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जेल से लौटे बेटे को सौतेली माँ ने दरवाज़े पर अपमानित कर कहा “तेरे पिता मर चुके हैं”, लेकिन श्मशान में मिली जंग लगी चाबी ने उस झूठ को खोल दिया जिसने उसकी 3 साल की जिंदगी और पिता की कब्र छीन ली

PART 1

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जेल से 3 साल बाद लौटे अर्जुन खन्ना को उसकी सौतेली माँ ने घर की चौखट पर ही रोककर थूक जैसी आवाज़ में कहा—

—तेरे पिता को मरे 1 साल हो गया। तेरे बिना उनका अंतिम संस्कार कर दिया। अब यहाँ से निकल जा।

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अर्जुन दिल्ली के ग्रेटर कैलाश वाले उस पुराने बंगले के बाहर पत्थर की मूर्ति की तरह खड़ा रह गया। हाथ में फटा हुआ स्पोर्ट्स बैग था, चेहरे पर तिहाड़ की 1095 रातों की धूल, और आँखों में वह आख़िरी उम्मीद, जिसके सहारे उसने हर सुबह जेल की सीलन भरी दीवारों को देखा था। उसने सोचा था, दरवाज़ा खुलेगा तो पिता सामने होंगे। कमजोर, बूढ़े, शायद छड़ी के सहारे, मगर होंगे। वही विनोद खन्ना, जिन्होंने चांदनी चौक की छोटी-सी दुकान से “खन्ना हेरिटेज कंस्ट्रक्शन्स” खड़ी की थी।

लेकिन दरवाज़े पर खड़ी थी माया खन्ना—रेशमी साड़ी, सोने के कड़े, माथे पर शांत बिंदी और चेहरे पर ऐसी ठंडक, जैसे सामने बेटा नहीं, कोई पुराना बिल वसूलने आया हो।

—मर गए? अर्जुन की आवाज़ टूट गई। कहाँ हैं पापा?

—श्मशान में राख बन गए। तू जेल में था, याद है ना? अपने ही बाप की कंपनी से 2 करोड़ 80 लाख गायब करने वाले बेटे को कौन बुलाता?

अर्जुन ने बैग की पट्टी इतनी कसकर पकड़ी कि उंगलियाँ सफेद पड़ गईं।

—मैंने चोरी नहीं की थी।

माया हँसी नहीं, बस होंठ टेढ़े किए।

—अदालत ने तेरी कहानी नहीं मानी। हमें क्यों माननी चाहिए?

अर्जुन ने दरवाज़े के भीतर झाँका। बंगला वही था, पर घर नहीं रहा था। माँ की पुरानी पीतल की दीपशाला गायब थी। पिता की वह तस्वीर, जिसमें वह लाल किले की मरम्मत के समय हेलमेट पहने खड़े थे, दीवार से उतर चुकी थी। उसकी जगह महँगी आधुनिक पेंटिंग लगी थी। घर की खुशबू भी बदल चुकी थी—अब वहाँ चंदन, पुरानी किताबों और चाय की जगह विदेशी रूम फ्रेशनर की ठंडी गंध थी।

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—मैंने पत्र लिखे थे, अर्जुन ने धीमे से कहा। पापा ने एक भी जवाब क्यों नहीं दिया?

—क्योंकि मरते हुए आदमी को चोर बेटे की चिट्ठियाँ पढ़ने का शौक नहीं होता।

अर्जुन जैसे भीतर से गिर पड़ा।

तभी परदे के पीछे से एक पुरुष आकृति हिली। रोहित। माया का बेटा। वही जिसे विनोद खन्ना ने 5 साल पहले कंपनी में सिर्फ इसलिए जगह दी थी कि “लड़का भटक जाएगा, उसे काम सिखा दो।” वही रोहित जो महँगी कारों, क्लबों और शॉर्टकट्स का दीवाना था। उसने अर्जुन को देखा, फिर बिना दरवाज़ा खोले अंदर गायब हो गया।

—मुझे पापा की समाधि दिखाओ, अर्जुन ने कहा।

—लोधी रोड श्मशान। या शायद निगमबोध घाट। मुझे याद नहीं। मरने के बाद आदमी जगह से नहीं, कर्म से याद रखा जाता है।

—तुम्हें पता भी नहीं कि मेरे पिता की अस्थियाँ कहाँ हैं?

