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अपनी ही शादी के मंच पर बहू ने विधवा सास के सफेद बालों पर चाशनी उंडेली, बेटा सिर झुकाकर चुप रहा, और माँ ने सबके सामने कहा, “कल से मेरा घर और मेरा पैसा बंद है”, तभी 5 साल की चुप्पी टूट गई

PART 1

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अपने ही बेटे की शादी में, सबके सामने बहू ने 65 साल की विधवा माँ के सफेद बालों पर गुलाब जामुन की चाशनी और रेड वाइन उंडेल दी, और बेटा स्टेज पर बैठा सिर झुकाए चुप रहा।

दिल्ली के छतरपुर वाले बड़े बैंक्वेट हॉल में 200 मेहमानों की साँस जैसे अटक गई। फूलों की झालरें, चमकती लाइटें, महँगा डीजे, कैमरों की फ्लैश और सोने की कढ़ाई वाले लहंगों के बीच शकुंतला मेहरा कुर्सी पर बैठी थीं। उनके माथे से चिपचिपी चाशनी बहकर भौंहों से गुज़री, फिर उनकी हल्के क्रीम रंग की साड़ी के पल्लू में फैल गई।

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नई दुल्हन रिया ने खाली गिलास मेज़ पर रखकर मुस्कुराते हुए कहा—

“कल से इस घर में आपकी कोई जगह नहीं होगी, आंटीजी।”

हॉल में किसी ने धीमे से “हे भगवान” कहा। किसी ने मोबाइल निकाल लिया। किसी ने नज़रें फेर लीं। मगर शकुंतला की आँखें सिर्फ अपने बेटे आरव पर टिक गईं।

आरव, 34 साल का, नेवी ब्लू शेरवानी में, अपनी ही शादी के मंच पर बैठा था। उसने माँ की तरफ देखा भी नहीं। बस अपनी प्लेट में पड़े अधखाए गुलाब जामुन को घूरता रहा।

शकुंतला ने 38 साल सरकारी अस्पताल में नर्स की नौकरी की थी। पति की मौत के बाद उन्होंने अकेले आरव को पढ़ाया, उसकी फीस भरी, उसकी पहली नौकरी तक किराया दिया, उसके टूटे रिश्ते सँभाले, उसके कर्ज चुकाए। पिछले 5 साल से आरव और रिया उनके लाजपत नगर वाले घर में बिना किराए रह रहे थे। रिया तब मंगेतर थी, फिर “जल्द शादी होगी” कहकर घर में जम गई।

शकुंतला सुबह उनके लिए पराठे बनातीं, दोपहर में बिजली-पानी के बिल भरतीं, शाम को रिया के ऑनलाइन मंगाए पैकेट रिसीव करतीं। रिया कहती—

“आपका ड्रॉइंग रूम बहुत पुराने लोगों जैसा है।”

आरव हँसकर बोलता—

“माँ, उसे मत लो दिल पर। उसका टेस्ट मॉडर्न है।”

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उस शादी की आधी सजावट, रिया का मेकअप आर्टिस्ट, फोटोग्राफर का एडवांस और गोवा हनीमून की बुकिंग तक शकुंतला के खाते से गई थी। हर बार आरव कहता—

“बस इस बार मदद कर दो माँ, फिर सब ठीक कर दूँगा।”

शकुंतला ने हर बार विश्वास किया।

लेकिन उस रात, जब रिया ने उन्हें सबके सामने अपमानित किया और आरव चुप बैठा रहा, शकुंतला के भीतर 5 साल की चुप्पी टूट गई।

उन्होंने धीरे से नैपकिन उठाया, चेहरा पोंछा, काँपते घुटनों के बावजूद खड़ी हुईं और स्टेज के पास रखा माइक उठा लिया।

