
भाग 1
गर्म प्रेस सिया के 8 महीने के पेट से बस 2 cm दूर रुकी ही थी कि पीछे का दरवाज़ा इतनी ज़ोर से खुला कि दीवार पर लगी तुलसी की माला नीचे गिर गई, और मेजर अर्जुन राणा, जिसे भारतीय सेना ने 4 महीने पहले लापता और लगभग मृत घोषित कर दिया था, धूल से भरी वर्दी, टूटी हुई गेंदे की माला और आंखों में युद्ध की राख लिए घर के अंदर खड़ा था।
सिया चीखना चाहती थी, पर आवाज़ गले में अटक गई। वह गुरुग्राम के सेक्टर 45 वाले राणा हाउस की रसोई के पास लकड़ी की कुर्सी पर फंसी हुई बैठी थी। उसके हाथ कांप रहे थे, सांस छोटी-छोटी हो रही थी, और उसके मैरून सूट का दुपट्टा एक किनारे से जल चुका था। कमरे में जले कपड़े की गंध, गरम लोहे की भाप और डर का ऐसा धुआं भरा था जैसे कोई हादसा अभी खत्म नहीं हुआ, बस अगले पल फिर शुरू होने वाला हो।
सावित्री देवी ने अपने बेटे को देखकर चीख नहीं मारी। वह बस जड़ हो गईं। सफेद रेशमी साड़ी, मोती की माला, माथे पर बड़ी लाल बिंदी और चेहरे पर वही ठंडी शान, जिससे उन्होंने इस घर के हर नौकर, हर रिश्तेदार और पिछले 6 महीनों से सिया को चुप कराया था।
अर्जुन ने मां की तरफ दौड़कर कदम नहीं बढ़ाया। उसने सिया को छुआ भी नहीं, मानो उसे डर हो कि वह छूते ही टूट जाएगी। उसने केवल अपने हाथ की मुरझाई गेंदे की माला फर्श पर गिरने दी, मोबाइल निकाला और सीधे पुलिस कंट्रोल रूम पर कॉल लगा दी।
—इंस्पेक्टर साहब, तुरंत मेरे घर पर पुलिस भेजिए। मैं अपनी गर्भवती पत्नी पर हत्या की कोशिश की रिपोर्ट कर रहा हूं।
सावित्री देवी की पलकें फड़कीं। पहली बार उनका चेहरा वैसा नहीं था जैसा मंदिर की आरती में दिखता था। मेज पर नीली फाइल खुली पड़ी थी। उसके ऊपर एक सुनहरी कलम रखी थी, और अंदर सिया से हस्ताक्षर करवाने के लिए तैयार कागज़ थे: बच्चे की अस्थायी अभिभावकता, मानसिक अस्थिरता का बयान, डॉक्टरों के झूठे नोट, और परिवार की इज़्ज़त बचाने के नाम पर बनाए गए कानूनी जाल।
—अर्जुन, बेटा… —सावित्री देवी की आवाज़ अचानक टूट गई— तू समझ नहीं रहा। यह लड़की अब ठीक नहीं है।
अर्जुन धीरे-धीरे आगे बढ़ा और सिया तथा अपनी मां के बीच खड़ा हो गया। उसकी परछाईं मेज पर रखे कागज़ों पर पड़ गई।
सिया ने उसे देखा। 4 महीने तक उसने माना था कि अर्जुन लद्दाख की किसी गुप्त सैन्य अस्पताल में बेहोश पड़ा है। 4 महीने तक उसने एक आधिकारिक पत्र को सीने से लगाकर रोया था, जिसमें लिखा था कि मेजर अर्जुन राणा दुश्मन सीमा के पास एक ऑपरेशन में घायल हुए हैं और परिवार से संपर्क उनकी सुरक्षा के लिए रोक दिया गया है। 4 महीने तक सावित्री देवी ने उसे रात में केसर वाला दूध दिया, उसके फोन से मैसेज मिटाए, उसके डॉक्टर की अपॉइंटमेंट रद्द की और रोज़ कहा कि गर्भावस्था ने उसका दिमाग़ कमजोर कर दिया है।
अब अर्जुन उसी रसोई में खड़ा था।
ज़िंदा।
और वह पत्र, जिसने सिया की दुनिया को जिंदा रहते विधवा बना दिया था, उसी फाइल में दबा था जहां सावित्री देवी उसकी अजन्मी बेटी को उससे छीनने का इंतज़ाम कर चुकी थीं।
अर्जुन ने फाइल उठाई। उसने एक-एक पन्ना पलटा। हर पन्ने में सिया को अस्थिर, खतरनाक, भ्रमित और मां बनने के अयोग्य दिखाने की कोशिश थी।
“सिया राणा को रात में भ्रम होते हैं।”
“सिया जरूरी बातें भूल जाती है।”
“सिया नवजात बच्ची के लिए खतरा बन सकती है।”
उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं आया, पर कागज़ पकड़ते हुए उसकी उंगलियों की नसें उभर आईं।
—ये सब किसने लिखा?
