
PART 1
— इसे खीर मत देना, यह हमारे खून की नहीं है।
दीवाली की रात रोशनी से भरे उस बंगले में यह वाक्य ऐसे गिरा, जैसे किसी ने पूजा की थाली जान-बूझकर फर्श पर पटक दी हो।
गुरुग्राम के सेक्टर 45 में शर्मा परिवार का बड़ा घर झालरों, गेंदे की मालाओं और चांदी के दीयों से चमक रहा था। डाइनिंग टेबल पर काजू कतली, गुझिया, पूड़ी, छोले, पनीर और केसर वाली खीर रखी थी। बाहर पटाखों की आवाजें आ रही थीं, लेकिन भीतर अचानक ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे घर की सारी रोशनी बुझ गई हो।
8 साल की अनन्या ने अपनी खाली कटोरी को देखा। फिर उसने अपनी छोटी उंगलियां अपनी फ्रॉक पर कस लीं। वह रोई नहीं। उसने सिर झुका लिया, जैसे उसे पहले से मालूम हो कि दर्द को शोर नहीं बनाना चाहिए।
काव्या शर्मा का गला सूख गया।
वह 36 साल की फैमिली कोर्ट की वकील थी। रोज़ टूटते घर, झूठे आरोप, लालच से भरी लड़ाइयां और बच्चों की कस्टडी के केस देखती थी। अदालत में उसकी आवाज कभी नहीं कांपती थी। लेकिन उस रात अपनी ही मां, सरोजिनी देवी, के सामने उसकी मुट्ठियां मेज़ के नीचे कांप रही थीं।
अनन्या उसके और रोहन की बेटी थी। 10 महीने की उम्र में वह उनके घर आई थी। 3 साल की लंबी प्रक्रिया, होम विज़िट, इंटरव्यू, कागज़, इंतज़ार और रोती हुई रातों के बाद। काव्या ने उसे कभी “गोद ली हुई” नहीं कहा। वह बस उनकी बेटी थी।
काव्या के पिता, देवेंद्र शर्मा, ने अनन्या को पहली बार गोद में लेते ही कहा था—
— मेरी लक्ष्मी आ गई।
लेकिन सरोजिनी देवी के लिए अनन्या हमेशा “वह बच्ची” रही। कभी “पोती” नहीं। कभी “हमारी अनन्या” नहीं। बस घर में रखी एक ऐसी कुर्सी, जिसे मेहमानों के लिए जोड़ दिया गया हो।
अपमान धीरे-धीरे आया था। राखी पर उसका नाम भूल जाना। बाकी बच्चों को चांदी के सिक्के देना, उसे सस्ता हेयरबैंड। परिवार की तस्वीर में उसे किनारे खड़ा करना। रिश्तेदारों के सामने मुस्कुराकर कहना, “काव्या का दिल बहुत बड़ा है, पर खून तो खून होता है।”
काव्या हर बार सोचती थी, वह संभाल लेगी। बात बढ़ाए बिना अपनी बेटी को बचा लेगी।
फिर 14 महीने पहले देवेंद्र शर्मा की हार्ट अटैक से मौत हो गई। मरने से 12 दिन पहले उन्होंने काव्या को अपने पुराने स्टडी रूम में बुलाया था। उनकी सांस धीमी थी, पर आंखें साफ थीं। उन्होंने एक छोटी शीशम की डिब्बी उसे दी थी।
— जिस दिन तेरी मां सबके सामने इस बच्ची को फिर पराया कहे, उस दिन यह डिब्बी अनन्या से खुलवाना।
वह डिब्बी उस रात शुरू से अनन्या की कुर्सी के नीचे रखी थी। उस पर पीतल की छोटी पट्टी जड़ी थी—
“अनन्या के लिए। जब उसे उसकी जगह दिखानी पड़े।”
रात के खाने के बाद सरोजिनी देवी ने आरव को सोने की चेन दी, मीरा को 5000 रुपये का लिफाफा, और अनन्या को एक बिना नाम वाला सस्ता कार्ड।
— धन्यवाद, दादी, अनन्या ने धीरे से कहा।
काव्या के भीतर कुछ टूट गया।
रोहन ने बिना कुछ कहे अनन्या की कटोरी में खीर डालनी चाही। तभी सरोजिनी देवी ने ऊंची आवाज में कहा—
