
भाग 1
ढाबे की खिड़की के पास बैठे वीर प्रताप की चाय अभी आधी ही खत्म हुई थी, तभी 10 साल का एक लड़का उसके सामने आकर खड़ा हो गया और बोला—
—अंकल, पुलिस चौकी कैसे जाना है?
धाबे में बैठे 3 बुलेट सवारों की बातचीत उसी पल थम गई। बाहर दिल्ली-जयपुर हाईवे पर सर्द हवा धूल उड़ा रही थी। अंदर तवे पर पराठे सिक रहे थे, लेकिन उस बच्चे की आवाज में जो ठहराव था, वह किसी बच्चे जैसा नहीं था।
वीर ने कप नीचे रखा। लड़के ने नीली हुडी पहन रखी थी, जिसकी चेन गले तक बंद थी। जींस घुटनों से फटी हुई थी। जूते बड़े थे, जैसे किसी और के पुराने हों। पर सबसे ज्यादा ध्यान खींच रहा था उसके जबड़े के पास पड़ा नीला निशान।
वीर ने धीमे से पूछा—
—पुलिस चौकी क्यों जाना है?
लड़के ने पीछे सड़क की तरफ देखा, जैसे कोई उसका पीछा कर रहा हो। फिर उसने वापस वीर की तरफ देखा।
—मेरा छोटा भाई अभी भी घर में है।
वीर के साथ बैठे कबीर और राघव ने एक-दूसरे को देखा। धाबे में चुप्पी भारी हो गई।
—नाम क्या है तुम्हारा?
—आरव।
—उम्र?
—10।
—घर कहाँ है?
—शिव विहार वाली गली में… यहाँ से करीब 2 किलोमीटर।
वीर ने उसकी आंखों में देखा।
—और पुलिस चौकी?
—6 किलोमीटर आगे।
—तुम पैदल जाओगे?
आरव ने सिर हिलाया।
—हाँ।
वीर ने कुर्सी की तरफ इशारा किया।
—बैठो।
आरव तुरंत नहीं बैठा। उसने पहले दरवाजे को देखा, फिर खिड़की को, फिर वीर को। वह बच्चे की तरह डर नहीं रहा था। वह किसी बड़े आदमी की तरह खतरा नाप रहा था।
वीर ने नरम आवाज में कहा—
—सिर्फ 2 मिनट। गरम दूध पी लो।
धाबे वाले ने बिना पूछे केसर वाला गरम दूध रख दिया। आरव ने गिलास पकड़ा, मगर पिया नहीं। उसकी नजर लगातार सड़क पर थी।
वीर ने पूछा—
—घर में कौन है?
आरव की उंगलियां गिलास पर कस गईं।
—मम्मी… मेरा भाई विहान… और प्रकाश अंकल।
—प्रकाश कौन?
—मम्मी का आदमी। पापा नहीं हैं। मम्मी कहती हैं, वह सहारा है। लेकिन वह सहारा नहीं है।
कबीर की गर्दन तन गई। राघव ने जेब से फोन धीरे से निकाला।
वीर ने पूछा—
—विहान कितने साल का है?
—7।
—तुम उसे साथ क्यों नहीं लाए?
आरव ने पहली बार दूध का छोटा सा घूंट लिया। उसके होंठ कांपे नहीं, आवाज भी नहीं टूटी।
—क्योंकि मुझे नहीं पता था रास्ता कितना लंबा है। वह जल्दी थक जाता। और अगर प्रकाश अंकल जाग जाते, तो हम दोनों पकड़े जाते।
—तुम कब निकले?
—लगभग 1 घंटा पहले। जब वह पिछवाड़े में गया था।
—माँ?
