
PART 1
माँ की चिता की राख अभी ठंडी भी नहीं हुई थी, जब अंजलि मेहरा की हथेली में एक ठंडी चाबी रखी गई और श्मशान घाट के कर्मचारी ने उसके कान में फुसफुसाया, “अस्थि-कलश खाली है, घर मत जाना।”
दिल्ली के निगमबोध घाट पर धुआँ, गीली लकड़ी और अगरबत्ती की गंध हवा में तैर रही थी। यमुना की तरफ से आती ठंडी हवा सफेद फूलों की मालाओं को हिला रही थी। सामने उसकी माँ, सावित्री मेहरा, की तस्वीर रखी थी—माथे पर चंदन, गले में गेंदे की माला, और नीचे चांदी के रंग का कलश, जिसे सबने सम्मान से देखा था। पर अब वही कलश अंजलि को अचानक किसी झूठे नाटक का सबसे डरावना सामान लगने लगा।
सावित्री मेहरा 58 साल की थीं, करोल बाग की एक पुरानी चार्टर्ड अकाउंटेंसी फर्म में वरिष्ठ लेखा अधिकारी। पूरी जिंदगी उन्होंने पैसों, कागजों और सच को लेकर ऐसा अनुशासन रखा था कि घर की बिजली की रसीदें भी साल और महीने के हिसाब से अलग फाइलों में बंद मिलती थीं। उन्होंने अपनी मृत्यु की तैयारी तक 4 साल पहले कर दी थी—सादा अंतिम संस्कार, कोई महंगा दिखावा नहीं, सिर्फ सफेद फूल, और बेटी को किसी पर निर्भर न रहने की सख्त सलाह।
लेकिन यह सलाह उन्होंने कभी नहीं दी थी कि उनके अंतिम संस्कार के बीच कोई आदमी उनकी बेटी को चाबी देकर कहे कि कलश खाली है।
अंजलि ने काँपकर उस कर्मचारी को देखा। उसका नाम राघव था। माँ उसे जानती थीं, क्योंकि वह श्मशान घाट की रसीदों का हिसाब ठीक कराने कभी-कभी उनसे मदद लेता था।
“क्या कहा आपने?” अंजलि की आवाज गले में अटक गई।
राघव ने आँखें नीचे रखीं।
“मैडम ने कहा था, अगर मैं आपको यहाँ अकेला पाऊँ तो यह दूँ। सफदरजंग स्टोरेज, लॉकर 16। अभी जाइए। अपनी मौसी के साथ नहीं। पुलिस चौकी में भी नहीं।”
“मेरी माँ मर चुकी हैं,” अंजलि ने जैसे खुद को समझाने के लिए कहा।
उसने शरीर देखा था। एम्स की मोर्चरी में सफेद चादर के नीचे एक सूजा हुआ चेहरा, गले पर दुपट्टा, हाथ पट्टियों में ढके हुए। उसे बताया गया था कि सावित्री सीढ़ियों से गिर गईं, सिर पर चोट लगी, और दम टूट गया। उसने कागजों पर हस्ताक्षर किए थे। उसने फोटो चुनी थी। उसने 86 शोक संदेश पढ़े थे।
राघव ने धीमे से कहा, “आपने वही देखा जो उन्हें दिखाना था।”
उसी पल अंजलि का फोन काँपा।
स्क्रीन पर नाम चमका—माँ।
संदेश था: अकेली घर लौट आओ।
उसके पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई। श्मशान घाट, मंत्र, रोती औरतें, सफेद कपड़े पहने रिश्तेदार—सब धुंधला गया। बस फोन पर “माँ” लिखा था, जैसे सावित्री सब्जी लेने गई हों और रास्ते से संदेश भेज रही हों।
तभी मौसी मीना ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“अंजू, तेरा चेहरा सफेद हो गया है। चल, मैं तुझे घर ले चलती हूँ।”
मीना बहुत जोर-जोर से रो रही थीं, मगर उनकी पकड़ अजीब तरह से कड़ी थी। अंजलि ने भीड़ के उस पार देखा। वहाँ निखिल खन्ना खड़ा था—खन्ना हेरिटेज कैपिटल का मालिक, सावित्री का बॉस। गहरे नीले सूट में, आँखों पर दुख का सही नाप, हाथ छाती पर। सुबह उसने अंजलि के सिर पर हाथ रखकर कहा था, “तुम्हारी माँ ईमानदारी की मिसाल थीं।”
अब उसका चेहरा बिल्कुल खाली था।
“मुझे उल्टी आ रही है,” अंजलि ने कहा।
मीना का रोना रुक गया। “अभी? यहाँ से कहाँ जाएगी?”
