
रोहन ने सिर हिलाया।
मीरा ने धीरे से कहा:
—अगर काव्या नहीं जाएगी, तो मैं भी दादी के घर नहीं जाऊँगी।
अर्जुन ने उसे गले लगाया।
—किसी भी मेज़ पर बैठने से पहले यह देखना ज़रूरी है कि वहाँ इंसानियत बची है या नहीं।
लेकिन काव्या बदल गई थी।
पहले वह अर्जुन की कार की आवाज़ सुनते ही दरवाज़े तक भागती थी। अब वह सोफे पर बैठी रहती, 2 सेकंड इंतज़ार करती, फिर उठती। जैसे उसे यकीन करने में समय लगता हो कि पापा आज भी उसे देखकर मुस्कुराएँगे।
एक दिन स्कूल से उसकी ड्रॉइंग कॉपी आई। अदिति ने बैग से निकाली। उसमें परिवार बना था—मम्मी, पापा, रोहन भैया, मीरा दीदी और काव्या।
लेकिन काव्या के सिर के ऊपर उसने ग्रे बादल बनाया था।
अदिति की साँस रुक गई।
शाम को अर्जुन ने वह ड्रॉइंग देखी। वह काफी देर तक किचन की कुर्सी पर बैठा रहा। उसके सामने कॉफी ठंडी हो गई।
फिर उसने कहा:
—मैं नहीं चाहता मेरी बेटी अपनी जगह पाने के लिए हर दिन अनुमति माँगे।
अदिति ने धीमे पूछा:
—क्या करोगे?
अर्जुन ने ड्रॉइंग को सावधानी से मोड़ा।
—जो मुझे बहुत पहले करना चाहिए था।
3 दिन बाद सावित्री देवी उनके घर पहुँचीं। हाथ में महँगे कपकेक का डिब्बा था, चेहरे पर वैसी मुस्कान जो बाहर से मीठी और अंदर से खुरदरी होती है।
अदिति ने खिड़की से उन्हें देखा तो उसका पेट कस गया।
अर्जुन ने दरवाज़ा खोला, लेकिन रास्ते से हटकर उन्हें अंदर आने का निमंत्रण नहीं दिया।
—मैं शांति से बात करने आई हूँ —सावित्री देवी बोलीं— अब काफी नाटक हो गया।
—नाटक नहीं था, माँ। चोट थी।
—अच्छा, अब क्या चाहो तुम? मैं मर जाऊँ?
—नहीं। बस काव्या से माफ़ी माँगिए।
सावित्री देवी की आँखें सिकुड़ गईं।
—एक बच्ची से?
अर्जुन ने सीधा जवाब दिया:
—मेरी बेटी से।
यह शब्द दरवाज़े के बीच में दीवार की तरह खड़ा हो गया।
आखिर वह अंदर आईं। काव्या लिविंग रूम में मीरा के साथ पजल बना रही थी। रोहन अपने लैपटॉप पर बैठा था। सावित्री देवी को देखकर काव्या के हाथ रुक गए।
सावित्री देवी ने बनावटी नरमी से कहा:
—काव्या, अगर उस दिन तुम्हें बुरा लगा हो तो सॉरी।
अर्जुन ने कपकेक का डिब्बा उठाकर उन्हें वापस पकड़ा दिया।
—यह माफ़ी नहीं है।
—तो क्या चाहो? मैं उसके पैर पकड़ूँ?
—नहीं। सच बोलिए।
सावित्री देवी का संयम टूट गया।
—सच यह है कि वह तुम्हारा खून नहीं है। सच यह है कि तुम किसी और आदमी की छोड़ी हुई जिम्मेदारी उठा रहे हो। सच यह है कि अदिति को शुक्र मनाना चाहिए कि हमने उसे बच्ची समेत स्वीकार किया।
अदिति का चेहरा सफेद पड़ गया।
रोहन कमरे से उठ खड़ा हुआ।
मीरा ने काव्या का हाथ पकड़ लिया।
काव्या ने अर्जुन की तरफ देखा, जैसे उसकी दुनिया का फैसला उसके चेहरे पर लिखा जाने वाला हो।
अर्जुन ने फिर भी आवाज़ ऊँची नहीं की।
उसने बस मुख्य दरवाज़ा खोल दिया।
—जाइए।
सावित्री देवी स्तब्ध रह गईं।
—तुम मुझे घर से निकाल रहे हो?