सावित्री देवी ने अपने सीने पर हाथ रखा।
—मैंने सिर्फ वही दर्ज करवाया जो इस घर ने देखा। तू यहां नहीं था, अर्जुन। तुझे नहीं पता यह रात में कैसे चिल्लाती थी, कैसे कहती थी कि मैं इसका फोन छुपाती हूं, कैसे अपने ही शब्द भूल जाती है।
—आपने सच में मेरा फोन छुपाया था —सिया की आवाज़ फट गई— मेरी डॉक्टर वाली फाइल गायब की। अर्जुन के पत्र रोके। मेरे घरवालों को बोल दिया कि मैं आराम कर रही हूं।
सावित्री देवी ने उसे दया से देखा, लेकिन उस दया में ज़हर था।
—देख बेटा, यही तो कह रही हूं। हर बात में आरोप। हर बात में शक।
अर्जुन ने फाइल के नीचे दबा एक मुड़ा हुआ पत्र निकाला। उसे खोलते ही कमरे की हवा बदल गई। वह वही सैन्य सूचना थी जिसे देखकर सिया 4 महीने तक सो नहीं पाई थी।
अर्जुन ने उसे पढ़ा। फिर दोबारा पढ़ा। फिर मां की तरफ देखा।
—यह फर्जी है।
—तू अभी सदमे में है। बॉर्डर से लौटा है। तुझे आराम की ज़रूरत—
—भारतीय सेना ऐसा पत्र इस फॉर्मेट में नहीं भेजती —अर्जुन ने काटते हुए कहा— सिग्नेचर गलत है। यूनिट कोड गलत है। और मेरी पोस्टिंग की जानकारी किसी सिविल घर में इस तरह नहीं आती।
सावित्री देवी का चेहरा राख जैसा हो गया।
उसी समय बाहर पुलिस सायरन की आवाज़ सुनाई दी। बारिश की हल्की बूंदों के बीच गली में लाल-नीली रोशनी चमकने लगी। पड़ोस की खिड़कियां खुलने लगीं। सामने वाले शर्मा अंकल बरामदे में आ गए। नौकरानी किचन के पीछे खड़ी कांप रही थी।
सिया के पेट में तेज़ खिंचाव उठा। उसने दांत भींच लिए।
अर्जुन ने बिना पीछे देखे कहा:
—मेरे साथ सांस लो, सिया। अभी नहीं टूटना।
—वह मुझे साइन करवाना चाहती थीं —सिया रो पड़ी— उन्होंने कहा अगर मैंने बच्ची की गार्जियनशिप नहीं छोड़ी, तो मेरी बेटी सही-सलामत पैदा नहीं होगी।
अर्जुन की आंखों में एक गहरी, खामोश आग उतर आई।
सावित्री देवी ने दरवाज़े की तरफ देखा। अगले ही पल उनके चेहरे से डर गायब हो गया और उसकी जगह ऐसा रोना आ गया, जैसे वे किसी टीवी सीरियल की सबसे दुखी मां हों।
वह पुलिस के अंदर आने से पहले ही दरवाज़े की तरफ भागीं।
—भगवान का शुक्र है आप लोग आ गए! मेरी बहू पागल हो गई है! खुद को और बच्चे को जलाने जा रही थी!