माया की आँखें कठोर हो गईं।

—जब वह रात भर दर्द से चिल्लाते थे, मैं उनके पास थी। जब लोगों को बताना पड़ता था कि उनका असली बेटा जेल में सड़ रहा है, मैं शर्म झेल रही थी। अब बेटा बनने का नाटक मत कर।

उसने दरवाज़ा बंद कर दिया।

अर्जुन सड़क पर उतर आया। वही पेड़, वही दूधवाला, वही मंदिर की घंटी, पर सब कुछ अजनबी था। एक बुज़ुर्ग पड़ोसी ने उसे पहचानकर खिड़की का पर्दा खींच लिया। वह बिना बोले ऑटो लेकर लोधी रोड श्मशान पहुँचा।

शाम ढल रही थी। हवा में राख, गीली मिट्टी और अगरबत्ती की मिली-जुली गंध थी। अर्जुन ने रजिस्टर पूछने के लिए दफ्तर की ओर कदम बढ़ाया ही था कि सफेद कुर्ते और धूल भरी बनियान पहने एक बूढ़े कर्मचारी ने उसे रोक लिया।

—तुम अर्जुन हो?

अर्जुन ठिठक गया।

—हाँ। आप?

—रामकिशन। 31 साल से यहाँ काम करता हूँ। तुम्हारे पिता विनोद जी हर साल 14 नवंबर को यहाँ आते थे, तुम्हारी माँ के लिए गेंदे और सफेद गुलाब लेकर।

अर्जुन की साँस अटक गई। 14 नवंबर उसकी माँ की बरसी थी।

—पापा यहीं हैं?

रामकिशन ने चारों तरफ देखा, फिर धीमे कहा—

—नहीं। और माया मैडम झूठ बोल रही हैं।

अर्जुन के पैरों के नीचे की जमीन जैसे खुल गई।

रामकिशन उसे एक पुराने कमरे के पीछे ले गया। लोहे की अलमारी खोली। अंदर से एक भूरा लिफाफा निकाला, जिस पर काँपते हाथों की लिखावट थी—

“मेरे बेटे अर्जुन के लिए। सिर्फ तभी देना, जब वह जेल से बाहर आए।”

लिफाफे से एक जंग लगी छोटी चाबी, एक स्टोरेज लॉकर की पर्ची और पिता की चिट्ठी निकली।

“बेटा, अगर तू यह पढ़ रहा है, तो समझ ले कि मैं तेरा इंतज़ार नहीं कर पाया। मुझे माफ कर देना। सबसे ज्यादा इस बात के लिए कि मैंने तुझ पर शक किया। अब मुझे सच पता है। तूने पैसे नहीं चुराए। तुझे फँसाया गया। और चोर मेरे ही खाने की मेज पर बैठे थे। लॉकर 217 में सब कुछ है। माया या रोहित से भिड़ने से पहले वहाँ जाना।”

अर्जुन ने चिट्ठी सीने से लगा ली।

उसी क्षण उसे लगा, उसका पिता मरा नहीं था—वह राख और झूठ के नीचे से पहली बार उससे सच बोल रहा था।

PART 2

अगली सुबह अर्जुन पहाड़गंज के सस्ते धर्मशाला से उठकर ओखला के पुराने स्टोरेज गोदाम पहुँचा। हाथ में वही जंग लगी चाबी थी, दिल में डर और गुस्सा दोनों।

लॉकर 217 खुला तो अंदर सामान नहीं, पिता की पूरी चुप्पी कागज़ों में बंद मिली। डिब्बों पर लिखा था—कंपनी, बैंक, मुकदमा, माया, रोहित, दवाइयाँ, वसीयत।

बीच में एक सफेद लिफाफा रखा था—“पहले इसे देख।”

उसमें पेन ड्राइव थी।

पास की दुकान से एडाप्टर लेकर अर्जुन ने मोबाइल में वीडियो खोला। स्क्रीन पर विनोद खन्ना दिखे—कमजोर, पीले, पर आँखें अब भी सच्ची।