आरव ने नीचे देखा।
—मम्मी वहीं हैं। पर वह बाहर नहीं आतीं। वह कहती हैं, सब ठीक हो जाएगा। पर कुछ ठीक नहीं होता।
वीर ने और कुछ नहीं पूछा। कभी-कभी बच्चे पूरा सच शब्दों से नहीं बताते, उनके शरीर बता देते हैं। आरव की कलाई पर हुडी की बांह बार-बार नीचे खिंच रही थी। वह हर आदमी को दरवाजे से अंदर आते देख रहा था। हर भारी कदम पर उसका कंधा सख्त हो जाता था।
राघव थोड़ा दूर जाकर फोन पर बात करने लगा। कबीर ने पुलिस चौकी का नंबर खोजा।
वीर ने आरव से कहा—
—हम तुम्हारी मदद करेंगे। लेकिन तुम अब अकेले कहीं नहीं जाओगे।
आरव ने पहली बार उसकी ओर सीधे देखा।
—आप पुलिस हैं?
—नहीं।
—फिर क्यों मदद करेंगे?
वीर कुछ पल चुप रहा।
—क्योंकि कभी-कभी सड़क पर मिले अजनबी भी घरवालों से ज्यादा इंसान निकलते हैं।
आरव की आंखें भर आईं, मगर उसने रोने नहीं दिया।
तभी राघव वापस आया। उसका चेहरा गंभीर था।
—उस पते से 8 महीने पहले भी शिकायत हुई थी। केस दब गया। पुलिस 20 मिनट कह रही है।
आरव ने सब सुन लिया। वह चुप रहा, लेकिन उसके चेहरे पर डर फिर से लौट आया।
—20 मिनट बहुत होते हैं। अगर प्रकाश अंकल को पता चल गया कि मैं गया हूँ… तो वह विहान को बंद कर देगा।
वीर ने कुर्सी पीछे धकेली। उसने मेज पर पैसे रखे और जैकेट पहन ली।
—चलो।
आरव खड़ा रह गया।
—कहाँ?
वीर ने बाहर खड़ी 3 बुलेट की तरफ देखा।
—शिव विहार। तुम्हारे भाई को लेने।
भाग 2
शिव विहार की गली में सूरज ढल चुका था। तंग सड़क के दोनों ओर पुराने मकान खड़े थे। वीर ने घर से आधा मोड़ पहले बाइक रोकी। आरव ने कांपते हाथ से सामने की तरफ इशारा किया।
—वही घर… नीला दरवाजा… बाहर काली स्कॉर्पियो।
वीर ने देखा। एक मंजिला मकान, टूटी नेमप्लेट, बरामदे में प्लास्टिक की कुर्सी, और खिड़की के पीछे पीली रोशनी। घर सामान्य लग रहा था, लेकिन आरव की सांसें बता रही थीं कि भीतर कुछ सामान्य नहीं था।
कबीर पीछे की गली की तरफ चला गया। राघव मोड़ पर खड़ा रहा। वीर ने आरव से कहा—
—तुम यहीं रहो।
—मैं भी चलूंगा।
—नहीं। तुम्हारे दिखते ही वह समझ जाएगा।
आरव ने दांत भींचे।
—वह अचानक चीजों पर बहुत बुरा करता है।
वीर ने उसकी ओर देखा।
—तो आज उसे भी पता चलेगा कि कुछ लोग अचानक डरते नहीं।
वीर ने दरवाजे पर 3 बार दस्तक दी। अंदर सन्नाटा रहा। फिर हल्के कदम आए। दरवाजा चेन लगाकर खुला। सामने एक औरत थी, 30 से कुछ ऊपर, मगर चेहरे पर ऐसी थकान जैसे कई सालों से नींद उधार पर चल रही हो।
—कौन?
—मेरा नाम वीर है। आपका बेटा आरव हाईवे वाले ढाबे पर मिला था। वह सुरक्षित है।
औरत का चेहरा एक पल के लिए टूट गया। उसकी आंखें सड़क की तरफ भागीं, जहाँ आरव खड़ा था। फिर उसने तुरंत खुद को संभाल लिया।
—उसे नहीं जाना चाहिए था।
—मुझे बस यह देखना है कि अंदर छोटा बच्चा ठीक है।
उसी समय घर के अंदर से भारी कदमों की आवाज आई। औरत का चेहरा सफेद पड़ गया। उसके पीछे एक मोटा-तगड़ा आदमी आकर खड़ा हो गया।
—कौन है तू?