पहले कांस्टेबल ने अर्जुन की तरफ हाथ उठाया।
—सर, पीछे हटिए।
अर्जुन ने दोनों हाथ ऊपर कर दिए।
—मैं मेजर अर्जुन राणा हूं। कॉल मैंने की है। मेरी पत्नी 8 महीने की गर्भवती है। मेरी मां ने उसे गरम प्रेस से धमकाया।
सावित्री देवी ज़ोर-ज़ोर से रोने लगीं।
—झूठ! मेरा बेटा युद्ध से टूटा हुआ लौटा है और यह लड़की उसका फायदा उठा रही है! मेरे पास सबूत हैं कि यह बच्ची को संभाल नहीं सकती!
सिया ने मेज पर पड़ी फाइल की तरफ देखा और समझ गई कि सावित्री देवी ने सिर्फ झूठ नहीं बोला था। उन्होंने महीनों से एक पिंजरा बनाया था: कागज़ों का, दवाइयों का, डर का और परिवार की इज़्ज़त का।
तभी एसीपी नंदिता चौहान अंदर आईं। उन्होंने पहले सावित्री देवी के आंसू नहीं देखे। उन्होंने रसोई देखी: कुर्सी दीवार से अटकी हुई, प्रेस का प्लग सावित्री देवी की कुर्सी के पास, सिया के दुपट्टे पर जला निशान, और साइन के ठीक स्थान पर रखी सुनहरी कलम।
—कोई भी चीज़ हाथ नहीं लगाएगा।
उसी वक्त पड़ोस की मिसेज़ कुलकर्णी भीगती हुई गेट पर आईं। उनके हाथ में मोबाइल था और आंखों में डर नहीं, गुस्सा था।
—मैंने सब रिकॉर्ड किया है।
सावित्री देवी का रोना वहीं रुक गया।
और अर्जुन ने जैसे ही फर्जी सैन्य पत्र के नीचे से झांकती पुरानी तस्वीर देखी, उसे समझ आ गया कि यह साजिश उस रात शुरू नहीं हुई थी।
यह 34 साल पहले शुरू हुई थी।
कमेंट्स में दिए गए लिंक से पूरी कहानी पढ़े 👇.
भाग 2
एसीपी नंदिता ने पहले एम्बुलेंस बुलवाई, फिर रसोई को क्राइम सीन की तरह सील करवाया। सिया की जांच उसी घर में हुई, अर्जुन 3 मीटर दूर खड़ा रहा ताकि कोई यह न कह सके कि उसने बयान पर दबाव डाला। सावित्री देवी हर मिनट अपनी कहानी बदलती रहीं—कभी वह डरी हुई सास थीं, कभी अपमानित मां, कभी उस “मध्यवर्गीय लड़की” की शिकार जिसने राणा परिवार में शादी करके सब कुछ हथियाने की योजना बनाई थी। लेकिन मिसेज़ कुलकर्णी के वीडियो में साफ दिख रहा था कि सिया कुर्सी पर पहले से बैठी थी, सावित्री देवी काले बैग से प्रेस निकाल रही थीं और एक आदमी, जो बिना वर्दी के भी फौजी चाल से चलता था, पीछे के गेट से अंदर आकर उन्हें एक लिफाफा दे रहा था। फाइल में मिली पुरानी तस्वीर में वही आदमी जवान दिख रहा था—कर्नल भास्कर मेहरा, अर्जुन का गॉडफादर और उसके दिवंगत पिता वीरेंद्र राणा का सबसे भरोसेमंद साथी। स्टोर रूम में आटे के डिब्बे के अंदर बिना लेबल की नींद की गोलियां मिलीं, और सिया को याद आया कि हर रात वही कड़वा बादाम दूध पीने के बाद उसे सुबह अपनी ही बातें याद नहीं रहती थीं। तभी अर्जुन के फोन पर आर्मी इंटेलिजेंस का कॉल आया। कर्नल भास्कर को फर्जी सैन्य सूचना, पारिवारिक पत्र रोकने और राणा डिफेंस सिस्टम्स से जुड़े आर्थिक घोटाले में हिरासत में लिया गया था। जांच अधिकारी ने बताया कि सावित्री देवी के खातों में 4 करोड़ से ज़्यादा संदिग्ध ट्रांसफर मिले हैं। सावित्री देवी का चेहरा अचानक बदल