—अर्जुन, तूने चोरी नहीं की। रोहित ने फर्जी बिल बनाए। माया ने तेरे कमरे में नकली दस्तावेज रखवाए। उन्होंने मेरी दवाइयाँ बढ़ाईं, तेरी चिट्ठियाँ छिपाईं, और मुझसे कागज़ों पर साइन करवाए। बेटा, बदला मत लेना। सच को सही जगह पहुँचा देना।

वीडियो रुकने से पहले विनोद ने एक बात कही—

—अगर मैं श्मशान में नहीं मिला, तो समझना उन्होंने मेरी मौत के बाद भी मुझसे मेरा नाम छीन लिया।

तभी अर्जुन का फोन बजा।

माया की आवाज़ आई—

—लॉकर में जो मिला है, उसे लेकर बाहर निकला तो इस बार जेल नहीं, सीधे गायब हो जाएगा।

PART 3

अर्जुन ने फोन काटा नहीं। वह कुछ सेकंड तक माया की साँस सुनता रहा। वही औरत, जिसने कभी उसके पिता के सामने मिठास से उसे “बेटा” कहा था, अब उसकी नसों में डर उतारने की कोशिश कर रही थी।

—तुम्हें कैसे पता मैं यहाँ हूँ? अर्जुन ने पूछा।

—दिल्ली छोटी है, अर्जुन। गरीब आदमी की हर चाल दिख जाती है। और जेल से निकले आदमी पर भरोसा कोई नहीं करता।

—तुम डर रही हो।

दूसरी तरफ कुछ पल सन्नाटा रहा।

—मैंने तुझे तब जेल भिजवाया था, जब तेरे पास वकील था, पैसा था, पिता जिंदा था। अब तेरे पास क्या है? एक फटा बैग और मरते हुए आदमी की वीडियो?

अर्जुन ने धीरे से कहा—

—मेरे पास सच है।

माया की आवाज़ बर्फ हो गई।

—सच अदालत में नहीं, लोगों की जेब में जीतता है। याद रख।

कॉल कट गई।

अर्जुन ने तुरंत डिब्बों से जरूरी फाइलें निकालीं। बैंक स्टेटमेंट, फर्जी कंपनियों के बिल, ईमेल की कॉपियाँ, डॉक्टर की दवाइयों की पर्चियाँ, वसीयत के बदले हुए पन्ने, पिता की चिट्ठियाँ, रोहित की हाथ से लिखी स्वीकारोक्ति और वह काला लिफाफा, जिसमें एक दूसरी पेन ड्राइव थी। उसने सब बैग में ठूँसा और बाहर निकल गया।

गोदाम के गेट के पास एक काली कार खड़ी थी। शीशे चढ़े हुए। अर्जुन ने उसकी ओर देखा भी नहीं। वह पैदल मुड़ा, गलियों से निकलता हुआ मेट्रो स्टेशन पहुँचा और भीड़ में खो गया। उस दिन उसने न माया के घर जाने की गलती की, न रोहित को फोन किया। तिहाड़ ने उसे 3 साल में एक बात सिखाई थी—गुस्से में किया गया पहला कदम अक्सर दुश्मन की जीत होता है।

दोपहर तक वह साकेत कोर्ट के पास एक कानूनी सहायता केंद्र में था। वहाँ उसकी मुलाकात अधिवक्ता नंदिता राव से हुई। छोटे बाल, साधारण कॉटन साड़ी और आँखों में वह कठोर ईमानदारी, जो लंबे झूठ सुनकर पैदा होती है।

शुरू में नंदिता ने अर्जुन को सावधानी से सुना। शायद वह हर दिन ऐसे लोगों से मिलती थीं, जो खुद को बेगुनाह कहते थे। लेकिन जैसे ही उन्होंने विनोद खन्ना की वीडियो देखी, उनका चेहरा बदल गया। फिर उन्होंने बैंक रिकॉर्ड देखे। फिर रोहित की लिखी स्वीकारोक्ति। फिर डॉक्टर की पर्चियाँ, जिनमें दर्द की दवाओं से ज्यादा बेहोशी लाने वाली दवाओं की मात्रा थी।

40 मिनट बाद उन्होंने चश्मा उतारकर टेबल पर रखा।

—अर्जुन, यह सिर्फ गलत सजा का मामला नहीं है।

—तो क्या है?