— इस घर में वंश, खून और खानदान की इज़्ज़त सबसे पहले आती है। तुम्हारे पापा भी यह जानते थे।
काव्या ने देखा, अनन्या ने चुपचाप हाथ अपनी कुर्सी के नीचे डाला।
और जैसे ही वह छोटी शीशम की डिब्बी उसकी गोद में आई, सरोजिनी देवी के चेहरे की सारी अकड़ एक पल में उतर गई।
PART 2
अनन्या कुर्सी से उतरी और डिब्बी सीने से चिपकाकर दादी के पास गई।
— दादी, नानू ने कहा था, जब आप फिर बोलें कि मैं परिवार की नहीं हूं, तब मैं आपको यह दूं।
पूरा कमरा जम गया।
सरोजिनी देवी ने पीतल की पट्टी पढ़ी। उनके हाथ में पकड़ा चांदी का गिलास हल्का कांपा।
— काव्या, यह नया तमाशा क्या है?
काव्या धीरे से उठी।
— मेरा नहीं है, पापा का है।
काव्या का भाई निशांत पीला पड़ गया। उसकी पत्नी रितु ने पहली बार फोन नीचे रखा। 9 साल की मीरा ने अनन्या की तरफ देखा और रो पड़ी।
— पर अनन्या मेरी बहन जैसी है।
— मीरा, चुप, रितु ने फुसफुसाया।
— नहीं, मीरा बोली, दादी हमेशा इसके साथ ऐसा करती हैं।
सच उस बच्ची के मुंह से निकला, जिसे किसी ने सिखाया नहीं था।
सरोजिनी देवी ने गुस्से में डिब्बी खींच ली।
— तुम्हारे पापा आखिरी दिनों में कमजोर हो गए थे।
काव्या ने अनन्या के कंधे पर हाथ रखा।
— खोलिए।
अंदर एक नोटरी की मुहर वाला कागज़, कुछ बैंक स्टेटमेंट, एक पुरानी चाबी और एक तस्वीर थी। तस्वीर में देवेंद्र समुद्र किनारे अपने गोवा वाले घर की बरामदे में बैठे थे, और अनन्या उनकी गोद में हंस रही थी।
सरोजिनी ने कागज़ खोला।
पहली ही लाइन में लिखा था—
मुख्य उत्तराधिकारी: अनन्या शर्मा।
फिर उन्होंने उस गोवा वाले घर का नाम देखा, जिसे वह पिछले 14 महीने से किराए पर चढ़ा रही थीं।
उनका चेहरा राख जैसा सफेद हो गया।
PART 3
— यह झूठ है, सरोजिनी देवी के होंठों से आवाज टूटी हुई निकली।
काव्या ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने अपनी मां को पढ़ने दिया। वह चाहती थी कि हर पंक्ति उस कमरे में बैठे हर इंसान के सामने अपना वजन खुद साबित करे।
सरोजिनी देवी ने कागज़ पलटा।
देवेंद्र शर्मा की निजी पैतृक संपत्ति।
गोवा के अंजुना स्थित समुद्र किनारे का पुराना घर।
स्टडी रूम का फर्नीचर।
निवेश खाते से जुड़ी राशि।
किराए से प्राप्त आय।
लाभार्थी: अनन्या शर्मा, नाबालिग, जिसकी कानूनी अभिभावक काव्या शर्मा रहेगी।
सरोजिनी देवी ने काव्या को घूरा।
— वह घर मेरा था।
— नहीं, काव्या ने शांत आवाज में कहा। वह नानाजी की तरफ से पापा को मिला था। शादी से पहले। आप यह जानती थीं।
— मैं वहां 32 साल से जाती रही हूं।
— और पिछले 14 महीने से उसका किराया भी लेती रही हैं, जो आपका नहीं था।
निशांत का चेहरा बदल गया।
— मम्मी, आपने तो कहा था घर खाली पड़ा है।
सरोजिनी देवी ने उसे घूरा।
— मैं उसका रखरखाव कर रही थी।
रोहन ने मेज़ पर एक नीली फाइल रखी।
— किराए के एग्रीमेंट, ऑनलाइन बुकिंग, बैंक ट्रांसफर, एजेंट के मैसेज, सब इसमें हैं।
रितु की आंखें फैल गईं।
— कितना पैसा?