गया। वह अब रो नहीं रही थीं। उन्होंने अर्जुन को ऐसे देखा जैसे बेटा नहीं, संपत्ति हाथ से निकल रही हो। सच वहीं फूट पड़ा: वीरेंद्र राणा की वसीयत के अनुसार उनके पहले पोते या पोती के जन्म पर कंपनी के शेयरों की स्वतंत्र ऑडिट शुरू होनी थी, और जब तक बच्चा 25 साल का न हो, उसका कानूनी अभिभावक वोटिंग अधिकार संभालता। इसलिए सिया से बच्ची की गार्जियनशिप छीननी थी। इसलिए उसे पागल साबित करना था। इसलिए अर्जुन को मौत से भी ज़्यादा दूर रखना था। जब पुलिस सावित्री देवी को ले जा रही थी, वह सिया के कान के पास झुकीं और फुसफुसाईं कि बच्ची सिर्फ कंपनी की चाबी नहीं, एक दबी हुई कब्र की मुहर भी है। उसी पल अर्जुन ने पुरानी तस्वीर पलटी। पीछे कांपती लिखावट में लिखा था: “अगर मुझे कुछ हो जाए, तो डीएनए टेस्ट करवाना।” ❤️नमस्ते, प्यारे रीडर्स! अगर आप अगले पार्ट के लिए तैयार हैं, तो प्लीज़ नीचे “Yes” लिखें, और मैं इसे तुरंत भेज दूँगा। मैं उन सभी के अच्छे स्वास्थ्य और खुशी की कामना करता हूँ जिन्होंने यह कहानी पढ़ी और पसंद की है! 💚
भाग 3
सिया को 4 दिन बाद दिल्ली के आर्मी रिसर्च एंड रेफरल अस्पताल के एक शांत कमरे में रिपोर्ट मिली। बाहर जून की बारिश शीशे पर थपथपा रही थी। अर्जुन उसकी खाट के पास बैठा था, उसकी वर्दी बदल चुकी थी, चेहरा धोया हुआ था, पर आंखों में अब भी नींद नहीं थी। उसने अपनी शादी की अंगूठी उतारी नहीं थी, मानो उसे डर हो कि अगर उसने उंगली खाली की तो दुनिया फिर उससे सिया को छीन लेगी।
डॉक्टर ने बताया कि बच्ची सुरक्षित थी। दिल की धड़कन मजबूत थी। सिया की हालत स्थिर थी। लेकिन उसके खून में 2 ऐसे सेडेटिव मिले जो गर्भवती महिला को बिना डॉक्टर की निगरानी के देना जानलेवा हो सकता था। उनमें से 1 दवा बार-बार दिए जाने पर भूलने, चक्कर, डर और भ्रम पैदा कर सकती थी।
हर लाइन सावित्री देवी की बनाई कहानी को तोड़ रही थी।
सिया पागल नहीं थी।
उसे धीरे-धीरे मिटाया जा रहा था।
अर्जुन ने रिपोर्ट पढ़ी और पहली बार उसकी उंगलियां कांपीं।
—मुझे समझ जाना चाहिए था।
सिया ने थकी आंखों से उसकी तरफ देखा।
—तुम सीमा पर थे।
—मुझे तुम्हारी आवाज़ में डर सुनाई देना चाहिए था।
—उन्होंने मेरी आवाज़ तुम तक पहुंचने ही नहीं दी।
अर्जुन ने धीरे से सिया के पेट पर हाथ रखा। बच्ची ने अंदर से हल्का सा झटका दिया, जैसे वह भी इस बात की गवाही दे रही हो कि वह जिंदा है, जाग रही है और किसी की विरासत नहीं, किसी की सांस है।
—मेरी मां ने मुझे हमेशा सिखाया कि दुश्मन बाहर से आता है —अर्जुन ने धीमे से कहा— मैं कभी नहीं समझ पाया कि सबसे खतरनाक दुश्मन घर के मंदिर में दिया जलाकर बैठा हो सकता है।
सिया ने उसका हाथ पकड़ लिया।
—अब समझ गए हो। अब मत भूलना।
दोपहर में आर्मी इंटेलिजेंस के अधिकारी मेजर कबीर सूद कमरे में आए। उनके हाथ में सीलबंद फाइल थी। उन्होंने सिया की तरफ सम्मान से सिर झुकाया, फिर अर्जुन की ओर देखा।