—साजिश। धोखाधड़ी। फर्जी दस्तावेज। बुजुर्ग बीमार व्यक्ति का शोषण। सबूत गढ़ना। और शायद तुम्हारे पिता की मौत के बाद उनके शरीर के साथ भी गैरकानूनी काम।

अर्जुन का चेहरा सूख गया।

—मतलब?

नंदिता ने मृत्यु प्रमाणपत्र उठाया।

—यहाँ लिखा है कि अंतिम संस्कार परिवार की अनुमति से हुआ। लेकिन रजिस्टर नंबर गायब है। डॉक्टर की मुहर संदिग्ध है। और अगर माया कहती है कि लोधी रोड में दाह संस्कार हुआ, तो वहाँ रिकॉर्ड क्यों नहीं?

अर्जुन की आवाज़ भर्रा गई।

—मुझे सिर्फ इतना जानना है कि पापा कहाँ हैं।

—जानेंगे। लेकिन पहले हमें यह साबित करना होगा कि उन्होंने तुमसे सब कुछ छीनने के लिए झूठ की पूरी इमारत बनाई।

अगले कुछ महीने अर्जुन के जीवन की दूसरी लड़ाई बन गए। पहली लड़ाई उसने अकेले लड़ी थी, जब अदालत में उसके खिलाफ फर्जी दस्तावेज रखे गए थे और पिता की चुप्पी ने उसकी रीढ़ तोड़ दी थी। इस बार वह अकेला नहीं था। नंदिता ने उच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका डाली, आर्थिक अपराध शाखा को शिकायत दी, और विनोद की वीडियो सहित सारे दस्तावेज सीलबंद कराए।

जांच शुरू होते ही माया की चमक उतरने लगी।

फर्जी कंपनियाँ एक-एक कर सामने आईं। एक कंपनी गुरुग्राम के खाली फ्लैट के पते पर थी। दूसरी रोहित के दोस्त के बैंक खाते से जुड़ी थी। तीसरी ने ठीक उसी सप्ताह पैसा लिया था, जिस सप्ताह अर्जुन के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज हुई थी। लॉगिन रिकॉर्ड से पता चला कि कंपनी के खाते में कई एंट्री रोहित के लैपटॉप से हुई थीं, लेकिन यूजर आईडी अर्जुन की थी।

माया ने पहले वही पुराना नाटक किया। महँगी साड़ी, हल्का काजल, काँपती आवाज़।

—विनोद जी बहुत टूट चुके थे। अर्जुन पैसों को लेकर हमेशा बेचैन रहता था। रोहित तो बस कंपनी संभालने की कोशिश कर रहा था।

लेकिन रोहित उतना मजबूत नहीं निकला। जैसे ही उसे लगा कि केस गंभीर है, उसने अपनी कार बेचने की कोशिश की, 18 लाख नकद निकाले और बैंकॉक की टिकट बुक कर ली। एयरपोर्ट पर इमिग्रेशन से पहले ही उसे रोक लिया गया। उसके बैग से नकद, एक नया फोन और कुछ दस्तावेज मिले।

जब पुलिस ने उसे उसकी ही लिखी स्वीकारोक्ति दिखाई, पहले उसने कहा कि विनोद ने जबरन लिखवाई। फिर दूसरी पेन ड्राइव चलाई गई। उसमें रोहित की शराबी आवाज़ साफ थी—

—विनोद अंकल, अर्जुन जेल में है क्योंकि आपने वही साइन किया जो हमें चाहिए था। और जब वह बाहर आएगा, लोग उसे चोर ही कहेंगे। आपका असली वारिस मैं हूँ, वो नहीं।

फिर विनोद की कमजोर आवाज़—

—क्यों किया तुमने?