काव्या ने अपनी मां से नज़र नहीं हटाई।
— अभी तक 39 लाख से ज्यादा। पूरी जांच के बाद रकम बढ़ सकती है।
सरोजिनी देवी ने फाइल को धक्का दिया, जैसे वह कागज़ नहीं, जलता हुआ कोयला हो।
— तुमने अपनी मां के खिलाफ केस बना लिया? दीवाली की रात?
— नहीं, काव्या ने कहा। हमने अपनी बेटी को बचाने के लिए सबूत संभाले।
— बेटी? सरोजिनी ने हिकारत से कहा।
यह शब्द अनन्या तक पहुंचा। वह रोहन के पास बैठी थी। उसकी कटोरी में खीर पड़ी थी, पर उसने चम्मच नहीं उठाया था। केसर की परत जम चुकी थी। उसके छोटे कंधे सिकुड़े हुए थे, जैसे वह कुर्सी पर नहीं, किसी अदालत में कटघरे में बैठी हो।
काव्या के भीतर सालों की आग उठी, मगर उसने आवाज नहीं बढ़ाई। उसके पिता कहा करते थे, “सच को चिल्लाने की जरूरत नहीं होती, बस सही समय पर सामने रखना पड़ता है।”
— पत्र पढ़िए, उसने कहा।
सरोजिनी देवी ने डिब्बी के नीचे रखे सफेद लिफाफे को देखा। उस पर देवेंद्र की लिखावट थी—
“सरोजिनी के लिए। उन सबके सामने पढ़ना, जिन्होंने चुप रहना चुना।”
— मैं यह नहीं पढ़ूंगी।
— तो मैं पढ़ूंगी।
— तुम मुझे मेरे ही घर में बेइज़्ज़त करोगी?
काव्या की आंखें भर आईं, पर आवाज पत्थर जैसी रही।
— इस घर में 8 साल की बच्ची को सबके सामने पराया कहा जा सकता है, पर एक मरे हुए आदमी की चिट्ठी नहीं पढ़ी जा सकती?