हॉल में सन्नाटा जम गया।

शकुंतला की आवाज़ धीमी थी, मगर हर मेहमान ने सुनी—

“रिया, इस हॉल, इन फूलों, इस लहंगे, इस खाने और इन कैमरों का आनंद ले लो। क्योंकि कल सुबह से मेरा घर, मेरा बैंक खाता और मेरी चुप्पी—तीनों तुम दोनों के लिए बंद हो जाएँगे।”

आरव ने पहली बार सिर उठाया।

रिया का चेहरा सफेद पड़ गया।

शकुंतला ने माइक रख दिया, अपना पर्स उठाया और बिना रोए, बिना पीछे देखे हॉल से बाहर निकल गईं।

पीछे से आरव की टूटी आवाज़ आई—

“माँ…”

लेकिन उस रात शकुंतला ने पहली बार अपने बेटे की आवाज़ से ज़्यादा अपनी आत्मा की आवाज़ सुनी।

PART 2

अगली सुबह 10 बजे आरव और रिया होटल से सूटकेस लेकर लाजपत नगर पहुँचे, जैसे रात की बेइज़्ज़ती सिर्फ शादी का “ड्रामा” थी।

रिया ने दरवाज़े में घुसते ही कहा—

“आपने हमारा पूरा फंक्शन खराब कर दिया। लोग क्या सोचेंगे?”

शकुंतला रसोई में काली चाय के सामने बैठी थीं। उनके बाल 3 बार धुल चुके थे, फिर भी अपमान की गंध मन से नहीं गई थी।

उन्होंने शांत होकर कहा—

“लोगों ने वही देखा, जो तुमने किया।”

आरव ने थका हुआ चेहरा बनाया—

“माँ, रिया तनाव में थी। शादी में प्रेशर होता है।”

शकुंतला ने बेटे को देखा।

“गलती से गिलास गिरता है, बेटा। उसने मुझे निशाना बनाया था।”

रिया सीढ़ियों की तरफ बढ़ी।

“अब हम शादीशुदा हैं। आपकी बड़ी वाली बेडरूम हमें चाहिए। आपको नीचे वाले कमरे में शिफ्ट होना होगा।”

शकुंतला ने मेज़ पर एक नई चाबी रखी।

“मेरे कमरे और मेरे स्टडी की कुंडी आज सुबह बदल चुकी है।”

रिया भागकर ऊपर गई। हैंडल ज़ोर से हिला। दरवाज़ा नहीं खुला।

नीचे लौटकर वह फुफकारते हुए बोली—

“आपको लगता है आरव आपको मेरे ऊपर चुनेगा?”

आरव चुप रहा।

शकुंतला ने चाबी उठाई।

“यही तो देखना था।”

PART 3

उस दिन के बाद लाजपत नगर का वही घर, जहाँ शकुंतला कभी अपने कदम दबाकर चलती थीं, जैसे धीरे-धीरे उनका फिर से होने लगा।

मंगलवार की सुबह रिया किराने की दुकान से तमतमाती हुई लौटी। हाथ में बिल था, चेहरे पर अपमान।

“मेरी कार्ड मशीन पर रिजेक्ट हो गई। दुकानदार मुझे ऐसे देख रहा था जैसे मैं चोर हूँ।”

शकुंतला ने अखबार मोड़ा।

“वह तुम्हारी कार्ड नहीं थी। वह मेरी ग्रोसरी कार्ड थी। मैं हर महीने उसमें पैसे डालती थी। कल बंद कर दी।”

आरव ऑफिस जाने के लिए जूते पहन रहा था। वह वहीं रुक गया।

“माँ, खाना तो खाना है।”

“तो कमाकर खरीदो।”

रिया हँस पड़ी, मगर उस हँसी में डर छिपा था।

“आप बदला ले रही हैं।”

“नहीं,” शकुंतला ने कहा, “मैं तुम्हें पालना बंद कर रही हूँ।”

आरव ने माथा पकड़ लिया।

“हम अभी शादी से निकले हैं। फोटोग्राफर का बैलेंस है, गोवा होटल ने पूरा पेमेंट काट लिया, डीजे वालों ने भी कॉल किया है।”