रोहित हँसा था।

—क्योंकि आप मुझे कभी वह नहीं देते जो अपने बेटे के लिए बचा रहे थे।

यह सुनकर अर्जुन ने रिकॉर्डिंग बंद करने को कहा। वह बाहर गलियारे में चला गया और पहली बार दीवार पकड़कर रोया। उसे यह बात नहीं तोड़ रही थी कि रोहित ने चोरी की। उसे यह तोड़ रहा था कि उसके पिता उस रात सच जान चुके थे, पर शायद बहुत देर हो चुकी थी।

माया की गिरफ्तारी एक सुबह हुई। वही ग्रेटर कैलाश का बंगला, वही दरवाज़ा, वही सीढ़ियाँ। फर्क बस इतना था कि इस बार दरवाज़े पर अर्जुन नहीं, पुलिस खड़ी थी। पड़ोसी फिर खिड़कियों से झाँक रहे थे। कुछ वही चेहरे थे जिन्होंने 3 साल पहले उसे देखकर पर्दे गिरा लिए थे।

माया ने पुलिस से कहा—

—मैं बीमार पति की देखभाल कर रही थी। क्या यही मेरा अपराध है?

जांच अधिकारी ने शांत स्वर में कहा—

—बीमार पति से बेहोशी में साइन करवाना, बेटे की चिट्ठियाँ छिपाना और फर्जी कागज बनवाना अपराध है, मैडम।

माया की आँखें पहली बार सचमुच डरी हुई लगीं।

अदालत में वह दिन भारी था, जब अर्जुन की सजा पर पुनर्विचार की सुनवाई हुई। उसने उधार की सफेद कमीज पहनी थी। थोड़ी ढीली, पर साफ। नंदिता ने उसे कहा था—

—दिखावा मत करना। टूटे हुए भी मत दिखना। बस सच्चे रहना।

माया अदालत में क्रीम रंग की साड़ी पहनकर आई। रोहित झुका हुआ था, जैसे रातों की नींद उससे छीन ली गई हो। लेकिन अर्जुन ने देखा, माया की आँखों में पछतावा नहीं था। सिर्फ हार का डर था।

सुनवाई में एक-एक सबूत रखा गया। बैंक ट्रांसफर। फर्जी बिल। लॉगिन रिकॉर्ड। अर्जुन की जेल से भेजी गई 27 चिट्ठियाँ, जो माया के कमरे की अलमारी से बंद मिली थीं, कभी खोली भी नहीं गईं। डॉक्टर की पर्चियाँ। वसीयत में बदलाव। विनोद की लिखावट। रोहित की आवाज़। और अंत में वीडियो।

स्क्रीन पर विनोद खन्ना का चेहरा आया तो अदालत में सन्नाटा फैल गया।

—अगर यह वीडियो किसी न्यायाधीश तक पहुँचे, तो इसका मतलब है मेरा बेटा उस साजिश से बच गया, जिसमें मेरे अपने घर ने उसे धकेला। अर्जुन निर्दोष है। रोहित ने पैसा चुराया। माया ने उसे बचाया। उन्होंने मुझे मेरे बेटे से अलग किया, मेरी दवाओं से मुझे कमजोर किया, और मेरे हाथ से वह कागज़ साइन करवाए जिन्हें मैं समझ भी नहीं पा रहा था। मैं अपने बेटे से माफी माँगना चाहता था। अगर मैं नहीं हूँ, तो अदालत से कहता हूँ—उसे उसका नाम वापस दे दीजिए।

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं। यह पिता की आखिरी गवाही थी। वह गवाही, जो 3 साल पहले मिल जाती तो उसका जीवन बच जाता।

7 महीने बाद उसकी सजा रद्द हुई। 9 महीने बाद उसका आपराधिक रिकॉर्ड साफ हुआ। अखबारों में खबर आई—“दिल्ली का कारोबारी 3 साल बाद बेगुनाह साबित।” सोशल मीडिया पर लोग गुस्सा थे, दुखी थे, हैरान थे। कुछ ने लिखा, “बेटे से उसका बाप छीन लिया गया।” कुछ ने पूछा, “झूठे केस लगाने वालों को क्या सजा मिलनी चाहिए?” वही पड़ोसी जिन्होंने खिड़कियाँ बंद की थीं, अब संदेश भेज रहे थे—“हमें हमेशा शक था।” अर्जुन ने शायद ही किसी को जवाब दिया। देर से आया विश्वास कभी-कभी अपमान जैसा लगता है।