वीर ने शांत रहकर कहा—
—एक आदमी, जिसे आपका बड़ा लड़का रास्ते में मिला।
प्रकाश की नजर सड़क पर गई। उसने आरव को देखा।
—आरव! घर के अंदर आ!
आरव नहीं हिला।
प्रकाश की आवाज धीमी हो गई, और वही धीमापन सबसे खतरनाक था।
—यह हमारा घर है। निकल जा।
वीर ने दरवाजे से पैर नहीं हटाया।
—मैं चला जाऊंगा। पहले विहान को देख लूं।
यह नाम सुनते ही प्रकाश की आंखें बदल गईं।
—विहान तेरा कौन लगता है?
—आज के लिए, चिंता करने वाला कोई।
पीछे से छोटे कदमों की आहट आई। 7 साल का विहान दीवार से सटा हुआ बाहर आया। उसकी आंखें सीधे आरव को ढूंढ रही थीं।
—भैया…
आरव का चेहरा टूट गया।
—विहान!
विहान आगे बढ़ना चाहता था, मगर प्रकाश ने उसका कंधा पकड़ लिया। पकड़ जोर की नहीं थी, लेकिन मतलब साफ था।
वीर की आवाज अब पत्थर जैसी हो गई।
—हाथ हटाइए।
प्रकाश मुस्कुराया।
—वरना?
उसी पल कबीर पिछली गली से आकर बरामदे के पास खड़ा हो गया। राघव भी सीढ़ियों के नीचे आ गया। तीनों ने कुछ नहीं किया, बस खड़े रहे। प्रकाश ने हिसाब लगाया और धीरे-धीरे विहान का कंधा छोड़ दिया।
विहान भागा। वह सीधे आरव से लिपट गया। दोनों भाई सड़क पर एक-दूसरे को पकड़े खड़े रहे, जैसे अगर छोड़ा तो दुनिया फिर उन्हें अलग कर देगी।
वीर ने औरत की तरफ देखा।
—नाम?
—मीरा।
—मीरा जी, बाहर आना चाहेंगी?
प्रकाश गरजा—
—वह कहीं नहीं जाएगी।
वीर ने उसकी तरफ नहीं देखा।
—यह फैसला उनका होगा।
मीरा ने अपने बेटों को देखा। बहुत देर तक देखा। फिर उसने होंठ खोले, मगर आवाज नहीं निकली। वह पीछे हट गई।
—मैं… अभी नहीं जा सकती।
आरव ने सुन लिया। उसके चेहरे पर चोट पुराने निशान से गहरी थी।
तभी गली के मोड़ पर पुलिस की जीप की हेडलाइट चमकी, और प्रकाश के चेहरे से पहली बार रंग उतर गया।
भाग 3
पुलिस की जीप बिना सायरन के गली में आई। 2 पुलिसकर्मी उतरे, एक महिला इंस्पेक्टर और एक उम्रदराज हवलदार। उनके कदमों में जल्दबाजी नहीं थी, पर उनकी आंखें सब कुछ नाप रही थीं—दरवाजे पर खड़ा प्रकाश, सड़क पर चिपके 2 बच्चे, तीनों बुलेट सवार, और दरवाजे के भीतर आधी छिपी मीरा।
महिला इंस्पेक्टर ने वीर से पूछा—
—कॉल आपने की थी?
वीर ने राघव की तरफ इशारा किया।
—हमने बच्चे को हाईवे वाले ढाबे पर पाया। बड़ा लड़का पुलिस चौकी पैदल जाने वाला था। छोटे को घर में छोड़ आया था।
इंस्पेक्टर ने आरव को देखा। फिर विहान को। दोनों भाइयों के हाथ एक-दूसरे से अलग नहीं हो रहे थे।
—पहले भी इस पते से शिकायत आई थी? 8 महीने पहले?
राघव ने कहा—
—डिस्पैच ने यही बताया।
इंस्पेक्टर की आंखें सिकुड़ गईं। वह सीधे दरवाजे की ओर बढ़ी।
—प्रकाश यादव?