“तो हिसाब सीखो।”

दोनों उन्हें ऐसे देखने लगे, जैसे माँ ने कोई निर्दयी कानून सुना दिया हो।

5 साल से आरव एक अच्छी डिजिटल मार्केटिंग कंपनी में काम करता था। रिया इवेंट प्लानर थी। कमाई दोनों की ठीक थी, मगर खर्च हमेशा उनसे तेज़ भागता था। महंगे कैफे, ब्रांडेड बैग, वीकेंड रिसॉर्ट, इंस्टाग्राम फोटोशूट, दोस्तों के सामने शान—और महीने के अंत में आरव का वही वाक्य—

“माँ, थोड़ा एडवांस कर दो। बस इस बार।”

बस इस बार 60 महीनों तक चला था।

गुरुवार को रसोई का सिंक बर्तनों से भर गया। प्लेटों पर सूखा दाल-चावल चिपका था, कढ़ाही में तेल जम गया था, गिलासों में कोल्ड ड्रिंक की परत बैठी थी। पहले शकुंतला सब धो देतीं, ताकि रिया ताना न मारे। उस दिन उन्होंने सिर्फ अपना कप, अपनी प्लेट और अपनी चम्मच धोई। बाकी सब वैसा ही छोड़ दिया।

शाम को उन्होंने अपने लिए मूंग दाल, लौकी की सब्ज़ी और 2 रोटियाँ बनाईं। आरव नीचे आया।

“माँ, खाना बना है?”

“हाँ।”

“हमारे लिए?”

“नहीं। फ्रिज में अंडे हैं, बना लो।”

आरव की आँखें फैल गईं।

रिया कमरे से निकली, बाल खुले, फोन हाथ में।

“आप घर पर रहती हैं। 3 लोगों का खाना बनाने में क्या चला जाता है?”

शकुंतला ने रोटी का टुकड़ा तोड़ा।

“मैं रिटायर हूँ, नौकरानी नहीं।”

रिया ने फोन मेज़ पर पटका।

“आपको जलन है कि आरव की जिंदगी में अब मैं सबसे ज़रूरी हूँ।”

शकुंतला ने पहली बार बिना दुखी हुए उसे देखा।

“मुझे किसी की जिंदगी की सबसे ज़रूरी औरत नहीं बनना। मुझे अपने घर की इज़्ज़तदार मालिक होना है।”

उस रात उन्होंने खाना ऑनलाइन मंगवाया। डिब्बे सुबह तक मेज़ पर पड़े रहे। शकुंतला ने छुआ भी नहीं।

शनिवार को रिया ने ड्रॉइंग रूम को पिंक गुब्बारों, फूलों और ग्लासों से भर दिया। शकुंतला का पुराना आरामकुर्सी खिसकाकर गलियारे में रख दिया गया था।

“यह क्या हो रहा है?” शकुंतला ने पूछा।

रिया ने बिना मुड़े कहा—

“ब्राइडल ब्रंच है। मेरी फ्रेंड्स आ रही हैं। आप 3 बजे तक ऊपर रह लीजिएगा।”

शकुंतला ने जाकर अपनी कुर्सी वापस खिड़की के पास रखी।

“नहीं।”

रिया पलटी।

“मतलब?”

“मतलब, मेरी अनुमति के बिना मेरे घर में कोई पार्टी नहीं होगी।”

आरव नीचे आया।

“माँ, उसकी दोस्त रास्ते में हैं। तमाशा मत करो।”

“तमाशा तो शादी में हो चुका है। अब नियम होंगे।”

रिया की आँखें भर आईं, मगर आँसू शर्म के नहीं, गुस्से के थे।

“आप मुझे मेरी फ्रेंड्स के सामने नीचा दिखाएँगी?”