माया और रोहित पर मुकदमा चला। रोहित ने सजा कम करवाने के लिए सच बोलना शुरू किया। उसने माना कि फर्जी कंपनियाँ उसने बनाईं। अर्जुन के फ्लैट में दस्तावेज माया ने रखवाए। अर्जुन की चिट्ठियाँ माया खोलती भी नहीं थी, बस अलमारी में बंद करती थी। विनोद को बताया जाता था कि अर्जुन उन्हें गालियाँ लिखता है, उनकी मौत का इंतज़ार करता है, और जेल से भी संपत्ति माँग रहा है।

लेकिन अर्जुन की सबसे बड़ी बेचैनी अभी खत्म नहीं हुई थी।

विनोद खन्ना कहाँ थे?

यह सवाल अंत में एक पुराने ड्राइवर ने सुलझाया। उसका नाम इरफान था। वह कभी विनोद के घर गाड़ी चलाता था। उसने बयान दिया कि विनोद की मौत वाली सुबह कोई वैध अंतिम संस्कार नहीं हुआ था। माया ने रात में डॉक्टर को बुलाया, सुबह 4 बजे एक निजी एम्बुलेंस आई, और शरीर को हरियाणा की सीमा के पास एक पुराने फार्महाउस ले जाया गया, जो माया के रिश्तेदार के नाम था।

अदालत में जब यह बात आई, माया ने सपाट आवाज़ में कहा—

—विनोद को कोई रस्म नहीं चाहिए थी। वह बहुत बीमार थे। उन्हें क्या समझ आता?

नंदिता ने विनोद की चिट्ठी पढ़ी, जिसमें लिखा था कि वह अपनी पहली पत्नी की स्मृति के पास, शांत जगह पर, पूरे सम्मान से विदा होना चाहते थे।

न्यायाधीश ने पूछा—

—तो आपने बिना नाम, बिना रिकॉर्ड, बिना परिवार के बेटे को सूचना दिए शरीर दफनाया?

माया ने कंधे उचकाए।

—मैंने जो ठीक लगा, किया।

उस क्षण अर्जुन चिल्लाया नहीं। उसने मेज नहीं पटकी। बस उसकी आँखों में एक अजीब खालीपन उतर आया। इस औरत ने उसका पैसा, नाम, पिता, घर और 3 साल चुराए थे। पर सबसे क्रूर चोरी यह थी कि उसने एक बेटे से शोक मनाने की जगह भी छीन ली थी।

कुछ दिनों बाद पुलिस टीम, नंदिता, अर्जुन और रामकिशन उस फार्महाउस पहुँचे। दिल्ली से बाहर निकलते ही शहर की आवाज़ पीछे छूट गई। सड़कें खेतों में बदल गईं। सरसों के सूखे डंठल, ईंट-भट्टों की धूल और दूर-दूर तक फैली दोपहर की सफेदी।

फार्महाउस लगभग छोड़ा हुआ था। जंग लगा गेट, टूटी दीवार, बंद कमरे, और पीछे की ओर बबूल के पेड़ों के बीच सूखी घास। इरफान ने काँपते हाथ से एक जगह इशारा किया—पुराने नीम के पेड़ के पास मिट्टी थोड़ी उभरी हुई थी।

अर्जुन धीरे-धीरे वहाँ पहुँचा।

हर कदम जैसे उसके भीतर से 1 साल की आग निकाल रहा था और सिर्फ दुख छोड़ रहा था।

वह मिट्टी के सामने घुटनों पर बैठ गया।

—पापा…

बस इतना कहा और आवाज़ टूट गई।

रामकिशन ने सिर से टोपी उतार ली। नंदिता कुछ दूर खड़ी रहीं। जांच अधिकारी भी चुप हो गया। वहाँ कोई बड़ा दृश्य नहीं था। कोई नाटकीय संगीत नहीं। सिर्फ एक बेटा, एक बिना नाम की मिट्टी, और 3 साल की गलतफहमी, जो अब राख से भी भारी लग रही थी।