“बस 5 मिनट।”
अंजलि पीछे मुड़ी नहीं। वह राख, फूलों और लोगों के बीच से निकलकर पार्किंग तक भागी। अपनी छोटी स्विफ्ट में बैठते हुए उसने शीशे में देखा—मीना फोन पर थीं, और निखिल खन्ना उनके पास झुककर कुछ सुन रहा था।
सफदरजंग स्टोरेज एक पुराने पेट्रोल पंप, टायर की दुकान और गोदामों के पीछे छिपा था। चाबी के साथ छोटी पर्ची पर कोड लिखा था। माँ की लिखावट थी—सीधी, साफ, बिना एक भी अनावश्यक रेखा के।
लॉकर 16 सबसे पीछे था।
अंजलि ने ताला खोला।
अंदर न पुराने कपड़े थे, न बर्तन, न दिवाली की सजावट। सिर्फ एक मोड़ी हुई कुर्सी, पानी की 4 बोतलें, छोटा टॉर्च, दवाइयों का डिब्बा, एक नीला बैग और माँ का भूरा हैंडबैग।
वही हैंडबैग, जिसे पुलिस ने कहा था कि मोर्चरी में शरीर के पास मिला।
हैंडबैग पर एक लिफाफा रखा था।
अंजलि, अगर तुम यह पढ़ रही हो, तो सबसे पहले उन्होंने तुम्हें ही धोखा दिया है।
वह लिफाफा खोलती, उससे पहले बाहर गाड़ियों के ब्रेक चीखे।
अंजलि ने झटके से शटर गिराया और अंधेरे में साँस रोक ली। बाहर कदमों की आवाज नजदीक आई।
“अंजलि मेहरा,” एक शांत पुरुष आवाज आई, “हमें पता है तुम अंदर हो। दरवाजा खोलो। तुम्हारी माँ ने तुम्हें ऐसी आग में धकेल दिया है, जिसमें तुम जल जाओगी।”
अंजलि ने काँपते हाथों से लिफाफा फाड़ा। टॉर्च की रोशनी में माँ की लिखावट उभरी।
निखिल खन्ना पर भरोसा मत करना। खन्ना हेरिटage कैपिटल पर भरोसा मत करना। मीना पर भरोसा मत करना। करोल बाग थाने में सीधे मत जाना। लाल फाइल लो। पीछे की जाली से निकलो। मुझे माफ कर देना।
मीना।
मौसी का नाम पढ़ते ही अंजलि के भीतर कुछ टूट गया।
बाहर किसी ने ताले में औजार घुमाया।
PART 2
लोहे के शटर पर पहला वार पड़ा तो अंजलि की चीख गले में ही दब गई। उसने बैग उलट दिया। अंदर फाइलें, बैंक स्टेटमेंट, प्रॉपर्टी डीड, बीमा पॉलिसी, पेन ड्राइव और एक मोटी लाल फाइल थी, जिस पर लिखा था—“बुजुर्गों की संपत्ति हड़पने के मामले।”
बाहर वही आवाज फिर आई, अब मीठी नहीं थी।
“दरवाजा खोलो। तुम्हारी माँ अपनी जिद की कीमत चुका चुकी है।”
अंजलि के हाथ सुन्न हो गए।
कीमत चुका चुकी है।
तो यह हादसा नहीं था।
लॉकर के पीछे लकड़ी का एक पटरा ढीला था। उसके पीछे पहले से कटी हुई जाली थी। माँ ने रास्ता बनाया था। माँ ने सब सोचा था। बस यह नहीं सोचा था कि बेटी उस रात कैसी टूटेगी।
अंजलि ने लाल फाइल, 2 पेन ड्राइव और माँ का बैग उठाया। जाली से रेंगते हुए उसका कुर्ता फट गया, बाजू छिल गई, पर वह बाहर निकल आई।
पीछे से शटर टूटने की आवाज आई।
वह भागी।
स्टोरेज के बाहर एक दूधवाले की वैन खड़ी थी। अंजलि ने दरवाजा खोलकर कहा, “भैया, बचा लो। वे मुझे मार देंगे।”
ड्राइवर ने पीछे देखा। 2 आदमी दौड़ते आ रहे थे।
उसने बिना सवाल किए गाड़ी बढ़ा दी।
अंजलि का फोन फिर काँपा।
माँ: अरविंद राव को ढूँढो। जमीन अभिलेख कार्यालय। किसी और को कुछ मत देना।
PART 3
अरविंद राव दिल्ली राजस्व अभिलेख विभाग की पुरानी इमारत में बैठता था, जहाँ दीवारों पर उखड़ा हुआ पेंट, लोहे की अलमारियाँ और धूल में दबे नक्शे किसी सरकारी दफ्तर की थकी हुई आत्मा जैसे लगते थे। दूधवाले ने, जिसका नाम जैकेट पर सुरेश लिखा था, अंजलि को आईएनए के पास उतारा।
“मैडम, मैं कुछ नहीं जानता,” उसने डरते हुए कहा।
“धन्यवाद,” अंजलि ने काँपती आवाज में कहा।
सुरेश ने पैसे लेने से इनकार कर दिया। “डर में पैसा मत गिनिए। अंदर जाइए।”
अंजलि लाल फाइल सीने से दबाए दफ्तर में घुसी। रिसेप्शन पर बैठी महिला ने ऊबकर पूछा, “किससे मिलना है?”