शकुंतला ने शांत स्वर में कहा—

“अजीब है। मुझे लगा था किसी को सबके सामने नीचा दिखाना तुम्हारे लिए मज़ाक होता है।”

रिया बाहर जाकर फोन पर रोने लगी। उसकी सहेलियाँ कैफे में मिलीं। शकुंतला ने खिड़की खोली, अपनी कुर्सी पर बैठीं और पुराने उपन्यास का पहला पन्ना पढ़ा। इतने साल बाद ड्रॉइंग रूम में उनके साँस लेने की जगह बची थी।

एक हफ्ते बाद उन्होंने रिया को नीचे वाले छोटे कमरे की नाप लेते पकड़ा। वही कमरा जहाँ उनके दिवंगत पति महेश अपनी टूल-बॉक्स और पुरानी फाइलें रखते थे।

रिया ने घोषणा की—

“मैं इसे अपना योगा स्टूडियो बनाऊँगी। आपकी वजह से हमें ढंग की मास्टर बेडरूम नहीं मिली, तो कम से कम पर्सनल स्पेस तो चाहिए।”

शकुंतला ने कोई बहस नहीं की। बस सिर हिला दिया।

अगले दिन जब दोनों ऑफिस गए, शकुंतला ने कमरे से पुराने डिब्बे निकाले, महेश की यादों को सावधानी से अलग रखा, बेकार सामान दान में दिया और बाज़ार से कैनवास, रंग, ब्रश और एक छोटा ईज़ल खरीद लाई। शादी से पहले, नौकरी से पहले, माँ बनने से पहले, वह पेंटिंग किया करती थीं। उन्होंने हमेशा कहा था—

“कभी समय मिला तो फिर शुरू करूँगी।”

उस शाम रिया लौटी तो छोटे कमरे में हल्की सफेद दीवार, लकड़ी की मेज़ और नीले रंग से भरी पैलेट देखकर चीख पड़ी।

“यह मेरा योगा रूम था!”

शकुंतला ने ब्रश पानी में धोया।

“नहीं। यह मेरा स्टूडियो है।”

रिया पास आ गई।

“आप मुझे नफरत करती हैं।”

“नहीं। मैंने बस तुमसे डरना छोड़ दिया है।”

दरवाज़े पर खड़ा आरव सब सुन रहा था। शकुंतला ने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हें भी लगता है उसे यह कमरा मिलना चाहिए?”

आरव ने गहरी साँस ली।

“माँ, बात मत बढ़ाओ।”

शकुंतला मुस्कुराईं। मुस्कान बहुत छोटी थी, मगर उसमें निर्णय साफ था।

“तुमने जवाब दे दिया।”

उसी दोपहर शकुंतला एक प्रॉपर्टी एजेंट से मिलीं। साउथ एक्सटेंशन के एक शांत कैफे में मीरा कपूर नाम की एजेंट आई। शकुंतला ने फाइल मेज़ पर रखी—घर की रजिस्ट्री, टैक्स की रसीदें, मरम्मत के बिल, बिजली-पानी के दस्तावेज़।

“घर पूरी तरह मेरे नाम है,” शकुंतला ने कहा। “किसी को भनक नहीं लगनी चाहिए।”

मीरा ने कागज़ देखे।

“लाजपत नगर में आपका प्लॉट बहुत कीमती है। शांत बिक्री हो सकती है। बोर्ड नहीं लगेगा। खरीदार सिर्फ अपॉइंटमेंट पर आएँगे।”

“मुझे यही चाहिए।”

उसके बाद शकुंतला वकील से मिलीं। उन्होंने पूछा कि बेटे और बहू को कितने दिन का नोटिस देना होगा, घर खाली करवाने का कानूनी तरीका क्या है, और अगर रिया सोशल मीडिया पर झूठ फैलाए तो क्या करना चाहिए।

शाम को उन्होंने द्वारका में एक छोटा अपार्टमेंट देखा। दूसरी मंज़िल, लिफ्ट, छोटी बालकनी, सफेद रसोई, धूप वाली खिड़की, और इतना ही कमरा कि कोई आकर 5 साल के लिए बस न सके।