प्रकाश ने तुरंत अपना चेहरा बदल लिया। वह वही आदमी बन गया जो समाज में इज्जतदार दिखना चाहता है।
—जी मैडम, लेकिन यह सब गलतफहमी है। बच्चे जिद्दी हैं। आजकल के बच्चे मोबाइल और झूठ से सबको नचा देते हैं। यह बाइक वाले लोग हमारे घर में दखल दे रहे हैं।
इंस्पेक्टर ने सपाट आवाज में कहा—
—बच्चे के पास मोबाइल नहीं था। वह पुलिस चौकी का रास्ता पूछ रहा था।
प्रकाश चुप हुआ। फिर बोला—
—घर का मामला है।
इंस्पेक्टर की आंखें ठंडी हो गईं।
—जब बच्चा घर से भागकर पुलिस ढूंढे, तब वह सिर्फ घर का मामला नहीं रहता।
हवलदार ने प्रकाश को बरामदे की कुर्सी पर बैठने को कहा। वह बैठ तो गया, लेकिन उसकी नजर लगातार मीरा पर थी। वह नजर कह रही थी—कुछ बोली तो देख लेना।
मीरा दरवाजे के पास पत्थर की तरह खड़ी थी। उसका पल्लू हाथ में मरोड़ा जा रहा था। उसकी आंखें बच्चों पर थीं, मगर पैरों में जैसे जंजीरें थीं।
इंस्पेक्टर उसके सामने आकर रुकी।
—आप माँ हैं?
मीरा ने सिर हिलाया।
—नाम?
—मीरा शर्मा।
—क्या आप बच्चों के साथ थाने चलना चाहेंगी?
मीरा ने तुरंत प्रकाश की तरफ देखा। यह देखना इतना छोटा था कि कोई अनदेखा कर सकता था, लेकिन वीर ने नहीं किया। आरव ने भी नहीं किया।
प्रकाश ने धीमे से कहा—
—सोच समझकर बोलना, मीरा। कल से किराया, खाना, स्कूल फीस… सब कौन देगा?
आरव ने पहली बार जोर से कहा—
—मम्मी, स्कूल फीस 3 महीने से रुकी है। आपने अपने कंगन बेचे थे। वह पैसे भी इन्होंने ले लिए थे।
गली में खड़े 2 पड़ोसी अब पूरी तरह दरवाजों से बाहर आ चुके थे। किसी ने कुछ नहीं कहा, लेकिन सब सुन रहे थे।
प्रकाश उठने लगा।
—चुप! बड़े लोगों की बात में—
हवलदार ने हाथ आगे कर दिया।
—बैठे रहिए।
विहान ने आरव का हाथ और कस लिया। वह अब तक चुप था, लेकिन उसका चेहरा पीला पड़ गया था। महिला इंस्पेक्टर ने झुककर उससे बहुत नरम आवाज में पूछा—
—बेटा, नाम क्या है?
—विहान।
—डर लग रहा है?