“अरविंद राव से। कहिए अंजलि मेहरा आई है।”
महिला का चेहरा एक पल को बदल गया। वह तुरंत उठी।
अरविंद राव छोटा कद, सफेद बाल, झुकी हुई गर्दन और मोटे चश्मे वाला आदमी था। उसके कमरे में पुराने कागजों की गंध थी। जैसे ही उसने अंजलि को देखा, उसने दरवाजा अंदर से बंद कर दिया।
“तुम्हारी माँ ने तुम्हें भेजा?”
“मेरी माँ की आज चिता जली है।”
अरविंद ने आँखें झुका लीं।
“नहीं।”
यह एक शब्द कमरे में पत्थर की तरह गिरा।
अंजलि पीछे हट गई। “ऐसा मत कहिए।”
“बैठ जाओ।”
“मुझे आदेश मत दीजिए।”
अरविंद ने मेज से दूसरा लिफाफा उठाया। उस पर माँ की लिखावट थी।
मेरी बेटी के लिए, जब उसे पता चल जाए कि मैंने उसे बचाने के लिए उसे सबसे बड़ा घाव दिया।
अंजलि ने लिफाफा फाड़ दिया।
मेरी अंजलि, अगर तुम यह पढ़ रही हो, तो मैं जिंदा हूँ। और इसका मतलब यह भी है कि मैंने तुम्हें अपनी ही झूठी मृत्यु पर रोने दिया। मैं तुमसे अभी माफी नहीं माँगूँगी, क्योंकि माफी सुनने से पहले तुम्हें सच सुनना चाहिए।
अंजलि की आँखों के आगे शब्द तैरने लगे।
सावित्री ने लिखा था कि खन्ना हेरिटेज कैपिटल पिछले 8 साल से अकेले रहने वाले बुजुर्गों, विधवाओं और रिटायर होने वाले छोटे कारोबारियों को “सुरक्षित निवेश” के नाम पर फँसा रही थी। वे कहते थे कि घर को गिरवी रखकर नियमित आय मिलेगी। असल में कागजों के बीच पावर ऑफ अटॉर्नी छिपाई जाती थी। कुछ हस्ताक्षर घर जाकर कराए जाते, कुछ स्कैन कॉपी से मिलाए जाते, कुछ रजिस्ट्री विभाग के भ्रष्ट कर्मचारियों से आगे बढ़वाए जाते। पुरानी कोठियाँ, छोटे फ्लैट, गांव की जमीन, बीमा पॉलिसी—सब धीरे-धीरे शेल कंपनियों में पहुँच जाता।
जिन बुजुर्गों ने शिकायत करनी चाही, उन्हें बताया गया कि उन्होंने खुद दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए थे। कई को अपने बच्चों से शर्म आई, कई अदालत तक पहुँचने से पहले बीमार पड़ गए, और कुछ तो यह समझते-समझते मर गए कि उनकी जिंदगी की कमाई कैसे गायब हुई।
सावित्री ने पहली बार शक तब किया जब पहाड़गंज की 82 साल की विधवा कमला सूद अपनी फाइल लेकर रोती हुई उनके पास आई। कमला को बताया गया था कि उन्होंने अपने पति का खरीदा घर 19 लाख में बेच दिया है, जबकि उस घर की कीमत 2 करोड़ से ऊपर थी। सावित्री ने दस्तावेज देखे तो हस्ताक्षर सही लग रहे थे, पर तारीखों में गड़बड़ थी। बैंक एंट्री में कोड गलत था। और रजिस्ट्री के गवाहों में एक नाम वही था, जो पहले 5 और बुजुर्गों के मामलों में आया था।
जब सावित्री ने निखिल खन्ना से पूछा, उसने मुस्कराकर कहा था, “आप बहुत समझदार हैं, सावित्री जी। इसलिए अब आपको हमारे साथ समझदारी से चलना होगा।”
उन्होंने मना कर दिया।