अंदर कदम रखते ही शकुंतला ने कुछ महसूस किया।

शांति।

अगले दिन उन्होंने टोकन अमाउंट दे दिया।

अगले 2 हफ्तों तक आरव और रिया छोटी-छोटी बातों पर झगड़ते रहे। डिटर्जेंट कौन खरीदेगा। इंटरनेट बिल किसके खाते से जाएगा। गैस सिलेंडर क्यों खत्म हुआ। बाथरूम कौन साफ करेगा। शकुंतला अब सिर्फ अपने लिए चाय बनातीं, अपने लिए खाना पकातीं और अपने स्टूडियो में नीले, सफेद, हरे रंग से कैनवास भरतीं।

जब रिया और आरव ऑफिस में होते, मीरा खरीदारों को घर दिखाती। एक रिटायर्ड प्रोफेसर दंपती आया। महिला ने आँगन के नीम के पेड़ को देखकर कहा—

“इस घर में पुरानी गरमाहट है।”

शकुंतला ने मन ही मन सोचा—गरमाहट नहीं, अब जाकर हवा लौटी है।

शुक्रवार शाम 6:30 पर मीरा का फोन आया।

“मैडम, ऑफर पूरा है। कैश पेमेंट। 30 दिन में पजेशन चाहते हैं।”

शकुंतला ने खिड़की से बाहर देखा। सड़क पर बच्चों की आवाज़ आ रही थी।

“पेपर तैयार करिए।”

सोमवार को समझौता साइन हो गया। वकील ने नोटिस तैयार किया। उसी रात शकुंतला ड्रॉइंग रूम में 8 खाली डिब्बे लेकर उतरीं।

आरव सोफे पर मोबाइल गेम खेल रहा था। रिया नेल पेंट लगा रही थी।

“ये डिब्बे क्यों?” आरव ने पूछा।

“ताकि तुम दोनों सामान पैक करना शुरू करो।”

रिया हँसी।

“आखिर आप जा रही हैं? अच्छा है। अब घर में घुटन कम होगी।”

शकुंतला ने पहला डिब्बा खोला।

“हाँ, मैं जा रही हूँ। पर एक बात और है।”

आरव ने मोबाइल नीचे रखा।

“क्या?”

शकुंतला ने सीधा कहा—

“मैंने यह घर बेच दिया है।”

कमरे में ऐसी चुप्पी गिरी कि दीवार घड़ी की टिक-टिक सुनाई देने लगी।

रिया की नेल पेंट वाली ब्रश हवा में रुक गई।

“क्या कहा आपने?”

“बिक्री साइन हो चुकी है। 30 दिन बाद नए मालिक आ जाएँगे। कल वकील का नोटिस मिल जाएगा। तुम दोनों को अपना घर ढूँढना होगा।”

आरव उठ खड़ा हुआ।

“आप ऐसा नहीं कर सकतीं।”

“कर सकती हूँ।”

“यह हमारा घर है!”

“नहीं। यह मेरा घर था। तुम मेहमान थे।”

“हम यहाँ 5 साल से रह रहे हैं!”

“और 5 साल में तुमने किराया नहीं दिया, धन्यवाद नहीं दिया, और सम्मान तो बिल्कुल नहीं दिया।”

रिया का चेहरा उतर गया।

“हमारे पास सिक्योरिटी डिपॉज़िट के पैसे नहीं हैं। शादी में सब खर्च हो गया। लहंगा, फोटोग्राफी, गोवा…”

शकुंतला ने पहली बार उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा—

“जिस औरत के पैसे पर तुम्हारी स्थिरता खड़ी थी, उसी के सिर पर चाशनी डालने से पहले यह सोचना चाहिए था।”

आरव की आवाज़ टूट गई।

“माँ, 6 महीने दे दो। प्लीज़।”

“मैंने 5 साल दिए। अब 30 दिन हैं।”

“आप हमें सड़क पर ला रही हैं।”

“नहीं। मैं तुम्हें तुम्हारे फैसलों के सामने खड़ा कर रही हूँ।”

रिया अचानक चीखी—

“सच्ची माँ कभी ऐसा नहीं करती!”