विहान ने प्रकाश की तरफ देखा। फिर आरव की तरफ। फिर बहुत धीरे कहा—
—अगर मैं सच बोलूंगा तो मम्मी रोएंगी।
मीरा का चेहरा वहीं टूट गया। वह एक कदम बाहर आई।
—विहान…
विहान की आंखों में पानी आ गया।
—मम्मी, उस रात जब आपने कहा था कि सब ठीक हो जाएगा, तब भी भैया ने मुझे अलमारी के पीछे छिपाया था। आज भी अगर भैया नहीं जाते तो…
वह आगे नहीं बोल पाया। आरव ने उसका सिर अपनी छाती से लगा लिया।
इंस्पेक्टर ने मीरा को समय दिया। कुछ सच ऐसे होते हैं जिन्हें बाहर लाने से पहले आदमी को अपने ही डर से लड़ना पड़ता है। मीरा ने प्रकाश की तरफ देखा। वह वही आदमी था जिसे उसने 2 साल पहले घर में आने दिया था, यह सोचकर कि विधवा औरत अकेली नहीं रह सकती। वही आदमी जिसने पहले राशन उठाया, फिर फैसले उठाए, फिर बच्चों की आवाज उठानी बंद करा दी। धीरे-धीरे उसने घर को घर नहीं, अपनी चौकी बना दिया था।
मीरा की शादी 11 साल पहले अमित से हुई थी। अमित ऑटो चलाता था। वह अमीर नहीं था, लेकिन हर शाम घर लौटते हुए बच्चों के लिए 5 रुपये की टॉफी जरूर लाता था। 3 साल पहले सड़क हादसे में अमित चला गया। उसी के बाद मीरा ने घरों में खाना बनाने का काम शुरू किया। पहले सब संभल रहा था। फिर मकान मालिक ने किराया बढ़ाया, स्कूल ने फीस मांगी, और रिश्तेदारों ने सलाह दी—
—एक औरत अकेले 2 बच्चों को नहीं पाल सकती।
प्रकाश उसी समय आया था। वह मीरा के दूर के रिश्ते में किसी जान-पहचान वाले का परिचित था। उसने शुरुआत में मदद की। राशन लाया, बिजली बिल भरा, बच्चों को पतंग दिलाई। आरव को उसने पहली बार ही पसंद नहीं किया था। क्योंकि आरव हर बात देखता था। हर झूठ पकड़ता था। हर रात दरवाजे की आहट सुनकर जाग जाता था।
प्रकाश ने धीरे-धीरे मीरा को यह यकीन दिलाया कि बच्चे बिगड़ रहे हैं। उसने कहा आरव जिद्दी है, विहान कमजोर है, और घर में सख्ती जरूरी है। मीरा ने शुरुआत में रोका। फिर उसे डराया गया—किराया बंद, राशन बंद, मोहल्ले में बदनामी, बच्चों को उससे छीन लेने की धमकी। डर ने मीरा की आवाज को रोज थोड़ा-थोड़ा कम कर दिया।
लेकिन आरव की आवाज नहीं मरी। उसने हर चीज याद रखी—किस दिन प्रकाश ने माँ की मजदूरी के पैसे छीने, किस दिन विहान को कमरे में बंद किया, किस दिन स्कूल की कॉपी फाड़ी, किस दिन माँ को कहा—
—तेरे बच्चों को पाल रहा हूँ, एहसान मान।
और आज, जब प्रकाश पिछवाड़े में गया था और विहान चुपचाप रो रहा था, आरव ने तय कर लिया था कि वह अब 10 साल का नहीं रहेगा। वह भाई बनेगा। वह पिता की जगह खड़ा होगा। वह पुलिस ढूंढेगा, चाहे 6 किलोमीटर पैदल जाना पड़े।
मीरा ने कांपते हुए कहा—
—मैडम… मैं बयान दूंगी।
प्रकाश ने गर्दन उठाई।
—मीरा!
उस एक शब्द में धमकी थी, आदत थी, मालिकाना हक था। पर इस बार मीरा ने आंख नहीं झुकाई।
—बस, प्रकाश। बहुत हो गया।
गली में जैसे हवा रुक गई।
मीरा सड़क पर पूरी तरह बाहर आ गई। उसने दोनों बेटों को अपनी ओर खींचा। पहले विहान को छुआ, फिर आरव के चेहरे पर हाथ रखा। उसके अंगूठे ने जबड़े के पास नीले निशान को छुआ तो उसकी सांस अटक गई।
—यह कब हुआ?
आरव ने झूठ बोलना चाहा। वह अब भी माँ को बचाना चाहता था। लेकिन विहान ने फुसफुसाया—
—कल रात।
मीरा की आंखों से आंसू गिरे, मगर वह टूटकर बैठी नहीं। वह सीधी खड़ी रही। शायद पहली बार आरव ने अपनी माँ को सिर्फ डरी हुई नहीं, जिंदा देखा।
महिला इंस्पेक्टर ने हवलदार को इशारा किया। प्रकाश को जीप के पास ले जाया गया। वह अब भी बोल रहा था—
—झूठ है। सब झूठ है। मैंने इनका घर चलाया है। यही औरत कल रोती हुई मेरे पास आएगी।
मीरा ने सुन लिया। उसने धीरे से कहा—
—कल मैं काम पर जाऊंगी। रोने नहीं।
यह वाक्य छोटा था, पर उस घर की दीवारों पर वर्षों से चिपके डर को पहली बार दरार पड़ी।
इंस्पेक्टर ने पूछा—
—आपके पास कहीं जाने की जगह है?