—हाँ।
—मैं तुम्हारी माँ हूँ।
—और वह मेरी बेटी है।
नीचे कार में इंतज़ार कर रहे महेंद्र जी ऊपर आ गए। उन्होंने दरवाज़े से झाँकते हुए कहा:
—अर्जुन, बात संभालो।
अर्जुन ने उनकी ओर देखा।
—पापा, बात मैंने नहीं बिगाड़ी।
रोहन अर्जुन के पास आकर खड़ा हो गया।
—मैं दादी के घर नहीं जाऊँगा अगर वह काव्या के बारे में ऐसे बोलेंगी।
मीरा दूसरी तरफ खड़ी हुई।
—मैं भी नहीं।
सावित्री देवी ने अपने “खून के पोते-पोती” को देखा। जिन्हें बचाने के नाम पर उन्होंने 7 साल की बच्ची को ठुकराया था, वही अब उसके सामने दीवार बन गए थे।
पहली बार उन्हें समझ आया कि वह बहस नहीं हार रहीं।
वह अपना स्थान खो रही थीं।
—एक दिन तुम सब समझोगे —उन्होंने धीमे से कहा।
तभी काव्या दरवाज़े तक आई। उसकी आँखों में डर था, पर आवाज़ साफ़ थी।
—मैं आपसे नफरत नहीं करती, दादी।
सावित्री देवी ने उसकी ओर देखा।
काव्या ने कहा:
—मुझे बस याद रहेगा।
कमरे में सन्नाटा भर गया।
सावित्री देवी ने नज़र झुका ली। अर्जुन ने दरवाज़ा बंद कर दिया।
उस रात, जब काव्या सो गई, अदिति ने डाइनिंग टेबल पर अर्जुन को कागज़ों के साथ बैठा पाया।
—यह क्या है?
अर्जुन ने उसकी ओर देखा।
—गोद लेने की प्रक्रिया की जानकारी।
अदिति की आँखें भर आईं।
—अर्जुन…
—मैं पहले से उसका पिता हूँ। हर ज़रूरी जगह पर। लेकिन अब मैं चाहता हूँ कोई फिर उसके खिलाफ सरनेम को हथियार न बना सके।
अदिति उसके सामने बैठ गई। दोनों काफी देर तक चुप रहे। यह फैसला भावुक था, पर जल्दबाज़ी नहीं था। उन्होंने वकील से बात की। दस्तावेज़ जुटाए। नंदिता को बताया। रोहन और मीरा से भी राय ली।
रोहन ने कहा:
—काव्या पहले से हमारी बहन है। कागज़ से क्या बदलेगा?
मीरा बोली:
—कागज़ से दुनिया चुप हो जाएगी।
कुछ हफ्तों बाद अर्जुन ने काव्या को अपने पास बैठाया। वही टूटा हुआ फ्रेम ठीक करवाकर टेबल पर रखा था।
—गुड़िया, एक ज़रूरी बात पूछनी है।
काव्या ने डरते हुए पूछा:
—क्या मैंने कुछ गलत किया?
अर्जुन का दिल कस गया।
—नहीं। कभी नहीं। मैं पूछना चाहता हूँ, क्या तुम चाहती हो कि मैं कागज़ों में भी तुम्हारा पापा बन जाऊँ?
काव्या ने माथा सिकोड़ लिया।
—कागज़ों में?
—हाँ। कानून के हिसाब से। ताकि स्कूल, अस्पताल, सरकार, सबको पता हो जो हमें पहले से पता है।
काव्या ने कुछ पल सोचा।
फिर बोली:
—आपने मुझे चुना था ना?
अर्जुन की आवाज़ भर्रा गई।
—हाँ।
—फिर मैं भी आपको चुनती हूँ।
अदिति ने अपना चेहरा हाथों में छिपा लिया।
कोर्ट की सुनवाई बहुत साधारण थी। कोई फिल्मी चिल्लाहट नहीं, कोई बड़ा भाषण नहीं। बस एक छोटी-सी फैमिली कोर्ट की कमरा, एक शांत जज, कुछ फाइलें, कुछ हस्ताक्षर और एक बच्ची जो पीली फ्रॉक पहनकर अर्जुन और अदिति के बीच बैठी थी।
जज ने मुस्कुराकर पूछा:
—काव्या, तुम चाहती हो कि अर्जुन तुम्हारे कानूनी पिता बनें?