कमरे में कोई नहीं बोला।
काव्या ने लिफाफा खोला। कागज़ से हल्की चंदन और पुराने कागज़ की गंध आई। उसे अपने पिता का स्टडी रूम याद आया—लकड़ी की मेज़, पुरानी घड़ी, चाय का कप, और वह आदमी जिसने अपनी नातिन को कभी किनारे नहीं खड़ा होने दिया।
उसने पढ़ना शुरू किया।
“सरोजिनी,
अगर यह पत्र पढ़ा जा रहा है, तो इसका मतलब है कि तुमने फिर एक बच्ची को यह महसूस कराया कि उसे प्यार पाने के लिए तुम्हारे खून की जरूरत थी।
मैंने तुम्हारे गुस्से, तुम्हारी ज़िद, तुम्हारे पक्षपात और तुम्हारी चुप हिंसा को बहुत साल सहा। लेकिन मैं यह सहकर नहीं जा सकता था कि एक मासूम बच्ची अपनी पूरी जिंदगी तुम्हारे अहंकार की सजा भुगते।”
निशांत ने सिर झुका लिया।
काव्या आगे पढ़ती रही।
“मैंने अनन्या को इंतज़ार करते देखा है। जब आरव को तुमने गोद में लिया और उसे सिर्फ सिर पर हाथ रखकर आगे बढ़ गईं। मैंने देखा है कि वह तुम्हारे दिए छोटे कार्ड को भी ऐसे संभालकर रखती थी जैसे उसमें प्यार लिखा हो। मैंने देखा है कि वह मिठाई की प्लेट आखिरी में उठाती थी, ताकि किसी को लगे नहीं कि वह ज्यादा चाहती है। मैंने सुना है तुमने रसोई में कहा था—वह लाई हुई बच्ची है।”
सरोजिनी देवी की आंखें बंद हो गईं।
— बस करो।
— नहीं, काव्या बोली।
उसकी आवाज में दरार थी, लेकिन वह टूटी नहीं।
“जिस दिन काव्या और रोहन उसे घर लाए थे, उसने मेरी उंगली पकड़ ली थी। उसी पल मैं उसका नानू बन गया था। न खून ने पूछा, न नाम ने। उसने मुझे अपने छोटे से संसार में जगह दी।
तुम्हारे पास 8 साल थे।
तुमने उसे जगह नहीं दी।”
अनन्या ने पहली बार ऊपर देखा।
काव्या ने धीमे स्वर में पढ़ना जारी रखा।
“मैं उसे गोवा वाला घर किसी को सजा देने के लिए नहीं दे रहा। मैं उसे इसलिए दे रहा हूं क्योंकि मैंने उसे वहां पहली बार खुलकर हंसते देखा था। वह बरामदे से समुद्र को देखती थी और पूछती थी—नानू, क्या यह घर सबका है?
मैं चाहता हूं कि उसके पास एक ऐसी जगह हो जहां कोई उसे मेहमान न कहे।
मेरी मौत के बाद उस घर से जो भी आय आएगी, वह उसी की होगी। अगर किसी ने वह पैसा लिया है, तो उसे लौटाना होगा।
काव्या को नहीं।
रोहन को नहीं।
अनन्या को।”
मेज़ के चारों ओर बैठे लोग जैसे अपनी-अपनी कुर्सियों में छोटे हो गए। रितु अब रो रही थी। निशांत अपनी मां की तरफ देख भी नहीं पा रहा था। परिवार की बुआ, जो हमेशा कहती थीं कि “सरोजिनी का स्वभाव ही ऐसा है”, आज बिल्कुल चुप थीं।
काव्या आखिरी पंक्तियों तक पहुंची।
“एक बार उसे देखना, सरोजिनी। दया से नहीं। शक से नहीं। उस बच्ची की तरह देखना जो बस चाहती थी कि तुम उसे भी वही खीर परोसो जो बाकी बच्चों को मिली।
मैंने उसे देखा था।
देवेंद्र।”
काव्या ने पत्र मोड़ दिया।
बाहर पटाखे फूट रहे थे, मगर घर के भीतर हर आवाज शर्म से दब गई थी।
अचानक सरोजिनी देवी उठ खड़ी हुईं।
— उसने मुझे धोखा दिया। मेरे पति ने मुझे धोखा दिया। तुम सबने मुझे धोखा दिया।
काव्या ने पत्र मेज़ पर रख दिया।
— पापा ने किसी को धोखा नहीं दिया। उन्होंने एक बच्ची को बचाया।
— वह हमारे खून की नहीं है!
इस बार यह वाक्य छिपा नहीं। यह पूरे कमरे के बीचोंबीच नंगा खड़ा था।
मीरा फूट-फूटकर रो पड़ी।
— दादी, आप बहुत बुरी हो! आप हमेशा अनन्या को अलग करती हो!