—जो सच हम लेकर आए हैं, वह सिर्फ आर्थिक घोटाला नहीं है। यह आपके परिवार की जड़ तक जाता है।
अर्जुन सीधा बैठ गया।
मेजर कबीर ने बताया कि वीरेंद्र राणा, अर्जुन के पिता, ने मरने से पहले राणा डिफेंस सिस्टम्स के कई रक्षा अनुबंधों में फर्जी सप्लायर, नकली मेंटेनेंस बिल और विदेशी खातों में जा रहे पैसे पकड़े थे। उस समय कंपनी भारतीय सेना के लिए कम्युनिकेशन ड्रोन और बॉर्डर सर्विलांस पार्ट्स बनाती थी। अगर घोटाला सामने आता, तो सिर्फ पैसा नहीं, देश की सुरक्षा से जुड़ी फाइलें भी खुलतीं।
वीरेंद्र ने शक किया था कि इस घोटाले में सावित्री देवी और कर्नल भास्कर मेहरा शामिल हैं। लेकिन उनके पास सीधे सबूत पूरे नहीं थे। इसलिए उन्होंने अपनी वसीयत में एक गुप्त शर्त रखी: अर्जुन के पहले बच्चे के जन्म पर कंपनी की स्वतंत्र ऑडिट अनिवार्य होगी। ऑडिट कोई परिवार का आदमी नहीं, अदालत द्वारा नियुक्त ट्रस्ट करेगा।
सिया ने आंखें बंद कर लीं।
—इसीलिए मेरी बेटी से इन्हें डर था।
—हां —मेजर कबीर बोले— बच्ची सिर्फ वारिस नहीं थी। वह फाइलें खोलने वाली चाबी थी।
अर्जुन ने पूछा:
—और फोटो के पीछे जो डीएनए टेस्ट लिखा था?
कमरे में कुछ पल खामोशी रही। मेजर कबीर ने दूसरी फाइल निकाली।
—वह टेस्ट बच्ची के लिए नहीं था, मेजर। वह आपके लिए था।
अर्जुन की सांस अटक गई।
रिपोर्ट में साफ लिखा था कि वीरेंद्र राणा अर्जुन के जैविक पिता थे, लेकिन सावित्री देवी उसकी जैविक मां नहीं थीं।
सिया ने अर्जुन की तरफ देखा। उसके चेहरे पर ऐसा भाव था जैसे किसी ने बचपन की पूरी जमीन उसके पैरों के नीचे से खींच ली हो।
मेजर कबीर ने आगे कहा:
—आपकी असली मां का नाम नंदिनी राणा था। वह सावित्री देवी की छोटी बहन थीं। राणा डिफेंस सिस्टम्स में चार्टर्ड अकाउंटेंट थीं। उन्होंने सबसे पहले पैसे के गड़बड़ रास्ते पकड़े थे। उन्होंने वीरेंद्र राणा को चेतावनी दी थी। रिकॉर्ड कहता है कि वह प्रसव के 3 दिन बाद “अचानक मेडिकल कॉम्प्लिकेशन” से मर गईं। लेकिन पुराने अस्पताल रिकॉर्ड बताते हैं कि उनकी दवा बदली गई थी।
अर्जुन ने कुछ नहीं कहा। वह सैनिक था। उसने गोलीबारी देखी थी, बम विस्फोट देखे थे, साथियों को खोया था। लेकिन उस पल उसके भीतर जो टूटा, वह आवाज़ के बिना टूटा।
—उन्होंने मेरी मां चुरा ली —उसने आखिर कहा।
सिया की आंखों में आंसू भर आए।
—और हमारी बेटी से उसका भविष्य चुराने वाली थीं।
मेजर कबीर ने धीरे से सिर झुका दिया।
—सावित्री देवी मां नहीं बन सकती थीं। नंदिनी के मरने के बाद उन्होंने आपको अपना बेटा घोषित कर दिया। कर्नल भास्कर ने जन्म रिकॉर्ड बदले, अस्पताल का स्टाफ खरीदा और वीरेंद्र को धीरे-धीरे अलग कर दिया। जब वीरेंद्र को सच्चाई का शक हुआ, उनकी दिल की दवा भी बदली गई थी। अब दोनों मामलों को फिर खोला जाएगा।
उस दिन अर्जुन अस्पताल के कॉरिडोर में बहुत देर तक खड़ा रहा। दीवार पर लगे देवी दुर्गा के छोटे कैलेंडर को देखता रहा। इतने साल वह सावित्री देवी के चरण छूता रहा, उनकी हर बात को धर्म मानता रहा, और वही औरत उसके जन्म की सबसे बड़ी गवाही को दफनाकर बैठी थी।