मीरा ने सिर झुका लिया।
—नहीं। मायका गाँव में है, पर वहाँ भी लोग पहले यही पूछेंगे कि वापस क्यों आई। मेरे पास पैसे भी नहीं हैं।
वीर ने कुछ बोलने के लिए मुंह खोला, मगर इंस्पेक्टर ने पहले ही कहा—
—थाने में महिला सहायता केंद्र है। आज रात आप वहीं रहेंगी। फिर संरक्षण गृह, कानूनी मदद, स्कूल की बात—सब एक-एक करके होगा। अभी बस बच्चों के साथ चलिए।
मीरा ने आरव की तरफ देखा।
—तू मुझे माफ करेगा?
आरव ने जवाब नहीं दिया। वह 10 साल का था, लेकिन उसके अंदर 100 रातों की थकान जमा थी। वह माँ से प्यार करता था, पर उस प्यार में शिकायत भी थी। वह उसे छोड़ना नहीं चाहता था, पर उसे यह भी याद था कि कई रात उसने माँ की चुप्पी से ज्यादा डर महसूस किया था।
वीर ने धीरे से कहा—
—माफ करने की जल्दी मत करो। पहले सुरक्षित हो जाओ।
आरव ने उसकी तरफ देखा। यह वाक्य उसके भीतर कहीं गहरे उतर गया। शायद पहली बार किसी बड़े ने उससे यह नहीं कहा था कि माँ है तो सब माफ कर दो। पहली बार किसी ने कहा था कि उसका दर्द भी सच है।
विहान ने माँ का हाथ पकड़ा।
—मम्मी, आज हम बाहर सोएंगे?
मीरा घुटनों के बल बैठ गई।
—नहीं बेटा। आज हम डर के बाहर सोएंगे।
विहान को शायद पूरा मतलब समझ नहीं आया, लेकिन उसने माँ को गले लगा लिया। आरव थोड़ी देर खड़ा रहा। फिर बहुत धीरे वह भी झुककर उस आलिंगन में शामिल हो गया। मीरा ने उसे इतना कसकर पकड़ा जैसे डर हो कि वह फिर कहीं मदद ढूंढने अकेला न निकल जाए।
कबीर सड़क किनारे खड़ा यह दृश्य देख रहा था। वह आमतौर पर कम बोलता था, लेकिन उसकी आंखें लाल थीं। राघव ने जेब से एक छोटा पैकेट निकाला—बिस्कुट और मूंगफली। उसने विहान को दिया।
—हीरो लोग भूखे नहीं रहते।
विहान ने पहली बार हल्की मुस्कान दी।
—मैं हीरो नहीं हूँ। भैया है।
आरव ने तुरंत कहा—
—नहीं, तू भी है। तूने सच बोला।
वीर ने दोनों को देखा। उसे लगा, इन बच्चों ने आज किसी अदालत से पहले अपने घर में ही फैसला सुना दिया था—डर जीतता है सिर्फ तब तक, जब तक कोई बच्चा सड़क पर निकलकर पूछ न ले कि पुलिस चौकी कहाँ है।
थाने जाने से पहले महिला इंस्पेक्टर ने आरव का बयान लिया। आरव ने सब कुछ सीधा-सीधा बताया। वह रोया नहीं। उसने बातों को सजाया नहीं। उसने बस सच रखा—कौन सा कमरा, कौन सा दरवाजा, कब माँ रोई, कब विहान छिपा, कब प्रकाश ने कहा कि पुलिस को बुलाया तो सबको सड़क पर फेंक देगा। इंस्पेक्टर ने बीच में उसे रोका नहीं।
जब बयान खत्म हुआ, उसने पूछा—
—तुम्हें रास्ता कैसे पता चला?