शकुंतला को चोट लगी। बहुत गहरी। मगर उन्होंने खुद को गिरने नहीं दिया।

“सच्ची माँ अपने बेटे से प्यार कर सकती है, पर उसके पैरों के नीचे बिछकर गायब नहीं हो सकती।”

उस रात आरव उनके कमरे के बाहर आया।

“माँ, दरवाज़ा खोलो।”

शकुंतला ने आधा दरवाज़ा खोला।

“यह ऐसे खत्म नहीं हो सकता।”

“हो सकता है।”

“मैं आपका बेटा हूँ।”

“और मैं तुम्हारी माँ हूँ, एटीएम नहीं।”

आरव की आँखें भर आईं।

“मुझे लगा नहीं था आप इतना आगे चली जाएँगी।”

शकुंतला ने धीमे से कहा—

“मुझे भी नहीं लगा था कि मेरा बेटा चुप रहेगा, जब उसकी पत्नी मेरी बेइज़्ज़ती करेगी।”

इस बार उसका मौन उन्हें नहीं तोड़ पाया। वह बस सबूत बन गया।

अगले 30 दिन भारी थे। रिया फोन पर अपनी माँ से रोती—

“इतने छोटे फ्लैट में कैसे रहेंगे? लोकेशन भी खराब है।”

आरव बैंक से लोन की बात करता, एजेंट से बहस करता, फिर शकुंतला से मदद माँगता।

“माँ, बस डिपॉज़िट दे दो।”

शकुंतला ने उसे खाली डिब्बा पकड़ा दिया।

“इसमें अपनी चीज़ें रखो।”

“थोड़ा उधार?”

“तुम्हारे लिए उधार का मतलब होता है—जब तक माँ भूल न जाए।”

रात में दोनों की लड़ाई दीवारों से टकराती।

“सब तुम्हारी वजह से हुआ!” आरव चिल्लाता।

रिया जवाब देती—

“अगर तुमने पहले ही अपनी माँ को कंट्रोल किया होता तो आज ये दिन नहीं आता!”

शकुंतला अपने स्टूडियो में बैठी कपों को अखबार में लपेटती रहीं। उन्हें बेटे का दुख देखकर खुशी नहीं हुई। माँ का दिल इतना सस्ता नहीं होता। पर उन्होंने पहली बार समझा कि किसी को उसकी जिम्मेदारी का वजन महसूस होने देना क्रूरता नहीं, न्याय है।

मूविंग वाले दिन शकुंतला का सामान पहले निकला। उनका आरामकुर्सी, किताबें, कैनवास, महेश की तस्वीर, पीतल की घंटी, चाय के कप—सब ट्रक में चढ़ गया। रिया दरवाज़े पर हाथ बाँधे खड़ी थी।

“खुश हो गईं आप?”

शकुंतला रुकीं।

“मैं तुम्हारी परेशानी देखकर खुश नहीं हूँ। मैं अपने फैसले से शांत हूँ।”

“आपने अपने बेटे से घर छीन लिया।”

“नहीं। मैंने उसकी माँ को उसकी जिंदगी वापस दी।”

आरव गेट के पास खड़ा था। इस बार भी उसने कुछ नहीं कहा। मगर उसकी आँखों में पहली बार पछतावे जैसा कुछ था। शायद सच्चा। शायद देर से आया हुआ।

द्वारका का नया अपार्टमेंट छोटा था, मगर रोशनी से भरा। शकुंतला ने अपना आरामकुर्सी खिड़की के पास रखा। बालकनी में तुलसी, धनिया और मोगरे के गमले लगाए। रात को उन्होंने बिना किसी आवाज़, बिना किसी ताने, बिना किसी मांग के 9 घंटे नींद ली।