रात में सिया की तबीयत अचानक बिगड़ी। मॉनिटर तेज़ आवाज़ करने लगा। नर्सें दौड़ीं। डॉक्टर अंदर आए। अर्जुन का चेहरा सफेद पड़ गया।
—सिया, आंखें खोलो।
सिया ने दर्द में उसका हाथ जकड़ लिया।
—अगर मुझे कुछ हो जाए तो मेरी बच्ची को किसी के हवाले मत करना।
—कुछ नहीं होगा। तुम दोनों को कुछ नहीं होगा।
लेकिन बच्ची इंतज़ार करने को तैयार नहीं थी।
शाम 6:14 पर, गरजते बादलों और अस्पताल की पीली रोशनी के बीच, सिया ने एक बेटी को जन्म दिया। बच्ची ने आते ही इतनी ज़ोर से रोया कि कमरे के बाहर खड़े अर्जुन ने अपना सिर दीवार से टिकाकर आंखें बंद कर लीं। वह रोना किसी नवजात का नहीं, किसी फैसले का लगा।
जब नर्स ने बच्ची को सिया के सीने पर रखा, सिया ने उसे देखकर फुसफुसाया:
—यह किसी कंपनी की चाबी नहीं है। यह मेरी बेटी है।
अर्जुन पास आया। बच्ची की मुट्ठी उसकी उंगली पर बंद हो गई। उस छोटे से स्पर्श में उसे अपना खोया हुआ बचपन, अपनी असली मां और अपना आने वाला जीवन एक साथ महसूस हुआ।
नर्स ने पूछा:
—नाम क्या लिखना है?
सिया ने अर्जुन की तरफ देखा। अर्जुन की आंखें भर आईं।
—आन्या नंदिनी राणा —सिया ने कहा।
अर्जुन ने सिर झुका लिया। पहली बार उसने नंदिनी का नाम सिर्फ रिपोर्ट में नहीं, अपने परिवार की सांस में सुना।
इसके बाद मामला अदालत पहुंचा। मीडिया राणा परिवार के बाहर डेरा डालकर बैठ गई। न्यूज़ चैनलों पर बहस हुई कि क्या अमीर घरों में बहुओं को “मानसिक बीमारी” कहकर चुप कराना नया अपराध है या पुरानी प्रथा का नया चेहरा। कुछ रिश्तेदारों ने कहा कि सिया को घर की बात बाहर नहीं ले जानी चाहिए थी। कुछ ने कहा कि मां को जेल भेजना पाप है। लेकिन जब अदालत में वीडियो चला, पूरा कमरा चुप हो गया।
मिसेज़ कुलकर्णी के फोन में रिकॉर्ड था: सावित्री देवी प्रेस को सिया के पेट की तरफ ले जा रही थीं।
अर्जुन के मोबाइल में रिकॉर्ड था: वह पीछे के बरामदे से अंदर आने से पहले ही सिया की दबाई हुई चीख सुन चुका था और रिकॉर्डिंग चालू कर चुका था।
सावित्री देवी की आवाज़ साफ आई:
—साइन कर दे, वरना तेरी बेटी इस घर में तेरे नाम से नहीं आएगी।
फिर कर्नल भास्कर को की गई कॉल चली:
—गार्जियनशिप मेरे हाथ में आते ही ऑडिट रुक जाएगी। लड़की को पागल साबित करना मुश्किल नहीं है।
सावित्री देवी के वकीलों ने कहा कि वह बुजुर्ग मां हैं, सदमे में थीं, परिवार बचाना चाहती थीं। उन्होंने कहा कि प्रेस ने सिया को छुआ भी नहीं। उन्होंने कहा कि दवा सिर्फ नींद के लिए थी।
तभी डॉक्टर ने रिपोर्ट पढ़ी। फिर मेजर कबीर ने फर्जी सैन्य पत्र की पुष्टि की। फिर पुराने अस्पताल रिकॉर्ड आए। फिर वह जन्म प्रमाणपत्र आया जिसमें नंदिनी का नाम काटकर सावित्री लिखा गया था।
सावित्री देवी पहली बार अदालत में कांपीं।