रितु ने मीरा का हाथ पकड़ना चाहा, पर मीरा पीछे हट गई।
— मम्मी, आप भी कुछ नहीं बोलतीं।
रितु वहीं जम गई। अपनी ही बेटी के शब्दों ने उसे आईना दिखा दिया था।
अनन्या मीरा को देख रही थी। उसकी आंखों में हैरानी थी, जैसे उसे पहली बार समझ आया हो कि कोई उसके दर्द को देख रहा था, बस अभी तक बोल नहीं पाया था।
सरोजिनी देवी ने काव्या की तरफ उंगली उठाई।
— तुमने सबको मेरे खिलाफ कर दिया।
— नहीं, काव्या ने कहा। आपने सबके सामने खुद बोला।
— मैं अदालत जाऊंगी। वसीयत रद्द करवाऊंगी। वह घर इस लड़की को नहीं मिलेगा।
रोहन ने अपना फोन उठाया।
— रात के खाने से आपकी बातें रिकॉर्ड हो रही थीं। आपका बयान, आपका किराए का इशारा, और अनन्या के लिए इस्तेमाल किए शब्द। कल वकील को ऑडियो भेज दिया जाएगा।
सरोजिनी देवी की सांस अटक गई।
— तुम लोगों ने मुझे रिकॉर्ड किया?
— हमें पता था कि आप सच खुद बोलेंगी।
— मैं तुम्हारी मां हूं!
काव्या ने उस वाक्य को अपने भीतर उतरने नहीं दिया। यही वाक्य सालों से उसे रोकता रहा था। हर बार वह बेटी बनकर चुप हो जाती थी। आज वह मां बनकर खड़ी थी।
— और अनन्या मेरी बेटी है।
सरोजिनी देवी ने कांपते होंठों से कहा—
— तुम एक घर के लिए परिवार तोड़ दोगी?
उसी पल अनन्या उठी। वह धीरे-धीरे दादी के पास गई। उसकी आंखें भीगी थीं, लेकिन उसने डिब्बी दोनों हाथों से पकड़ रखी थी।
— मुझे आपका घर नहीं चाहिए था।
सरोजिनी देवी ने कुछ नहीं कहा।
— मुझे बस चाहिए था कि आप मेरे कार्ड पर मेरा नाम लिख दें।
यह वाक्य किसी भी वसीयत से भारी था।
निशांत ने आंखें पोंछीं। रितु ने सिर झुका लिया। मीरा दौड़कर अनन्या से लिपट गई।
— सॉरी, उसने रोते हुए कहा। मुझे पहले बोलना चाहिए था।
अनन्या ने धीरे से कहा—
— तुमने देखा तो था।
काव्या को उस पल समझ आया कि न्याय सब कुछ ठीक नहीं करता। कागज़ घर लौटा सकते हैं, पैसा लौटा सकते हैं, चाबी लौटा सकते हैं। लेकिन वे 8 साल की चुप चोटें नहीं लौटा सकते। वे वे तस्वीरें नहीं बदल सकते जिनमें एक बच्ची हमेशा किनारे खड़ी रही। वे वे धन्यवाद नहीं मिटा सकते जो उसने प्यार के टुकड़ों के बदले बोले थे।
काव्या ने अनन्या का स्वेटर उठाया।
— हम जा रहे हैं।
निशांत खड़ा हुआ।
— काव्या, रुको। बात कर लेते हैं।
— आज नहीं।
— मुझे नहीं पता था कि बात इतनी गहरी है।
काव्या ने उसे देखा।
— पता था। बस दर्द तुम्हारे बच्चे का नहीं था।
निशांत ने सिर झुका लिया। उसके पास कोई जवाब नहीं था।
सरोजिनी देवी कुर्सी पर बैठ गईं। उनका चेहरा ऐसा था जैसे दीवारों से सारी तस्वीरें उतर गई हों।
— देवेंद्र ने मुझसे सब छीन लिया।
काव्या दरवाजे पर रुकी।
— नहीं। उन्होंने अनन्या को वह दिया जो आपने उससे छीन रखा था—एक जगह।
कार में लौटते हुए कोई कुछ देर तक नहीं बोला। दिल्ली की सड़कें दीवाली की रोशनी से चमक रही थीं। अनन्या की गोद में वह डिब्बी रखी थी। वह अंगूठे से पीतल की पट्टी को छू रही थी।
— मम्मा?