फिर खेल शुरू हुआ।
उनके लॉगिन से फर्जी एंट्री डाली गईं। उनके नाम से मेल भेजे गए। कुछ खातों में पैसे घुमाकर ऐसे निशान बनाए गए कि चोरी उन्हीं पर आए। फिर एक दिन निखिल ने अंजलि का नाम लिया—उसकी लाइब्रेरी की नौकरी, उसके घर लौटने का समय, उसकी तीसरी मंजिल का कमजोर ताला।
अंजलि के हाथ से कागज लगभग छूट गया।
पत्र में आगे लिखा था:
मीना ने सबसे पहले साथ छोड़ा। उसे ऑनलाइन सट्टे और कर्ज में 46 लाख रुपये डूब चुके थे। निखिल ने उसका कर्ज चुकाया। बदले में उसे हमारे घर पर नजर रखनी थी, तुम्हें शांत रखना था, मेरी फाइलें ढूँढनी थीं और जरूरत पड़े तो तुम्हें घर लौटने के लिए मजबूर करना था। मुझे पता है तुम उसे प्यार करती थीं। इसी बात ने मुझे सबसे ज्यादा डराया।
अंजलि की आँखों में आँसू नहीं आए। कुछ दर्द आँसू से बड़ा होता है।
मीना मौसी, जो बचपन में उसे इंडिया गेट पर आइसक्रीम खिलाती थीं। जो हर राखी पर कहती थीं, “मेरी अंजू मेरी बेटी जैसी है।” वही मौसी माँ की चिता के पास रो रही थीं, और उसी समय फोन पर निखिल को खबर दे रही थीं।
“शरीर किसका था?” अंजलि ने पत्थर जैसी आवाज में पूछा।
अरविंद ने गहरी साँस ली।
“एक बेसहारा महिला, जो पुरानी दिल्ली की आग में मरी थी। पहचान मुश्किल थी। एक जूनियर मोर्चरी कर्मचारी और एक डॉक्टर को पैसे दिए गए। तुम्हारी माँ इसे लेकर खुद को कभी माफ नहीं कर पाएगी। मगर बिना नकली मौत के निखिल उसे ढूँढता रहता। उसे यकीन दिलाना जरूरी था कि सावित्री खत्म हो गई।”
“उन्होंने मुझे इस्तेमाल किया।”
“उन्होंने तुम्हें बचाया।”
“उन्होंने मुझे जला दिया।”
अरविंद चुप हो गया। सच कभी-कभी इतना गंदा होता है कि उसे साफ शब्दों में भी नहीं धोया जा सकता।
तभी उसके कंप्यूटर पर सुरक्षा कैमरे की खिड़की चमकी। बाहर काली एसयूवी रुकी। निखिल खन्ना उतरा। उसके साथ 2 आदमी थे। पीछे से मीना भी उतरीं, अभी भी सफेद साड़ी में, आँखों के नीचे काजल फैला हुआ।
अंजलि के भीतर डर की जगह गुस्सा भर गया।
“वह आ गई,” उसने कहा।
अरविंद ने दराज से पुराना फोन निकाला।
“तुम्हारी माँ ने यह भी तय किया था।”
अंजलि हँसी, मगर उस हँसी में जहर था।
“हाँ, माँ ने हर मिनट तय किया था। बस यह नहीं तय किया कि उनकी बेटी इंसान है, फाइल नहीं।”
18 मिनट बाद आर्थिक अपराध शाखा की अधिकारी कविता चौहान साधारण सूट में पहुँचीं। उनके साथ 3 अधिकारी थे। उन्होंने ज्यादा बात नहीं की। लाल फाइल खोली, पेन ड्राइव लगाई, और एक रिकॉर्डिंग सुनी जिसमें निखिल की आवाज साफ थी।
“सावित्री अब समस्या नहीं है। बेटी को पकड़ो, उससे पहले कि उसे समझ आए।”
कविता ने अंजलि को देखा।
“यह काफी है। पर तुम्हें कुछ दिन गायब रहना होगा।”
“फिर से?”