अर्जुन ने मिट्टी पर हाथ रखा।

—मैं आ गया, पापा। देर हो गई… पर मैं आ गया।

उसके मन में आखिरी मुलाकात कौंधी। मुकदमे से पहले पिता जेल में मिलने आए थे। काँच की दीवार के पार बैठे विनोद की आँखें थकी हुई थीं। अर्जुन ने कहा था—

—पापा, मेरी आँखों में देखिए। मैंने कुछ नहीं किया।

विनोद ने बहुत देर बाद कहा था—

—काश मैं यकीन कर पाता।

वह वाक्य अर्जुन को जेल की हर रात काटता रहा था। अब उसी मिट्टी के सामने उसने फुसफुसाया—

—आपको सच पता चल गया था। मेरे लिए यही काफी है।

कानूनी प्रक्रिया लंबी चली। शरीर की पहचान हुई। मृत्यु और दफन से जुड़े सारे अवैध काम रिकॉर्ड में आए। अर्जुन चाहता तो पिता को दिल्ली लाकर माँ की स्मृति के पास रखता। लेकिन लॉकर 217 में मिली विनोद की आखिरी नोट ने उसका निर्णय बदल दिया था।

“अगर मेरे अपने मुझे जगह न दें, तो मुझे वहाँ मत रखना जहाँ लोग नाम के लिए रोएँ। किसी पेड़ के नीचे, खुली हवा में, जहाँ सच पर किसी का ताला न हो।”

अर्जुन ने फार्महाउस की मिट्टी से दूर, हरियाणा के एक छोटे शांत कब्रिस्तान जैसे स्मृति स्थल में, नीम और अमलतास के बीच पिता के लिए वैध स्मारक बनवाया। पत्थर सादा था, काला और मजबूत।

उस पर लिखा था—

“विनोद खन्ना। पिता। निर्माता। सच देर से आया, पर आया।”

अंतिम विदाई के दिन भीड़ नहीं थी। रामकिशन था। नंदिता थीं। खन्ना कंपनी के 4 पुराने मजदूर आए थे, जिन्हें रोहित ने निकाल दिया था। उनमें से एक, सलीम, अपने साथ पुराना मापने वाला फीता लाया।

—साहब कहते थे, दीवार टेढ़ी हो तो तोड़ने से पहले कारण समझो, उसने रोते हुए कहा। आदमी टूटे तो भी ऐसा ही करना चाहिए।

अर्जुन ने फीता पिता की स्मृति पर रखा और सिर झुका लिया।

माया को बुजुर्ग के शोषण, धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज, धमकी और सबूत छिपाने के मामलों में कड़ी सजा मिली। रोहित को भी सजा हुई, हालांकि सहयोग करने के कारण कम। इंटरनेट पर लोग भड़क गए। किसी ने कहा, “कम सजा है।” किसी ने लिखा, “3 साल की जिंदगी कौन लौटाएगा?” अर्जुन ने बहस नहीं की। उसे पता था, भीड़ को खलनायक चाहिए होते हैं। पर असली दर्द अदालत की फाइलों से बाहर, रातों की नींद में रहता है।

बंगला अदालत के आदेश से अर्जुन को मिला। कंपनी के हिस्से भी लौटे। कुछ पैसा वापस आया, कुछ कभी नहीं मिला। लोग बोले—

—अब तो उसी घर में रहना। यही असली जीत होगी।

लेकिन अर्जुन एक दिन अकेले उस बंगले में गया और घंटों खाली कमरों में घूमता रहा। जहाँ माँ की दीपशाला थी, वहाँ धूल का निशान था। जहाँ पिता की कुर्सी रहती थी, वहाँ फर्श थोड़ा हल्का था। सीढ़ियों पर उसे माया के कदम सुनाई दिए। स्टडी रूम में उसे वे चिट्ठियाँ याद आईं, जो कभी पढ़ी नहीं गईं। रसोई में उसने कल्पना की, पिता दवा का गिलास पी रहे हैं और सामने माया उन्हें झूठ खिला रही है।