— हां, बेटा।
— नानू को पता था कि मुझे बुरा लगता है?
काव्या का गला भर आया।
— हां। उन्हें पता था।
— तो उन्होंने मुझे भुलाया नहीं?
रोहन ने गाड़ी चलाते हुए धीमे से कहा—
— कभी नहीं।
अनन्या ने डिब्बी से गाल लगा लिया।
— गोवा वाले घर में हम जा सकते हैं?
— जब तुम चाहो, काव्या बोली।
— मीरा को भी बुला सकते हैं?
काव्या ने रियरव्यू मिरर में अपनी बेटी को देखा। जिस बच्ची को अभी सबके सामने चोट दी गई थी, उसका पहला खयाल किसी और को अपने साथ जगह देने का था।
— हां, अगर तुम चाहो।
अनन्या ने कुछ देर सोचा।
— फिर वहां बहुत सारी कुर्सियां रखेंगे।
आने वाले महीने आसान नहीं थे। सरोजिनी देवी ने पहले 1 वकील किया, फिर 2। उन्होंने कहा देवेंद्र पर दबाव डाला गया था। उन्होंने कहा काव्या ने बुजुर्ग पिता को भड़काया था। उन्होंने कहा गोद ली हुई बच्ची को इतनी बड़ी संपत्ति देना परिवार की परंपरा के खिलाफ है।
लेकिन देवेंद्र शर्मा ने सब सोचकर किया था। डॉक्टरों के प्रमाण थे कि उनकी समझ पूरी तरह सही थी। नोटरी के सामने दिए गए बयान थे। बैंक रिकॉर्ड थे। ईमेल थे। वीडियो कॉल की रिकॉर्डिंग थी, जिसमें उन्होंने साफ कहा था—
— अनन्या मेरी नातिन है। यह मेरा निर्णय है।
अप्रैल में अदालत के बाहर समझौते के तहत सरोजिनी देवी को 41 लाख 80 हजार रुपये अनन्या के नाम बने खाते में जमा करने पड़े। किराए की बाकी जांच अलग चलती रही। उन्होंने एक छोटा-सा पत्र भेजा—
“मैं कानूनी मजबूरी में भुगतान कर रही हूं।”
माफी नहीं थी।
काव्या ने जवाब नहीं दिया।
कुछ हफ्तों बाद निशांत का संदेश आया—
“मैंने मां को कभी रोका नहीं। शायद मैं डरता था। अनन्या से कैसे माफी मांगूं?”