“इस बार तुम जानती हो क्यों।”
निखिल दफ्तर के गलियारे तक ही पहुँचा था कि उसे गिरफ्तार कर लिया गया। वह पहले मुस्कराया, फिर बोला, “आप लोगों को पता भी है मैं किससे जुड़ा हूँ?” लेकिन जब अधिकारी ने उसकी कंपनी की फर्जी रजिस्ट्री, बुजुर्गों के दस्तावेज और रिकॉर्डिंग का नाम लिया, उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
मीना ने वहीं चीखना शुरू कर दिया।
“मुझे कुछ नहीं पता! मैं मजबूर थी! उन्होंने मुझे फँसाया!”
कविता की टीम ने उसे बैंक ट्रांसफर दिखाए—9 लाख, 12 लाख, 25 लाख। फिर मीना की आवाज बंद हो गई।
अंजलि गलियारे में खड़ी उसे देख रही थी।
मीना ने उसे देखते ही हाथ बढ़ाया।
“अंजू, मैंने तेरे भले के लिए किया। मैं डर गई थी।”
अंजलि धीरे-धीरे आगे बढ़ी। उसके जूतों पर अभी भी श्मशान की राख चिपकी थी।
“आपने मुझे माँ की चिता के सामने गले लगाया था।”
“मैं सब नहीं जानती थी।”
“आप इतना जानती थीं कि मैं अकेली हूँ।”
मीना ने उसका हाथ पकड़ना चाहा। अंजलि पीछे हट गई।
“मुझे मत छूना। कभी नहीं।”
उसी रात अंजलि को एक सुरक्षित सरकारी गेस्ट हाउस में रखा गया। उसका फोन ले लिया गया। उसे नया नंबर दिया गया। कहा गया कि किसी से संपर्क न करे, माँ को ढूँढने की कोशिश न करे, सोशल मीडिया न खोले। पर यह कहना आसान था। 1 दिन में उसने अपनी माँ का अंतिम संस्कार किया था, फिर जाना था कि माँ जिंदा हैं, फिर उन लोगों से भागी थी जो उसे मार सकते थे, फिर अपनी मौसी को गिरफ्तार होते देखा था।
3 रातें वह सो नहीं पाई। आँख लगती तो उसे खाली कलश दिखता। राख के ऊपर माँ का नाम दिखता। निखिल का नकली दुख दिखता। मीना की चिपकी हुई उँगलियाँ दिखतीं। कभी वह लॉकर 16 की चाबी अपनी मुट्ठी में इतनी कसकर पकड़ लेती कि हथेली पर निशान पड़ जाते।
4वें दिन सुबह कविता चौहान आईं।
“आज खबर बाहर जाएगी।”
छोटे टीवी पर अंजलि ने देखा—खन्ना हेरिटेज कैपिटल के दफ्तर पर छापा। निखिल खन्ना हथकड़ी में। बुजुर्ग लोग फाइलें लेकर मीडिया के सामने रो रहे थे। एक 76 साल की महिला कह रही थी कि उसके पति की मेहनत से खरीदा लाजपत नगर का फ्लैट उससे छीन लिया गया था। एक रिटायर्ड शिक्षक ने बताया कि उसके हस्ताक्षर की नकल कर जमीन बेच दी गई। फोन लाइनों पर शिकायतों की बाढ़ आ गई।
पर अंजलि सिर्फ एक सवाल सुन रही थी।
“मेरी माँ कहाँ हैं?”
कविता ने कहा, “सुरक्षित हैं।”
“मुझे मिलना है।”
“अभी नहीं।”
अंजलि हँसी, सूखी और कड़वी।
“मेरी जिंदगी में सब लोग मेरे बदले फैसले लेते हैं।”
कविता ने सिर झुका लिया।
“उन्होंने तुम्हें फोन करने की अनुमति माँगी है।”
रात 9 बजकर 13 मिनट पर सुरक्षित फोन बजा।
अंजलि ने लंबे समय तक स्क्रीन को देखा। फिर उठाया।
“हैलो?”