काव्या ने मासूम गंभीरता से कहा:
—वह पहले से मेरे पापा हैं। बस अब सरकार को बता रहे हैं।
जज हँस पड़ीं।
अदिति रो पड़ी।
अर्जुन की आँखों से भी आँसू निकल आए।
पीछे रोहन, मीरा और नंदिता बैठे थे। आदेश पूरा होते ही मीरा ने धीरे से ताली बजाई। रोहन ने काव्या को बाहर आकर चॉकलेट दी।
कोर्ट के बाहर उन्होंने फोटो खिंचवाई। काव्या ने दस्तावेज़ ऐसे पकड़ा जैसे स्कूल में फर्स्ट आने का सर्टिफिकेट हो।
उस शाम अदिति ने सोशल मीडिया पर एक तस्वीर डाली।
कोई ताना नहीं।
कोई नाम नहीं।
बस एक लाइन:
“परिवार हमेशा खून से नहीं बनता, कभी-कभी कोई हाथ पकड़कर कहता है—तुम मेरी हो।”
रात 8:43 पर सावित्री देवी का मैसेज आया।
“तुमने एक पराई बच्ची के लिए अपना घर तोड़ दिया।”
अर्जुन ने मैसेज पढ़ा।
अदिति ने उसकी ओर देखा।
—जवाब दोगे?
अर्जुन ने फोन स्क्रीन बंद कर दी।
—नहीं। जो लोग प्यार को विनाश समझते हैं, उनसे बहस नहीं होती।
कुछ महीनों बाद दीवाली आई।
इस बार अर्जुन ने साफ़ कह दिया था कि त्योहार उनके घर पर होगा। कोई ज़बरदस्ती नहीं। जो प्यार से आएगा, उसका स्वागत होगा। जो खून की गिनती लेकर आएगा, उसके लिए दरवाज़ा बंद रहेगा।
अदिति ने घर में रंगोली बनाई। मीरा ने काव्या के साथ दीये सजाए। रोहन ने लाइट्स लगाते-लगाते 2 बार झटका खाया और फिर खुद ही हँस पड़ा। नंदिता मिठाई लेकर आई। महेंद्र जी चुपचाप आए, काव्या के लिए किताब लाए और उससे बोले:
—बेटा, यह तुम्हारे लिए।
काव्या ने हिचकते हुए पूछा:
—आप मुझे बेटा बोल रहे हैं?
महेंद्र जी की आँखें नम हो गईं।
—हाँ। देर से सही, सीख रहा हूँ।
सावित्री देवी नहीं आईं।
उनकी जगह खाली नहीं थी।
क्योंकि इस बार किसी कुर्सी पर खून का नाम नहीं लिखा था।
काव्या ने हर प्लेट पर हाथ से बनी छोटी पर्ची रखी थी।
एक पर लिखा था: “मम्मी।”
दूसरी पर: “पापा।”
तीसरी पर: “रोहन भैया।”
चौथी पर: “मीरा दीदी।”
पाँचवीं पर: “नंदिता आंटी।”
और महेंद्र जी की प्लेट पर लिखा था: “दादू, अगर आप चाहें।”
महेंद्र जी ने वह पर्ची पढ़ी और आँखें पोंछ लीं।
खाने से पहले अर्जुन ने पानी का गिलास उठाया।
—मैं इस मेज़ के लिए शुक्रगुज़ार हूँ। क्योंकि यहाँ किसी को यह साबित नहीं करना पड़ता कि वह बैठने लायक है।
मीरा ने काव्या को गले लगाया।
रोहन ने कहा:
—चलो अब जल्दी खाओ, वरना पनीर मैं खत्म कर दूँगा।
काव्या खिलखिला पड़ी।
अदिति ने चारों तरफ देखा। यह परिवार सीधा-सादा नहीं था। इसमें पुराने रिश्ते थे, टूटे हुए भरोसे थे, दूसरी शादी थी, सौतेले बच्चे थे, नई बच्ची थी, पूर्व पत्नी थी, पछताते पिता थे। लेकिन उस रात यह सब उलझन नहीं लग रहा था।
यह जीवन लग रहा था।
सच्चा।
गर्म।
चुना हुआ।
काव्या ने अचानक अर्जुन का हाथ पकड़ा।
—पापा, अब कोई मुझे मेज़ से उठाएगा तो?
अर्जुन ने उसकी ओर देखा।
पूरा कमरा शांत हो गया।
वह झुका, उसकी आँखों में देखा और बोला:
—तो पहले मुझे उठाना पड़ेगा।
काव्या ने मुस्कुराकर सिर उसके कंधे पर रख दिया।
दीयों की रोशनी में अदिति ने सोचा, सावित्री देवी अपने बड़े घर, चमकती थालियों और खाली कुर्सियों के साथ रहें। उन्हें अपना खून मुबारक।
इस घर में हर जगह किसी ने किसी को चुना था।
और चुना हुआ प्यार, विरासत में मिले अहंकार से हमेशा बड़ा होता है।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.