काव्या ने लिखा—
“मुझसे नहीं, उससे पूछो। और याद रखना, बच्चे माफी से ज्यादा बदला हुआ व्यवहार देखते हैं।”
मीरा ने अनन्या को एक कार्ड भेजा। उसमें 2 लड़कियां समुद्र किनारे खड़ी थीं। पीछे एक नीले दरवाजे वाला घर था और सामने बड़ी मेज़। ऊपर लिखा था—
“इस बार हम बीच में बैठेंगे।”
अनन्या ने वह कार्ड अपने कमरे की दीवार पर चिपका दिया।
जून की छुट्टियों में वे पहली बार गोवा वाले घर गए।
घर पुराना था, पर उसमें अजीब सुकून था। लकड़ी के दरवाजे नम हवा से फूल गए थे। बरामदे में नारियल के पेड़ों की छाया पड़ती थी। दूर समुद्र की आवाज आती थी। रसोई में अभी भी देवेंद्र का पुराना स्टील का मग रखा था, जिस पर चाय के दाग जमे थे।
अनन्या ने घर में कदम रखते ही चप्पल उतार दी, जैसे मंदिर में आती हो। उसने दीवारों को छुआ, खिड़की की सलाखों को देखा, पुराने झूले पर हाथ फिराया। वह भागी नहीं। वह धीरे-धीरे हर चीज़ को समझ रही थी, जैसे कोई बच्ची पहली बार यकीन करने की कोशिश कर रही हो कि यह जगह सचमुच उसकी है।
काव्या ने शीशम की डिब्बी ड्रॉइंग रूम की शेल्फ पर रखी।
रोहन ने उसके पास देवेंद्र और अनन्या की वही तस्वीर लगा दी।
पहली शाम अनन्या बरामदे में बैठी समुद्र देख रही थी। उसके कंधों पर हल्का शॉल था। काव्या उसके पास आकर बैठ गई।
— क्या सोच रही हो?
अनन्या ने बहुत देर बाद कहा—
— क्या दादी मुझे कभी प्यार करेंगी?
काव्या ने चाहा कि वह तुरंत कह दे, हां। एक मीठा झूठ बोल दे ताकि बच्ची चैन से सो जाए। लेकिन अनन्या ने पहले ही बहुत झूठे रिश्ते झेले थे।
— मुझे नहीं पता, बेटा।
अनन्या ने सिर हिलाया। उसके चेहरे पर दुख था, लेकिन पहले जैसा डर नहीं था।
— लेकिन अब मुझे उनकी मेज़ पर बैठकर इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा, है ना?
काव्या ने उसका हाथ पकड़ लिया।
— कभी नहीं।
अनन्या ने घर की तरफ देखा। पीली रोशनी खिड़कियों से बाहर आ रही थी। वह घर किसी संपत्ति जैसा नहीं लग रहा था। वह किसी जवाब जैसा लग रहा था।
— यहां हम हमेशा एक प्लेट ज्यादा रखेंगे, अनन्या ने कहा।
उस गर्मी में मीरा 12 दिन के लिए आई। फिर रोहन के 2 भतीजे आए। फिर पड़ोस की एक बुजुर्ग आंटी, जिनके पति 5 साल पहले गुजर गए थे, रोज़ शाम चाय पीने आने लगीं। घर में हंसी लौट आई। बरामदे में चप्पलें बिखरने लगीं। रसोई में पराठों की खुशबू आने लगी। समुद्र किनारे तस्वीरें खिंचने लगीं।
और उन तस्वीरों में अनन्या किनारे नहीं थी।
वह बीच में थी।
किसी ने उसे बीच में खड़ा करने की कोशिश नहीं की। लोग खुद उसके पास खड़े हो गए।
एक रात काव्या ने उसे रसोई में प्लेटें निकालते देखा।
— हम तो 6 लोग हैं, उसने कहा।
अनन्या ने 7वीं प्लेट भी निकाल ली।
— मुझे पता है।
— फिर यह किसके लिए?
अनन्या ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
— अगर किसी को जगह चाहिए हो तो?
काव्या कुछ नहीं बोल पाई। उसने देवेंद्र को याद किया—उनकी कांपती उंगलियां, नोटरी के सामने रखा वह कागज़, वह शीशम की डिब्बी, और वह प्रेम जो मरने के बाद भी अपनी नातिन के लिए दरवाजा खोल गया था।
सरोजिनी देवी के पास 8 साल थे, एक कटोरी खीर देने के लिए।
देवेंद्र को सिर्फ 1 डिब्बी चाहिए थी, यह साबित करने के लिए कि अनन्या कभी बाहर की नहीं थी।
वह बस बहुत देर तक गलत मेज़ पर अपनी जगह खोजती रही थी।
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