दूसरी तरफ साँस की आवाज आई। फिर एक टूटी, बूढ़ी, जिंदा आवाज।
“अंजू।”
अंजलि की आँखें बंद हो गईं। यही आवाज उसने 6 रातों तक याद करके खुद को तोड़ा था। अब वही आवाज सामने थी, और उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसे पकड़े या धकेल दे।
“मुझे उस नाम से मत बुलाइए।”
फोन के उस पार सावित्री रो पड़ीं।
“ठीक है।”
यह छोटा-सा शब्द अंजलि के सीने में चाकू की तरह उतरा।
“आपने मुझे खाली कलश के सामने रोने दिया।”
“हाँ।”
“आपने मुझे आपकी फोटो चुनने दी।”
“हाँ।”
“आपने मुझे उन लोगों से शोक स्वीकार कराए जो आपको खत्म करना चाहते थे।”
“हाँ।”
“आपको पता था मीना मौसी उनके साथ हैं?”
लंबी चुप्पी।
“हाँ।”
अंजलि ने दीवार पकड़ ली।
“और फिर भी आप मुझे उनके साथ घर जाने देतीं?”
“योजना बिगड़ गई थी। मुझे लगा था राघव पहले तुम्हें निकाल लेगा।”
“योजना! योजना! मैं आपकी बेटी हूँ, कोई पार्सल नहीं जिसे एक जगह से दूसरी जगह भेज दिया जाए!”
सावित्री ने कोई सफाई नहीं दी।
“तुम सही कह रही हो।”
“मैंने आपको मरा हुआ मान लिया था।”
“मुझे पता है।”
“नहीं, आपको नहीं पता। आपको नहीं पता कि उस चिता को देखकर कैसा लगता है, जब आपको लगता है कि दुनिया में बिना शर्त प्यार करने वाली आखिरी इंसान राख बन गई।”
फोन के उस पार सावित्री का रोना गहरा हो गया।
“मैंने यही सोचकर किया कि वे तुम्हें मेरी जगह न जला दें।”
अंजलि चाहती थी कि यह वाक्य झूठ लगे। वह चाहती थी कि वह साफ-साफ नफरत कर सके। मगर आवाज में वही पुरानी घबराहट थी—वही माँ, जो रात में दरवाजा 3 बार जाँचती थी, जो गैस बंद है या नहीं, पूछते-पूछते बच्चों जैसी बेचैन हो जाती थी, जो प्यार भी ताले लगाकर करती थी।
“मैं अभी आपको माफ नहीं कर सकती,” अंजलि ने कहा।
“मैंने माँगा भी नहीं।”
“मुझे यह भी नहीं पता कि मैं खुश हूँ कि आप जिंदा हैं।”
सावित्री ने धीमे से कहा, “मैं खुश हूँ कि तुम मुझे यह कह सकती हो।”
मुकदमा 7 महीने बाद शुरू हुआ। खन्ना हेरिटेज कैपिटल की इमारत पर लगे चमकदार बोर्ड उतर गए। निखिल खन्ना, उसके 6 साझेदार, 2 रजिस्ट्री दलाल, 1 बैंक अधिकारी, 1 मोर्चरी कर्मचारी और डॉक्टर के सहायक पर आरोप तय हुए। मीना ने मजबूरी की बात कही, पर बैंक रिकॉर्ड, संदेश और कॉल रिकॉर्ड ने उसकी कहानी तोड़ दी। कई बुजुर्गों को अपनी संपत्ति का हिस्सा वापस मिला। कुछ को सिर्फ सच मिला, क्योंकि नुकसान बहुत पुराना था। मगर अदालत में हर गवाही किसी न किसी घर की बची हुई दीवार जैसी थी।
सावित्री जुलाई की एक सुबह दिल्ली लौटीं। बाल छोटे, चेहरा सूखा, आँखों के नीचे गहरे घेरे, हाथ में छोटी-सी अटैची। अंजलि करोल बाग वाले पुराने फ्लैट की रसोई में खड़ी थी। वही स्टील के डिब्बे, वही मसालों की कतार, वही लेबल लगी दालें, वही मेज जिस पर माँ का अंतिम संस्कार वाला फोल्डर अब भी रखा था।
दरवाजा खुला।
सावित्री अंदर आईं और चौखट पर ठिठक गईं।
“नमस्ते,” उन्होंने कहा।
इतने बड़े झूठ के बाद इतना छोटा शब्द।