फैसला आने में 3 घंटे से कम लगे। उन्हें हत्या की कोशिश, जबरन हस्ताक्षर करवाने, गैरकानूनी दवा देने, धोखाधड़ी, फर्जी सैन्य दस्तावेज़ बनवाने, सबूत छिपाने और आपराधिक साजिश में दोषी ठहराया गया। कर्नल भास्कर ने सज़ा कम करवाने के लिए गवाही दी, लेकिन उसका नाम भी सम्मान से मिट गया। सेना ने उसके पदक वापस ले लिए।
सज़ा सुनाए जाने से पहले सावित्री देवी ने अर्जुन से बात करने की अनुमति मांगी।
वह अब भी साड़ी में थीं, मोती पहने थीं, लेकिन उनकी गर्दन की अकड़ टूट चुकी थी।
—मैंने तुझे पाला है —उन्होंने कहा— जो कुछ तू है, मेरी वजह से है।
अर्जुन खड़ा हुआ। उसकी गोद में छोटी आन्या नंदिनी थी। बच्ची उसकी वर्दी की जेब पकड़कर सो रही थी।
—नहीं —अर्जुन की आवाज़ शांत थी— जो कुछ मेरे अंदर अच्छा है, वह आपसे बचकर जिंदा रहा है।
सावित्री देवी ने पहली बार सिर झुका लिया।
उन्हें जेल ले जाया गया। अदालत के बाहर कुछ कैमरे चिल्लाए, कुछ लोग फुसफुसाए, लेकिन सिया ने किसी को जवाब नहीं दिया। वह सिर्फ अपनी बेटी को देखती रही। उसका चेहरा थका हुआ था, पर आंखों में अब डर नहीं था।
कुछ महीनों बाद राणा हाउस बेच दिया गया। सिया ने शर्त रखी कि बेचने से पहले वह आखिरी बार रसोई देखना चाहती है। अर्जुन उसके साथ गया, लेकिन दरवाज़े पर रुक गया। सिया अकेली अंदर गई।
फर्श पर अब भी वह जला हुआ निशान था, आधे चांद जैसा। वहीं, जहां प्रेस गिरी थी। वहीं, जहां उसे लगा था कि उसकी बेटी उससे छीन ली जाएगी। वहीं, जहां अर्जुन वापस आया था। वहीं, जहां झूठ की सबसे बड़ी दीवार में पहली दरार पड़ी थी।
अर्जुन ने बाद में कहा:
—अगर तुम चाहो तो नए मालिक से कहकर यह टाइल बदलवा देता हूं।
सिया ने सिर हिलाया।
—नहीं। रहने दो। यह डर की निशानी नहीं है। यह उस पल की निशानी है जब डर हार गया था।
आन्या नंदिनी का 1 साल का जन्मदिन किसी फार्महाउस या 5 स्टार होटल में नहीं मनाया गया। सिया और अर्जुन उसे लेकर पुणे के पुराने कब्रिस्तान जैसी शांत स्मृति भूमि में गए, जहां नंदिनी राणा की नई पट्टिका लगाई गई थी। वर्षों बाद उस पर सही नाम लिखा था:
नंदिनी राणा
साहसी मां
सच की पहली गवाह
कभी नहीं भुलाई गई
अर्जुन ने वहां गेंदे के फूल रखे। वही फूल, जिन्हें वह सिया के लिए लेकर घर लौटा था और जो उस रात फर्श पर बिखर गए थे। इस बार फूल टूटे नहीं थे।
सिया ने आन्या को गोद में उठाया। बच्ची ने छोटी उंगलियों से फूल छूने की कोशिश की। हवा हल्की थी, आसमान साफ था, और अर्जुन बिना वर्दी के खड़ा था। उस पल वह मेजर नहीं था, वारिस नहीं था, किसी झूठी मां का बेटा नहीं था। वह बस पति था, पिता था और उस स्त्री का बेटा था जिसका नाम उसे 34 साल बाद मिला था।
—घर चलें? —उसने धीरे से पूछा।
सिया ने आन्या को देखा, फिर अर्जुन को।
—हां। अब घर चलें।
और उस दिन घर कोई हवेली, कोई कंपनी, कोई वसीयत या कोई नाम नहीं था।
घर वह जगह थी जहां किसी और की चालाकी से नहीं, अपने सच से सांस ली जा सकती थी।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.