वह घर जीत नहीं था। वह कैद का दूसरा रूप था।

अर्जुन ने बंगला बेच दिया।

लोगों ने कहा, वह भावुक हो गया। कुछ ने कहा, उसे संपत्ति बचानी चाहिए थी। लेकिन अर्जुन जानता था, वह झूठ को अपना पता नहीं बनने देगा।

उसने कंपनी दोबारा शुरू की—“खन्ना रिस्टोरेशन।” पुराने मजदूरों को वापस बुलाया। छोटे काम लिए, साफ काम लिए। रिश्वत वाले ठेके ठुकराए। ऑफिस में उसने पिता की एक पंक्ति धातु की पट्टिका पर लिखवाई—

“कोई इमारत इतनी कीमती नहीं कि उसे बचाने के लिए किसी इंसान को कुचल दिया जाए।”

नंदिता के साथ मिलकर उसने एक छोटा फंड भी शुरू किया, उन परिवारों के लिए जिनके लोग झूठे मामलों में फँसकर अकेले पड़ जाते हैं। वह मीडिया में इसका ढिंढोरा नहीं पीटता था। उसे पता था, जब जेल का दरवाज़ा बंद होता है, तो बाहर कई लोग आपकी कहानी अपनी सुविधा से लिखना शुरू कर देते हैं।

1 साल बाद, अर्जुन नीम वाले स्मृति स्थल पर सफेद गुलाब और गेंदे लेकर पहुँचा। रामकिशन अब धीमे चलते थे, पर साथ आए। शाम हल्की सुनहरी थी, पर उदास नहीं। हवा में धूल थी, पर बोझ नहीं।

अर्जुन ने फूल रखे।

रामकिशन ने धीरे से कहा—

—विनोद जी आज तुम्हें देखते तो बहुत गर्व करते।

अर्जुन ने पत्थर पर लिखे नाम को देखा। लंबे समय तक “गर्व” शब्द उसे चुभता था, जैसे वह उसके योग्य नहीं। लेकिन उस दिन उसने उसे भीतर आने दिया।

—शायद अब मैं इस बात पर भरोसा कर सकता हूँ।

दोनों कुछ देर चुप रहे।

अर्जुन वह आदमी नहीं रहा था, जो जेल से फटा बैग लेकर लौटा था और दरवाज़े पर सुनता था कि उसका पिता बिना नाम के चला गया। वह पूरी तरह ठीक भी नहीं हुआ था। कुछ घाव कभी बंद नहीं होते; बस वे यह सीख जाते हैं कि किन लोगों के सामने खून नहीं बहाना।

जाने से पहले उसने पत्थर पर हाथ रखा।

—आप जेल के बाहर मेरा इंतज़ार नहीं कर पाए, पापा। घर में भी नहीं मिले। श्मशान में भी नहीं। मगर आपने मेरे लिए सच छोड़ दिया। और कभी-कभी सच ही वह आखिरी आलिंगन होता है, जो मरने के बाद भी पिता अपने बेटे को दे सकता है।

नीम की पत्तियाँ हवा में हिलीं।

अर्जुन ने पीछे मुड़कर आखिरी बार देखा।

उससे 3 साल छीने गए थे। उसका घर, उसका नाम, उसकी इज्जत, उसका पिता और यह भरोसा भी कि परिवार हमेशा बचाता है। लेकिन सब कुछ नहीं छीना जा सका। उसकी स्मृति नहीं। उसका सच नहीं। वह जंग लगी चाबी नहीं, जिसने बंद लॉकर ही नहीं, बंद रिश्ते की आखिरी आवाज़ भी खोल दी थी।

कुछ लोग पैसे चुराते हैं। कुछ कागज़ों पर झूठे हस्ताक्षर करवाते हैं। कुछ किसी की जिंदगी के 3 साल चुरा लेते हैं। और कुछ इतने क्रूर होते हैं कि एक बेटे से उसके पिता की मिट्टी तक छिपा देते हैं।

लेकिन जब तक कोई बेटा लौटकर पूछता है—“मेरे पिता कहाँ हैं?”—तब तक कोई झूठ हमेशा के लिए दफन नहीं रह सकता।

Disclaimer: This story is a work of fiction created for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.