अंजलि दौड़ी नहीं। वह वहीं खड़ी रही, हाथ बाँधे। वह वह दृश्य नहीं निभा सकती थी जो दुनिया चाहती—बेटी माँ को देखकर सब भूल जाए।
सावित्री ने अटैची नीचे रखी।
“अगर तुम कहो तो मैं चली जाती हूँ।”
“नहीं,” अंजलि ने कहा।
वह धीरे-धीरे आगे बढ़ी। हर कदम पर उसे श्मशान दिखा, खाली कलश, लॉकर, भागती गाड़ी, मीना का झूठ, माँ का संदेश। फिर वह माँ के सामने पहुँची और उसने उन्हें थप्पड़ मार दिया।
रसोई में आवाज गूँज गई।
सावित्री ने चेहरा नहीं बचाया। जैसे यह थप्पड़ कोई सजा नहीं, बहुत छोटी किश्त हो।
अंजलि रो पड़ी।
“यह उस चिता के लिए था।”
सावित्री ने सिर हिलाया।
अंजलि ने दूसरा थप्पड़ मारा, इस बार कमजोर, काँपता हुआ।
“यह मुझे उनके बीच अकेला छोड़ने के लिए।”
फिर वह टूटकर माँ से लिपट गई।
सावित्री ने उसे थाम लिया। दोनों मेज से टकराते-टकराते बचीं। अंजलि माँ को ऐसे पकड़ रही थी जैसे नफरत और डर दोनों एक ही जगह रो रहे हों। जैसे वह कहना चाहती हो—मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकती, और मैं तुम्हें तुरंत माफ भी नहीं कर सकती।
सावित्री ने “माफ कर दो” नहीं कहा। उन्होंने कोई कहानी नहीं सुनाई। उन्होंने बस बेटी को पकड़े रखा।
कुछ देर बाद दोनों मेज के सामने बैठीं। अंजलि ने लॉकर 16 की चाबी बीच में रखी।
“अब आप मुझे सब बताएँगी। जो-जो आपने मेरे बदले तय किया।”
“हाँ।”
“बिना मुझे बचाने के नाम पर सच छिपाए।”
“हाँ।”
“और फिर आप सीखेंगी कि बेटी को बचाने से पहले उससे बात भी की जाती है।”
सावित्री ने चाबी को देखा।
“मुझे नहीं पता मैं सीख पाऊँगी या नहीं।”
“तो सीखिए।”
वे तुरंत ठीक नहीं हुईं। कई शामें लड़ाई में बीतीं। अंजलि बीच खाने से उठ जाती, क्योंकि सावित्री की कोई बात आदेश जैसी लगती। सावित्री रात में उठकर दरवाजे जाँचतीं। वे मीना पर, झूठ पर, मौत पर, डर पर बहस करतीं। मगर कुछ सुबहें ऐसी भी थीं जब अंजलि माँ को सोफे पर सोता पाती—जिंदा, थकी हुई, धीमे साँस लेती हुई। उन सुबहों में गुस्सा थोड़ा दूर बैठ जाता।
एक दिन वे साथ में निगमबोध घाट के पास उस जगह गईं जहाँ नकली अंतिम संस्कार हुआ था। वहाँ कोई कब्र नहीं थी, सिर्फ राख की स्मृति थी। सावित्री लंबे समय तक चुप रहीं।
“इसे मिटा देना चाहिए,” उन्होंने कहा।
अंजलि ने जेब में चाबी दबाई।
“अभी नहीं।”
सावित्री ने उसकी ओर देखा। “क्यों?”
“क्योंकि वह मृत्यु मेरे लिए सच थी। भले ही आप जिंदा थीं।”
सावित्री के पास कोई जवाब नहीं था।
वापसी में अंजलि ने माँ का हाथ नहीं पकड़ा। अभी नहीं। मगर वह उनके साथ चली, उसी रफ्तार में, बिना आगे निकले, बिना पीछे छूटे।
उस रात जब सावित्री फिर सोफे पर सो गईं, अंजलि दरवाजे पर खड़ी होकर उनकी साँसें सुनती रही।
अब उसे समझ आ गया था कि कुछ झूठ जान बचाते हैं, मगर आत्मा पर राख छोड़ जाते हैं।
और कुछ सच ऐसे होते हैं जो टूटी हुई चिताओं को ठीक नहीं करते।
वे बस इतना करते हैं कि कोई और उनमें धकेला न जाए।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.