आरव ने कहा—
—पता नहीं था। इसलिए पूछने गया था।
—और अगर कोई मदद नहीं करता?
आरव ने वीर की बाइक की तरफ देखा।
—तो मैं चलते-चलते पहुँच जाता।
वीर ने सुनकर गर्दन झुका ली। यह साहस नहीं था। यह मजबूरी थी। और बच्चों की मजबूरी को अक्सर लोग बहादुरी कहकर अपने अपराध हल्के कर लेते हैं।
मीरा और दोनों बच्चों को पुलिस जीप में बैठाया गया। प्रकाश दूसरी जीप में था। इस बार वह चिल्लाया नहीं। शायद उसे पहली बार समझ आया था कि जिस घर को वह अपनी मुट्ठी समझता था, उसी घर का 10 साल का बच्चा उसकी मुट्ठी खोल आया है।
जीप का दरवाजा बंद होने से पहले विहान ने खिड़की से सिर निकाला।
—बुलेट अंकल!
कबीर हंस पड़ा।
—हाँ, कप्तान?
—कल बर्फ पड़ेगी?
गुरुग्राम की सर्दी में बर्फ पड़ने का कोई सवाल नहीं था, फिर भी कबीर ने आसमान की तरफ देखकर कहा—
—अगर नहीं पड़ी, तो भी गरम जलेबी पक्का पड़ेगी।
विहान हंस दिया। वह हंसी छोटी थी, टूटी हुई थी, लेकिन सच थी।
आरव ने खिड़की से वीर को देखा।
—आप थाने नहीं आओगे?
—जरूरत पड़ी तो आऊंगा। अभी तुम्हारे साथ तुम्हारी माँ है, पुलिस है, और तुम्हारा भाई है।
आरव ने कुछ पल उसे देखा।
—आपने कहा था अजनबी भी इंसान निकलते हैं।
—हाँ।
—तो क्या घर वाले भी दोबारा इंसान बन सकते हैं?
वीर ने मीरा की तरफ देखा। वह सिर झुकाए बैठी थी, आरव का हाथ पकड़े हुए। उसका अपराध खत्म नहीं हुआ था, लेकिन उसकी हिम्मत शुरू हो चुकी थी।
—कभी-कभी बन सकते हैं। अगर वे सच से भागना बंद कर दें।
आरव ने धीमे से सिर हिलाया। फिर उसने खिड़की बंद कर दी।
जीप चली गई। गली फिर शांत हो गई। नीले दरवाजे वाला घर खाली खड़ा था। बरामदे की पीली बत्ती अब भी जल रही थी। प्लास्टिक की कुर्सी वहीं पड़ी थी, जैसे अभी भी कोई आदमी उस पर बैठकर आदेश देगा। मगर दरवाजे के बाहर अब डर नहीं था। डर पुलिस की जीप में नहीं गया था। डर उसी खाली घर में बंद रह गया था।
वीर ने दस्ताने पहने। कबीर और राघव अपनी बुलेट के पास आए। कुछ देर कोई कुछ नहीं बोला।
फिर राघव ने कहा—
—ढाबे पर लौटें?
वीर ने सड़क की ओर देखा।
—हाँ। वहाँ 2 गरम दूध का हिसाब बाकी है।
कबीर ने इंजन चालू किया।
—और शायद जलेबी भी।
तीनों बुलेट की आवाज गली में गूंजी, मगर इस बार वह आवाज डराने वाली नहीं थी। वह किसी बंद कमरे की कुंडी टूटने जैसी थी। वे हाईवे की ओर मुड़े। पीछे नीला दरवाजा छोटा होता गया।
उस रात महिला सहायता केंद्र के एक छोटे कमरे में मीरा पहली बार अपने दोनों बेटों के बीच सोई। विहान नींद में भी आरव की उंगली पकड़े रहा। आरव देर तक जागता रहा। वह छत देखता रहा, फिर माँ का चेहरा, फिर छोटे भाई की बंद आंखें।
मीरा ने धीरे से कहा—
—नींद नहीं आ रही?