सुबह चाय बनाई तो स्वाद अलग था।

वह आज़ादी का स्वाद था।

3 हफ्ते बाद डोरबेल बजी। शकुंतला ने छेद से देखा। आरव बाहर खड़ा था। अकेला। शर्ट सिकुड़ी हुई, दाढ़ी बढ़ी हुई, आँखों के नीचे गहरे घेरे।

उन्होंने दरवाज़ा खोला, मगर रास्ता नहीं छोड़ा।

“नमस्ते माँ।”

“नमस्ते आरव।”

उसने अंदर झाँका।

“घर अच्छा है।”

“धन्यवाद।”

वह चुप रहा, फिर बोला—

“हमारा फ्लैट बहुत छोटा है। रिया को रसोई पसंद नहीं। किराया बहुत ज्यादा है। गोवा वाले पैसे भी बाकी हैं।”

शकुंतला ने कप पकड़े रखा।

“मुश्किल लग रहा है।”

आरव ने होंठ भींचे।

“थोड़ी मदद चाहिए।”

पुरानी हवा जैसे दरवाज़े के नीचे से फिर भीतर आना चाहती थी।

“किस तरह की मदद?”

“छोटा सा लोन। बस संभलने तक।”

शकुंतला ने उसे लंबे समय तक देखा। उन्हें छोटा आरव दिखा, जो बुखार में उनका हाथ पकड़कर सोता था। फिर वह युवा आरव दिखा, जो पिता की चिता के सामने टूट गया था। फिर वही आदमी दिखा, जिसने अपनी शादी में माँ की बेइज़्ज़ती पर नज़रें झुका ली थीं।

तीनों ने उन्हें दुख दिया।

“नहीं।”

आरव का चेहरा ढह गया।

“माँ…”

“मैं तुम्हारी गलतियों का खर्च अब नहीं उठाऊँगी।”

“लेकिन मैं आपसे प्यार करता हूँ।”

“मैं भी तुमसे प्यार करती हूँ। इसलिए सच बोल रही हूँ। जब तक तुम प्यार और पैसे को एक समझोगे, तुम मुझे कभी सम्मान नहीं दोगे।”

आरव ने आँखें पोंछीं।

“मैं कोशिश कर रहा हूँ।”

“तो अपनी जिंदगी की जिम्मेदारी से शुरू करो। जिस दिन तुम सिर्फ चाय पीने और इज़्ज़त से बात करने आओगे, यह दरवाज़ा खुलेगा। जिस दिन पैसे माँगने आओगे, बंद रहेगा।”

आरव ने धीरे से सिर हिलाया।

“रिया कहती है आप बदल गई हैं।”

शकुंतला के चेहरे पर थकी हुई मुस्कान आई।

“नहीं। मैं फिर से शकुंतला बन गई हूँ।”

उन्होंने दरवाज़ा धीरे से बंद किया। सज़ा देने के लिए नहीं। जीतने के लिए नहीं। बस खुद को बचाए रखने के लिए।

कुंडी की हल्की आवाज़ कमरे में गूँजी। शकुंतला अपने कैनवास के पास लौटीं। सफेद कपड़े पर उन्होंने गहरा नीला रंग लगाया। कई साल तक उन्हें लगता रहा कि शांति तब आएगी, जब उनका बेटा एक दिन उन्हें समझेगा।

वह गलत थीं।

शांति उस रात शुरू हो चुकी थी, जब वह शादी के हॉल से चिपचिपे बालों और भीगे पल्लू के साथ बाहर निकली थीं, मगर सिर झुकाकर नहीं।

उस सुबह, नीली रेखा खींचते हुए शकुंतला ने जाना—कभी-कभी माँ होना दरवाज़ा खोलना नहीं, उसे सही समय पर बंद करना भी होता है।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.