आरव ने पूछा—
—कल हम वापस उसी घर नहीं जाएंगे न?
मीरा की आंखें भर आईं। उसने इस बार कोई झूठ नहीं बोला, कोई कमजोर सांत्वना नहीं दी।
—नहीं। अब नहीं।
आरव ने पहली बार आंखें बंद कीं।
सुबह जब महिला इंस्पेक्टर कागज लेकर आई, मीरा ने हर पन्ने पर हस्ताक्षर किए। शिकायत, सुरक्षा आवेदन, स्कूल सहायता फॉर्म, अस्थायी आश्रय का कागज। उसके हाथ कांप रहे थे, लेकिन हर हस्ताक्षर पिछले डर पर एक रेखा की तरह गिर रहा था।
कुछ हफ्तों बाद मीरा ने पास के सरकारी स्कूल में रसोई सहायक का काम शुरू किया। आरव और विहान उसी स्कूल में दाखिल हुए। फीस की जगह सरकारी योजना लगी। किताबें मिलीं। यूनिफॉर्म मिली। शुरुआत आसान नहीं थी। मोहल्ले वाले बातें करते थे। रिश्तेदार सलाह देते थे। कई रात मीरा रोती थी। कई बार आरव चुप रहता था। कई बार विहान अचानक डरकर उठ जाता था।
लेकिन अब दरवाजा बंद होने पर भी भीतर कोई भारी कदम नहीं आता था।
एक महीने बाद हाईवे वाले उसी ढाबे पर वीर, कबीर और राघव चाय पी रहे थे। बाहर धूप थी। तभी एक स्कूल वैन रुकी। उसमें से आरव उतरा, उसके पीछे विहान। दोनों के पास स्कूल बैग थे। मीरा ने दूर से हाथ जोड़कर नमस्ते किया।
विहान दौड़कर कबीर के पास गया।
—बुलेट अंकल, जलेबी याद है?
कबीर ने हंसते हुए कहा—
—तुम्हारी याददाश्त तो पुलिस से भी तेज है।
आरव वीर के सामने आकर रुका। अब भी वह उतना ही गंभीर था, लेकिन उसकी आंखों में लगातार रास्ता नापने वाली बेचैनी कम थी।
—मैंने स्कूल में निबंध लिखा।
—किस पर?
—साहस पर।
वीर मुस्कुराया।
—क्या लिखा?
आरव ने बैग से कॉपी निकाली। पन्ने पर साफ अक्षरों में लिखा था—
“साहस यह नहीं कि डर नहीं लगता। साहस यह है कि डर लगे, फिर भी छोटे भाई का हाथ पकड़ने के लिए रास्ता ढूंढा जाए।”
वीर ने पन्ना धीरे से बंद किया। कुछ बातें पढ़ी नहीं जातीं, भीतर रखी जाती हैं।
विहान जलेबी खाते हुए बोला—
—अब हमारा घर छोटा है, लेकिन मम्मी कहती हैं वहाँ डर नहीं रहता।
मीरा की आंखें फिर भर आईं, मगर इस बार वे आंसू हार के नहीं थे।
वीर ने आरव के सिर पर हाथ नहीं रखा। उसने बस उसके सामने चाय का खाली कप सरकाया और कहा—
—कभी रास्ता पूछना पड़े, तो पूछ लेना। पर इस बार अकेले मत चलना।
आरव ने पहली बार पूरा मुस्कुराया।
—अब मैं अकेला नहीं हूँ।
ढाबे के बाहर हाईवे पर गाड़ियां भाग रही थीं। लोग आते-जाते रहे। किसी को नहीं पता था कि इसी जगह एक दिन 10 साल का बच्चा पुलिस चौकी का रास्ता पूछने आया था, और उसी सवाल ने 3 लोगों को बाइक से उठाकर एक घर की चुप्पी तोड़ दी थी।
दुनिया अक्सर बड़े फैसलों से नहीं बदलती। कभी-कभी वह सिर्फ एक बच्चे की स्थिर आवाज से बदलती है—
—अंकल, पुलिस चौकी कैसे जाना है?
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.